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सोमवार, 28 दिसंबर 2015

कांग्रेस की खाल ओढ़कर ...

कांग्रेस का 131वां स्थापना दिवस के अवसर पर  मुंबई से प्रकाशित कांग्रेस दर्शन ने नागपुर मुख्यालय द्वारा नेहरु-पटेल व सोनिया गाँधी के सम्बन्ध में की जा रही सुनियोजित तरीके से चरित्र हत्या को प्रकाशित किया है. कांग्रेस दर्शन में छपे लेख के बाद नागपुर मुख्यालय द्वारा सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार को तेज कर दिया गया है. 
इस लेख में कश्मीर, चीन और तिब्बत जैसी समस्याओं के लिए नेहरु को जिम्मेदार माना है तथा नेहरु व पटेल के वैचारिक भिन्नता को आधार बनाया है. वहीँ, सोनिया गाँधी के सम्बन्ध में उनके पिता को फासीवाद का सैनिक बताया है.यह दुष्प्रचार काएक तरीका है कि नेहरु और पटेल में कोई टकराव था. अगर टकराव होता तो सरदार पटेल उप-प्रधानमंत्री बन कर नेहरु की नीतियों को आगे नही बढाते. दोनों विराट व्यक्तित्व के स्वामी थे और कांग्रेस के नेता थे. नागपुर मुख्यालय के पास अपना कुछ न होने के कारण कभी गाँधी की चरित्र हत्या, कभी नेहरु की और कभी तीनो लोगों का टकराव दिखाना इनकी मजबूरी. आजादी के पहले से भी और बाद में नागपुर मुख्यालय के कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस की खाल ओढ़कर देश के अन्दर सांप्रदायिक सद्भाव व एकता को विखंडित करने का काम किया था. आज भी कांग्रेस के अन्दर नागपुर मुख्यालय के विषाक्त विचारधारा को मानने वाले बहुत सारे लोग हैं. यहाँ तक की कांग्रेस की नीतियों को भी सांप्रदायिक आधार पर प्रभावित करने का काम भी यही लोग करते हैं.कांग्रेस को अगर आगे बढ़ना है तो निश्चित रूप से नागपुरी लोगों की कांग्रेसी खाल उतारनी पड़ेगी अन्यथा समय-समय पर कांग्रेस की नीतियों को यह प्रभावित कर उसको नुक्सान पहुंचाते रहेंगे. स्थापना काल 1925 से लेकर 1947 तक स्वतंत्रता संग्राम में इन्होने कोई योगदान नहीं दिया. भगत सिंह की फांसी का जब सवाल आया तब भी नागपुर मुख्यालय चुपचाप रहा और ब्रिटिश नीतियों का समर्थन करता रहा. आज यह देशभक्ति, राष्ट्रभक्ति की बात करते हुए नहीं थकते हैं. जम्मू एंड कश्मीर की क्रॉस बॉर्डर फायरिंग को लेकर यूपीए सरकार को हर समय कोसने वाले यह लोग अमेरिकी इशारे पर लाहौर जाकर पैर छूने से गुरेज नहीं करते हैं. वहीँ, इनका असली राष्ट्रीय स्वाभिमान देशभक्ति, राष्ट्रभक्ति दिखाई देती है. पाकिस्तान यात्रा भी अमेरिकी इशारे पर हुई है. ईरान, रूस के प्रभाव को कम करने के लिए तथा तुर्कमेनिस्तान से अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान होकर भारत तक जाने वाली ’तापी गैस पाईपलाईन’ का निर्माण-कार्य शुरू कराया था। इसके अलावा तुर्कमेनिस्तान ने अपने सबसे बड़े ’गालकिनिश’ गैस भण्डार के विकास का तीसरा दौर भी शुरू कर दिया है। ’गालकिनिश’ गैस भण्डार से ही तुर्कमेनिस्तान तापी गैस पाईपलाईन को जोड़ेगा। तुर्कमेनिस्तान के सबसे बड़े गैस भण्डार ’गालकिनिश’ से शुरू होने वाली यह गैस पाईपलाईन 1814 किलोमीटर लम्बी होगी। यह पाईपलाईन अफ़ग़ानिस्तान के हेरात और कन्धार नगरों तथा पाकिस्तान के क्वेटा और मुल्तान नगरों से गुज़रकर भारतीय-पाक सीमा पर स्थित भारतीय शहर फ़ाज़िल्का तक जाएगी। तापी गैस परियोजना को अमरीका का समर्थन प्राप्त है जो इसे ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइपलाइन की जगह बढ़ावा देना चाहता है जबकि ईरान-पकिस्तान-भारत गैस लाइन की लागत कम होती तथा सस्ते पेट्रोलियम पदार्थ मिलते. मोदी के पाकिस्तान में पहुंचने ने से पहले  सज्जन जिंदल ने ट्वीट करके यह बताया था कि वो भी पी एम नवाज़ शरिफ़ के जन्मदिन पर लाहौर में है और उनसे मुलाकात भी करेंगे.
पहले ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा यह संरक्षित थे और अब अमेरिकी साम्राज्यवाद से संरक्षित हैं.अफवाह फैलाना इनका मुख्य धर्म है. इसी से इनको उर्जा मिलती है.
सुमन
 लो क सं घ र्ष !


