गांधी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
गांधी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 8 जून 2015

मोदी सरकार की पहली वर्षगांठ-भाग.2




पिछले अंक से जारी
न्यायपालिका से टकराव: प्रजातांत्रिक संस्थाओं की अवहेलना
मोदी सरकार ने अगस्त 11ए 2014 को लोकसभा में 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्तियां आयोग विधेयक 2014' व 'संविधान ;121वां संशोधन: विधेयक 2014' प्रस्तुत किए। इन दोनों विधेयकों को राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्तियां आयोग ;एनजेएसी: के गठन के लिए लाया गया था। एनजेएसी अधिनियम में उस प्रक्रिया का वर्णन किया गया है, जो कि एनजेएसी भारत के मुख्य न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों, उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों व उच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए अपनाएगा। अगर न्यायाधीशों की नियुक्ति की कॉलिजियम व्यवस्था में कमियां थीं तो एनजेएसी एक ऐसी दवा हैए जो मर्ज को और बिगाड़ेगी। इस आयोग के अध्यक्ष होंगे भारत के मुख्य न्यायाधीश। इसके सदस्यों में केन्द्रीय विधि मंत्री, उच्चतम न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश व दो प्रतिष्ठित विधिवेत्ता होंगे। प्रतिष्ठित विधिवेत्ताओं का नामांकनए प्रधानमंत्री,विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश की सदस्यता वाली त्रिसदस्यीय समिति करेगी।
इस समय देश की विभिन्न अदालतों में व विशेषकर उच्च व उच्चतम न्यायालयों में जितने भी मुकदमे चल रहे हैं, उनमें से अधिकांश में भारत सरकार एक पक्षकार है। न्यायिक नियुक्तियां आयोग में केंद्रीय कानून व न्याय मंत्री.जो कि सबसे बड़े पक्षकार के प्रतिनिधि हैं.और भारत के मुख्य न्यायाधीश.जिन्हें उन कई मुकदमों में निर्णय सुनाना है, जिनमें भारत सरकार एक पक्षकार है.एक साथ बैठेंगे। एक बड़ी पुरानी कहावत है कि न्याय न केवल होना चाहिए वरन् होते हुए दिखना भी चाहिए। अगर विधि मंत्री और आयोग के दो में एक विधिवेत्ता सदस्य मिल जाएं तो उनके पास किसी भी प्रस्तावित नियुक्ति को वीटो करने का अधिकार होगा क्योंकि एनजेएसी एक्ट में यह व्यवस्था है कि अगर आयोग के दो या दो से अधिक सदस्य किसी व्यक्ति के नाम पर सहमत न हों तो आयोग उसकी नियुक्ति की सिफारिश नहीं करेगा। जाहिर है कि एनजेएसी अधिनियम का उद्देश्य, केंद्र सरकार के प्रति नर्म रूख रखने वाले या उसकी पसंद के व्यक्तियों की उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियां सुनिश्चित करना है। भारत में लंबित मुकदमों का अंबार है। इन मुकदमों के जल्द से जल्द निपटारे और न्याय व्यवस्था को अधिक सुगम व सरल बनाने के लिए कुछ करने की बजाए,मोदी सरकार अपनी पसंद के जजों की नियुक्ति करने की जुगत भिड़ा रही है। ज्ञातव्य है कि जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे,तब मोदी और उनके मंत्रिमंडल के अनेक साथियों पर कई मुकदमे चले थे और उनके दो निकटस्थ सहयोगियों.मायाबेन कोडनानी और अमित शाह.को अदालतों ने दोषी करार दिया था।
एनजेएसी, न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सीमित करेगा। कुछ समय पहले प्रधानमंत्री मोदी ने न्यायपालिका का आह्वान किया था कि वो आत्मावलोकन व आत्म.मूल्यांकन के लिए आंतरिक मशीनरी विकसित करे। उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू व अन्य न्यायाधीशों को यह सलाह भी दी थी कि वे इस पर विचार करें कि कहीं 'पांच सितारा कार्यकर्ता' व 'पांच सितारा परिप्रेक्ष्य' तो न्यायपालिका पर हावी नहीं हो रहा है। एक तरह से यह कार्यपालिका के मुखिया द्वारा सार्वजनिक रूप से न्यायपालिका पर आक्षेप था। मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ताओं को'पांच सितारा कार्यकर्ता' कहना न केवल दुर्भाग्यपूर्ण बल्कि आधारहीन भी था। इससे ऐसा प्रतीत होना स्वाभाविक था कि कार्यपालिका, न्यायपालिका से टकराव की ओर बढ़ रही है। भारत के मुख्य न्यायाधीश ने एनजेएसी की कार्यवाही में भाग लेने से यह कहकर इंकार कर दिया कि उच्चतम न्यायालय,एनजेएसी के गठन को चुनौती देने वाली जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है।
मोदी सरकार ने सूचना का अधिकार अधिनियम ;आरटीआई के अंतर्गत मुख्य सूचना आयुक्त और खाली पड़े चार आयुक्तों के पदों पर नियुक्तियां नहीं की। इस कारण आरटीआई अर्थहीन.सा हो गया। केंद्रीय सूचना आयोग में 2011 में छः आयुक्तों ने 22,351 प्रकरणों का निपटारा किया था वहीं 2014 में सात आयुक्तों ने केवल 16,006 मामले निपटाए।
मोदी सरकार ने लोकपाल की नियुक्ति भी नहीं की। हिंदू राष्ट्रवादियों की जयजयकार के बीचए 'टीम अन्ना' ने लोकपाल की नियुक्ति के लिए कानून बनाए जाने की मांग को लेकर लंबा आंदोलन किया था। टीम अन्ना का मानना था कि लोकपाल की नियुक्ति से भ्रष्टाचार की समस्या समाप्त हो जाएगी। मोदी सरकार ने चुनाव के पहले जनता से यह वायदा किया था कि वो देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाएगी परंतु उसने तो लोकपाल की नियुक्ति करने तक की ज़हमत नहीं उठाई।
सांस्कृतिक व नैतिक पुलिस
जहां एक ओर सड़कों और चौराहों पर नैतिकता और संस्कृति के स्वनियुक्त रक्षकों की गतिविधियों में तेजी से वृद्धि हुई वहीं मोदी सरकार ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणीकरण बोर्ड के अध्यक्ष पद पर पहलाज निहलानी की नियुक्ति कर यह स्पष्ट कर दिया कि वह समाज पर अनुदारवादी व दकियानूसी परंपराएं लादने की हामी है। निहलानी फिल्म निर्माता हैं परंतु इस क्षेत्र में उनकी कोई विशेष उपलब्धि नहीं है। हां,उन्होंने मोदी के प्रचार के लिए एक फिल्म जरूर बनाई थी जिसका शीर्षक थाए 'हर हर मोदी, घर घर मोदी'।
फिल्म प्रमाणीकरण अपीलीय अभिकरण ने एक फिल्म 'मेसेंजर ऑफ गॉड' को प्रमाणीकृत कर दिया। इसके पहलेए सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म, जिसमें डेरा सच्चा सौदा के मुखिया गुरूमीत राम रहीम सिंह की मुख्य भूमिका है, को पास करने से इंकार कर दिया था। इसके कारण बोर्ड की पूर्व मुखिया लीला सैमसन के लिए उनके पद पर बने रहना कठिन हो गया और उनके साथ बोर्ड के 12 अन्य सदस्यों ने भी इस्तीफा दे दिया।
बोर्ड के 12 सदस्यों इरा भास्कर, एमके रैना, पंकज शर्मा, टीजी थियागराजन, शाजी करूण, अंजुम राजाबलि, शुभ्रा गुप्ता, निखिल अल्वा, राजीव मसंद, मनमंग दाई, केसी शेखर बाबू व आईके प्रभु ने केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री राज्यवर्धन राठौर को भेजे एक संयुक्त ईमेल में अपने इस्तीफे की सूचना देते हुए लिखा किए 'लंबे समय से हमारे धैर्य की परीक्षा ली जा रही थी और अंततः, हालिया घटनाक्रम के बाद, अध्यक्षा सुश्री लीला सैमसन ने मजबूर होकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया.हम लोग काफी लंबे समय से कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तनों की मांग करते आए हैं जो कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणीकरण बोर्ड की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए आवश्यक हैं। परंतु 'कई बार सिफारिशें और अपीलें भेजने,मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों व सचिवों के साथ कई बैठकों के आयोजन और पिछले मंत्री के साथ एक मुलाकात के बाद भी मंत्रालय ने एक भी सकारात्मक कदम नहीं उठाया'।
पहलाज निहलानी के काम करने के तरीके के विरूद्ध सेंसर बोर्ड में विद्रोह हो गया। बोर्ड के एक प्रतिष्ठित सदस्य अशोके पंडित ने निहलानी को एक 'आदिम बादशाह' बताया जो कि बोर्ड को अपना'व्यक्तिगत साम्राज्य'समझता है।  बोर्ड के कई सदस्य पहलाज निहलानी की निर्णय लेने की तानाशाहीपूर्ण प्रक्रिया से सहमत नहीं हैं और ना ही वे फिल्मों में जबरन कांटछांट करने की उनकी प्रवृत्ति से इत्तेफाक रखते हैं। वे निहलानी द्वारा बनाई गई 'गालियों' की सूची से भी सहमत नहीं हैं,जिसमें हिंदी के 15 और अंग्रेजी के 13 ऐसे शब्द शामिल हैंए जिन्हें निहलानी के अनुसार, किसी फिल्म में नहीं होना चाहिए। फिल्मी दुनिया ने निहलानी पर 'नैतिक पुलिस' बनने का प्रयास करने का आरोप लगाया तो फिल्म निर्माता विशाल भारद्वाज ने कहा कि वे तालिबान की तरह व्यवहार कर रहे हैं।
पांच सितारा कार्यकर्ता
गुजरात के सन् 2002 के दंगों के बाद, प्रधानमंत्री मोदी को कई सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा दायर किए गए ऐसे मुकदमों का सामना करना पड़ा था, जिनमें यह आरोप लगाया गया था कि उनकी और उनकी सरकार की गुजरात दंगों में भूमिका थी। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने औद्योगिकरण के नाम पर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की जमीनें जबरदस्ती अधिग्रहित किए जाने का विरोध भी किया था। जो लोग विस्थापित किए गएए उनमें मुख्यतः आदिवासी और दलित थे। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने उन लोगों के पक्ष में भी आवाज़ उठाई जिन्होंने गुजरात कत्लेआम के पीडि़तों की न्याय की लड़ाई लड़ी थी। यही कारण है कि मोदी सरकार,मानवाधिकार संगठनों पर निशाना साध रही है। प्रधानमंत्री की 'पांच सितारा कार्यकर्ता' वाली टिप्पणी को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। 'विदेशी योगदान नियमन अधिनियम';एफसीआरए के अंतर्गत 'सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस' की तीस्ता सीतलवाड और 'ग्रीनपीस' की प्रिया पिल्लई की जांच की गई। उनको मिलने वाले अनुदान और सहायता के स्त्रोतों की पड़ताल की गई और प्रिया पिल्लई को तो इंग्लैंड जाने से रोक दिया गया। वहां वे इसलिए जा रही थीं ताकि इंग्लैंड में पंजीकृत एस्सार कंपनी द्वारा छत्तीसगढ़ में किए जा रहे भारी पर्यावरणीय नुकसान के बारे में ब्रिटिश सांसदों के समक्ष एक प्रस्तुतिकरण दे सकें। इन कार्यकर्ताओं को इसलिए निशाना बनाया गया ताकि अन्य एनजीओ, हाशिए पर पड़े लोगों के अधिकारों की रक्षा से तौबा कर लें और नागरिक समाजए पर्यावरणीय व श्रम कानूनों के उल्लंघनों पर नजर रखना बंद कर दें और बड़े औद्योगिक घराने, देश की प्राकृतिक संपदा को खुलकर लूट सकें और श्रमिकों का शोषण कर अपने खजाने भर सकें।
जहां एक ओर सरकार मानवाधिकारों के रक्षकों को सींखचों के पीछे पहुंचाने के लिए हर तरह की कोशिश करती रही वहीं माया कोडनानी व बाबू बजरंगी जैसे कई दोषसिद्ध अपराधी, मोदी सरकार के पहले साल में जेलों से बाहर आने में कामयाब हो गए। इनमें गुजरात के ऐसे कई पुलिस अधिकारी शामिल हैं जिनपर झूठी मुठभेड़ों में निर्दोष लोगों को मारने के आरोप हैं। डीजी वंझारा, एमके अमीन व अन्य कई पुलिस अधिकारियों को जमानत मिल गई। जमानत पर जेल से बाहर आने के बाद वंझारा ने कहा कि उनके 'अच्छे दिन' आ गए हैं। गुजरात सरकार ने तुलसीराम प्रजापति को फर्जी मुठभेड़ में मार गिराने संबंधी मामले में गुजरात के पूर्व पुलिस महानिदेशक पीसी पांडे पर मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं दी।
सरकार की पलटियां
मोदी सरकार को अलग.अलग मुद्दों पर पलटियां खाने के लिए कई लोगों ने कटघटरे में खड़ा किया। कांग्रेस द्वारा प्रकाशित एक पुस्तिका में शुरूआती 180 दिनों के 25 यू.टर्नों की सूची दी गई है। इनमें शामिल हैं सौ दिन के भीतर विदेशों में जमा काला धन वापिस लाना व हर भारतीय के खाते में 15 लाख जमा करना आदि। बाद में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि अगर काला धन वापिस आया तो भी उसे हर भारतीय के खाते में जमा नहीं कराया जाएगा और यह भी कि हर भारतीय को 15 लाख रूपये मिलने की बात तो चुनाव प्रचार का एक जुमला थी।
स्वच्छ भारत अभियान से भी बहुत कुछ हासिल नहीं हुआ। यह अभियान केवल नारेबाजी और प्रतीकात्मकता तक सीमित रह गया। इस अभियान को असफल होना ही था क्योंकि सरकार की इसमें बहुत कम भूमिका थी और मुख्य काम नागरिकों को करना था। साफ.सफाई का उच्च स्तर बनाए रखने के लिए ढ़ेर सारे संसाधनों और उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है। चाहे वह जमीन हो, हवा, पानी या मनुष्य का दिमाग.सफाई बनाए रखना एक कठिन और खर्चीला काम है। इस अभियान ने गांधी की तौहीन की। गांधीजी की विराट भूमिका को केवल साफ.सफाई तक सीमित कर दिया गया। सरकार ने क्रिसमस के त्योहार का महत्व घटाने की कोशिश भी की। इसके लिए 25 दिसंबर को सुशासन दिवस मनाया गया।
हमें क्या करना चाहिए
हाशिए पर पड़े वर्गों के कुछ हिस्सेए विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले लोगों का मोदी सरकार से मोहभंग हो रहा है। हम यह नहीं कहते कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए की सरकार का प्रदर्शन बेहतरीन था। परंतु यह सरकार उससे भी बुरी साबित हुई है।
दलितए आदिवासी, श्रमिक व छोटे व सीमांत कृशकों जैसे वंचित समुदायों के लिए अच्छे दिन केवल सरकार की नीतियों के प्रभाव से उन्हें परिचित करवाने से नहीं आएंगे। इन वर्गों के लोगों को साम्प्रदायिकता की अफीम चटाई जा रही है ताकि वे अपनी समस्याओं के असली स्त्रोत को न पहचान सकें और एक दूसरे वंचित तबके.अल्पसंख्यकों.को अपना शत्रु समझ लें। साम्प्रदायिक राजनीति का मूलमंत्र ही यह है कि समाज के एक वंचित व दमित तबके को दूसरे वंचित व दमित तबके से भिड़ा दिया जाए। दरअसल सबसे राक्षसी कुटिलता वाली शासन प्रणाली वह नहीं होती जिसमें ऊपर बैठे लोग नीचे वालों को नियंत्रित करते हैं बल्कि वह होती है जिसमें ऊपर बैठे लोग सभी को आपस में लड़वाते रहते हैं।
हमें लोगों की भौतिक जिंदगी बेहतर बनाने के लिए तो लड़ना ही हैए हमें अपनी संस्कृति व परंपराओं का आलोचनात्मक परीक्षण भी करना होगा। भारत विविधताओं का देश है और हमें ऐसी शिक्षा व्यवस्था की जरूरत है जो विद्यार्थियों को विविधता और बहुवाद का सम्मान करना सिखाए।
----------इरफान इंजीनियर

