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शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

अयोध्या फिर चुनावी रणभूमि में




भाजपा के नए अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने एक बार फिर राम मंदिर का मुद्दा उछाला है। विहिप से जुड़े हुए साधु.संतों ने भी कहा है कि राम मंदिर उनके एजेन्डे पर है। संघ परिवार के सभी शीर्ष नेता महाकुंभ में पहुंच रहे हैं और पवित्र गंगा में डुबकी लगाकर यह घोषणा कर रहे हैं कि सन् 2014 के लोकसभा चुनाव में राम मंदिर का मुद्दा उनके चुनाव अभियान का केन्द्र बिन्दु होगा।
यह सचमुच चिंतनीय है कि राम मंदिर का मुद्दा इस तथ्य के बावजूद उठाया जा रहा है कि इलाहबाद हाईकोर्ट यह निर्णय दे चुका है कि विवादित भूमि को तीन बराबर भागों में बांटकर,तीनों पक्षकारों.सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला विराजमान. को सौंप दिया जाए। इस निर्णय को उच्चतम न्यायलय में चुनौती दी गई है और यह अपील देश के सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। इलाहबाद हाईकोर्ट के निर्णय के बाद आरएसएस ने कहा था कि बहुसंख्यकों की भावनाओं का आदर करते हुए मुसलमानों को अपने हिस्से की भूमि छोड़ देनी चाहिए। जहां मस्जिद थी, उस भूमि के मालिकाना हक के विवाद का मसला न्यायालय में लंबित होने के बावजूद विहिप आदि यह कह रहे हैं कि अयोध्या में कहीं भी मस्जिद का निर्माण नहीं होने दिया जाएगा। विहिप के अनुसार, मस्जिद का निर्माण अयोध्या की शास्त्रीय सीमा के बाहर किया जा सकता हैए जिसका वर्णन तुलसीदास की रामचरितमानस में किया गया है। कुल मिलाकर, विहिप का यह कहना है कि अयोध्या केवल हिन्दुओं की धर्मस्थली है। यहां यह स्पष्ट कर देना समीचीन होगा कि अयोध्या का अर्थ है युद्धया अर्थात युद्धमुक्त क्षेत्र। अयोध्या केवल हिन्दुओं के लिए पवित्र नहीं है। बौद्ध व जैन धर्मों की भी यह पवित्र स्थली रही है। पांचवी सदी ईसा पूर्व से अयोध्या में बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म के अनुयायियों ने बसना शुरू किया। यद्यपि बौद्ध धर्म को पहली सहस्त्राब्दी में विकट हमलों का सामना करना पड़ा तथापि इस धर्म के धर्मस्थलों के कुछ अवशेष अब भी अयोध्या में बचे हुए हैं। बौद्ध मान्यताओं के अनुसारए पहले और चैथे तीर्थंकंर का जन्म अयोध्या में हुआ था। अयोध्या में जो सबसे पहले जो हिन्दू पूजास्थल बने वे शैव व वैष्णव पंथों के थे। विष्णु के अवतार के रूप में राम की पूजा तो बहुत बाद में शुरू हुई। राम की मूर्तियों की चर्चा छठी शताब्दी ईसवी के बाद ही सुनाई देती है। अयोध्या के सबसे बड़ा मंदिर हनुमानगढ़ी, जिस भूमि पर बना है वह अवध के नवाब ने दान दी थी।
इस सिलसिले में यह मांग भी की जा रही है कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण सरकार उसी तरह करवाए जिस तरह सोमनाथ मंदिर का निर्माण करवाया गया था। आडवानी और कई अन्य यह दावा करते रहे हैं कि सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माणए नेहरू मंत्रिमंडल के निर्णयानुसार करवाया गया था। यह सफेद झूठ है। चूंकि आमजन बहुत समय तक सार्वजनिक मसलों को याद नहीं रखते इसलिए इसका लाभ उठाकर झूठ को बार.बार दोहराकर उसे सच की शक्ल देने की कोशिशें चलती रहती हैं। यह वही कला है जिसमें हिटलर के प्रचार मंत्री गोयबेल्स अत्यंत सिद्धहस्त थे। अगर हम इतिहास पर नजर डालें तो एक बिल्कुल अलग चित्र सामने आएगा। भारत सरकार का सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से कोई लेनादेना नहीं था। यह झूठ है कि नेहरू सरकार ने सोमनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था या निर्माण कार्य में किसी भी प्रकार की सहायता या सहभागिता की थी। यह दुष्प्रचार केवल इस आधार  पर किया जा रहा है कि नेहरू मंत्रिमंडल के दो मंत्री अपनी व्यक्तिगत हैसियत से सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के कार्य में शामिल हुए थे। सच यह है कि जब सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का मसला सरदार पटेल द्वारा उठाया गया थाए तब महात्मा गांधी ने यह राय व्यक्त की थी कि हिन्दू अपने मंदिर का निर्माण करने में पूर्णतः सक्षम हैं और उन्हें न तो सरकारी धन और ना ही सरकारी मदद की जरूरत है। सरकार को ऐसी कोई मदद करनी भी नहीं चाहिए और ना ही मंदिर के निर्माण के लिए सरकारी धन का इस्तेमाल होना चाहिए।
सरदार पटेल की मृत्यु के बाद, नेहरू सरकार के दो मंत्रियों के. एम. मुंशी और एन. व्ही. गाडगिल ने अपनी व्यक्तिगत हैसियत से मंदिर के पुनर्निर्माण में हिस्सेदारी की। केबिनेट ने सोमनाथ मंदिर के संबंध में कभी कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया, जैसा कि साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा दावा किया जा रहा है। मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण होने के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद को उसका उद्घाटन करने के लिए आमंत्रित किया गया। उन्होंने पंडित नेहरू के कड़े विरोध के बावजूद यह आमंत्रण स्वीकार कर लिया। पंडित नेहरू का यह मत था कि उच्च संवैधानिक, सार्वजनिक पदों पर विराजमान व्यक्तियों को किसी भी धर्म या उसके तीर्थस्थलों से संबंधित सार्वजनिक समारोहों में हिस्सा नहीं लेना चाहिए।
बाबरी विध्वंस को बीस साल गुजर चुके हैं। हम आज पीछे पलटकर देख सकते हैं कि राम मंदिर आंदोलन ने देश की राजनीति और समाज को कितना गहरा नुकसान पहुंचाया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अयोध्या मामले में अदालत ने आस्था को अपने फैसले का आधार बनाया। परंतु इस निर्णय को उच्चतम न्यायालय मंे चुनौती दी गई है। क्या कारण है कि अपने एजेन्डे की घोषणा करने के पहले आरएसएस, उच्चतम न्यायालय के निर्णय का इंतजार नहीं कर सकता इसका असली कारण राजनैतिक है। मंदिर आंदोलन का हिन्दू धर्म से कोई संबंध नहीं है। संघ परिवार ने मस्जिद तोड़ी और उससे उसकी राजनैतिक ताकत बढ़ी। सन् 1984 के चुनाव में भाजपा के केवल दो उम्मीदवार लोकसभा में पहुंच सके थे। परंतु इसके बादए संघ परिवार ने ज्योंही इस मुद्दे का पल्लू थामा, भाजपा की लोकसभा में सदस्य संख्या में तेजी से वृद्धि हुई। सन् 1999 के चुनाव में भाजपा के 183 उम्मीदवार  जीते। इस आंदोलन के कारण ही एक छोटे से दल से भाजपा सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बन सकी। परंतु शनैः.शनैः इस मुद्दे का जुनून जनता के सिर से उतरने  लगा और 1999 के बाद से भाजपा की लोकसभा में उपस्थिति लगातार घटती गई। राम मंदिर मुद्दे को पुनर्जीवित करने की वर्तमान कोशिशए एक सोची.समझी रणनीति का हिस्सा है। भाजपा शायद यह सोच रही है कि राम मंदिर के मुद्दे को हवा देकर वह एक बार फिर भारतीय राजनीति के शीर्ष पर पहुंच सकती है।
परंतु इस रणनीति की सफलता संदिग्ध है। दो दशकों की अवधि में मतदाताओं का मिजाज बदल गया है। कम उम्र के युवाओं की मंदिरों आदि में बहुत कम रूचि है। वे अन्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। फिर भी, समाज में एक ऐसा वर्ग है जिसकी भावनाओं को भड़काया जा सकता है। संघ परिवार अपने विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए इस मुद्दे को हवा देने की भरपूर कोशिश कर रहा है। आरएसएस जैसे संगठन केवल पहचान पर आधारित मुद्दों की दम पर जिन्दा रहते हैं। उनके लिए राम मंदिर का मुद्दाए तुरूप का इक्का है। बार.बार दोहराए गए इस तर्क कि राम मंदिर का संबंध भारतीय राष्ट्रीयता से है, ने कई लोगों को भ्रमित कर दिया है। हम सब यह जानते हैं कि भारतीय राष्ट्रीयताए मंदिरों और मस्जिदों के इर्दगिर्द नहीं घूमती। भारतीय राष्ट्रीयताए धार्मिक राष्ट्रीयता नहीं है। प्रजातंत्र में राष्ट्रीयता को सैकड़ों वर्ष पहले हुए राजाओं के धर्म से नहीं जोड़ा जा सकता। वैसे भीए सभी धर्मों के राजाओं के प्रशासनिक तंत्र में दोनों धार्मिक समुदायों के सदस्य रहते थे। हमें भारतीय स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों को एक बार फिर याद करना होगा। स्वाधीनता संग्राम ने ही भारत को एक राष्ट्र की शक्ल दी.एक ऐसे राष्ट्र की जो प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता पर आधारित है। आईए,हम मंदिर.मस्जिद के मुद्दों को दरकिनार करें और उन मसलों पर ध्यान दें जिनका संबंध हमारे देश के करोड़ों नागरिकों की रोजी.-रोटी, रहवास और मूल समस्याओं से है।

 .-राम पुनियानी

सोमवार, 14 जनवरी 2013

खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर ?



