शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

अयोध्या फिर चुनावी रणभूमि में




भाजपा के नए अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने एक बार फिर राम मंदिर का मुद्दा उछाला है। विहिप से जुड़े हुए साधु.संतों ने भी कहा है कि राम मंदिर उनके एजेन्डे पर है। संघ परिवार के सभी शीर्ष नेता महाकुंभ में पहुंच रहे हैं और पवित्र गंगा में डुबकी लगाकर यह घोषणा कर रहे हैं कि सन् 2014 के लोकसभा चुनाव में राम मंदिर का मुद्दा उनके चुनाव अभियान का केन्द्र बिन्दु होगा।
यह सचमुच चिंतनीय है कि राम मंदिर का मुद्दा इस तथ्य के बावजूद उठाया जा रहा है कि इलाहबाद हाईकोर्ट यह निर्णय दे चुका है कि विवादित भूमि को तीन बराबर भागों में बांटकर,तीनों पक्षकारों.सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला विराजमान. को सौंप दिया जाए। इस निर्णय को उच्चतम न्यायलय में चुनौती दी गई है और यह अपील देश के सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। इलाहबाद हाईकोर्ट के निर्णय के बाद आरएसएस ने कहा था कि बहुसंख्यकों की भावनाओं का आदर करते हुए मुसलमानों को अपने हिस्से की भूमि छोड़ देनी चाहिए। जहां मस्जिद थी, उस भूमि के मालिकाना हक के विवाद का मसला न्यायालय में लंबित होने के बावजूद विहिप आदि यह कह रहे हैं कि अयोध्या में कहीं भी मस्जिद का निर्माण नहीं होने दिया जाएगा। विहिप के अनुसार, मस्जिद का निर्माण अयोध्या की शास्त्रीय सीमा के बाहर किया जा सकता हैए जिसका वर्णन तुलसीदास की रामचरितमानस में किया गया है। कुल मिलाकर, विहिप का यह कहना है कि अयोध्या केवल हिन्दुओं की धर्मस्थली है। यहां यह स्पष्ट कर देना समीचीन होगा कि अयोध्या का अर्थ है युद्धया अर्थात युद्धमुक्त क्षेत्र। अयोध्या केवल हिन्दुओं के लिए पवित्र नहीं है। बौद्ध व जैन धर्मों की भी यह पवित्र स्थली रही है। पांचवी सदी ईसा पूर्व से अयोध्या में बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म के अनुयायियों ने बसना शुरू किया। यद्यपि बौद्ध धर्म को पहली सहस्त्राब्दी में विकट हमलों का सामना करना पड़ा तथापि इस धर्म के धर्मस्थलों के कुछ अवशेष अब भी अयोध्या में बचे हुए हैं। बौद्ध मान्यताओं के अनुसारए पहले और चैथे तीर्थंकंर का जन्म अयोध्या में हुआ था। अयोध्या में जो सबसे पहले जो हिन्दू पूजास्थल बने वे शैव व वैष्णव पंथों के थे। विष्णु के अवतार के रूप में राम की पूजा तो बहुत बाद में शुरू हुई। राम की मूर्तियों की चर्चा छठी शताब्दी ईसवी के बाद ही सुनाई देती है। अयोध्या के सबसे बड़ा मंदिर हनुमानगढ़ी, जिस भूमि पर बना है वह अवध के नवाब ने दान दी थी।
इस सिलसिले में यह मांग भी की जा रही है कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण सरकार उसी तरह करवाए जिस तरह सोमनाथ मंदिर का निर्माण करवाया गया था। आडवानी और कई अन्य यह दावा करते रहे हैं कि सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माणए नेहरू मंत्रिमंडल के निर्णयानुसार करवाया गया था। यह सफेद झूठ है। चूंकि आमजन बहुत समय तक सार्वजनिक मसलों को याद नहीं रखते इसलिए इसका लाभ उठाकर झूठ को बार.बार दोहराकर उसे सच की शक्ल देने की कोशिशें चलती रहती हैं। यह वही कला है जिसमें हिटलर के प्रचार मंत्री गोयबेल्स अत्यंत सिद्धहस्त थे। अगर हम इतिहास पर नजर डालें तो एक बिल्कुल अलग चित्र सामने आएगा। भारत सरकार का सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से कोई लेनादेना नहीं था। यह झूठ है कि नेहरू सरकार ने सोमनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था या निर्माण कार्य में किसी भी प्रकार की सहायता या सहभागिता की थी। यह दुष्प्रचार केवल इस आधार  पर किया जा रहा है कि नेहरू मंत्रिमंडल के दो मंत्री अपनी व्यक्तिगत हैसियत से सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के कार्य में शामिल हुए थे। सच यह है कि जब सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का मसला सरदार पटेल द्वारा उठाया गया थाए तब महात्मा गांधी ने यह राय व्यक्त की थी कि हिन्दू अपने मंदिर का निर्माण करने में पूर्णतः सक्षम हैं और उन्हें न तो सरकारी धन और ना ही सरकारी मदद की जरूरत है। सरकार को ऐसी कोई मदद करनी भी नहीं चाहिए और ना ही मंदिर के निर्माण के लिए सरकारी धन का इस्तेमाल होना चाहिए।