रविवार, 22 मार्च 2015

‘लक्षित आक्रमण’ से पैदा होता अविश्वास का वातावरण

  धर्मनिरपेक्षता तथा सहिष्णुता से लिए दुनिया में अपनी अलग पहचान रखने वाला हमारा देश भारतवर्ष इन दिनों अल्पसंख्यक  समुदाय विशेष·कर ईसाई समुदाय से  चर्च,मिशनरी स्कूलों तथा नन आदि पर होने वाले लक्षितआक्रमण को लेकर एक  बार फिर चर्चा में है। हालांकि देश मेें ऐसे धर्मस्थलों पर होने वाले हमलों का  इतिहास कोई नया नहीं है। परंतु इस बात से भी इंकार नहीं किया  जा सकता कि देश में नरेंद्र मोदी सरकार के  सत्ता में आने के  बाद दक्षिणपंथी उग्र विचारधारा रखने वाली शक्तियों के  हौसले काफ़ी बढ़ गए हैं। और शायद यही वजह है कि केवल राजधानी दिल्ली में दिसंबर 2014 सेलेकर अब तक  ऐसे 6 हादसे घटित हो चुके  हैं जिनमें विभिन्न चर्चों व कान्वेंट स्कूलों पर हमले किए गए। पहला हादसा दिसंबर में सेंट सिबेसटियन चर्च, दिलशाद गार्डन में घटित हुआ जिसमें आसामाजिक तत्वों द्वारा चर्च में तोड़फोड़ की गई। केंद्रीय गृहमंत्रालय ने इस हादसे की जांच के लिए एसआईटी भी गठित की  है। दूसरी घटना इसके  बाद जसेला क्षेत्र में हुई जिसमें एक चर्च पर पत्थरबाज़ी की गई। तीसरी घटना में रोहिणी के  एक  चर्च में क्रिसमस  का  पालना जला दिया गया। इसी प्रकार विकासपुरी में कुछ लोगों द्वारा एक चर्च पर आक्रमण किया गया तथा तोड़फोड़की गई। इसके पश्चात वसंतकुंज के  एक चर्च में तोड़फोड़ व हमला किए जाने का  समाचार आया। और अभी ताज़ातरीन घटना में वसंतकुंज  के एक ईसाई  स्कूल में भी अवांछित तत्वों द्वारा लूटपाट की घटना अंजाम दी गई है। हालांकि इनमें से कई घटनाओं को दिल्ली पुलिस सांप्रदायिकतापूर्ण अथवा लक्षित हिंसा के दृष्टिकोण से नहीं देखना चाह रही है। परंतु कुछ ही समय के अंतराल में एक ही समुदाय के धर्मस्थलों व  स्कूल पर होने वाली इस प्रकार की घटनाओं ने अल्पसंख्यक ईसाई समुदाय के लोगों के दिलों में भय व दहशत का माहौल ज़रूर पैदा कर दिया है। दिल्ली में ईसाई धर्मस्थलों पर हुए हमलों के विरोध में ईसाई समुदाय के लोगों को गुहमंत्री राजनाथ सिंह के  निवास पर प्रदर्शन तक  करना पड़ा है।

                उपरोक्त घटनाओं की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी ने भी पिछले दिनों अपने एक सार्वजनिक संबोधन में इन्हीं घटनाओं के परिपेक्ष्य में देश के अल्पसं यकों को पूर्ण सुरक्षा का भरोसा भी दिलाया। इसके अतिरिक्त भाजपा शासित राज्य हरियाणा के हिसार में एक निर्माणधीन चर्च को कुछ उपद्रवियों द्वारा गिरा दिया गया तथा कथित रूप से इसमें हनुमानजी की मूर्ति  उग्र भीड़ द्वारा स्थापित कर दी गई। ऐसे ही एक लक्षित  आक्रमण में पश्चिम बंगाल -में कोलकाता से मात्र 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित रानाघाट टाऊन में गत् 14 मार्च को एक 72 वर्षीय नन के साथ कुछ लोगों द्वारा सामूहिक बलात्कार किया गया। कान्वेंट स्कूल में काम ·रने वाली इस नन ने हालांकि अपराधियों को सार्वजनिक रूप से माफ किए जानेकी घोषणा तो ज़रूर कर दी है परंतु पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने अपराधियों की गिरफ़तारी हेतु तथा मामले  की   तह तक जाने के लिए इस घटना को सीबीआई के  सुपुर्द कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हरियाणा व पश्चिम बंगाल में घटी इन दोनों घटनाओं पर संज्ञान लेते हुए घटनाओं  की रिपोर्ट तलब की  है। दूसरी ओर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने हिसार की घटना के पीछे ईसाई समुदाय द्वारा धर्म परिवर्तन कराए जाने के चलते लोगों के आक्रोशित होने का  अंदेशा जताया है। वहीं विश्व हिंदू परिषद के कुछ जिम्मेदार नेता भी  आक्रमणकारियों का बचाव करते दिखाई दे रहे हैं। हद तो यह है कि विश्व हिंदू परिषद के एक नेता ने 72 वर्षीय नन के साथ हुई बलात्कार की घटना को  भी ईसाई संस्क्रतिका एक  हिस्सा बताकर अपराध की गंभीरता को ·मकरने की कोशिश की  है। सवाल यह है कि अल्पसं यक समुदायके प्रति होने वाले इस प्रकारके दुरव्यहार,उनके  विरुद्ध होने वाली आपत्तिजनक बयानबाजि़यां,धर्मस्थलों व उनकी शिक्षण संस्थाओं पर होने वाले हमले आखिर क्या संकेत दे रहे हैं? ऐसी शक्तियों के  हौसले आखिर ऐसी शक्तियों के  हौसले आखिर नेरंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद ही  क्योंकर बुलंद हो गए हैं? और क्या वर्ग विशेष के लोगों में भय तथा अविश्वास की भावना पैदा होना या इसका बढ़ना देशकी प्रगति तथा विकास अथवा इसकीअंतर्राष्ट्रीय छवि के लिए हानिकारक नहीं है?