 संसद में सरकार की जीत , पर विपक्ष की हार भी नही --- हार है तो , आम खुदरा व्यापारियों की
विपक्षी पार्टियों के विरोध का खोखलापन इस बात से भी परिलक्षित हो रहा है कि उन्होंने उस विरोध को संसद में मतदान तक सीमित या लगभग सीमित कर दिया | उसे लेकर उन्होंने समाज में खुदरा व्यपारियो को संगठित व आन्दोलित करने और उसके जरिये सरकार पर दबाव डालने का कोई प्रयास ही नही किया | इसका प्रयास न तो उन्होंने संसदीय बहस या वोटिंग से पहले किया और न ही अब करने आ रहे है |
5 दिसम्बर के दिन केंद्र की कांग्रेस नेतृत्व सरकार ने लोक सभा में खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के प्रस्ताव को बहुमत से पास करवा लिया | दो दिन तक चले बहस के बाद हुए मतदान में प्रस्ताव के पक्ष में 253 सांसदों ने मत दिया | जब कि उसके विरोध या कहिये विपक्ष में 218 सांसदों ने मत दिया | इस तरह विधयेक के पक्ष में कुल 35 मत अधिक पड़े | हालाकि मतदान के समय विभिन्न पार्टियों के 29 सदस्य लोक सभा में उपस्थित ही नही थे | फिर समाजवादी पार्टी ( 22 सांसद ) और बहुजन समाज पार्टी ( 21 सांसद ) यानी कुल 43 सांसद मतदान के समय लोकसभा से बाहर चले गये | उन्होंने मतदान में हिस्सा नही लिया हालाकि बहस के दौरान इन दोनों पार्टियों ने भी अपने वक्तव्यों में खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष निवेश का विरोध किया था | जाहिर सी बात है कि अगर बहस में किये गये विरोध के मुताबिक़ वे विधेयक के विरोध में मतदान करते तो यह विधेयक ( 43 -- 35 ) 8 मतो से गिर जाता |
फिर अगले दिन राज्य सभा में भी सरकार ने इस विधेयक को पास करवा लिया | बसपा के सांसदों  ने वह उसके पक्ष में मतदान करके उसका प्रत्यक्ष समर्थन किया जबकि सपा के सांसदों  मतदान के समय राज्य सभा से बाहर चले गये | इस तरह उत्तर प्रदेश की राजनीति में कट्टर प्रतिद्वन्दिता में लगी रही सपा -- बसपा के लोक सभा में अप्रत्यक्ष और फिर राज्य सभा में बसपा के प्रत्यक्ष तथा सपा के अप्रत्यक्ष समर्थन के जरिये ही यह विधयेक पास हुआ | दोनों ने ही अपनी प्रतिद्वन्दिता को दरकिनार कर और बहस के दौरान खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर किये गये अपने विरोध को भी दरकिनार कर केन्द्रीय सरकार को इस विधेयक पर जीत हासिल करने में मदद की |
लेकिन इस विधेयक को पास करवाने और इसका वास्तविक विरोध न उठने देने के लिए सपा -- बसपा ही नही बल्कि अन्य दूसरी पार्टिया भी कम जिम्मेदार नही है | इस संदर्भ में याद रखने वाली पहली बात तो यह है कि नवम्बर 2011 में ही एकल ब्राण्ड के मालो सामानों के खुदरा व्यापार के लिए विदेशी मालिको को छूट दी जा चुकी है | सत्ता पक्ष और विपक्ष में बैठने वाली सभी पार्टियों ने इसे एक साल पहले ही स्वीकार कर लिया था | तब से आज तक उस विधेयक  का विरोध किसी पार्टी ने जारी नही रखा | न तो वैचारिक रूप में और न ही व्यवहारिक रूप में | साफ़ मतलब है कि सभी पार्टियों के लिए एकल ब्राण्ड खुदरा व्यापार में विदेशी मालिको के लिए अपनी सहमती दे दी थी | अब यह विधेयक तो उसका अगला विस्तार या अगला चरण मात्र है | इसके अंतर्गत अब सारे ब्रांडो या कहिए सभी तरह के मालो सामानों के खुदरा व्यापार में 51 % तक विदेशी -- निवेश या विदेशी -- मालिकाने का अधिकार प्रदान कर दिया गया है |
फिर इस संदर्भ में याद रखने वाली दूसरी प्रमुख बात यह है कि लोक सभा में प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा के नेरित्व की एन डी ए सरकार ने 2002  में ही खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी देने की तैयारी कर दिया था | उस समय विपक्षी पार्टी की भूमिका निभा रही कांग्रेस पार्टी ने भाजपा के इस प्रस्ताव को '' राष्ट्र विरोधी '' का प्रस्ताव बताया था | भाजपा के भीतर के अन्य विरोधो तथा उसके नेतृत्व के घटक दलों  के आपसी विरोधो के चलते यह मामला उस समय लटक गया था | फिर 2004 में तो खैर उसके हाथ से केन्द्रीय सत्ता ही निकल गयी , अन्यथा पूरी संभावना थी कि सत्ता में दुबारा आने के पश्चात वह इसे पास करवाती और कांग्रेस पार्टी विपक्ष में रहकर उसका वैसा ही विपक्षी विरोध करती जैसा कि भाजपा व उसके कई सहयोगी दलों ने अभी किया है |

याद  रखने वाली तीसरी प्रमुख बात यह है कि भाजपा नेतृत्व की एन .डी .ए सरकार से पहले संयुक्त मोर्चा सरकार ने विदेशी मालो सामानों के आयात पर लगे प्रतिबन्ध को घटाने के लिए नीतिगत बदलाव कर दिया था | फिर इसी नीति को बाद में भाजपा नेतृत्व की सरकार ने और कांग्रेस नेतृत्व की सरकार ने भी आगे बढाया | विदेशी मालो पर थोड़े बहुत लगे रहे प्रतिबन्ध को और ज्यादा घटाया |कोई भी समझ सकता कि विदेशी मालो सामानों को अधिकाधिक छूट देते बढाते जाने के बाद स्वंय विदेशी मालिको का उसके थोक व खुदरा व्यापार में आना उसका अगला चरण मात्र है | सभी जानते है कि संयुक्त मोर्चा तथा भाजपा नेतृत्व की एन डी ए सरकार और उसके बाद आई कांग्रेस नेतृत्व की यू पी ए सरकार में देश के सभी प्रमुख केन्द्रीय व सत्ताधारी पार्टिया प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में शामिल रही है |
इसीलिए अब यानी 2012 में कोई पार्टी यह कह सकने की स्थिति में नही रह गयी है कि उसके केन्द्रीय शासन सत्ता में भागीदारी के दौरान विदेशी माल और उनके को देश के बाजार में घुसने की छूट विदेशी मालिको के मालो सामानों को मिली बढ़ी | फिर 2011 से खुदरा व्यापार में लगे अन्तराष्ट्रीय स्तर के मालिको कम्पनियों को एकल ब्राण्ड के खुदरा व्यापार के लिए छूट दी गयी | और अब 2012 में इसे पूरी छूट में बदलने का  काम कर दिया गया |
इसके अलावा चौथी और अत्यंत महत्वपूर्ण बात यह है कि खुदरा व्यापार का क्षेत्र पहले देश की भी बड़ी व एकाधिकारी कम्पनियों के लिए भी पूरी तरह से खुला हुआ नही था | उस पर भी ( एम् . आर . टी पी कानून अर्थात एकाधिकारी प्रतिबंधात्मक कानून ) के जरिये कई क्षेत्रो के उत्पादन व व्यापार पर प्रतिबन्ध लगा हुआ था | साथ ही छोटे उद्यमियों एवं कारोबारियों के लिए कई क्षेत्रो में आरक्षित अधिकार भी मिले हुए थे | 1991 में उदारीकरण . वैश्वीकरण तथा निजीकरण की नीतियों को लागू करने के बाद इस प्रतिबंधात्मक कानून को हटाया जाने लगा |
फलत: विदेशी कम्पनियों के साथ सहयोग व साठ -- गाठ में बहुत पहले
जुडी और निरन्तर जुडती रही देश की दिग्गज कम्पनियों को खुदरा व्यापार में पूरी तरह घुसने बड़े -- बड़े माल शाप खोलने और चलाने की पूरी छुट पहले से ही मिलनी शुरू हो गयी थी | विदेशी कम्पनियों के माल सामानों के साथ खुदरा व्यापार भी अपने सहयोगियों व सहायक देशी कम्पनियों के जरिये पहले से ही आगमन होने लगा था |
अत: विदेशी मालो के साथ विदेशी कम्पनियों की सहायक देशी कम्पनियों को खुदरा व्यापार में मिलते रहे छूटो को देखते हुए विदेशी मालिको को खुदरा व्यापार करने की छूट मिलना वस्तुत: उसका अगला चरण ही माना जाएगा और माना भी जाना चाहिए | चूंकि इन नीतिगत बदलावों में सभी राजनितिक पार्टिया शामिल रही है | इसके विभिन्न चरणों को आगे बढाती रही है | लिहाजा इस समय खुदरा व्यापार में ज्यादातर विपक्षी पार्टियों द्वारा संसद में इसके विरोध में दिया गया मतदान भी उनके खोखले विरोध को ही परिलक्षित करता है |उनके विरोध का खोखलापन इस बात से भी परिलक्षित हो रहा है कि उन्होंने उस विरोध को संसद में मतदान तक सीमित या लगभग सीमित कर दिया | उसे लेकर उन्होंने समाज में खुदरा व्यापारियों को संगठित व आन्दोलित करने और उसके जरिये सरकार पर दबाव डालने का कोई प्रयास नही किया | इसका प्रयास न तो उन्होंने संसदीय बहस या वोटिंग से पहले किया और न ही अब करने आ रहे है | जबकि इसी समय सरकारी नौकरियों में दलित समुदाय के पदोन्नति के आरक्षण को लेकर संसद से लेकर आफिसो व सडको तक समर्थन व विरोध चल रहे है | संसद में वोटिंग हो रही है और समाज में उसके समर्थन व विरोध के प्रदर्शन हो रहे है | फुटकर व्यापारियों के आन्दोलनो को न खड़ा करने और उनके मुकाबले संख्या में कही कम कर्मचारियों के इस परस्पर विरोधी आन्दोलन प्रदर्शन को समाज में बढावा मिलने का एक प्रमुख कारण यह है कि खुदरा व्यापारियों के आन्दोलन का सीधा असर धनाढ्य वर्गीय आर्थिक नीतियों के विरुद्ध जाएगा , जब कि कर्मचारियों का परस्पर विरोधी आन्दोलन समाज में जातिवादी राजनितिक , सामाजिक गोलबन्दी बढाने और उसके सत्ता स्वार्थी इस्तेमाल के काम अना है | जैसा कि पहले भी आता रहा है |
इसीलिए यह विधेयक को संसद में पास कराने में कांग्रेस नेतृत्व की वर्तमान सरकार की जीत तो है पर वह विपक्षी पार्टियों की भी हार नही है | कयोकी उन्होंने इस विधेयक को संसदीय व विपक्षीय विरोध ही किया | उसका वास्तविक विरोध कदापि नही किया गया | फिर सही मायने में यह जीत खुदरा व्यापार में लगी अन्तराष्ट्रीय कम्पनियों और उनके सहयोगी  देशो की कम्पनियों की है | उसी तरह से यह हार भी दरअसल देश के आम खुदरा व्यापारियों की है |
एक और महत्वपूर्ण बात खासकर पिछले बीस सालो से निरन्तर बढाई जा रही वैश्वीकरणवादी नीतियों के जरिये उत्पादन व्यापार बाजार के हर क्षेत्र में देश व विदेश के बड़े धनाढ्य मालिको के छूटो अधिकारों को बढाया जाता रहा है | और जनसाधारण के विभिन्न हिस्से के मजदूरो , किसानो , दस्तकारो व छोटे कारोबारियों आदि के छूटो अधिकारों को काटा और घटाया गया है | इस बार इसका शिकार खुदरा व्यापारी खासकर छोटे और औसत खुदरा व्यापार में लगे चार करोड़ परिवार के लोगो को बनाया जा रहा है |
अत: खुदरा व्यापार के इस विधेयक के विरोध के लिए अब स्वंय खुदरा व्यापारियों को ही संगठित होना होगा | साथ ही किसानो मजदूरों एवं अन्य छोटे व्यापारियों के साथ खड़े होकर इन जन विरोधी वैश्वीकरणवादी नीतियों का भी निरंतर विरोध करना होगा |


