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मंगलवार, 19 मार्च 2013

कोबरा पोस्ट के स्टिंग ऑपरेशन

मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल होने के आरोपों के बीच प्राइवेट सेस्टर के आईसीआईसीआई बैंक, एक्सिस बैंक और एचडीएफसी बैंक हरकत में आ गए हैं। इन्होंने अपने स्तर पर आरोपों की जांच शुरू कर दी है। आईसीआईसीआई बैंक ने जांच पूरी होने तक शुक्रवार को ही अपने 18 अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया था। एक्सिस बैंक ने भी शनिवार को 16 अधिकारियों को जांच पूरी होने तक प्रशासनिक कार्यालयों को रिपोर्ट करने को कहा है। उधर, एचडीएफसी बैंक ने इन आरोपों के बाद जांच के लिए अलग अलग समितियां गठित की हैं।
एक्सिस बैंक सूत्रों ने बताया कि बैंक ने एक आंतरिक जांच शुरू की है। जब तक जांच पूरी नहीं होतीए हमने 16 संबंधित कर्मचारियों को बैंक के प्रशासनिक कार्यालयों को रिपोर्ट करने को कहा है।

प्राइवेट सेक्टर के इन तीनों प्रमुख बैंकोंए आईसीआईसीआई बैंक, एचडीएफसी बैंक और एक्सिस बैंक पर अंदर और बाहर दोनों तरह से मनी लॉन्ड्रिंग गतिविधियों में लिप्त होने के आरोप लगे हैं। एक ऑनलाइन पोर्टल कोबरा पोस्ट ने दावा किया है कि उसके स्टिंग ऑपरेशन में मनी लॉन्ड्रिंग घोटाले का खुलासा हुआ है।

कोबरा पोस्ट के स्टिंग ऑपरेशन के तहत खुलासा होने के बाद आईसीआईसीआई बैंक ने कहा कि उसने एक उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की है जो मामले की जांच कर 2 सप्ताह में अपनी रिपोर्ट देगी। बैंक ने 18 कर्मचारियों को जांच पूरी होने तक सस्पेंड कर दिया।

कोबरा पोस्ट के स्टिंग ऑपरेशन 'ऑपरेशन रेड स्पाइडर'में दिखाया गया है कि तीनों बैंकों के कई सीनियर अधिकारी अंडरकवर रिपोर्टर से बिना किसी लिखित के भारी नकदी लेने पर सहमत हो रहे हैं और इस पैसे को दीर्घकालिक निवेश योजनाओं में लगाने की बात कर रहे हैं, ताकि इस कथित ब्लैकमनी को वाइट में बदला जा सके।
 वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने  कहा कि निजी क्षेत्र के प्रमुख बैंकों के कुछ अधिकारियों के खिलाफ मनी लांड्रिंग गतिविधियों में लिप्त होने के आरोपों पर सरकार और रिजर्व बैंक नजदीकी से नजर रखे हुये हैं।वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वित्तीय खुफिया तंत्र को वर्ष 2011.12 में संदिग्ध लेन देन के 13871 मामलों का पता चला है। अध्ययन के अनुसार यदि इस गैर कानूनी ब्लैक मनी का पता लगा लिया जाए और उस पर 30 फीसद की दर से टैक्स लगाया जाए तो उससे प्राप्त होने वाले 8.5 लाख करोड़ रुपए से देश के 626 जिलों में दो हजार बिस्तरों वाले सुपर स्पेशलिटी वाले अस्पताल खोले जा सकते हैं। अध्ययन बताते हैं कि यदि यह सारी ब्लैक मनी वापस आ जाए तो तो देश के प्रत्येक नागरिक और उद्योगों को एक साल तक टैक्स देने की जरूरत नहीं पड़ेगी।आगामी लोकसभा चुनाव में मंहगाई और भ्रष्टाचार के बाद यदि तीसरा कोई बड़ा मुद्दा है जो सत्तापक्ष के सियासी गड़ित को गड़बड़ा सकता है तो वह ब्लैक मनी का है। देश की खस्ता हाल अर्थव्यवस्था को विदेशी बैंकों में जमा यह काला धन संजीवनी देने का काम कर सकता है। देश की धन संपदा को गैर कानूनी तरीके से जोंक की तरह चूस कर विदेशी बैंकों की शोभा बढ़ाने के इस खेल में राजनेताओं से लेकर बड़े उद्योगपति शामिल हैं। रीयल एस्टेट, सोने, बुलियन और शेयर मार्केट के कारोबारियों से लेकर अनके नौकरशाहों की भी अकूत संपत्ति विदेशी बैंकों में जमा है। काले धन को वापस लाना तो दूर की बात है फिलहाल तो सरकार ऐसे लोगों के नाम भी उजागर करने का जोखिम नहीं उठाना चाहती है। इसलिए उच्चतम न्यायालय के कड़े रुख के बाद सरकार ने जो लिफाफा न्यायालय को सौंपा उसमें यह कहा गया कि नाम उजागर न किए जाएं।

निजी क्षेत्र के तीन प्रमुख बैंकों के खिलाफ मनी लांड्रिंग आरोपों के बारे में पूछे जाने पर चिदंबरम ने कहा, ष्वित्तीय सेवाओं के विभाग के सचिव इस मामले को नजदीकी से देख रहे हैं। रिजर्व बैंक भी बारीकी से इसे देख रहा है। उन्होंने ;बैंकों ने भी अपनी खुद की जांच बिठाई है। हमें उन्हें जांच रिपोर्ट तैयार करने के लिये कुछ समय देना चाहिये।
एचडीएफसी बैंक ने मामले की स्वतंत्र जांच के लिये बाहर से ऑडिट फर्म को नियुक्त किया है जबकि एक्सिस बैंक ने मामले में अपनी जांच शुरू की है।
वित्त मंत्रालय के सूत्रों से एक्सक्लूसिव जानकारी मिली है कि आयकर विभाग मनी लॉन्डरिंग के आरोपी कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रावाई कर सकता है। कर्मचारियों के खिलाफ धारा 276ए 278 के तहत मामला दर्ज हो सकता है।
कोबरपोस्ट के स्टिंग में आईसीआईसीआई बैंकए एक्सिस बैंक और एचडीएफसी बैंक के कुछ कर्मचारियों को काले धन को सफेद बनाने के तरकीबें बताते हुए दिखाया गया था।
सूत्रों के मुताबिक तीनों बैंकों के खिलाफ कार्रवाई करने को लेकर आयकर विभाग आरबीआई के साथ बातचीत कर रहा है। आरबीआई और वित्त मंत्रालय मामले की जांच कर रहे हैं। तीनों बैंकों ने भी आंतरिक जांच शुरू कर दी है।
सूत्रों का कहना है कि आरबीआई की टीम ने कोबरापोस्ट के स्टिंग ऑपरेशन में नाम आने वाले बैंकों की शाखाओं में जाकर जांच शुरू कर दी है। स्टिंग ऑपरेशन के बाद आरबीआई की तरफ से गठित 30 टीमों ने पिछले हफ्ते बैंकों के शाखाओं में जाकर अपनी जांच शुरू की है। आरबीआई की टीम ने बैंकों की शाखाओं में स्पेशल ऑडिट किया है।
सूत्रों की मानें तो आरबीआई की तरफ से स्टिंग ऑपरेशन में शामिल बैंकों पर लगे आरोप की जांच के लिए ऑडिट किया गया है। आरबीआई की टीम एक्सिस बैंकए आईसीआईसीआई बैंक और एचडीएफसी बैंक के हेड ऑफिस में भी जाने वाली है। इन बैंकों के हेड ऑफिस में सिस्टम की जांच की जाएगी। माना जा रहा है कि 2.4 हफ्तों में ऑडिट रिपोर्ट के नतीजे आ सकते हैं।
-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​

बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

दंगामुक्त भारत के निर्माण






हमारे देश में जहां एक ओर दक्षिणपंथी हिन्दुत्ववादी शक्तियों की गतिविधियों में तेजी से वृद्धि हो रही है वहीं दूसरी ओर सरकार लगभग लकवाग्रस्त है और इन शक्तियों के खिलाफ कोई निर्णायक कदम उठाने में असमर्थ प्रतीत हो रही है। ऐसी स्थिति में हम बिना किसी संदेह के यह कह सकते हैं कि भारत में साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक राजनीति का बोलबाला अभी बना रहेगा। भारत में साम्प्रदायिक ताकतों की शक्ति में दिन ब दिन वृद्धि हो रही है। गुजरात के भयावह दंगों के बाद साम्प्रदायिक हिंसा में जो कमी परिलक्षित हो रही थी वह भी अब दिखलाई नहीं देती। साम्प्रदायिक दंगे फिर से होने लगे हैं और इनका स्वरूप राष्ट्रव्यापी है। गुजरात के बाद असम में व्यापक साम्प्रदायिक हिंसा हुई और एक के बाद एक हो रहे दंगों से ऐसा लग रहा है मानो स्थिति वही हो गई है जिसे सन् 1980 के दशक में एम. जे. अकबर ने ‘दंगे के बाद दंगा‘ निरूपित किया था।
मुझे धर्मनिरपेक्ष ताकतों की प्रतिबद्धता पर तनिक भी संदेह नहीं है। साम्प्रदायिक दंगे उनकी चिंता का विषय हैं परंतु दंगा खत्म होते ही उनकी चिंता भी मानो समाप्त हो जाती है। ऐसे रवैये से काम चलने वाला नहीं है। आरएसएस के कार्यकर्ता अपने काम को मिशन बतौर करते हैं और बारहों महीने तीसों दिन पूरे जोशो खरोश से अपने काम में जुटे रहते हैं। वे समाज में साम्प्रदायिकता का जहर फैलाने में कोई कसर बाकी नहीं रखते। आरएसएस प्रचारकों की तुलना में धर्मनिरपेक्ष कार्यकर्ताओं की संख्या न केवल बहुत कम है वरन् उनमें वह उत्साह और निष्ठा भी नहीं है, जो इतनी बड़ी लड़ाई के लिए जरूरी है।
जहां तक सरकारों का सवाल है- चाहे वे कांग्रेस की हों, मायावती की या मुलायम सिंह की- उनके बारे में कुछ कहना बेकार है। हां, वामपंथी सरकारांे और पहले लालू प्रसाद यादव और अब नीतीश कुमार ने कुछ हद तक साम्प्रदायिकता के दानव से निपटने में सफलता हासिल की है। भले ही लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार अपनी राजनैतिक मजबूरियों के चलते, साम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ रहे हैं परंतु वे इस मोर्चे पर पूरी निष्ठा से डटे हुए हैं और उन्हें सफलता भी प्राप्त हुई है। दोनों के बीच मुसलमानों के वोट हासिल करने की कड़ी होड़ है। जिस तरह बिहार और पश्चिम बंगाल लंबे समय तक दंगा-मुक्त रह सके हैं, उससे यह साफ है कि अगर सरकार चाहे तो दंगे नहीं होंगे।
यद्यपि विचारधारा की दृष्टि से कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष है तथापि उसकी नीतियांे में हमेशा से एक दोगलापन रहा है और कांग्रेस-शासित राज्यों में साम्प्रदायिक हिंसा पर पूरी तरह रोक लग सके, इसके लिए कांग्रेस सरकारों ने कभी गंभीरता से प्रयास नहीं किए। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में भी कांग्रेस का रवैया काफी ढ़ुलमुल था। कांगे्रस ने बाबरी मस्जिद को ढह जाने दिया और देश को साम्प्रदायिक हिंसा के दावानल में झोंक दिया।
हमारे देश के अधिकांश राजनेता साम्प्रदायिक और जातिगत विभाजक रेखाओं को बनाए रखने और उन्हें और गहरा करने में रूचि रखते हैं क्योंकि इससे उन्हें वोट मिलने की उम्मीद होती है। जैसे-जैसे आर्थिक समस्याएं बढ़ती जाएंगी और महंगाई डायन का मुंह बड़ा, और बड़ा होता जाएगा वैसे-वैसे हमारे राजनीतिज्ञों के लिए पहचान की राजनीति की उपयोगिता बढ़ती जाएगी क्योंकि पहचान की राजनीति के जरिए भावनाएं भड़काकर वे जनता का ध्यान आर्थिक समस्याएं  सुलझाने में उनकी विफलता से हटा सकेंगे।
इस पृष्ठभूमि में साम्प्रदायिकता की समस्या का क्या हल हो सकता है? इसका कोई आसान हल नहीं है और न ही इसे रातों-रात सुलझाया जा सकता है। एक महत्वपूर्ण मुद्दा यह भी है कि इस समस्या के सुलझाव की किसी भी कोशिश में राजनीतिज्ञों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। प्रजातंत्र में हम राजनीतिज्ञों को दरकिनार नहीं कर सकते चाहे वे कितने ही अच्छे हों या कितने ही बुरे। प्रजातंत्र का कम से कम एक लाभ तो यह है कि सब नहीं तो कुछ राजनेता अल्पसंख्यकांे के वोटों के लालच में साम्प्रदायिकता के खिलाफ अभियान में भागीदारी करने के लिए तैयार हो सकते हैं। गहन सोच विचार के पश्चात मंैने साम्प्रदायिकता की समस्या के स्थायी हल के लिए एक पांच सूत्रीय फार्मूला तैयार किया है। जाहिर है कि यह फार्मूला कोई जादू की छड़ी नहीं है और इससे अपेक्षित परिणाम तभी प्राप्त होंगे जब हम इस पर लंबे समय तक पूरी निष्ठा से अमल करेंगे।
इस फार्मूले का पहला बिन्दु है सभी स्कूली कक्षाआंे के पाठ्यक्रम में आमूलचूल परिवर्तन-विशेषकर उस हिस्से में जिसका संबंध मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास, स्वाधीनता संग्राम व देश के विभाजन से है। यह खेदजनक है कि आजादी के 65 साल बाद भी मध्यकालीन इतिहास को देखने-समझने के हमारे नजरिये में तनिक भी परिवर्तन नहीं आया है। हम आज भी मध्यकालीन इतिहास का घोर सरलीकरण कर रहे हैं और इसका ही नतीजा है कि मंदिर-मस्जिद जैसे व्यर्थ के विवादों को सुलझाने में हमारे देश की ऊर्जा खर्च हो रही है।
इतिहास की इसी तोड़ी-मरोड़ी गई समझ के कारण रामजन्मभूमि आंदोलन को अभूतपूर्व सफलता मिली थी। हमारा मध्यकालीन इतिहास कहता है कि महमूद गजनी और औरंगजेब ने सैकड़ों मंदिर ढहाए। परंतु वह हमारी सांझी संस्कृति की चर्चा नहीं करता। वह उन सूफी संतों, लेखकों, कवियों और संगीतकारों के बारे में कुछ नहीं बताता जिन्होंने दोनों समुदायों के बीच संवाद के सेतु निर्मित करने में अहम भूमिका निभाई। बाबा फरीद, मोइनुद्दीन चिश्ती, मियां मीर, निजामउद्दीन औलिया, मिर्जा जानेजांना, दाराशिकोह और अन्य अनेक संगीतकारांे, वास्तुविदों, कवियों आदि की हमारा इतिहास चर्चा ही नहीं करता, जो दोनों समुदायांे को नजदीक लाए और जिनके प्रयासों से ढेर सारी विविधताओं के बावजूद, भारत एक राष्ट्र बन सका। इतिहास के विद्यार्थी इन लोगों के नाम तक नहीं जानते। यदि हमारी पाठ्यपुस्तकों में भारत की सांझा संस्कृति और उसे मजबूत करने वाली शक्तियों व व्यक्तित्वों के बारे में कम से कम एक अध्याय  शामिल हो तो इससे बहुत लाभ होगा। हमारे विद्यार्थियों को यह अहसास होगा कि हमारी सांझा संस्कृति कितनी समृद्ध है। उन्हें यह पता चलेगा कि दोनों समुदायों के बौद्धिक व धार्मिक नेता और कलाकार न केवल एक दूसरे के नजदीक थे वरन् उन्होंने हमारी मिलीजुली संस्कृति को धार्मिक, बौद्धिक व आध्यात्मिक दृष्टि से कितना समृद्ध किया था।
दाराशिकोह ने एक पुस्तक लिखी थी जिसका शीर्षक था ‘मजमा अल बहराईन‘ (दो महासागरों का मिलन)। इस पुस्तक में उन्होंने सफलतापूर्वक यह साबित किया था कि हिन्दू धर्म और इस्लाम के बीच कोई शत्रुता या वैमनस्य नहीं है बल्कि ये दोनों धर्म एक दूसरे के नजदीक हैं। इस तरह का साहित्य आज भी दोनों समुदायों के सदस्यों को एक-दूसरे के नजदीक लाने में मददगार सिद्ध हो सकता है। यह तथ्य कि हमारे पाठ्यक्रमों में इस तरह के व्यक्त्तिवों और साहित्य को कोई महत्व नहीं दिया गया है स्पष्ट दर्शाता है कि हमारी रूचि एकता में कम है विभाजन और वैमनस्यता में ज्यादा। हमें राजनीतिज्ञों पर दबाव डालना चाहिए कि हमारे इतिहास के इस पक्ष को न केवल पाठ्यपुस्तकों में आवश्यक रूप से शामिल किया जाए वरन् उसे पर्याप्त महत्व भी दिया जाए।
इसी तरह, आधुनिक इतिहास व स्वाधीनता संग्राम का भी हमारी पाठ्यपुस्तकों में अत्यंत पूर्वाग्रहपूर्ण विवरण है। स्वाधीनता संग्राम में अल्पसंख्यक समुदाय की भूमिका को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है। मौलाना महमूदउल हसन, मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना उबेदुल्ला सिन्धी, मौलाना हिफ्जउर्रहमान जैसी शख्सियतों की चर्चा भी नहीं है जिन्होंने स्वाधीनता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और जिन्हें अंग्रेज शासकों ने माल्टा, अंडमान निकोबार आदि में निर्वासित किया। इन्हींे में से कुछ ने ‘रेशमी रूमाल षड़यंत्र‘ में भाग लिया था जिसका उद्धेश्य स्वतंत्रता के संदेश को देशभर में पहुंचाना था और जिसकी उन्हें भारी कीमत अदा करनी पड़ी थी।
हमारी पाठ्पुस्तकों से यह भान भी होता है कि कुछ अपवादों को छोड़कर, सभी मुसलमान पाकिस्तान के पक्षधर थे जबकि सच इसके ठीक उलट है। अधिकांश मुसलमान देश के बंटवारे के खिलाफ थे और चाहते थे कि भारत एक बना रहे। आज भी मुसलमानों को देश के विभाजन के लिए दोषी ठहराया जाता है और दंगे भड़काने के लिए इस मुद्दे का इस्तेमाल होता है। यह राष्ट्रहित में होगा कि हम स्वाधीनता संग्राम और उसमें मुसलमानों की हिस्सेदारी की सही तस्वीर से हमारी नई पीढ़ी को परिचित करवाएं।
2. इस सिलसिले में दूसरा महत्वपूर्ण बिन्दु है नैतिक शिक्षा। आज हमारी शिक्षा व्यवस्था का पूरा फोकस केवल और केवल कैरियर बनाने पर है। चरित्र निर्माण के लिए इसमें कोई जगह नहीं है। हमारी शिक्षा व्यवस्था विद्यार्थियों को ज्ञान और सूचना तो देती है परंतु नैतिक मूल्य नहीं। विद्यार्थियों को सच्चरित्र बनाना हमारी शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकताओं में कहीं नहीं है। मैं इसके कारणों पर यहां चर्चा नहीं करना चाहता परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि यह हमारे देश के लिए एक बहुत बड़ी त्रासदी है। इसके अतिरिक्त, हमारी शिक्षा प्रणाली जो बताया जा रहा है उसपर आंख मूंदकर विश्वास करना सिखाती है। हमारे विद्यार्थी सोचते नहीं हैं, केवल रटते हैं। उनके लिए शिक्षा केवल वह माध्यम है जिसके जरिये वे ऊँचे वेतन वाली नौकरियां हासिल कर भौतिक सुख-सुविधााओं से पूर्ण जीवन बिता सकें। हमारी शिक्षा व्यवस्था अल्पसंख्यकों, दलितों व आदिवासियों के प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त मस्तिष्कों का उत्पादन कर रही है। स्कूल या कालेज से निकलने वाले हमारे विद्यार्थियों का दिलोदिमाग स्वस्थ व संतुलित नहीं होता। यदि हम अपनी शिक्षा प्रणाली मेें मूलभूत परिवर्तन ला सकें तो यह राष्ट्र हित में होगा। हमें ऐसे विद्यार्थी तैयार करने होंगे जिनके मन में विविधता के प्रति सम्मान हो और गरीब व कमजोरों के प्रति सहानुभूति व प्रेम। आज की शिक्षा व्यवस्था समस्या का भाग है। हमें उसे समाधान का हिस्सा बनाना होगा।
3. पुलिस व्यवस्था में सुधारः चूंकि हमारी पुलिस भी हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था की देन है अतः पुलिसकर्मी भी कई तरह के पूर्वाग्रहों से ग्रस्त रहते हैं। वे अल्पसंख्यकों और समाज के अन्य कमजोर तबकों को जन्मजात अपराधी मानते हैं। हम तब तक देश में साम्प्रदायिक हिंसा का अंत नहीं कर सकते जब तक कि पुलिस व्यवस्था में व्यापक सुधार न हों। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दंगों को रोकने में पुलिस की अहम भूमिका होती है और पुलिस के सहयोग के बगैर दंगों के दोषियों को सजा दिलवाना असंभव है। हमारी पुलिस गहरे तक पूर्वाग्रहग्रस्त है। क्या हम लगभग हर दंगे के बाद यह नहीं सुनते कि पुलिस ने दंगो को रोकने की बजाए उन्हें और भड़काया?
मैंने सन् 1961 के जबलपुर दंगों से लेकर 2002 के गुजरात दंगों तक हर बड़े दंगे का गहन अध्ययन किया है। मैंने पुलिसकर्मियों के लिए 150 से अधिक शांति व सद्भाव कार्यशालाओं का संचालन भी किया है। मेरा यह अनुभव है कि शिक्षा व्यवस्था की तरह, पुलिस व्यवस्था भी समाधान नहीं बल्कि समस्या का हिस्सा है। उत्तरप्रदेश काॅडर के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी विभूति नारायण राय, जो वर्तमान में महात्मा गांधी हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति हैं, ने ‘साम्प्रदायिक दंगों मंे पुलिस की भूमिका‘ विषय पर उन दिनों शोध किया था जब वे राष्ट्रीय पुलिस अकादमी, हैदराबाद के निदेशक थे। उनके शोध का नतीजा यह था कि पुलिस का घोर साम्प्रदायिकीकरण हो चुका है। उन्होंने इलाहबाद के दंगों पर हिन्दी में एक उपन्यास भी लिखा है जिसका शीर्षक है ‘शहर में कफ्र्यू‘। इस उपन्यास में उन्होंने इलाहबाद में दंगों के दौरान पुलिस की भूमिका का चित्रण किया है और यह बताया है कि किस तरह पुलिस, हिन्दू समुदाय का साथ देती है।
मेरा प्रस्ताव है कि पुलिसकर्मियों के भर्ती-पूर्व प्रशिक्षण में उन्हें धर्मनिरपेक्ष मूल्यों से परिचित कराया जाना चाहिए। जो पुलिसकर्मी सेवारत हैं उनके लिए रिफे्रशर कोर्स चलाए जा सकते हैं। मेरा अनुभव है कि इस तरह की कार्यशालाओं और पाठ्यक्रमों का पुलिसकर्मियों की मानसिकता पर गहरा असर पड़ता है। मैंने राष्ट्रीय पुलिस अकादमी और कई राज्यों की पुलिस अकादमियों में व्याख्यान दिए हैं और उनका चमत्कारिक परिणाम देखा है। अगर यह काम नियमित और आवश्यक रूप से किया जाएगा तो इसके बहुत अच्छे नतीजे निकलेंगे। हाल में महाराष्ट्र के धुले में दंगों के दौरान पुलिस ने, छःह मुस्लिम युवकों को  सीने व गर्दन पर गोली चलाकर मार डाला। यह पुलिस मैन्युअल का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन था। परंतु सरकार ने संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की। उन्हें निलंबित तक नहीं किया गया।
4. साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक का अधिनियमन: अगर यह विधेयक कानून बन जाता है तो इससे साम्प्रदायिक हिंसा रोकने में बहुत मदद मिलेगी क्योंकि यह कानून साम्प्रदायिक हिंसा के लिए अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करता है। इस बिल को  धर्मनिरपेक्ष कार्यकर्ताओं ने बहुत सावधानी से तैयार कर श्रीमती सोनिया गांधी को सौंपा था। बिल पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया जानने के लिए सरकार ने राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक बुलाई। इस बैठक में अरूण जेटली और सुषमा स्वराज सहित अन्य भाजपा नेताओं ने विधेयक पर इतना तीखा हल्ला बोला कि सरकार घबरा गई और उसने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। इस बिल को तुरंत पुनर्जीवित किया जाना चाहिए और अगर जरूरी हो, तो कुछ संशोधनों के साथ, संसद से पारित करवाया जाना चाहिए। अगर इसके साथ-साथ पांचवे पुलिस आयोग की रपट को भी लागू कर दिया जाए तो साम्प्रदायिक दंगों की समस्या से निपटने में हमें काफी हद तक कामयाबी मिल सकती है। इस बिल में साम्प्रदायिक हिंसा के शिकार लोगों के लिए मुआवजे व नुकसान की भरपाई की व्यवस्था भी है।
5. मिश्रित व कास्मोपालिटन रहवास: हर दंगे के बाद, हिन्दू और मुसलमान, मिश्रित आबादी वाले क्षेत्रों को छोड़कर अपने-अपने मोहल्लों में रहने चले जाते हैं। यह प्रवृत्ति समाज के एकीकरण में बड़ी बाधा है। जिस शहर में अलग-अलग धर्मों के लोग अलग-अलग मोहल्लों में रहते हैं वहां साम्प्रदायिक दुष्प्रचार और अफवाहें फैलाना आसान हो जाता है। सरकार को किसी भी ऐसी गृह निर्माण समिति को पंजीकृत नहीं करना चाहिए जिसमें हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी, जैन व बौद्ध सदस्य न हों। हमारे देश में धर्म और जाति पर आधारित गृह निर्माण समितियां बहुत आम हैं। इसके विपरीत, सिंगापुर में ऐसा कानून है कि किसी गृह निर्माण समिति या एपार्टमेंट ब्लाक को सरकार तब तक आवश्यक अनुमति नहीं देती जब तक उसमें सभी धार्मिक व नस्लीय समूहों का प्रतिनिधित्व न हो।
ये वे पांच सुझाव है ंजो अगर स्वीकार कर लिए जाते हैं तो हमारे समाज में शांति व साम्प्रदायिक सद्भाव की स्थापना में काफी मदद मिलेगी। मैं जानता हूं कि सरकारों को इन सुझावों पर अमल करने के लिए राजी करना बहुत आसान नहीं है क्योंकि इन पर अमल से निहित स्वार्थों को चोट पहुंचेगी, विशेषकर राजनैतिक स्वार्थों को। आज हमारे देश में चुनाव लोगों को विभाजित करके जीते जाते हैं उन्हें एक करके नहीं। पहचान के मुद्दे की चुनावों में उन मसलों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका रहती है जिनका संबंध लोगों की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति से है। फिर भी, मैं कम से यह अपेक्षा तो कर ही सकता हूं कि इन मुद्दों पर चर्चा और बहस होगी।
 -डा. असगर अली इंजीनियर

रविवार, 6 जनवरी 2013

इतिहास के पन्नो से निकलते सबक .......

महान राष्ट्रवादी विपिनचंद्र पाल ने कहा था कि --- ' देश को नया रिफार्म यानी सुधार नही चाहिए अपितु री--- फ़ार्म यानी पुनर्गठन चाहिए | आज इस राष्ट्र को ऐसे ही पुनर्गठन की आवश्यकता है | इंग्लैंड को भारतीय सरकार की नीति -- निर्माण का अधिकार छोड़ देना चाहिए | '

देश के इतिहास में , 1905 में अंग्रेज वायसराय लार्ड कर्जन द्वारा किये गये बंगाल के विभाजन के बाद खड़े हुए राष्ट्रीय आन्दोलन को राष्ट्रीयता के पहले उभार के रूप में देखा जा सकता है | इसका यह मतलब नही है कि इससे पहले ब्रिटिश साम्राज्य विरोधी आन्दोलनों का कोई राष्ट्रीय चरित्र नही था | एकदम था | लेकिन वह राष्ट्रीयता पुराने या मध्ययुगों  के मूल्यों मान्यताओं पर आधारित थी | उदाहरण -- 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम देश में विद्यमान सामन्ती मूल्यों मान्यताओं के साथ ब्रिटिश दासता को जड़ मूल से खत्म कर देने का स्वतंत्रता संग्राम था | हालाकि यह बात भी एकदम सच है कि बीसवी शताब्दी में शुरू हुए आधुनिक युग के राष्ट्रीय आंदोलनों , 19 वी शताब्दी के उन्ही आन्दोलनों व संघर्षो की पृष्ठ्भूमिया आधार पर ही पनपे तथा आगे बढे |

1905 में ब्रिटिश विरोधी आन्दोलन के इस महान राष्ट्रवादी उभार ने न केवल देशवासियों में आधुनिक राष्ट्रवाद की भावना का रक्त संचार कर दिया , अपितु देशवासियों के भीतर ब्रिटिश राज के हिमायतियो और विरोधियो के बीच अन्तरभेद व विरोध को भी तेज कर दिया | यहाँ तक कि बंग -- भंग के विरोध की अगुवाई कर रही कांग्रेस पार्टी में भी आन्दोलन के प्रमुख मुद्दों और उसके उद्देश्य को लेकर ऐतिहासिक विभाजन हो गया | वह आज कल की राजनितिक पार्टियों के भीतर चल रहे सत्ता -- स्वार्थी विभाजन जैसा नही था , बल्कि वह राष्ट्रवादी आन्दोलनों  के प्रमुख मुद्दों को लेकर उसकी दिशा या लक्ष्य के सवाल पर हुआ था |जहा बालगंगाधर तिलक , विपिनचंद्र पाल तथा लाला लाजपत राय जैसे गरम दलीय कांग्रेसी नेताओं के प्रमुख मुद्दों में बंगाल विभाजन के साथ विदेशी मालो का बहिष्कार करने , स्वदेशी मालो को अंगीकार करने तथा राष्ट्रीय शिक्षा लेने और स्वराज पाने पर जोर था | वही गोपाल कृष्ण गोखले तथा मदन मोहन मालवीय जैसे नरम दलीय नेताओं का बंगाल विभाजन के विरोध के स्वदेशी को अपनाने पर ही प्रमुख जोर था | जहा गरम दलीय कांग्रेस का प्रमुख लक्ष्य स्वराज था वही नरम- दल का प्रमुख लक्ष्य ब्रिटिश हुकूमत के भीतर हिन्दुस्तानियों के लिए ज्यादा अधिकार पद -- प्रतिष्ठा को प्राप्त करना था |

यहाँ हम इतिहास के पन्नो से गरम दलीय नेताओं के -- खासकर बाल -- पाल -- लाल के महत्वपूर्ण कथन यहाँ उद्घृत कर रहे है | ये उद्धरण हमने बी . एल . ग्रोवर तथा यशपाल की पुस्तक '' आधुनिक भारत का इतिहास '' से लिया है ----

बाल गंगाधर तिलक का यह कथन तो सर्वविदित है कि -- ' स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे | ' कोई भी समझ सकता है कि तिलक का प्रमुख लक्ष्य स्वराज था | उन्होंने अपने इसी ऐतिहासिक कथन के साथ यह भी कहा था कि -- '' स्वराज व स्वशासन , स्वधर्म के लिए आवश्यक है | स्वराज के बिना कोई सामाजिक सुधार नही हो सकता , न ही कोई औद्यगिक प्रगति या कोई उपयोगी शिक्षा ही हो सकती है और न ही राष्ट्रीय जीवन की  परिपूर्णता खड़ी हो सकती है |

विपिनचंद्र पाल ने कहा था कि -- '' देश को नया रिफार्म यानी सुधार नही चाहिए अपितु री- फ़ार्म यानी पुनर्गठन चाहिए | आज इस राष्ट्र को ऐसे ही पुनर्गठन की आवश्यकता है | इंग्लैण्ड को भारतीय सरकार की नीति -- निर्माण का अधिकार छोड़ देना चाहिए और एक विदेशी सरकार को जो कानून चाहे , वह बना सकने का अथवा अपनी इच्छा से शासन करने के अधिकार को त्याग देना चाहिए | उन्हें अपनी इच्छा से कर लगाने और अपनी इच्छा से धन को व्यय करने के अधिकार को भी छोड़ना होगा | ....

लाला लाजपत राय ने कहा कि -- '' जैसे दास की कोई आत्मा ( अर्थात स्वविवेक नही रह जाता ) उसी तरह से दास जाति ( अर्थात राष्ट्र की ) कोई आत्मा नही रह जाती | फिर इस आत्मा के बिना मनुष्य पशु के समान है | इसलिए इस आत्मा को जागृत करने के लिए स्वराज परम आवश्यक है और सुधार तथा उत्तम राज्य इसके विकल्प नही हो सकते | ...............