                जूलियो रिबैरो भारतीय पुलिससेवा का  एक  ऐसा वरिष्ठतम नाम है जिनकी सेवाओं के लिए राष्ट्र हमेशा उनका कृतग रहेगा। उन्होंने मुंबई पुलिस कमिश्रनर के रूप में अपनी सेवाएं दीं। पंजाब तथा गुजरात में भी वे पुलिस महानिदेशक रहे तथा उनके बेहतरीन सेवा रिकार्ड व बेदाग छवि के मद्देनज़र उन्हें रोमानिया का राजदूत भी नियुक्तकिया गया। इस समय श्री रिबेरो 86 वर्ष की आयु के हो चुके हैं। गत् दिनों देश के एक प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी दैनिक में उन्हें एक लेख लिख·र अपनी पीड़ा को सार्वजनिक करने के लिए मजबूर होना पड़ा। वे देश में लगातार बढ़ रहे ऐसे लक्षित आक्रमण व हिंसा की  घटनाओं से   चिंतित हैं कि वे स्वयं को अपने ही देश में एक परदेसी सा महसूस करने लगे हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह सारी घटनाएं हिंदू दक्षिण पंथियों द्वारा अंजाम दी जा रही हैं जो बेहद खतरनाक हैं। उन्होंने पाकिस्तान में जनरल जि़या उल हक के शासनकाल के बाद पाकिस्तान के   बिगड़े हालात का उदाहरण देते हुए कहा है कि जिस प्रकार पाकिस्तान आज इतने बुरे दौर से इन्हीें सांप्रदायिकता पूर्ण विचारों के चलते पहुंच गया है वैसी स्थिति हमारे देश में पैदा नहीं होनी चाहिए। उनका भी यही मानना है कि पिछले 9 महीने से इस प्रकार की घटनाओं में तेज़ी से इज़ाफा हुआ है तथा सांप्रदायिक शक्तियों का सशक्तीकरण हुआ है। आखिर देश के इतने जि़म्मेदार तथा दबंग व बेदाग छवि के पुलि अधिकारी द्वारा जिसकी अपनीकई पुश्तें भारत में ही पैदा हुईं,पलीं-बढ़ी तथा देश की सेवा करती रहीं उन्हें स्वयं को  परदेसी समझने के ज़रूरत  आखिर क्यों महसूस हुई? क्या यह हमारे देश के लिए,यहां की शासन व्यवस्था,सरकार तथा संविधान के लिए यह चिंता का विषय नहीं है? क्या ऐसे लोगों ·ी व्यथा दृुनिया में देश का  सिर झुकाने के लिए काफी नहीं है?

                   ईसाईयों अथवा उनके धर्मस्थलों पर होने वाले हमलों अथवा उनके साथ किए जा रहे बलात्कार अथवा अन्य हिंसक घटनाओं को यह कहकर कतई जायज़ नहीं ठहराया जा सकता कि यह उस समुदाय के लोग हैं जो धर्म परिवर्तन कराते रहते हैं। हां इस विषय को  उछालकर तथा उन पर यह आरोप मढ़कर राजनीति ज़रूर की जा सकती है। गुजरात,छत्तीसगढ़ तथा मध्यप्रदेश जैसे भाजपा शासित राज्यों में ही जा·र यह बखूबी देखा जा सकता है कि दूर-दराज़  के क्षेत्रों में जहां आदिवासी व जनजातीय समुदाय के लोग रहते हैं तथा जहां सरकार की ओर से सुविधायुक्त अस्पताल तथा पाठशालाओं की व्यवस्था नहीं हो सकी  है वहां ईसाई मिशनरीज़ द्वारा स्वास्थय केंद्र भी खोले गए हैं तथा स्कूल भी संचालित किए जा रहे हैं। ज़रा सोचिए कि एक बीमार व्यक्ति अपने इलाज हेतु क्या किसी ईसाई स्वास्थय केंद्र पर जाने से इंकार ·रेगा जबकि वहां सरकार अथवा उसके अपने धर्म की ओर से कोई दूसरा सवास्थयकेंद्रर संचालित न किया जा रहा हो? यही हाल शिक्षा का भी है। जहां सरकारी स्कूल नहीं है वहां ईसाईयों ने मिशनरीज़ द्वारा संचालि स्कूल खोल रखे हैं। अब यदि धर्म परिवर्त रोकना है तो सर्वप्रथम उन कारणों की तलाश की जानी चाहिए जिसके चलते दूसरे समाज के लोग ईसाई समुदाय की ओर आकर्षित होने के लिए मजबूर होते हैं। असमानता व ऊंच-नीच व जात-पात की भावना भी इनमें एक महत्वपूर्ण कारण है। अभी इसी वर्ष जनवरी के दूसरे सप्ताह में बिहार के सारण व गया जि़लों में 1700 हिंदू,दलित व महादलित समुदाय के लोगों द्वारा बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया गया। इनमें बारह सौ लोग सारण जि़ले के बैंकथपुर व कुदारबाघा गांव के थे जबकि पांच सौ लोगों गया में बौद्ध धर्म अपनाया। इन लोगों का     कहना था कि उन्हें रोज़मर्रा में जीवन में सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ रहा था। और उन्होंने बौद्ध धर्म इसलिए अपनाया कि इसमें एकता पर ज़ोर दिया जाता है तथा वहां आपस में भेदभाव का कोई स्थान नहीं है।

                   बाबा साहब भीमराव अंबेडकर से लेकर अब तक लाखों लोग भारतवर्ष में बौद्ध धर्म अपना चुके हैं। बौद्ध धर्म के धर्मगुरुओं द्वारा तो किसी प्रकार की लालच दिए जानेकी भी कोई खबर नहीं आती। ऐसे में क्या बौद्धधर्म सथलों पर या उनके शिक्षण संस्थानों पर आक्रमणकर दिया जाना चाहिए? या फिर इस समुदाय के लोगों के साथ भी हिंसा से पेश आना चाहिए? या फिर इनके लिए भी कथित घरवापसी की मुहिम छेड़े जाने की ज़रूरत है? दरअसल नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने के  बाद सांप्रदायिकतावादी सोच रखने वाले संगठनों तथा इनके नेताओं के हौसले सातवें आसमान पर पहुंच गए हैं। कोई गांधीजी को अपमानित कर रहा है तो कोई गोडसे की  मूर्ति स्थापित करने पर तुला है। कोई घर वापसी के मिशन में लगा हुआ है तो कहीं हिंदुओं कोई जनसंख्या कम होने का भय दिखाया जा रहा है। कोई भाजपा नेता मस्जिदों को तोड़े जाने को जायज़ ठहरा रहा है तो कोई  देश को हिंदू राष्ट्र घोषित किए बैठा है।कई सांसद ऐसे हैं जो सार्वजन· रूप से धर्म विशेष के लोगों को अपमानित ·रते व उनके विरुद्ध ज़हर उगलते देखे जा रहे हैं। और यही हालात ऐसे है जिनकी वजह से गणतंत्र दिवस पर भारत पधारे अमेरिकी राष्ट्र्रपति बराक ओबामा को एकता व धार्मिक सहिष्णुताका पाठ पढ़ाना पड़ा। संभव है कि ऐसी परिसिथतियां चंद सांप्रदायिकतावादी लोगों केलिए संतोष अथवा प्रसन्नता का कारण बनती हों अथवा इस प्रकार होने वाले धु्रवीकरण का लाभ उन्हें सत्ता के रूप में मिल जाता हो। परंतु इस प्रकार के हालात देश की अंतराष्ट्रीय छवि तथा भारत की धर्मनिरपेक्ष वैश्विक पहचान पर धब्बा ज़रूर हैं। -तनवीर जाफरी