-सुनील दत्ता
पत्रकार

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

फैजाबाद में सरकारी दंगा -3

कुल मिलाकर यदि दंगाइयों की कार्यप्रणाली, आगजनी को अंजाम देने के लिए प्रयुक्त सामग्री, साम्प्रदायिक शक्तियों के साथ एक दो अपवाद को छोड़कर समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेताओं के तालमेल और पुलिस प्रशासन द्वारा दंगाइयों को दी गई खुली छूट से यह निष्कर्ष निकलता है कि फैजाबाद के दंगे समाजवादी सरकार में होने वाले पूर्व के दंगों का विस्तार है। कोसी कलाँ और एस्थान की भाँति यहाँ भी पुलिस ने दंगाइयों को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया। यहाँ भी पुलिस ने घंटों तक लगातार चलने वाली लूट और आगजनी को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया। यहाँ भी दंगाइयों ने कहीं पुलिस फोर्स का रास्ता रोक लिया तो कहीं फायर ब्रिगेड की गाड़ी दंगाग्रस्त स्थान तक नहीं पहुँचने दी। भदरसा में दूसरे दिन दमकल गाडि़याँ तो पहुँचीं मगर उनके पास पानी नहीं था। आग तो सब कुछ खाक करके बुझ गई और सरकारी कागजों में इसका श्रेय आग बुझाने वाले अमले को मिल गया। प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार दंगों पर काबू पाने में पूरी तरह विफल है। विकराल रूप धारण करती जा रही इस समस्या को सुलझाने के लिए न तो सरकार के पास कोई स्पष्ट नीति है और न ही इच्छा शक्ति। प्रदेश की वर्तमान स्थिति और सरकार के रवैये से यह संदेह भी होता है कि कहीं यह सब जान बूझकर ध्रुवीकरण की राजनीति के लिए वातावरण निर्मित करने हेतु खेले गए किसी खतरनाक खेल का हिस्सा तो नहीं है। इस संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। सपा सुप्रीमो अपने बेटे की आठ महीने की सरकार को जितने नम्बर भी दे डालें परन्तु वास्तविक्ता तो यह है कि कानून व्यवस्था के मामले में इतनी ही अवधि में किसी भी अन्य सरकार की तुलना में उत्तर प्रदेश की यह अब तक की सबसे नाकाम सरकार है। हकीकत तो यह है कि अब दक्षिण पंथी और मध्यमार्गीय कहे जाने वाले राजनैतिक दलों के एजेन्डों में अन्तर सिमटता जा रहा है अगर कुछ बचा रह गया है तो भाषा और भाषण का। प्रदेश में आज एक वास्तविक सेकुलर राजनैतिक विकल्प की जितनी आवश्यकता महसूस की जा रही है शायद पहले कभी नहीं की गई।
-मसीहुद्दीन संजरी

बुधवार, 26 दिसंबर 2012

फैजाबाद में सरकारी दंगा -2

फैजाबाद में यह परम्परा रही है कि श्रद्धालु महिलाएँ चैक स्थित मस्जिद की सीढि़यों तथा ऊपर के हिस्से में जाकर हर साल जुलूस का स्वागत फूल बरसा कर किया करती थीं परन्तु इस साल पहली बार ऐसा नहीं हुआ। यह अपने आप में संदेह पैदा करने वाली बात थी। 24 अक्तूबर को मूर्ति विसर्जन के जुलूस से पहले ही मस्जिद के गेट के सामने दस पन्द्रह वाहन पार्क कर दिए गए। आपत्ति करने पर उनमें सवार व्यक्ति झगड़े पर उतारू हो गए। जब इसकी शिकायत मौके पर मौजूद पुलिस वालों से की गई तो उन लोगों ने शिकायतकर्ता को ही अपनी जान बचा कर निकल जाने की सलाह दे डाली। बाद मंे कई अन्य जगहों से ऐसी सूचनाएँ प्राप्त हुईं कि जब जुलूस में शामिल शरारती तत्वों की संदिग्ध हरकतों की जानकारी पुलिस वालों को दी गई तो उन लोगों ने इसी तरह के सुझाव देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली। इन घटनाओं से यह अंदाजा कर पाना कठिन नहीं है कि जो कुछ आगे घटित होने वाला था उसकी यदि उन्हें पक्की जानकारी नहीं तो कम से कम आभास अवश्य था। परन्तु जब जुलूस में धार्मिक नारों के साथ-साथ ‘यूपी भी गुजरात बनेगा फैजाबाद शुरुआत करेगा‘ जैसे साम्प्रदायिक नारे भी लगने लगे थे तो पुलिस प्रशासन को तुरन्त सजग हो जाना चाहिए था। परन्तु कोई अतिरिक्त सावधानी नही बरती गई। भदरसा में दंगा फूटने से पहले ही स्थानीय थाने के एस0ओ0 धरमपाल यादव ने वहाँ के चार मुस्लिम कोटेदारों से यह कहकर केरोसिन तेल मँगवाया कि बाहर से फोर्स आई हुई है और एस.डी.एम. साहब का आदेश है कि तेल पहुँचा दें। इस जबानी निर्देश पर कोटेदारों ने तेल पहुँचा दिए। अगले दिन उसी एस.ओ. ने कोटेदारों से केरोसिन तेल कैम्प से थाने पहुँचाने को कहा। चूँकि अब तक दंगा हो चुका था इसलिए उनमें से तीन ने जाने से इंकार कर दिया। चैथा कोटेदार जाहिद जब तेल पहुँचाने के लिए वहाँ गया तो उसे दंगा करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद समाचार पत्रों में विनय कटियार के हवाले से यह खबर प्रकाशित हुई कि भदरसा के मुस्लिम कोटेदारों ने आगजनी को अंजाम देने के लिए मुसलमानों में 5-5 लीटर केरोसिन तेल बाँटे थे। इसी तरह की कई अन्य घटनाओं को झाड़ कर देखा जाए तो आसानी से इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि दंगों की योजना पहले से तैयार थी और पुलिस प्रशासन में ऐसे लोग मौजूद थे जिनको बाद में घटित होने वाली घटनाओं की पहले से ही जानकारी थी।
    फैजाबाद शहर के चैक क्षेत्र में सबसे पहले दंगा शुरू हुआ। दंगा शाम के लगभग साढ़े चार बजे से रात ग्यारह बजे तक चलता रहा। वैसे व्यावहारिक रूप से इसे दंगा कहा ही नहीं जा सकता। यह तो किसी विजयी सेना के विध्वंस अभियान जैसा था। बलबाइयों की भीड़ द्वारा चुनचुन कर मुसलमानों की दुकानें पहले लूटी गईं फिर उनमें आग लगा दी गई। पुलिस ने कभी भी दंगाइयों को रोकने का प्रयास नहीं किया। हकीकत तो यह है कि दंगाई इतने निश्चिंत थे कि लूटे हुए सामान को ठेले पर लाद कर सुरक्षित स्थान तक ले गए। दंगा भड़कने के बाद तो सामान्य जन ने अपने अपने घरों की राह ली परन्तु कुछ ऐसे लोग भी थे जिन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर दंगाइयों द्वारा लगाई गई आग को बुझाने का प्रयास किया। हालाँकि उनके पास न तो कोई यन्त्र था और न ही पानी उपलब्ध और न तो वह अपने प्रयास में सफल ही हो सके। किन्तु उन विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होनंे मानवता को शर्मसार होने से बचाने के लिए जो कुछ किया हम उस पर गर्व कर सकते हैं। उन्हीं में से दो मित्र आशीष और दीपक भी थे। लेकिन जब पुलिस वालों की नजर इन दोनों पर पड़ी तो उनकी निष्क्रियता सक्रियता में बदल गई। इन दोनों को वहाँ से खदेड़ दिया गया जबकि दंगाई अपना काम निर्बाध रूप से अंजाम देते रहे। दंगों की यह आग फैजाबाद के अन्य कस्बों और गाँवों तक भी पहुँच गई। भदरसा, भेलसर, रुदौली और शाहगंज में भी मुसलमानों के घर और दुकानों को पहचान कर पहले लूटा गया फिर आग लगा दी गई। सिर्फ भदरसा कस्बे में मुसलमानों के एक सौ तीन घर और मकान जला कर खाक कर दिए गए। इन दंगों का सबसे दुखद पहलू यह था कि फैजाबाद शहर और कस्बों के अतिरिक्त लगभग दो दर्जन गाँवों या छोटे चट्टी चैराहों पर मुसलमानों के मकानों और दुकानों को जलाए जाने की घटना की ओर बहुत कम लोगों का ध्यान जा पाया। उनकी बर्बादी का दृश्य दिल दहला देने वाला था। फतेहपुर, इस्लामाबाद, फुलवरिया, भरत कुंड और लालगाँव जैसी कई बस्तियों में जहाँ गरीब मुसलमान रहते हैं उनके घरों और छोटे कारोबारों को पूरी तरह तबाह कर दिया गया। कहानी वहाँ भी वैसी ही थी जैसी शहर और कस्बा क्षेत्रों की। इन गाँवों में भी पहले दंगाइयों ने घरों को लूटा फिर जो सामान नहीं ले जा पाए उन्हें इकट्ठा करके आग के हवाले कर दिया। खपरैल और फूस के छप्पर जलकर खाक हो गए। अब वहाँ घरों के नाम पर सिर्फ दीवारें बची थीं और कच्ची फर्श पर बिछा कर बैठने के लिए बोरिया भी नहीं था। चालीस पचास घरों की आबादी वाले फतेहपुर गाँव में मुसलमानों के कुल सोलह घर हैं। सब जलकर खाक हो गए बाकी किसी भी मकान को आँच तक नहीं आई। उनकी बर्बादी की गाथा न तो अखबारों में जगह पा सकी और न ही वहाँ कोई विधायक मंत्री पहुँचा। शायद यही कारण था कि भदरसा की तरह दंगाइयों और प्रशासन में उनके सहयोगियों ने एक दो मड़हों को जलाकर दो तरफा दंगा दिखाने का नाटक करने की भी आवश्यकता महसूस नहीं की। जब प्रशासन को लगा कि अब कुछ मानवाधिकार संगठनों का रुख गाँवों की तरफ भी हो रहा है तो वहाँ सफाई के लिए दबाव बना कर सुबूतों को मिटाने का प्रयास शुरू हो गया। इसी क्रम में फतेहपुर गाँव में लेखपाल राजेश सिंह ने कानूनगो और पुलिस वालों के साथ मिलकर कुछ घरों की जबरन सफाई भी करवा दी। फतेहपुर में लुटने और जलने वाले सभी घर मुसलमानों ही के थे इसलिए हमें उस समय बहुत आश्चर्य हुआ जब यह बताया गया कि गाँव से कई मुसलमान युवकों को दंगा करने के आरोप में पुलिस उठा कर ले गई है। हम इस बात पर हैरान थे कि आखिर पुलिस फतेहपुर के मुसलमानों की गिरफ्तारी को कैसे जायज ठहरा पाएगी। परन्तु जब रिहाई मंच की जाँच में यह बात सामने आई कि सरकारी जाँच में फुलवरिया के कुछ हिन्दू परिवारों के घरों को जला हुआ दिखाया गया है और उनको मुआवजे की रकम भी अदा की जा चुकी है तब अचानक फतेहपुर से गिरफ्तार किए गए युवकों की गुत्थी सुलझती हुई नजर आने लगी। अब ऐसी आपराधिक अनियमितताओं की खबरें कई जगहों से आ रही है। भदरसा में एक चैदह वर्षीय बालक को दंगा करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। भदरसा से ही पिछले सात महीने में दो बार फालिज के हमले के शिकार 75 वर्ष के इफ्तेख़ार को हत्या का आरोपी बनाया गया है। ज्यादा तर गिरफ्तार मुसलमानों के स्वयं अपने ही घर और कारोबार जलकर भस्म हो चुके हैं।
-मसीहुद्दीन संजरी

