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गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

फैजाबाद में सरकारी दंगा -3

कुल मिलाकर यदि दंगाइयों की कार्यप्रणाली, आगजनी को अंजाम देने के लिए प्रयुक्त सामग्री, साम्प्रदायिक शक्तियों के साथ एक दो अपवाद को छोड़कर समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेताओं के तालमेल और पुलिस प्रशासन द्वारा दंगाइयों को दी गई खुली छूट से यह निष्कर्ष निकलता है कि फैजाबाद के दंगे समाजवादी सरकार में होने वाले पूर्व के दंगों का विस्तार है। कोसी कलाँ और एस्थान की भाँति यहाँ भी पुलिस ने दंगाइयों को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया। यहाँ भी पुलिस ने घंटों तक लगातार चलने वाली लूट और आगजनी को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया। यहाँ भी दंगाइयों ने कहीं पुलिस फोर्स का रास्ता रोक लिया तो कहीं फायर ब्रिगेड की गाड़ी दंगाग्रस्त स्थान तक नहीं पहुँचने दी। भदरसा में दूसरे दिन दमकल गाडि़याँ तो पहुँचीं मगर उनके पास पानी नहीं था। आग तो सब कुछ खाक करके बुझ गई और सरकारी कागजों में इसका श्रेय आग बुझाने वाले अमले को मिल गया। प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार दंगों पर काबू पाने में पूरी तरह विफल है। विकराल रूप धारण करती जा रही इस समस्या को सुलझाने के लिए न तो सरकार के पास कोई स्पष्ट नीति है और न ही इच्छा शक्ति। प्रदेश की वर्तमान स्थिति और सरकार के रवैये से यह संदेह भी होता है कि कहीं यह सब जान बूझकर ध्रुवीकरण की राजनीति के लिए वातावरण निर्मित करने हेतु खेले गए किसी खतरनाक खेल का हिस्सा तो नहीं है। इस संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। सपा सुप्रीमो अपने बेटे की आठ महीने की सरकार को जितने नम्बर भी दे डालें परन्तु वास्तविक्ता तो यह है कि कानून व्यवस्था के मामले में इतनी ही अवधि में किसी भी अन्य सरकार की तुलना में उत्तर प्रदेश की यह अब तक की सबसे नाकाम सरकार है। हकीकत तो यह है कि अब दक्षिण पंथी और मध्यमार्गीय कहे जाने वाले राजनैतिक दलों के एजेन्डों में अन्तर सिमटता जा रहा है अगर कुछ बचा रह गया है तो भाषा और भाषण का। प्रदेश में आज एक वास्तविक सेकुलर राजनैतिक विकल्प की जितनी आवश्यकता महसूस की जा रही है शायद पहले कभी नहीं की गई।
-मसीहुद्दीन संजरी

बुधवार, 26 दिसंबर 2012

फैजाबाद में सरकारी दंगा -2

फैजाबाद में यह परम्परा रही है कि श्रद्धालु महिलाएँ चैक स्थित मस्जिद की सीढि़यों तथा ऊपर के हिस्से में जाकर हर साल जुलूस का स्वागत फूल बरसा कर किया करती थीं परन्तु इस साल पहली बार ऐसा नहीं हुआ। यह अपने आप में संदेह पैदा करने वाली बात थी। 