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

जस्टिस दवे का स्वप्न: धर्मनिरपेक्ष भारत का दुःस्वप्न

गुजरात विश्वविद्यालय के कंवेंशन हॉल में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए गत 2 अगस्त को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति अनिल आर.दवे ने कहा कि 'अगर मैं भारत का तानाशाह होता तो पहली कक्षा से गीता और महाभारत की पढ़ाई शुरू करवा देता। यही एक तरीका है, जिससे आप यह सीख सकेंगे कि हमें कैसा जीवन जीना चाहिए। अगर कोई कहे कि मैं धर्मनिरपेक्ष हूं या मैं धर्मनिरपेक्ष नहीं हूं तो इसके लिए मैं क्षमा चाहूंगा परंतु हमें हर जगह से अच्छी चीजें लेनी होंगी।'
उनके इस कथन की देश के उदारवादी, प्रगतिशील तबकों में कड़ी प्रतिक्रिया हुई। धर्मनिरपेक्षता के पैरोकारों ने भी न्यायमूर्ति दवे के विचारों का विरोध किया और उनपर अपनी चिंता जताई। परंतु उनके विरोध और चिंता के आधार अलग थे। कुछ लोगों ने इस संभावना पर चिंता व्यक्त की कि शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में धार्मिक पुस्तकों का समावेश किया जा सकता है ;यद्यपि यह पहली बार नहीं है कि इस तरह की चिंता व्यक्त की गई हो। कुछ अन्य का तर्क था कि 'गीता पढ़ाना भारतीय धर्मनिरपेक्षता के विरूद्ध नहीं है परंतु केवल गीता पढ़ाना धर्मनिरपेक्षता का मखौल बनाना है।' इस मतविभिन्नता का कारण है धर्मनिरपेक्षता की मूल भावना व उसकी परिभाषा के संबंध में एकमत का अभाव। क्या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ अधार्मिकता है अथवा धर्म.विरोध ? क्या इसका अर्थ यह है कि हम सभी धर्मों और उनकी शिक्षाओं को आत्मसात करें या सभी धर्मों का विरोध करें?उदाहरणार्थ, क्रिस्टोफर जेफरलॉट का तर्क है कि 'यह सिद्धांत ;धर्मनिरपेक्षता न तो धार्मिकता का समर्थन करता हैए ,न अधार्मिकता का और ना ही यह धार्मिकता का विरोधी है। बल्कि यह धार्मिकता से पूरी तरह सुसंगत है। राज्य,समाज में धर्म के महत्व को स्वीकार करता है और आवश्यकतानुसार सभी धर्मावलंबियों के समर्थन में हस्तक्षेप करता है। वह हर किस्म की धार्मिक गतिविधियों के लिए माली इमदाद उपलब्ध करवाता हैए चाहे वह सिक्खों की पाकिस्तान में स्थित उनके तीर्थस्थलों की यात्रा हो या हिन्दुओं की अमरनाथ यात्रा';जेफरलॉट 2014। कुछ अन्यों का तर्क है कि धर्म का मूलचरित्र ही दमनकारी है और अगर हमें समाज में समानता लानी है तो हमें हर किस्म के धार्मिक ढांचे को तोड़ना होगा। अंबेडकर का एक प्रसिद्ध कथन है,'असमानता, हिन्दू धर्म की आत्मा है'। इस तरहए अंबेडकर के लिए प्रजातांत्रिक,समतावादी भारत के निर्माण के उनके स्वप्न को पूरा करने के लिए हिन्दू धर्म को त्यागना आवश्यक था।
किसी व्यक्ति के लिए धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा चाहे जो हो परंतु भगवद्गीता जैसी पुस्तक को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने का सुझाव खतरनाक और चिंतित करने वाला है। इसका कारण मात्र यह नहीं है कि धार्मिक पुस्तकें किसी धर्मविशेष से जुड़ी होती हैं वरन् यह भी है कि आलोचनात्मक दृष्टिकोण का अभाव,हमारी शिक्षा व्यवस्था का केन्द्रीय तत्व है। और गीता जैसी पवित्र पुस्तक के मामले में तो आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाना लगभग असंभव हो जायेगा। इसके अलावा,जस्टिस दवे ने जिन'अच्छी चीजों'के  लेने की बात कही है उसकी भी गहरी पड़ताल जरूरी है। जातिगत व लैंगिक ऊँचनीच, दमनकारी व भेदभावपूर्ण व्यवस्था का आधार हैं। और भारतीय परंपरा में इस जातिगत और लैंगिक ऊँचनीच का न केवल महिमामंडन किया गया है वरन् उसे 'भारतीय संस्कृति' का अविभाज्य हिस्सा मान लिया गया है। अगर भगवद्गीता को पाठ्यपुस्तकों में शामिल किया जायेगा तो क्या उस पर बहस करने और उसका आलोचनात्मक अध्ययन करने का अधिकार विद्यार्थियों और शिक्षकों को दिया जायेगा ? जिस देश में धार्मिक मुद्दों को आस्था से जोड़कर,बहस और आलोचना से ऊपर रखा जाना सामान्य और औचित्यपूर्ण माना जाता हो वहां क्या इस बात की जरा सी भी संभावना है कि किसी धार्मिक पुस्तक की आलोचनात्मक व्याख्या को सहन किया जायेगा? इसलिएए, गीता चाहे कितनी भी शिक्षाप्रद और विद्वतापूर्ण पुस्तक क्यों न हो, उसे स्कूलों में पढ़ाया जाना एक गलत और खतरनाक कदम होगा। यहां यह समझना उपयोगी होगा कि गीता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने से पहले उसके आलोचनात्मक अध्ययन को स्वीकार्य बनाना क्यों आवश्यक है। यह भी समझना आवश्यक है कि ;जस्टिस दवे की मान्यता के विरूद्ध गीता,ज्ञान और प्रेरणा का अनन्य स्त्रोत नहीं है।
यह सही है कि गीता को अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है और उसकी शिक्षाओं ने कई धर्मों के लोगों को प्रेरणा दी है। इनमें शामिल हैं महात्मा गांधी, बालगंगाधर तिलक और अरविंदो। परंतु यह भी उतना ही सही है कि अंबेडकर ने गीता की कटु आलोचना की है। गीता पर अंबेडकर के विचार, उनकी अप्रकाशित पुस्तक 'वोल्युशन एण्ड काउंटर रेवोल्यूशन इन एन्शिएन्ट इंडिया';प्राचीन भारत में क्रांति व प्रतिक्रांति में उपलब्ध हैं।
अंबेडकर की दृष्टि में, ,'भगवद्गीता न तो धार्मिक पुस्तक है और ना ही दार्शनिक ग्रंथ। गीता केवल कुछ धार्मिक रूढि़यों को दार्शनिक आधारों पर उचित ठहराती है। यह प्रतिक्रांति का दर्शनशास्त्रीय बचाव है';पंडित,1992। अंबेडकर के अनुसार, बौद्ध धर्म द्वारा भारत में लाई गई नैतिक, सामाजिक और राजनैतिक क्रांति की प्रतिक्रिया में, ब्राह्मणों ने ब्राह्मणवाद की पुनर्स्थापना के लिए जो अभियान चलाया, वह प्रतिक्रांति थी। वे लिखते हैं, 'प्रतिक्रांति को दार्शनिक आधार पर उचित ठहराने का प्रयास अध्याय 2 के श्लोक 2 से 28 तक स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। गीता दो तरह के तर्कों का सहारा लेती है। पहला तर्क यह है कि दुनिया नाशवान और मनुष्य नश्वर है। हर मनुष्य को एक न एक दिन मरना है। इसलिए ज्ञानियों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि कोई मनुष्य स्वाभाविक मृत्यु को प्राप्त होता है या वह हिंसा में अपनी जान गंवाता है। जीवन मिथ्या है इसलिए उसके न रहने पर आंसू बहाना व्यर्थ है। मृत्यु अवश्यम्भावी है इसलिए इस बात की क्यों फिक्र करना की वह कैसे और कहां होती है...एक अन्य रूढि़, जिसके समर्थन में गीता दर्शनशास्त्रीय तर्क देती है वह है चातुर्वर्ण....वह चातुर्वर्ण को इस आधार पर उचित ठहराती है कि उसका संबंध मनुष्य के जन्मजात और प्रकृतिदत्त गुणों से हैं..............एक तीसरी रूढि़, जिसका गीता बचाव करती है वह है कर्म मार्ग। गीता के अनुसार, 'कर्म मार्ग का अर्थ है मुक्ति पाने के लिए यज्ञों आदि जैसे कर्मकाण्ड करना।'
अंबेडकर की गीता की इस आलोचना का मैंने विस्तार से वर्णन इसलिए किया है क्योंकि अगर गीता को पाठशालाओं में पढ़ाया जायेगा तो इस तरह के आलोचनात्मक स्वरों को कुचल दिया जायेगा। आलोचनात्मक विश्लेषण को 'ज्ञान' के हाशिए पर पटक दिया जायेगा। इस तरह की आलोचनाओं को हम सही मानें या गलत परंतु यह निश्चित है कि उन पर कक्षाओं में चर्चा नहीं की जायेगी.और यह भी हो सकता है कि ऐसे विचार रखने वालों को खलनायक बताया जाने लगे.और इससे भारत का प्रजातांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष तानाबाना खतरे में पड़ जायेगा। यह सही है कि ज्ञान और इतिहास का प्रभुत्वशाली वर्ग का संस्करण पहले से ही समाज पर छाया हुआ है और केवल गीता को पढ़ाए जाने से वह अस्तित्व में आयेगाए ऐसा नहीं है। परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि गीता को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने से विद्यार्थियों की उनके और 'दूसरों'के धर्मों की समझ पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। संभावना यही है कि पाठ्यक्रमों में गांधीजी द्वारा की गई गीता की प्रशंशा तो शामिल की जायेगी परंतु अंबेडकर द्वारा उसकी निंदा को कोई स्थान नहीं मिलेगा। इसके दो संभावित कारण हैं। पहला यह कि हमारे पाठ्यक्रमों में पहले से ही अंबेडकर की तुलना में गांधी को बहुत अधिक महत्व दिया जाता रहा है और दूसरे, अंबेडकर की आलोचना को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने से इस मान्यता को धक्का पहुंचेगा कि गीता अथाह ज्ञान की सर्वकालिकए त्रुटिरहित व अंतिम स्त्रोत है।
यही बात गीता की स्त्रीवादी टीकाओं के बारे में भी सही है। गीता के एक प्रसिद्ध प्रसंग में अर्जुन युद्ध लड़ने से इस आधार पर इंकार करते हैं क्योंकि उसके कारण बड़े पैमाने पर मानव वध होगा। वे चिंतित हैं कि युद्ध के बाद अराजकता फैल जायेगी और महिलाओं की स्थिति में गिरावट आयेगी। युद्ध के परिणामस्वरूप 'कुलक्षय' होगा। कुल के क्षय से अपना आशय स्पष्ट करते हुए अर्जुन कहते हैं कि महिलाओं की स्थिति में गिरावट का अर्थ है अंतर्जातीय विवाह और वर्गीय व जातिगत ढांचे का बिखरना। स्पष्टतः इसका मतलब यह है कि अंतर्जातीय विवाह उन सबसे घातक कृत्यों में से एक है जो कोई मनुष्य कर सकता है और यह महिलाओं की स्थिति में गिरावट के कारण किया जाता है। इसके अतिरिक्त, गीता यह भी कहती है कि महिलाओं का स्वयं का कोई वजूद नहीं है और वे अपने जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में अपने पिता,पति व पुत्रों पर निर्भर हैं।
यह कहना गलत नहीं होगा कि इस तरह के विचारों का इस्तेमालए दकियानूसी ताकतों द्वारा 'पारंपरिक' या 'सभ्य' भारतीय नारी को परिभाषित करने के लिए किया जाने लगेगा और इन स्थापित नियमों का जरा सा भी उल्लंघन करने वाली महिलाओं का दानवीकरण होने लगेगा।
इस प्रकार, गीता को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने से जो सबसे बड़ा खतरा है वह समानता, प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता को है.चाहे धर्मनिरपेक्षता की हमारी परिभाषा व समझ कुछ भी क्यों न हो। इसका मूल कारण यह है कि अत्यंत श्रद्धा से देखे जाने वाले किसी भी धार्मिक ग्रंथ को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने के बाद उसके किसी भी प्रकार के आलोचनात्मक अध्ययन व विश्लेषण की सभी संभावनाएं समाप्त हो जायेंगी और असहमति के सभी स्वरए जो पहले से ही हाशिए पर हैं,पूरी तरह कुचल दिए जाएंगे।
-रिदिमा शर्मा

