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बुधवार, 30 दिसंबर 2015

ध्वंस के अपराधियों को सजा कराओ

बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद, ध्वंस करने वाले लोगों पर रायबरेली की सीबीआई न्यायालय में मामला विचाराधीन है. वहीँ, संपत्ति किसकी है उसका वाद माननीय उच्चतम नयायालय में लंबित है लेकिन केंद्र सरकार के मंत्री आये दिन उस विवादित स्थल पर निर्माण करने की बात करते रहते हैं और अब उनकी देखा-देखी दूसरा पक्ष भी निर्माण की बात करने लगा है. सरकार के मंत्रियों व सत्तारूढ़ दल के गैर जिम्मेदाराना बयानों के कारण देश की एकता और अखंडता को गंभीर खतरा हो सकता है. जिस तरह से सांप्रदायिक आधार पर सोची-समझी रणनीति के तहत विभाजन कराया जा रहा है. वह देश के संविधान की प्रस्तावना में लिखित शब्द " धर्मनिरपेक्षता" की भावना का स्पष्ट उल्लंघन है. सरकार की अगर मंशा नहीं है तो कैसे शिलापूजन और निर्माण के लिए पत्थर तराशे जा रहे हैं. क्या सरकार को मालूम है उच्चतम न्यायलय का फैसला उन्ही पक्ष में आएगा. सरकार को चाहिए की अविलम्ब ध्वंस के जिम्मेदार अपराधियों को न्यायलय से प्राथमिकता के आधार पर सजा कराये. कोई भी मंत्री ध्वंस के मामले में अपराधियों को सजा कराने की बात नहीं करता है.
                    आज ही केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा ने कहा है कि उनकी सरकार अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन वह या तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करेगी या मंदिर निर्माण पर परस्पर सहमति पर पहुंचेगी. इससे पहले भी अयोध्या में साधू-संतों ने विवादित परिसर के पास शिलापूजन किया था. सत्ता रूढ़ दल व उसके सहयोगी संगठन एक-एक शिला का पूजन कर विवादित परिसर पर निर्माण कार्य करने की उद्घोषनाएं करते रहते हैं और सामाजिक वातावरण में सांप्रदायिक सद्भाव को जबरदस्त खतरे में डालते हैं जब सरकारें ही देश के संविधान और कानून का पालन नहीं करेंगी तो जनता से कैसे उम्मीद कैसे की जा सकती है की वह उसका पालन करे. भारतीय लोकतंत्र में यह अद्भुत द्रश्य जनता के सामने परिलक्षित हो रहा है.
                     मजेदार बात तो यह है कि इस सरकार का एक मंत्री उत्तेजक बयान देकर चुप होता है तो दूसरा मंत्री यह बताने लगता है कि उस मंत्री का बयान उसका व्यक्तिगत विचार है. तबतक सहयोगी संगठन का कोई फायर ब्रांड नेता नया सवाल खड़ा कर देता है. विकास की बात महंगाई की बात, बेरोजगारी कैसे दूर हो इन सवालों की कोई चर्चा या समाधान की दिशा में प्रयास नहीं हो रहा है. कभी-कभी यह लगता है कि प्रधानमंत्री का मंत्रिमंडल के सदस्यों के ऊपर नियंत्रण ही नहीं रहा है या वह जानबूझकर मंत्रिमंडल के सदस्यों और दल व सहयोगी संगठनो से बहुसंख्यक आबादी की भावनाओं को उभार कर उनको अपने पक्ष के मतदाता के रूप में बदल रहे हैं. देश व उसके संविधान से कोई लेना-देना नहीं है. 

सुमन

शनिवार, 5 सितंबर 2015

राम रहे टाट में - संघी रहे ठाठ में

अयोध्या में बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद राम लला टाट में और उनको टाट में पहुँचाने वाले लोग ठाठ में हैं. जब-जब चुनाव आता है तो संघ के एजेंडे में राम मंदिर निर्माण की बात जरूर आती है. अभी बिहार में चुनाव होने जा रहे हैं और संघ की बैठक में प्रधानमंत्री व संघ के कुल वक्ती कार्यकर्ता नरेन्द्र दामोदर मोदी एक कार्यकर्ता की हैसियत से उपस्थित हुए. वहां अयोध्या में राम मंदिर के मामले में संघ ने कहा कि हम राम मंदिर के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन हम सरकार की समय-सारणी के अनुसार उनके क्रियान्वयन का इंतजार करेंगे। कुछ दिन पूर्व अमित शाह ने कहा कि राम मंदिर के लिए 370 सीटें चाहिए. राम लला के नाम पर हमेशा हिन्दू जनमानस को झकझोर कर वोट लेकर सत्ता हासिल की जाती रही है और फिर उस मुद्दे को जिन्दा भी रखा जाता है जिससे धार्मिक आस्था और विश्वास को भुनाकर वोट प्राप्त कर सत्ता हासिल की जाए. उन्माद भरने के लिए यह नारा तो प्रिय है कि ' राम लला हम आयेंगे, मंदिर वहीँ बनायेंगे '. किन्तु यह सब हिन्दू आस्था का लाभ उठाने के लिए राजनीति का प्रयोग है जो संघ की प्रयोगशाला का सबसे बढ़िया हथियार है जिससे वोट पैदा करने का सबसे बढ़िया तरीका है. इसके अतिरिक्त न इनका राम में विशवास है न धर्म मेंसत्ता ही धर्म है. जो लोग बाबरी मस्जिद के ध्वंस के अपराधिक कृत्य में मारे गए थे उनके परिवारों का भी कोई पुरसाहाल नहीं है जब यह राम के भी नहीं हुए तो उनके नाम पर मरने वाले लोगों के भी यह नहीं हुए हैं सच्चिदानंद हरी साक्षी जो इस समय उन्नाव से सांसद हैं और जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी छोड़ दी थी तब उन्होंने कहा था , "मेरे सामने सिंघल ने महाराज वामदेव ने कहा कि आंदोलन तब तक तेज नहीं होगा, जब तक कोई मरता नहीं है। महाराज वामदेव ने कहा कि अगर बच्चे मरे, तो यह काफी बुरा होगा। सिंघल ने फिर कहा कि जब तक ऐसा नहीं होगा, आंदोलन गति नहीं पकड़ेगा।" 

साक्षी का दावा था कि बंगाल के कोठारी बंधु और राजस्‍थान के महेंद्र सिंह जैसे जाने-माने कारसेवकों को पुलिस ने कुछ खास लोगों के इशारे पर जानकर निशाने पर लिया। 

उमा भारती आज केन्द्रीय मंत्री हैं जब यह भारतीय जनता पार्टी से नाराज थी तब उन्होंने कहा था कि  कोठारी बंधुओं को  मारे जाने की जिम्मेदारी विनय कटियार के सिर पर मढ़ी थी.  उन्होंने कहा, "जो लोग मरे थे, वो विनय की गलती से। गलती भी नहीं, वो भगदड़ मची, वो गली छोटी थी। गलती मतलब वो भाग गया छोड़कर।"  संघ के लोगों ने अयोध्या में राम भक्त के मूड को समझते हुए शपथ दिलाई . शपथ यह थी, "6 दिसंबर के दिन हम राम भक्त राम लला के परिसर में यह शपथ लेते हैं कि वहां भव्य मंदिर बनाने के लिए इस ढांचे को हटाया जाना जरूरी हो गया है। राम जन्मभूमि मंदिर बनाने के‌ लिए इसे हटाना ही होगा।

जब चुनाव आता है तो संघ की प्रयोगशाला कहने लगती है कि "जय श्री राम, जय श्री राम और जय श्री राम और जब सरकार में आती है तो कहती है बैठक में यह तय किया गया है कि 'सरकार', अयोध्या में बनना चाहिए राम मंदिर. 

