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शनिवार, 13 सितंबर 2014

मोदी अपने मनशूर पर वापिस: कुलदीप नय्यर

   इन्तिखाबी मुहिम के दौरान नरेन्द्र मोदी भारतीय जनता पार्टी को जो हिन्दुत्व नवाज तंजीम है अपनी माँ करार देते हुए आबदीदह हो गए तो मैंने समझा कि गहरे जजबात का इजहार है और जब हिन्दुस्तान का वजीर आजम होने के बाद इन्होंने कहा कि वह तरक्की की राह पर तमाम 125 करोड़ लोगों को अपने साथ लेकर चलेंगे तो मुझे इस पर यकीन आ गया था।
    लेकिन ज्यों-ज्यों पार्टी अपने प्रोग्राम सामने ला रही है तो मुझे लगता है कि आर0एस0एस0 की वजह कर्दा तफरीकी हिकमते अमली की पर्दा पोशी है। मोदी खुद को गैर मुतास्सिब के तौर पर पेश करते हैं जबकि बी0जे0पी0 मय आर0एस0एस0 तक्शीरियत के तख्फ़ीक के इक्दामात करती  है। आर0एस0एस0 पहले ही अपने मोतबर अफराद को मुख्तलिफ कमीशनों की रुक्नियत दे रही है और कलीदी ओहदों पर बैठा रही है। इस से ताल्लुक रखने वाले नवजवानों को कम दर्जे के कामों के लिए मुकर्रर किया जाता है। चूँकि ब्यूरो क्रेसी का झुकाव हवा की रुख की तरफ होता है, बी0जे0पी0 और आर0एस0एस0 को अपने एजेण्डे के नफाज में किसी मजाहिमत का सामना करना नहीं पड़ रहा है।
    साविक वजीर जराअत शरद पवार ने जो महाराष्ट्र के वजीर आला भी थे बजातौर पर तबसरा किया है कि बी0जे0पी0 की फतेह के बाद फिरका वारियत हर जगह सर उभार रही है और मोदी हुकूमत के पहले दो हफ्तों में ही ये हो रहा है। जबकि इसे अभी अपनी पाँच साला मुद्दतकार पूरी करनी है। महाराष्ट्र के एतदाल पसन्द शहर पुणे में जो कुछ हुआ वह बेकाबू हो जाने वाली ताकतों की तरफ इशारा करता है। एक इन्तिहा पसन्द हिन्दू ग्रुप ने शिवाजी और इन्तेहा पसन्द शिवसेना के बानी बाल ठाकरे की अहानत आमेज तस्वीरें इरसाल किए जाने पर 28 साला आई0टी0 मैनेजर मोहसिन शेख को जान से मार डाला। मोहसिन महज मशकूक था और उसके खिलाफ न कोई शहादत थी न सबूत।
    ये सच है कि बी0जे0पी0 ने इस कत्ल की मजम्मत की है लेकिन मोदी के लिए खुद को गैर महफूज समझने वाले मुसलमानों को यह यकीन दिलाने को बेहतरीन मौका था कि इनकी हुकूमत इसका ख़याल रखेगी कि मोहसिन के कातिलों के खिलाफ फौरन कानूनी चारहजोई की जाएगी। यहाँ तक कि जब उनसे खासतौर पर मजलूम के खानदान से हमदर्दी का एक लफ्ज कहने की दरख्वास्त की गई तो भी मोदी ने खामोशी अख्तियार की।
    इस रवैये से हैरत नहीं होना चाहिए। 2002 में गुजरात के वजीर आला की हैसियत से जब बशमूल पुलिस इन्तजामिया की साजबाज से 2000 से ज्यादा मुसलमानों को हलाक किया गया तो मोदी ने इजहार अफसोस नहीं किया। दर हकीकत मोदी ने गुजरात की एक मजिस्ट्रेट अदालत से हासिल कर्दा क्लीन चिट तनकीद करने वालों के मुँह पर मार दी। आज तक इन्होंने अफसोस का इजहार नहीं किया। उनके तास्सुफ के अल्फाज मुसलमानों के अहसासात को तस्कीन देने और तक्सीरियत पर मबनी हिन्दुस्तान के तसव्वुर को तकवियत देने में मुअस्सर होंगे।
    मुझ जैसे अफराद 15 से 16 करोड़ की आबादी पर मुस्तमिल मुस्लिम फिरके को ये यकीन दिलाना चाहते हैं कि इन्हें खायफ होने की जरूरत नहीं है क्योंकि हिन्दुस्तान दस्तूर पर कार बन्द है जो कानूनों की नजर में हर शहरी को मसावात की जमानत देता है। अगर इस फिरके को निशाना बनाया जाता है तो अदालतें, मीडिया और एतदाल पसन्द आवाजंे हैं जो मुसलमानों की हामी हैं। इसका मुजाहिरा उस वक्त देखने में आया जब बाबरी मस्जिद मुन्हदिम की गई और गुजरात में मुस्लिम कश फसादात हुए।