24 अक्तूबर को मूर्ति विसर्जन के जुलूस से पहले ही मस्जिद के गेट के सामने दस पन्द्रह वाहन पार्क कर दिए गए। आपत्ति करने पर उनमें सवार व्यक्ति झगड़े पर उतारू हो गए। जब इसकी शिकायत मौके पर मौजूद पुलिस वालों से की गई तो उन लोगों ने शिकायतकर्ता को ही अपनी जान बचा कर निकल जाने की सलाह दे डाली। बाद मंे कई अन्य जगहों से ऐसी सूचनाएँ प्राप्त हुईं कि जब जुलूस में शामिल शरारती तत्वों की संदिग्ध हरकतों की जानकारी पुलिस वालों को दी गई तो उन लोगों ने इसी तरह के सुझाव देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली। इन घटनाओं से यह अंदाजा कर पाना कठिन नहीं है कि जो कुछ आगे घटित होने वाला था उसकी यदि उन्हें पक्की जानकारी नहीं तो कम से कम आभास अवश्य था। परन्तु जब जुलूस में धार्मिक नारों के साथ-साथ ‘यूपी भी गुजरात बनेगा फैजाबाद शुरुआत करेगा‘ जैसे साम्प्रदायिक नारे भी लगने लगे थे तो पुलिस प्रशासन को तुरन्त सजग हो जाना चाहिए था। परन्तु कोई अतिरिक्त सावधानी नही बरती गई। भदरसा में दंगा फूटने से पहले ही स्थानीय थाने के एस0ओ0 धरमपाल यादव ने वहाँ के चार मुस्लिम कोटेदारों से यह कहकर केरोसिन तेल मँगवाया कि बाहर से फोर्स आई हुई है और एस.डी.एम. साहब का आदेश है कि तेल पहुँचा दें। इस जबानी निर्देश पर कोटेदारों ने तेल पहुँचा दिए। अगले दिन उसी एस.ओ. ने कोटेदारों से केरोसिन तेल कैम्प से थाने पहुँचाने को कहा। चूँकि अब तक दंगा हो चुका था इसलिए उनमें से तीन ने जाने से इंकार कर दिया। चैथा कोटेदार जाहिद जब तेल पहुँचाने के लिए वहाँ गया तो उसे दंगा करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद समाचार पत्रों में विनय कटियार के हवाले से यह खबर प्रकाशित हुई कि भदरसा के मुस्लिम कोटेदारों ने आगजनी को अंजाम देने के लिए मुसलमानों में 5-5 लीटर केरोसिन तेल बाँटे थे। इसी तरह की कई अन्य घटनाओं को झाड़ कर देखा जाए तो आसानी से इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि दंगों की योजना पहले से तैयार थी और पुलिस प्रशासन में ऐसे लोग मौजूद थे जिनको बाद में घटित होने वाली घटनाओं की पहले से ही जानकारी थी।
    फैजाबाद शहर के चैक क्षेत्र में सबसे पहले दंगा शुरू हुआ। दंगा शाम के लगभग साढ़े चार बजे से रात ग्यारह बजे तक चलता रहा। वैसे व्यावहारिक रूप से इसे दंगा कहा ही नहीं जा सकता। यह तो किसी विजयी सेना के विध्वंस अभियान जैसा था। बलबाइयों की भीड़ द्वारा चुनचुन कर मुसलमानों की दुकानें पहले लूटी गईं फिर उनमें आग लगा दी गई। पुलिस ने कभी भी दंगाइयों को रोकने का प्रयास नहीं किया। हकीकत तो यह है कि दंगाई इतने निश्चिंत थे कि लूटे हुए सामान को ठेले पर लाद कर सुरक्षित स्थान तक ले गए। दंगा भड़कने के बाद तो सामान्य जन ने अपने अपने घरों की राह ली परन्तु कुछ ऐसे लोग भी थे जिन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर दंगाइयों द्वारा लगाई गई आग को बुझाने का प्रयास किया। हालाँकि उनके पास न तो कोई यन्त्र था और न ही पानी उपलब्ध और न तो वह अपने प्रयास में सफल ही हो सके। किन्तु उन विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होनंे मानवता को शर्मसार होने से बचाने के लिए जो कुछ किया हम उस पर गर्व कर सकते हैं। उन्हीं में से दो मित्र आशीष और दीपक भी थे। लेकिन जब पुलिस वालों की नजर इन दोनों पर पड़ी तो उनकी निष्क्रियता सक्रियता में बदल गई। इन दोनों को