बाबरी मस्जिद में मूर्ति का रखवाना, फिर मस्जिद को तोडना, फिर उसको ढांचा कहना, फिर मंदिर निर्माण न करना कितने झूठ और कितने रंग बदल सकती है संघ की प्रयोगशाला, उसका कोई अनुमान नहीं लगा सकता है. हिटलर का प्रचार मंत्री गोविल्स के ये आधुनिक चेले उससे कई कदम आगे हैं. राम हमेशा संघ के कारण वोट बटोरने के हथियार तो हो सकते हैं लेकिन उनकी मर्यादा को नष्ट यह संघी करके राजनीति का केंद्र बिंदु बना दिए हैं. 


सुमन

लो क सं घ र्ष !

सोमवार, 1 दिसंबर 2014

इतिहास का संघीकरण

   नई सरकार आने के बाद अकादमी क्षेत्र में सबसे त्वरित और केन्द्रित हमला इतिहास पर हुआ है, क्योंकि शासक और विजेता इतिहास को तलवार-बंदूक से अधिक कारगर हथियार मानते हैं। किसी भी समाज की मानसिकता बदल देने में इतिहास की बहुत बड़ी भूमिका होती है, इसलिए हर शासक अपने अनुकूल इतिहास लिखवाने की कोशिश करता है। मोदी सरकार ने रणनीति के तहत इसकी शुरूआत कर दी है। भारत में इतिहास अनुसंधान और इतिहास लेखन की सर्वोच्च संस्था भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) के चेयरमैन वाई0 सुदर्शन राव की नियुक्ति इस रणनीति का पहला कदम है। कालकाटिया विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के प्रमुख रहे सुदर्शन राव ने 2007 में लिखे गए एक लेख-‘इण्डियन कास्ट सिस्टमः अरीअप्रेजल’ के कारण विवाद में रहे। इस लेख में उन्होंने लिखा है कि ‘‘जाति व्यवस्था प्राचीन काल में बहुत अच्छे ढंग से कार्य कर रही थी और हमें किसी भी पक्ष से शिकायत नहीं मिलती। इस व्यवस्था को अक्सर शोषक सामाजिक व्यवस्था कहा जाता है, जिसके जरिए सत्ताधारी वर्ग ने आर्थिक, सामाजिक आधिपत्य बनाया है। लेकिन वह गलत धारणा है।’’
    इतिहास लेखन को वैज्ञानिकता और वस्तुनिष्ठता प्रदान करने के उद्देश्य से 1972 में स्थापित आईसीएचआर के चेयरमैन नियुक्त होने के बाद वाई0 सुदर्शन राव ने अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक को एक साक्षात्कार दिया, (21 जुलाई अंक में) जो इतिहास के प्रति उनकी सोच और विचारधारा प्रस्तुत करती है। इस लेख में आउटलुक को दिए साक्षात्कार के सारांश को विश्लेषित करने का प्रयास किया गया है-
‘भारतीय परिदृश्य’ में इतिहास-लेखन-
    वाई0 सुदर्शन राव का मानना है कि इतिहास का लेखन ‘भारतीय परिदृश्य’ में होना चाहिए। अब तक का इतिहास-लेखन वामपंथ और पाश्चात्य विद्वानों द्वारा किया गया है। जोकि भ्रामक है।    वस्तुतः किसी भी देश का इतिहास दुनिया के इतिहास का एक हिस्सा होता है। इतिहास को मुल्क की सीमा रेखाओं में कैद करना मुश्किल ही नहीं बल्कि आने वाली पीढि़यों के लिए घातक भी होता है। पिछले छः दशकों में इतिहास ने एक विषय के रूप में उल्लेखनीय प्रगति की है, खास करके ‘विवादित या भ्रामक इतिहास’ का सही चेहरा उजागर हुआ है। सीड्स आॅफ पीस अन्तर्राष्ट्रीय शिविर जैसी संस्था का उदय हुआ है ताकि आने वाली पीढि़याँ ‘सही इतिहास’ को जान सकें। इसी तर्ज पर भारत और पाकिस्तान के युवा इतिहासकारों ने ‘द हिस्ट्री प्रोजेक्ट’ नाम से एक संस्था बनाई है जिसका काम है भारत और पाकिस्तान के परस्पर विरोधी इतिहास लेखन को उजागर करना। ताकि इसे पढ़कर लोगों के भीतर एक प्रक्रिया शुरू हो और कथित रूप से स्थापित किए उन तथ्यों पर संदेह करना शुरू करें जो उन्हें भ्रामक लगते हैं। परन्तु आईसीएचआर के निदेशक महोदय ने इतिहास को सीमाओं में कैद कर लेने का तुगलकी फरमान जारी कर दिया है।
    इतिहास लेखन को लेकर दक्षिणपंथी विचारधारा की चिंता नई नहीं है। पूर्व मानव संसाधन मंत्री रहे डाॅ0 मुरली मनोहर जोशी ने 30 दिसम्बर 2001 में ‘द हिन्दू’ में लिखा कि- ‘‘इस देश को दो प्रकार के आतंकवाद का सामना करना पड़ रहा है। एक है ‘बौद्धिक आतंकवाद’ जो देश में धीमे जहर की तरह फैला हुआ है, जो वामपंथी इतिहासकारों द्वारा ‘भारतीय इतिहास के गलत प्रस्तुतीकरण’ की वजह से स्थापित हुआ है और वह सरहद पार आतंकवाद से कहीं ज्यादा घातक है।’’ वस्तुतः इतिहास के सबसे करीब पहुँचने वाले इतिहासकार के ऊपर वामपंथ का ठप्पा लगाकर दक्षिणपंथी और ‘राष्ट्रवादी’ लोग इतिहास बोध को दबा देना चाहते हैं। ताकि जिस ‘राष्ट्रवाद’ की आग में वे अपनी रोटियाँ सेंक रहे हैं, उस पर सवाल न खड़ा हो सके।
इतिहास का पुनर्लेखन-