    वह लोग जो रियासत जम्मू व कश्मीर को खुसूसी हैसियत देने वाले आर्टिकल 370 को खत्म करने का मुतालबा कर रहे हैं वही मुस्लिम मुखालिफ अनासिर हैं। आर्टिकल 370 दस्तूरे-हिन्द की तरह 65 साल पुराना है क्योंकि जम्मू व कश्मीर मुस्लिम अक्सरीयत वाली रियासत है, इन अनासिर को मोदी के दौरे हुकूमत मंे इस रियासत की हैसियत पर एतराज उठाने का साजगार माहौल फिर अहम हो गया है। तारीख से वह वाकिफ नहीं हैं और न ही हकायक जानने में इन्हें कोई दिलचस्पी है।
    अगस्त 1947 में बरतानवी तसल्लुत के खात्मे पर रियाया की अक्सरीयत के मजहब के पेशे नजर तकरीबन 560 रजवाड़ो को इस इन्तखाब की आजादी दी गई कि या तो वे हिन्दुस्तान में शामिल रहें या तो तश्कील शुदा पाकिस्तान के साथ हो जाएँ। कोई हुकमरान अगर चाहता तो आजाद भी रह सकता था। जम्मू व कश्मीर के हुक्मराँ महाराजा हरि सिंह ताखीर से हिन्दुस्तानी वफाक में शामिल हो गए, अगरचे इस रियासत की आबादी में मुसलमानों की गालिबअकसरियत थी। मेरा मुशाहिदा यह है कि अगर उसने सब्र से काम लिया होता तो कश्मीर पाकिस्तान में चला जाता लेकिन इसने रियासत के अलहाक के लिए पहले कबायली और फिर बाकायदा फौज को भेजा। अपनी फौज के हाथों कत्ल व खून रोकने की गरज से महाराज ने हिन्दुस्तान के हक में दस्तखत कर दिए। महाराज ने सिर्फ तीन मामलात हिन्दुस्तान को सौंपे। दिफा, खारजी उमूर और मवासिलात। रियासत ने दीगर मामलात अपने पास ही रखे। आर्टिकल 370 इसी मफाहिमत की दस्तावेजी शकल है। अगर हिन्दुस्तान वफाक मजीद मामलात को अपने हाथ में लेना चाहे तो इसका फैसला रियासत जम्मू व कश्मीर के अख्तियार में है। क्योंकि वह इसी शर्त पर वफाक में शामिल हुई थी। रियासत की रजामन्दी के बगैर वफाक मजीद मामलात अपने अख्तियार में नही ले सकता। इसलिए आर्टिकल 370 के खात्मे के मुतालबे को आगे बढ़ाने वाली आर0एस0एस0 का अमल गैर कानूनी है।
      दर हकीकत मामलात इस कदर उलझ गए हैं कि किसी हल तक पहुँचने के लिए तीन फिरको की रजामन्दी जरूरी है। वह हैं हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और जम्मू व कश्मीर के अवाम।
      अगर आज रायशुमारी कराई जाए तो वादीए कश्मीर एक आजाद रियासत की हिमायत में वोट देगी। हिन्दू अक्सरीयत वाले जम्मू के अवाम हिन्दुस्तान में रहना चाहेंगे और लद्दाख जहाँ गालिब अक्सरीयत बौद्धांे की है बराहे रास्त के तहत मरकज के जेरे निगरानी इलाके की हैसियत पाना चाहेगा। इन तमाम मुश्किलों ने मसले को नाकाबिल हल बना दिया है।
     जब आर0एस0एस0 शकाफती तन्जीम होने का दावा करती है तो इसे किसी हालत में भी सियासत बाजी नहीं करनी चाहिए। मुझे याद है कि आर0एस0एस0 के आदमी नाथूराम गोड्से के हाथों महात्मा गांधी के कत्ल के बाद 30 जनवरी 1948 को इस पर पाबन्दी आयद की गई थी। फिर 1949 में आर0एस0एस0 की तरफ से पाबन्दी हटाने की दरख्वास्त के जवाब में उस वक्त के वजीर दाखिला सरदार वल्लभ भाई पटेल और आर0एस0एस0 के दरमियान एक मुअहिदा हुआ जिसमें यह जमानत दी गई कि आर0एस0एस0 किसी सियासी सरगर्मी में शरीक नहीं होगा और यह कि आर0एस0एस0 सिर्फ शकाफ्ती सरगर्मियों में शामिल होगा।
         फिर पटेल ने जो आर0एस0एस0 के वादे से मुतमइन नहीं थे मतालबा किया कि इसमें यह वादा शामिल किया जाय कि वह संघ की तशकील में सियासी सरगर्मियों में हिस्सा नहीं लेगी, मुआहिदे को मुहरबन्द किया जाए और आर0एस0एस0 को हमेशा के लिए सियासी सगर्मियों से रोक दिया जाए। यह 1949 में हुआ था और इसके बाद हुकूमत ने पाबन्दी हटा दी। ताहम एक हैरतनाक बदअहदी यह हुई कि आर0एस0एस0 अपने सरसंघ चालक मोहन भागवत की कयादत में जून 2013 से साबिक आर0एस0एस0 प्रचारक मोदी को हिन्दुस्तान के वजीर आजम के मनसब पर बैठाने के लिए जारिहाना सियासी सरगर्मियो में मुलब्बिस हो गई। नतीजा आपके सामने है।