इनके अलावा राष्ट्रवादी क्रांतिकारी दर्शन व व्यवहार के प्रति समर्पित रहे महान राष्ट्रवादी  व दार्शनिक श्री अरविन्द घोष का कहना था कि -- '' राजनितिक स्वतंत्रता राष्ट्र के जीवन का श्वास है | बिना राजनितिक स्वतंत्रता के सामाजिक तथा शैक्षणिक सुधार , औद्योगिक प्रसार , राष्ट्र की नैतिक उन्नति इत्यादि की बात सोचना मुर्खता की चरम सीमा है | '

स्पष्ट है कि इन सभी राष्ट्रवादियो के लिए स्वराज का अर्थ विदेशी नियंत्रण से मुक्त स्वतंत्रता का था , जिसमे अपने राष्ट्र की नीतियों तथा प्रबन्धन में स्वराज की अवधारणा रखते हुए ब्रिटेन के साथ इस देश को लूट -- पाट के बनते -- बढ़ते रहे आर्थिक सम्बंधो को समाप्त करने की बात नही कही गयी थी | लेकिन उन्होंने उस राष्ट्रीय आन्दोलन में विदेशी मालो के बहिष्कार तथा स्वदेशी को अंगीकार करने के नारे व कार्यक्रम को तथा राष्ट्रीय शिक्षा को प्रमुख मुद्दा बनाकर यह स्पष्ट कर दिया था कि वे राष्ट्र के आर्थिक , शैक्षणिक व सांस्कृतिक जीवन में विदेशी मालो . सामानों और विदेशी शिक्षा पर निर्भरता नही बल्कि राष्ट्र का आत्मनिर्भरतापूर्ण स्वराज चाहते है |
सवाल है कि राष्ट्रवादियो और भगत सिंह जैसे क्रान्तिकारियो के ब्रिटिश साम्राज्यवाद से स्वराज और फिर पूर्ण राष्ट्र्मुक्ति के उद्देश्यों व क्रियाकलापों को आज सुनने , जानने की कोई आवश्यकता है या नही ? अगर उसकी आवश्यकता है तो किसे है ? यानी समाज के किस हिस्से को है ? इस राष्ट्र के धनाढ्य एवं उच्च हिस्से को ? या विभिन्न पेशो , स्तरों में बटे जनसाधारण समाज को ? नि:सन्देह देश का धनाढ्य उच्च राजनितिक एवं गैर राजनितिक हिस्सा यह काम नही कर सकता | कयोंकि यही वह हिस्सा है जो 1947 के बाद से ब्रिटेन , अमेरिका जैसे लुटेरे साम्राज्यी देशो के साथ संबंधो को बढाते हुए तथा उनसे पूंजी व तकनीक आदि से अधिकाधिक सहयोग -- सहायता लेते हुए उनकी हिदायतों व सलाहों , शर्तो , नीतियों को मानता और लागू करता रहा है | फिर पिछले बीस सालो से वह अन्तराष्ट्रीय वैश्वीकरणवादी नीतियों को डंकल प्रस्ताव आदि को राष्ट्रीय नीतियों व कानूनों के रूप में लागू करते हुए राष्ट्र में विदेशियों को बेलगाम एवं अधिकार पूर्वक आगमन का भरपूर सहयोग व समर्थन करता रहा है | उन्हें देश के धनाढ्य व उच्च हिस्सों के साथ अधिकाधिक अधिकार सम्पन्न बनाता रहा है | लेकिन इसी के साथ इस पूरे दौर में जनसाधारण को अधिकाधिक साधनहीन अधिकारहीन भी बनाता रहा है |
इसलिए यह बात निश्चित हो चुकी है कि राष्ट्र के धनाढ्य एवं उच्च हिस्से का अब राष्ट्र -- हित व जन -- हित की नीतियों को बनाने व लागू करने का काम नही कर सकते | उन्हें अब उसकी कोई आवश्यकता नही रह गयी है | वे महज देश व विदेश के धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों के हितो -- स्वार्थो की अधिकाधिक पूर्ति वाली नीतियों , कानूनों को लागू करने और संचालित करने का ही काम कर सकते है | उन्हें उसी को आगे बढाने वाले '' रिफार्म '' यानी '' सुधार ''  चाहिए |
लेकिन इन नीतियों सुधारों के कुपरिणामो को जीवन में संकट के रूप में भोगते जा रहे जनसाधारण को आज ऐसे जनविरोधी रिफार्म यानी सुधार की नही बल्कि राज और समाज का जनहित में री -- फ़ार्म यानी पुनर्गठन चाहिए | विदेशी लूट को लगातार बढाने वाली अन्तराष्ट्रीय या विदेशी नीति नही बल्कि राष्ट्रीय जीवन और जनजीवन के हित की राष्ट्रवादी जनवादी नीति व कानून चाहिए | राष्ट्र -- हित एवं जनहित का पूरा अधिकार चाहिए | उसे लागू करने वाली स्वराज व जनराज की व्यवस्था चाहिए | विदेशी लूट को लगातार बढाने वाली विदेशी सम्बन्ध नही चाहिए बल्कि ऐसे सम्बन्ध से राष्ट्र को मुक्ति चाहिए मुक्त राष्ट्र के साथ नए राष्ट्रिय व अन्तराष्ट्रीय सम्बन्ध चाहिए | वस्तुत: इसी लक्ष्य को लेकर हम इतिहास के पन्नो को पलट भी रहे है और उन्हें आपको सूना भी रहे है |

हमे अपने राष्ट्र के लिए एक नया  मुक्ति पथ खोलना होगा |

 -सुनील दत्ता
पत्रकार

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

बाबरी कांड के बीस साल

इस साल 6 दिसम्बर को बाबरी मस्जिद ठहाए जाने की 20वीं बरसी थी। बाबरी मस्जिद को जमींदोज किए जाने के पहले और उसके बाद, देशभर में भयावह साम्प्रदायिक हिंसा हुई थी। केवल मुंबई में एक हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे। यहां यह स्मरणीय है कि घोषणा यह की गई थी कि कारसेवा पूर्णतः शांतिपूर्ण होगी। अटलबिहारी वाजपेयी के कद के नेता ने साफ शब्दों में कहा था कि 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में होने वाली कारसेवा में केवल भजन गाए जाएंगे और इसलिए भाजपा को कारसेवा करने की अनुमति दी जानी चाहिए। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन भाजापाई मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने भी ऐसा ही आश्वासन दिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. व्ही. नरसिम्हाराव ने वाजपेयी के आश्वासन को गंभीरता से ले लिया और कारसेवा की अनुमति दे दी।
उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने हजारों बल्कि लाखों कारसेवकों को अयोध्या में प्रवेश करने दिया। न तो कल्याण सिंह और न ही भाजपा के केन्द्रीय नेताओं ने इस भारी भीड़ पर नियंत्रण बनाए रखने की कोई कोशिश की।
और जब उच्चतम न्यायालय ने कल्याण सिंह को भीड़ पर नियंत्रण करने में असफल रहने का दोषी ठहराया और उन्हें एक दिन की सजा सुनाई तब उन्होंने कहा कि उन्हें एक महान लक्ष्य की खातिर जेल जाने पर गर्व है। सच यह है कि भीड़ पर नियंत्रण रखने की कोशिश करना तो दूर, एल. के. आडवानी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती और कई अन्य नेताओं ने उत्तेजक भाषण देकर भीड़ को भड़काया। बल्कि, ये सभी लोग बाबरी मस्जिद को गिराने का लक्ष्य लेकर ही अयोध्या पहुचे थे। यह है साम्प्रदायिक ताकतों का असली चरित्र और चेहरा। वे अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए झूठ बोलने में जरा भी संकोच नहीं करते और उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके कारण कितने लोगों को अपनी जानें गंवानी पड़ेंगी और कितनों की जीवन भर की कमाई स्वाहा हो जाएगी।
सच यह है कि बाबरी मस्जिद को संघ परिवार ने एक सोची समझी, सुनियोजित साजिश के तहत हाया था। कुछ जानकारों का यह भी कहना है कि यद्यपि वाजपेयी इस षड़यंत्र का हिस्सा नहीं थे तथापि उन्हें निश्चित तौर पर यह जानकारी थी कि मस्जिद हा दी जाएगी। माहौल को देखते हुए उन्होंने मस्जिद को बचाने की कोई कोशिश भी नहीं की।
हिन्दी मीडिया एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह संघ परिवार का साथ दे रहा था। वह भी चाहता था कि मस्जिद हा दी जाए। हिन्दी समाचारपत्रों में बाबरी मस्जिद को ॔विवादस्पद ांचा॔ कहा जाता था। हिन्दी अखबारों में जिस तरह के लेख और समाचार छपते थे, उनसे ऐसा लगता था कि बाबरी, मस्जिद नहीं बल्कि राम मंदिर है। उत्तर भारत में (यद्यपि दक्षिण में नहीं) मस्जिद को गिराने का जुनून हावी था और मस्जिद हा दिए जाने के बाद उत्तर भारत के कई शहरों में जश्न हुए। कानपुर के एक धर्मनिरपेक्ष कार्यकर्ता के अनुसार उत्तर प्रदेश के कई शहरों में इतने पटाखे चलाए गए कि ऐसा लगने लगा मानो उस दिन दीपावली हो। जानेमाने पत्रकार प्रफुल्ल बिडवई उस दिन मसूरी की लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी में थे। उन्होंने लिखा कि वहां प्रिशक्षण प्राप्त कर रहे आईएएस, आईपीएस व आईआरएस अधिकारियों ने भी जमकर जश्न मनाया।
संघ परिवार ने इस मुद्दे पर हिन्दुओं और मुसलमानों का इस हद तक धु्रवीकरण कर दिया था, जितना कि शायद विभाजन के समय था। अपने शक्तिशाली प्रचार तंत्र के जरिए संघ परिवार ने ऐसा माहौल पैदा कर दिया था कि आम हिन्दुओं को यह महसूस होने लगा था कि बाबरी मस्जिद का बना रहना उनके लिए घोर शर्मिंदगी की बात है और यह भी कि बाबरी मस्जिद हिन्दुओं की मुगल बादशाहों की गुलामी का प्रतीक है। संघ परिवार के लिए बाबरी मस्जिद को गिराना, सत्ता में आने की आवश्यक शर्त थी। जहां तक मेरी जानकारी है, दुनिया में शायद ही किसी राजनैतिक दल ने एक ऐतिहासिक इमारत को हाने को अपने एजेन्डे का हिस्सा मनाया होगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ मुस्लिम नेताओं ने भी भावनाएं भड़काईं और हालात को और गंभीर बनाया। मुस्लिम नेताओं ने सकारात्मक बातचीतजिसके लिए कुछ नरमपंथी हिन्दू तैयार थेके जरिए संकट को टालने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की।
उत्तेजना के उस दौर में जिन चन्द लोगों ने अपना संतुलन बनाए रखा और तल्खी से परहेज रखा उनमें शामिल थे वामपंथी व जेएनयू के कुछ जानेमाने धर्मनिरपेक्ष इतिहासविद जैसे प्रोफेसर रोमिला थापर, प्रो. सतीशचन्द्र, प्रो. विपिनचन्द्र, प्रो. हरबंस मुलखिया, प्रो. इरफान हबीब व कुछ अन्य। इन सबने मिलकर एक पैम्फलैट निकाला था जिसमें ठोस ऐतिहासिक सुबूतों व तथ्यों के आधार पर यह सिद्ध किया गया था कि संघ परिवार के इस दावे में जरा सी भी सच्चाई नहीं है कि बाबरी मस्जिद का निर्माण, राम मंदिर को गिराकर किया गया था। इतिहास में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त एक आईएएस अधिकारी शेरसिंह ने एक किताब लिखकर यह दावा किया था कि राम के युग में उस स्थान पर घना जंगल था, जहां कि आज की अयोध्या है। उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की थी कि राम की अयोध्या वहां थी, जहां आज का अफगानिस्तान है। परंतु उस जुनूनी दौर में समझदारी की बातें सुनने और गुनने वाला था ही कौन।
अधिकांश मुसलमानों के मन में प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव की धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्धता के संबंध में गहरे संदेह थे। ऐसा माना जा रहा था कि उनका झुकाव संघ परिवार की ओर है। यहां तक कि स्वर्गीय अर्जुन सिंह ने भी इस बात पर अप्रसन्नता जाहिर की थी कि प्रधानमंत्री ने सुरक्षाबलों को बाबरी मस्जिद का विध्वंस रोकने के निर्देश नहीं दिए और उन्हें अयोध्या से 11 किलोमीटर पहले रोक दिया गया। सुरक्षाबलों ने बाबरी मस्जिद का विध्वंस रोकने के लिए योजना तैयार कर ली थी परंतु उच्चाधिकारियों से निर्देश न मिलने के कारण वे उस योजना को अमली जामा नहीं पहना सके। अयोध्या में उस समय तैनात सुरक्षाबलों के मुखिया से मेरी मुलाकात माउंट आबू स्थित सीआरपीएफ प्रिशक्षण अकादमी में हुई थी। उन्होंने सीआरपीएफ की एक कार्यशाला में नक्शों की सहायता से यह समझाया था कि मस्जिद का विध्वंस कैसे रोका जा सकता था। उन्होंने इस बात पर खेद व्यक्त किया कि वे कार्यवाही शुरू करने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय के निर्देशों का इंतजार करते रहे परंतु वहां से उन्हें तब तक कोई संदेश प्राप्त नहीं हुआ जब तक कि मस्जिद को पूरी तरह हा नहीं दिया गया। नरसिम्हाराव के कुछ नजदीकियों के अनुसार प्रधानमंत्री की यह इच्छा थी कि बाबरी मस्जिद हा दी जाए ताकि संघ परिवार के हाथों से एक बड़ा मुद्दा खिसक जाए। अगर ऐसा था भी, तो नरसिम्हाराव ने अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हजारों निर्दोर्षों को कत्ल करवा दिया। उस समय भारत फासीवाद की कगार पर पहुंच गया था।
इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि खुलओम गुंडागर्दी करने और एक ऐतिहासिक, संरक्षित स्मारक को गिराने वालों में से एक को भी कोई सजा नहीं मिली। जब धर्मनिरपेक्ष और प्रजातांत्रिक शक्तियों ने भाजपा को इस बर्बरता के लिए लताड़ा तो आडवानी ने इससे अपना पल्ला झाड़ते हुए यह कहा कि ॔॔वह उनके जीवन का सबसे दुःखद दिन था।॔॔ क्या आडवानी यह भूल गए कि वे राम मंदिर आंदोलन के प्रणेता और शीर्षतम नेता थे। उन्होंने ही देश भर में ॔रथयात्रा॔ निकाली थी जो कि द टाईम्स ऑफ इंडिया के अनुसार ॔ब्लड यात्रा॔ बन गई थी। यह यात्रा अपने पीछे खून की लकीरें छोड़ गई थी। हमेशा की तरह, राव सरकार ने बाबरी मस्जिद कांड की जांच के लिए न्यायिक जांच आयोग गठित कर दिया। इस आयोग ने, जिसका नाम लिब्रहान आयोग था, 16 साल से अधिक समय में अपनी रिपोर्ट तैयार की और जैसा कि अपेक्षित था, नरसिम्हाराव को क्लीन चिट दे दी। दरअसल, न्याययिक जांच आयोगों की नियुक्ति ही इसलिए की जाती है ताकि कोई त्वरित कार्यवाही न करनी पड़े। ये आयोग जांच पूरी करने में सालों और कभी कभी दशकों लगा देते हैं और जनता की गा़ी कमाई के दसियों लाख रूपये उन पर बर्बाद हो जाते हैं। इन आयोगों की नियुक्ति ही इसलिए की जाती है ताकि सरकारों को समय मिल जाए और दोषी बच निकलने में कामयाब हो जाएं।
सीबीआई अदालत भी बाबरी विध्वंस के लिए किसी की जिम्मेदारी तय करने मे विफल रही और एल. के. आडवानी (जिन्होंने रथयात्रा निकालकर देश भर में भावनाएं भड़काईं थीं), एम. एम. जोशी, विनय कटियार, कल्याण सिंह, उमा भारती आदि सभी खुलओम घूम रहे हैं। यह इस तथ्य के बावजूद कि उनके खिलाफ चश्मदीदों सहित ठोस सुबूत उपलब्ध हैं। सन 1999 में भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए गठबंधन केन्द्र में सत्ता में आया। इस सरकार में आडवानी गृहमंत्री थे और सीबीआई उनके अधीनस्थ थी। ऐसे में सीबीआई अपने ही मंत्री के खिलाफ भला कैसे कार्यवाही कर सकती थी? सन 2004 में एनडीए की हार के बाद यूपीए की सरकार बनी और सीबीआई ने अयोध्या मामले में बरेली की अदालत में कार्यवाही आगे ब़ाई। परंतु अंततः इसका भी कोई नतीजा नहीं निकला।
मुझे कभीकभी ऐसा लगता है कि सभी पार्टियों के बीच एक अलिखित समझौता होता है कि वे सत्ता में आने पर, एकदूसरे के नेताओं को कटघरे में खड़ा नहीं करेंगी और शायद इसी समझौते के चलते सभी पार्टियों के नेता बिना किसी डर के अपने राजनैतिक खेल खेलते रहते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो क्या अयोध्या में हुई मनमानी और गुंडागर्दी को कोई भी प्रजातांत्रिक राष्ट्र माफ कर देता? बल्कि, यदि राव सरकार प्रभावी कदम उठाती तो बाबरी कांड होता ही नहीं। तत्कालीन केन्द्र सरकार बहुत आसानी से आडवानी, जोशी, उमा भारती, कटियार आदि को विषवमन करने से रोक सकती थी। अंततः, जब मस्जिद गिरा ही दी गई थी तब भी दोषियों को सजा दिलवाकर हमारे देश के प्रजातंत्रिक मूल्यों की रक्षा की जा सकती थी। परंतु वह भी नहीं हुआ। इतना ही खेदजनक यह तथ्य है कि इलाहबाद उच्च न्यायालय ने सितम्बर 2010 के अपने निर्णय में उस जमीनजिस पर बाबरी मस्जिद थीको बांटने का हुक्म सुना दिया। अदालत ने इस संबंध में कुछ नहीं कहा कि उस जमीन का असली हकदार कौन है, जबकि मुकदमा इसी प्रश्न के समाधान के लिए दाखिल किया गया था। इस मामले में उच्चतम न्यायालय में अपील लंबित है और हम आशा कर सकते हैें कि इस देश की सबसे बड़ी अदालत न्याय करेगी। उच्चतम न्यायालय जो भी निर्णय दे, उसे सभी पक्षकारों को सद्भावनापूर्वक स्वीकार करना चाहिए। अब इस मुद्दे के हल का बस यही एक रास्ता बचा है।
अंगे्रजी की एक कहावत है ॔एवरी क्लाउड हेज ए सिल्वर लाईनिंग॔ (हर मुसीबत का एक उजला पक्ष होता है)। यह कहावत बाबरी विध्वंस के बारे में भी सही है। इस घटना के बाद मुसलमानों को यह एहसास हुआ कि उन्हें शिक्षा और आर्थिक विकास जैसी अपनी असली समस्याओं पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। संघ परिवार और उनके स्वयं के नेताओं ने मुसलमानों को एक भावनात्मक मुद्दे में जबरन फंसा दिया था जिसके कारण उनका ध्यान अपनी असली समस्याओं पर से हट गया था। इस एहसास से मुसलमानों का बहुत भला हुआ है। बाबरी कांड के बाद अनेक शैक्षणिक संस्थाएं अस्तित्व में आईं हैं और इनसे मुसलमानों को लाभ हुआ है।
दुर्भाग्यवश, शिक्षा मुफ्त नहीं मिलती। शिक्षा पाने के लिए पैसा खर्च करना होता है। मुसलमानों में कितनी गरीबी है, यह सच्चर समिति की रपट से जाहिर है। इस रपट में कहा गया है कि रोजगार और आर्थिक विकास की दृष्टि से मुसलमान दलितों से भी नीचे खिसक गए हैं। स्पष्टतः, निजीकरण और उदारीकरण के इस युग में, जब उच्च शिक्षा का खर्च बहुत ब़ गया है, गरीबी की समस्या को हल किए बगैर मुस्लिम समुदाय के शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करना संभव नहीं है। इस मामले में सरकार को ही हस्तक्षेप करना होगा। परंतु यह भी आसान नहीं है क्योंकि मुस्लिम राजनैतिक नेतृत्व इतना सक्षम नहीं है कि वह सरकार को कुछ करने के लिए मजबूर कर सके और गैरमुस्लिम धर्मनिरपेक्ष नेतृत्व में इस कार्य को करने की इच्छाशक्ति का नितांत अभाव है। हम केवल इंतजार कर सकते हैं और यह उम्मीद कि समय बदलेगा, हालात सुधरेंगे और हमारी दुनिया बेहतर बनेगी।
-डॉ. असगर अली इंजीनियर