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

फैजाबाद में सरकारी दंगा -1



उ0प्र0की समाजवादी सरकार में होने वाले दंगों का न केवल सिलसिला ब़ता जा रहा है बल्कि उसी अनुपात में उनकी आक्रामकता, तीव्रता और विध्वंसता में भी वृद्धि होती जा रही है। साम्प्रदायिक शक्तियों के हौसले बुलंद होते जा रहे हैं। वे अपनी योजनाओं में पहले से ज्यादा सफल भी हो रहे हैं और साथसाथ अपना साम्प्रदायिक आधार भी ब़ाने में सफल होते प्रतीत होते हैं। पहले भी दंगों के पूर्वनियोजित होने, प्रशासन की निष्क्रियता और शासन की संवेदनहीनता के आरोप लगते रहे हैं। परन्तु फैजाबाद के दंगों के मामले में तो ऐसा लगता है कि दंगे पूर्वनियोजित और संगठित ही नहीं थे बल्कि प्रशासनिक एवं राजनैतिक स्तर पर भी दंगा फैलाने वालों ने तालमेल बना रखा था। दंगों से पहले और बाद की कुछ घटनाओं का विश्लेषण करने पर इसी प्रकार के तथ्य खुलकर सामने आते हैं। दंगा भड़कने का आकस्मिक कारण कुछ भी बताया जाए परन्तु यह सच है कि इसकी तैयारी काफी पहले से चल रही थी। प्रशासन का रवैया लापरवाही भरा और पक्षपातपूर्ण था। प्रदेश सरकार की भूमिका बेहद संदेहास्पद और निराशाजनक थी। बाबरी मस्जिद
विध्वंस के पश्चात भी साम्प्रदायिक दंगों की आग से बचा रहने वाला फैजाबाद फासीवादी शक्तियों के चंगुल में कैसे चला गया इसे समझने के लिए इन शक्तियों की वहाँ पहले से चल रही गतिविधियों और शासन प्रशासन की भूमिका को समझना जरूरी है।
फैजाबाद की बड़ी देवकाली मंदिर से 21 सितम्बर को मूर्तियाँ चोरी हो गईं। पहले इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ। फिर स्थानीय नेताओं ने पुलिस प्रशासन के खिलाफ अपने विरोध को मुखर बनाने के लिए ॔देवकाली मंदिर पूजा स्थापना समिति॔ का गठन किया। हालाँकि मंदिर के केयरटेकर श्रीराम पाठक का कहना है कि एक खास राजनैतिक दल के लोगों ने मंदिर प्रबन्धन पर संघर्ष समिति में शामिल होने का दबाव भी बनाया परन्तु इससे जुड़ा हुआ कोई भी व्यक्ति समिति में शामिल नहीं हुआ। क्योंकि समिति इस मामले को साम्प्रदायिक दृष्टि से देख रही थी। 13 अक्तूबर को योगी आदित्यनाथ ने फैजाबाद पहुँच कर मूर्ति चोरी का आरोप सीधे मुसलमानों पर लगाते हुए प्रशासन को यह धमकी दी कि यदि दो दिन के भीतर मूर्तियाँ बरामद नहीं की गईं तो उनके मामले को अपने हाथ में ले लेंगे। यहीं से पूरा आन्दोलन मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने के अभियान में बदल गया। स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए समाजवादी पार्टी के विधायक तेजनारायण पाण्डेय ने समिति के सदस्यों को लेकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मुलाकात की। तेजनारायण ने मुख्यमंत्री को बताया कि साम्प्रदायिक शक्तियाँ फैजाबाद की शान्ति को चुनाव के समय से ही भंग करने पर तुली हुई थीं। अब वह मूर्ति चोरी के मामले को लेकर तनाव उत्पन्न करना चाहती हैं इसलिए मूर्तियों को बरामद करने की दिशा में तेजी लाने के लिए प्रशासन को निर्देशित करें। पाण्डेय का मानना था कि भाजपा के नेता विधान सभा चुनाव में मिली पराजय को पचा नहीं पा रहे हैं और लगातार वातावरण को दूषित करने में लगे हुए हैं। इसी दौरान दशहरा से दो दिन पहले 22 अक्तूबर को चोरी की गई मूर्तियाँ कानपूर से बरामद कर ली गईं और इस आरोप में चार लोगों को गिरफ्तार भी कर लिया गया। योगी आदित्यनाथ के आरोपों के विपरीत गिरफ्तार चारों व्यक्तियों में से कोई भी मुसलमान नहीं था। परन्तु मूर्ति चोरी के नाम पर साम्प्रदायिकता का खेल खेलने पर आमादा समिति के लोगों की पोल उस समय खुल गई जब वह बरामद मूर्तियों को नकली कहकर अपने दुष्प्रचार अभियान पर अड़े रहे। अन्त में मंदिर की मूर्तियों की देखभाल करने वाले महन्त को न्यायालय में जाकर बरामद मूर्तियों की शिनाख्त करनी पड़ी।
ठीक उसी समय आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तार किए गए बेकसूर मुस्लिम युवकों की रिहाई के सम्बन्ध में प्रदेश सरकार द्वारा विभिन्न जनपदों के जिलाधीशों को लिखे गए पत्र के खिलाफ विरोध स्वरूप फैजाबाद में अधिवक्ताओं ने हड़ताल कर दी। यह हड़ताल करीब पच्चीस दिनों तक जारी रही। इस बीच पूरे जनपद से जिला मुख्यालय पर आने वालों के सामने मूर्ति चोरी और आतंकवादियों को छोड़े जाने समेत मुसलमानों के अत्याचार तथा मंदिर निर्माण जैसी बातें की जाती रहीं। इस प्रकार लगभग एक महीना तक साम्प्रदायिकता की कार्यशाला चलती रही। परन्तु प्रशासन की तरफ से उसे रोकने का कोई प्रयास नहीं किया गया। शासन या प्रशासन की ओर से जन सामान्य को यह बताने की कोशिश कभी नहीं की गई कि सरकार आतंकियों नहीं आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों को छोड़ने की बात कर रही है। एक आरोप तो यह भी है कि जिलाधीशों को लिखे गए पत्र जानबूझ कर फैजाबाद से ही लीक करवाए गए थे। एक और महत्वपूर्ण बात यह कि दशहरे से ठीक पहले ॔श्री नव दुर्गा समिति॔ की तरफ से मूर्ति विसर्जन के जुलूस में शामिल होने के लिए निमन्त्रण भेजे गए थे। निमन्त्रण पत्र में यह अपील की गई थी कि लोग भारी संख्या में भाग लें परन्तु स्ति्रयों और बच्चों को साथ न लाएँ जबकि इस प्रकार के कार्यक्रमों में बच्चों के लिए खास आकर्षण होता है। यह अभूतपूर्व था और इसके पीछे की मंशा को खँगालना आवश्यक था फिर भी प्रशासन ने कोई सुध नहीं ली। इतना सब कुछ होने के बावजूद क्या इस बात में कोई शंका रह जाती है कि दंगों की पृष्ठभूमि बहुत पहले से तैयार की जा रही थी? फिर भी कोई विशेष सुरक्षा व्यवस्था तो दूर दशहरे के दिन सुरक्षा व्यवस्था सामान्य से भी कम थी। क्या यह माना जा सकता है कि इन घटनाओं की जानकारी प्रशासन को नहीं थी? हमारा खुफिया तंत्र वह सब कुछ नहीं देख पाया जो एक सामान्य व्यक्ति आसानी से महसूस कर सकता था। सत्ताधारी दल के विधायक ने भी स्वंय सरकार के मुखिया को फैजाबाद की स्थिति से अवगत कराया था। इन परिस्थितियों का मुकाबला करने के लिए सरकार या प्रशासन ने कौन से कदम उठाए यह बताने के लिए किसी के पास कुछ नहीं है।
-मसीहुद्दीन संजरी