वहाँ से खदेड़ दिया गया जबकि दंगाई अपना काम निर्बाध रूप से अंजाम देते रहे। दंगों की यह आग फैजाबाद के अन्य कस्बों और गाँवों तक भी पहुँच गई। भदरसा, भेलसर, रुदौली और शाहगंज में भी मुसलमानों के घर और दुकानों को पहचान कर पहले लूटा गया फिर आग लगा दी गई। सिर्फ भदरसा कस्बे में मुसलमानों के एक सौ तीन घर और मकान जला कर खाक कर दिए गए। इन दंगों का सबसे दुखद पहलू यह था कि फैजाबाद शहर और कस्बों के अतिरिक्त लगभग दो दर्जन गाँवों या छोटे चट्टी चैराहों पर मुसलमानों के मकानों और दुकानों को जलाए जाने की घटना की ओर बहुत कम लोगों का ध्यान जा पाया। उनकी बर्बादी का दृश्य दिल दहला देने वाला था। फतेहपुर, इस्लामाबाद, फुलवरिया, भरत कुंड और लालगाँव जैसी कई बस्तियों में जहाँ गरीब मुसलमान रहते हैं उनके घरों और छोटे कारोबारों को पूरी तरह तबाह कर दिया गया। कहानी वहाँ भी वैसी ही थी जैसी शहर और कस्बा क्षेत्रों की। इन गाँवों में भी पहले दंगाइयों ने घरों को लूटा फिर जो सामान नहीं ले जा पाए उन्हें इकट्ठा करके आग के हवाले कर दिया। खपरैल और फूस के छप्पर जलकर खाक हो गए। अब वहाँ घरों के नाम पर सिर्फ दीवारें बची थीं और कच्ची फर्श पर बिछा कर बैठने के लिए बोरिया भी नहीं था। चालीस पचास घरों की आबादी वाले फतेहपुर गाँव में मुसलमानों के कुल सोलह घर हैं। सब जलकर खाक हो गए बाकी किसी भी मकान को आँच तक नहीं आई। उनकी बर्बादी की गाथा न तो अखबारों में जगह पा सकी और न ही वहाँ कोई विधायक मंत्री पहुँचा। शायद यही कारण था कि भदरसा की तरह दंगाइयों और प्रशासन में उनके सहयोगियों ने एक दो मड़हों को जलाकर दो तरफा दंगा दिखाने का नाटक करने की भी आवश्यकता महसूस नहीं की। जब प्रशासन को लगा कि अब कुछ मानवाधिकार संगठनों का रुख गाँवों की तरफ भी हो रहा है तो वहाँ सफाई के लिए दबाव बना कर सुबूतों को मिटाने का प्रयास शुरू हो गया। इसी क्रम में फतेहपुर गाँव में लेखपाल राजेश सिंह ने कानूनगो और पुलिस वालों के साथ मिलकर कुछ घरों की जबरन सफाई भी करवा दी। फतेहपुर में लुटने और जलने वाले सभी घर मुसलमानों ही के थे इसलिए हमें उस समय बहुत आश्चर्य हुआ जब यह बताया गया कि गाँव से कई मुसलमान युवकों को दंगा करने के आरोप में पुलिस उठा कर ले गई है। हम इस बात पर हैरान थे कि आखिर पुलिस फतेहपुर के मुसलमानों की गिरफ्तारी को कैसे जायज ठहरा पाएगी। परन्तु जब रिहाई मंच की जाँच में यह बात सामने आई कि सरकारी जाँच में फुलवरिया के कुछ हिन्दू परिवारों के घरों को जला हुआ दिखाया गया है और उनको मुआवजे की रकम भी अदा की जा चुकी है तब अचानक फतेहपुर से गिरफ्तार किए गए युवकों की गुत्थी सुलझती हुई नजर आने लगी। अब ऐसी आपराधिक अनियमितताओं की खबरें कई जगहों से आ रही है। भदरसा में एक चैदह वर्षीय बालक को दंगा करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। भदरसा से ही पिछले सात महीने में दो बार फालिज के हमले के शिकार 75 वर्ष के इफ्तेख़ार को हत्या का आरोपी बनाया गया है। ज्यादा तर गिरफ्तार मुसलमानों के स्वयं अपने ही घर और कारोबार जलकर भस्म हो चुके हैं।