शनिवार, 26 सितंबर 2015

सवर्ण हिन्दुत्व की जातिवादी राजनीति और गुजरात में पटेल आरक्षण

सवर्ण उग्र हिंदुत्व के सत्ता में आने के पश्चात ही पिछले एक साल से देश में नाटकीय माहौल देखने को मिल रहा है। यह महज संयोग नहीं है कि जिस दिन जाति-जनगणना के आँकड़ों की माँग के लिए बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ‘बिहार बंद’ का आह्वान करते हैं उसी दिन सुबह तड़के ही पंजाब के गुरुदासपुर में आतंकी हमला हो जाता है। मीडिया के लिए सामाजिक न्याय से कहीं
अधिक महत्वपूर्ण उग्र हिंदुत्व की मुसलमान विरोधी भावना को कवरेज देना है इसलिए ‘बिहार बंद’ की उपेक्षा करके गुरुदासपुर आतंकी हमले और याकूब मेमन की फाँसी की खबर को पचा दिया गया। उन्हीं दिनों इस समय की भाजपा के मूल राज्य और जनपद, गुजरात के महेसाणा में पटेल जाति के युवकों ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में अपने लिए आरक्षण की माँग की। वे जुलाई माह के शुरुआती दिनों से ही अपने आंदोलन को आकार देने लगे थे। महेसाणा के विसनगर में पटेल जाति के इन युवकों का विरोध-प्रदर्शन उग्र हो गया और पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़प भी हो गई। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की कई गाडि़यों में आग लगा दी। कुछ पत्रकार घायल हुए और पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ शांति-भंग का मुकदमा भी दर्ज किया। अब प्रश्न यह उठता है कि गुजरात में सुदृढ़ सामाजिक-आर्थिक स्थिति में होने के बावजूद पटेल या पाटीदार जाति के लोग आरक्षण क्यों माँग रहे हैं?
    पटेल या पाटीदारों को उत्तर भारत की कुर्मी जाति के समकक्ष रखा जाता है क्योंकि इनकी वास्तविक अस्मिता मेहनतकश किसानों की ही है। ध्यातव्य है कि उत्तर भारत के पटेलों को अन्य पिछड़ा वर्ग में आरक्षित किया गया है। यद्यपि इनमें सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक स्तर पर भिन्नता है। गुजरात के कुछ पटेलों के पास बड़े आर्थिक उत्पादन के स्रोतों पर अधिकार हैं। उनके पास बड़ी खेतिहर भूमि या जोत है। संभव है कि यह केवल कुछ पटेलों के पास ही हों और इनकी बहुत बड़ी संख्या में निर्धनता व्याप्त हो, लेकिन गुजरात में पटेलों की स्थिति देखकर तनिक भी अनुभव नहीं होता कि इन्हें किसी प्रकार के आरक्षण की आवश्यकता है। लेकिन यह भी चैंकाने वाला सत्य है कि केंद्र सरकार की सरकारी नौकरियों में गुजराती पटेलों का प्रतिनिधित्व लगभग शून्य है। गुजरात की आबादी लगभग 6 करोड़ है जिसका बीस प्रतिशत पटेल या पाटीदार हैं। गुजरात में पटेलों की दो उपजातियाँ पाई जाती हैं एक ‘लेवा’ और दूसरी ‘कड़वा’। दोनों में वर्चस्व की पारस्परिक प्रतिद्वंद्विता भी है किन्तु आरक्षण की माँग के मुद्दे पर दोनों में जबरदस्त एकता देखी जा रही है। इससे पहले पटेलों ने आरक्षण की माँग दो दशकों पहले कांग्रेस की सरकार में की थी। लेकिन तब भी इन्हें टाल दिया गया था। सच तो यह है कि भारत की सभी ओबीसी जातियों को आरक्षण के नाम पर छलावा ही मिला है। गुजरात के पटेलों का मामला दूसरा है। क्योंकि वे अपनी सामाजिक, आर्थिक स्थिति से परेशान नहीं हैं बल्कि शिक्षा और सरकारी नौकरियों में अपने पिछड़े होने के आधार पर आरक्षण की माँग कर रहे हैं। मूल रूप से काँग्रेसी चेतना और सरदार वल्लभ भाई पटेल के अनुयायी पटेलों को भाजपा ने जातिवादी कार्ड खेलकर लुभा लिया और गुजरात में अभूतपूर्व राजनैतिक सफलता प्राप्त की। पटेलों की धर्म-निरपेक्ष भावना को कट्टरपंथी हिन्दुत्व में परिवर्तित कर भाजपा उन पर शासन करती रही। अभी भी कर रही है और उनकी यही सफलता पिछले आम चुनावों में राष्ट्रीय स्तर पर भी देखी गई। एकाएक राज्य व्यापी ‘पाटीदार अनामत आंदोलन’ (पटेल आरक्षण आंदोलन) को देखकर गुजरात सरकार के हाथ-पाँव फूल गए। विडम्बना यह है कि सरकार में भी पटेलों का ही दबदबा है। गुजरात की मुख्यमंत्री और राज्य भाजपा अध्यक्ष रणछोड़ दास फाल्दू दोनों ही पटेल हैं। इसके अलावा गुजरात सरकार के सात राज्यमंत्री और विधानसभा के कुल 182 में से 44 विधायक पटेल हैं। आंदोलन को मिलती सफलता देखकर सरकार ने इसे दबाने की भी कोशिश की लेकिन असफल रही। ‘पाटीदार अनामत समिति’ के बैनर तले लाखों पटेल जुट गए और अपने-अपने क्षेत्र में आंदोलन को दिशा देने लगे। राजधानी गांधीनगर में भी पटेल प्रदर्शन कर चुके हैं। गुजरात के बड़े क्षेत्रों मसलन वड़ोदरा, सूरत, हिम्मत नगर, राजकोट और सौराष्ट्र में भी आंदोलन ने अपने पाँव पसार लिए हैं। आंदोलन कारियों में बड़ी भागीदारी युवाओं की हैं। आंदोलन का नेतृत्व ही इक्कीस वर्षीय युवा नेता हार्दिक पटेल कर रहे हैं। उन्हें डराने,
धमकाने का भी प्रयास किया गया लेकिन अब सबकुछ इसलिए व्यर्थ है क्योंकि आंदोलन गति पकड़ चुका है और गुजरात भाजपा की मुश्किलें बढ़ा रहा है। आंदोलनकारियों का स्पष्ट संकल्प है कि वे 2017 तक अन्य पिछड़ा वर्ग में अपने आप को दर्ज कराके रहेंगे। इस पर स्वयं को आंदोलन का नेता घोषित करने वाले हार्दिक पटेल का कहना है कि वे अभी महात्मा गांधी और सरदार पटेल के मार्ग पर चल रहे हैं, किन्तु आवश्यकता पड़ी तो भगत सिंह का रास्ता भी अख्तियार करेंगे।
    धर्म और जाति की राजनीति करने का भाजपा का इतिहास रहा है। मण्डल कमीशन का प्रभाव कम करने के लिए भाजपा ने अपने आका, पुरुष सवर्ण हिंदुओं के कट्टरपंथी संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सहायता से बाबरी विध्वंस कराने में सफल रही थी और उस समय धार्मिक भावनाओं को भड़का कर जनता का ध्यान भटकाने की उसकी मंशा पूरी हुई थी। 2014 के आम चुनावों में भी कट्टरपंथी सवर्ण हिन्दुत्व का फेमस चेहरा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं को ओबीसी और ‘नीच जात’ का बताते नहीं थके। बिहार में भी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह मोदी को ओबीसी प्रचारित करते फिर रहे हैं। लेकिन जाति जनगणना के आँकड़ों को सार्वजनिक करने में इनकी कोई रुचि नहीं दिखाई पड़ी। ओबीसी की अनुमानित साठ फीसदी आबादी का कुछ ज्ञान इन्हें अवश्य है। इसीलिए ये बार-बार ओबीसी का पत्ता फेंकते रहते हैं। बहर हाल पटेल आरक्षण आंदोलन भाजपा की जड़ों में मट्ठा डाल सकता है क्योंकि आंदोलन भी उसी स्थान से उठा है जहाँ वर्तमान भाजपा की जड़ें स्थित हैं। गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीनों ही गुजरात के महेसाणा जिले के हैं और पटेल आरक्षण आंदोलन भी महेसाणा से उठा जो अब पूरे गुजरात में व्यापक हो गया है। फौरी तौर पर पटेल आरक्षण आंदोलन को गुजरात-भाजपा को तोड़ने की कांग्रेस द्वारा की गई साजिश बताया गया लेकिन नाटकीयता तब और बढ़ गयी जब राज्य सरकार के मंत्री नानूभाई वणानी के पुत्र विपुल को भी आंदोलन में शामिल पाया गया। नानूभाई के पुत्र ने अपनी फेसबुक वाल पर ‘पाटीदार अनामत आंदोलन’ का बैनर पोस्ट किया था और मीडिया द्वारा पूछने पर स्वीकार किया कि वह इस आंदोलन में शामिल हैं। विपुल ने मीडिया से यह भी कहा कि वह पटेल जाति को अन्य पिछड़ा वर्ग में आरक्षित करने का पूरी तरह से समर्थन करता है। क्षतिपूर्ति के नाम पर पाटीदारों की दोनों उपजातियों, लेवा और कड़वा की धार्मिक गद्दियों, ‘माँ उमिया माताजी संस्थान’ और ‘श्री खोढाल धाम’ के मठाधीशों से मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल और गुजरात के भाजपा अध्यक्ष ने भेंट की और आंदोलन पर अपनी चिंता जाहिर की। उन्हें पता है कि पाटीदारों की दोनों उपजातियों को अपने धार्मिक स्थलों पर असीम श्रद्धा है और उनकी राजनैतिक, सामाजिक दिशा को वही तय करते हैं। अंततः थक-हारकर गुजरात सरकार ने पटेल आरक्षण आंदोलन की समस्या को सुलझाने के लिए सात सदस्यीय एक पैनल बनाया है। इसकी अध्यक्षता गुजरात के स्वास्थ्य मंत्री और सरकार के प्रवक्ता नितिन पटेल करेंगे।
    गुजरात में पटेलों की संख्या लगभग डेढ़ करोड़ है। भाजपा ने जातिवादी राजनीति के बल पर ही पटेलों की बहुसंख्यक जनता को सत्ता पाने के लिए इस्तेमाल किया। ‘पटेल आरक्षण आन्दोलन’ के खड़े होने से कई प्रश्न खड़े होते हैं। क्या भाजपा ने कुछ पटेलों को सत्ता में शामिल कर पटेलों की बड़ी संख्या को हाशिए पर कर दिया है? क्या पटेल अपनी बहुसंख्यक राजनैतिक शक्ति को पहचान गए हैं? यदि राज्य में उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग में आरक्षित कर दिया गया (जिसकी संभावनाएँ बन सकती हैं क्योंकि ऐसा न करने पर गुजरात की भाजपा सरकार को खतरा उत्पन्न हो सकता है) तो वे केंद्र में भी आरक्षण माँग सकते हैं। अगर वे केंद्र में भी आरक्षण की माँग करते हैं तो अन्य पिछड़ा वर्ग में आरक्षित अन्य जातियाँ इसका विरोध नहीं करेंगी क्या? जाति जनगणना के आँकड़ों को लेकर पिछड़े वर्ग के नेताओं और जनता में पहले से ही आक्रोश व्याप्त है। दूसरी तरफ सवर्ण सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग की जतियों के बढ़ते वर्चस्व से अलग हलकान हैं। धीरे-धीरे ही सही लेकिन पिछड़े वर्ग की जातियाँ शैक्षिक और सार्वजनिक क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं। उत्तर-प्रदेश में पिछले दिनों ऐसे कई अवसर आए हैं जब सामान्य और पिछड़े वर्ग के अभ्यर्थियों में संघर्ष हुए हैं। हालात ये हैं कि अन्य पिछड़े वर्ग में सामान्य श्रेणी से अधिक प्रतिस्पर्धा है क्योंकि उन्हें आबादी के अनुपात में आरक्षण नहीं दिया गया है। इसलिए सामाजिक न्याय के संवैधानिक प्रावधानों को दृष्टि में रखकर सरकार को जाति जनगणना के आँकड़ें जारी करने चाहिए और ओबीसी को उसकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देना चाहिए। हर जाति को ओबीसी में लाकर जोड़ देना भी सही नीति नहीं है। यदि सरकार गुजरात के पटेलों को आरक्षण देना चाहती है (जो अनुचित नहीं है) तो वह उसी अनुपात में ओबीसी की आरक्षण सीमा भी बढ़ाएँ।
 -संतोष अर्श 
मोबाइल: 09919988123
लोकसंघर्ष  पत्रिका  के सितम्बर 2015  अंक में प्रकाशित