सोमवार, 16 जून 2014

चुनावी नतीजे: देश दक्षिणपंथ की ओर

    आखिरकार कई वर्षों और दशकों की मशक्कत के बाद भाजपा को अकेले बहुमत मिल ही गया। एक मायने में यदि यह अचरज भरा है तो अन्य दृष्टि से ऐसा नहीं है। ऐसे सत्ता परिवर्तन की तैयारियाँ काफी अरसे से की जा रही थीं और इसके लिए जनता के बीच सांप्रदायिक धु्रवीकरण और अन्य ‘प्रयोग’ किए जा रहे थे, जैसा की नई शासक पार्टी ने खुद कई बार दावा किया है। इस परिवर्तन की कई खासियतें हैं और उन पर आने वाले समय में विचार-विश्लेषण होता रहेगा। सुनियोजित योजना के तहत पिछले दो एक दशकों से भाजपा केन्द्र में अपनी सत्ता लाने की कोशिश में रही है।
    वैसे जनतंत्र में सभी को चुनाव लड़ने और सत्ता में आने, उचित संख्या में सीटें प्राप्त करके अपनी सरकार बनाने का आधिकार है और इसमें कोई गलत भी नहीं है   लेकिन इस सन्दर्भ में कुछ विशेषताओं की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। पहली बार सत्ताधारी पार्टी इतने कम मतों से जीत कर आई है। भाजपा को मात्र 31 प्रतिशत वोट मिले हैं और बाकी सभी को 69 प्रतिशत का विशाल बहुमत, जो सीटों के रूप में रूपांतरित नहीं हो पाया। इधर कुछ समय से समानुपातिक चुनाव प्रणाली के पक्ष में विचार दिए जा रहे हैं। इन चुनाव नतीजों से चुनाव प्रणाली बदलने का तरीका मजबूत होता है। आखिर    जिनको 20 या 50 या 69 प्रतिशत मत मिले हैं उनका उचित प्रतिनिधित्व तो होना ही चाहिए। इस माने में नतीजे एकतरफा हैं।
दक्षिणपंथ की जीत
    इस देश में पहली बार वह ताकत जीत कर आई है जिसका आजादी के आंदोलन से कोई संबंध नहीं था। साथ ही हर मायने में एक दक्षिणपंथी पार्टी की सरकार बनी है। संघ ने हमेशा ही स्वतंत्रता संग्राम से स्वयं को अलग रखा और अपना निशाना ब्रिटिश साम्राज्यवाद को नहीं बल्कि कुछ समुदायों को बनाया। संघ ने साफ कहा कि वह राजनैतिक संस्था नहीं है, इसलिए आजादी की लड़ाई में भाग नहीं लेगी। अब अचानक इतने अरसे बाद वह चुनाव के राजनैतिक मैदान में क्यों कूद पड़ी, यह अचरज की तथा विश्लेषण की बात है। इसका जवाब तो उन्हे ही देना है। इस मानसिकता से वे देश को कैसे चलाएँगे, यह देखना है। वैसे देश का जनतांत्रिक ढाँचा किसी को इतनी आसानी से उसे तोड़ने की शक्ति नहीं देता, फिर भी खतरा तो है ही।
    हम यह भी याद करें की सांप्रदायिक शक्तियों से लड़ते हुए गणेश शंकर विद्यार्थी और महात्मा गाँधी ने क्रमशः आजादी से पहले और बाद में अपनी जानें गवाँईं। वे सांप्रदायिक षड्यंत्रों के शिकार हुए और दोनों की ही हत्याएँ साम्प्रदायवादी शक्तियों ने कीं। हिंदू और मुस्लिम तथा अन्य संप्रदायवाद देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बने हुए हैं। इस सन्दर्भ में संघ पर प्रश्न-चिह्न है क्योंकि उसने इन दो हत्याओं तथा अन्य घटनाओं की अभी तक निंदा नहीं की है।
    भारत के इतिहास में पहली बार पूर्णतः दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादी शक्तियों की केन्द्र में जीत हुई है। यदि इस लेबल से केंद्रीय पार्टी अपने को मुक्त करले तो बड़ी उपलब्धि होगी। लगातार हमारी संसद और लोकसभा में प्रथम आम चुनावों से ही मनमर्जी, जनतांत्रिक शक्तियों का वर्चस्व रहा है। 1952 से लेकर आज तक दक्षिण पंथी पार्टियाँ हाशिए पर रही हैं। वर्तमान परिवर्तन कैसे हुआ, इस पर कुछ विचार हम आज प्रस्तुत करेंगे:-
    आज देश में जो कुछ विकास देख रहे हैं, वह पब्लिक सेक्टर आधारित उन मूल आर्थिक नीतियों का नतीजा है जो वाम तथा कम्युनिस्ट विचारधारा और प्रगतिशील कांग्रेसियों की देखरेख में लागू की र्गइं। आज भारत 1947 का पिछड़ा, गरीब और विदेशी सहायता पर निर्भर भारत नहीं रह गया है। आज भारत चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे तेज विकसित होता हुआ देश है जो कच्चे माल के निर्यात पर नहीं बल्कि तैयार विकसित औद्योगिक सामानों, जिनमे ऑटोमोबाइल और भारी मशीनें शामिल हैं, के  निर्यात में अपनी महत्वपूर्ण जगह बना चुका है। यह विकास है जिसे दक्षिणपंथी शक्तियाँ नजर अंदाज करना चाहती हैं। यह विकास बड़े सामंतों, इजारेदारों और साम्राज्यवादियों से संघर्ष करके हुआ है। यह नीति अब खतरे में पड़ गई है।
    आज ‘विकास’ की बात करना एक फैशन हो गया है। भाजपा ने भी बड़े दावे चुनावों में किए हैं और यह दर्शाने की कोशिश की है कि सिर्फ वही ‘विकास’ का प्रतिनिधि है। अब तक विरोध करते हुए अचानक संघ विकास का प्रचारक बन गया है, लेकिन अब तक उसने जनता को और देश को यह नहीं बताया है कि वह कैसा विकास करेगा क्या कदम उठाएगा और देश की समस्याएँ कैसे हल करेगा। यह तो समय ही बताएगा, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि  भारत विकास के ही उस रास्ते पर चल रहा था जिस रास्ते का पुरजोर विरोध स्वयं भाजपा ने लगातार किया है। सवाल यहाँ आर्थिक रणनीति और कार्यनीति का है जिस पर संघ और मोदी ने अब तक कुछ भी पेश नहीं किया है। विकास शब्द का उच्चारण करने से विकास नहीं होगा। हमारे देश की स्वीकृत रणनीति पब्लिक सेक्टर के गिर्द मिश्रित अर्थव्यवस्था की रही है जो ‘नेहरू आर्थिक रूपरेखा’ या नेहरू मार्ग के नाम से जानी जाती है।
    आज की आर्थिक और राजनैतिक घटनाएँ इसी आर्थिक आधार और उसके अंतर्विरोधों की देन हैं। इसलिए, देश की वर्तमान घटनाएँ विकास की कमी नहीं बल्कि विकास के अर्थविरोधों का नतीजा हैं। विकास का यह मार्ग परस्पर टकराओं से भरा और कई मायनों में अपूर्ण रहा है। वर्तमान सरकार इस विकास के चरम दक्षिणपंथी तबकों की नीतियों का परिणाम हैं, सिर्फ जनता के असंतोष का नहीं।
इजारेदार पूँजीवाद का समर्थन
    कॉर्पोरेट घरानों और देश के इजारेदार पूँजीपतियों के सबसे दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादी तबकों, जिन्हें राजनीति की भाषा में चरम दक्षिणपंथी कहते हैं, ने अपनी सारी ताकत मोदी के पक्ष में झोंक दी। साथ ही कंाग्रेस की जन विरोधी नीतियों ने इन्हें पूरा अवसर दिया। संघ विरोधी पार्टियों में एकता की भारी कमी रही, और संघ आदि ने जनता के उन तारों को छेड़ा जो दुखती रग थे। जनता ने अपने गुस्से का इजहार इन नीतियों के रूप में किया।
        वर्गीय दृष्टिकोण से इजारेदार पूँजीवाद और कॉर्पोरेट घरानों के सबसे दक्षिणपंथी हिस्सों ने मोदी के रूप में चरम दक्षिणपंथी प्रक्रियावाद को तैयार किया। यह शब्दों का जाल नहीं, एक लच्छी है। इसीलिए अकूत मात्रा में धन बहाया गया। अखबारों के अनुसार 10 हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए। कहाँ से आए ये पैसे? और इस धन को तो बटोरने की पहले से कोशिश होगी। इसे अभी तक जनता समझ नहीं पाई है। जिस दिन थोड़ा भी समझ जाएगी, भाजपा का पतन शुरू हो जाएगा।
    कॉरपोरेट घराने क्यों भाजपा के पीछे हैं? क्योंकि उन्हें पिछली सरकार में जो भी रुकावटें थी, उनकी पूर्ण समाप्ति वे चाहते हैं। वे निरंकुश इजारेदार-साम्यवादी पूँजी का शासन चाहते हैं। मोदी इसके लिए सबसे उपयुक्त हैं और उनकी पार्टी भाजपा, सबसे उपयुक्त पार्टी और संघ सबसे उपयुक्त ‘हथियार बंद फौज’ है। उनके लिए, ये सारी घटनाएँ हमें जाने अंजाने में 30 के दशक में जर्मनी में हिटलर के उत्थान की याद दिलाती हैं। उस पर फिर कभी विचार किया जाएगा, जब अन्य घटनाएँ सामने आएँगी।