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

प्रत्यक्ष खुदरा विदेशी निवेश का प्रभाव

हिन्दुस्तान में प्रत्यक्ष खुदरा विदेशी निवेश का प्रभाव

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश वह पूँजी निवेश है जो किसी विदेशी कम्पनी के द्वारा दूसरे देश में लाभ कमाने के लिए किया जाता है। वह या तो अपनी कम्पनी का विस्तार दूसरे देश में करता है या नई कम्पनी खोलकर पूँजी निवेश करता है। ऐसा करते समय वह इस बात का विशोष
ध्यान रखता है कि जिस देश में वह निवेश करना चाहता है वहाँ स्पष्ट लाभ का अवसर, कच्चा माल, सस्ता मजदूर, यातायात की सुविधा, मुनाफे का बाजार, सस्ते दरों पर पूँजी ऋण की उपलब्धता एवं सुरक्षा, विभिन्न करों में छूट, जमीन, बिजली, आदि आवश्यक संसाधनों की रियायती दरों पर उपलब्धता हो। ऐसा करने के लिए वह विभिन्न देशों का तुलनात्मक अध्ययन करता है और जहाँ उसे सर्वाधिक सहूलियत के साथ लाभ की सम्भावना दिखता है, वह अपने लाभ को अधिकतम करने के लिए पूँजी निवेश करता है। यद्यपि जरूरी नहीं कि वह अपनी ही पूँजी लगाए। अक्सर वह बैंकों से कर्ज लेकर तथा कम्पनी का शेयर या तो स्वयं खरीदकर या फिर साझे हिस्सेदारी से अपनी कारोबार को ब़ाता है।
हिन्दुस्तान में भी विभिन्न देशों की विदेशी कम्पनियाँ सदियों से व्यापार और कारोबार के लिए आती रहीं हैं। पुर्तगाल, फ्रान्स, इंगलैंड, चीन, जापान, आदि देशों की कम्पनियाँ हमारे देश में आती रही हैं। 1990 में भारत में विदेशी निवेश 1 अरब डालर से भी कम था किन्तु उदारीकरण के साथ विदेशी निवेश में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है। अंक्टाड के एक सर्वे आधारित आकलन के अनुसार हमारा देश प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में आकर्षण की दृष्टि से चीन के बाद दूसरा स्थान रखता है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 2010 में भारत में 44.8 अरब डालर का हुआ जो 2011 में 13 प्रतिशत ब़ोतरी के साथ 50.8 अरब डालर हो गया। 2012 मार्च तक इसमें आठ गुणा वृद्धि हो गया। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का भारत में आकर्षण का मुख्य कारण दुनिया के औद्योगिक देशों में छाई मंदी के कारण पूँजी के लाभ के लिए सुरक्षित निवेश के बाजार की तलाश और 1990 के दशक में भारत द्वारा अपनाया गया उदारीकरण, भूमंडलीकरण एवं निजीकरण की नीति रही है। भारत सरकार द्वारा लगातार विदेशी पूँजी को आकर्षित करने के लिए रियायतें दी जाती रहीं हैं। कई कम्पनियों के सार्वजनिक उपक्रमों की हिस्सेदारी निजी कम्पनियों को बेची गई है। विशोष आर्थिक क्षेत्र का प्रावधान किया गया है जिसके कारण करों में पूर्णतः छूट, श्रमिक कानूनों के अनुपालन में ील एवं अन्य कई रियायतें दी गई हैं। हाल में विमानन के क्षेत्र में 49 प्रतिशत, प्रसारण के क्षेत्र में 74 प्रतिशत, मल्टीब्रांड खुदरा क्षेत्र में 51 प्रतिशत, एक ब्रांड खुदरा क्षेत्र में 100 प्रतिशत, आपूर्ति क्षेत्र में कोल्ड चेन विकसित करने में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अनुमति दी गई है।
हमारे देश के सरकारी विशोषज्ञ, अधिकारी, शीर्ष नेतृत्व, मंत्री, एवं प्रधान मंत्री, नई आर्थिक नीति के लागू करने में यह तर्क देते रहे हैं कि निजी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से देश में वस्तु एवं सेवा के उत्पादन में वृद्धि होगी, रोजगार ब़ेगा एवं गरीबी कम होगी। औद्योगिक मंदी जब 2008 में विश्व अर्थव्यवस्था को निगल रही थी तो भी उदारीकरण के पैरोकार यह कहते नहीं थक रहे थे कि भारत का आर्थिक संरचना मजबूत है, इस पर दुनिया के मंदी का असर नहीं पड़ेगा। विकसित कहे जाने वाले देशों में जब कुशल मजदूर, डॉक्टर, इन्जीनियर आदि की छँटनी हो रही थी, जब उनके वीजा के नियमों को सख्त किए जा रहे थे तो भी हम उदारीकरण के फायदे गिनाने में लगे रहे हैं। जबकि आलम यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था का विकास दर लगातार संशोधित हो रहा है और अब लगभग 5 फीसदी पर पहुँच गया है। रोजगार वृद्धि का स्तर तो और भी चिन्ताजनक है। हाल के आधिकारिक आँकड़े बताते हैं कि 2000 से 2005 के बीच कुल रोजगार में वृद्धि दर 2.7 फीसदी रही जो 2005 से 2010 के बीच घटकर 0.8 फीसदी हो गई। इन्हीं अवधियों में गैर खेती क्षेत्र में रोजगार वृद्धि दर 4.65 प्रतिशत से घटकर 2.53 हो गया। कुपोषण को तो प्रधानमंत्री जी ने राष्ट्रीय शर्म तक कह दिया है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 200910 के 66वें दौर के आँकड़े बताते हैं कि ग्रामीण भारत में 2400 कैलोरी से कम पर जीने वाले 79 फीसद तथा शहरी भारत में 2100 कैलोरी से कम उपभोग करने वाले 72 फीसद हैं। फिर भी योजना आयोग की सत्ता ठाकुर सुहाती देश की गरीबी के आकलन को घटाकर 29.8 फीसदी, ग्रामीण गरीबी 33.8 और शहरी गरीबी 20.9 फीसदी कर घटाने में लगी रही है। अतः उदारीकरण के लगभग दो दशक के बाद जो तथ्य उभर कर आए हैं, वे उदारीकरण से लाभ के उन तर्कों के विपरीत हैं। विश्व समुदाय एवं संगठन ने भी यह स्वीकार किया है कि बाजारीकरण से हाशियाकरण ब़ा है। अतः बाजार को मानवीय चेहरा बनाने पर बल दिया जाना चाहिए। वास्तविकता यह है कि बाजार का सीधा रिश्ता लाभ कमाने से है। उसे मानवीय चेहरे के साथ लाभ कमाने की कोई बाध्यता नहीं है। ऐसे में जिस तेवर से दूसरे चरण का आर्थिक सुधार लागू करने में सरकार ने खुदरा क्षेत्र में, विशोषकर मल्टीब्रांडिंग खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अनुमति दिया है, उसका कितना गहरा प्रभाव आम आदमी पर पड़ेगा, इस पर गम्भीरता से विचार करने की जरूरत है। यह तब और भी आवश्यक है जब भारत का खुदरा क्षेत्र खेती के बाद दूसरा सबसे बड़ा रोजगार देने वाला क्षेत्र है। खुदरा क्षेत्र में लगभग 4 करोड़ लोग रोजगार पाते हैं, जिसमें अधिकांश छोटे असंगठित एवं स्वरोजगार में लगे हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनी के इस क्षेत्र में निवेश की अनुमति से छोटे खुदरा कारोबारियों को रोजगार से बाहर करने की सम्भावना ब़ जाती है। इक्रीयर के 2008 के एक अध्ययन के अनुसार ठेला खोंमचावालों को छोड़कर औसतन 217 वर्गफीट में एक खुदरा कारोबार होता है। इक्रीयर के आकलन के अनुसार भारत में कुल वार्षिक खुदरा व्यवसाय 200607 में 408.8 अरब डालर था और 1.3 करोड़ पारम्परिक खुदरा करोबारी हैं। इस प्रकार प्रति व्यवसाय औसत 31446 डालर या 15 लाख रूपये की पूँजी के साथ औसतन 2 से 3 लोग प्रति कारोबार रोजगार में लगे रहते हैं।
इसके विपरीत संयुक्त राज्य अमेरिका में एक वालमार्ट सुपरबाजार लगभग 108000 वर्ग फीट में फैला होता है जिसमें 225 लोग रोजगार में लगे होते हैं। वर्ष 2010 में 28 देशों में फैले लगभग 9800 दुकानों में 21 लाख लोगों को रोजगार देते हुए 405 अरब डालर का कारोबार किया। इस प्रकार एक विदेशी पूँजी की दुकान औसत 1300 दुकानों की जगह लेगा और 3900 लोगों को रोजगार से बेदखल करेगा। अतः खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से रोजगार के नुकसान का अनुमान लगाया जा सकता है। जबकि वाणिज्य मंत्री खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से तीन साल में लगभग 40 लाख सीधे एवं 60 लाख अन्य तरह से, इस प्रकार 1 करोड़ रोजगार पैदा करने का दावा करते हैं। भारत दुनिया के चार बड़े खुदरा कारोबारी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आधार पर जिसमें औसतन 117 को रोजगार मिलता है, इसके लिए कम से कम 34180 मॉल खोलने होंगे। भारत सरकार वैसे शहरों में ऐसा निजी मॉल खोलवाना चाहती है जिनकी आबादी 10 लाख से अधिक है, अर्थात 53 बड़े शहरों में से प्रत्येक शहर में 644 सुपर बाजार खोलने होंगे। यदि अमरीका का मानक जमीन की जरूरत हो तो एक शहर में लगभग 1596 एकड़ जमीन मुहैया कराएगी। इस प्रकार कुल 84588 एकड़ जमीन प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए तीन वर्षों में देने का इरादा रखती है। भारत सरकार दावा करती है कि खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से खाद्य आपूर्ति के क्षेत्र में आधुनिकीकरण से खाद्यान्न नष्ट होने से बचाया जा सकेगा, साथ ही किसानों को बिचौलियों से मुक्ति मिलेगी तथा बाजार का लाभ मिलेगा। अमरीकी प्रयोग के अनुभव पर गौर करें तो मात्र 24 फीसदी शीतगृह का निर्माण निजी क्षेत्रों के द्वारा हुआ है, शेष 76 फीसदी सार्वजनिक क्षेत्र का है। निजी क्षेत्र सार्वजनिक सुविधाओं का लाभ लेकर मुनाफा ब़ाता है। जहाँ तक बिचौलियों के समाप्त होने तथा किसानों को बाजार का लाभ मिलने का है, जिन देशों ने निजी क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को ब़ाया है वहाँ निजीकरण का लाभ पूँजी को मिला है किसान को नहीं। यूरोपियन संघ में भी फ्रांस, इटली, नीदरलैंड, बेलजियम, आयरलैंड, हंगरी आदि देशों के किसानों के प्रतिरोध के परिणाम स्वरूप 2008 में विभिन्न देशों के संसद ने इसे स्वीकारा। दक्षिण पूर्व एशियाई देशों का अनुभव भी साथ नहीं देता है। मलयेशिया और थाईलैंड के सुपरबाजार ने भी बिचौलियों को ब़ाया ही है। भारत में कैडबरी ने कर्नाटक के कैंपको को बंद करवा दिया। जहाँ तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से सस्ते दरों पर चीजों के उपलब्ध होने की बात है इसका भी आधार नहीं दिखता है। दवा के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से दवा की कीमत कम नहीं हुई बल्कि बेतहासा ब़ी है। दुनिया के देशों का अनुभव है कि खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का खुदरा एकाधिकार में ब़ोतरी हुई है।
यह एक ऐतिहासिक सच है कि जब भी विदेशी कम्पनियाँ भारत आईं तो अपने साथ कुछ संस्कृति, कुछ तकनीक, कुछ नई चीजें भी लाइंर्। पुर्तगाली आलू, गोभी, पपीता लाए। इंगलैंड की ईस्ट इन्डिया कम्पनी पहले व्यापार करने आई फिर बंगाल की दीवानी खरीदा, धीरेधीरे सेना, रेल, अपनी जरूरत के हिसाब से न्यायालय, शिक्षा, सचिवालय, जमीनी इन्तजाम, अपनी कर प्रणाली आदि और पूरे देश का शासक बन बैठी। हमारे बीच के ही लोग उनकी मदद कर रहे थे और देश हित को नीलाम कर रहे थे। अधिकांश राजा महाराजा, हुक्मरान, अफसरान और अमला उनके साथ मिलकर आम तौर पर किसानों और मजदूरों का शोषण कर रहे थे। देश गुलाम रहा और दलालों का ऐशो आराम बदस्तूर जारी रहा। खेती, घरेलू उद्योग धंधे विदेशी बाजारों की भेंट च़ गए। बेरोजगारी और गरीबी के बीच आम जन जीवन रेंगती रही। अंग्रेजों का जमींदारों और हुक्मरानों के साथ ब़ते औपनिवेशिक शोषण के खिलाफ प्रतिरोध और जंग में किसानों और मजदूरों के आंदोलन ने महत्वपूर्ण मुकाम हासिल किया। साम्राज्यवाद विरोधी शक्तियों के संघर्ष ने आजादी की लड़ाई तेज की। विभिन्न नेतृत्व के कशमकश के बीच जैसी भी आजादी मिली, उसे जनसाधारण तक पहुँचाने की चुनौतियाँ आज भी बरकरार हैं। केन्द्र और राज्य में सत्तासीन वर्ग लोकतंत्र का उपयोग
प्रमुखता से पूँजी के पक्ष में करता रहा है। खुदरा क्षेत्र के कारोबार को विदेशी पूँजी के लिए खोलना भी उसी का एक नमूना है। सत्तावर्ग को पूँजी के संकट और औद्योगिक मंदी की जितनी चिंता है, जनसाधारण की गरीबी की नहीं। जिस तबज्जो से विशोष आर्थिक क्षेत्र पर जोर है वैसा जोर भूमि सुधार पर नहीं रहा। जन साधारण की जीविका विस्तार के नाम पर जीविका के अवसर घटते जा रहे हैं। विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनो को पूँजी के हवाले किया जा रहा है। विभिन्न राजनैतिक दल अवसरवादी संसदीय भटकाव में खुदरा विदेशी निवेश के विरोध करने का स्वांग जरूर करते हैं किन्तु अविश्वास प्रस्ताव के निर्णायक परिस्थिति में कोई बहाना बनाकर सरकार को गिरने से बचाने का व्यावहारिक उपाय ़ूढ़ते हैं, जिससे चुनाव से बचा जा सके। ऐसे में दादा धर्माधिकारी का कथन सही प्रतीत होता है कि ॔लोकशाही पूँजी के खेमा में खड़ी है’। ऐसे में लोकशाही और संसद को जनसाधारण के पक्ष में खड़ा करने की चुनौतियाँ हैं। लाजिमी है कि इस प्रयास में सत्ता वर्ग अपना अस्तित्व बचाने के लिए लोकतंत्र के नाम पर हर तरह के जनविरोधी हथकंडे अख्तियार करेगा। जन संघर्ष से ही लोकतंत्र एवं संसद को पूँजी सत्तावर्ग से मुक्त कराया जा सकता है। संघर्ष के अलावा और कोई विकल्प शेष नहीं प्रतीत होता है।
-डी0 एम0 दिवाकर