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

आरक्षण समाप्त करने का नया जादू

गुजरात में नागपुर की प्रयोगशाला है, उस प्रयोगशाला में पहले व्यापक पैमाने पर लूटपाट व नरसंहार किया गया था. अब उसी प्रयोगशाला में दो-तीन महीने की कड़ी मेहनत के बाद पिछड़ों व दलितों के आरक्षण को समाप्त करने के लिए नया प्रयोग शुरू हुआ है. गुजरात की रैली में जानबूझ कर पुलिस लाठीचार्ज व उसके बाद भड़काई गयी हिंसा ने अरबों रुपये की परिसंपत्तियों को नष्ट कर दिया तथा हिंसा करने का जो प्रयोग संघी प्रयोग शाला मुसलमानों के खिलाफ करती आ रही थी, वह अपनी ताकत को पुन: दिखाने के लिए अमादा थी और दिखाया और जिस तरीके से गुजरात पुलिस ने लोगों के घरों में घुसकर महिलाओं, बच्चों, पुरुषों को पीटा तथा संपत्ति को नुकसान पहुँचाया है यही काम पूर्व में मुसलमानों के खिलाफ गुजरात पुलिस ने किया था. गुजरात पुलिस का चरित्र संघ की प्रयोगशाला से निर्मित विचारों से ओत-प्रोत होने के कारण उसने जनता को जगह-जगह मारा पीटा व गोलियां चलाई. इस सब हिंसा और प्रतिहिंसा के बीच संघ आरक्षण को समाप्त करने का कार्य करना चाहती है. अगर पाटीदार जाति ओबीसी में शामिल हो जाती है तो गुजरात में पिछड़े वर्ग के आरक्षण का कोई अर्थ नहीं रह जायेगा. अगर नहीं हो पाती है तो जैसा हार्दिक पटेल ने कहा है कि पटेल-पाटीदार को आरक्षण नहीं तो किसी को आरक्षण नहीं होना चाहिए.
संघी हिन्दुवत्व से प्रभावित सवर्ण जाति के कुछ तत्व बराबर आरक्षण की मांग कर रहे हैं या आरक्षण समाप्त करने की. इस पूरे आन्दोलन को आरएसएस का वैचारिक समर्थन प्राप्त था, बगैर उसकी मदद के इतना बड़ा आन्दोलन खड़ा करना हार्दिक पटेल के बस की बात नहीं थी.
                     संघ के ऊपर हमेशा एक अवसर को छोड़ कर महाराष्ट्र की चितपावन ब्राह्मण जाति का कब्ज़ा रहा है और आज भी प्रमुख पदाधिकारीगण चितपावन ब्राह्मण जाति के हैं वह किसी भी कीमत पर दलितों व पिछड़ों को आरक्षण नहीं देना चाहते हैं. जब देश के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू की थी तो पूरे देश के अन्दर आरएसएस ने एक तूफ़ान खड़ा कर दिया था और मंडल पर कमंडल लागू करने का कार्य किया था और जब आज कमंडल का ही शासन है तो वह पूरी तरह से देश को मनुस्मृति के दौर में देश को ले जाना चाहती है और उसमें सवर्ण जातियों का शासन हो और बाकी जातियां सेवक की भूमिका में हों ऐसा सामाजिक ढांचा तैयार करने के लिए नागपुर की प्रयोगशाला किसी भी कीमत पर बनाना चाहती हैं उसी का परिणाम है गुजरात में होने वाली हिंसा और पुलिस द्वारा की जा रही प्रति हिंसा, जिससे आरक्षण समाप्त करने की बात को आगे ले जाया जा सके. संघ की प्रयोगशाला का आरक्षण समाप्त करने का नया जादू कितना चल पाता है यह तो वक्त बताएगा.   

सुमन 

बुधवार, 26 अगस्त 2015

मोदी का नया अवतार

गुजरात, प्रधानमंत्री मोदी की वजह से आजकल चर्चित रहता है. पहले आजादी की लड़ाई में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ सफल संघर्ष चलाने वाले महानायक मोहन दास करमचंद गाँधी के कारण चर्चित रहा है आजादी के बाद नेहरु मंत्रीमंडल के उप-प्रधानमंत्री व गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के कार्यों के कारण चर्चा में रहा है. मोदी जब मुख्यमंत्री थे, मुसलमानों के नरसंहार के समय उनके मूक दर्शक होने के कारण गुजरात चर्चित रहा है. मोदी आरएसएस के प्रचारक रहे हैं और महात्मा गाँधी को किसी भी रूप में न मानने के लिए चर्चित संघ रहा है और गाँधी की हत्या में भी संघ का नाम आया और सरदार पटेल ने संघ के ऊपर प्रतिबन्ध लगा दिया था जो बाद में माफीनामे के बाद उसको सांस्कृतिक गतिविधियाँ करने की छूट मिली थी. आज मोदी गुजरात में चल रहे आन्दोलन को शांति करने के लिए जो अपील की है वह महात्मा गाँधी की फोटो व सरदार पटेल की फोटो के साथ की है. यह उनका नया अवतार माना जाए या राजनीति में सत्ता के शिखर के ऊपर बने रहने के लिए विचारों की तिलांजलि माना जाए. यह नया मुखौटा प्रधानमंत्री पद पर बने रहने के लिए मजबूरी है या जरूरी है.
ज्ञातव्य है कि गुजरात में रिजर्वेशन की मांग कर रही पटेल-पाटीदार कम्युनिटी का आंदोलन हिंसक हो जाने के बाद राज्य के बड़े शहरों में तनाव है। अहमदाबाद और सूरत में असर सबसे ज्यादा है। हालात काबू करने के लिए गांधीनगर से आर्मी की एक टुकड़ी अहमदाबाद बुलवाई गई। इससे पहले कुछ लोगों ने पटरियां उखाड़कर कोयले से लदी एक मालगाड़ी में आग लगाने की भी कोशिश की। वहीं, मंगलवार रात से अब तक हुई हिंसा की वजह से उत्तरी गुजरात के पालनपुर में दो लोगों की मौत हो गई। इस तरह हिंसा के चलते अब तक सात लोगों की मौत हो चुकी है। इस बीच, केंद्र ने पैरामिलिट्री फोर्सेस की 60 कंपनियां  भेजी हैं।
गुजरात में चल रहे मुसलमानों के नरसंहार के समय न महात्मा गाँधी की बात आई थी और न ही सरदार पटेल ही याद आये थे. आज यह अपील अद्भुत अपील है - महात्मा गांधी और सरदार पटेल की तस्वीरों के साथ गुजरात की जनता को टीवी पर दो मिनट छह सेकेंड के इस संबोधन में मोदी ने कहा, 'मेरी सभी भाइयों और बहनों से विनती है कि उन्हें हिंसा का मार्ग नहीं अपनाना चाहिए। इस समय हमारा एक ही मंत्र होना चाहिए, शांति।'
 'हर समस्या का समाधान बातचीत द्वारा निकाला जा सकता है। लोकतंत्र की मर्यादा का पालन हम सबको करना चाहिए। मैं एक बार फिर गुजरात के सभी भाइयों और बहनों को शांति रखने का आग्रह करता हूं। हिंसा के मार्ग पर चलकर कभी कुछ नही मिलता। हम सब साथ मिलकर बातचीत के जरिए समस्या का समाधान करें।'
यह अपील जब गुजरात में सांप्रदायिक आधार पर अल्पसंख्यकों के साथ ज्यादती हो रही थी उस समय अगर आई होती तो निश्चित रूप से प्रधानमंत्री मोदी का कद जनता के दिमाग में बढ़ गया होता लेकिन आज जब उनका स्वयं का वोट बैंक हिंसा के ऊपर उतर आया है तब वह शांति का पाठ पढ़ाकर गौतम बुद्ध का सन्देश देने की कोशिश कर रहे हैं और जब अल्पसंख्यकों का नरसंहार चल रहा था तब वह हिटलर की यहूदी विरोधी नीति का अनुसरण कर रहे थे. शायद राजनीति में सब कुछ जायज है. 

