सोमवार, 24 दिसंबर 2012

फैजाबाद में सरकारी दंगा -1



उ0प्र0की समाजवादी सरकार में होने वाले दंगों का न केवल सिलसिला ब़ता जा रहा है बल्कि उसी अनुपात में उनकी आक्रामकता, तीव्रता और विध्वंसता में भी वृद्धि होती जा रही है। साम्प्रदायिक शक्तियों के हौसले बुलंद होते जा रहे हैं। वे अपनी योजनाओं में पहले से ज्यादा सफल भी हो रहे हैं और साथसाथ अपना साम्प्रदायिक आधार भी ब़ाने में सफल होते प्रतीत होते हैं। पहले भी दंगों के पूर्वनियोजित होने, प्रशासन की निष्क्रियता और शासन की संवेदनहीनता के आरोप लगते रहे हैं। परन्तु फैजाबाद के दंगों के मामले में तो ऐसा लगता है कि दंगे पूर्वनियोजित और संगठित ही नहीं थे बल्कि प्रशासनिक एवं राजनैतिक स्तर पर भी दंगा फैलाने वालों ने तालमेल बना रखा था। दंगों से पहले और बाद की कुछ घटनाओं का विश्लेषण करने पर इसी प्रकार के तथ्य खुलकर सामने आते हैं। दंगा भड़कने का आकस्मिक कारण कुछ भी बताया जाए परन्तु यह सच है कि इसकी तैयारी काफी पहले से चल रही थी। प्रशासन का रवैया लापरवाही भरा और पक्षपातपूर्ण था। प्रदेश सरकार की भूमिका बेहद संदेहास्पद और निराशाजनक थी। बाबरी मस्जिद
विध्वंस के पश्चात भी साम्प्रदायिक दंगों की आग से बचा रहने वाला फैजाबाद फासीवादी शक्तियों के चंगुल में कैसे चला गया इसे समझने के लिए इन शक्तियों की वहाँ पहले से चल रही गतिविधियों और शासन प्रशासन की भूमिका को समझना जरूरी है।
फैजाबाद की बड़ी देवकाली मंदिर से 21 सितम्बर को मूर्तियाँ चोरी हो गईं। पहले इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ। फिर स्थानीय नेताओं ने पुलिस प्रशासन के खिलाफ अपने विरोध को मुखर बनाने के लिए ॔देवकाली मंदिर पूजा स्थापना समिति॔ का गठन किया। हालाँकि मंदिर के केयरटेकर श्रीराम पाठक का कहना है कि एक खास राजनैतिक दल के लोगों ने मंदिर प्रबन्धन पर संघर्ष समिति में शामिल होने का दबाव भी बनाया परन्तु इससे जुड़ा हुआ कोई भी व्यक्ति समिति में शामिल नहीं हुआ। क्योंकि समिति इस मामले को साम्प्रदायिक दृष्टि से देख रही थी। 13 अक्तूबर को योगी आदित्यनाथ ने फैजाबाद पहुँच कर मूर्ति चोरी का आरोप सीधे मुसलमानों पर लगाते हुए प्रशासन को यह धमकी दी कि यदि दो दिन के भीतर मूर्तियाँ बरामद नहीं की गईं तो उनके मामले को अपने हाथ में ले लेंगे। यहीं से पूरा आन्दोलन मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने के अभियान में बदल गया। स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए समाजवादी पार्टी के विधायक तेजनारायण पाण्डेय ने समिति के सदस्यों को लेकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मुलाकात की। तेजनारायण ने मुख्यमंत्री को बताया कि साम्प्रदायिक शक्तियाँ फैजाबाद की शान्ति को चुनाव के समय से ही भंग करने पर तुली हुई थीं। अब वह मूर्ति चोरी के मामले को लेकर तनाव उत्पन्न करना चाहती हैं इसलिए मूर्तियों को बरामद करने की दिशा में तेजी लाने के लिए प्रशासन को निर्देशित करें। पाण्डेय का मानना था कि भाजपा के