-कुलदीप नय्यर
लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

नशेमन से धुआँ उठता है तुम कहते हो बादल है

 हालिया पार्लियामानी इन्तखाबात से पहले मुस्लिम तंजीमों और इदारों के सरबराहान में बड़ी इजतराबी कैफियत देखने को मिली थी। हर जानिब से ये आवाज बुलन्द की गई कि किसी सूरत बी0जे0पी0 और मोदी को बरसरे एक्तदार आने से रोका जाए। इस अन्दाज से मोदी के खिलाफ नारे बुलन्द किए गए कि हिन्दू वोटरों का एक बड़ा तबका खामोशी के साथ मुत्तहिद हो गया और मुस्लिम वोटर मुन्तसिर होकर कई खानों में बँट गए। नतीजा यह हुआ कि बी0जे0पी0 अक्सरीयत से जीत गई और मोदी सिर्फ हिन्दुस्तान को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को हैरत में डालकर बाआसानी वजीर आजम बन गए। ऐसे लोग जो हर हाल में किसी भी हुकूमत से करीब तर हो जाना चाहते हैं वह अपनी सियासी मन्तिक को फेल होता देख कर परेशान व बेचैन हो गए, अब खौफ व डर की वजह से उजलत में वजीर आजम मोदी को अपनी हिमायत की खबर पहुँचाना चाहते हैं। चूँकि इन लोगों ने यह अन्दाजा अपने तौर पर कर लिया है कि आइन्दा दस साल तक मोदी एक्तदार उज़मा पर काबिज रहेंगे। गालिबन यही सोच मुस्लिम इदारों के सरबराहान को भी खुद सुपुर्दगी पर मजबूर कर रही है। ताज्जुब की बात यह है कि न किसी ने इनकी हिमायत तलब की है न अब किसी को हुकूमत साजी के लिए मुसलमानों की हिमायत की जरूरत है। रजाकाराना तौर पर अपनी जानिब से हिमायत का एलान किस बात का पैगाम देता है? बेमहल बे मौका और बेजरूरत बातों से सिर्फ कीमत ही नहीं घटती बल्कि बचा बचाया वकार भी बाकी नहीं रहता और इसको हलकापन भी कहा जाता है।
      वजीर आजम मोदी ने अपने इलेक्शन के तकरीरों में और टी0वी0 चैनलों को इंटरव्यू देते हुए बहुत सारे नेकात की तरफ इशारा किया है और कुछ बातें मुस्लिम अवाम के तईं खुल कर की हैं। अभी तो मोदी की ताजपोशी को एक माह भी नहीं गुजरा हम अभी से उतावले होकर खुद को इनके हवाले कर दें, ये कहाँ की अकलमंदी है। इसे खौफ या लालच ही तसव्वुर किया जाएगा। गलती दर गलती यह सियासी सूझ बूझ हरगिज नहीं है। हम हिन्दुस्तानी शहरी हैं। हमारे हुकूक बराबर के हैं। हम किसी के मरहूनेमिन्नत नहीं हैं। हमारे हुकूक की अदायगी में अगर जानिबदारी बरती गई तो हम खामोश नहीं रहेंगे। दस्तूर हिन्द ने हमें जो मुराआत दी हैं इन में अगर किसी तरह की नाइंसाफी की गई तो हमें अपने हुकूक को वागुजार कराने के जायज तरीकों से कोई ताकत रोक नहीं सकती और खुद मोदी ने कहा है कि मैं किसी मखसूस कौम या फिरका का नहीं बल्कि एक सौ पच्चीस करोड़ हिन्दुस्तानियों का चैकीदार और सेवक हूँ। मुझसे किसी को डरने की जरूरत नहीं है। मोदी से कौन डरता है। मुसलमानों में गुजरात के फसाद का गुस्सा जरूर बाकी है। अगर उन्हें इस गुस्से को खत्म करना है तो अपनी गैर जानिबदारी का सबूत पेश करने के लिए ही मसायल हल करें।