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

बाबरी मस्जिद के दो दशक बाद

आज से बीस वर्ष पहले ;6 दिसम्बर 1992 बाबरी मस्जिद ढ़हा दी गई थी। यह घटना भारत के इतिहास पर एक बदनुमा दाग है। इस घटना को अंजाम दिया था साम्प्रदायिक ताकतों ने और इससे भारतीय राजनीति एक अवांछित दिशा में मुड़ गई। इस दिशापरिवर्तन का खामियाजा हम आज भी भोग रहे हैं। लिब्रहान जांच आयोग ने अपनी रपट में साफ कहा है कि बाबरी मस्जिद को संघ परिवार द्वाराए सोची.समझी साजिश के तहत, ढहाया गया था। आज भी संघ परिवार इस कुकर्म को अपनी बड़ी उपलब्धि मानता है और हर वर्ष 6 दिसम्बर को शौर्य दिवस मनाता है।
संघ परिवार और उसकी विचारधारा से इत्तेफाक रखने वाले बुद्धिजीवी यह मानते  हैं कि बाबरी मस्जिद को जमींदोज करके राष्ट्रनिर्माण की नींव रखी गई थी। दूसरी  ओर, जिन व्यक्तियों की प्रतिबद्धता प्रजातंत्र व धर्मनिरपेक्षता के प्रति है, उनकी यह मान्यता है कि इस दिन भारतीय राजनीति व धर्मनिरपेक्षता शर्मसार हुई थी। इस घटना ने साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया को गति दी। इस त्रासद दिन से शुरू हुई साम्प्रदायिक ताकतों के सुदृढ़ीकरण की प्रक्रियाए जिसके नतीजे में भाजपा एक शक्तिशाली राजनैतिक दल के रूप में उभरी। इससे हमारी संस्कृति शनैः.शनैः उदारता से संकीर्णता की ओर और बहुवाद से साम्प्रदायिकता की ओर बढ़ने लगी। समाज में अलगाव का भाव बढ़ा और कमजोर वर्गों के प्रति सहिष्णुता घटी। जहां साम्प्रदायिक ताकतों का बोलबाला बढ़ने लगा  वहीं तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टी कांग्रेस इस घटनाक्रम को या तो चुपचाप देखती रही या इस प्रक्रिया को और तेज करने में हाथ बंटाती रही। कांग्रेस, बाबरी मस्जिद की रक्षा करने में असफल रही और इस कारण उसे इस हद तक सिद्धांतविहीन माना जाने लगा कि कुछ लोग उसकी तुलना भाजपा से तक करने लगे। यह कहा जाने लगा कि भाजपा जो काम सीना ठोक कर, खुलेआम करती है, कांग्रेस वही काम दबे.छुपे ढंग से, पर्दे के पीछे से करती है। ये दोनों पार्टियां इस समय भारतीय राजनीति के शीर्ष पर हैं। भाजपा की साम्प्रदायिकता के प्रति नीतिगत प्रतिबद्धता है वहीं कांग्रेस, राजनैतिक फायदे के लिए साम्प्रदायिकता का सहारा लेने में जरा भी नहीं सकुचाती। बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना, उसके तुरंत बाद हुई साम्प्रदायिक हिंसाए उसकी प्रतिक्रिया में हुए बम धमाके और इन सबके दौरान पुलिस की भूमिका से प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्ध तबका हतप्रभ रह गया। उसे गहरा धक्का लगा। जब बाबरी मस्जिद ढहायी जा रही थी तब उसकी रक्षा के लिए जिम्मेदार पुलिस दूसरी तरफ देख रही थी। साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान भी पुलिस या तो मूक दर्शक बनी रही या फिर दंगाईयों के साथ हो ली। साम्प्रदायिक दंगों के बाद भी पुलिस की भूमिका अत्यंत संदिग्ध रही है। यद्यपि साम्प्रदायिक हिंसा का मुख्य शिकार अल्पसंख्यक होते हैं तथापि दंगों के बाद सबसे ज्यादा संख्या में उन्हीं की गिरफ्तारियां होती हैं। कुछ अपवादों को छोड़कर, अधिकांश पुलिसकर्मी बहुसंख्यकवादी साम्प्रदायिकता के प्रति अपने प्रेम के चलते, कानूनी प्रक्रिया का खुलेआम मखौल बनाते हैं।
साम्प्रदायिक  हिंसा का एक निश्चित ढर्रा होता है। सन् 2001 की जनगणना के अनुसारए मुसलमानों का देश की कुल आबादी में प्रतिशत 13ण्6 है। परंतु दंगों में मरने वालों में 90 प्रतिशत से अधिक मुसलमान होते हैं। मुसलमानों के खिलाफ पूर्वाग्रहों से समाज में उनके विरूद्ध हिंसा के लिए उपजाऊ भूमि तैयार हो गई है। राजनैतिक पार्टियों के नेतृत्व व नौकरशाही और पुलिस के बड़े तबके सहितए समाज का अधिकांश हिस्सा इन पूर्वाग्रहों की गिरफ्त में है और इसका शिकार होते हैं असहाय व निर्दोष अल्पसंख्यक। यह मानकर चला जाता है कि वे अपराधी हैं और हिंसा में विश्वास रखते हैं। यह सोच अधिकारियों व राज्यतंत्र की कार्यशैली में स्पष्ट प्रतिबिंबित होती है।

इस हिंसा के चलते समाज का साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण बढ़ता जा रहा है। यह ध्रुवीकरण इस सीमा तक बढ़ गया है कि स्कूलोंए कालेजों और उन चन्द कार्यस्थलों में.जहां मुसलमानों को  रोजगार मिल पाता है.धार्मिक आधार पर भेदभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। इस ध्रुवीकरण के कारण ही साम्प्रदायिक ताकतें चुनावों में जीत हासिल कर पा रही हैं और सत्ता पर काबिज होने में भी सफल हो रही हैं। मुंबई में साम्प्रदायिक हिंसा का नेतृत्व शिवसेना ने किया था। दंगों के बाद हुए चुनावों में उसे भारी सफलता मिली।  लिब्रहान व श्रीकृष्ण जैसे न्यायिक जांच आयोगों की रपटें सरकारी दफ्तरों की अलमारियों में कैद हैं। साम्प्रदायिक पार्टियां तो इन रपटों को रद्दी कागजों का ढेर समझती ही हैंए कांग्रेस भी सत्ता में आने पर इनकी सिफारिशों को लागू करने में तनिक भी दिलचस्पी नहीं दिखाती। वोट बैंक की राजनीति के चलते कोई पार्टी बहुसंख्यक समुदाय को नाराज करने के लिए तैयार नहीं है। इस मामले में न्यायपालिका की भूमिका भी कोई खास प्रशंसनीय नहीं रही है। अगर इस देश में कानून का राज होता तो वे लोग जो समाज में नफरत फैलाते हैंए वे लोग जो दंगे भड़काते हैं और वे लोग जो दंगों में निर्दोषों की जान लेते हैंए आज सींखचों के पीछे होते। इसकी बजाए वे सड़कों पर दहाड़ रहे हैं और उन्हें ष्हिन्दू हृदय सम्राटष् जैसे तमगों से नवाजा जा रहा है। यह संयोग नहीं है कि बाल ठाकरेए जिन्होंने 1992.93 के मुंबई दंगों का नेतृत्व किया था और नरेन्द्र मोदीए जो 2002 के गुजरात कत्लेआम के केन्द्र में थे.दोनों को ही हिन्दू हृदय सम्राट की पदवी दी गई। साम्प्रदायिक सोच की जकड़ से न्यायपालिका भी नहीं बच सकी है। यही कारण है कि गुजरात दंगों के शिकार हुए लोगों को न्याय तभी मिल सका जब उनके मामले गुजरात से बाहर के न्यायालयों में स्थानांतरित किए गए। इलाहबाद उच्च न्यायालय के अयोध्या मामले में फैसले में तीन में से दो जजों ने सुबूतों से ज्यादा तव्वजो आस्था को दी और यह हुक्म सुनाया कि ष्ष्विवादास्पद भूमि को सभी दावेदारों के बीच बराबर.बराबर बांट दिया जाए।ष्ष् ऐसी मांग न तो मामले के पक्षकारों ने की थी और न ही ऐसा करना विधि सम्मत है। साम्प्रदायिक हिंसा और ध्रुवीकरण के कारण विभिन्न समुदायों के लोगों के बीच भावनात्मक दीवारें तो खड़ी हुई ही हैंए भौतिक दीवारें भी खड़ी हो गई हैं। साम्प्रदायिक हिंसा के निशाने पर रहने वाले समुदाय के सदस्य अपने.अपने मोहल्लों और दड़बों में सिमट गए हैं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के भरसक प्रयासों के बावजूद शिक्षाए उदारवादी मूल्यों और प्रगति की रोशनी उन तक नहीं पहुंच पा रही है। मुंबई में अवश्य मोहल्ला समितियों ने कुछ सकारात्मक भूमिका निभाई थी और कुछ हद तक वे आज भी ऐसा कर रही हैं। इस पहल के पीछे थे कुछ पुलिस अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ताए जो समाज में शांति और सद्भाव के पक्षधर थे।

दुर्भाग्यवष, देश के सामने खड़ी इस भारी समस्या का मुकाबला करने के लिए न राज्यतंत्र और न ही सामाजिक संगठनों ने पर्याप्त प्रयास किए। सरकार ने "नेशनल फाउंडेशन ऑफ कम्यूनल हारमोनी" की स्थापना अवश्य की परंतु उसका एजेंडा और उसके संसाधन इतने सीमित हैं कि वह समाज के विभिन्न तबकों में धर्मनिरपेक्ष.प्रजातांत्रिक मूल्यों के संबंध में जागृति फैलाने के विशाल व कठिन काम को करने में सक्षम नहीं है। एनसीईआरटी द्वारा प्रकाशित स्कूली पाठ्यपुस्तकों में सकारात्मक परिवर्तन किए गए हैं परंतु इनका प्रभाव भी सीमित है क्योंकि राज्यों के शिक्षा बोर्डों ने इन परिवर्तनों को नहीं अपनाया है। पुलिस व नौकरशाही को साम्प्रदायिकता से जुड़े मुद्दो के प्रति संवेदनशील बनाने का काम न के बराबर हुआ है। यह बहुत आवश्यक है कि पुलिस व नौकरशाहों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों के पाठ्यक्रमों में व्यापक सुधार लाए जाएं। निश्चित ही पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को उनके मूल कार्य से संबधित प्रशिक्षण दिया जाना अनिवार्य है परंतु राष्ट्रीय एकीकरण से संबंधित मसलों के बारे में उन्हें शिक्षित किया जाना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक, जो कि साम्प्रदायिक हिंसा पर काफी हद तक काबू पाने में हमारी मदद कर सकता थाए ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है।

सामाजिक संगठनों की भी अपनी सीमाएं हैं। कुछ सामाजिक  संगठनों ने केवल पीड़ितों  को न्याय दिलाने के काम  तक स्वयं को सीमित रखा  है और उन्होंने प्रशंसनीय उपलब्धियां भी हासिल की हैं परंतु समाज में साम्प्रदायिक विचारधारा के फैलाव से उत्पन्न समस्या इतनी व्यापक है कि उससे मुकाबला करने के संसाधन सामाजिक संगठन नहीं जुटा सकते। कुछ संगठन जनजागृति के कार्यक्रम चला रहे हैं परंतु उनकी पहुंच सीमित है और वे उन लोगों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं जहां उनको पहुंचना चाहिए। नुक्कड़ नाटकों, गीतों, फिल्मों आदि के जरिए, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के प्रचार.प्रसार का काम यद्यपि चल रहा है तथापि वह अभी अपने शुरूआती दौर में ही है। हमें एक लंबी राह तय करनी है। स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्य ही हमारे राष्ट्र के निर्माण की नींव बन सकते हैं। बाबरी मस्जिद का ढ़हाया जाना राष्ट्रीय एकता को तोड़ने का प्रयास था। इसके बाद साम्प्रदायिक ताकतों की बढ़ती ताकत ने घाव पर नमक छिड़कने का काम किया है। हमें आशा है कि बाबरी कांड से राज्यतंत्र व सामाजिक संगठनों ने उपयुक्त सबक सीखे होंगे और जो दानवी ताकतें बाबरी मस्जिद के मलबे से उभरी हैं उनसे मुकाबला करने के लिए प्रभावी व दूरगामी नीतियां व कार्यक्रम बनाए जाएंगे। ;
 -राम पुनियानी