सुमन 

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

बाल दिवस पर विशेष-नरेन्द्र मोदी बड़े या मोहन भागवत

नरेन्द्र मोदी की जगह अगर भारत के प्रधानमंत्री आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत होते तो नागपुर से सन्देश सरकार को देने के लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता . अयोध्या में राम मंदिर, संविधान से अनुच्छेद 370 का खात्मा, पूर्ण गौहत्या निषेध के साथ देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने में कोई परेशानी या दिक्कत नहीं होती . नरेन्द्र मोदी बड़े हैं या मोहन भगवत ? 
              नागपुर की प्रयोगशाला से नेहरु और पटेल के सम्बन्ध में तरह-तरह की अफवाहबाज़ कहानियां नेट, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया व प्रिंट मीडिया प्रचारित की जा रही हैं जबकि वस्तुस्तिथि इसके विपरीत है संघ अपने जन्मकाल 1925 से लेकर 1947 तक इस देश की आजादी की लड़ाई में उसका का कोई योगदान नहीं रहा है. नेहरु , पटेल इस देश की जंग ए आजादी के नायक रहे हैं और महानायक महात्मा गाँधी थे . संघी भक्त नाथू राम गोडसे ने गाँधी की गोली मारकर हत्या कर दी थी उसका कोई प्रयाश्चित नागपुर न करके केरल के संघी मुखपत्र में नेहरु की हत्या के बाद करता है. आजादी की लड़ाई में भाग न लेकर आज वह सबसे बड़े देश प्रेमी व देश भक्त हैं . इसके विपरीत जो धाराएं आजादी की लड़ाई लड़ रही थी उसमें छोटा व बड़ा बताने का काम संघियों के अलावा किसी के पास नहीं है  आज वह बड़ी बेशर्मी से यह अफवाह फैलाते हैं . अगर देश के प्रधानमंत्री पटेल हुए होते तो देश विकास की नयी उचाईयों पर और आगे बढ़ा होता . यह बात कहकर संघी आजादी की लड़ाई में कोई योगदान न होने के बाद छिपाने की कोशिश करते हैं . संघ प्रशिक्षित कई बड़े नेता ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लिए मुखबिरी करने का काम करते रहे हैं . 
            पटेल व नेहरु के बीच कोई विवाद नहीं था. यह वह लोग थे जो मानव के बजाए महा मानव थे.
आई बी एन खबर के पंकज श्रीवास्तव के ब्लॉग में नेहरु पटेल का पत्र व्यवहार प्रकाशित हुआ है जो इस प्रकार है-
1 अगस्त 1947 को पंडित नेहरू ने पटेल को लिखा-'कुछ हद तक औपचारिकताएं निभाना जरूरी होने से मैं आपको मंत्रिमंडल में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए लिख रहा हूं। इस पत्र का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि आप तो मंत्रिमंडल के सुदृढ़ स्तंभ हैं।'
जवाब में पटेल ने 3 अगस्त को नेहरू के पत्र के जवाब में लिखा-'आपके 1 अगस्त के पत्र के लिए अनेक धन्यवाद। एक-दूसरे के प्रति हमारा जो अनुराग और प्रेम रहा है तथा लगभग 30 वर्ष की हमारी जो अखंड मित्रता है, उसे देखते हुए औपचारिकता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। आशा है कि मेरी सेवाएं बाकी के जीवन के लिए आपके अधीन रहेंगी। आपको उस ध्येय की सिद्धि के लिए मेरी शुद्ध और संपूर्ण वफादारी और निष्ठा प्राप्त होगी, जिसके लिए आपके जैसा त्याग और बलिदान भारत के अन्य किसी पुरुष ने नहीं किया है। हमारा सम्मिलन और संयोजन अटूट और अखंड है और उसी में हमारी शक्ति निहित है। आपने अपने पत्र में मेरे लिए जो भावनाएं व्यक्त की हैं, उसके लिए मैं आपका कृतज्ञ हूं।
2 अक्टूबर 1950 को इंदौर में एक महिला केंद्र का उद्घाटन करने गये पटेल ने अपने भाषण में कहा-'अब चूंकि महात्मा हमारे बीच नहीं हैं, नेहरू ही हमारे नेता हैं। बापू ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था और इसकी घोषणा भी की थी। अब यह बापू के सिपाहियों का कर्तव्य है कि वे उनके निर्देश का पालन करें और मैं एक गैरवफ़ादार सिपाही नहीं हूं।'
ये सारे पत्र अहमदाबाद के नवजीन प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक 'सरदार पटेल के चुने हुए पत्र (1945-50)' में मौजूद हैं।

सुमन 

शनिवार, 13 सितंबर 2014

मोदी अपने मनशूर पर वापिस: कुलदीप नय्यर

   इन्तिखाबी मुहिम के दौरान नरेन्द्र मोदी भारतीय जनता पार्टी को जो हिन्दुत्व नवाज तंजीम है अपनी माँ करार देते हुए आबदीदह हो गए तो मैंने समझा कि गहरे जजबात का इजहार है और जब हिन्दुस्तान का वजीर आजम होने के बाद इन्होंने कहा कि वह तरक्की की राह पर तमाम 125 करोड़ लोगों को अपने साथ लेकर चलेंगे तो मुझे इस पर यकीन आ गया था।
    लेकिन ज्यों-ज्यों पार्टी अपने प्रोग्राम सामने ला रही है तो मुझे लगता है कि आर0एस0एस0 की वजह कर्दा तफरीकी हिकमते अमली की पर्दा पोशी है। मोदी खुद को गैर मुतास्सिब के तौर पर पेश करते हैं जबकि बी0जे0पी0 मय आर0एस0एस0 तक्शीरियत के तख्फ़ीक के इक्दामात करती  है। आर0एस0एस0 पहले ही अपने मोतबर अफराद को मुख्तलिफ कमीशनों की रुक्नियत दे रही है और कलीदी ओहदों पर बैठा रही है। इस से ताल्लुक रखने वाले नवजवानों को कम दर्जे के कामों के लिए मुकर्रर किया जाता है। चूँकि ब्यूरो क्रेसी का झुकाव हवा की रुख की तरफ होता है, बी0जे0पी0 और आर0एस0एस0 को अपने एजेण्डे के नफाज में किसी मजाहिमत का सामना करना नहीं पड़ रहा है।
    साविक वजीर जराअत शरद पवार ने जो महाराष्ट्र के वजीर आला भी थे बजातौर पर तबसरा किया है कि बी0जे0पी0 की फतेह के बाद फिरका वारियत हर जगह सर उभार रही है और मोदी हुकूमत के पहले दो हफ्तों में ही ये हो रहा है। जबकि इसे अभी अपनी पाँच साला मुद्दतकार पूरी करनी है। महाराष्ट्र के एतदाल पसन्द शहर पुणे में जो कुछ हुआ वह बेकाबू हो जाने वाली ताकतों की तरफ इशारा करता है। एक इन्तिहा पसन्द हिन्दू ग्रुप ने शिवाजी और इन्तेहा पसन्द शिवसेना के बानी बाल ठाकरे की अहानत आमेज तस्वीरें इरसाल किए जाने पर 28 साला आई0टी0 मैनेजर मोहसिन शेख को जान से मार डाला। मोहसिन महज मशकूक था और उसके खिलाफ न कोई शहादत थी न सबूत।