    चाहिए तो ये था कि हम अभी खामोश रहकर हुकूमत के रवैये का जायजा लेते क्योंकि पूरा हिन्दुस्तान गुजरात नहीं है। हिन्दुस्तानी मुसलमानों को और इनके मफादात को नजरअंदाज करना या इन पर जबर जुल्म करना कोई आसान बात नहीं है। अगर ऐसा हुआ तो इसके बड़े भयानक नतीजे  बरामद होंगे, हमें मोदी से कोई ज़ाती दुश्मनी नहीं थी न है। बात सिर्फ यह है कि गुजरात में मुसलमानों का जो कत्लेआम हुआ उस वक्त वह खुद वजीर आला थे। इनकी मौजूदगी में जो हुआ इसको रोकना इनका फर्ज मनसवी था जिसे इन्होंने नहीं निभाया। न मुजरिमों को इन्होंने कैफरे किरदार तक पहुँचाया। यही शिकायत और इसी कारकिर्दगी का जख्म आज भी हरा है। इसके बावजूद हमारी बेहिसी और चापलूसी की इन्तिहा देखिए कि मोदी साहब को और इनके करीबी लोगों को जामिया मिलिया और एक दीगर मुस्लिम इदारे में दावत दी जा चुकी है। यह इदारा एक कल्चरल सेन्टर है जिसका सियासत से कोई लेना देना नहीं है वहाँ के जिम्मेदारों में एक होड़ लग गई है कि कैसे मोदी तक पहुँचा जाए। इनके करीबी मुअतमिद हैं जो गुजरात से आकर आजकल दिल्ली में कयाम पजीर हंै। जामिया मिलिया में इनको दावत दी जा चुकी है जबकि इसके बरअक्स मुजफ्फरनगर फसाद के हीरो को वजीर बना दिया गया है। पुणे में एक मुसलमान इंजीनियर को टोपी और दाढ़ी के जुर्म में कत्ल किया गया, अभी तक इस पर खामोशी है कि हिन्दू राष्ट्र सेना पर कब पाबन्दी आयद होगी और कब तक इसको बेलगाम छोड़ा जाएगा। एक तरफ यह एलान है कि हम एक सौ पच्चीस करोड़ अवाम के सेवक हैं दूसरी तरफ अमल यह है कि बेगुनाह मुसलमानों को दसियों साल तक जेल में बन्द करके स्कीम बनाने वाला आई0बी0 अफसर अजीत देवल को एन0एस0ए0 बनाया जाता है। दूसरी तरफ बाबरी मस्जिद शहादत के वक्त कल्याण सिंह का होम सेक्रेटरी जो बाद में टी0आई0आई0 का चेयरमैन बना, गैर कानूनी तरीके से कैबिनेट सेक्रेटरी आर्डिनेन्स के जरिये बनाया जाता है। इससे हुकूमत की करनी का तजाद और जहनियत का पता चलता है।
    हमारी जिन्दगी और मौत का मालिक रज्जाक सिर्फ अल्लाह है, यही हमारा ईमान है। ईमान व यकीन को मजबूत करके अपने मौक्किफ पर इस्तकलाल के साथ कायम रहना एक मोमिन की शान है। अगर हमारे साथ अच्छा रवैया रहा और हमारे मजहबी उमूर में बेजा मदाखिलत नहीं की गयी। हमारे चैन सुकून की जिन्दगी में रखनान्दाजी नहीं की गई तो खामख्वाह मुखालिफत का हमें शौक नहीं। नरेन्द्र मोदी के खिलाफ 60 फीसदी हिन्दू आज भी ऐसे हैं जो खुद को सेक्यूलर कहते हैं। इन्हें ये बताना चाहिए कि 1947 में हमने हिन्दुस्तान के इक्तिदार को यह कहकर इनके हवाले कर दिया था कि अब हम हिन्दुस्तान की हुकूमत आपके जिम्मे करते हैं आप हुकूमत कीजिए हम आपके पीछे हैं। जो हालत उस वक्त हमारी थी वही हालत आज 2014 में हिन्दुस्तान के सेक्यूलर हिन्दुओं की है। अब ये मुल्क गांधी, लोहिया, या अम्बेडकर की सोच पर चलेगा या फिर गोलवलकर या सावरकर के ख्वाब की ताबीर पूरी करेगा। यह एक लमहा फिफ्र मुसलमानों के लिए ही नहीं बल्कि सेकुलर हिन्दुओं के लिए भी है। इन्हें चाहिए कि वे आपस में इत्तिहाद पैदा करें और सेकुलर पार्टियों के लीडरों को चाहिए गुजिश्ता सियासी रंजिशों को भूलकर करीब आएँ और मौजूदा सियासी तब्दीलियों का मुकाबला करने के लिए अवाम का एतमाद हासिल करें। तभी कोई बेहतर रास्ता निकल सकता है और हुकूमत को सीधे रास्ते पर चलाने के लिए एक दबाव कायम किया जा सकता है। वरना वही होगा जो आजादी के बाद से अब तक होता आ रहा है। वादा और मीठी बातों से खुश होकर और भरोसा करने की वजह से गुजिश्ता साठ वर्षों से हमारे जज्बात और एतमाद के साथ मुसलसल खेला जा रहा है। एक अरसा दराज तक रामविलास पासवान मुसलमानों की नजर में खुद को सेकुलर साबित करने के लिए बी0जे0पी0 से कसदन दूर रहे। आज अपने सियासी मफादात के हुसूल के लिए इन्होंने बी0जे0पी0 का दामन पकड़ा और मुसलमानों को पस्त हिम्मत करने के लिए इनके मुस्लिम नुमाइन्दे मुसलमानों की मजलिस में जाकर तकरीर करते हैं और अपने मतालबात से बाज रहने की तल्क़ीन करते हैं ऐसे बहुत सारे लोग मुस्लिम नुमाइन्दा बनकर खैरख्वाही की आड़ में