सोमवार, 12 नवंबर 2012

नेहरू ही हैं आधुनिक भारत के निर्माता

1945 के शिमला सम्मेलन के लिए जाते हुए ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार खां, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल
14 नवम्बर जयंती पर विशेष
हमारे देश के कुछ संगठन, विशेषकर संघ परिवार के सदस्यए जब भी सरदार वल्लभभाई पटेल की चर्चा करते हैं, वे उनके बारे में दो बातें अवश्य कहते हैं। पहली यह कि सरदार पटेल आज के भारत के निर्माता हैं और दूसरी यह कि यदि कश्मीर की समस्या सुलझाने का उत्तरदायित्व सरदार पटेल को दे दिया जाता तो पूरे कश्मीर पर भारत का कब्जा होता।
संघ परिवार का हमेशा यह प्रयास रहता है कि आजाद भारत के निर्माण में जवाहरलाल नेहरू की भूमिका को कम करके पेश किया जाये और यह भी कि आज यदि पूरा कश्मीर हमारे कब्जे में नहीं है, तो उसके लिये सिर्फ और सिर्फ नेहरू को जिम्मेदार ठहराया जाए। संघ परिवार इस बात को भूल जाता है कि आजाद भारत में पंड़ित नेहरू और सरदार पटेल की अपनी.अपनी भूमिकायें थीं। जहां सरदार पटेल ने अपनी सूझबूझ से सभी राजे.रजवाड़ों का भारत में विलय करवाया और भारत को एक राष्ट्र का स्वरूप दिया वहीं नेहरू ने भारत को एक शक्तिशाली आर्थिक नींव देने के लिए आवश्यक योजनायें बनाईं और उनके क्रियान्वयन के लिये उपयुक्त वातावरण भी।
नेहरू जी के योगदान को तीन भागों में बांटा जा सकता है। पहला,ऐसी शक्तिशाली संस्थाओं का निर्माणए जिनसे भारत में प्रजातांत्रिक व्यवस्था स्थायी हो सके। इन संस्थाओं में संसद एवं विधानसभायें व पूर्ण स्वतंत्र न्यायपालिका शामिल हैं।
दूसराए प्रजातंत्र को जिंदा रखने के लिये निश्चित अवधि के बाद चुनावों की व्यवस्था और ऐसे संवैधानिक प्रावधान, जिससे भारतीय प्रजातंत्र धर्मनिरपेक्ष बना रहे।
तीसरा, मिश्रित अर्थव्यवस्था और उच्च शिक्षण संस्थानों की बड़े पैमाने पर स्थापना। वैसे  नेहरू समाजवादी व्यवस्था के समर्थक नहीं थे परंतु वे भारत को पूंजीवादी देश भी नहीं बनाना चाहते थे। इसलिये उन्होंने भारत में एक मिश्रित अर्थव्यवस्था की नींव रखी। इस व्यवस्था में उन्होंने जहां उद्योगों में निजी पूँजी की भूमिका बनाये रखी वहीं उन्होंने अधोसंरचनात्मक उद्योगों की स्थापना के लिये सार्वजनिक क्षेत्र का निर्माण किया। उन्होंने कुछ ऐसे उद्योग चुने जिन्हें सार्वजनिक क्षेत्र में ही रखा गया। ये ऐसे उद्योग थे जिनके बिना निजी उद्योग पनप ही नहीं सकते थे। बिजली का उत्पादन पूरी तरह से सार्वजनिक क्षेत्र में रखा गया। इसी तरह इस्पातए बिजली के भारी उपकरणों के कारखानेए रक्षा उद्योग, एल्यूमिनियम एवं परमाणु ऊर्जा भी सार्वजनिक क्षेत्र में रखे गए। देश में तेल की खोज की गई और पेट्रोलियम की रिफाईनिंग व एलपीजी की बाटलिंग का काम भी केवल सार्वजनिक क्षेत्र में रखे गये। औद्योगिकरण की सफलता के लिये तकनीकी ज्ञान में माहिर लोगों की आवश्यकता होती है। उद्योगों के संचालन के लिये प्रशिक्षित प्रबंधक भी चाहिए होते हैं। 
उच्च तकनीकी शिक्षा के लिये आईआईटी स्थापित किये गये। इसी तरह, प्रबंधन के गुर सिखाने के लिए आईआईएम खोले गए। इन उच्चकोटि के संस्थानों के साथ.साथ संपूर्ण देश के पचासों छोटे.बड़े शहरों में इंजीनियरिंग कालेज व देशवासियों के स्वास्थ्य की देखभाल करने के लिये मेडिकल कॉलेज स्थापित किये गये। 
चूँकि अंग्रेजों के शासन के दौरान देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी इसलिये उसे वापिस पटरी पर लाने के लिये अनेक बुनियादी कदम उठाये गये। उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण था देश का योजनाबद्ध विकास। इसके लिये योजना आयोग की स्थापना की गई। स्वयं नेहरू जी योजना आयोग के अध्यक्ष बने। योजना आयोग ने देश के चहुंमुखी विकास के लिये पंचवर्षीय योजनाएं बनाईं। उस समय पंचवर्षीय योजनाएं सोवियत संघ सहित अन्य समाजवादी देशों में लागू थीं परंतु पंचवर्षीय योजना का ढांचा एक ऐसे देश में लागू करना नेहरूजी के ही बूते का था जो पूरी तरह से  समाजवादी नहीं था।
उस समय भारत के सामने एक और समस्या थी और वह थी बुनियादी उद्योगों के लिये वित्तीय साधन उपलब्ध करवाना। पूँजीवादी देश इस तरह के उद्योगों के लिये पूँजी निवेश करने को तैयार नहीं थे। इन देशों का इरादा था कि भारत और भारत जैसे अन्य नव.स्वाधीन देशों की अर्थव्यवस्था कृषि.आधारित बनी रहे। चूँकि पूँजीवादी देश भारत के औद्योगिकरण में हाथ बंटाने को तैयार नहीं थे इसलिये नेहरू जी को सोवियत रूस समेत अन्य समाजवादी देशों से सहायता मांगनी पड़ी और समाजवादी देशों ने दिल खोलकर सहायता दी। समाजवादी देशों ने सहायता देते हुये यह स्पष्ट किया कि वे यह सहायता बिना किसी शर्त के दे रहे हैं। समाजवादी देशों की इसी नीति के अन्तर्गत हमें सार्वजनिक क्षेत्र के पहले इस्पात संयत्र के लिये सहायता मिली और यह प्लांट भिलाई में स्थापित हुआ।
जब पूँजीवादी देशों को यह महसूस हुआ कि यदि वे अपनी नीति पर चलते रहे तो वे समस्त नव.स्वाधीन देशों का समर्थन खो देंगे व इससे उन्हें भारी नुकसान होगा तब उन्होंने भी भारी उद्योगों के लिये सहायता देना प्रारंभ कर दिया।
इस तरहए धीरे.धीरे हमारा देश भारी उद्योगों के मामले में काफी प्रगति कर गया। आजादी के बाद जब हमें समाजवादी देशों से उदार सहायता मिलने लगी तो हमारे देश के प्रतिक्रियावादी राजनैतिक दलों और अन्य संगठनों ने यह आरोप लगाना प्रारंभ कर दिया कि हम सोवियत कैम्प की गोद में बैठ गये हैं।
द्वितीय महायुद्ध के बाद विश्व दो गुटो में विभाजित हो गया था। एक गुट का नेतृत्व अमरीका कर रहा था और दूसरे गुट का सोवियत संघ। भारत ने यह फैसला किया कि वह दोनों में से किसी गुट में शामिल नहीं होगा।
इसी निर्णय के अन्तर्गत हमने अपनी विदेशी नीति का आधार गुटनिरपेक्षता को बनाया। भारत द्वारा की गई इस पहल को भारी समर्थन मिला और अनेक नव.स्वाधीन देशों ने गुटनिरपेक्षता को अपनाया। गुटनिरपेक्षता की नीति की अमेरिका द्वारा सख्त निंदा की गई। तत्कालीन अमरीकी विदेश मंत्री जॉन फास्टर डलेस ने कहा कि जो हमारे साथ नहीं है वह हमारे  विरूद्ध है।
हमारे देश के अंदर भी जनसंघ ने गुटनिरपेक्षता की नीति की आलोचना की और कहा कि हम समाजवादी देशों के पिछलग्गू बन गये हैं। परंतु हमारी गुटनिरपेक्षता की नीति के कारण सारी दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी और जवाहरलाल नेहरूए गुटनिरपेक्ष देशों के सर्वाधिक शक्तिशाली नेता बन गये। नेहरूजी के बाद इंदिरा गांधी भी इस नीति पर चलीं परंतु अब भारत ने इस नीति को पूरी तरह से भुला दिया है।
आर्थिक और विदेश नीति के निर्धारण में मौलिक योगदान के साथ.साथ नेहरू ने हमारे देश में प्रजातंत्र की जड़ें मजबूत कीं और उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि नेहरू ने भारत को पूरी ताकत लगाकर एक धर्मनिरपेक्ष देश बनाया।
चूँकि हमने धर्मनिरपेक्षता को अपनाया इसलिए हमारे देश में प्रजातंत्र की जड़ें गहरी होती गईं। जहां अनेक नव.स्वाधीन देशों में प्रजातंत्र समाप्त हो गया है और तानाशाही कायम हो गई है वहीं भारत में प्रजातंत्र का कोई बाल बांका तक नहीं कर सका है।
इस तरहए कहा जा सकता है कि जहां सरदार पटेल ने भारत को भौगोलिक दृष्टि से एक राष्ट्र बनाया वहीं नेहरू ने ऐसा राजनीतिक.आर्थिक एवं सामाजिक आधार निर्मित किया जिससे भारत की एकताए अखण्डता व प्रजातंत्र को कोई ताकत खत्म नहीं कर सकी। आधुनिक भारत के निर्माण में पटेल और नेहरू दोनों का महत्वपूर्ण योगदान है।
- एल. एस. हरदेनिया

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

इतिहास के आईने में दिल्ली

'' दिल्ली दिलवालों की '' भले ही कही जाति हो , पर यह सदियों से  '' जी हुजूरी '' से लेकर '' सरकार '' तक , संत्री से ले कर   '' मंत्री '' तक और '' नेता '' से ले कर  अभिनेता '' तक -- सभी के आकर्षण का केंद्र रही है , देशी ही नही विदेशी भी दिल्ली के दिल में समाने के लिए लालायित रहे है .  
इस दिल्ली की अपनी कोई संस्कृति हो या न  हो , किन्तु इसका अपना एक इतिहास अवश्य है , जिस में सम्पूर्ण भारत की झलक सहज ही देखी  जा सकती है . 
पौराणिक पृष्ठभूमि में दिल्ली का सम्बन्ध महाभारत कालीन पांड्वो की राजधानी इन्द्रप्रस्थ से जोड़ा जाता है , वर्तमान दिल्ली में यमुना नदी के पश्चिमी  किनारे पर दिल्ली गेट के आसपास के इलाके की पहचान '' इन्द्रप्रस्थ '' के रूप में की गई है .

पौराणिक  कथाओं के अनुसार माना जाता है की यह स्थल धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर आदि पांड्वो को अपना आवास बनाने के लिए दिया था , तब इस का नाम '' खांडव वन '' था युधिष्ठिर ने अपने भाइयो की सहायता से वन को साफ़ कर  के , मय दानव से शानदार महल का निर्माण कराया था , स्वभावत: यहाँ धीरे -- धीरे बस्तिया बस्ती गई , जिन पर युधिष्ठिर का शासन चलता रहा , बाद में युधिष्ठिर हस्तिनापुर चले गये और वही से शासन सूत्र का संचालन करते रहे |
परवर्तीकाल  में इन्द्रप्रस्थ मौर्यों ,यौधेयो , कुषाणों आदि के शासन में भी रहा , किन्तु तब तक यह ' इंदरपत गाँव '' में बदल चुका था ,
ऐतिहासिक तथ्यों , ज्ञात अभिलेखों और पुरातात्विक  खुदाइयो से प्राप्त प्रमाणों के आधार पर दिल्ली को ' सात बस्तियों का नगर '' माना जाता है , जो विभिन्न कालो में बनी .. इन में सबसे पुरानी बस्ती दसवी सदी के अंतिम चरण (993 )  में बसी थी , जिसे तोमर राजपूत अनगपाल  ने बसाया था और नाम रखा था '' ढिल्ली '' आधुनिक युग में इस की पहचान '' लालकोट '' के रूप में की गई है .

अनगपाल के बाद  कन्नौज  के  गहडवाल  शासको ने '' ढिल्ली '' पर अधिकार जमाया फिर क्रमश: अजमेर के चौहान राजा  अर्णोराज तथा विग्रहराज  बीसल देव चतुर्थ ( 115 -- 64 ) ने इसे कन्नौज के राजा से छीन लिया |
बीसल देव के बाद पृथ्वीराज चौहान ( 1177 -- 92 ) ने यहाँ शासन किया , पृथ्वीराज ने यहाँ '' रायपिथौरा '' के नाम से एक किला भी बनवाया था , पृथ्वीराज चौहान और कन्नौज नरेश जयचंद के बीच लम्बे समय तक मन मुटाव चलता रहा , इस बीच पृथ्वीराज ने जयचन्द्र की पुत्री संयोगिता -- संयुक्ता  से प्रेम विवाह भी कर लिया , जिस से और अधिक चिढ  कर जयचंद ने विदेशी हमलावर मुहम्मद गोरी को पृथ्वीराज के विरुद्ध युद्ध लड़ने के लिए आमंत्रित किया |

पृथ्वीराज ने तरावली के मैदान में मुहम्मद गोरी को युद्ध में हराया , परन्तु गोरी ने 1192 में पृथ्वीराज पर विजय पाई और अपने सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली का सूबेदार बनाया , उस ने 1210 तक दिल्ली पर राज्य किया , यद्यपि उस ने 1206 में मुहम्मद गोरी की मृत्यु के बाद दिल्ली की जगह लाहौर को राजधानी बनाया था |