    ये सच है कि बी0जे0पी0 ने इस कत्ल की मजम्मत की है लेकिन मोदी के लिए खुद को गैर महफूज समझने वाले मुसलमानों को यह यकीन दिलाने को बेहतरीन मौका था कि इनकी हुकूमत इसका ख़याल रखेगी कि मोहसिन के कातिलों के खिलाफ फौरन कानूनी चारहजोई की जाएगी। यहाँ तक कि जब उनसे खासतौर पर मजलूम के खानदान से हमदर्दी का एक लफ्ज कहने की दरख्वास्त की गई तो भी मोदी ने खामोशी अख्तियार की।
    इस रवैये से हैरत नहीं होना चाहिए। 2002 में गुजरात के वजीर आला की हैसियत से जब बशमूल पुलिस इन्तजामिया की साजबाज से 2000 से ज्यादा मुसलमानों को हलाक किया गया तो मोदी ने इजहार अफसोस नहीं किया। दर हकीकत मोदी ने गुजरात की एक मजिस्ट्रेट अदालत से हासिल कर्दा क्लीन चिट तनकीद करने वालों के मुँह पर मार दी। आज तक इन्होंने अफसोस का इजहार नहीं किया। उनके तास्सुफ के अल्फाज मुसलमानों के अहसासात को तस्कीन देने और तक्सीरियत पर मबनी हिन्दुस्तान के तसव्वुर को तकवियत देने में मुअस्सर होंगे।
    मुझ जैसे अफराद 15 से 16 करोड़ की आबादी पर मुस्तमिल मुस्लिम फिरके को ये यकीन दिलाना चाहते हैं कि इन्हें खायफ होने की जरूरत नहीं है क्योंकि हिन्दुस्तान दस्तूर पर कार बन्द है जो कानूनों की नजर में हर शहरी को मसावात की जमानत देता है। अगर इस फिरके को निशाना बनाया जाता है तो अदालतें, मीडिया और एतदाल पसन्द आवाजंे हैं जो मुसलमानों की हामी हैं। इसका मुजाहिरा उस वक्त देखने में आया जब बाबरी मस्जिद मुन्हदिम की गई और गुजरात में मुस्लिम कश फसादात हुए।
    वह लोग जो रियासत जम्मू व कश्मीर को खुसूसी हैसियत देने वाले आर्टिकल 370 को खत्म करने का मुतालबा कर रहे हैं वही मुस्लिम मुखालिफ अनासिर हैं। आर्टिकल 370 दस्तूरे-हिन्द की तरह 65 साल पुराना है क्योंकि जम्मू व कश्मीर मुस्लिम अक्सरीयत वाली रियासत है, इन अनासिर को मोदी के दौरे हुकूमत मंे इस रियासत की हैसियत पर एतराज उठाने का साजगार माहौल फिर अहम हो गया है। तारीख से वह वाकिफ नहीं हैं और न ही हकायक जानने में इन्हें कोई दिलचस्पी है।
    अगस्त 1947 में बरतानवी तसल्लुत के खात्मे पर रियाया की अक्सरीयत के मजहब के पेशे नजर तकरीबन 560 रजवाड़ो को इस इन्तखाब की आजादी दी गई कि या तो वे हिन्दुस्तान में शामिल रहें या तो तश्कील शुदा पाकिस्तान के साथ हो जाएँ। कोई हुकमरान अगर चाहता तो आजाद भी रह सकता था। जम्मू व कश्मीर के हुक्मराँ महाराजा हरि सिंह ताखीर से हिन्दुस्तानी वफाक में शामिल हो गए, अगरचे इस रियासत की आबादी में मुसलमानों की गालिबअकसरियत थी। मेरा मुशाहिदा यह है कि अगर उसने सब्र से काम लिया होता तो कश्मीर पाकिस्तान में चला जाता लेकिन इसने रियासत के अलहाक के लिए पहले कबायली और फिर बाकायदा फौज को भेजा। अपनी फौज के हाथों कत्ल व खून रोकने की गरज से महाराज ने हिन्दुस्तान के हक में दस्तखत कर दिए। महाराज ने सिर्फ तीन मामलात हिन्दुस्तान को सौंपे। दिफा, खारजी उमूर और मवासिलात। रियासत ने दीगर मामलात अपने पास ही रखे। आर्टिकल 370 इसी मफाहिमत की दस्तावेजी शकल है। अगर हिन्दुस्तान वफाक मजीद मामलात को अपने हाथ में लेना चाहे तो इसका फैसला रियासत जम्मू व कश्मीर के अख्तियार में है। क्योंकि वह इसी शर्त पर वफाक में शामिल हुई थी। रियासत की रजामन्दी के बगैर वफाक मजीद मामलात अपने अख्तियार में नही ले सकता। इसलिए आर्टिकल 370 के खात्मे के मुतालबे को आगे बढ़ाने वाली आर0एस0एस0 का अमल गैर कानूनी है।
      दर हकीकत मामलात इस कदर उलझ गए हैं कि किसी हल तक पहुँचने के लिए तीन फिरको की रजामन्दी जरूरी है। वह हैं हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और जम्मू व कश्मीर के अवाम।
      अगर आज रायशुमारी कराई जाए तो वादीए कश्मीर एक आजाद रियासत की हिमायत में वोट देगी। हिन्दू अक्सरीयत वाले जम्मू के अवाम हिन्दुस्तान में रहना चाहेंगे और लद्दाख जहाँ गालिब अक्सरीयत बौद्धांे की है बराहे रास्त के तहत मरकज के जेरे निगरानी इलाके की हैसियत पाना चाहेगा। इन तमाम मुश्किलों ने मसले को नाकाबिल हल बना दिया है।
     जब आर0एस0एस0 शकाफती तन्जीम होने का दावा करती है तो इसे किसी हालत में भी सियासत बाजी नहीं करनी चाहिए। मुझे याद है कि आर0एस0एस0 के आदमी नाथूराम गोड्से के हाथों महात्मा गांधी के कत्ल के बाद 30 जनवरी 1948 को इस पर पाबन्दी आयद की गई थी। फिर 1949 में आर0एस0एस0 की तरफ से पाबन्दी हटाने की दरख्वास्त के जवाब में उस वक्त के वजीर दाखिला सरदार वल्लभ भाई पटेल और आर0एस0एस0 के दरमियान एक मुअहिदा हुआ जिसमें यह जमानत दी गई कि आर0एस0एस0 किसी सियासी सरगर्मी में शरीक नहीं होगा और यह कि आर0एस0एस0 सिर्फ शकाफ्ती सरगर्मियों में शामिल होगा।
         फिर पटेल ने जो आर0एस0एस0 के वादे से मुतमइन नहीं थे मतालबा किया कि इसमें यह वादा शामिल किया जाय कि वह संघ की तशकील में सियासी सरगर्मियों में हिस्सा नहीं लेगी, मुआहिदे को मुहरबन्द किया जाए और आर0एस0एस0 को हमेशा के लिए सियासी सगर्मियों से रोक दिया जाए। यह 1949 में हुआ था और इसके बाद हुकूमत ने पाबन्दी हटा दी। ताहम एक हैरतनाक बदअहदी यह हुई कि आर0एस0एस0 अपने सरसंघ चालक मोहन भागवत की कयादत में जून 2013 से साबिक आर0एस0एस0 प्रचारक मोदी को हिन्दुस्तान के वजीर आजम के मनसब पर बैठाने के लिए जारिहाना सियासी सरगर्मियो में मुलब्बिस हो गई। नतीजा आपके सामने है।
-कुलदीप नय्यर
लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित

बुधवार, 19 मार्च 2014

संघ के जहरीले प्रचार के कारण गांधी जी की हत्या हुई थी

  राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने महात्मा गांधी की हत्या की थी।
संघ इस आरोप को बेबुनियाद बता रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि महात्मा गांधी की हत्या में संघ का अप्रत्यक्ष हाथ था। हत्या का फैसला कोई प्रस्ताव पारित करके नहीं किया गया था परन्तु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि संघ व हिन्दू महासभा के कुछ प्रमुख नेताओं को यह जानकारी थी कि महात्मा गांधी की हत्या होने वाली है। यह आरोप कि संघ को ज्ञात था कि महात्मा गांधी की हत्या होने वाली है, तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल ने लगाया था। पत्र में पटेल ने लिखा था ‘‘उसके (आर.एस.एस.) सभी नेताओं के भाषण साम्प्रदायिक जहर से भरे रहते थे। उन जहरीले भाषणों के चलते देश में ऐसा वातावरण बना जिससे यह बड़ी त्रासदी (गांधी जी की हत्या) घटी। हत्या के बाद संघ के स्वयंसेवकों ने खुशियां मनाईं और मिठाई बांटी।’’
पटेल ने इस पत्र की कापी जनसंघ के प्रथम अध्यक्ष और हिन्दू महासभा नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी को भी भेजी थी। सरदार पटेल ने महात्मा गांधी की हत्या के बाद तत्कालीन सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर को एक पत्र लिखासंदेह नहीं कि  नाथूराम गोडसे, जिसने गांधीजी की हत्या की थी, वे संघ के सदस्य रहे थे। उन्हें बौद्धिक प्रचारक का उत्तरदायित्व सौंपा गया था। उनके भाई गोपाल गोडसे लिखते हैं कि ‘‘नाथूराम गोडसे ने अदालत को बताया था कि उन्होंने 1934 में संघ छोड़ दिया था परंतु वास्तविकता यह है कि उन्होंने (नाथूराम गोडसे) संघ को कभी नहीं छोड़ा’’ गोपाल गोडसे के इस कथन से स्पष्ट होता है कि वे उस समय भी संघ से जुड़े थे जब उन्होंने गांधी की हत्या की थी।
गोडसे की वास्तविक स्थिति के बारे में आउटलुक पत्रिका ने सरसंघचालक प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह से एक साक्षात्कार में पूछा था। राजेन्द्र सिंह ने उत्तर दिया था कि ‘‘नाथूराम गोडसे अखंड भारत का सपना देखता था। उसका इरादा ठीक था परंतु उसने जो तरीका अपनाया वह गलत था।’’
संघ ने कभी भी नाथूराम गोडसे से अपना संबंध नहीं तोड़ा। इसके ठीक विपरीत, संघ उसके विचारों को प्रचारित करता रहा है। संघ वर्षों तक नाथूराम गोडसे और उनके भाई की किताबों के विज्ञापन अपने साप्ताहिक समाचारपत्र आर्गनाईजर में छापता रहा है। जैसे दिनांक अक्टूबर 5, 1997 के संस्करण में रीडेबल अटरेक्टिव न्यू बुक्स शीर्षक से विज्ञापन छपा था। इन किताबों में नाथूराम गोडसे की किताब ‘‘मे इट प्लीज युअर आनर’’ और गोपाल गोडसे की किताब ‘‘गांधीज मर्डर एंड आफ्टर’’ शामिल हैं। इस तरह के विज्ञापन समय-समय पर छपते रहे हैं।
सरदार पटेल ने, जिन्हें नरेन्द्र मोदी और संघ अपना हीरो मानता है, गांधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया था। 4 फरवरी 1948 को प्रतिबंध लगाया गया था। ‘भारत सरकार ने 2 फरवरी को अपनी घोषणा में कहा है कि  उसने (भारत सरकार) उन सभी विद्वेकारी तथा हिंसक क्तियों को जड़मूल से नष्ट कर देने का निष्चय किया है, जो राष्ट्र की स्वतत्रंता को खतरे में डालकर उसके उज्जवल नाम पर कलंक लगा रही हैं। उसी नीति के अनुसार, चीफ कमिश्नरों के अधीनस्थ सब प्रदेशों  में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अवैध घोषित करने का निर्णय भारत सरकार ने कर लिया है। गवर्नरों के अधीन राज्यों में भी इसी ढंग की योजना जारी की जा रही है।’’ सरकारी विज्ञप्ति में आगे कहा गया: ‘‘संघ के स्वयंसेवक अनुचित कार्य भी करते रहे हैं। देश  के विभिन्न भागों में उसके सदस्य व्यक्तिगत रूप से आगजनी, लूटमार, डाके, हत्याएं तथा लुकछिप कर स्त्र, गोला और बारूद संग्रह करने जैसी हिंसक कार्यवाहियां कर रहे हैं। यह भी देखा गया है कि ये लोग पर्चे भी बांटते हैं, जिनसे जनता को आतंकवादी मार्गों का अवलंबन करने, बंदूकें एकत्र करने तथा सरकार के बारे में असंतोश  फैला कर सेना और पुलिस में उपद्रव कराने की प्रेरणा दी जाती है।’’
सरकारी आदेश  में वे अन्य कारण भी गिनवाए गये जिनके चलते आरएसएस पर प्रतिबंध लगाना जरूरी हो गया था। इस संदर्भ में जानने लायक एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जब आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया गया तब देश  के गृहमंत्री सरदार पटेल ही थे, जिनको आरएसएस कांग्रेस में अपना प्रिय नेता मानती थी और आज भी मानती है। सरदार पटेल ने गांधी जी की हत्या में आरएसएस की भूमिका के बारे में स्वयं गोलवलकर को एक पत्र के माध्यम से जो कुछ लिखा था वह भी पढ़ने लायक है। सरदार पटेल ने 19.9.1948 के अपने पत्र में लिखा, ‘‘हिन्दुओं का संगठन करना, उनकी सहायता करना एक प्रश्न है पर उनकी मुसीबतों का बदला, निहत्थे व लाचार औरतों, बच्चों व आदमियों से लेना दूसरा प्रष्न है...उन्होंने कांग्रेस का विरोध करके और इस कठोरता से कि न व्यक्तित्व का ख्याल, न सभ्यता व शिष्टता का ध्यान, जनता में एक प्रकार की बेचैनी पैदा कर दी थी। इनकी सारी स्पीचिज सांप्रदायिक विष से भरी थीं। हिन्दुओं में जोश  पैदा करना व उनकी रक्षा के प्रबन्ध करने के लिए यह आवश्यक न था कि वह जहर फैले। इस जहर का फल अन्त में यही हुआ कि गांधी जी की अमूल्य जान की कुर्बानी देश  को सहनी पड़ी और सरकार व जनता की सहानुभूति जरा भी आरएसएस के साथ नहीं रही, बल्कि उनके खिलाफ हो गयी। उनकी मृत्यु पर आरएसएस वालों ने जो हर्ष प्रकट किया था और मिठाई बांटी, उस से यह विरोध और बढ़ गया और सरकार को इस हालत में आरएसएस के खिलाफ कार्यवाही करना जरूरी ही था।
‘‘तब से अब 6 महीने से ज्यादा हो गए। हम लोगों की आशा  थी कि इतने वक्त के बाद सोचविचार कर के आरएसएस वाले सीधे रास्ते पर आ जाएंगे। परन्तु मेरे पास जो रिपोर्ट आती हैं उनसे यही विदित होता है कि पुरानी कार्यवाहियों को नई जान देने का प्रयत्न किया जा रहा है।’’
प्रतिबंध लगने के बाद संघ की गतिविधियां ठप्प हो गईं। इसके बाद संघ द्वारा प्रतिबंध उठाने के लिए अथक प्रयास किए गए। अपने प्रयासों के दौरान गोलवलकर ने पटेल को अनेक पत्र लिखे। परन्तु पटेल ने बार-बार यह स्पष्ट किया कि प्रतिबंध उठाने के अनुरोध पर उसी समय विचार किया जाएगा जब संघ उसके संविधान का प्रारूप पेश करे।
14 नवंबर 1948 को गृह मंत्रालय की ओर से एक विज्ञप्ति जारी की गई जिसमें यह स्पष्ट रूप से कहा गया कि गोलवलकर प्रतिबंध उठवाना तो चाहते हैं परंतु संघ अपने स्वरूप और गतिविधियों में किसी प्रकार का सुधार करने को तैयार नहीं है। पटेल ने श्यामाप्रसाद मुखर्जी को लिखे एक पत्र में कहा कि संघ की गतिविधियों से देश को खतरा है। वे वास्तव में राष्ट्रविरोधी हैं। बाद में संघ ने अपने संविधान का प्रारूप पटेल को भेजा। इस प्रारूप में संघ ने यह स्पष्ट प्रावधान किया कि संघ, राजनीति में हिस्सा नहीं लेगा और अपनी गतिविधियों को सांस्कृतिक क्षेत्र तक सीमित रखेगा। यह आश्वासन देने के बावजूद, संघ अब सीधे राजनीति में भाग ले रहा है। इस तरह वह पटेल को दिए गए आश्वासन के ठीक विपरीत कार्य कर रहा है। आज भी संघ जिन उद्देश्यों के लिए काम कर रहा है वे उस संविधान के विरूद्ध हैं जिसके द्वारा हमारे राष्ट्र की सभी प्रकार की गतिविधियों का संचालन होता है।
-एल.एस. हरदेनिया