    इसलिए विकास की दिशा को पूरी तरह दक्षिण पाठ और चरम दक्षिण पाठ की ओर मोड़ने की पूरी तैयारियाँ चल रही हैं। हमारा पब्लिक सेक्टर, देश के अर्थतंत्र का आधार और केन्द्र, हमारी राष्ट्रीयता का आर्थिक आधार, खतरे में है।
      भाजपा की जीत और अन्य की पराजय के कुछ कारण, धन और मीडिया की भूमिका गौर करने लायक है, पैसों तथा मीडिया की भूमिका इससे पहले इतनी अधिक कभी नहीं थी। सबसे बड़े पूँजीपतियों ने ‘दिल खोलकर’ (अर्थात तिजोरी खोलकर!) संघ  ने भाजपा के लिए धन पानी की तरह बहाया। इसका कारण है कि वे अपने हित में अब पूरी तरह संघ जैसी शक्तियों को खड़ा करना चाहते हैं। इसके लिए हमें कड़ी रिसर्च की जरूरत नहीं। अखबारों में कई तथ्य आ चुके हैं।
     यह अचरज की बात है और कांग्रेस की नाकामी और उदासीनता कि मीडिया पूरी तरह सरकार और सरकारी पार्टी कांग्रेस के हाथ से निकल चुका था। आज के जमाने में मीडिया समाज और सत्ता का चैथा खंभा कहलाता है, लेकिन उससे शासक पार्टी लगभग पूरी तरह गायब थी। आधा चुनाव तो वह यहीं हार गई, सैकड़ों चैनलों में भाजपा व संघ और मोदी की रिंग कॅमेंट्री की जाती रही। मीडिया में आम लोगों और मेहनतकशों की खबरें नदारद थीं अर्थात वह देश का प्रतिबिम्ब नहीं रह गया था और अभी भी नहीं है। भाजपा के चुनाव जीतने के बाद ऐसा लगता है कि ज्यादातर अखबार, चैनल और पत्रकार सिर्फ सरकार की चमचागीरी में लगे हुए हैं। यह देश के लिए बड़ी चिंताजनक बात है। मीडिया से जनता गायब हो चुकी है। यह हमें पश्चिम के ‘एंबेडेड’ अर्थात सरकारी पम्परा से जुड़े हुए मीडिया की याद दिलाते हंै।
कांग्रेस की नाकामयाबी
      ना कांग्रेस, ना ही अन्य कोई पार्टी देश में हो रहे परिवर्तनों को समझ पाई। कांग्रेस आत्म-संतुष्टि से पीडि़त रही। सिर्फ विकास की दर बढ़ने से ही देश का भला नहीं होता है। विकास का फल जनता तक पहुँचना चाहिए, यह समझ उसे बड़ी देर से आई. कांग्रेस पहले ही हारी हुई फौज के समान लड़ रही थी। उसने मीडिया को पूरी तरह कार्पोरेटों और संघ-भाजपा के हवाले कर दिया था। यह नीति समझ में आने लायक नहीं है। कांग्रेस को अपना दंभ त्यागकर अन्य दलों के साथ बराबरी का व्यवहार सीखना होगा। कांग्रेस ने नव-उदारवाद के नतीजों की, जिनका शिकार जनता हुई, पूरी तरह अनदेखी की। ऐसा लगता था की ‘महँगाई बढ़ी तो क्या?’ का रुख उसने अपना लिया था। इस समस्या का समधान नई सरकार को भी करना पड़ेगा। बोलना आसान है लेकिन महँगाई पर नियंत्रण करना आसान नहीं। वाम तथा अन्य दलों की दिशाहीनता, बिहार तथा कुछ एक अन्य जगहों में वाम तथा कुछ अन्य दल और कांग्रेस नजदीक आए हैं। उन्हें एहसास हुआ है कि ‘धर्मनिरपेक्ष ताकतों’ को एक जगह आना चाहिए। इसमे विचारधारा से अधिक कुछ अन्य कारकों की भूमिका भी है।
    यह समझदारी पहले क्यों नहीं आई? पहले वे क्या कर रहे थे? और वाम दलों ने अन्य दलों तथा कांग्रेस के साथ सीमित ही सही, तालमेल बिठाने का काम क्यों नहीं किया? चुनाव के बाद तालमेल का क्या मतलब रह जाता है जब आपके पास नंबर ही नहीं हैं, सीटें ही नही मिलीं।
     इन प्रश्नों का उत्तर तो वे ही दे सकते हैं। अंकगणित स्पष्ट है- 31 प्रतिशत बनाम 69 प्रतिशत, सीमित तालमेल में भी भाजपा को कोई अवसर नहीं बनता, जीतने का कारण स्पष्ट है-दिशाहीनता। ऐसी पार्टियाँ जो वामपंथी हैं, जो वैज्ञानिक होने का दावा करती हैं, वे भी इस बात को क्यों नहीं समझ पाईं? ऐसा लगता है कि उन्होने रणनीति ताक पर रख दी और उनकी दृष्टि अंध कांग्रेस विरोध से पीडि़त हो गई। वे चुनाव के बाद तीसरे मोर्चे की तलाश में थे, यह भूलते हुए कि यदि सीटें नहीं आईं तो कोई तीसरा या चैथा मोर्चा ना बन सकता है, ना ही उसकी सरकार, हुआ भी यही।
    वाम तथा अन्य दल अपनी रणनीति तैयार नहीं कर पाए, वैचारिक संघर्ष नहीं चला पाए, आधे मन से चुनाव लड़े और पूरी तरह तालमेल से अलग रहे। यह अति स्वाभिमान का मामला हुआ। नतीजतन, आज वाम 2008 के बाद 62 सीट से 12 पर आ गया है।
     वाम को पूरी तरह समय के साथ बदलने की जरूरत है। उसे देश में हो रहे परिवर्तनों, बदलती सामाजिक रचनाओं, मीडिया, सूचना और तकनीकी क्रांति के नतीजों, मोबाइल और टीवी के महत्व, इत्यादि कई चीजों को समझना होगा। एक के बाद एक बड़े शहरों में वामपंथ कहीं नहीं है। ये शहर और भी बड़े और संख्या में भी अधिक होते जा रहे हैं। फलस्वरूप, वास्तव में वाम और प्रगतिशील छोटे होते जा रहे हैं। चुनाव नतीजे इन मायनों में आश्चर्य की बात नहीं हैं, बल्कि वास्तविकता के ही प्रतिबिम्ब हैं।
    वाम को अपनी पूरी रणनीति और कार्यनीति बदलनी होगी। उसे सारी प्रगतिशील शक्तियों को एकजुट करना होगा जिसमें कांग्रेस के प्रगतिशील तबके भी होंगे। सिर्फ एकता या नजदीकियाँ काफी नहीं, वाम सहयोग या मोर्चे को करना क्या है, किससे मित्रता, किससे दूरी बनाना है, नीतियाँ क्या होंगी, यह समझना होगा। वाम के पास कोई वैकल्पिक अर्थनीति नहीं है। वह सिर्फ दक्षिणपंथ की नीतियों पर प्रतिक्रिया दे रहा है, दूसरों के गेंद का जवाब दे रहा है, वह भी ठीक से नहीं। वाम और जनवादी अलग-अलग रहें तो दक्षिणपंथ की जीत सुनिश्चित है। अपने एजेेंडा और उस पर देश को चलाना, यह आवश्यक है।
      उसे ऐसा एजेण्डा तैयार करना होगा। जिस पर देश आकृष्ट हो, जिसके गिर्द कांग्रेस समेत अन्य जनवादी पार्टियाँ सीमित अर्थों में ही सही, नजदीक आएँ, कुछ अधूरे मन से कोशिश अवश्य हुई है लेकिन प्रभावी तरीके से नहीं। वाम और जनवादी शक्तियों को स्पष्टता और
धारदार नीतियाँ अपनानी होंगी और देश को साफ दिशा देनी होगी। कोई अगर मगर नहीं चलेगा, ना ही लंबे चैड़ माँग पत्र। वाम सभी प्रगतिशील ताकतों को एक जगह लाए और जनता और देश को दिशा दे वैचारिक तेजी लाए।
देश  का भविष्य
          हम कह आए हैं कि आज पूरी तरह दक्षिणपंथ की ताकतें सत्ता में आ गई हैं। जाहिर है, नीतियों में इसी के अनुरूप परिवर्तन होगा या कोशिश होगी। इसका यह भी मतलब है कि आजादी के बाद देश ने जो भी उपलब्धियाँ हासिल की थीं उन पर पूरा हक है। आर्थिक क्षेत्र, स्कूल-कॉलेज के पाठ्यक्रम तथा इस प्रकार की अन्य बातें खतरनाक मोड़ पर हैं।
      यह जानी हुई बात है कि छोटे बच्चों में ही सांप्रदायिक मानसिकता भरी जा रही है, जिसकी गति तेज होगी। जब पाठ्यक्रमों में हिटलर पढ़ा जाए और गांधी गायब हों तो देश के मानस पर क्या प्रभाव पड़ेगा और भावी विचार कैसे होंगे यह समझा जा सकता है। 35 वर्षों के एक छत्र शासन ने वैज्ञानिक और प्रगतिशील विचारधारा से अज्ञता को शिक्षित करने के लिए कुछ नहीं किया। दूसरी और विभाजनकारी साम्प्रदायिक विचारधारा, चाहे जिसकी हो, फैलाई जाती रही।
         दूसरे शब्दों में विचारधारा के पहलुओं को, उसके विकास और अंतर्विरोधों को नजरअंदाज कर दिया गया। यह भुला दिया गया कि विचारधारा का संघर्ष अत्यंत ही महत्वपूर्ण है।
    क्या प्रगतिशील, जनवादी, वाम तथा धर्मनिरपेक्ष विचारधारा फिर से एक बार देश को स्वस्थ दिशा में ले जा पाएगी? यह विवेकपूर्ण विचारधारात्मक कार्यों से ही भविष्य में साबित हो पाएगा।    
  -अनिल राजिमवाले
  मो0 09868525812