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

बंगाल विधानसभा में हिंसा

 विधानसभा में मंगलवार को जो कुछ हुआ उससे बंगाल दुनिया में कलंकित हुआ है। इसके लिए सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस को कभी माफ नहीं किया जाएगा। उक्त बातें मंगलवार को सिलीगुड़ी में पत्रकारों से बात करते हुए वाममोर्चा चेयरमैन विमान बोस ने कहा। उन्होंने कहा कि सत्ता में आने के साथ ही तृणमूल कांग्रेस विरोधियों पर दलतंत्र का अंकुश लगाने का प्रयास करती रही है। विरोधी विधायकों को सदन के अंदर बोलने की आजादी छीनी जाती है। विधानसभा की कार्रवाई या फैसला को सदन में नहीं बोलकर मुख्यमंत्री उसे सचिवालय में बोलने का काम करती है। यह गणतंत्र के लिए ठीक नहीं है। बोस ने कहा कि सदन से वामपंथी तीन विधायक को निलंबित किया गया यह क्या ठीक था? विधानसभा का अर्थ होता है जनता का प्रतिनिधि सदन। यहां राज्य के लिए कानून तैयार किया जाता है। वहीं कानून को हाथ में लेकर जिस प्रकार विधायकों की पिटाई हुई इसकी जितनी निंदा की जाए कम है। कोलकाता जाने के बाद वाममोर्चा की बैठक में इसपर गंभीरता से चर्चा होगी। जरुरत पड़ी तो इस मुद्दे को लेकर राज्यव्यापी आंदोलन किया जाएगा। पंचायत चुनाव को लेकर जिला कमेटी की बैठक पर पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि त्रिपस्तीय पंचायत चुनाव के लिए वाममोर्चा पूरी तरह तैयार है। जैसे ही घोषणा होती है हम प्रत्याशियों की सूची जारी कर चुनाव मैदान में होंगे। वाममोर्चा पहले से भी ज्यादा अटूट है। हमारा गठबंधन परिवर्तन की सरकार जैसा नहीं। पंचायत चुनाव के लिए जिला नेताओं को सभी प्रकार के निर्देश दिए गये है। वाममोर्चा गांव के सभी वर्ग के लोगों के पास जाएगी और उसकी समस्याओं को लेकर जरुरत पड़ी तो सड़क तक आंदोलन करेगी। उन्होंने कहा कि पंचायत चुनाव में वाममोर्चा को कुछ ज्यादा नहीं करना है। परिवर्तन की सरकार को आमलोग पूरी तरह जानने लगी है। उन्होंने कहा कि वाममोर्चा लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा लोगों को बताया था कि झूठ ज्यादा दिन तक नहीं चलती। हिल्स में माकपा छोड़कर गोजमुमो में शामिल होने वाली घटनाओं पर पूछने पर कहा कि वामपंथी कभी पार्टी छोड़कर एक जगह से दूसरी जगह नहीं जाते। वे वैसे कार्यकर्ता होते है जो निहित स्वार्थ के लिए स्वयं को वामपंथी होने की बात करते है। विमान बोस जिला बैठक के बाद कोलकाता के लिए लौट गये।

सदन की कार्यवाही जब दोबारा शुरू हुई तो संसदीय कार्यमंत्री ने स्पीकर बिमान बनर्जी के काम में बाधा डालने तथा उन्हें शारीरिक रूप से आघात पहुंचाने का हवाला देते हुए माकपा विधायक नजमुल हकए अमजद हुसैन और सुशांत बेसरा के खिलाफ कार्रवाई करने का प्रस्ताव रखाए जिसका विपक्ष के नेता सूर्यकांत मिश्रा ने कड़ा विरोध किया। विपक्षी सदस्य अपनी सीट से उठकर शोर मचाने लगे। स्पीकर ने चटर्जी के प्रस्ताव पर रूलिंग देते हुए तीनों विधायकों को निलंबित कर दिया। स्पीकर के फैसला सुनाते ही विपक्षी सदस्य भड़क उठे और विरोध जताने के लिए वेल में उतरे तो सत्तारुढ़ दल के सदस्य उनसे भिड़ गए। माकपा की देवलीना हेंब्रम और तृणमूल कांग्रेस की महमूदा बेगम के बीच भी हाथापाई हुई। माकपा की देवलिना हेंब्रम और गौरांग चटर्जी धक्कामुक्की के शिकार होकर गिर गए और कुछ देर तक फर्श पर भी पड़े रहे।
इसके बाद विपक्षी सदस्यों ने तोलाबाजी सरकार आर नेई दरकार ख्रंगदारी वसूलने वाली सरकारी अब नहीं चलेगी, का नारा लगाते हुए सदन का बहिष्कार कर दिया। सायंकाल विपक्ष के नेता सूर्यकांत मिश्रा के नेतृत्व में वाममोर्चा विधायकों ने राज्यपाल एमके नारायणन को ज्ञापन सौंप कर सदन में अपनी सुरक्षा के लिए गुहार लगाई। संसदीय कार्यमंत्री पार्थ चटर्जी और विपक्ष के नेता सूर्यकांत मिश्रा ने एक.दूसरे के सदस्यों पर हमला करने का आरोप लगाया है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2006 में भी विधानसभा के अंदर हंगामे और तोड़फोड़ की घटना हुई थी।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी पोलित ब्यूरो के सदस्य और विधानसभा में विपक्ष के नेता सूर्यकांत मिश्र ने कहा कि जन.महत्व वाले महत्वपूर्ण मुद्दे पर कार्यस्थगन प्रस्ताव लाने की हमारी मांग एक बार फिर खारिज कर दी गई। तृणमूल सरकार जब से सत्ता में आई है हमारे सभी कार्यस्थगन प्रस्तावों को सारहीन आधारों पर खारिज किया जाता रहा है।
मिश्र ने कहा कि तृणमूल सदस्यों ने विधानसभा में मारपीट की। जिसके बाद उनकी पार्टी के विधायक गौरांग चट्टोपाध्याय को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। उन्होंने कहा कि न केवल चट्टोपाध्याय की पिटाई की गईए बल्कि हमारी पार्टी की महिला विधायक देबोलीना हेम्ब्रम के साथ भी हाथापाई की गई और उनके खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया। एसएसकेएम राजकीय अस्पताल में प्रवेश करने से पूर्व चट्टोपाध्याय ने कहा कि मेरे सिर पर किसी भारी चीज से बार.बार प्रहार किया गया।
दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस नेता और राज्य के संसदीय कार्य मंत्री पार्थ चटर्जी ने मिश्रा के दावे को खारिज कर दिया और कहा कि तृणमूल के दो विधायकों महमूदा होसैन और पुलक रॉय की एमसीपी सदस्यों ने गंभीर रूप से पिटाई कर दी। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इस बीच वाम मोर्चा ने अपने तीन विधायकों के निलंबन को असंवैधानिक बताया और निलंबन खत्म करने की मांग करते हुए विधानसभा के बाहर धरना दिया।
उधर, कांग्रेस नेता मानस भुइयां ने कहा कि हमारे कुछ सदस्य रो रहे थे। हम अपनी सुरक्षा को लेकर आशंकित थे, इसलिए हमने सदन का बहिष्कार किया। लोकतंत्र के मंदिर को प्रदूषित और अपवित्र किया जाना सचमुच आश्चर्यजनक है।भुइयां के नेतृत्व में कांग्रेसी विधायकों के प्रतिनिधिमंडल और एमसीपी नेता अनीसुर रहमान के नेतृत्व में वाम मोर्चा के प्रतिनिधिमंडल ने मंगलवार की शाम राज्यपाल एमके नारायणन से मुलाकात की और उन्हें विधानसभा में हुईं घटनाओं से अवगत कराया।
राज्य में चिटफंड कंपनियों की बढ़ती संख्या पर वामपंथी सदस्य स्थगन प्रस्ताव की माग करते हुए विधानसभा अध्यक्ष बिमान बनर्जी के आसन तक चले गए और वहीं खड़े होकर नारेबाजी करने लगेए इससे माहौल गरमा गया। करीब आधा घंटे चले हंगामे के बीच माकपा विधायक नजमुल हक ने स्पीकर का माइक छीनने की कोशिश की। तब स्पीकर ने सदन की कार्यवाही दोपहर 1.30 तक के लिए स्थगित कर दी।
                           अराजक बंगाल त्रिमुखी सत्तासंघर्ष में विकास से कोसों दूर है। अर्थव्यवस्था का कोई अस्तित्व  ही नहीं है। निवेश का कोई माहौल नहीं है। सच में यहां राजनीति के अलावा कुछ भी संभव नहीं है।सामाजिक समरसता तो है ही नहीं ए राजनीतिक और सांप्रदायिक ध्रूवीकरण में उत्पादनप्रणाली और आजीविका का घनघोर संकट है। अवदमित घृणा और हिंसा अब राजनीति का नाम है।दुनियाभर में शहरी आबादी बढ़ रही हैए पर कोलकाता एक अकेला शहर है जिसकी ाबादी घट रही है। पलायन के सिवाय़ इस दमघोंटू हिंसक परिवेश से बचने का उपाय नहीं है एजहां प्रकृति और पर्यावरण में भी राजनीति अभिव्यक्त होती है। दुर्गोत्सव को सांसकृतिक मानने वाला बंगाल अब अपने हर विरोधी को असुर मानता है और उसके निधन पर ही शांति हो सकती है। यह एक ऐसा वधस्थल बन गया है एजहां हर कोई हर किसी के​​ लिए वध्य है। यहां सबसे प्रचलित धंधा और उद्योग है नशाए अपराध और लड़कियों की तस्करी। य़ह चित्र न मुख्यमंत्री के परिवर्तन ब्रेगेड को दिखता है और न उन्हें बेदखल करने के लिए बेताब विपक्ष में, विडंबना यही है।बंगाल में 520 किलमीटर तक बहती बड़े भूभाग का जीवन चलाती गंगा जब सागर से मिलने को होती है तो गति थामकर डेल्टा का रूप अख्तियार कर लेती है पर उत्तराखंड से निकलते ही उपेक्षा और दुर्व्यवहार झेलती गंगा का दर्द यहां बालूए पत्थर और वन माफिया और बढ़ा जाते हैं। जादवपुर विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ एन्वायरमेंटल स्टडीज की हाल में जारी रिपोर्ट के अनुसारए कोलकाता के 114 में से 78 वार्ड इलाकों के नलकूपों के पानी में आर्सेनिक पाया गया है। 32 वार्ड इलाकों के नलकूपों में आर्सेनिक की मात्रा निर्धारित मानक से बहुत अधिक प्रतिलीटर 50 माइक्रोग्राम पाई गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित मानक प्रति लीटर 10 माइक्रोग्राम है। आर्सेनिक.दूषण दक्षिण कोलकाता, दक्षिण के उपनगरीय इलाके और मटियाबुर्ज के इलाकों में ज्यादा मिला है।
बहुत पहले पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने कहा कि पश्चिम बंगाल में जारी राजनीतिक हिंसा से वह बहुत दुखी हैं। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु को याद करते हुए उन्होंने कहा कि बसु ने ऐसी हिंसा की हमेशा निंदा की थी।राष्ट्रपति चुनाव से पहले तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जतायी।कलकत्ता चेंबर ऑफ कॉमर्स के एक कार्यक्रम में चिदंबरम ने कहा कि पश्चिम बंगाल में वर्ष 2010.11 के मुकाबले हिंसा की घटनाओं में कमी आयी है, पर इसके बावजूद इस वर्ष जून तक राज्य में हिंसा की 455 घटनाएं हुई हैं, जिनमें 82 लोगों की मौत हुई है। केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि सबसे खतरनाक बात यह है कि राज्य में राजनीतिक संघर्ष की घटनाएं बढ़ी हैं।455 में अधिकतर राजनीतिक हिंसा की घटनाएं हैं। हिंसा की संस्कृति लोकतंत्र के लिए अच्छा लक्षण नहीं है। चिंदबरम ने कहा कि सभी राजनीतिक दलों को हिंसा बंद करने के लिए पहल व उपाय करने होंगे। उन्होंने कहा कि जो राजनीतक दल माओवादियों को हथियार डाल कर बातचीत शुरू करने का परामर्श दे रहे हैं, उन दलों को पहले स्वयं हिंसा बंद कर हथियार डालना होगा, तभी लोकतंत्र मजबूत होगा।