शनिवार, 2 नवंबर 2013

पटेल ने भारत को मजबूत बनाया, नेहरू ने आधुनिक

यह अत्यधिक दुःखद है कि नरेन्द्र मोदी यह दावा कर रहे हैं कि जवाहरलाल नेहरू के स्थान पर यदि सरदार पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री होते तो देश की तस्वीर अलग ही होती। वैसे तो मोदी अपने तर्कों के समर्थन में प्रायः झूठ का सहारा लेते हैं। झूठ बोलने की श्रृंखला में उन्होंने अभी हाल में यह तक कह डाला था कि नेहरू, पटेल की अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हुए थे। पलक झपकते ही मोदी के इस झूठ की पोल खुल गई।
दिनांक 29 अक्टूबर को अहमदाबाद में आयोजित एक समारोह में मोदी ने दावा किया कि यदि पटेल प्रधानमंत्री बनते तो देश की तस्वीर और होती। वैसे तो इतिहास की किसी भी घटना के बारे में किसी भी प्रकार का तर्क दिया जा सकता है। इतिहास में घटित घटनाओं की मीमांसा अनेक प्रकार से हो सकती है। यदि ऐसा होता तो क्या होता, यदि वैसा होता तो क्या होता यह मूलतः व्यर्थ की वैचारिक जुगाली के अतिरिक्त कुछ नहीं है। परन्तु जहां तक नेहरू-पटेल की तुलना का सवाल है, कुछ बुनियादी तथ्यों को याद रखा जाना आवश्यक है।
एक बार महात्मा गांधी से पूछा गया था कि वे किसे आजाद भारत के प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहेंगे। इस पर उनका उत्तर था कि मेरे साथियों में दर्जनों ऐसे लोग हैं जिनमें प्रधानमंत्री बनने की काबलियत है परन्तु प्रधानमंत्री पद के लिए मेरी पहली पसंद नेहरू हैं। महात्मा गांधी के अतिरिक्त, देश के करोड़ों नागरिक भी नेहरू को ही प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते थे। कांग्रेस पार्टी के बहुत बड़े हिस्से की पसंद भी नेहरू थे। इसके साथ ही, नेहरू, आजाद भारत के उन नेताओं में से थे जिन्होंने आजादी के आंदोलन के दौरान ही भविष्य का भारत कैसा होगा, इसकी परिकल्पना की थी। आजादी के आंदोलन के दौरान, कांग्रेस ने एक योजना समिति की स्थापना की थी जिसके अध्यक्ष नेहरू थे। इस समिति ने भविष्य के भारत का एक विस्तृत खाका तैयार किया था। इस योजना के अन्र्तगत यह तय किया गया था कि आजाद भारत का स्वरूप समाजवादी होगा। आजाद भारत में सार्वजनिक क्षेत्र को विकसित किया जाएगा, जिसके अंतर्गत बुनियादीश्उद्योगों में सार्वजनिक क्षेत्र के अतिरिक्त, निजी क्षेत्र को भी प्रोत्साहित किया जाएगा। सार्वजनिक और निजी, दोनों क्षेत्रों की देश के विकास में निर्णायक भूमिका रहेगी। आजाद भारत में नेहरू के प्रयासो के कारण सार्वजनिक क्षेत्र के प्रथम स्टील प्लांट की स्थापना भिलाई में हुई। इसी तरह, हैवी इलेक्ट्रिकल कारखाना  भोपाल में स्थापित हुआ। यह फैसला किया गया कि बिजली उत्पादन के कारखाने, सार्वजनिक क्षेत्र में होंगे। इसके साथ ही, सार्वजनिक क्षेत्र में अनेक बुनियादी उद्योग खोले गए। इससे एक औद्योगिक भारत के विकास के दरवाजे खुल गए।
औद्योगिक क्षेत्र के अलावा, कृषि के विकास के प्रति भी ध्यान दिया गया। बिना सिंचाई साधनों के, कृषि उत्पादन नहीं बढ़ सकता। इस उद्देश्य से बड़े-बड़े बांधों की नींव डाली गई। आजाद देश का प्रथम बड़ा भाखड़ा नंगल बांध पंजाब में सतलुज नदी पर बना। नेहरू जी ने स्वयं उसका उद्घाटन किया। आधुनिक भारत के बड़े कारखानों और बांधों को नेहरू ने आधुनिक मंदिर बताया। देश के औद्योगिकरण के लिये प्रतिभावान वैज्ञानिकों की जरूरत पड़ना स्वाभाविक है। वैज्ञानिक तैयार हो सकें, इस उद्देश्य से आई. आई. टी. की स्थापना की गई।
राजनीतिक दृष्टि से भी भारत एक आधुनिक देश बने इसलिए देश के सभी वयस्क नागरिकों को मताधिकार दिया गया। उस समय देश में साक्षरता का प्रतिशत शायद दस ही था। परन्तु अशिक्षितों को भी सरकार चुनने का अधिकार मिला। नेहरू जी के प्रयासों से ही ऐसा संविधान बना जिसके अंतर्गत सभी नागरिकों को मूलभूत अधिकार मिले। मूलभूत अधिकारों की रक्षा के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका की नींव डाली गई। सर्वशक्तिमान संसद की स्थापना की गई। पांच वर्ष में आवश्यक रूप से चुनाव होंगे, इसकी संवैधानिक व्यवस्था की गई।
नेहरू जी को इतिहास का गहरा ज्ञान था। उनकी किताबें ‘विश्व इतिहास की झलक’, ‘भारत एक खोज’ आदि इसका प्रतीक हैं। उन्होंने भारतीय इतिहास का गहन अध्ययन किया था। राजनीति में प्रवेश के पहले, लंदन में शिक्षा प्राप्त करने के बाद, उन्होंने भारत के विभिन्न स्थानों की यात्रा की और देश की जनता की समस्याओं से रूबरू हुए। देश के अतिरिक्त, उन्होंने अनेक बार विदेशों की यात्राएं भी कीं थीं। विश्व के अन्य देशों के आजादी के आंदोलनों का समर्थन, उन देशों में जाकर किया। उन्होंने अनेक बार दुनिया के प्रथम समाजवादी देश सोवियत रूस की यात्रा की। वे सोवियत संघ के प्रशंसकों में से थे। सोवियत क्रांति ने उनके चिंतन को काफी प्रभावित किया। उन्होंने यूरोप में फासीवाद और नाजीवाद के बढ़ते खतरे से भारत के अलावा पूरे विश्व को आगाह किया था। एक बार रोम से गुजरते हुए उन्होंने मुसोलनी से मिलने से इंकार कर दिया था।
आजाद भारत के अलावा, उन्होंने एशियाई देशों की एकता की आवश्यकता प्रतिपादित की थी। इस उद्देश्य से 1946 में उन्होंने दिल्ली में एशियाई देशों का सम्मेलन आयोजित किया था। इस सम्मेलन में शामिल राष्ट्रों में से बहुसंख्यक ऐसे थे जो उस समय आजादी के लिये संघर्षरत थे। इस सम्मेलन का उद्घाटन महात्मा गांधी ने किया था। भारत के आजाद होने के बाद, एशियाई देशों का एक विशाल सम्मेलन इंडोनेशिया के शहर बांडुंग मंे आयोजित हुआ। इस सम्मेलन के आयोजन में नेहरू जी की प्रमुख भूमिका थी। इस सम्मेलन में चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई भी शामिल हुए थे। इस सम्मेलन में एशियाई देशों के आपसी संबंधों के लिए जो सिद्धांत तय किए गए थे उन्हें पंचशील का नाम दिया गया था।
कुछ समय बाद, इन देशों को एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास नेहरू जी ने किया। इस प्रयास को गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नाम दिया गया। इस आंदोलन का मूल उद्देश्य भारत को पूंजीवादी और समाजवादी गुटों से दूर रखना था।
इसके अतिरिक्त, नेहरू जी के कारण ही भारत एक सेक्यूलर देश बन सका। अनेक लोगों का प्रयास था कि भारत हिन्दू राष्ट्र बने। मोदी शायद सोचते हैं कि यदि पटेल प्रधानमंत्री बनते तो भारत हिन्दू राष्ट्र बन जाता। मेरी राय में मोदी की यह सोच गलत है। नेहरू जी की तरह, पटेल की भी सेक्यूलर आदर्शों में अगाध आस्था थी।
अंत मंे यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि पटेल के समर्थन से ही नेहरू प्रधानमंत्री बने थे। पटेल इतने बड़े संगठनकर्ता थे और कांग्रेस पर उनकी इतनी पकड़ थी कि वे कभी भी नेहरू का तख्ता पलट सकते थे। सच पूछा जाए तो पटेल ने नेहरू जी को हमेशा अपना छोटा भाई माना और उन्होंने जीवनभर उनके साथ वैसा ही व्यवहार किया। मोदी के अलावा, संघ परिवार की ओर से पहले भी ऐसी बातंे की गई हैं कि यदि पटेल प्रधानमंत्री बनते तो देश की शक्ल और होती। पटेल ने देश की सीमाओं को बढ़ाया। भारत को एक मजबूत राष्ट्र बनाया वहीं नेहरू ने भारत को आधुनिक राष्ट्र बनाया। नेहरू-पटेल दोनों ही आज के भारत के महान नेता थे। सबसे बड़ी बात है कि दोनों महात्मा गांधी के चेले थे। मोदी को दोनों की तुलना करने से बाज आना चाहिए। मोदी में बांटने की बड़ी ताकत है। वे देश को बांट रहे हैं, उसके साथ ही वे नेहरू-पटेल के बीच भी विभाजन की रेखा खींच रहे हैं।
एक बात पूरे विश्वास के साथ कही जा सकती है कि तथाकथित लौहपुरूष आडवाणी ने 2002 के दंगों के बाद मोदी की सरकार को बर्खास्त नहीं किया। परन्तु यदि उस समय पटेल देश के गृहमंत्री होते तो वे मोदी की सरकार को तुरंत बर्खास्त कर देते। 
-एल.एस. हरदेनिया