    इतिहास के पुनर्लेखन पर पूछे गए एक सवाल के उत्तर में सुदर्शन राव ने कहा कि ‘वह सत्य के फालोवर हैं।’ और ‘सत्य’ सामने आना चाहिए। राव साहब के इस जवाब से स्पष्ट है कि ‘सत्य’ के नाम पर एक बार फिर से ‘इतिहास का भगवाकरण’ किया जाएगा। वह पूरी प्रक्रिया हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के कलेवर में हमारे सामने आएगी। नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से अपनी 385 ‘भारत विजय रैलियों’ मेें राष्ट्रवाद का नारा बुलंद किया, वह जर्मन राष्ट्रवाद ‘मेरा राष्ट्र सही या गलत परन्तु सबसे अच्छा’ से रत्ती भर कम नहीं है। परन्तु इतिहास के लिए यह बेहद घातक होगा जैसा कि एरिक हाॅब्सबाॅम ने सटीक सुझाया है कि राष्ट्रवाद इतिहास के लिए अफीम जैसा है।
    वस्तुतः इतिहास लेखन फिर से साम्प्रदायिक इतिहास लेखन की तरफ मुड़ रहा है। जेम्स मिल द्वारा ‘इतिहास विभाजन’ के औचित्य को सुदर्शन राव जी सही साबित करना चाहते हैं कि प्राचीन भारत (हिन्दूकाल) भारतीय सभ्यता का स्वर्णिम काल था और मध्यकालीन भारत (मुस्लिमकाल) राष्ट्र और सभ्यता के विघटन और विध्वंस का काल था। दक्षिणपंथी विचारधारा इसकी प्रबल समर्थक रही है तभी तो देश के
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में 9 जून को अभिभाषण में कहा कि- ‘‘कुछ बातों में बारह सौ सालों की गुलामी हमें परेशान करती है।’’ वह 1200 वर्षों की गुलामी आखिर किस तरफ इशारा करती है? गौरतलब है कि यह धारणा यह स्थापित करती है कि 711 ई0 में सिंधु पर अरबों का आक्रमण और उसके बाद ‘तुर्की शासन’ की स्थापना भारत के लिए गुलामी थी। अब इतिहास पुनर्लेखन के नाम पर फिर से राष्ट्रनायक और खलनायकों को परिभाषित किया जाएगा।
ऐतिहासिक स्रोत बनाम ‘कलेक्टिव मेमोरी’
    प्राचीन इतिहास लेखन में राव के अनुसार अब ‘कलेक्टिव मेमोरी’ को प्राथमिकता दी जाएगी। इतिहास के प्राथमिक और द्वितीयक स्रोतों को ताख पर रखकर अब किंवदंतियों और गाथाओं को आधार माना जाएगा। एक तरफ इतिहास पुरानी घटनाओं, वस्तुओं की प्रमाणिकता को सिद्ध करने के लिए कई वैज्ञानिक उपकरणों व प्रक्रियाओं से लैस हुआ है, वहीं दूसरी तरफ भारत के इतिहास शोध के सर्वोच्च संस्थान के चेयरमैन ‘कलेक्टिव मेमोरी’ की बात कर रहे हैं। वस्तुतः ‘कलेक्टिव मेमोरी’ और कुछ नहीं बल्कि बहुसंख्यकवाद की एक अभिव्यक्ति होगी जो यह स्थापित करने में सफल होगी कि राजा दशरथ के बाद ‘शब्दभेदी बाण’ दिल्ली का अंतिम ‘हिन्दू शासक’ हेमू और पृथ्वीराज चैहान चलाते थे। साथ ही साथ यह भी प्रमाणित कर देगी कि मु0 गौरी को पृथ्वीराज ने ‘शब्दभेदी बाण’ से मार गिराया।
    यह सत्य है कि इतिहास लेखन में गाथाओं और किंवदंतियों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है परन्तु जिस ‘कलेक्टिव मेमोरी’ की बात सुदर्शन राव जी कर रहे हैं वह हिन्दुत्व का महिमा मंडन ही है। जिस तरह से ‘जनभावनाओं की संतुष्टि’ के नाम पर फाँसी की सजा सुनायी जा रही है, उसकी तरफ अब ‘कलेक्टिव मेमोरी’ के नाम पर इतिहास को दफन करने की कोशिश की जाएगी।
प्राचीन इतिहास और ‘महाभारत प्रोजेक्ट’
    सुदर्शन राव जी ने ‘महाभारत प्रोजेक्ट’ नामक एक शोध कार्य किया है और उनका मानना है कि महाभारत और रामायण दोनों सत्य घटनाओं पर आधारित हैं। इसके लिए बकायदा तिथि निर्धारण का भी कार्य किया जा रहा है। इन दोनों महाकाव्यों को लेकर एक इतिहासकार के सामने मुख्यतः दो समस्या होती है-पहला इन महाकाव्यों की पवित्रता और दूसरा आस्था और इतिहास में फर्क न कर पाना। प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर का मानना है कि ‘‘आज इतिहास को आस्था पर नहीं बल्कि गहन अन्वेषण पर आधारित होना होगा।’’ परन्तु क्या हम सुदर्शन राव से आस्था से इतर सोचने की उम्मीद कर सकते हैं, जिन्होंने अपने साक्षात्कार में अपने आप को सिर्फ हिन्दू ही नहीं कहा बल्कि यह भी जोड़ा कि वे ब्राह्मण भी हैं।