-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास



मंगलवार, 6 नवंबर 2012

इतिहास के आईने में दिल्ली

'' दिल्ली दिलवालों की '' भले ही कही जाति हो , पर यह सदियों से  '' जी हुजूरी '' से लेकर '' सरकार '' तक , संत्री से ले कर   '' मंत्री '' तक और '' नेता '' से ले कर  अभिनेता '' तक -- सभी के आकर्षण का केंद्र रही है , देशी ही नही विदेशी भी दिल्ली के दिल में समाने के लिए लालायित रहे है .  
इस दिल्ली की अपनी कोई संस्कृति हो या न  हो , किन्तु इसका अपना एक इतिहास अवश्य है , जिस में सम्पूर्ण भारत की झलक सहज ही देखी  जा सकती है . 
पौराणिक पृष्ठभूमि में दिल्ली का सम्बन्ध महाभारत कालीन पांड्वो की राजधानी इन्द्रप्रस्थ से जोड़ा जाता है , वर्तमान दिल्ली में यमुना नदी के पश्चिमी  किनारे पर दिल्ली गेट के आसपास के इलाके की पहचान '' इन्द्रप्रस्थ '' के रूप में की गई है .

पौराणिक  कथाओं के अनुसार माना जाता है की यह स्थल धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर आदि पांड्वो को अपना आवास बनाने के लिए दिया था , तब इस का नाम '' खांडव वन '' था युधिष्ठिर ने अपने भाइयो की सहायता से वन को साफ़ कर  के , मय दानव से शानदार महल का निर्माण कराया था , स्वभावत: यहाँ धीरे -- धीरे बस्तिया बस्ती गई , जिन पर युधिष्ठिर का शासन चलता रहा , बाद में युधिष्ठिर हस्तिनापुर चले गये और वही से शासन सूत्र का संचालन करते रहे |
परवर्तीकाल  में इन्द्रप्रस्थ मौर्यों ,यौधेयो , कुषाणों आदि के शासन में भी रहा , किन्तु तब तक यह ' इंदरपत गाँव '' में बदल चुका था ,
ऐतिहासिक तथ्यों , ज्ञात अभिलेखों और पुरातात्विक  खुदाइयो से प्राप्त प्रमाणों के आधार पर दिल्ली को ' सात बस्तियों का नगर '' माना जाता है , जो विभिन्न कालो में बनी .. इन में सबसे पुरानी बस्ती दसवी सदी के अंतिम चरण (993 )  में बसी थी , जिसे तोमर राजपूत अनगपाल  ने बसाया था और नाम रखा था '' ढिल्ली '' आधुनिक युग में इस की पहचान '' लालकोट '' के रूप में की गई है .

अनगपाल के बाद  कन्नौज  के  गहडवाल  शासको ने '' ढिल्ली '' पर अधिकार जमाया फिर क्रमश: अजमेर के चौहान राजा  अर्णोराज तथा विग्रहराज  बीसल देव चतुर्थ ( 115 -- 64 ) ने इसे कन्नौज के राजा से छीन लिया |
बीसल देव के बाद पृथ्वीराज चौहान ( 1177 -- 92 ) ने यहाँ शासन किया , पृथ्वीराज ने यहाँ '' रायपिथौरा '' के नाम से एक किला भी बनवाया था , पृथ्वीराज चौहान और कन्नौज नरेश जयचंद के बीच लम्बे समय तक मन मुटाव चलता रहा , इस बीच पृथ्वीराज ने जयचन्द्र की पुत्री संयोगिता -- संयुक्ता  से प्रेम विवाह भी कर लिया , जिस से और अधिक चिढ  कर जयचंद ने विदेशी हमलावर मुहम्मद गोरी को पृथ्वीराज के विरुद्ध युद्ध लड़ने के लिए आमंत्रित किया |

पृथ्वीराज ने तरावली के मैदान में मुहम्मद गोरी को युद्ध में हराया , परन्तु गोरी ने 1192 में पृथ्वीराज पर विजय पाई और अपने सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली का सूबेदार बनाया , उस ने 1210 तक दिल्ली पर राज्य किया , यद्यपि उस ने 1206 में मुहम्मद गोरी की मृत्यु के बाद दिल्ली की जगह लाहौर को राजधानी बनाया था |

11211 में ऐबक के दामाद शमशुद्दीन ने पुन: लाहौर छोड़ कर  दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया 1236 में दिल्ली की गद्दी पर रजिया बेगम बैठी , दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाली वह पहली महिला थी उन्होंने 1240 तक शासन किया ......
रजिया बेगम के बाद बहराम शाह (1240 -- 42 ) मसूद (1242 --46 ) नसुरुद्दीन ( 1246 -- 66 ) बलबम ( 1266-- 86 ) केकुबाद ( 1286-- 90 ) आदि ने दिल्ली पर राज्य किया था , केकुबाद के समय ही दिल्ली पर गुलाम वंश के शासन का अंत हो गया |
1290 में दिल्ली की बागडोर जलालुद्दीन खिलजी ने संभाली , खिलजी वंश के तीसरे शासक के रूप में अलाउद्दीन खिलजी 1296 में सत्तारूढ़ हुआ . अलाउद्दीन ने ही दिल्ली की दूसरी बस्ती की नीव डाली उस ने यहाँ सीरी फोर्ट का निर्माण कराया हौजखास भी उसी की देन है उस ने1296 से1316 तक शासन किया|
अलाउद्दीन के बाद 1320 तक दिल्ली की बागडोर शाह्बुद्धीन खिलजी , मुबारक और खुसरो  ने संभाली , 1320 में खुसरो के एक सरदार गाजी मलिक ने बगावत कर  दी , जिसमे खुसरो मारा गया और उस के साथ ही खिलजी वंश का शासकीय अंत हो गया
1320  में गाजी मलिक गयासुद्दीन तुगलक के नाम से दिल्ली का सुलतान बना और उस ने यहाँ तुगलक वंशीय शासन की नीव डाली , 1414 तक यहाँ 11 तुग्लको ने राज्य किया जिन में से केवल तीन ने ही राज्य के विस्तार में योगदान  दिया , ग्यासुद्धीन तुगलक ( 1320-- 25 ) ने तुगलकाबाद बसाया जो दिल्ली की तीसरी बस्ती मानी जाती है |
1325 में मुहम्मद बिन तुगलक दिल्ली का शासक बना , उसने 1327 से 1330 तक अपनी राजधानी दिल्ली से देवगिरी और 130 से 1351 तक देवगिरी से दिल्ली बदल ली , इस दौरान 1328 में तरमाशीरी खा के नेतृत्व में मंगोल लूटपाट करते हुए दिल्ली तक आ पहुंचे , मुहम्मद तुगलक ने उन्हें ढेर सारा धन दे कर वापस भेज दिया मुहम्मद तुगलक ने यहाँ पर '' जहापनाह '' नामक चौथी बस्ती बसाई , जो आज  खंडहर के रूप में नाम शेष है |
मुहम्मद तुगलक के उतराधिकारी फिरोजशाह तुगलक (1351-- 88 ) ) दिल्ली की पांचवी बस्ती '' फिरोजाबाद '' बसाई जो फिरोजशाह कोटला के नाम से प्रसिद्ध है फिरोजशाह की मृत्यु के बाद उस के पोते ग्यासुद्धीन ( 1388 -- 92 ) दूसरे पोते अबू  बकर तथा नासिरुद्धीन के नाम से मुहम्मद , हुमायु और महमूद ( 1392 -- 1398 ) ने दिल्ली पर शासन किया
महमूद शाह के शासनकाल में तैमुर लंग ने दिल्ली पर आक्रमण किया 17 दिसम्बर 1398 को महमूद और तैमुर में जम कर  युद्ध हुआ जिस में तैमुर की जीत हुई और महमूद को भागना पडा , उस ने गुजरात में जा कर  शरण ली , इधर तैमुर लंग ने दिल्ली में जमकर लूटपाट की , लगभग तीन लाख लोगो को बंदी बनाया और चलता बना , वह दिल्ली में मात्र 15  दिन रहा
फरवरी 1492 में महमूद शाह की मृत्यु के बाद दौलत खा लोदी दिल्ली का शासक बना , किन्तु1414 में खिज्र खा ने उसे हटा कर  कैद कर  लिया और स्वंय शासक बन बैठा , खिज्र खा के बाद उसका बेटा मुबारक शाह तथा पोता मुहम्मद दिल्ली के शासक बने , मुहम्मद के बाद अलाउद्धीन आजम शाह ( 1445 ) सिंक्र लोदी ( 1489 ) और इब्राहिम लोदी (1517 ) ने दिल्ली का शासन संभाला
लाहौर के सूबेदार दौलत खा से इब्राहिम की कुछ अनबन हो गई , जिस से दौलत खा ने बाबर को दिल्ली पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया 21 अप्रैल 1526 को पानीपत की पहली लड़ाई में बाबर ने इब्राहिम को हराकर दिल्ली पर अधिकार कर  लिया और भारत में मुग़ल साम्राज्य की नीव रखी यद्दपि  बाबर का शासन केवल चार साल ( 1526 -- 1530 ) रहा , पर इस बीच उस ने देश में अनेक भवनों का निर्माण कराया
बाबर की मृत्यु के बाद उस का पुत्र हुमायु गद्दी पर बैठा , हुमायु ने पुराने किले और फिरोजशाह कोटला के मध्य दीनपनाह नामक एक बस्ती बसाई , जिसे ध्वस्त कर शेरशाह सूरी ने पुराना किला नामक दिल्ली की छठवी बस्ती बसाई , हुमायु का उतराधिकारी अकबर (1566-- 1605 ) और अकबर का जहागीर ( 1605 -- 1627 ) यद्यपि  इन दोनों ने बाबर और हुमायु की तरह आगरा को ही अपने शासन संचालन का केंद्र बनाया किन्तु दिल्ली और उस के आसपास के इलाको के विकास में भी योगदान दिया , बाद में अकबर ने आगरा और फतहपुर सिकरी को छोड़ कर  दिल्ली में ही डेरा डाल लिया |
यही प्रवृति शाहजहा की भी रही , उसने 1639 में दिल्ली में शाहजहानाबाद बसा कर  उसे राजधानी बनाया आजकल यह '' पुरानी दिल्ली '' के नाम से प्रसिद्ध है , यह दिल्ली की सातवी बस्ती है , जो कश्मीरी गेट , लाहौरी गेट और लालकिले के मध्य का क्षेत्र है |
1658 में औरंगजेब दिल्ली का शासक बना , उस ने 1707 तक दिल्ली पर राज्य किया औरंगजेब के बाद बहादुरशाह (1707 -- 12) जहादार्शाह ( 1712 -- 13 ) फरुखशियार ( 1713 -- 19 ), रफ़ी -- उद- दाराजात ( 1719 ) रफ़ी - उद-  दौला ( 1719 ) और मुहम्मद शाह बगश 1719 --48 ने दिल्ली की गद्दी संभाली
इसी दौरान 1739 में नादिर शाह ने दिल्ली पर हमला कर  दिया , उस ने मुहम्मद बगश को बंदी बना कर  दिल्ली में 57 दिनों तक भारी लूटपाट की , वह अपने साथ लगभग 70 करोड़ का माल लुटा , जिस में कोहिनूर हीरा तथा शाहजहा द्वारा लगभग एक करोड़ रुपयों की लागत से बनवाये गये तख्ते ताउस '' भी शामिल थे
1748 में मुहम्मद शाह की मृत्यु के बाद अहमदशाह सम्राट बना , वह एक अयोग्य शासक था इसीलिए1754 में उसे गद्दी से उतार कर  उस की आँखे फोड़ दी गयी तब जहादर शाह का पुत्र अजिजुद्दौला आलमगीर दितीय के नाम से बादशाह बना 1757 में अहमदशाह अब्दाली ने दिल्ली पर आक्रमण किया तथा यहाँ अपना प्रतिनिधि नजीबुद्दौला को नियुक्त किया |
1757 से 1857 तक दिल्ली में शासको का प्राय: स्थायित्व नही रहा जो भी राजा बना , वह आपसी संघर्ष का शिकार हुआ जिस का दुष्परिणाम यह हुआ की 1803 में लार्ड लेक के नेतृत्व में दिल्ली पर अंग्रेजो का अधिकार हो गया और मुगल सम्राट शाह आलम की रक्षा का भार भी अंग्रेजो ने ले लिया
1806 में शाह आलम की मृत्यु के बाद उस के बेटे अकबर द्दितीय  (1806 -- 37 ) और उसके बाद बहादुरशाह द्दितीय ( 1837 -- 57) को गद्दी पर बैठाया गया , ये दोनों शासक ब्रिटिश सरकार के पेंशनधारी होने के कारण नाममात्र के ही सम्राट थे , एक तरह से उन के साम्राज्य की सीमा लाल किले तक ही सीमित  थी |
प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दौरान भारतीय सैनिको की तीन टुकडियो ने 11मई 1857 को दिल्ली से मेरठ पहुंच कर अंग्रेजो को खदेड़ दिया और बहादुरशाह को भारत का सम्राट घोषित कर दिया , किन्तु 21 सितम्बर 1857 को अंग्रेजो ने दिल्ली पर पुन: कब्जा कर  लिया | और बहादुरशाह के पुत्र को मार दिया, बहादुरशाह जीनत महल और जवानबख्त  को नजरबंद क्र के रंगून भेज दिया जहा 1862 में बहादुरशाह का देहांत हो गया , अन्य विद्रोहीयो को चांदनी चौक पर फाँसी दे दी गयी | 1876 में रानी विक्टोरिया ने केसर - ए - हिंद ( भारत की साम्राज्ञी ) की उपाधि धारण की , इस अवसर पर लार्ड लिटन ने दिल्ली में एक बड़ा दरबार आयोजित किया , तब सभी भारतीय रियासतों के शासको को महारानी के प्रति सत्यनिष्ठा की शपथ  दिलाई गयी |
1911 में अंग्रेजो ने कलकत्ता के बदले दिल्ली के दक्षिण में बसी नई दिल्ली को राजधानी बनाया 1911 में ही यहाँ इंग्लैण्ड के राजा की ताज पोशी हुई 1911 से 1947 तक दिल्ली अंग्रेजो के शासन में रही 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता के समय सत्ता हस्तांतरण दिल्ली स्थित संसद भवन में ही हुआ था | स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व उत्तर प्रदेश के शासन में था , स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह चीफ कमिश्नर द्वारा शासित प्रदेश बना , शीघ्र ही संविधान के अनुसार दिल्ली को '' सी '' श्रेणी का राज्य बनाने का आन्दोलन शुरू हुआ फलत: 1952 में यह '' सी '' श्रेणी  का राज्य बन गया |
कुल मिलाकर दिल्ली प्राचीनकाल से लेकर अब तक राजनितिक उथलपुथल का केंद्र तो रही है , दिल दहलाने वाली घटनाए भी होती रही है | हम वीर और साहसी होते हुए भी क्यों दुश्मनों से मात खाते रहे , क्या प्राचीनकाल से अब तक हम अपने पराजयों का कभी विश्लेषण किया है  और क्या आगे करेंगे |