11211 में ऐबक के दामाद शमशुद्दीन ने पुन: लाहौर छोड़ कर  दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया 1236 में दिल्ली की गद्दी पर रजिया बेगम बैठी , दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाली वह पहली महिला थी उन्होंने 1240 तक शासन किया ......
रजिया बेगम के बाद बहराम शाह (1240 -- 42 ) मसूद (1242 --46 ) नसुरुद्दीन ( 1246 -- 66 ) बलबम ( 1266-- 86 ) केकुबाद ( 1286-- 90 ) आदि ने दिल्ली पर राज्य किया था , केकुबाद के समय ही दिल्ली पर गुलाम वंश के शासन का अंत हो गया |
1290 में दिल्ली की बागडोर जलालुद्दीन खिलजी ने संभाली , खिलजी वंश के तीसरे शासक के रूप में अलाउद्दीन खिलजी 1296 में सत्तारूढ़ हुआ . अलाउद्दीन ने ही दिल्ली की दूसरी बस्ती की नीव डाली उस ने यहाँ सीरी फोर्ट का निर्माण कराया हौजखास भी उसी की देन है उस ने1296 से1316 तक शासन किया|
अलाउद्दीन के बाद 1320 तक दिल्ली की बागडोर शाह्बुद्धीन खिलजी , मुबारक और खुसरो  ने संभाली , 1320 में खुसरो के एक सरदार गाजी मलिक ने बगावत कर  दी , जिसमे खुसरो मारा गया और उस के साथ ही खिलजी वंश का शासकीय अंत हो गया
1320  में गाजी मलिक गयासुद्दीन तुगलक के नाम से दिल्ली का सुलतान बना और उस ने यहाँ तुगलक वंशीय शासन की नीव डाली , 1414 तक यहाँ 11 तुग्लको ने राज्य किया जिन में से केवल तीन ने ही राज्य के विस्तार में योगदान  दिया , ग्यासुद्धीन तुगलक ( 1320-- 25 ) ने तुगलकाबाद बसाया जो दिल्ली की तीसरी बस्ती मानी जाती है |
1325 में मुहम्मद बिन तुगलक दिल्ली का शासक बना , उसने 1327 से 1330 तक अपनी राजधानी दिल्ली से देवगिरी और 130 से 1351 तक देवगिरी से दिल्ली बदल ली , इस दौरान 1328 में तरमाशीरी खा के नेतृत्व में मंगोल लूटपाट करते हुए दिल्ली तक आ पहुंचे , मुहम्मद तुगलक ने उन्हें ढेर सारा धन दे कर वापस भेज दिया मुहम्मद तुगलक ने यहाँ पर '' जहापनाह '' नामक चौथी बस्ती बसाई , जो आज  खंडहर के रूप में नाम शेष है |
मुहम्मद तुगलक के उतराधिकारी फिरोजशाह तुगलक (1351-- 88 ) ) दिल्ली की पांचवी बस्ती '' फिरोजाबाद '' बसाई जो फिरोजशाह कोटला के नाम से प्रसिद्ध है फिरोजशाह की मृत्यु के बाद उस के पोते ग्यासुद्धीन ( 1388 -- 92 ) दूसरे पोते अबू  बकर तथा नासिरुद्धीन के नाम से मुहम्मद , हुमायु और महमूद ( 1392 -- 1398 ) ने दिल्ली पर शासन किया
महमूद शाह के शासनकाल में तैमुर लंग ने दिल्ली पर आक्रमण किया 17 दिसम्बर 1398 को महमूद और तैमुर में जम कर  युद्ध हुआ जिस में तैमुर की जीत हुई और महमूद को भागना पडा , उस ने गुजरात में जा कर  शरण ली , इधर तैमुर लंग ने दिल्ली में जमकर लूटपाट की , लगभग तीन लाख लोगो को बंदी बनाया और चलता बना , वह दिल्ली में मात्र 15  दिन रहा
फरवरी 1492 में महमूद शाह की मृत्यु के बाद दौलत खा लोदी दिल्ली का शासक बना , किन्तु1414 में खिज्र खा ने उसे हटा कर  कैद कर  लिया और स्वंय शासक बन बैठा , खिज्र खा के बाद उसका बेटा मुबारक शाह तथा पोता मुहम्मद दिल्ली के शासक बने , मुहम्मद के बाद अलाउद्धीन आजम शाह ( 1445 ) सिंक्र लोदी ( 1489 ) और इब्राहिम लोदी (1517 ) ने दिल्ली का शासन संभाला
लाहौर के सूबेदार दौलत खा से इब्राहिम की कुछ अनबन हो गई , जिस से दौलत खा ने बाबर को दिल्ली पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया 21 अप्रैल 1526 को पानीपत की पहली लड़ाई में बाबर ने इब्राहिम को हराकर दिल्ली पर अधिकार कर  लिया और भारत में मुग़ल साम्राज्य की नीव रखी यद्दपि  बाबर का शासन केवल चार साल ( 1526 -- 1530 ) रहा , पर इस बीच उस ने देश में अनेक भवनों का निर्माण कराया
बाबर की मृत्यु के बाद उस का पुत्र हुमायु गद्दी पर बैठा , हुमायु ने पुराने किले और फिरोजशाह कोटला के मध्य दीनपनाह नामक एक बस्ती बसाई , जिसे ध्वस्त कर शेरशाह सूरी ने पुराना किला नामक दिल्ली की छठवी बस्ती बसाई , हुमायु का उतराधिकारी अकबर (1566-- 1605 ) और अकबर का जहागीर ( 1605 -- 1627 ) यद्यपि  इन दोनों ने बाबर और हुमायु की तरह आगरा को ही अपने शासन संचालन का केंद्र बनाया किन्तु दिल्ली और उस के आसपास के इलाको के विकास में भी योगदान दिया , बाद में अकबर ने आगरा और फतहपुर सिकरी को छोड़ कर  दिल्ली में ही डेरा डाल लिया |
यही प्रवृति शाहजहा की भी रही , उसने 1639 में दिल्ली में शाहजहानाबाद बसा कर  उसे राजधानी बनाया आजकल यह '' पुरानी दिल्ली '' के नाम से प्रसिद्ध है , यह दिल्ली की सातवी बस्ती है , जो कश्मीरी गेट , लाहौरी गेट और लालकिले के मध्य का क्षेत्र है |
1658 में औरंगजेब दिल्ली का शासक बना , उस ने 1707 तक दिल्ली पर राज्य किया औरंगजेब के बाद बहादुरशाह (1707 -- 12) जहादार्शाह ( 1712 -- 13 ) फरुखशियार ( 1713 -- 19 ), रफ़ी -- उद- दाराजात ( 1719 ) रफ़ी - उद-  दौला ( 1719 ) और मुहम्मद शाह बगश 1719 --48 ने दिल्ली की गद्दी संभाली
इसी दौरान 1739 में नादिर शाह ने दिल्ली पर हमला कर  दिया , उस ने मुहम्मद बगश को बंदी बना कर  दिल्ली में 57 दिनों तक भारी लूटपाट की , वह अपने साथ लगभग 70 करोड़ का माल लुटा , जिस में कोहिनूर हीरा तथा शाहजहा द्वारा लगभग एक करोड़ रुपयों की लागत से बनवाये गये तख्ते ताउस '' भी शामिल थे
1748 में मुहम्मद शाह की मृत्यु के बाद अहमदशाह सम्राट बना , वह एक अयोग्य शासक था इसीलिए1754 में उसे गद्दी से उतार कर  उस की आँखे फोड़ दी गयी तब जहादर शाह का पुत्र अजिजुद्दौला आलमगीर दितीय के नाम से बादशाह बना 1757 में अहमदशाह अब्दाली ने दिल्ली पर आक्रमण किया तथा यहाँ अपना प्रतिनिधि नजीबुद्दौला को नियुक्त किया |
1757 से 1857 तक दिल्ली में शासको का प्राय: स्थायित्व नही रहा जो भी राजा बना , वह आपसी संघर्ष का शिकार हुआ जिस का दुष्परिणाम यह हुआ की 1803 में लार्ड लेक के नेतृत्व में दिल्ली पर अंग्रेजो का अधिकार हो गया और मुगल सम्राट शाह आलम की रक्षा का भार भी अंग्रेजो ने ले लिया
1806 में शाह आलम की मृत्यु के बाद उस के बेटे अकबर द्दितीय  (1806 -- 37 ) और उसके बाद बहादुरशाह द्दितीय ( 1837 -- 57) को गद्दी पर बैठाया गया , ये दोनों शासक ब्रिटिश सरकार के पेंशनधारी होने के कारण नाममात्र के ही सम्राट थे , एक तरह से उन के साम्राज्य की सीमा लाल किले तक ही सीमित  थी |
प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दौरान भारतीय सैनिको की तीन टुकडियो ने 11मई 1857 को दिल्ली से मेरठ पहुंच कर अंग्रेजो को खदेड़ दिया और बहादुरशाह को भारत का सम्राट घोषित कर दिया , किन्तु 21 सितम्बर 1857 को अंग्रेजो ने दिल्ली पर पुन: कब्जा कर  लिया | और बहादुरशाह के पुत्र को मार दिया, बहादुरशाह जीनत महल और जवानबख्त  को नजरबंद क्र के रंगून भेज दिया जहा 1862 में बहादुरशाह का देहांत हो गया , अन्य विद्रोहीयो को चांदनी चौक पर फाँसी दे दी गयी | 1876 में रानी विक्टोरिया ने केसर - ए - हिंद ( भारत की साम्राज्ञी ) की उपाधि धारण की , इस अवसर पर लार्ड लिटन ने दिल्ली में एक बड़ा दरबार आयोजित किया , तब सभी भारतीय रियासतों के शासको को महारानी के प्रति सत्यनिष्ठा की शपथ  दिलाई गयी |
1911 में अंग्रेजो ने कलकत्ता के बदले दिल्ली के दक्षिण में बसी नई दिल्ली को राजधानी बनाया 1911 में ही यहाँ इंग्लैण्ड के राजा की ताज पोशी हुई 1911 से 1947 तक दिल्ली अंग्रेजो के शासन में रही 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता के समय सत्ता हस्तांतरण दिल्ली स्थित संसद भवन में ही हुआ था | स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व उत्तर प्रदेश के शासन में था , स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह चीफ कमिश्नर द्वारा शासित प्रदेश बना , शीघ्र ही संविधान के अनुसार दिल्ली को '' सी '' श्रेणी का राज्य बनाने का आन्दोलन शुरू हुआ फलत: 1952 में यह '' सी '' श्रेणी  का राज्य बन गया |
कुल मिलाकर दिल्ली प्राचीनकाल से लेकर अब तक राजनितिक उथलपुथल का केंद्र तो रही है , दिल दहलाने वाली घटनाए भी होती रही है | हम वीर और साहसी होते हुए भी क्यों दुश्मनों से मात खाते रहे , क्या प्राचीनकाल से अब तक हम अपने पराजयों का कभी विश्लेषण किया है  और क्या आगे करेंगे |

-सुनील दत्ता
आभार ....स , विश्वनाथ

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

कारपोरेट राज के भंडाफोड़ से कांग्रेस और भाजपा दोनों को गुस्सा आया।

दूसरी ओर,जो आरोप केजरीवाल ने लगाये हैंए उनमें नया कुछ भी नहीं है।जल जंगल जमीन और आजीविका से बहुसंख्य जनता को बेदखल करकेए उत्पादन प्रणाली को तहस नहस करके, उत्पादक जनसमूहों के कत्लेआम के जरिये प्रकृतिक संसाधनों की बंदरबांट के सिद्धांत पर आजादी के तुरंत बाद से कारपोरेट राज जारी है। पूंजी के इस खुल्ला खेल फर्ऱूखाबादी के खिलाफ आजतक कोई प्रतिरोध नहीं हुआ। भंडाफोड़ करने की रघुकुल रीति चली आयी, पर उसका क्या अंजाम हुआ केजरीवाल अपने गुरिल्ला युद्ध को किस अंजाम तक कैसे लि जायेंगे, इसका अभी​खुलासा नहीं है। इसके बावजूद सत्तवर्ग का एकजुट होकर उनके खिलाफ मोर्चा खोलना हैरतअंगेज है। क्या कहीं कुछ टूटने लगा है? केजरीवाल और प्रशांत भूषण के आरोपों के जवाब में भाजपा प्रवक्ता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि केजरीवाल टीम हिट एंड रन ;वार करो और फरार हो जाओ की मासिक मंडी और साप्ताहिक बाजार बनकर रह गई है। रंजन भट्टाचार्य और नीरा राडिया के ऑडियो के बाबत कोई टिप्पणी करने से उन्होंने इनकार कर दिया।

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

केजरीवाल ने रिलायंस को केजी बैसिन का आबंटन रद्द करने की मांग की है।अरविंद केजरीवाल ने इस बार मशहूर उद्योगपति और रियायंस इंडस्ट्री के मुकेश अंबानी को निशाने पर लिया।रिलायंस इंडस्ट्रीज में 2017 तक शेयर मूल्य के हिसाब से 100 अरब डॉलर की हैसियत की कंपनी बनने की क्षमता है।अरबपति और रिलायंस इंडस्ट्रीज के मुखिया मुकेश अंबानी देश के सबसे धनी व्यक्ति हैं। हालांकि उनका नेटवर्थ पिछले एक साल में 1ण्6 अरब डॉलर कम होकर 21 अरब डॉलर रहाए लेकिन इसके बावजूद वह दूसरे पायदान पर रहे लक्ष्मी मित्तल से आगे हैं। केजरीवाल ने आरोप लगाए हैं कि सरकार ने मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज को 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का फायदा पहुंचाया है।भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी और गांधी परिवार के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर सवाल खड़े करने के बाद अरविंद केजरीवाल ने बुधवार को प्रेसवार्ता कर भारत की दिग्गज कार्पोरेट कंपनी रिलायंस पर सवाल खड़े किए।केजरीवाल ने एक बार फिर चौंकाया और निशाने पर लिया देश के सबसे बड़े बिजनेसमैन मुकेश अंबानी को। केजरीवाल ने अंबानी की कंपनी रिलायंस को मिले केजी बेसिन के ठेके और उसमें हुई कथित गड़बड़ियों का मामला उठाया और सरकार के कंपनी के सामने नतमस्तक होने का आरोप मढ़ा। केजरीवाल का कहना है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों मुकेश अंबानी की जेब में हैं। उन्होंने कहा कि बढती महंगाई के लिए उद्योगपति और राजनेता जिम्मेदार हैं। केजरीवाल जब अंबानी पर आरोप लगा रहे थे इसी दौरान उनकी प्रेस कांफ्रेंस में हंगामा हो गया। यह हंगामा सवाल पूछने की बात को लेकर हुआ।कृष्णा.गोदावरी बेसिन यानी केजी बेसिन आबादी से 25 किलोमीटर दूर बंगाल की खाड़ी में बना है। देश की सबसे अमीर शख्सियत मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्री ने यहां से 2008 में तेल निकालना शुरू किया था और इसी के साथ उनकी कंपनी पानी के नीचे से तेल निकालने वाली पहली कंपनी बन गई थी।

इंडिया अगेंस्ट करप्शन के तीन सवाल 

1ण् क्या केजी बेसिन में स्थित गैस सिर्फ रिलायंस की हैघ् जबकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट कह चुका है गैस देश के लोगों की है।
2ण् क्या इस सरकार को देश के उद्योग घराने चला रहे हैं क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह किसी मजबूरी में इन फैसलों पर अमल कर रहे हैं
दो मांग 

1ण् इन खुलासों के साथ ही केजरीवाल ने कहा कि सरकार रिलांयस इंडस्ट्रीज का केजी बेसिन का ठेका रद्द करे।
2ण् गैस निकासी का ठेका नए सिरे से किसी बिजली बनाने वाली सरकारी कंपनियों को दे। 

पेट्रोलियम मंत्रालय ने रिलायंस इंडस्ट्रीज के केजी.डी6 क्षेत्र में हुए खर्च की कैग की लेखापरीक्षा के लिये तय बैठक आगे के लिये टाल दी।कैग ने केजी डी6 गैस ब्लॉक के दूसरे दौर की लेखापरीक्षा शुरु करने के लिये रिलायंस इंडस्ट्रीज और पेट्रोलियम मंत्रालय के साथ शुरुआती बैठक बुलाई थी।इसमें रिलायंस इंडस्ट्रीज के केजी.डी6 क्षेत्र में 2008.09 और 2011.12 में किए गए खर्च की लेखापरीक्षा की जानी है।मामले से जुड़े सूत्रों ने बताया कि मंत्रालय ने 29 अक्टूबर को सभी पक्षों को पत्र लिखकर बैठक स्थगित होने के बारे में सूचित किया।बताया जाता है कि यह बैठक इसलिए स्थगित की गईए क्योंकि कैग के ऑडिट की प्रकृति और दायरे को लेकर मतभेद थे।रिलायंस ने यह लिखित आश्वासन मांगा था कि कैग की लेखापरीक्षा केवल उत्पादन भागीदारी करार ष्पीएससीष् के तहत सिर्फ बहीखातों और रिकार्ड तक सीमित होगी।कंपनी को पीएससी के तहत लेखा प्रक्रियाओं की धारा 1ण्9 से अलग कोई दस्तावेज उपलब्ध कराने को नहीं कहा जाएगा और न ही किसी तरह का स्पष्टीकरण मांगा जाएगा।
इसके साथ ही कंपनी ने यह शर्त भी रखी कि लेखापरीक्षा उसके परिसर में होनी चाहिये और रिपोर्ट को पीएससी के तहत पेट्रोलियम मंत्रालय को सौंपा जाएए संसद को नहीं।वहीं दूसरी ओर मंत्रालय ने जोर देकर कहा था कि कंपनी कैग को अपने बही खातों को बिना किसी रुकावट के दिखाए।इसके लंबित रहने तक मंत्रालय ने कंपनी के निवेश प्रस्तावों को मंजूरी रोकी हुई हैण्
सूत्रों ने बताया कि यह बैठक इसीलिए स्थगित की गई ताकि मतभेदों को सुलझाया जा सके।

मंत्रालय ने 23 अक्टूबर को रिलायंस इंडस्ट्रीज को पत्र लिखकर कहा था कि कैग कंपनी के प्रदर्शन का ऑडिट नहीं करेगा और निगरानी समिति ने पहले ही कंपनी के विकास प्रस्तावों को मंजूरी दे दी है।सूत्रों ने हालांकिएबताया कि केजी.डी6 ब्लाक में 2010.11ए 2011.12 और 2012.13 के लिए सालाना पूंजीगत खर्च के प्रस्ताव को अभी तक मंजूर नहीं किया गया है। केजी.डी6 ब्लॉक पर प्रबंधन समिति ने 7 अगस्त को पिछले तीन साल के लिए निवेश प्रस्ताव को मंजूर किया हैए लेकिन अभी तक इस प्रस्ताव पर दस्तखत नहीं हुए हैं।

दो साल के लंबे इंतजार के बाद रिलायंस इंडस्ट्रीज को कृष्णा गोदावरी ख्केजी, बेसिन में 1ण्53 अरब डॉलर और निवेश करने की सरकार से मंजूरी मिल गई है। इस राशि का इस्तेमाल डी6 ब्लॉक के आसपास के चार क्षेत्रों के विकास में होगा। इससे इन क्षेत्रों से रोजाना एक करोड़ 36 लाख घनमीटर गैस का उत्पादन हो सकेगा।