बुधवार, 19 मार्च 2014

संघ के जहरीले प्रचार के कारण गांधी जी की हत्या हुई थी

  राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने महात्मा गांधी की हत्या की थी।
संघ इस आरोप को बेबुनियाद बता रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि महात्मा गांधी की हत्या में संघ का अप्रत्यक्ष हाथ था। हत्या का फैसला कोई प्रस्ताव पारित करके नहीं किया गया था परन्तु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि संघ व हिन्दू महासभा के कुछ प्रमुख नेताओं को यह जानकारी थी कि महात्मा गांधी की हत्या होने वाली है। यह आरोप कि संघ को ज्ञात था कि महात्मा गांधी की हत्या होने वाली है, तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल ने लगाया था। पत्र में पटेल ने लिखा था ‘‘उसके (आर.एस.एस.) सभी नेताओं के भाषण साम्प्रदायिक जहर से भरे रहते थे। उन जहरीले भाषणों के चलते देश में ऐसा वातावरण बना जिससे यह बड़ी त्रासदी (गांधी जी की हत्या) घटी। हत्या के बाद संघ के स्वयंसेवकों ने खुशियां मनाईं और मिठाई बांटी।’’
पटेल ने इस पत्र की कापी जनसंघ के प्रथम अध्यक्ष और हिन्दू महासभा नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी को भी भेजी थी। सरदार पटेल ने महात्मा गांधी की हत्या के बाद तत्कालीन सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर को एक पत्र लिखासंदेह नहीं कि  नाथूराम गोडसे, जिसने गांधीजी की हत्या की थी, वे संघ के सदस्य रहे थे। उन्हें बौद्धिक प्रचारक का उत्तरदायित्व सौंपा गया था। उनके भाई गोपाल गोडसे लिखते हैं कि ‘‘नाथूराम गोडसे ने अदालत को बताया था कि उन्होंने 1934 में संघ छोड़ दिया था परंतु वास्तविकता यह है कि उन्होंने (नाथूराम गोडसे) संघ को कभी नहीं छोड़ा’’ गोपाल गोडसे के इस कथन से स्पष्ट होता है कि वे उस समय भी संघ से जुड़े थे जब उन्होंने गांधी की हत्या की थी।
गोडसे की वास्तविक स्थिति के बारे में आउटलुक पत्रिका ने सरसंघचालक प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह से एक साक्षात्कार में पूछा था। राजेन्द्र सिंह ने उत्तर दिया था कि ‘‘नाथूराम गोडसे अखंड भारत का सपना देखता था। उसका इरादा ठीक था परंतु उसने जो तरीका अपनाया वह गलत था।’’
संघ ने कभी भी नाथूराम गोडसे से अपना संबंध नहीं तोड़ा। इसके ठीक विपरीत, संघ उसके विचारों को प्रचारित करता रहा है। संघ वर्षों तक नाथूराम गोडसे और उनके भाई की किताबों के विज्ञापन अपने साप्ताहिक समाचारपत्र आर्गनाईजर में छापता रहा है। जैसे दिनांक अक्टूबर 5, 1997 के संस्करण में रीडेबल अटरेक्टिव न्यू बुक्स शीर्षक से विज्ञापन छपा था। इन किताबों में नाथूराम गोडसे की किताब ‘‘मे इट प्लीज युअर आनर’’ और गोपाल गोडसे की किताब ‘‘गांधीज मर्डर एंड आफ्टर’’ शामिल हैं। इस तरह के विज्ञापन समय-समय पर छपते रहे हैं।
सरदार पटेल ने, जिन्हें नरेन्द्र मोदी और संघ अपना हीरो मानता है, गांधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया था। 4 फरवरी 1948 को प्रतिबंध लगाया गया था। ‘भारत सरकार ने 2 फरवरी को अपनी घोषणा में कहा है कि  उसने (भारत सरकार) उन सभी विद्वेकारी तथा हिंसक क्तियों को जड़मूल से नष्ट कर देने का निष्चय किया है, जो राष्ट्र की स्वतत्रंता को खतरे में डालकर उसके उज्जवल नाम पर कलंक लगा रही हैं। उसी नीति के अनुसार, चीफ कमिश्नरों के अधीनस्थ सब प्रदेशों  में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अवैध घोषित करने का निर्णय भारत सरकार ने कर लिया है। गवर्नरों के अधीन राज्यों में भी इसी ढंग की योजना जारी की जा रही है।’’ सरकारी विज्ञप्ति में आगे कहा गया: ‘‘संघ के स्वयंसेवक अनुचित कार्य भी करते रहे हैं। देश  के विभिन्न भागों में उसके सदस्य व्यक्तिगत रूप से आगजनी, लूटमार, डाके, हत्याएं तथा लुकछिप कर स्त्र, गोला और बारूद संग्रह करने जैसी हिंसक कार्यवाहियां कर रहे हैं। यह भी देखा गया है कि ये लोग पर्चे भी बांटते हैं, जिनसे जनता को आतंकवादी मार्गों का अवलंबन करने, बंदूकें एकत्र करने तथा सरकार के बारे में असंतोश  फैला कर सेना और पुलिस में उपद्रव कराने की प्रेरणा दी जाती है।’’
सरकारी आदेश  में वे अन्य कारण भी गिनवाए गये जिनके चलते आरएसएस पर प्रतिबंध लगाना जरूरी हो गया था। इस संदर्भ में जानने लायक एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जब आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया गया तब देश  के गृहमंत्री सरदार पटेल ही थे, जिनको आरएसएस कांग्रेस में अपना प्रिय नेता मानती थी और आज भी मानती है। सरदार पटेल ने गांधी जी की हत्या में आरएसएस की भूमिका के बारे में स्वयं गोलवलकर को एक पत्र के माध्यम से जो कुछ लिखा था वह भी पढ़ने लायक है। सरदार पटेल ने 19.9.1948 के अपने पत्र में लिखा, ‘‘हिन्दुओं का संगठन करना, उनकी सहायता करना एक प्रश्न है पर उनकी मुसीबतों का बदला, निहत्थे व लाचार औरतों, बच्चों व आदमियों से लेना दूसरा प्रष्न है...उन्होंने कांग्रेस का विरोध करके और इस कठोरता से कि न व्यक्तित्व का ख्याल, न सभ्यता व शिष्टता का ध्यान, जनता में एक प्रकार की बेचैनी पैदा कर दी थी। इनकी सारी स्पीचिज सांप्रदायिक विष से भरी थीं। हिन्दुओं में जोश  पैदा करना व उनकी रक्षा के प्रबन्ध करने के लिए यह आवश्यक न था कि वह जहर फैले। इस जहर का फल अन्त में यही हुआ कि गांधी जी की अमूल्य जान की कुर्बानी देश  को सहनी पड़ी और सरकार व जनता की सहानुभूति जरा भी आरएसएस के साथ नहीं रही, बल्कि उनके खिलाफ हो गयी। उनकी मृत्यु पर आरएसएस वालों ने जो हर्ष प्रकट किया था और मिठाई बांटी, उस से यह विरोध और बढ़ गया और सरकार को इस हालत में आरएसएस के खिलाफ कार्यवाही करना जरूरी ही था।
‘‘तब से अब 6 महीने से ज्यादा हो गए। हम लोगों की आशा  थी कि इतने वक्त के बाद सोचविचार कर के आरएसएस वाले सीधे रास्ते पर आ जाएंगे। परन्तु मेरे पास जो रिपोर्ट आती हैं उनसे यही विदित होता है कि पुरानी कार्यवाहियों को नई जान देने का प्रयत्न किया जा रहा है।’’
प्रतिबंध लगने के बाद संघ की गतिविधियां ठप्प हो गईं। इसके बाद संघ द्वारा प्रतिबंध उठाने के लिए अथक प्रयास किए गए। अपने प्रयासों के दौरान गोलवलकर ने पटेल को अनेक पत्र लिखे। परन्तु पटेल ने बार-बार यह स्पष्ट किया कि प्रतिबंध उठाने के अनुरोध पर उसी समय विचार किया जाएगा जब संघ उसके संविधान का प्रारूप पेश करे।
14 नवंबर 1948 को गृह मंत्रालय की ओर से एक विज्ञप्ति जारी की गई जिसमें यह स्पष्ट रूप से कहा गया कि गोलवलकर प्रतिबंध उठवाना तो चाहते हैं परंतु संघ अपने स्वरूप और गतिविधियों में किसी प्रकार का सुधार करने को तैयार नहीं है। पटेल ने श्यामाप्रसाद मुखर्जी को लिखे एक पत्र में कहा कि संघ की गतिविधियों से देश को खतरा है। वे वास्तव में राष्ट्रविरोधी हैं। बाद में संघ ने अपने संविधान का प्रारूप पटेल को भेजा। इस प्रारूप में संघ ने यह स्पष्ट प्रावधान किया कि संघ, राजनीति में हिस्सा नहीं लेगा और अपनी गतिविधियों को सांस्कृतिक क्षेत्र तक सीमित रखेगा। यह आश्वासन देने के बावजूद, संघ अब सीधे राजनीति में भाग ले रहा है। इस तरह वह पटेल को दिए गए आश्वासन के ठीक विपरीत कार्य कर रहा है। आज भी संघ जिन उद्देश्यों के लिए काम कर रहा है वे उस संविधान के विरूद्ध हैं जिसके द्वारा हमारे राष्ट्र की सभी प्रकार की गतिविधियों का संचालन होता है।
-एल.एस. हरदेनिया