    प्रायः कहा जाता है कि भारतीयों में इतिहासबोध बिल्कुल नहीं होता। वस्तुतः इतिहास बदलावों का एक दस्तावेज है, परन्तु भारतीय इतिहास में वाई0 सुदर्शन राव सरीखे व्यक्तियों की भरमार रही है जो प्रतिगामी रहे हैं और समाज को स्थिर बनाये रखने में यकीन रखते हैं। रामायण या महाभारत जैसे महाकाव्य समाज को समझने के एक स्रोत हो सकते हंै। परन्तु आँख बंद करके यह मान लेना कि महाभारत या रामायण के सारे पात्र ऐतिहासिक हैं, गलत ही नहीं बल्कि घातक है। रोमिला थापर का मानना है, ‘‘यदि आपने तय कर लिया है कि वह राम है जिसने धर्म की स्थापना की थी, तब आपको सिद्ध करना पड़ेगा कि वह बुद्ध, ईसा और मोहम्मद साहब की तरह ही ऐतिहासिक रूप से अस्तित्व में था। ‘महाभारत प्रोजेक्ट’ वस्तुतः यही साबित करना चाहता है ताकि धर्म के आधार पर ही ‘भारतीय गुलामी’ को परिभाषित करते हुए मुसलमानांे और ईसाइयों को बाहरी साबित किया जा सके। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो पहले ही घोषित कर रखा है कि भारत हिन्दुआंे के लिए ‘सुरक्षित स्थान’ होगा, आखिर इसे कोई तर्क चाहिए ना।
राम की अयोध्या
    अयोध्या पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में सुदर्शन राव  ने कहा कि यदि राम का जन्म अयोध्या में नहीं हुआ तो कहाँ हुआ? वस्तुतः सुदर्शन राव जी इतिहास के जरिये अयोध्या को राम की जन्मभूमि बनाने की कवायद में जुड़ जाएगें और भारतीय जनता पार्टी के घोषणा-पत्र में शामिल राममंदिर मुद्दा का संवैधानिक हल निकालकर मंदिर निर्माण के सपने को हकीकत में बदलने की पुरजोर कोशिश करेगें।
प्राचीन काल में छुआछूत नहीं थी
    प्राचीन काल का महिमा मण्डन करने वाले सुदर्शन राव ने स्पष्ट कहा है कि प्राचीन काल में छुआछूत अस्तित्व में नहीं थी। 2007 में लिखे अपने लेख में भी ‘जाति-प्रथा’ को भारतीय संस्कृति का सकारात्मक पक्ष मानते हुए लिखा है कि प्राचीन काल की जाति व्यवस्था में किसी भी वर्ग को किसी से शिकायत नहीं थी। यदि सुदर्शन राव के द्वारा जारी ‘कलेक्टिव मेमोरी’ को सही माना जाए तो कई सवाल इसके तथ्य को आईना दिखाने के लिए खड़े हो जाते हैं। जैसे-यदि महाभारत अथवा रामायण के समय छुआछूत नहीं थी तो लक्ष्मण ने शबरी का बेर क्यों नहीं खाया? तपस्वी होते हुए भी राम ने शंबूक की हत्या क्यों की? एकलव्य से निर्लज्जतापूर्वक अँगूठा कैसे और क्यों माँगा गया। गौरतलब है कि अपनी अतीतग्रस्तता के वजह से सुदर्शन जी इन सारी गाथाओं को नजर अंदाज कर दिए होंगे। अतीतग्रस्तता एक सहज प्रवृत्ति है, मुख्यतः असहाय बने अकर्मण्य लोगों की। दक्षिणपंथी विचारधारा यहीं मार खा जाती है, जब वही ‘स्वर्णिम काल’ की बात करती है और जब सवाल वर्णव्यवस्था या जातिवाद पर उठ जाता है तो सारा इतिहास बोध पारलौकिकता और नियतिवाद में तब्दील हो जाता है। जातिभेद के सवाल पर अपने साक्षात्कार में वाई0 सुदर्शन ने कहा कि विश्वामित्र ने दलित के घर कुत्ते का मांस खाया था। सुदर्शन राव साहब इसके जरिए यह दिखाना चाहते हैं कि दलित कुत्ता खाता था, परन्तु क्या उनमें यह हिम्मत है कि आर्यों के गोमाँस खाने के प्रमाणिक तथ्यों को वह स्वीकार करें।
इतिहास बनाम धर्म
    इतिहास साक्ष्यों पर आधारित होता है वहीं धर्म आस्था का विषय है। परन्तु सुदर्शन राव साहब सिर्फ आस्थावान व्यक्ति ही नहीं बल्कि असहिष्णु भी हैं। तभी तो सनातन धर्म की बड़ाई करते-करते राव साहब ने यहाँ तक दावा कर दिया है कि सनातन धर्म सर्वश्रेष्ठ धर्म है। साथ ही साथ इस्लाम को विध्वंसक धर्म बताया है कि मध्यकाल में किस तरह से उन्होंने मंदिरों को नुकसान पहुँचाया। इतिहासबोध की इतनी छिछली जानकारी रखने वाले राव साहब को पता होना चाहिए कि तुर्कों से पहले भी भारत में हिन्दू शासको ने एक दूसरे के मंदिरों को तोड़ा था, क्योंकि मंदिर शासक की प्रतिष्ठा हुआ करते थे। अतः यह कहना कि सिर्फ मुसलमानों ने मंदिर तोड़े यह बचकाना बात है। मध्य काल में मंदिरांे का तोड़ा जाना मुख्यतः आर्थिक कारण था न कि धार्मिक कारण।
    खैर 1972 मंें स्थापित आईसीएचआर के पहले चेयरमैन प्रो0 रामशरण शर्मा के साथ इरफान हबीब, सव्यसाची भट्टाचार्य के ‘इतिहास बोध’ को दोराहे पर खड़ा कर दिया गया है। क्योंकि सुदर्शन राव ने इतिहास की धारा को ‘इतिहास जो है’ से ‘इतिहास जो हो सकता है’ की तरफ मोड़ने का प्रयास किया है। फिलहाल समाज और सरकारों को नहीं भूलना चाहिए कि यदि हम अतीत पर पिस्तौल से गोली चलाएँगें तो आने वाला भविष्य हम पर तोप से गोले दागेगा।
 -अनिल यादव
   मो0 0945429233
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
दिसम्बर --2014