हुकूमत के मन्जूरे नजर होने की गरज से मुसलमानों में दाखिल होकर दहशत पैदा करने की कोशिश में मुन्हमिक हंै। ऐसे लोग कौम व मिल्लत के भी खैरख्वाह नहीं हो सकते। इनसे होशियार रहने की अशद जरूरत है। आइन्दा पाँच बरसों में सियासत गिरगिट की तरह न जाने कितने रंग बदलेगी। अगर हमारे साथ बदसलूकी नहीं की गई तो हमसे ज्यादा वफादार दुनिया की कोई कौम नहीं है। पन्द्रह सौ साला तारीख इस सच्चाई की चश्मदीद गवाह है, इस पर किसी तरह के शक की गुंजाइश नहीं है। किसी को ज़ाती तौर पर हमारी हिमायत वफादारी का मुशाहिदा करना है तो हमारे जुमला मसायल को हल करे और फिर देखे कि हम किस कदर जां निशार हैं। अब सिर्फ वादों से काम नहीं चलेगा। अमली इकदामात ही जख्म पर मरहम का काम कर सकते हैं। इसलिए अभी वक्त हमारे सब्र व तहम्मुल का मोत्कादी है।
अभी इश्क के इम्तिहाँ और भी हैं।
आईना-जमीर हाशमी
लो उजागर हो गया पटना धमाकों का भी सच
कार्यवाही थी वहाँ भी सब उसूलांे के बगैर।
ला न पाए छः महीने में भी कोई फर्दे जुर्म
बेगुनाहों पर थी तोहमत फिर सबूतों के बगैर।।

 -मुहम्मद अदीब
मजमून निगार
(राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं। )
मोबाइल: 09868181945
साभार-इंकलाब
लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

प्रत्यक्ष खुदरा विदेशी निवेश का प्रभाव

हिन्दुस्तान में प्रत्यक्ष खुदरा विदेशी निवेश का प्रभाव

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश वह पूँजी निवेश है जो किसी विदेशी कम्पनी के द्वारा दूसरे देश में लाभ कमाने के लिए किया जाता है। वह या तो अपनी कम्पनी का विस्तार दूसरे देश में करता है या नई कम्पनी खोलकर पूँजी निवेश करता है। ऐसा करते समय वह इस बात का विशोष
ध्यान रखता है कि जिस देश में वह निवेश करना चाहता है वहाँ स्पष्ट लाभ का अवसर, कच्चा माल, सस्ता मजदूर, यातायात की सुविधा, मुनाफे का बाजार, सस्ते दरों पर पूँजी ऋण की उपलब्धता एवं सुरक्षा, विभिन्न करों में छूट, जमीन, बिजली, आदि आवश्यक संसाधनों की रियायती दरों पर उपलब्धता हो। ऐसा करने के लिए वह विभिन्न देशों का तुलनात्मक अध्ययन करता है और जहाँ उसे सर्वाधिक सहूलियत के साथ लाभ की सम्भावना दिखता है, वह अपने लाभ को अधिकतम करने के लिए पूँजी निवेश करता है। यद्यपि जरूरी नहीं कि वह अपनी ही पूँजी लगाए। अक्सर वह बैंकों से कर्ज लेकर तथा कम्पनी का शेयर या तो स्वयं खरीदकर या फिर साझे हिस्सेदारी से अपनी कारोबार को ब़ाता है।
हिन्दुस्तान में भी विभिन्न देशों की विदेशी कम्पनियाँ सदियों से व्यापार और कारोबार के लिए आती रहीं हैं। पुर्तगाल, फ्रान्स, इंगलैंड, चीन, जापान, आदि देशों की कम्पनियाँ हमारे देश में आती रही हैं। 1990 में भारत में विदेशी निवेश 1 अरब डालर से भी कम था किन्तु उदारीकरण के साथ विदेशी निवेश में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है। अंक्टाड के एक सर्वे आधारित आकलन के अनुसार हमारा देश प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में आकर्षण की दृष्टि से चीन के बाद दूसरा स्थान रखता है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 2010 में भारत में 44.8 अरब डालर का हुआ जो 2011 में 13 प्रतिशत ब़ोतरी के साथ 50.8 अरब डालर हो गया। 2012 मार्च तक इसमें आठ गुणा वृद्धि हो गया। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का भारत में आकर्षण का मुख्य कारण दुनिया के औद्योगिक देशों में छाई मंदी के कारण पूँजी के लाभ के लिए सुरक्षित निवेश के बाजार की तलाश और 1990 के दशक में भारत द्वारा अपनाया गया उदारीकरण, भूमंडलीकरण एवं निजीकरण की नीति रही है। भारत सरकार द्वारा लगातार विदेशी पूँजी को आकर्षित करने के लिए रियायतें दी जाती रहीं हैं। कई कम्पनियों के सार्वजनिक उपक्रमों की हिस्सेदारी निजी कम्पनियों को बेची गई है। विशोष आर्थिक क्षेत्र का प्रावधान किया गया है जिसके कारण करों में पूर्णतः छूट, श्रमिक कानूनों के अनुपालन में ील एवं अन्य कई रियायतें दी गई हैं। हाल में विमानन के क्षेत्र में 49 प्रतिशत, प्रसारण के क्षेत्र में 74 प्रतिशत, मल्टीब्रांड खुदरा क्षेत्र में 51 प्रतिशत, एक ब्रांड खुदरा क्षेत्र में 100 प्रतिशत, आपूर्ति क्षेत्र में कोल्ड चेन विकसित करने में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अनुमति दी गई है।
हमारे देश के सरकारी विशोषज्ञ, अधिकारी, शीर्ष नेतृत्व, मंत्री, एवं प्रधान मंत्री, नई आर्थिक नीति के लागू करने में यह तर्क देते रहे हैं कि निजी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से देश में वस्तु एवं सेवा के उत्पादन में वृद्धि होगी, रोजगार ब़ेगा एवं गरीबी कम होगी। औद्योगिक मंदी जब 2008 में विश्व अर्थव्यवस्था को निगल रही थी तो भी उदारीकरण के पैरोकार यह कहते नहीं थक रहे थे कि भारत का आर्थिक संरचना मजबूत है, इस पर दुनिया के मंदी का असर नहीं पड़ेगा। विकसित कहे जाने वाले देशों में जब कुशल मजदूर, डॉक्टर, इन्जीनियर आदि की छँटनी हो रही थी, जब उनके वीजा के नियमों को सख्त किए जा रहे थे तो भी हम उदारीकरण के फायदे गिनाने में लगे रहे हैं। जबकि आलम यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था का विकास दर लगातार संशोधित हो रहा है और अब लगभग 5 फीसदी पर पहुँच गया है। रोजगार वृद्धि का स्तर तो और भी चिन्ताजनक है। हाल के आधिकारिक आँकड़े बताते हैं कि 2000 से 2005 के बीच कुल रोजगार में वृद्धि दर 2.7 फीसदी रही जो 2005 से 2010 के बीच घटकर 0.8 फीसदी हो गई। इन्हीं अवधियों में गैर खेती क्षेत्र में रोजगार वृद्धि दर 4.65 प्रतिशत से घटकर 2.53 हो गया। कुपोषण को तो प्रधानमंत्री जी ने राष्ट्रीय शर्म तक कह दिया है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 200910 के 66वें दौर के आँकड़े बताते हैं कि ग्रामीण भारत में 2400 कैलोरी से कम पर जीने वाले 79 फीसद तथा शहरी भारत में 2100 कैलोरी से कम उपभोग करने वाले 72 फीसद हैं। फिर भी योजना आयोग की सत्ता ठाकुर सुहाती देश की गरीबी के आकलन को घटाकर 29.8 फीसदी, ग्रामीण गरीबी 33.8 और शहरी गरीबी 20.9 फीसदी कर घटाने में लगी रही है। अतः उदारीकरण के लगभग दो दशक के बाद जो तथ्य उभर कर आए हैं, वे उदारीकरण से लाभ के उन तर्कों के विपरीत हैं। विश्व समुदाय एवं संगठन ने भी यह स्वीकार किया है कि बाजारीकरण से हाशियाकरण ब़ा है। अतः बाजार को मानवीय चेहरा बनाने पर बल दिया जाना चाहिए। वास्तविकता यह है कि बाजार का सीधा रिश्ता लाभ कमाने से है। उसे मानवीय चेहरे के साथ लाभ कमाने की कोई बाध्यता नहीं है। ऐसे में जिस तेवर से दूसरे चरण का आर्थिक सुधार लागू करने में सरकार ने खुदरा क्षेत्र में, विशोषकर मल्टीब्रांडिंग खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अनुमति दिया है, उसका कितना गहरा प्रभाव आम आदमी पर पड़ेगा, इस पर गम्भीरता से विचार करने की जरूरत है। यह तब और भी आवश्यक है जब भारत का खुदरा क्षेत्र खेती के बाद दूसरा सबसे बड़ा रोजगार देने वाला क्षेत्र है। खुदरा क्षेत्र में लगभग 4 करोड़ लोग रोजगार पाते हैं, जिसमें अधिकांश छोटे असंगठित एवं स्वरोजगार में लगे हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनी के इस क्षेत्र में निवेश की अनुमति से छोटे खुदरा कारोबारियों को रोजगार से बाहर करने की सम्भावना ब़ जाती है। इक्रीयर के 2008 के एक अध्ययन के अनुसार ठेला खोंमचावालों को छोड़कर औसतन 217 वर्गफीट में एक खुदरा कारोबार होता है। इक्रीयर के आकलन के अनुसार भारत में कुल वार्षिक खुदरा व्यवसाय 200607 में 408.8 अरब डालर था और 1.3 करोड़ पारम्परिक खुदरा करोबारी हैं। इस प्रकार प्रति व्यवसाय औसत 31446 डालर या 15 लाख रूपये की पूँजी के साथ औसतन 2 से 3 लोग प्रति कारोबार रोजगार में लगे रहते हैं।
इसके विपरीत संयुक्त राज्य अमेरिका में एक वालमार्ट सुपरबाजार लगभग 108000 वर्ग फीट में फैला होता है जिसमें 225 लोग रोजगार में लगे होते हैं। वर्ष 2010 में 28 देशों में फैले लगभग 9800 दुकानों में 21 लाख लोगों को रोजगार देते हुए 405 अरब डालर का कारोबार किया। इस प्रकार एक विदेशी पूँजी की दुकान औसत 1300 दुकानों की जगह लेगा और 3900 लोगों को रोजगार से बेदखल करेगा। अतः खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से रोजगार के नुकसान का अनुमान लगाया जा सकता है। जबकि वाणिज्य मंत्री खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से तीन साल में लगभग 40 लाख सीधे एवं 60 लाख अन्य तरह से, इस प्रकार 1 करोड़ रोजगार पैदा करने का दावा करते हैं। भारत दुनिया के चार बड़े खुदरा कारोबारी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आधार पर जिसमें औसतन 117 को रोजगार मिलता है, इसके लिए कम से कम 34180 मॉल खोलने होंगे। भारत सरकार वैसे शहरों में ऐसा निजी मॉल खोलवाना चाहती है जिनकी आबादी 10 लाख से अधिक है, अर्थात 53 बड़े शहरों में से प्रत्येक शहर में 644 सुपर बाजार खोलने होंगे। यदि अमरीका का मानक जमीन की जरूरत हो तो एक शहर में लगभग 1596 एकड़ जमीन मुहैया कराएगी। इस प्रकार कुल 84588 एकड़ जमीन प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए तीन वर्षों में देने का इरादा रखती है। भारत सरकार दावा करती है कि खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से खाद्य आपूर्ति के क्षेत्र में आधुनिकीकरण से खाद्यान्न नष्ट होने से बचाया जा सकेगा, साथ ही किसानों को बिचौलियों से मुक्ति मिलेगी तथा बाजार का लाभ मिलेगा। अमरीकी प्रयोग के अनुभव पर गौर करें तो मात्र 24 फीसदी शीतगृह का निर्माण निजी क्षेत्रों के द्वारा हुआ है, शेष 76 फीसदी सार्वजनिक क्षेत्र का है। निजी क्षेत्र सार्वजनिक सुविधाओं का लाभ लेकर मुनाफा ब़ाता है। जहाँ तक बिचौलियों के समाप्त होने तथा किसानों को बाजार का लाभ मिलने का है, जिन देशों ने निजी क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को ब़ाया है वहाँ निजीकरण का लाभ पूँजी को मिला है किसान को नहीं। यूरोपियन संघ में भी फ्रांस, इटली, नीदरलैंड, बेलजियम, आयरलैंड, हंगरी आदि देशों के किसानों के प्रतिरोध के परिणाम स्वरूप 2008 में विभिन्न देशों के संसद ने इसे स्वीकारा। दक्षिण पूर्व एशियाई देशों का अनुभव भी साथ नहीं देता है। मलयेशिया और थाईलैंड के सुपरबाजार ने भी बिचौलियों को ब़ाया ही है। भारत में कैडबरी ने कर्नाटक के कैंपको को बंद करवा दिया। जहाँ तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से सस्ते दरों पर चीजों के उपलब्ध होने की बात है इसका भी आधार नहीं दिखता है। दवा के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से दवा की कीमत कम नहीं हुई बल्कि बेतहासा ब़ी है। दुनिया के देशों का अनुभव है कि खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का खुदरा एकाधिकार में ब़ोतरी हुई है।