मोदी : राजनैतिक फायदे के लिए इतिहास का दुरूपयोग

मोदी के पितृ संगठन आरएसएस की राजनीति, इतिहास, विशोषकर मध्यकालीन इतिहास, को तोड़नेमरोड़ने पर आधारित है। राजाओं को धर्म के चश्मे से देखा जाता है, मुस्लिम राजाओं का दानवीकरण किया जाता है और ऐतिहासिक तथ्यों को न केवल तोड़ामरोड़ा जाता है वरन इतिहास के बारे में सफेद झूठ भी कहे जाते हैं। इन सब को आधार बनाकर, मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाई जाती है। इतिहास का विरूपण ही वह नींव है, जिस पर संघ की राजनीति आधारित है। नरेन्द्र मोदी इसी रणनीति को अपना रहे हैं। परंतु वे मध्यकालीन की जगह आधुनिक इतिहास को तोड़मरोड़ रहे हैं और काफी निचले दर्जे की बातें कर रहे हैं। अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में उन्होंने दो आमसभाओं को संबोधित किया और एक साक्षात्कार दिया। और इन तीनों में ही उन्होंने यह दिखा दिया कि राजनैतिक लाभ के लिए वे किस हद तक गिर सकते हैं।
सरदार पटेल के स्मारक के उद्घाटन समारोह में मोदी ने कहा कि भारत का प्रथम प्रधानमंत्री सरदार पटेल को होना था। यह भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दो बड़े और महान नेताओं महात्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू की छवि को आघात पहुंचाने का प्रयास था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को पूरे देश का समर्थन प्राप्त था। उन्हें सभी क्षेत्रों, धर्मों, लिंगों और जातियों के लोग ईश्वर की तरह पूजते थे। देश का प्रधानमंत्री कौन हो, यह चुनने का अधिकार गांधी जी को दिया गया। और उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के नेहरू को इस पद के लिए चुना। महात्मा गांधी ने यह निर्णय विभिन्न कारकों पर गहन विचार करके ही लिया होगा क्योंकि सरदार पटेल और नेहरू, दोनों ही उनके बहुत प्रिय चेले थे। वे दोनों को बहुत अच्छी तरह से समझते थे। पटेल देश के उपप्रधानमंत्री व गृहमंत्री बने और इस हैसियत से उन्होंने देश में फैले 550 राजेरजवाड़ों का भारतीय संघ में विलय करवाया। यह भारत के लिए उनका बहुत बड़ा योगदान था। प्रधानमंत्री के बतौर नेहरू ने औद्योगिक विकास, शिक्षा और विदेशी मामलों में देश की नीतियों की नींव रखी और वे ॔आधुनिक भारत के निर्माता’ कहलाए। उन्होंने भारत को औद्योगिकीकरण और शिक्षा की राह पर तेजी से आगे ब़ाया और उनके द्वारा रखी गई नींव पर ही भारत आज विश्व की एक बड़ी आर्थिक शक्ति बन सका है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि पंडित नेहरू के मंत्रीमंडल के साथियों का इस वृहद कार्य में महत्वपूर्ण योगदान रहा होगा। उनकी कुछ नीतियों की आलोचना करने में कुछ भी गलत नहीं है परंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय समाज को सामंती खांचे से बाहर निकालना, महिलाओं और नीची जातियों को गुलामी से मुक्त करना और स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व जैसे प्रजातांत्रिक मूल्यों पर आधारित समाज का निर्माण, उन्हीं के महान नेतृत्व में हुआ था। सरदार पटेल की विरासत पर मोदीआरएसएस कब्जा जमाने का प्रयास कर रहे हैं। यह इस तथ्य के बावजूद कि पटेल, भारतीय राष्ट्रवाद के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध थे। वे गांधी जी के निष्ठावान अनुयायी थे और पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष थे। आरएसएस इनमे से कुछ भी नहीं है। आरएसएस और मोदी तो उन सभी मूल्यों के कट्टर विरोधी हैं, जिन पर सरदार पटेल की पूर्ण आस्था थी। मोदी की पहली कोशिश यह है कि वे पंडित नेहरू की भूमिका और उनके योगदान को कम करके बतायें। एक हिन्दी दैनिक को दिए साक्षात्कार में उन्होंने यह तक कह डाला कि नेहरू ने सरदार पटेल की अंतिम यात्रा में भाग नहीं लिया था। इस झूठ की पोल तुरन्त खुल गई। द टाईम्स ऑफ इंडिया ने सरदार पटेल के अंतिम संस्कार की खबर को मुखपृष्ठ पर छापा था और इसमें स्पष्ट शब्दों में कहा गया था कि राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद व प्रधानमंत्री पंडित नेहरू इस मौके पर मौजूद थे। अखबार ने नेहरू द्वारा पटेल को दी गई श्रृद्घांजलि भी प्रकाशित की थी जिसमें उन्होंने कहा था कि सरदार पटेल की भारत को स्वतंत्र कराने और नए भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका थी। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने एक वीडियो क्लिप अपने ब्लाग पर अपलोड की है, जिसमें नेहरू को अंतिम संस्कार में भाग लेते हुए दिखाया गया है। यह भी स्मरणीय है कि मोरारजी देसाई ने अपनी आत्मकथा (खण्ड 1, पृष्ठ 271, पैरा2) में अंतिम यात्रा में पंडित नेहरू की उपस्थिति की चर्चा की है।
यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि आरएसएस व मोदी एक ऐसे व्यक्ति को अपने आदशर के रूप में प्रचारित कर रहे हैं, जिसने राष्ट्रपिता की हत्या के बाद उनके संगठन पर रोक लगाई थी। आरएसएस के मुखिया एम.एस. गोलवलकर को सरदार पटेल ने एक पत्र में लिखा, ॔॔उसके (आरएसएस) नेताओं के भाषण साम्प्रदायिकता के जहर से भरे हुए थे। अंतिम नतीजा यह हुआ कि समाज में साम्प्रदायिकता का ऐसा जहरीला वातावरण बन गया, जिसमें इतनी भयावह त्रासदी (गांधी की हत्या) संभव हो सकी’’। (सरदार पटेल के पत्र के अंश, जिन्हें ॔आउटलुक’ पत्रिका के अप्रैल 27, 1998 के अंक में प्रकाशित किया गया था)। ॔आउटलुक’ का यही अंक हमें बताता है कि गांधी जी की मृत्यु पर आरएसएस ने खुशियां मनाईं और मिठाई बांटी। मोदी, गोडसे का अधूरा काम पूरा कर रहे हैं। वे भारतीय राष्ट्रवाद पर हिन्दू राष्ट्रवाद के हमले के प्रतीक हैं। हिन्दू राष्ट्रवादी गोडसे ने गांधी पर इसलिए हमला किया क्योंकि वे भारतीय राष्ट्रवाद के प्रतीक थे। अब एक नया हिन्दू राष्ट्रवादी, नरेन्द्र मोदी, महात्मा गांधी पर प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी पसंद को लेकर आक्रमण कर रहा है। मोदी का यह कहना कि नेहरू के स्थान पर सरदार पटेल को देश का प्रधानमंत्री होना था, नेहरू की छवि को आघात पहुंचाने का प्रयास तो है ही, उससे भी ब़कर, यह गांधी पर धा हमला है। और इसमें आश्चर्य की कोई बात भी नहीं है। मोदी उस हिन्दू राष्ट्रवाद के पैरोकार हैं, जिसे गांधी और उनकी विचारधारा इसलिए पसंद नहीं थी क्योंकि वह भारत की विभिन्नता को स्वीकार करने की हामी थी। शायद ये लोग नहीं समझते कि ऐसा करके वे सरदार पटेल का भी अपमान कर रहे हैं क्योंकि सरदार भी भारतीय धर्मनिरपेक्षता और बहुवाद के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध थे और भारत को बहुवादी और धर्मनिरपेक्ष देश बनाने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पटेल ने गांधी जी के धर्मनिरपेक्ष भारत के निर्माण के सपने को पूरा करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मोदी के एक और झूठ का पर्दाफाश किया है। उन्होंने कहा कि मोदी ने पटना में अपने भाषण में कहा कि सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य, गुप्त राजवंश के थे जबकि वे मौर्य वंश के थे। इसी तरह, मोदी ने कहा कि सिकंदर गंगा के तट तक आ पहुंचा था। जबकि सच यह है कि सिकंदर सतलुज के तट से ही यूनान लौट गया था। मोदी ने इतिहास की अपनी अज्ञानता का भरपूर प्रदशर्न करते हुए कहा कि तक्षिशला, बिहार में है, जबकि तक्षिशला भारत के पिश्चमी भाग में थी और इस समय पाकिस्तान में है। मोदी ने पटना में अपनी आमसभा में ये सब झूठ जनता को लुभाने के लिए कहे। पटना की आमसभा को ॔हुंकार सभा’ का नाम दिया गया था। हुंकार का अर्थ होता है किसी बात को जोर से और अहंकार के अंदाज में कहना। और यह फासीवादी मानसिकता का प्रतीक है। मोदी ने अपनी सभा में विरोधियों को ॔चुनचुनकर उखाड़ फेंकने’ की बात भी कही। हिटलर ने भी ठीक यही किया था। उसने भी कम्युनिश्टों, ट्रेड यूनियनों और यहूदियों को चुनचुनकर उखाड़ फेंका था। इस समय मोदी का ध्यान उनके राजनैतिक विरोधियों पर केंद्रित है परन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उनकी हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा का पुराना नारा है ॔॔पहले कसाई फिर ईसाई’’। कुल मिलाकर, एक अत्यंत खतरनाक परिदृश्य उभर रहा है। गांधी जी की प्रधानमंत्री पद के लिए पसंद पर आक्रमण कर, भारतीय राष्ट्रवाद पर हल्ला बोला जा रहा है। जनता को भड़काने के लिए गोएबल्स के अंदाज में इतिहास को तोड़ामरोड़ा जा रहा है और उसी भाषा का इस्तेमाल हो रहा है, जो फासीवादियों की याद दिलाती है।
इस समय आरएसएसभाजपा-मोदी की किसी भी अन्य राजनैतिक गठबंधन से तुलना करना बेमानी और खतरनाक है। भाजपा एक अलग तरह की पार्टी है, जिसका अंतिम लक्ष्य हिन्दू राष्ट्र की स्थापना है। और इसके नेता मोदी चाहकर भी अपने खूनी पंजों को छुपा नहीं पा रहे हैं। जो लोग भाजपा और मोदी की किसी अन्य दल से तुलना करते हैं वे गंभीर भूल कर रहे हैं, जिसकी देश को आने वाले समय में, प्रजातंत्र के खात्मे के तौर पर, भारी कीमत चुकानी होगी। हमें यह याद रखना चाहिए कि हिटलर भी प्रजातांत्रिक तरीके से सत्ता में आया था। परंतु सत्ता में आने के तुरंत बाद उसने प्रजातंत्र का गला घोंट दिया और देश पर फासीवाद लाद दिया। उसके लिए उसने एक ओर अपने गुंडों की सेना का उपयोग किया तो दूसरी ओर विभिन्न क्षेत्रों में अपने विचारधारा के समर्थकों का।
खतरे की घंटी बज चुकी है। हम सबको उठकर खड़े हो जाना चाहिए।
-राम पुनियानी

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