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

अयोध्या फिर चुनावी रणभूमि में




भाजपा के नए अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने एक बार फिर राम मंदिर का मुद्दा उछाला है। विहिप से जुड़े हुए साधु.संतों ने भी कहा है कि राम मंदिर उनके एजेन्डे पर है। संघ परिवार के सभी शीर्ष नेता महाकुंभ में पहुंच रहे हैं और पवित्र गंगा में डुबकी लगाकर यह घोषणा कर रहे हैं कि सन् 2014 के लोकसभा चुनाव में राम मंदिर का मुद्दा उनके चुनाव अभियान का केन्द्र बिन्दु होगा।
यह सचमुच चिंतनीय है कि राम मंदिर का मुद्दा इस तथ्य के बावजूद उठाया जा रहा है कि इलाहबाद हाईकोर्ट यह निर्णय दे चुका है कि विवादित भूमि को तीन बराबर भागों में बांटकर,तीनों पक्षकारों.सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला विराजमान. को सौंप दिया जाए। इस निर्णय को उच्चतम न्यायलय में चुनौती दी गई है और यह अपील देश के सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। इलाहबाद हाईकोर्ट के निर्णय के बाद आरएसएस ने कहा था कि बहुसंख्यकों की भावनाओं का आदर करते हुए मुसलमानों को अपने हिस्से की भूमि छोड़ देनी चाहिए। जहां मस्जिद थी, उस भूमि के मालिकाना हक के विवाद का मसला न्यायालय में लंबित होने के बावजूद विहिप आदि यह कह रहे हैं कि अयोध्या में कहीं भी मस्जिद का निर्माण नहीं होने दिया जाएगा। विहिप के अनुसार, मस्जिद का निर्माण अयोध्या की शास्त्रीय सीमा के बाहर किया जा सकता हैए जिसका वर्णन तुलसीदास की रामचरितमानस में किया गया है। कुल मिलाकर, विहिप का यह कहना है कि अयोध्या केवल हिन्दुओं की धर्मस्थली है। यहां यह स्पष्ट कर देना समीचीन होगा कि अयोध्या का अर्थ है युद्धया अर्थात युद्धमुक्त क्षेत्र। अयोध्या केवल हिन्दुओं के लिए पवित्र नहीं है। बौद्ध व जैन धर्मों की भी यह पवित्र स्थली रही है। पांचवी सदी ईसा पूर्व से अयोध्या में बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म के अनुयायियों ने बसना शुरू किया। यद्यपि बौद्ध धर्म को पहली सहस्त्राब्दी में विकट हमलों का सामना करना पड़ा तथापि इस धर्म के धर्मस्थलों के कुछ अवशेष अब भी अयोध्या में बचे हुए हैं। बौद्ध मान्यताओं के अनुसारए पहले और चैथे तीर्थंकंर का जन्म अयोध्या में हुआ था। अयोध्या में जो सबसे पहले जो हिन्दू पूजास्थल बने वे शैव व वैष्णव पंथों के थे। विष्णु के अवतार के रूप में राम की पूजा तो बहुत बाद में शुरू हुई। राम की मूर्तियों की चर्चा छठी शताब्दी ईसवी के बाद ही सुनाई देती है। अयोध्या के सबसे बड़ा मंदिर हनुमानगढ़ी, जिस भूमि पर बना है वह अवध के नवाब ने दान दी थी।
इस सिलसिले में यह मांग भी की जा रही है कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण सरकार उसी तरह करवाए जिस तरह सोमनाथ मंदिर का निर्माण करवाया गया था। आडवानी और कई अन्य यह दावा करते रहे हैं कि सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माणए नेहरू मंत्रिमंडल के निर्णयानुसार करवाया गया था। यह सफेद झूठ है। चूंकि आमजन बहुत समय तक सार्वजनिक मसलों को याद नहीं रखते इसलिए इसका लाभ उठाकर झूठ को बार.बार दोहराकर उसे सच की शक्ल देने की कोशिशें चलती रहती हैं। यह वही कला है जिसमें हिटलर के प्रचार मंत्री गोयबेल्स अत्यंत सिद्धहस्त थे। अगर हम इतिहास पर नजर डालें तो एक बिल्कुल अलग चित्र सामने आएगा। भारत सरकार का सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से कोई लेनादेना नहीं था। यह झूठ है कि नेहरू सरकार ने सोमनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था या निर्माण कार्य में किसी भी प्रकार की सहायता या सहभागिता की थी। यह दुष्प्रचार केवल इस आधार  पर किया जा रहा है कि नेहरू मंत्रिमंडल के दो मंत्री अपनी व्यक्तिगत हैसियत से सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के कार्य में शामिल हुए थे। सच यह है कि जब सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का मसला सरदार पटेल द्वारा उठाया गया थाए तब महात्मा गांधी ने यह राय व्यक्त की थी कि हिन्दू अपने मंदिर का निर्माण करने में पूर्णतः सक्षम हैं और उन्हें न तो सरकारी धन और ना ही सरकारी मदद की जरूरत है। सरकार को ऐसी कोई मदद करनी भी नहीं चाहिए और ना ही मंदिर के निर्माण के लिए सरकारी धन का इस्तेमाल होना चाहिए।
सरदार पटेल की मृत्यु के बाद, नेहरू सरकार के दो मंत्रियों के. एम. मुंशी और एन. व्ही. गाडगिल ने अपनी व्यक्तिगत हैसियत से मंदिर के पुनर्निर्माण में हिस्सेदारी की। केबिनेट ने सोमनाथ मंदिर के संबंध में कभी कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया, जैसा कि साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा दावा किया जा रहा है। मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण होने के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद को उसका उद्घाटन करने के लिए आमंत्रित किया गया। उन्होंने पंडित नेहरू के कड़े विरोध के बावजूद यह आमंत्रण स्वीकार कर लिया। पंडित नेहरू का यह मत था कि उच्च संवैधानिक, सार्वजनिक पदों पर विराजमान व्यक्तियों को किसी भी धर्म या उसके तीर्थस्थलों से संबंधित सार्वजनिक समारोहों में हिस्सा नहीं लेना चाहिए।
बाबरी विध्वंस को बीस साल गुजर चुके हैं। हम आज पीछे पलटकर देख सकते हैं कि राम मंदिर आंदोलन ने देश की राजनीति और समाज को कितना गहरा नुकसान पहुंचाया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अयोध्या मामले में अदालत ने आस्था को अपने फैसले का आधार बनाया। परंतु इस निर्णय को उच्चतम न्यायालय मंे चुनौती दी गई है। क्या कारण है कि अपने एजेन्डे की घोषणा करने के पहले आरएसएस, उच्चतम न्यायालय के निर्णय का इंतजार नहीं कर सकता इसका असली कारण राजनैतिक है। मंदिर आंदोलन का हिन्दू धर्म से कोई संबंध नहीं है। संघ परिवार ने मस्जिद तोड़ी और उससे उसकी राजनैतिक ताकत बढ़ी। सन् 1984 के चुनाव में भाजपा के केवल दो उम्मीदवार लोकसभा में पहुंच सके थे। परंतु इसके बादए संघ परिवार ने ज्योंही इस मुद्दे का पल्लू थामा, भाजपा की लोकसभा में सदस्य संख्या में तेजी से वृद्धि हुई। सन् 1999 के चुनाव में भाजपा के 183 उम्मीदवार  जीते। इस आंदोलन के कारण ही एक छोटे से दल से भाजपा सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बन सकी। परंतु शनैः.शनैः इस मुद्दे का जुनून जनता के सिर से उतरने  लगा और 1999 के बाद से भाजपा की लोकसभा में उपस्थिति लगातार घटती गई। राम मंदिर मुद्दे को पुनर्जीवित करने की वर्तमान कोशिशए एक सोची.समझी रणनीति का हिस्सा है। भाजपा शायद यह सोच रही है कि राम मंदिर के मुद्दे को हवा देकर वह एक बार फिर भारतीय राजनीति के शीर्ष पर पहुंच सकती है।
परंतु इस रणनीति की सफलता संदिग्ध है। दो दशकों की अवधि में मतदाताओं का मिजाज बदल गया है। कम उम्र के युवाओं की मंदिरों आदि में बहुत कम रूचि है। वे अन्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। फिर भी, समाज में एक ऐसा वर्ग है जिसकी भावनाओं को भड़काया जा सकता है। संघ परिवार अपने विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए इस मुद्दे को हवा देने की भरपूर कोशिश कर रहा है। आरएसएस जैसे संगठन केवल पहचान पर आधारित मुद्दों की दम पर जिन्दा रहते हैं। उनके लिए राम मंदिर का मुद्दाए तुरूप का इक्का है। बार.बार दोहराए गए इस तर्क कि राम मंदिर का संबंध भारतीय राष्ट्रीयता से है, ने कई लोगों को भ्रमित कर दिया है। हम सब यह जानते हैं कि भारतीय राष्ट्रीयताए मंदिरों और मस्जिदों के इर्दगिर्द नहीं घूमती। भारतीय राष्ट्रीयताए धार्मिक राष्ट्रीयता नहीं है। प्रजातंत्र में राष्ट्रीयता को सैकड़ों वर्ष पहले हुए राजाओं के धर्म से नहीं जोड़ा जा सकता। वैसे भीए सभी धर्मों के राजाओं के प्रशासनिक तंत्र में दोनों धार्मिक समुदायों के सदस्य रहते थे। हमें भारतीय स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों को एक बार फिर याद करना होगा। स्वाधीनता संग्राम ने ही भारत को एक राष्ट्र की शक्ल दी.एक ऐसे राष्ट्र की जो प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता पर आधारित है। आईए,हम मंदिर.मस्जिद के मुद्दों को दरकिनार करें और उन मसलों पर ध्यान दें जिनका संबंध हमारे देश के करोड़ों नागरिकों की रोजी.-रोटी, रहवास और मूल समस्याओं से है।

 .-राम पुनियानी

मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

आस्था की जीत या संविधान की?