-मसीहुद्दीन संजरी

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

फैजाबाद में सरकारी दंगा -1



उ0प्र0की समाजवादी सरकार में होने वाले दंगों का न केवल सिलसिला ब़ता जा रहा है बल्कि उसी अनुपात में उनकी आक्रामकता, तीव्रता और विध्वंसता में भी वृद्धि होती जा रही है। साम्प्रदायिक शक्तियों के हौसले बुलंद होते जा रहे हैं। वे अपनी योजनाओं में पहले से ज्यादा सफल भी हो रहे हैं और साथसाथ अपना साम्प्रदायिक आधार भी ब़ाने में सफल होते प्रतीत होते हैं। पहले भी दंगों के पूर्वनियोजित होने, प्रशासन की निष्क्रियता और शासन की संवेदनहीनता के आरोप लगते रहे हैं। परन्तु फैजाबाद के दंगों के मामले में तो ऐसा लगता है कि दंगे पूर्वनियोजित और संगठित ही नहीं थे बल्कि प्रशासनिक एवं राजनैतिक स्तर पर भी दंगा फैलाने वालों ने तालमेल बना रखा था। दंगों से पहले और बाद की कुछ घटनाओं का विश्लेषण करने पर इसी प्रकार के तथ्य खुलकर सामने आते हैं। दंगा भड़कने का आकस्मिक कारण कुछ भी बताया जाए परन्तु यह सच है कि इसकी तैयारी काफी पहले से चल रही थी। प्रशासन का रवैया लापरवाही भरा और पक्षपातपूर्ण था। प्रदेश सरकार की भूमिका बेहद संदेहास्पद और निराशाजनक थी। बाबरी मस्जिद
विध्वंस के पश्चात भी साम्प्रदायिक दंगों की आग से बचा रहने वाला फैजाबाद फासीवादी शक्तियों के चंगुल में कैसे चला गया इसे समझने के लिए इन शक्तियों की वहाँ पहले से चल रही गतिविधियों और शासन प्रशासन की भूमिका को समझना जरूरी है।
फैजाबाद की बड़ी देवकाली मंदिर से 21 सितम्बर को मूर्तियाँ चोरी हो गईं। पहले इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ। फिर स्थानीय नेताओं ने पुलिस प्रशासन के खिलाफ अपने विरोध को मुखर बनाने के लिए ॔देवकाली मंदिर पूजा स्थापना समिति॔ का गठन किया। हालाँकि मंदिर के केयरटेकर श्रीराम पाठक का कहना है कि एक खास राजनैतिक दल के लोगों ने मंदिर प्रबन्धन पर संघर्ष समिति में शामिल होने का दबाव भी बनाया परन्तु इससे जुड़ा हुआ कोई भी व्यक्ति समिति में शामिल नहीं हुआ। क्योंकि समिति इस मामले को साम्प्रदायिक दृष्टि से देख रही थी। 13 अक्तूबर को योगी आदित्यनाथ ने फैजाबाद पहुँच कर मूर्ति चोरी का आरोप सीधे मुसलमानों पर लगाते हुए प्रशासन को यह धमकी दी कि यदि दो दिन के भीतर मूर्तियाँ बरामद नहीं की गईं तो उनके मामले को अपने हाथ में ले लेंगे। यहीं से पूरा आन्दोलन मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने के अभियान में बदल गया। स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए समाजवादी पार्टी के विधायक तेजनारायण पाण्डेय ने समिति के सदस्यों को लेकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मुलाकात की। तेजनारायण ने मुख्यमंत्री को बताया कि साम्प्रदायिक शक्तियाँ फैजाबाद की शान्ति को चुनाव के समय से ही भंग करने पर तुली हुई थीं। अब वह मूर्ति चोरी के मामले को लेकर तनाव उत्पन्न करना चाहती हैं इसलिए मूर्तियों को बरामद करने की दिशा में तेजी लाने के लिए प्रशासन को निर्देशित करें। पाण्डेय