नेता विधान सभा चुनाव में मिली पराजय को पचा नहीं पा रहे हैं और लगातार वातावरण को दूषित करने में लगे हुए हैं। इसी दौरान दशहरा से दो दिन पहले 22 अक्तूबर को चोरी की गई मूर्तियाँ कानपूर से बरामद कर ली गईं और इस आरोप में चार लोगों को गिरफ्तार भी कर लिया गया। योगी आदित्यनाथ के आरोपों के विपरीत गिरफ्तार चारों व्यक्तियों में से कोई भी मुसलमान नहीं था। परन्तु मूर्ति चोरी के नाम पर साम्प्रदायिकता का खेल खेलने पर आमादा समिति के लोगों की पोल उस समय खुल गई जब वह बरामद मूर्तियों को नकली कहकर अपने दुष्प्रचार अभियान पर अड़े रहे। अन्त में मंदिर की मूर्तियों की देखभाल करने वाले महन्त को न्यायालय में जाकर बरामद मूर्तियों की शिनाख्त करनी पड़ी।
ठीक उसी समय आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तार किए गए बेकसूर मुस्लिम युवकों की रिहाई के सम्बन्ध में प्रदेश सरकार द्वारा विभिन्न जनपदों के जिलाधीशों को लिखे गए पत्र के खिलाफ विरोध स्वरूप फैजाबाद में अधिवक्ताओं ने हड़ताल कर दी। यह हड़ताल करीब पच्चीस दिनों तक जारी रही। इस बीच पूरे जनपद से जिला मुख्यालय पर आने वालों के सामने मूर्ति चोरी और आतंकवादियों को छोड़े जाने समेत मुसलमानों के अत्याचार तथा मंदिर निर्माण जैसी बातें की जाती रहीं। इस प्रकार लगभग एक महीना तक साम्प्रदायिकता की कार्यशाला चलती रही। परन्तु प्रशासन की तरफ से उसे रोकने का कोई प्रयास नहीं किया गया। शासन या प्रशासन की ओर से जन सामान्य को यह बताने की कोशिश कभी नहीं की गई कि सरकार आतंकियों नहीं आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों को छोड़ने की बात कर रही है। एक आरोप तो यह भी है कि जिलाधीशों को लिखे गए पत्र जानबूझ कर फैजाबाद से ही लीक करवाए गए थे। एक और महत्वपूर्ण बात यह कि दशहरे से ठीक पहले ॔श्री नव दुर्गा समिति॔ की तरफ से मूर्ति विसर्जन के जुलूस में शामिल होने के लिए निमन्त्रण भेजे गए थे। निमन्त्रण पत्र में यह अपील की गई थी कि लोग भारी संख्या में भाग लें परन्तु स्ति्रयों और बच्चों को साथ न लाएँ जबकि इस प्रकार के कार्यक्रमों में बच्चों के लिए खास आकर्षण होता है। यह अभूतपूर्व था और इसके पीछे की मंशा को खँगालना आवश्यक था फिर भी प्रशासन ने कोई सुध नहीं ली। इतना सब कुछ होने के बावजूद क्या इस बात में कोई शंका रह जाती है कि दंगों की पृष्ठभूमि बहुत पहले से तैयार की जा रही थी? फिर भी कोई विशेष सुरक्षा व्यवस्था तो दूर दशहरे के दिन सुरक्षा व्यवस्था सामान्य से भी कम थी। क्या यह माना जा सकता है कि इन घटनाओं की जानकारी प्रशासन को नहीं थी? हमारा खुफिया तंत्र वह सब कुछ नहीं देख पाया जो एक सामान्य व्यक्ति आसानी से महसूस कर सकता था। सत्ताधारी दल के विधायक ने भी स्वंय सरकार के मुखिया को फैजाबाद की स्थिति से अवगत कराया था। इन परिस्थितियों का मुकाबला करने के लिए सरकार या प्रशासन ने कौन से कदम उठाए यह बताने के लिए किसी के पास कुछ नहीं है।
-मसीहुद्दीन संजरी

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