सरदार पटेल की मृत्यु के बाद, नेहरू सरकार के दो मंत्रियों के. एम. मुंशी और एन. व्ही. गाडगिल ने अपनी व्यक्तिगत हैसियत से मंदिर के पुनर्निर्माण में हिस्सेदारी की। केबिनेट ने सोमनाथ मंदिर के संबंध में कभी कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया, जैसा कि साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा दावा किया जा रहा है। मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण होने के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद को उसका उद्घाटन करने के लिए आमंत्रित किया गया। उन्होंने पंडित नेहरू के कड़े विरोध के बावजूद यह आमंत्रण स्वीकार कर लिया। पंडित नेहरू का यह मत था कि उच्च संवैधानिक, सार्वजनिक पदों पर विराजमान व्यक्तियों को किसी भी धर्म या उसके तीर्थस्थलों से संबंधित सार्वजनिक समारोहों में हिस्सा नहीं लेना चाहिए।
बाबरी विध्वंस को बीस साल गुजर चुके हैं। हम आज पीछे पलटकर देख सकते हैं कि राम मंदिर आंदोलन ने देश की राजनीति और समाज को कितना गहरा नुकसान पहुंचाया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अयोध्या मामले में अदालत ने आस्था को अपने फैसले का आधार बनाया। परंतु इस निर्णय को उच्चतम न्यायालय मंे चुनौती दी गई है। क्या कारण है कि अपने एजेन्डे की घोषणा करने के पहले आरएसएस, उच्चतम न्यायालय के निर्णय का इंतजार नहीं कर सकता इसका असली कारण राजनैतिक है। मंदिर आंदोलन का हिन्दू धर्म से कोई संबंध नहीं है। संघ परिवार ने मस्जिद तोड़ी और उससे उसकी राजनैतिक ताकत बढ़ी। सन् 1984 के चुनाव में भाजपा के केवल दो उम्मीदवार लोकसभा में पहुंच सके थे। परंतु इसके बादए संघ परिवार ने ज्योंही इस मुद्दे का पल्लू थामा, भाजपा की लोकसभा में सदस्य संख्या में तेजी से वृद्धि हुई। सन् 1999 के चुनाव में भाजपा के 183 उम्मीदवार  जीते। इस आंदोलन के कारण ही एक छोटे से दल से भाजपा सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बन सकी। परंतु शनैः.शनैः इस मुद्दे का जुनून जनता के सिर से उतरने  लगा और 1999 के बाद से भाजपा की लोकसभा में उपस्थिति लगातार घटती गई। राम मंदिर मुद्दे को पुनर्जीवित करने की वर्तमान कोशिशए एक सोची.समझी रणनीति का हिस्सा है। भाजपा शायद यह सोच रही है कि राम मंदिर के मुद्दे को हवा देकर वह एक बार फिर भारतीय राजनीति के शीर्ष पर पहुंच सकती है।
परंतु इस रणनीति की सफलता संदिग्ध है। दो दशकों की अवधि में मतदाताओं का मिजाज बदल गया है। कम उम्र के युवाओं की मंदिरों आदि में बहुत कम रूचि है। वे अन्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। फिर भी, समाज में एक ऐसा वर्ग है जिसकी भावनाओं को भड़काया जा सकता है। संघ परिवार अपने विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए इस मुद्दे को हवा देने की भरपूर कोशिश कर रहा है। आरएसएस जैसे संगठन केवल पहचान पर आधारित मुद्दों की दम पर जिन्दा रहते हैं। उनके लिए राम मंदिर का मुद्दाए तुरूप का इक्का है। बार.बार दोहराए गए इस तर्क कि राम मंदिर का संबंध भारतीय राष्ट्रीयता से है, ने कई लोगों को भ्रमित कर दिया है। हम सब यह जानते हैं कि भारतीय राष्ट्रीयताए मंदिरों और मस्जिदों के इर्दगिर्द नहीं घूमती। भारतीय राष्ट्रीयताए धार्मिक राष्ट्रीयता नहीं है। प्रजातंत्र में राष्ट्रीयता को सैकड़ों वर्ष पहले हुए राजाओं के धर्म से नहीं जोड़ा जा सकता। वैसे भीए सभी धर्मों के राजाओं के प्रशासनिक तंत्र में दोनों धार्मिक समुदायों के सदस्य रहते थे। हमें भारतीय स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों को एक बार फिर याद करना होगा। स्वाधीनता संग्राम ने ही भारत को एक राष्ट्र की शक्ल दी.एक ऐसे राष्ट्र की जो प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता पर आधारित है। आईए,हम मंदिर.मस्जिद के मुद्दों को दरकिनार करें और उन मसलों पर ध्यान दें जिनका संबंध हमारे देश के करोड़ों नागरिकों की रोजी.-रोटी, रहवास और मूल समस्याओं से है।

 .-राम पुनियानी

1 टिप्पणी:

Neetu Singhal ने कहा…

पक्ष जित के बियंजन भर थाल परोसत जाए ।
अधर अधर बिपक्ष जन घरी घरी लै उबकाए ।।