जिस न्यायिक निर्णय का पूरा देश साँस रोककर इन्तिज़ार कर रहा था, आखिरकार वह आ ही गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने अयोध्या मामले में विवादित भूमि के मालिकाना हक संबंधी सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा व अन्यों द्वारा दायर दावों का निराकरण कर दिया है। इस निर्णय की प्रशंसा भी हुई है और निंदा भी। निंदकों में मुख्यतः मुकदमे के पक्षकार हैं। जो लोग इस विवाद का स्थाई समाधान चाहते हैं वे कहते हैं कि इस निर्णय ने तीनों पक्षकारों (रामलला विराजमान को भी अदालत ने एक पक्षकार माना है) के बीच विवाद के सुलझाव का रास्ता प्रशस्त कर दिया है। अब हिन्दू वहाँ मंदिर बना सकते हैं और मुसलमान- अगर चाहें तो-वहाँ एक मस्जिद का निर्माण कर सकते हैं और देश इस विवाद को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ सकता है।
आखिर इस विवाद का कभी तो अंत होना चाहिए ताकि देश आगे बढ़ सके। अगर इस निर्णय से यह लक्ष्य प्राप्त हो गया होता तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता था। परंतु तथ्य यह है कि दोनों पक्षकार इस निर्णय से असंतुष्ट हैं और उच्चतम न्यायालय में अपील करने की तैयारी कर रहे हैं। यह निर्णय किसी भी प्रकार का समझौता या मेल-मिलाप कराने में तो सफल हुआ ही नहीं है बल्कि इससे एक अत्यंत ख़तरनाक नज़ीर की स्थापना हो गई है। ‘शांति और समझौता बेशक बहुत महत्वपूर्ण हैं परंतु अगर इन्हें संवैधानिक, प्रजातंत्र और कानून के राज की कीमत पर हासिल किया जाता है तो इनसे फायदे से अधिक नुकसान होने की आशंका होती है।
अयोध्या मामले का निर्णय कानून पर नहीं वरन् आस्था पर आधारित है। तीन में से दो जजों ने ऐतिहासिक प्रमाणों और देश के कानून को दरकिनार कर केवल हिन्दुओं की आस्था के आधार पर यह मान लिया कि राम एक स्थान विशेष पर जन्मे थे और यह भी कि वहाँ बारहवीं सदी में बनाया गया एक मंदिर अस्तित्व में था। मजे की बात यह है कि दोनों जजों ने यह भी स्वीकार किया कि वे इतिहास व पुरातत्व विज्ञान के बारे में कुछ नहीं जानते। तीसरे जज खान का यह कहना है कि यद्यपि उक्त स्थान पर राम मंदिर के होने का कोई प्रमाण नहीं है तथापि शांति व समझौते की खातिर विवादित भूमि को तीनों पक्षकारों के बीच बाँटना उचित होगा। इस तरह, एक ओर रामलला और दूसरी ओर निर्मोही अखाड़े को भूमि दे दी गई। लगे हाथ, सुन्नी वक्फ बोर्ड को भी जमीन में हिस्सा दे दिया गया।
पक्षकारों के अलावा कई विधिवेत्ताओं ने भी उच्च न्यायालय के निर्णय की कड़ी निंदा की है और यह आशा व्यक्त की है कि उच्चतम न्यायालय केवल और केवल संवैधानिक व कानूनी दृष्टिकोण से इस मामले में अंतिम फैसला करेगा। इस प्रक्रिया में काफी समय लगने की संभावना है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले में तीनों जजों ने शांति और समझौते को अधिक महत्व दिया है और प्रजातांत्रिक भारत के संवैधानिक मूल्यों को कम। कानून का न तो पक्षकारों और न ही जजों की आस्था से कोई लेना-देना है और न ही होना चाहिए। भारत जैसे देश में, जहाँ पिछले साठ सालों से न्यायापालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों को संरक्षित रखा गया है, कोई भी न्यायिक निर्णय केवल कानून पर आधारित होना चाहिए।
यह शायद पहली बार है कि देश के किसी उच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक तथ्यों और कानूनी प्रावधानों को दरकिनार कर, केवल आस्था को प्रधानता दी है। अदालत को इस बात से कोई मतलब नहीं होना चाहिए कि उसके निर्णय से समझौता या मेलमिलाप होता है या नहीं। अदालत को तो कानून के अनुसार काम करना चाहिए। बेशक, अदालत सभी पक्षकारों से यह अपील कर सकती है कि वे अदालती लड़ाई में अपना समय व धन बर्बाद करने के बजाय आपसी बातचीत से विवाद का हल खोज लें। परंतु यह पक्षकारों पर निर्भर है कि वे अदालत की अपील को स्वीकार करें या न करें। अगर वे ऐसा नहीं करते तो जजांे का यह कर्तव्य है कि वे कानून के अनुरूप अपना निर्णय सुनाएँ।
जो लोग इस निर्णय को शांति की जीत और एक पुराने विवाद का सुखद अंत निरूपित कर रहे हैं वे या तो इसके दूरगामी परिणामों से वाक़िफ़ नहीं हैं या हमारे संवैधानिक प्रजातंत्र के लिए उनके मन में आदर व सम्मान का भाव नहीं है। खुशी मनाने वालों की सोच चाहे जो हो परंतु यह साफ है कि इस निर्णय से अदालतों की कार्यप्रणाली में एक ख़तरनाक प्रवृत्ति की शुरुआत हुई है। आगे चलकर, जज अपनी-अपनी आस्था के अनुरूप निर्णय देने लगेंगे। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उच्च न्यायालयों व उच्चतम न्यायालय का कोई भी निर्णय, भविष्य के निर्णयों का आधार बन सकता है।
यदि इसी तर्क को हम आगे बढ़ाएँ तो क्या इससे यह ध्वनित नहीं होता कि चूँकि प्रजातंत्र में संख्या बल सबसे महत्वपूर्ण है इसलिए बहुसंख्यक समुदाय की आस्था का अधिक महत्व है और अल्पसंख्यकों के धार्मिक विश्वासों का कम। क्या इससे हमारा न्यायतंत्र बहुसंख्यकवादी नहीं हो जाएगा? क्या इससे कानून और संविधान में अल्पसंख्यकों व कमजोर वर्गांे की सुरक्षा के लिए किए गए प्रावधान अर्थहीन नहीं हो जाएँगे? क्या इससे अल्पसंख्यकांे की देश के न्यायतंत्र और संविधान पर आस्था कम नहीं होगी? अगर हम संविधान और कानून की सर्वोच्चता में आस्था रखते हैं तो हमें इस निर्णय पर प्रश्नचिह्न लगाने ही होंगे। निःसंदेह, धार्मिक आस्था और विश्वास, व्यक्तियों व धार्मिक समुदायों के लिए बहुत महत्व रखते हैं परन्तु जहाँ तक राष्ट्र का प्रश्न है, उसके लिए संविधान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। भारत एक विविधवर्णी राष्ट्र है जहाँ विभिन्न आस्थाओं वाले लोग रहते हैं। हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को अंतःकरण और आस्था की आजादी देता है परंतु राष्ट्र के लिए कानून उतना ही महत्वपूर्ण है जितनी किसी व्यक्ति के लिए उसकी आस्था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय को इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।
