रविवार, 31 अक्तूबर 2010

एतद् देश प्रसूतस्य शकासाद् अग्रजन्मन : , स्वं-स्वं चरित्रं शिक्षरेन् पृथ्वियां सर्व मानव :

भावार्थ- जो लोग भारत में पैदा हुए तथा यहाँ के ब्राहमणों ने अपने-अपने चरित्र से पृथ्वी के समस्त मानव-प्राणी को शिक्षा दी
उपर्युक्त श्लोक को तकरीबन 25 वर्षों एक सद्ग्रंथ में पढ़ा तो मेरा मन बाग़-बाग़ हो उठा, मन-मयूर नृत्य करने लगामुझे इस बात का गर्व था कि हमारे पूर्वज दुनिया में सबसे अच्छे थेवे चरित्रवान थे, मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण थेज्यादा समय नहीं बीता, मैं निराश होने लगा, मेरा मनका ढह गयाअब विश्वास ही नहीं होता कि हम बहुत अच्छे थेयदि हम बड़े मानवीय मूल्यों से युक्त थे, इंसानियत पसंद थे, तो आज क्या हो गया हैसन् 1949 में बाबरी मस्जिद में मूर्तियाँ रख दी गयीं, 6 दिसम्बर 1992 में यह मस्जिद नारा लगते हुए सरेशाम तोड़ दी गयीइंदिरा गाँधी की हत्या के पश्चात सिखों का संहार, गुजरात में गोधरा-कांड के पश्चात मुस्लिमो का संहार तथा महिलाओं के गर्भ में पल रहे बच्चे को धारदार हथियार से पेट चीर मार देना, उड़ीसा के कंधमाल में दलित ईसाईयों का संहार तथा उनके घर-झोपड़ियों को आग के हवाले कर देना आदि घटनाएं क्या यही दर्शाती हें कि हम बड़े कुलीन हैं, हम अच्छे हैं, चरित्रवान हें, सभी हैं ?
इस देश में फसिस्टवादियों की संख्या 20 प्रतिशत से भी कम हैआज भी हम अपने कर्तव्यों से पूरी दुनिया को शिक्षा देने में सक्षम हैं, परन्तु हमारी अच्छाइयों को कट्टरपंथियों ने गहरे धुंध में धकेल दिया हैदुर्योधन द्वारा भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण किया जा रहा था, उनको नग्न करने का प्रयास चल रहा थाउस समय भीष्म पितामह मौन थेयुधिष्ठिर धर्मराज कहे जाते थे, इन्होने भी प्रतिकार नहीं कियाआज हम उन्ही लोगों जैसे धर्मधुरंधर हो गए हैंसांप्रदायिक ताकतें नंगा नृत्य करती रहती हैं, मानवीय मूल्यों का गला घोटती रहती हैंइंसानों को मौत के घाट उतारती रहती हैं, फिर भी हम चुप बैठे रहते हैं

युगलकिशोर शरण शास्त्री
निकट बाबरी मस्जिद
अयोध्या
फैजाबाद

1 टिप्पणी:

sahaytaa ने कहा…

yah sthitee kisee raashtr ke nirmaan aur sthayitv dono ke liye khatara hai. nishchit roop se yah vightan kaa paarambh hai