का मानना था कि भाजपा के नेता विधान सभा चुनाव में मिली पराजय को पचा नहीं पा रहे हैं और लगातार वातावरण को दूषित करने में लगे हुए हैं। इसी दौरान दशहरा से दो दिन पहले 22 अक्तूबर को चोरी की गई मूर्तियाँ कानपूर से बरामद कर ली गईं और इस आरोप में चार लोगों को गिरफ्तार भी कर लिया गया। योगी आदित्यनाथ के आरोपों के विपरीत गिरफ्तार चारों व्यक्तियों में से कोई भी मुसलमान नहीं था। परन्तु मूर्ति चोरी के नाम पर साम्प्रदायिकता का खेल खेलने पर आमादा समिति के लोगों की पोल उस समय खुल गई जब वह बरामद मूर्तियों को नकली कहकर अपने दुष्प्रचार अभियान पर अड़े रहे। अन्त में मंदिर की मूर्तियों की देखभाल करने वाले महन्त को न्यायालय में जाकर बरामद मूर्तियों की शिनाख्त करनी पड़ी।
ठीक उसी समय आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तार किए गए बेकसूर मुस्लिम युवकों की रिहाई के सम्बन्ध में प्रदेश सरकार द्वारा विभिन्न जनपदों के जिलाधीशों को लिखे गए पत्र के खिलाफ विरोध स्वरूप फैजाबाद में अधिवक्ताओं ने हड़ताल कर दी। यह हड़ताल करीब पच्चीस दिनों तक जारी रही। इस बीच पूरे जनपद से जिला मुख्यालय पर आने वालों के सामने मूर्ति चोरी और आतंकवादियों को छोड़े जाने समेत मुसलमानों के अत्याचार तथा मंदिर निर्माण जैसी बातें की जाती रहीं। इस प्रकार लगभग एक महीना तक साम्प्रदायिकता की कार्यशाला चलती रही। परन्तु प्रशासन की तरफ से उसे रोकने का कोई प्रयास नहीं किया गया। शासन या प्रशासन की ओर से जन सामान्य को यह बताने की कोशिश कभी नहीं की गई कि सरकार आतंकियों नहीं आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों को छोड़ने की बात कर रही है। एक आरोप तो यह भी है कि जिलाधीशों को लिखे गए पत्र जानबूझ कर फैजाबाद से ही लीक करवाए गए थे। एक और महत्वपूर्ण बात यह कि दशहरे से ठीक पहले ॔श्री नव दुर्गा समिति॔ की तरफ से मूर्ति विसर्जन के जुलूस में शामिल होने के लिए निमन्त्रण भेजे गए थे। निमन्त्रण पत्र में यह अपील की गई थी कि लोग भारी संख्या में भाग लें परन्तु स्ति्रयों और बच्चों को साथ न लाएँ जबकि इस प्रकार के कार्यक्रमों में बच्चों के लिए खास आकर्षण होता है। यह अभूतपूर्व था और इसके पीछे की मंशा को खँगालना आवश्यक था फिर भी प्रशासन ने कोई सुध नहीं ली। इतना सब कुछ होने के बावजूद क्या इस बात में कोई शंका रह जाती है कि दंगों की पृष्ठभूमि बहुत पहले से तैयार की जा रही थी? फिर भी कोई विशेष सुरक्षा व्यवस्था तो दूर दशहरे के दिन सुरक्षा व्यवस्था सामान्य से भी कम थी। क्या यह माना जा सकता है कि इन घटनाओं की जानकारी प्रशासन को नहीं थी? हमारा खुफिया तंत्र वह सब कुछ नहीं देख पाया जो एक सामान्य व्यक्ति आसानी से महसूस कर सकता था। सत्ताधारी दल के विधायक ने भी स्वंय सरकार के मुखिया को फैजाबाद की स्थिति से अवगत कराया था। इन परिस्थितियों का मुकाबला करने के लिए सरकार या प्रशासन ने कौन से कदम उठाए यह बताने के लिए किसी के पास कुछ नहीं है।
-मसीहुद्दीन संजरी
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