वैसे भी, हिन्दू धर्म अपने आप में एकसार नहीं है। हिन्दुओं में दक्षिण भारत के द्रविड़ भी शामिल हैं पंरतु उनकी धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराएँ, उत्तर भारत की आर्य परंपराओं से सर्वथा भिन्न हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि ने हाल में यह आरोप लगाया है कि आर्य देवी-देवता, द्रविड़ों पर थोपे जा रहे हैं।
स्पष्टतः, इलाहाबाद उच्च न्यायालय जिस “हिन्दू आस्था“ की बात कर रहा है वह भी विभाजित है। उन धर्मनिरपेक्ष हिन्दुओं के अतिरिक्त जो संवैधानिक मूल्यों में आस्था रखते हैं, अन्य सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों वाले व अन्य भाषा-भाषी हिन्दू भी वह “आस्था“ नहीं रखते जिसकी न्यायालय ने चर्चा की है। कुल मिलाकर, आस्था के आधार पर न्यायिक फैसले होने से सभी अल्पसंख्यक समूहों व विशेषकर प्रभावित होने वाले अल्पसंख्यकों पर, यह दबाव बनता है कि वे बहुसंख्यकों की मान्यताओं के समक्ष अपने घुटने टेक दंे।
जो कुछ मैंने ऊपर कहा, उसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि अयोध्या जैसे विवादों को बातचीत और आपसी समझौते से नहीं सुलझाया जाना चाहिए। अगर अयोध्या विवाद, संवाद और न्यायपूर्ण लेन-देन के आधार पर सुलझ जाता है तो मुझसे ज्यादा खुशी किसी को नहीं होगी। इस मामले के सबसे पुराने पक्षकारों में से एक-श्री हाशिम अंसारी, जो सन् 1960 के दशक से इस मुकदमे को लड़ रहे हैं-ने निर्णय के बाद हनुमानगढी़ मंदिर के मुख्य पुजारी से मुलाकात की। यह एक प्रशंसनीय पहल है। उन्होंने मुख्य पुजारी श्री ज्ञान दास से अनुरोध किया कि वे निर्माेही अखाड़े को इस बात के लिए राजी करें कि आपसी संवाद और सहमति के जरिए इस विवाद का कोई हल निकाला जाए।
भारत एक महान प्रजातंत्र है और हमें इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़ने के बजाय भविष्य की ओर देखना चाहिए। भूत से भविष्य कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। अगर ऐसा कोई मुद्दा उठ खड़ा होता भी है तो उसे आपसी समझ और सहयोग से इस ढंग से निपटाया जाना चाहिए कि किसी पक्ष को यह महसूस न हो कि उसकी हार हुई है। राजनैतिक दलों द्वारा इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़कर उनका इस्तेमाल अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए करना देश के लिए अहितकर है। भाजपा ने ठीक यही किया है।
यह अत्यंत खेद का विषय है कि बाबरी मस्जिद को ढहाने के गैर-कानूनी, असंवैधानिक व गैर-प्रजातांत्रिक षड्यन्त्र को अंजाम देने वाले तत्व, इस निर्णय को अपनी जीत मानकर जश्न मना रहे हैं। वे आस्था की न्याय पर विजय को अपनी विजय बता रहे हैं। यह अत्यंत ख़तरनाक व निंदनीय प्रवृत्ति है। मस्जिद ढहाने वालों को आज तक कोई सजा न मिलना भी भारतीय संविधान का अपमान है। उन्हें उनके इस कृत्य का-जो हिन्दू धर्म की शिक्षाओं के विरुद्ध था-कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।
ऐसे मामलों में समाज की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। हमारे बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, शांति कार्यकर्ताओं और उन सबको, जो संवैधानिक व प्रजातांत्रिक मूल्यों में आस्था रखते हैं, आगे बढ़कर दोनों पक्षों पर सार्थक आपसी संवाद करने का दबाव बनाना चाहिए ताकि इस विवाद को अदालत की चहारदीवारी के बाहर सुलझाया जा सके।
सन् 2000 के शुरू में, कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य ने मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड की मदद से इस विवाद के शांतिपूर्ण निपटारे की पहल की थी परंतु विहिप ने उनका घेराव किया और उन्हें अपने कदम पीछे खींचने पड़े। इस बार, द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने ऐसी ही पहल की है। इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए और मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड को इस कार्य में शंकराचार्य को पूरा सहयोग देना चाहिए।
इसके साथ ही, हमें भारत के आमजनों की भी दिल खोलकर प्रशंसा करनी होगी जिन्होंने शांति व सौहार्द बनाए रखा और अयोध्या निर्णय के बाद कहीं से भी किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं आई। आमजनों ने हमारे राजनेताओं से अधिक परिपक्वता व समझदारी प्रदर्शित की है।
हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि देश में शांति और व्यवस्था बनाए रखने में मुसलमानों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। निर्णय के पहले की जुमे की नमाजों में देश की लगभग सभी मस्जिदों के इमामों ने मुसलमानों से शांति बनाए रखने और निर्णय को-चाहे वह उनके पक्ष में हो या विरुद्ध-स्वीकार करने की अपीलें कीं। इसके विपरीत, सन् 1980 के दशक के मध्य से लेकर अंत तक मुसलमान, बाबरी मस्जिद के मुद्दे पर अत्यंत संवेदनशील और उत्तेजित थे।
मुसलमानों को अब यह अहसास हो गया है कि प्रजातंत्र व धर्मनिरपेक्ष मूल्यों में ही उनका सुखद व सुरक्षित भविष्य छुपा हुआ है। उन्हें इस बात का अहसास है कि टकराव से केवल हिंसा और बर्बादी होगी और सभी भारतीयों की भलाई में ही उनकी भलाई निहित है। इस बार हिन्दुओं और मुसलमानों ने जबरदस्त एकजुटता का परिचय दिया और अतिवादियों को-जो उत्तेजक वक्तव्यांे के जरिए माहौल को बिगाड़ते थे- दरकिनार कर दिया। अब तो अतिवादी भी अत्यंत समझदारी की बातें कर रहे हैं। उन्हें भारत की जनता ने इसके लिए मजबूर किया है। कोई भी जागृत समाज अपने राजनेताओं पर किस तरह नियंत्रण रख सकता है, यह उसका उदाहरण है। बेहतर होगा कि देश की सबसे बड़ी अदालत के दरवाजे खटखटाने के पहले, अयोध्या मामले का बातचीत से हल खोजने की गंभीर कोशिश की जाए और हमारे देश जैसे प्रजातंत्र में यह काम केवल समाज कर सकता है।