यह एक ऐतिहासिक सच है कि जब भी विदेशी कम्पनियाँ भारत आईं तो अपने साथ कुछ संस्कृति, कुछ तकनीक, कुछ नई चीजें भी लाइंर्। पुर्तगाली आलू, गोभी, पपीता लाए। इंगलैंड की ईस्ट इन्डिया कम्पनी पहले व्यापार करने आई फिर बंगाल की दीवानी खरीदा, धीरेधीरे सेना, रेल, अपनी जरूरत के हिसाब से न्यायालय, शिक्षा, सचिवालय, जमीनी इन्तजाम, अपनी कर प्रणाली आदि और पूरे देश का शासक बन बैठी। हमारे बीच के ही लोग उनकी मदद कर रहे थे और देश हित को नीलाम कर रहे थे। अधिकांश राजा महाराजा, हुक्मरान, अफसरान और अमला उनके साथ मिलकर आम तौर पर किसानों और मजदूरों का शोषण कर रहे थे। देश गुलाम रहा और दलालों का ऐशो आराम बदस्तूर जारी रहा। खेती, घरेलू उद्योग धंधे विदेशी बाजारों की भेंट च़ गए। बेरोजगारी और गरीबी के बीच आम जन जीवन रेंगती रही। अंग्रेजों का जमींदारों और हुक्मरानों के साथ ब़ते औपनिवेशिक शोषण के खिलाफ प्रतिरोध और जंग में किसानों और मजदूरों के आंदोलन ने महत्वपूर्ण मुकाम हासिल किया। साम्राज्यवाद विरोधी शक्तियों के संघर्ष ने आजादी की लड़ाई तेज की। विभिन्न नेतृत्व के कशमकश के बीच जैसी भी आजादी मिली, उसे जनसाधारण तक पहुँचाने की चुनौतियाँ आज भी बरकरार हैं। केन्द्र और राज्य में सत्तासीन वर्ग लोकतंत्र का उपयोग
प्रमुखता से पूँजी के पक्ष में करता रहा है। खुदरा क्षेत्र के कारोबार को विदेशी पूँजी के लिए खोलना भी उसी का एक नमूना है। सत्तावर्ग को पूँजी के संकट और औद्योगिक मंदी की जितनी चिंता है, जनसाधारण की गरीबी की नहीं। जिस तबज्जो से विशोष आर्थिक क्षेत्र पर जोर है वैसा जोर भूमि सुधार पर नहीं रहा। जन साधारण की जीविका विस्तार के नाम पर जीविका के अवसर घटते जा रहे हैं। विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनो को पूँजी के हवाले किया जा रहा है। विभिन्न राजनैतिक दल अवसरवादी संसदीय भटकाव में खुदरा विदेशी निवेश के विरोध करने का स्वांग जरूर करते हैं किन्तु अविश्वास प्रस्ताव के निर्णायक परिस्थिति में कोई बहाना बनाकर सरकार को गिरने से बचाने का व्यावहारिक उपाय ़ूढ़ते हैं, जिससे चुनाव से बचा जा सके। ऐसे में दादा धर्माधिकारी का कथन सही प्रतीत होता है कि ॔लोकशाही पूँजी के खेमा में खड़ी है’। ऐसे में लोकशाही और संसद को जनसाधारण के पक्ष में खड़ा करने की चुनौतियाँ हैं। लाजिमी है कि इस प्रयास में सत्ता वर्ग अपना अस्तित्व बचाने के लिए लोकतंत्र के नाम पर हर तरह के जनविरोधी हथकंडे अख्तियार करेगा। जन संघर्ष से ही लोकतंत्र एवं संसद को पूँजी सत्तावर्ग से मुक्त कराया जा सकता है। संघर्ष के अलावा और कोई विकल्प शेष नहीं प्रतीत होता है।
-डी0 एम0 दिवाकर

शनिवार, 4 दिसंबर 2010

सीबीआई सहित भारत की कुल 270 वेबसाइट्स हैक

हैकरों ने सीबीआई की वेबसाइट हैक कर उसपर पाकिस्तान के समर्थन में नारे लिख डाले। वेबसाइट पर हैकरों ने अपना एक संदेश भी लिख छोड़ा।

इस संदेश में पाकिस्तान साइबर आर्मी की तरफ दिए गए इस संदेश में कहा गया है कि यह हैकिंग भारतीय साइबर आर्मी द्वारा उनकी 36 वेबसाइट को हैक करने के बाद की गई है। सीबीआई की वेबसाइट विश्व पुलिस संगठन इंटरपोल के कमांड सेंटर से जुड़ी हुई है।

एक पाक न्यूज चैनल ने दावा किया कि पाक साइबर आर्मी ने सीबीआई सहित भारत की कुल 270 वेबसाइट्स को हैक किया है। इस खबर के आने के तुरंत बाद सीबीआई की वेबसाइट ने काम करना बंद कर दिया।

हिन्दुस्तान
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