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री आरपीएन सिंह ने गुरुवार को लोकसभा में यह जानकारी दी। इनमें डी2ए डी6ए डी19 और डी22 क्षेत्र शामिल हैं। यहां से वर्ष 2016 के मध्य तक गैस उत्पादन होने लगेगा। इन चार क्षेत्रों में 617 अरब घन मीटर गैस का भंडार है। यहां से आठ साल तक उत्पादन हो सकेगा। केजी.डी6 ब्लॉक की निगरानी समिति ने 3 जनवरी को इस निवेश योजना को मंजूरी दी। इस समिति में पेट्रोलियम मंत्रालय और हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय के अधिकारी शामिल हैं।

इन क्षेत्रों में ब्रिटेन की बीपी और कनाडा की निको रिसोर्सेज भी रिलायंस की भागीदार हैं। इस नए निवेश से केजी.डी6 ब्लॉक में घटते उत्पादन को संभाला जा सकेगा। पिछले 18 महीने में डी6 ब्लॉक के उत्पादन में 40 फीसदी की कमी आई है। यहां से फिलहाल 3ण्4 करोड़ घन मीटर गैस का रोजाना उत्पादन हो रहा है। पूर्व योजना के मुताबिक अब तक यहां से रोजाना आठ करोड़ घन मीटर गैस का उत्पादन होना था।

सरकार ने जब से सबसिडी वाले सिलेंडरों की गिनती तय कर दी हैए तब से लोग इसी कोशिश में हैं कि किसी तरह उन्हें कम कीमत पर अधिक सिलेंडर मिल पाएं। हालांकि कई कुछ राज्यों में सस्ते सिलेंडरों की गिनती छह से नौ कर दी गई हैए पर कुछ राज्यों में लोगों को महंगी एलपीजी से ही गुजारा करना पड़ेगा। ऐसे में इन लोगों के लिए यह खबर खुशखबरी साबित हो सकत है।सूत्रों से जानकारी मिली है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज की घरेलू रसोई गैस के रिटेल कारोबार में उतरने की तैयारी में है। सूत्रों के मुताबिक अनसब्सिडाइज्ड एलपीजी मार्केट में पकड़ बनाने के लिए रिलायंस इंडस्ट्रीज आकर्षक कीमतें तय करेगी। गुजरात और महाराष्ट्र से कंपनी एलपीजी कारोबार शुरू करेगी। कंपनी के पास बाजार भाव पर 200.300 रुपये का मार्जिन है।


कारपोरेट राज का यह आलम भी देखिये।जानकारी मिली है कि जीएएआर को 1 और साल के टाला जा सकता है। जीएएआर को पहले ही वित्त वर्ष 2014 तक टाला जा चुका है।सूत्रों के मुताबिक सरकार वित्त वर्ष 2015 से जीएएआर लागू करने का मन बना रही है। माना जा रहा है कि शोम कमेटी ने जीएएआर को 3 साल के लिए टालने की सिफारिश की थी। मामले पर गुरुवार को सरकार अंतिम फैसला सुना सकती है।पुरानी तारीख से टैक्स वसूलने को लेकर शोम कमेटी में मतभेद हो गया है। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिर कई सदस्य इस कानून के पक्ष में नहीं हैं।शोम पैनल में पिछली तारीख से टैक्स वसूलने को लेकर मतभेद हो गए हैं। सूत्रों के मुताबिक कई सदस्य पिछली तारीख से टैक्स वसूली के पक्ष में नहीं हैं। सूत्रों का ये भी कहना है कि सदस्य रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स लागू करने के पक्ष में नहीं हैं। रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स लागू करने के फैसले पर सहमति नहीं बन पा रही है।सूत्रों के मुताबिक वैलिडेशन क्लॉज पर कल चर्चा हो सकती है। पुरानी तारीख से टैक्स वसूली पर अंतिम फैसला वित्त मंत्री लेंगे।वित्त वर्ष 2013 की पहली छमाही खत्म हो गई है। इस दौरान बाजार में अच्छी तेजी जरूर देखने को मिली। तेजी के इस दौर में बाजार के 6ए000 तक जाने की उम्मीद जताई जाने लगी। हालांकि अब बाजार पर दबाव दिख रहा है और निफ्टी के 6ए000 तक पहुंचने के आसार नहीं दिख रहे हैं। लिहाजा बाजार के दिग्गज जानकार वित्त वर्ष 2014 में बाजार में जबर्दस्त तेजी आने की उम्मीद जता रहे हैं।

रिजर्व बैंक ने मंगलवार को मौद्रिक नीति की मध्यावधि समीक्षा में नकद आरक्षित अनुपात ;सीआरआरद्ध में 0ण्25 फीसदी की कटौती कीए लेकिन रेपो और रिवर्स रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया गया। आरबीआई के इस कदम से कर्ज का बोझ कुछ कम होने की उम्मीद लगाए बैठे लोगों को तो निराशा हुई ही हैए साथ ही केंद्रीय वित्त मंत्री पीण् चिदंबरम भी खासे खफा नजर आ रहे हैं।आगामी 3 नवंबर से सीआरआर 4ण्50 से 4ण्25 फीसदी हो जाएगा। आरबीआई के ऐलान के बाद ही बैंकों ने साफ संकेत दे दिया कि हाल.फिलहाल कर्ज सस्ता होने की संभावना नहीं है। इस बीचए चिदंबरम ने कहा कि महंगाई जितना ही महत्व आर्थिक विकास को भी दिया जाना चाहिए। आर्थिक विकास भी एक चुनौती है और अगर विकास के लिए सरकार को अकेले ही आगे बढ़ना होगा तो हम अकेले ही बढ़ेंगे।आरबीआई ने भले ही महंगाई का हवाला देते हुए रेपो रेट को यथावत रखा होए लेकिन वित्त मंत्री पीण् चिदंबरम उसके इस तर्क से कतई सहमत नहीं हैं। चिदंबरम ने मंगलवार को यहां कहाए श्महंगाई को काबू में रखना जितनी बड़ी चुनौती हैए उतना ही बड़ा चैलेंज विकास भी है।श् इसके साथ ही वित्त मंत्री ने कुछ कठोर लहजे में कहाए श्अगर जरूरत पड़ी तो सरकार अकेले ही इस चुनौती का सामना करने के लिए निकल पड़ेगी।श्मौद्रिक नीति की समीक्षा पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए चिदंबरम ने कहाए श्सरकार साफ.साफ शब्दों में यह संदेश दे रही है कि वह सरकारी खजाने की हालत दुरुस्त करने और राजकोषीय घाटे पर अंकुश लगाने की दिशा में अग्रसर है। मुझे उम्मीद है कि फिस्कल कंसोलिडेशन को लेकर सरकार द्वारा जताई जा रही प्रतिबद्धता को हर कोई समझने की कोशिश करेगा।श्मौद्रिक नीति का आगे जिक्र करते हुए उन्होंने कहाए श्मैंने इस स्टेटमेंट के अंत में लिखे कुछ पैराग्राफ नहीं पढ़े हैं। हालांकिए अगर उनमें भविष्य को लेकर उम्मीदें जाहिर की गई हैं तो मैं उस आने वाले समय को ध्यान में रखूंगा।श् वित्त मंत्री ने यह टिप्पणी संभवतरू मौद्रिक नीति के उस पैराग्राफ को ध्यान में रखकर की है जिसमें कहा गया है कि अंतिम तिमाही में रेपो रेट घटाया जा सकता है।

अरविंद केजरीवाल ने प्रेस कांफ्रेंस में नीरा राडिया के टेप भी सुनवाए। उन्होंने नीरा राडिया और रिश्ते में पूर्व प्रधानमंत्री के दामाद रंजन भट्टाचार्य के बीच हुई बातचीत का टेप सुनवाया। इस टेप में नीरा राडिया और रंजन यह बात कर रहे हैं कि मंत्री वही बनेगा जिसे अंबानी परिवार चाहेगा। भट्टाचार्य ने कांग्रेस के बारे में टिप्पणी करते हुए कहा. कांग्रेस तो अपनी ही दुकान है। हालांकि अरविंद केजरीवाल ने सिर्फ कांग्रेस पर ही निशाना नहीं साधा बल्कि भाजपा को भी रिलायंस के हाथों बिका हुआ बताया। अरविंद केजरीवाल ने कहा कि भाजपा सरकार के वक्त अनुचित फायदा पहुंचाकर रिलायंस को गैस ब्लॉक दिए गए। गौरतलब है कि साल 2000 में रिलायसं को केजी बेसिन का ठेका मिला था। रिलायंस पर आरोप लगाते हुए अरविंद केजरीवाल ने कहाए श्सरकार को ब्लैकमेल करने के लिए रिलायंस ने गैस का उत्पादन कम कर दिया। रिलायंस ने सरकार को मजबूर करके अपनी पसंद के लोगों को मंत्री बनवाया ताकि देश में गैस के दाम बढ़ाए जा सके।श्

अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री पर पद का दुरुपयोग कर मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज को फायदा पहुंचाने का आरोप लगाया है। केजरीवाल के मुताबिक पहले भाजपा नीत राजग सरकार ने इस कंपनी को फायदा पहुंचाने वाली शर्तो पर इसे प्राकृतिक गैस का ठेका दिया। इसके बाद कांग्रेस नीत संप्रग सरकार ने पहले से तय दर में वृद्धि कर दी। अरविंद ने रिलायंस पर गैस की जमाखोरी का आरोप भी लगाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस.भाजपा दोनों मुकेश अंबानी की जेब में हैं। ऐसा लगता है देश को मुकेश अंबानी ही चला रहे हैं।

केंद्रीय मंत्रिपरिषद में रविवार को हुए फेरबदल पर उन्‍होंने पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री जयपाल रेड्डी को पद से हटाए जाने पर सवाल खड़ा किया है। केजरीवाल ने रेड्डी का पक्ष लेते हुए कहा क्‍या सरकार ने ईमानदार रेड्डी को पद रिलायंस को खुश करने के लिए हटायाघ्जयपाल रेड्डी के स्‍थान पर अब वीरप्पा मोइली नए पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हैं तो अब क्‍या एलपीजी और बिजली की कीमतें फिर बढ़ेंगी। जयपाल रेड्डी को ईमानदार होने की सजा मिलीए सलमान खुर्शीद भ्रष्‍ट हैं इसलिए उन्‍हें प्रमोशन दिया गया। उन्‍होंने इस फेरबदल पर ट्विट किया और बोल भ्रष्‍ट मंत्रियों को प्रमोशन दिया गया हैण् उन्‍होंने कहा कि इस फेर बदल से कोई लाभ नहीं है।

अरविंद केजरीवाल ने कहा कि रिलायंस को एनडीए सरकार ने केजी बेसिन का ठेका दिया था ताकि वह गैस निकालकर देश की जरूरतें पूरी कर सके। ये गैस रिलायंस को साल 2017 तक सवा दो डॉलर प्रति यूनिट बेचनी थी लेकिन 2006 में ही इसके लिए कंपनी ने सवा चार डॉलर प्रति यूनिट मांगे। तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री मणिशंकर अय्यर इसके लिए राजी नहीं थे इसलिए हटा दिए गए और रिलायंस के आदमी माने जाने वाले मुरली देवड़ा को ये मंत्रालय मिला।इसके बाद वर्ष 2007 में तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में अधिकार प्राप्त मंत्रियों के समूह ने रिलायंस के दबाव के आगे झुकते हुए 2014 तक 4ण्25 डॉलर प्रति युनिट के हिसाब से अनुमति दे दी। आज रिलायंस सरकार से इसके लिए सवा 14 डॉलर प्रति यूनिट मांग रही है। रिलायंस की इसी मांग का विरोध करने के चलते पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी को हटाकर वीरप्पा मोइली को मंत्री बनाया गया है।

केजरीवाल ने कहा कि अगर मोइली ने रिलायंस की सवा 14 डॉलर प्रति यूनिट गैस की मांग मान ली तो इस देश में बिजली सात रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से मिलेगी। देश को करीब 43 हजार करोड़ रुपये का नुकसान होगा। अगर जनता को ये मंजूर है तो ठीक है लेकिन अगर नहीं है तो वो इसके खिलाफ खड़ी हो ताकि सरकार मजबूर होकर रिलायंस की मांग ठुकरा दे।
केजरीवाल ने कहा कि केजी बेसिन का ठेका रिलायंस को मिला लेकिन रिलायंस ने जुलाई 2011 में इसका एक हिस्सा ब्रिटिश पेट्रोलियम को 35 हजार करोड़ रुपये में बेच दिया। लेकिन किसी ने सवाल नहीं उठाए और सरकार देखती रही। रिलायंस गैस की जमाखोरी कर रही है ताकि जब सरकार दाम बढ़ा दे तब वो उसे बेचे और फायदा कमाए।

रिलायंस को सरकार को 8 हजार करोड़ यूनिट गैस देनी थी लेकिन उसने दी महज 2 हजार करोड़ यूनिट। रिलायंस ने गैस प्रोडक्शन जानबूझकर घटा दी। उसने 2009 से गैस का उत्पादन तय सीमा से एक तिहाई कर दिया। केजरीवाल ने कहा कि इसकी वजह से गैस आधारित बिजली घरों को बंद करना पड़ा।

केजरीवाल ने कहा कि जब जयपाल रेड्डी ने रिलायंस की कारगुजारियों के खिलाफ आवाज उठाई और 7000 करोड़ रुपये के जुर्माने का नोटिस भेजा तो उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ा। मुकेश अंबानी के दबाव में रेड्डी को मंत्रालय से हटा दिया गया।

कांग्रेस ने आज अरविंद केजरीवाल के आरोपों को ष्निराधारष् बताते हुए खारिज किया और पलटवार करते हुए इंडिया अगेंसट करप्शन की फंडिंग स्रोत को लेकर सवाल उठाए। केजरीवाल ने आरोप लगाया कि संप्रग सरकार मुकेश अंबानी का पक्ष ले रही है।कांग्रेस महासचिव बीके हरिप्रसाद ने संवाददाताओं को कहाए ष्यह निराधार है। आजकल आईएसी के लिए आरोप लगाना फैशन हो गया है। आपके पास फंड कहां से आ रहे हैंघ् आईएसी को फंड कौन दे रहा हैघ् रामलीला मैदान से लेकर इस संवाददाता सम्मेलन तक यह फोर्ड फाउंडेशन है।ष् भाजपा और केजरीवाल के बीच गठजोड़ की बात कहते हुए हरिप्रसाद ने सवाल कियाए ष्वह उन प्रदेशों में क्यों नहीं जा रहे जो आंकठ भ्रष्टाचार में डूबे हैं। उन्हें दूसरों पर आरोप लगाने से पहले अपने ऊपर लगे आरोपों पर सफाई देनी चाहिए।ष्उन्होंने कहाए ष्अगर सरकार को मुकेश अंबानी चला रहे हैं तो आईएसी को विदेश में बैठे लोग चला रहे हैं।ष् उन्होंने आरोप लगाया कि अरविंद केजरीवाल मीडिया को आकर्षित करने के लिए ऐसा कर रहे हैं।

भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के कारोबार की गड़बडिय़ां उजागर होने के बाद अब इंडिया अगेंस्ट करप्शन के नेता अरविंद केजरीवाल भाजपाइयों के निशाने पर हैं। मध्यप्रदेश भाजपा अध्यक्ष और पार्टी के राष्ट्रीय मुखपत्र कमल संदेश के संपादक प्रभात झा ने केजरीवाल के पीछे विदेशी करेंसी का खेल होने की आशंका जताई है। कमल संदेश के ताजा अंक में झा ने संपादकीय में तल्ख भाषा का इस्तेमाल करते हुए केजरीवाल और उनकी टीम को कुकुरमुत्तों जैसे शब्द से संबोधित किया है।तो दूसरी ओरएप्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता अभय दुबे ने केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे को लिखे एक पत्र में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया के एनजीओ को मिली विदेशी सहायता की जांच की मांग की है। दुबे ने उनके एनजीओ को मिली विदेशी सहायता पर सवाल खड़े करते हुए कहा है कि जो विदेशी एनजीओ केजरीवाल और सिसौदिया की मदद करते हैंए उनकी गतिविधियां संदिग्ध हैं।गडकरी को दूसरा कार्यकाल मिलने की संभावना के साथ ही झा भी दूसरा कार्यकाल मिलने की उम्मीद कर रहे थे। पार्टी भले ही गडकरी के बचाव की मुद्रा में होए लेकिन संघ के हाथ खींच लेने से संगठन चुनाव असमंजस से घिर गए हैं। झा के संपादकीय को पार्टी में गडकरी के समर्थन में मुहिम के तौर पर देखा जा रहा है। झा ने कहा है कि केजरीवाल का खेल करेंसी का है।डाण्मनमोहन सिंह को यह पता लगाना चाहिए कि यह करेंसी भारत की है या फिर भारत को कमजोर करने वाली शक्तियों की। झा ने गडकरी को केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार की क्लीन चिट को केजरीवाल के मुंह पर करारा तमाचा बताया है। झा ने केजरीवाल को ब्लैकमेलरए अन्ना के साथ विश्वासघात करने वाला बताते हुए लिखा कि केजरीवाल की चाहत पिटने की हैए ताकि जनता का भावनात्मक समर्थन मिलने लगे। झा यहीं नहीं रुके उन्होंने न्यूज चैनलों के बारे में कहा कि उन्होंने कुकुरमुत्तों को मुंह लगाकर अपना कीमती समय बर्बाद किया और जनता को भी गुमराह किया।