-डॉ. असगर अली इंजीनियर
मोबाइल: 0986944999
(लेखक मुंबई स्थित सेंटर फार स्टडी ऑफ़ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म के संयोजक हैं, जाने-माने इस्लामिक विद्वान हैं और कई दशकों से साम्प्रदायिकता व संकीर्णता के खिलाफ संघर्ष करते रहे हैं।)

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

पुरातत्ववेत्ता प्रोफेसर मण्डल का कथन अयोध्या उत्खनन के सम्बन्ध में

अयोध्या के विवादित पुरास्थल का उत्खनन आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इण्डिया (ए0एस0आई0) द्वारा 2002-2003 में किया गया। यह उत्खनन लगभग पाँच महीनें में सम्पन्न हो गया।
उत्खनन के लगभग समाप्ति के दिनों में 10 जून से 15 जून 2003 तक तथा दूसरी बार ए0एस0आई0 की अन्तिम रिपोर्ट जमा हो जाने के बाद 27 सितम्बर से 29 सितम्बर 2003 तक धनेश्वर मण्डल, रिटायर्ड प्रोफेसर डिपार्टमेन्ट आफ ऐनशियंट हिस्ट्री, कल्चर एण्ड आर्कियोलाजी, यूनिवर्सिटी आफ इलाहाबाद ने अयोध्या जाकर मामले का बारीकी से अध्ययन एवं स्थलीय निरीक्षण किया तथा तथ्यों को एक पक्ष की तरफ़ से शपथ-पत्र के रूप में 5 दिसम्बर 2005 को न्यायालय के समक्ष दाखिल किया।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि ए0एस0आई0 की दो जिल्दों की मोटी-मोटी अंतिम उत्खनन रिपोर्ट केवल पन्द्रह दिनों में ही प्रकाशित हो गई।
प्रोफेसर मण्डल के बयान की एक पुस्तिका ‘एक पुरातत्ववेत्ता का हलफनामा-जनता के दरबार में’ के शीर्षक से, मई 2006 में पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस (प्रा0) लि0 रानी झाँसी रोड, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई। इसी के आधार पर संक्षेप में कुछ तथ्य एवं अंश प्रस्तुत हैं-सबसे पहले यह बताते चलंे कि प्रो0 मंडल की टिप्पणियाँ तीन स्रोतों से उपलब्ध सूचनाओं पर आधारित हैं प्रथम-उत्खनित स्थान का व्यक्तिगत सर्वेक्षण, द्वितीय-ए0एस0आई0 द्वारा प्रस्तुत दो जिल्दों की रिपोर्ट, तृतीय-उत्खनन से सम्बंधित डे-टू-डे रजिस्टर।
प्रो0 मंडल ने अपने बयान में ए0एस0आई0 की कार्य-विधि एवं रिपोर्ट पर अत्यन्त गंभीर आपत्तियाँ उठाई हैं, इस सम्बन्ध में यह अंश देखिए:-
‘‘उत्खनन में मान्यता प्राप्त पुरातत्विक विधियों का समुचित उपयोग नहीं हुआ है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि स्तरीकरण, पुरातात्विक, उत्खनन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विधि है। इस विधि के अनुसार स्तर अथवा परत को आधार बनाकर उत्खनन किया जाता है न कि गहरान ;क्म्च्ज्भ्द्ध को। गहरान आधारित उत्खनन वस्तुतः पुरातत्विक उत्खनन नहीं अपितु पुरातत्व की दृष्टि से उसका विनाश है’’
वे यह भी लिखते हैं-
‘‘स्तरीकरण एवं कालक्रम से मैं सहमत नहीं हूँ।’’ उनके अनुसार इन दोनों में पहले का महत्व अधिक है, क्योंकि दूसरा, पहले पर निर्भर है। एक अध्याय का उल्लेख करके बताया कि उसमें ‘‘स्तरीकरण से सम्बंधित तथ्यों का नितांत अभाव है। पूरा का पूरा अध्याय कालक्रम के ब्योरे से भरा है, वह भी प्रमाणित तथ्यों पर आधारित नहीं।’’
यह उत्खनन क्षैतिज है, इसमें 5-5 मीटर की 90 ‘‘ट्रेंच’’ खोदी गईं। ट्रेंच जी-7 के बारे में प्रोफेसर साहब लिखते हैं कि यह ‘‘पुरास्थल की पूरी कहानी कहता है। यह एक खुली किताब है। इसका हर परत किताब के पन्नों की तरह है। जो पढ़ सके पढ़ ले।’’
ए0एस0आई0 की रिपोर्ट ने 18 परतों के जमाव को पुरातत्विक जमाव माना है परन्तु प्रो0 मंडल इसे दो कोटि में विभाजित करके दूसरे जमाव को प्राकृतिक जमाव मानते हैं, और इसे भी दो भागों बसावटी एवं गैर बसावटी में विभाजित करते हैं, फिर बताते हैं कि लम्बे अर्से तक जगह वीरान रही, फिर बाढ़ से कुछ परतंे बनीं तत्पश्चात आबादी हुई। जगह को ऊँचा करते रहने के भी प्रमाण मिले। श्री बी0बी0 लाल द्वारा खुदाई के हवाले से बताते हैं कि यह क्षेत्र बाढ़ प्रभावित रहा है जिसकी सुरक्षा में ‘फोर्टीफिकेशन वाल’ का भी अवशेष मिला था। प्रो0 मंडल का यह कहना है-‘‘संभावना है कि बाढ़ प्रकोप से सुरक्षा प्रदान करने हेतु ही इस स्थल को बार-बार ऊँचा करने की आवश्यकता पड़ी। इस घटनाक्रम में एक समय ऐसा भी आया कि बाढ़ के कारण यहाँ के लोगो को बाध्य होकर एक लम्बे समय के लिए यह स्थान ही त्याग देना पड़ा।’’

- विजय प्रताप सिंह (एडवोकेट)

रविवार, 31 अक्टूबर 2010

एतद् देश प्रसूतस्य शकासाद् अग्रजन्मन : , स्वं-स्वं चरित्रं शिक्षरेन् पृथ्वियां सर्व मानव :

भावार्थ- जो लोग भारत में पैदा हुए तथा यहाँ के ब्राहमणों ने अपने-अपने चरित्र से पृथ्वी के समस्त मानव-प्राणी को शिक्षा दी
उपर्युक्त श्लोक को तकरीबन 25 वर्षों एक सद्ग्रंथ में पढ़ा तो मेरा मन बाग़-बाग़ हो उठा, मन-मयूर नृत्य करने लगामुझे इस बात का गर्व था कि हमारे पूर्वज दुनिया में सबसे अच्छे थेवे चरित्रवान थे, मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण थेज्यादा समय नहीं बीता, मैं निराश होने लगा, मेरा मनका ढह गयाअब विश्वास ही नहीं होता कि हम बहुत अच्छे थेयदि हम बड़े मानवीय मूल्यों से युक्त थे, इंसानियत पसंद थे, तो आज क्या हो गया हैसन् 1949 में बाबरी मस्जिद में मूर्तियाँ रख दी गयीं, 6 दिसम्बर 1992 में यह मस्जिद नारा लगते हुए सरेशाम तोड़ दी गयीइंदिरा गाँधी की हत्या के पश्चात सिखों का संहार, गुजरात में गोधरा-कांड के पश्चात मुस्लिमो का संहार तथा महिलाओं के गर्भ में पल रहे बच्चे को धारदार हथियार से पेट चीर मार देना, उड़ीसा के कंधमाल में दलित ईसाईयों का संहार तथा उनके घर-झोपड़ियों को आग के हवाले कर देना आदि घटनाएं क्या यही दर्शाती हें कि हम बड़े कुलीन हैं, हम अच्छे हैं, चरित्रवान हें, सभी हैं ?
इस देश में फसिस्टवादियों की संख्या 20 प्रतिशत से भी कम हैआज भी हम अपने कर्तव्यों से पूरी दुनिया को शिक्षा देने में सक्षम हैं, परन्तु हमारी अच्छाइयों को कट्टरपंथियों ने गहरे धुंध में धकेल दिया हैदुर्योधन द्वारा भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण किया जा रहा था, उनको नग्न करने का प्रयास चल रहा थाउस समय भीष्म पितामह मौन थेयुधिष्ठिर धर्मराज कहे जाते थे, इन्होने भी प्रतिकार नहीं कियाआज हम उन्ही लोगों जैसे धर्मधुरंधर हो गए हैंसांप्रदायिक ताकतें नंगा नृत्य करती रहती हैं, मानवीय मूल्यों का गला घोटती रहती हैंइंसानों को मौत के घाट उतारती रहती हैं, फिर भी हम चुप बैठे रहते हैं

युगलकिशोर शरण शास्त्री
निकट बाबरी मस्जिद
अयोध्या
फैजाबाद
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