-सुनील दत्ता
आभार ....स , विश्वनाथ

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

डीजीपीऔर आठ महीने में ही 9 दंगे


रिहाई मंच ने फैजाबाद में हुये दंगे के हफ्ते भर बाद भी मुख्यमंत्री अखिलेश  यादव के वहां न पहंुचने की कड़ी आलोचना करते हुए इसे मुख्यमंत्री का गैर जिम्मेदार रवैया बताया है।
रिहाई मंच की तरफ से दंगा प्रभावित इलाकों से दूसरे चरण की छानबीन करने के बाद जारी विज्ञप्ति में राजीव यादव, लालचंद, आलोक, ऋि ष   कुमार सिंह ने कहा कि प्रभावित लोगों के बीच सरकार की तरफ से मुख्यमंत्री या किसी वरिश्ठ मंत्री के न जाने से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के प्रति सरकार के प्रतिबद्धता पर सवालिया निषान लगता है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री औरदूसरे वरिश्ठ मंत्री सिर्फ लखनउ में बैठ कर दोशियों को सजा देने की बात कर रहे हैं। जबकि स्थानीय स्तर पर डरे सहमे लोगों में विष्वास बहाली की
कोई कोषिष सरकार की तरफ से नहीं की जा रही है। उल्टे भदरसा में हिंसा के कार मुसलमानों पर ही फर्जी मुकदमे लाद कर उन्हें दंगाई साबित करने की कोषिष की जा रही है जबकि असली दोशियों को खुला छोड दिया गया है।
जांच दल ने दुर्गा पूजा समिति के नेता और सपा से जुडे मनोज जायसवाल की भूमिका पर सवाल उठाते हुये कहा कि प्रदेष सरकार में दंगाईयों से निपटने की इच्छा षक्ति नहीं है। क्योंकि खुद समाजवादी पार्टी से जुडे
हिंदुत्ववादी तत्व ही इस दंगे के मुख्य शडयंत्रकारी हैं। इसीलिये मुख्यमंत्री लखनउ से तो दोशियों को सजा दिलवाने की बात कर रहे हैं लेकिन फैजाबाद जाने की हिम्मत नहीं दिखा पा रहे हैं क्योंकि वहां दंगा पीडित
मुसलमान उनसे उन्हीं की पार्टी के नेताओं की भूमिका पर सवाल उठाएंगे। मानवाधिकार नेताओं ने इन दंगों को सपा द्वारा कमजोर पड चुकी भाजपा को जिंदा करने की कवायद करार देते हुये कहा कि सपा लोकसभा चुनाव से पहले साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण कराने पर तुली है।

राजीव यादव और लालचंद ने कहा कि सपा सरकार को अमरीश चंद्र षर्मा से ज्यादा बेहतर पुलिस अधिकारी प्रदेष का डीजीपी बनाने के लिये नहीं मिला। इससे भी सरकार के मुस्लिम विरोधी रवैये को समझा जा सकता है। क्योंकि मौजूदा डीजीपी पर 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद कानपुर में हिंदुत्ववादी तत्वों को प्रश्रय देने का आरोप है। तब वह वहां एसएसपी के पद पर तैनात थे। जिस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के लखनउ बेंच के तत्कालीन न्यायमूर्ति आईएस माथुर के नेतृत्व में जांच आयोग गठित किया गया गया था
जिसने 1998 में ही अपनी रिर्पोट सरकार को सौंप दी थी। जांच दल के सदस्यों ने कहा कि यदि सपा सच मुच धर्मनिरपेक्ष होती तो माथूर आयोग की रिर्पोट को सार्वजनिक करते हुये ए सी शर्मा के खिलाफ दंडात्मक कार्यवायी करती। लेकिन उसने उल्टे उन्हें डीजीपी बना दिया और आठ महीने में ही 9 दंगे हो गये।
मानवाधिकार नेताओं ने अखिलेश  सरकार को गुजरात की मोदी सरकार से भी ज्यादा मुस्लिम विरोधी करार देते हुये कहा कि मोदी ने तो 2002 में चुनाव जीतने के लिये मुसलमानों के खिलाफ हिंसा करवायी थी लेकिन सपा ने तो मुसलमानों के सहयोग से ही चुनाव जीतने के बावजूद सत्ता में आते ही मुस्लिम विरोधी दंगे कराना शुरू कर दिया। नेताओं ने कहा कि घोशित तौर पर मुस्लिम विरोधी भाजपा सरकार के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी देर से ही सही लेकिन गुजरात के मुस्लिम पीडितों से मिलने गये थे। लेकिन मुसलमानों के हमदर्द होने का दावा करने वाले मुलायम सिंह या उनके मुख्यमंत्री बेटे ने फैजाबाद सहित उनकी सरकार में हुये किसी भी दंगे में अब तक पीडितों से मिलने का कश्ट नहीं उठाया है।
रिहाई मंच के नेताओं ने मुख्यमंत्री अखिलेश  यादव के इस बयान को भी गुमराह करने वाला करार दिया जिसमें उन्होंने दंगों को उनकी सरकार को बदनाम करने की विरोधियों की साजिश  बताया था। मानवाधिकार नेताओं ने कहा कि प्रतापगढ के अस्थान गांव में 45 मुसलमानों के घर जलाने की घटना के पीछे तो सपा
सरकार में मंत्री रघुराज प्रताप सिंह के समर्थकों और सपा सांसद शैलेंद्र कुमार की भूमिका सामने आयी है। अगर उनके मंत्री और सांसद ही सरकार को बदनाम करने के लिये दंगा करा रहे हैं तो यह उनके नेतृत्व क्षमता पर ही सवाल उठाता है।
जांच दल के सदस्यों ने कहा कि आने वाले दिनों में कई प्रतिश्ठित मानवाधिकार नेता, पत्रकार और बुद्धिजीवियों का एक दल भी फैजाबाद दंगा प्रभावित लोगों से मिलने जाएगा और इस पूरे प्रकरण में सपा सरकार की भूमिका पर जनता के सामने रिपोर्ट लाएगा।
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