अनिल अंबानी की अगुआई वाले रिलायंस समूह ने एक बार फिर मध्य प्रदेश को मोटे निवेश का भरोसा दिलाया है। अपनी विस्तार योजना की घोषणा करते हुए कंपनी ने कहा कि वह राज्य में अपने कुल निवेश के आंकड़े को 30ए000 करोड़ रुपये के मौजूदा स्तर से बढ़ाकर 50ए000 करोड़ रुपये के पार पहुंचा देगी। रिलायंस समूह के अध्यक्ष अनिल अंबानी ने प्रदेश सरकार के आयोजित वैश्विक निवेशक सम्मेलन में कहाए श्हम अगले कुछ साल के  दौरान प्रदेश में कोयला खननए बिजली उत्पादन और सीमेंट निर्माण के क्षेत्र में 50ए000 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश करेंगे।श् उन्होंने बताया  कि  रिलायंस समूह प्रदेश में इन तीनों क्षेत्रों में 30ए000 करोड़ रुपये की परियोजनाओं पर आगे बढ़ रहा है। अंबानी ने बतायाए श्हमारी कोयला खनन परियोजना का पहला चरण शुरू हो चुका है। हम अपने सासन संयंत्र में 660 मेगावॉट बिजली उत्पादन जल्द शुरू कर देंगे।बिना किसी खास एजंडे के केजरीवाल के इस गुरिल्ला युद्ध पर बीबीसी ने मौजूं सवाल किया है।कौन है केजरीवाल का अगला निशाना देखें
सोनिया गाँधी के दामाद क्लिक करें रॉबर्ड वाड्रा , विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद और भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी के बाद क्लिक करें अरविंद केजरीवाल का अगला निशाना कौन होगा और उसका संबंध किस पार्टी के साथ होगा बुधवार को अपनी प्रेसवार्ता से कुछ घंटे पहले इंडिया अगेंस्ट करप्शन सदस्य अरविंद केजरीवाल ने अपने ट्वीट में कहा,आज के पर्दाफाश को देखें ये बहुत बड़ा हो सकता जब अरविंद केजरीवाल ने क्लिक करें रॉबर्ड वाड्रा के खिलाफ डीएलएफ के साथ मिलकर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था तब विपक्षी भाजपा ने जाँच की तो मांग की थी लेकिन बहुत शोर.शराबा नहीं मचाया.

-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

साम्रज्यवाद परस्त नीतियों के कारण डॉ. सुनीलम को जेल

अन्नदाता कहा जाने वाला और खुद को भूखा रख कर दूसरे का पेट भरने वाला किसान बदहाल ही नहीं, बदनाम भी है। जब बिमारियों और सूखे से बच कर फसल अच्छी हो जाए तो बाजार में उसके खरीदार नहीं होते। किसान औनेपौने दामों पर फसल बेचने के लिए मजबूर होते हैं जिससे उसकी लागत भी नहीं निकल पाती है। प्राकृतिक कारणों से फसल बर्बाद हो जाती है जिससे किसानों का खर्च किया हुआ पैसा भी डूब जाता है और किसान कर्ज के जाल में फंसता चला जाता है। इस तरह किसान दोनों तरफ से मारा जाता है फसल अच्छा हो तब भी, बर्बाद हो जाये तब भी। नई आर्थिक नीति के बाद से करीब 2.5 लाख (गैर सरकारी आंकड़ें इससे कहीं अधिक है) किसान कर्ज में डूब कर आत्महत्या करने के लिए मजबूर हुए हैं। जब किसान संगठित होकर अपने नुकसान या फसल का उचित मूल्य मांगता है तो अपने को ॔किसान हितैषी’ कहने वाली सरकार या अपने को किसानों के घर का बताने वाले मंत्री उनकी जायज मांग को अनसुना कर देते हैं। उनकी समस्या का समाधान उनको लाठीडंडों से पीट कर, झूठे केसों में फंसाकर दिया जाता है। कई बार तो उनके ऊपर गोली चालन कर के उनके उचित मांग का जबाब दिया जाता है।
मुलताई की घटना
म.प्र. के बैतूल जिले के मुलताई तहसील में 12 जनवरी 1998 को ऐसी ही घटना घटी जिसमें किसानों की मुआवजे की मांग का जबाब गोलियों से दिया गया जिसमें 24 किसानों की मृत्यु हो गई तथा 150 किसान घायल हो गये। मुलताई तहसील घेरने की सूचना पहले से प्रशासन को थी। किसान पिछले कुछ महीनों से फसल खराब होने की मुआवजे की मांग को लेकर आन्दोलन कर रहे थे। वे कई बार जिला तथा तहसील स्तर पर अपनी मांग का ज्ञापन प्रशासन को भी दिये। 12 दिसम्बर 1997 को किसानों ने श्री टंटी चौधरी के नेतृत्व में ज्ञापन सौंपा। 18 दिसम्बर 1997 को पुनः ज्ञापन सौंपा गया और 7 दिन के अन्दर कर्रवाई न होने की स्थिति में आन्दोलन की चेतावनी दी गई । किसानों ने 25 दिसम्बर 1997 को मुलताई तहसील प्रांगण में एक बैठक बुलाई जिसमें किसान संघर्ष समिति का गठन किया तथा तहसील प्रांगण में हजारों किसान अनिश्चितकालिन धरने पर बैठ गये। लगातार 12 दिन के धरने के बाद सुनवाई न होने पर किसानों ने 7 जनवरी को निर्णय लिया कि 9 जनवरी 1998 को मुलताई तहसील से बैतूल जिला कलक्टर तक रैली निकालेंगे, 11 जनवरी, 1998 को मुलताई तहसील में चक्का जाम करेंगे तथा 12 जनवरी, 1998 को मुलताई तहसील को घेरेंगे। 8 जनवरी, 1998 को पुलिस ने शांतिपूर्ण धरना दे रहे किसानों को रात में धरना स्थल से भगा दिया, उसके बाद भी मुलताई के 75 हजार किसानों ने बैतूल जिले तक शांतिपूर्ण रैली निकाली। जिलाधीश ने पुलिस ग्राउण्ड में आकर 400 रुपये प्रति एकड़ मुआवजा देने की बात कही जिसे किसानों ने हाथ खड़ा कर अस्वीकार कर दिया। 11 जनवरी, 1998 को मुलताई तहसील में चक्का जाम हुआ जिसे 450 गांव के किसानों ने सफल बनाया। पुलिस और कांग्रेस के गुण्डों द्वारा बसों में तोड़फोड़ कराकर आन्दोलनरत किसानों पर फर्जी मुकदमें लगाये गये और किसान संघर्ष समिति के छः नेताओं को गिरफ्तार किया गया। 12 जनवरी को पुलिस ने तहसील घेराव को रोकने का प्रयास नहीं किया और जब किसान एकत्रित होकर अपनी मांगों के लिए नारे लगा रहे थे तब पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दिया, जिसमें 24 किसान शहीद हो गए तथा 150 किसान घायल हुए। पुलिस पर कार्रवाई करने के बदले गोली चालन के बाद 250 किसानों पर 66 मुकदमें दर्ज किए गए। उस समय म.प्र. के उप मुख्यमंत्री सुभाष यादव ने कहा था कि एसपी और कलक्टर पर हत्या का मुकदमा दर्ज हो। यही मांग कांग्रेस के केन्द्रीय पर्यवेक्षक बलराम जाखड़ ने भी रखी। सभी न्याय पसंद बुद्धजीवि व सामाजिक संगठनों ने दोषी पुलिस अधिकारियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग की। भाजपा ने इस कांड को जालियांवालाबाग हत्यकांड से तुलना की थी। उमा भरती ने मुख्यमंत्री बनने के बाद सभी मुकदमें वापस लेने की बात कही थी। उसके बाद से म.प्र. में करीब 1 लाख 76 हजार मुकदमें, जो कांग्रेस सरकार ने भाजपा कार्यकर्ताओं पर लगाये थे , वापस लिये गये लेकिन मुलताई प्रकरण से जुड़ा मुकदमा वापस नहीं लिया गया। न्याय के आश में 20 आरोपित किसानों की मौत हो चुकी है तथा 15 आरोपित किसान 70 वर्ष से अधिक के हो चुके हैं। इसी प्रकरण में 18 अक्टूबर, 2012 को बैतूल जिला के प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश एस.सी. उपाध्याय ने डॉ. सुनीलम के साथसाथ दो लोगों शेषराव व प्रहलाद अग्रवाल, को हत्यारा बता कर आजीवन करावास की सजा सुनाई गई।
प्रहलाद अग्रवाल वही व्यक्ति है जो मुलताई में लॉज चलाते हैं और मुलताई गोली कांड की जांच कर रहे एकल जांच आयोग के सामने शपथ पत्र देकर बताया था कि ॔16 जनवरी को मेरी अनुपस्थिति में पुलिस का एक दल लॉज में घुसकर तलाशी लेते रहा तथा मुझे घर से बुलाकर लॉज के कमरा नं. 4 में एक रिवाल्वर एवं कुछ कारतूस गद्दे पर रखकर मुझसे कागजों पर हस्ताक्षर करने को कहा। मुझ पर दबाव डाला गया कि इस कमरे में डॉ. सुनीलम रहते थे एवं ये रिवाल्वर एवं कारतूस उन्हीं के हैं। यह नहीं करोगे तो झूठे मामले में फंसा दिए जाओगे।॔ (देखें समाचार पत्र, लोकमत समाचार, 26 अगस्त 1998)
जिला कोर्ट, बैतूल का फैसला पूरी तरह उसी पुलिसप्रशासन की बयानों पर आधारित है जो खुद उक्त गोलीकांड का दोषी है। कोर्ट ने पुलिस अधिक्षक जीपी सिंह के बयान को सही माना जो कि खुद इस कत्लओम के जिम्मेदार अधिकारी हैं। जीपी सिंह ने अदालत को बताया कि डॉ. सुनीलम ने फायर बिग्रेड के ड्राइवर को नीेचे खींचकर कर पत्थर से मारा। उन्होंने कहा कि पुलिस ने गोली चलाई तथा आन्दोलनकारियों ने गोली चलाई और किसके गोली से कितने मारे गये वह यह नहीं जानते। उस समय कौन उप मुख्यमंत्री थे वे यह भी नहीं जानते। इस तरह अदालत ने गैर जिम्मेदार पुलिस अधिकारी की बात तो मान ली जिसको ये भी नहीं पाता कि उप मुख्यमंत्री कौन था, पुलिस ने कितनी गोली चलाई और पुलिस की गोली से कितने लोग मरे। यह आईपीएस अधिकारी, जो कि 24 किसानों का हत्यारा है, अब आईजी बन चुका है।
दूसरे गवाह जो कि मुलताई के गांव से थे, उनमें से एक गुलाब सिंह हैें, जो कि 12 जनवरी, 1998 को अपने घरेलू कामों से मुलताई आये थे। बस स्टैंड पर खड़े गुलाब सिंह का कहना है कि वे किसी भी पुलिस वाले के साथ मार पीट होते नहीं देखा लेकिन पुलिस वालों को भीड़ पर आश्रु गैस छोड़ते देखा। दूसरा गवाह रामदास किराना का समान लेने मुलताई आये थे। उन्होंने कोर्ट को बताया कि जब वह बस से उतरा तो देखा कि तहसील के पास भीड़ लगी थी। उस भीड़ में पुलिस वालों ने गोली चलाया था और उसे भी गोली लगी थी। अदालत ने गांव वालों के बातों पर गौर नहीं किया जिसमें उन्होंने पुलिस को गोली चलाते हुए और आश्रु गैस के गोले दागते हुए देखा। इस तरह साफ जाहिर है कि अदालत का फैसला पूर्वनियोजित है।
डॉ. सुनीलम और एड0 अराधना भार्गव के ऊपर 22 मई, 2011 को छिन्दवड़ा (म.प्र.) जिले में जिला मुख्यालय से 14 कि.मी. दूर पर जानलेवा हमला किया गया। डॉ. सुनीलम अदानी पावर प्रोजेक्ट लि. और अदानी पेच पॉवर प्रोजेक्ट में 5 गांव की जमीन छिनने का विरोध कर रहे थे। जब वे 2829 मई, 2011 के पदयात्रा को सफल बनाने के लिए भूलामोहगांव से लौट रहे थे तो केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ के गुगोर्ं ने उनके जीप को बोलरो से घेर लिया और लाठी डंडों से पिटाई की। इस हमले के तुरन्त बाद छिन्दवाड़ा एस.पी. को सूचना दी गयी लेकिन 14 कि.मी. की दूरी तय करने में पुलिस को 2.30 घंटे लगा। इस फैसले से यह भी अशंका व्यक्त की जा रही है कि यह न्यायपालिका और कारपोरेट घरानों की मिलिभगत है। डॉ. सुनीलम को जेल में डालकर अदानी पॉवर प्रोजेकट और अदानी पेंच पावर परियोजना के आन्दोलन को कुचलना चाहते हैं।
इसी तरह देश भर में चल रहे जीविका के साधनों, जलजंगल-जमीन को बचाने की लड़ाई को दबाने की साजिश हो रही है। सभी संघषोर्ं के नेताओं और कार्यकर्ताओं को इसी तरह झूठे केसों में फंसा कर जेलों में ठूंसा जा रहा है, गोलियों का निशाना बनाया जा रहा है। ॔आजाद भारत’ में विगत 65 वषोर्ं में अपनी जायज मांग के लिए प्रदर्शन करते हुए करीब 84 हजार बार आन्दोलनकारी पुलिस के गोलियों के निशाना बने हैं लेकिन आज तक एक भी दोषी पुलिस अधिकारी को सजा नहीं हुआ है। हर बार आत्मरक्षा की दुहाई देकर पुलिसप्रशासन अपने को पाक साफ कर लेती है। किसानों से कहीं सेज, कहीं एकस्प्रेस वे तथा विकास के विभिन्न नामों पर जमीन छीना जा रहा है। जब किसान इसका विरोध कर रहे हैं तो उनको झूठे केसों में फंसा कर जेलों में घोर यातनायें दी जाती हैं; उनको दंगा फैलाने वाला अराजक तत्व आदि, आदि नामों से सम्बोधित किया जाता है।
भारत का शासक वर्ग साम्राज्यवाद परस्त नीतियों को लागू करने के लिए भारत की जनता पर क्रुर दमन ब़ाता जा रहा है। भारत के विभिन्न राज्यों में जनता के ऊपर अलगअलग नामों से आपरेशन चलाये जा रहे हैं। यहां तक कि बस्तर में ट्रेनिंग के नाम पर सेना को भी उतारा जा चुका है और आत्मरक्षा के नाम पर वायु सेना को भी फायरिंग करने का अधिकार दे दिया गया है। यह अपनी ही जनता पर अघोषित युद्ध है जो भारत का शासक वर्ग अलगअलग रूप में लड़ रहा है। डॉ. सुनीलम, दयामानी बारला हो या देश के विभन्न जेलों में बंद जलजंगल जमीन को बचाने की लड़ाई लड़ने वाले हों या माओवादी सभी शासक वर्ग की साम्राज्यवाद परस्त नीतियों के शिकार हैं। जिस तरह दयामनी बरला का जमानत होने के बाद दूसरे केश में गिरफ्तार कर लिया गया उसी तरह माओवादी नेता सुशील राय जिनकी उम्र 70 साल है जब भी जमानत होता है दूसरे केशों में उनको गिरफ्तार कर जेल से बाहर नहीं आने दिया जाता है। भारत की मेहनतकश जनता, न्याय पसंद बुद्धिजीवी, छात्र, मजदूर, किसान, महिलाओं को मिलकर इस साम्राज्यवादपूंजीवाद परस्त नीतियों को मुंहतोड़ जबाब देना होगा। इस तरह के जुझारू आन्दोलन से ही डॉ. सुनीलम और उन जैसे लाखों लोगों पर हो रहे अत्याचार से उनको बचाया जा सकता है और लोगों के जीविका के साधन जलजंगल-जमीन की रक्षा हो सकती है।
-सुनील
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