बुधवार, 12 मार्च 2014

महात्मा गांधी की हत्या और आरएसएस: बहस जारी

पिछले हफ्ते (मार्च 2014) राहुल गांधी ने एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कहा कि, ‘‘आरएसएस के लोगों ने गांधीजी को मारा और अब उनके लोग और भाजपा, गांधीजी की बात करते हैं...उन्होंने सरदार पटेल और गांधीजी का हमेशा  विरोध किया‘‘। आरएसएस ने राहुल गांधी के इस भाषण के खिलाफ चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज की है। यह पहली बार नहीं है कि राहुल गांधी ने ऐसा वक्तव्य दिया हो। वे पहले भी यही बात कह चुके हैं।
गांधीजी की हत्या का सच क्या है? क्या, बतौर एक संगठन, आरएसएस की इसमें कोई भूमिका थी? गांधीजी की हत्या के बाद आरएसएस के समर्थकों की क्या प्रतिक्रिया थी? इस कायराना हरकत के संबंध में तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री सरदार पटेल के क्या विचार थे?
इन मुद्दों पर कई किताबें लिखी जा चुकी हैं, कई नाटक खेले जा चुके हैं और कई फिल्में बनाई जा चुकी हैं। इन विषयों से संबंधित लेखों की तो भरमार है। जहां तक घटना, उसकी जांच के लिए नियुक्त किए गए न्यायिक आयोगों की रपटों और मुकदमे के निर्णय का सवाल है, वे सबके सामन हैं। परंतु गांधीजी की हत्या के पीछे के असली और गहरे कारणों पर पर्याप्त बहस नहीं हुई है। दो राष्ट्रवादों के टकराव का समुचित विष्लेषण नहीं हुआ है। आज यह आवष्यक है कि हम गांधीजी की हत्या की घटना के साथ-साथ, उसके पीछे के विचारधारात्मक कारणों की भी विवेचना करें-उन कारणों की जिनका आधार थीं राष्ट्रवाद की दो अलग-अलग परिकल्पनाएं। पहला था भारतीय राष्ट्रवाद, जिसके प्रवक्ता और पुरोधा गांधी थे और दूसरा था हिन्दू राष्ट्रवाद, जो गांधीजी के हत्यारे गोडसे का प्रेरणास्त्रोत था। यह दिलचस्प है कि आरएसएस की राजनैतिक षाखा भाजपा के प्रधानमंत्री पद के वर्तमान उम्मीदवार भी अपने राष्ट्रवाद को हिन्दू बताते नहीं थकते।  इसलिए आज के राजनैतिक संदर्भों मंे यह बहस और प्रासंगिक व महत्वपूर्ण बन गई है।
महात्मा की हत्या के बाद, आरएसएस ने आधिकारिक रूप से यही कहा कि उसका हत्या से कोई लेनादेना नहीं है और गोडसे, आरएसएस का सदस्य नहीं है। आरएसएस यह दावा इतनी आसानी से इसलिए कर सका क्योंकि आरएसएस में सदस्यों का औपचारिक रिकार्ड रखे जाने की परंपरा ही नहीं है। इस कारण, कानूनी तौर पर संघ गोडसे से स्वयं को अलग करने मंे सफल रहा। तथ्य यह है कि गोडसे ने सन् 1930 में आरएसएस की सदस्यता ली थी और जल्दी ही उसे बौद्धिक प्रचारक के रूप में  नियुक्त कर दिया गया था। ‘‘हिन्दुओं की उन्नति के लिए काम करने के बाद मुझे इस बात की जरूरत महसूस हुई कि मैं हिन्दुओं के न्यायपूर्ण अधिकारों की रक्षा के लिए देश की राजनैतिक गतिविधियों में भाग लूं। इसलिए मैंने संघ को छोड़ दिया और हिन्दू महासभा की सदस्यता ले ली‘‘, (गोडसे, व्हाय आय एसेसीनेटिड महात्मा गांधी, 1993, पृष्ठ 102)। गोडसे, महात्मा गांधी को मुसलमानों के तुष्टिकरण व इस कारण हुए पाकिस्तान के निर्माण के लिए जिम्मेदार मानता था। उसने तत्समय की एकमात्र हिन्दुत्वववादी पार्टी हिन्दू महासभा की सदस्यता ले ली और उसकी पुणे शाखा का महासचिव बन गया। आगे चलकर उसने एक समाचारपत्र निकाला, जिसका शीर्षक था ‘अग्रणी या हिन्दू राष्ट्र‘। गोडसे इस अखबार का संस्थापक संपादक था।
‘द टाईम्स आॅफ इंडिया‘ (25 जनवरी 1998) को दिए गए अपने साक्षात्कार में नाथूराम के भाई गोपाल गोडसे, जोकि हत्या में सह-अपराधी था, ने नाथूराम की आरएसएस की सदस्यता और गांधीजी की हत्या करने के पीछे के कारणों पर रोशनी डालते हुए कहा, ‘‘उनकी (गांधी) नीति तुष्टिकरण की थी और उन्होंने अपनी इस नीति को सभी कांग्रेस सरकारों पर थोपा। नतीजे में मुस्लिम अलगाववादी तत्वों को प्रोत्साहन मिला और अंततः पाकिस्तान बना...।‘‘ तकनीकी और सैद्धांतिक दृष्टि से वे (नाथूराम) सदस्य (आरएसएस के) थे परंतु बाद मंे उन्होंने उसके लिए काम करना बंद कर दिया था। उन्होंने अदालत में यह बयान इसलिए दिया कि उन्हांेने आरएसएस को छोड़ दिया था, ताकि उन आरएसएस कार्यकर्र्ताओं की रक्षा हो सके, जिन्हें हत्या के बाद जेल में डाल दिया जाएगा। जब उन्हें लगा कि अगर वे स्वयं को आरएसएस से अलग कर लें तो उससे उन्हें (आरएसएस स्वयंसेवकों) को लाभ होगा, तो उन्होंने खुशी -खुशी यह किया‘‘।
गांधीजी की हत्या के बाद, आरएसएस के समर्थकों  ने मिठाई बांटकर खुशियां मनाईं। सरदार पटेल ने लिखा, ‘‘उसके (आरएसएस) नेताओं के भाषण साम्प्रदायिक जहर से लबरेज रहते थे। इसका अंतिम परिणाम यह हुआ कि ऐसा जहरीला वातावरण बन गया, जिसमें इस तरह की वीभत्स त्रासदी (गांधीजी की हत्या) संभव हो सकी। आरएसएस के लोगों ने गांधीजी की मौत के बाद अपनी खुशी  का इजहार किया और मिठाईयां बांटी।‘‘ (सरदार पटेल के एमएस गोलवलकर और एसपी मुकर्जी को लिखे गए पत्रों के अंश , आउटलुक, 27 अप्रैल 1998)। हिन्दू साम्प्रदायिक तत्व, गांधीजी के विरूद्ध जिस तरह का जहर उगल रहे थे, महात्मा की हत्या उसका तर्कसंगत परिणाम थी। एक तरह से गांधीजी की हत्या, हिन्दुत्व की राजनीति का भारतीय राष्ट्रवाद पर पहला बड़ा हमला था, जिसने और बड़े खतरों को जन्म दिया। ये खतरे आज हमारे समक्ष हिन्दुत्ववादी राजनीति के रूप मंे खड़े हैं।
गोडसे के इस दावे के विपरीत कि हत्या की योजना उसने बनाई थी, विभिन्न जांच आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि हिन्दू महासभा-आरएसएस विचारधारा के कई समर्थकों ने मिलकर महात्मा की हत्या की साजिश रची थी क्योंकि एक हिन्दू होने के बावजूद, वे इस देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने की राह मंे सबसे बड़ी बाधा थे। सरदार पटेल ने लिखा है कि ‘‘हिन्दू महासभा का एक कट्टरवादी धड़ा, जो सावरकर के नेतृत्व में काम कर रहा था, ने इस साजिश को रचा और अंजाम दिया...। उनकी हत्या का आरएसएस और हिन्दू महासभा ने स्वागत किया क्योंकि वे गांधीजी के सोचने के तरीके और उनकी नीतियों के विरूद्ध थे...‘‘ (सरदार पटेल, जस्टिस कपूर रपट के अध्याय 1 पृष्ठ 43 में उद्वत)। जस्टिस जीवनलाल कपूर भी इस निश्कर्ष पर पहुंचे कि ‘‘...सभी तथ्यों को समग्र रूप से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि सावरकर और उनके समूह के अतिरिक्त और किसी ने हत्या की साजिश रची हो, इसकी संभावना नहीं है‘‘।
यही हिन्दुत्व, हिन्दू महासभा और आरएसएस की राजनीति का आधार बना। गांधी जी एक सच्चे हिन्दू थे परंतु वे हिन्दू राष्ट्र के सिंद्धातः खिलाफ थे। इसी तरह, मौलाना अबुल कलाम आजाद एक सच्चे मुसलमान थे परंतु उन्होंने कभी मुस्लिम राष्ट्र (पाकिस्तान) के विचार का समर्थन नहीं किया। गांधीजी ने पूरे देश को धर्मनिरपेक्ष आधारों पर एक किया। उन्होंने रहवास के क्षेत्र, धर्म और जाति से ऊपर उठकर भारतीयों में एकता कायम की। वे अत्यंत धार्मिक व्यक्ति थे परंतु वे धर्म के राजनैतिक हितसाधन के लिए प्रयोग के खिलाफ थे। ‘‘...उस भारत, जिसके निर्माण के लिए मैंने जीवन भर काम किया है, में प्रत्येक व्यक्ति का दर्जा एकसमान होगा, भले ही उसका धर्म कुछ भी हो। राज्य पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष होगा’’ (हरिजन, 31 अगस्त 1947) और ‘‘धर्म हर व्यक्ति का निजी मामला है और उसका राजनीति या राष्ट्रीय मुद्दों में घालमेल नहीं होना चाहिए।’’ हिन्दु महासभा और आरएसएस की मान्यता थी कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है, जहां अल्पसंख्यकों को हिन्दुओं के अधीन रहना होगा। इन दोनों संगठनों के सदस्यों ने ब्रिटिश-विरोधी आंदोलनों और संघर्षों में भाग नहीं लिया। उदाहरणार्थ, सावरकर, जो अपने जीवन की शुरूआत में ब्रिटिश-विरोधी क्रांतिकारी थे, ने अंडमान जेल से अपनी रिहाई के बाद न तो राष्ट्रीय आंदोलन में हिस्सेदारी की और ना ही किसी ब्रिटिश-विरोधी संघर्ष में। हेडगेवार को छोड़कर, जिन्होंने यदाकदा स्वाधीनता संघर्ष में हिस्सेदारी की, आरएसएस के किसी नेता या समर्थक ने आजादी की लड़ाई में भाग नहीं लिया। उनका मुख्य जोर मुस्लिम सम्प्रदायवादियों को परास्त करने पर था। वे अंग्रेजों के खिलाफ नहीं थे।
जहां तक गांधीजी की हत्या के पीछे 55 करोड़ रूपए के मुद्दे का प्रश्न है, वह एक बहाना मात्र था। तथ्य यह है कि यह धनराषि अविभाजित भारत के खजाने में पाकिस्तान का हिस्सा थी। पाकिस्तान के हिस्से की पहली किश्त चुकाई जा चुकी और 55 करोड़ रूपए बकाया थे। इस बीच पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया। इस हमले के बाद, भारत सरकार ने पाकिस्तान को 55 करोड़ रूपए का भुगतान रोक दिया। उस समय कश्मीर एक स्वतंत्र राज्य था और राजनीति में अपने उच्च नैतिक मूल्यों से समझौता न करने वाले गांधी जी ने सरकार से कहा कि कश्मीर पर हमले को, बकाया धनराशि  के भुगतान से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
यह मुद्दा एक बहाना मात्र था, यह इससे भी स्पष्ट है कि 55 करोड़ रूपए की बात करने के पहले भी गांधीजी पर चार जानलेवा हमले जो चुके थे जिनमें से कुछ में गोडसे भी शामिल था। जगदीश फडनीस ने अपनी पुस्तक ‘‘महात्मयाचि अखेर’’ (लोकवांग्यमय गृह, 1994) में ठीक ही लिखा है कि गांधी जी की हत्या उस कारण नहीं की गई, जिसका प्रचार वे लोग करते हैं (देश का विभाजन और पाकिस्तान को बकाया 55 करोड़ चुकाने पर जोर) बल्कि वह इसलिए की गई क्योंकि हिन्दू राष्ट्र के समर्थकों और गांधी जी की राजनीति में मूल अंतर थे। ये दोनों कारण तो मात्र बहाने थे। हमें यह समझना होगा कि जब भाजपा और उसके साथी राष्ट्रवाद की बात करते हैं, तब उनका मतलब भारतीय राष्ट्रवाद से नहीं बल्कि हिन्दू राष्ट्रवाद से होता है, जो कि उनके राजनीतिक एजेण्डे का हिस्सा है।
इस समय हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे पर जो हमले हो रहे हैं, वे भी महात्मा गांधी की हत्या के प्रयास के समकक्ष हैं। इसलिए, गांधीजी की हत्या के पीछे के असली कारणों पर चर्चा तब तक प्रासंगिक रहेगी जब तक कि देश के धर्मनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक मूल्यों पर हमला जारी रहेगा।

 -राम पुनियानी

सोमवार, 4 नवंबर 2013

इरोम शर्मिला की भूख हड़ताल के तेरह साल :4 नवम्बर पर विशेष

शहीद भगत सिंह का जज़्बा, गांधी जी की राह

देश में दीपावली मनाई जा रही है। रोशनी की जा रही है। दीप जल रहे हैं। मोमबत्तियां जलाई जा रही हैं। ऐसे में हमसे बहुत दूर उत्तर पूर्व के राज्य मणिपुर में मानवाधिकार कार्यकर्ता, कवयित्री इरोम चानू शर्मिला इस लोकतंत्र के अंधेरे से संघर्ष कर रही है, अपने संघर्ष की मशाल जलाए हुए है। वह न सिर्फ हमारे ‘लोकतंत्र’ की नौकरशाही और सैनिक तंत्र का मुकाबला कर रही हैं बल्कि अपनी मृत्यु से भी पंजे लड़ा रही हैं। क्या हम इस दीवाली में अपने घरों, कस्बों और शहर में दीप व मोमबत्यिां जलाकर उनके साथ नहीं खड़े हो सकते हैं ? वह आज संघर्ष की जिस कठिन राह पर हैं, हमारे लिए जरूरी है कि हम उनके साथ अपनी एकजुटता जाहिर करें, उन्हें यह संदेश दें कि वह अकेली नहीं हंै। इस साल चार नवम्बर को उनकी भूख हड़ताल के तेरह साल पूरे हो गये। इतनी लम्बी भूख हड़ताल का कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता।
                         इरोम शर्मिला ने जब भूख हड़ताल की शुरुआत की थी, वे 28 साल की युवा थीं। कुछ लोगों को लगा था कि यह कदम एक युवा द्वारा भावुकता में उठाया गया है। लेकिन समय के साथ इरोम शर्मिला के इस संघर्ष की सच्चाई लोगों के सामने आती गई। आज वह एकतालीस साल की हो चुकी हैं। तमाम अवरोधों और मुश्किलों के बावजूद उनकी भूख हड़ताल आज भी जारी है। भले ही इन वर्षों में इरोम शर्मिला का कृषकाय शरीर और जर्जर व कमजोर हुआ हो पर कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना करने वाली उनकी आन्तरिक ताकत और इच्छा.शक्ति बढ़ी है। इसीलिए इसे मात्र भावुकता नहीं कहा जा सकता है बल्कि यह पूर्वोŸार भारत खासतौर से मणिपुर के ठोस यथार्थ की आँच में पका उनका विचार व दृढ इच्छा शक्ति है जिसके मूल में दमन और परतंत्रता के विरुद्ध दमितो.उत्पीडि़तों द्वारा स्वतंत्रता की दावेदारी है। इरोम शर्मिला  के संघर्ष में हमें इसी दावेदारी की अभिव्यक्ति मिलती है। इसके अन्तर में स्वतंत्रता की छटपटाहट और अदम्य साहस से लबरेज मौत को धता बता देने वाली ताकत है। इसीलिए आज इरोम शर्मिला इस्पात की तरह न झुकने, न टूटने वाली मणिपुर की ‘लौह महिला’ के रूप में जानी जाती हैं।
                      बात दो नवम्बर 2000 की है। मणिपुर की राजधानी इम्फाल से सटे मलोम में शान्ति रैली के आयोजन के सिलसिले में इरोम शर्मिला एक बैठक कर रही थीं। उसी समय मलोम बस स्टैण्ड पर सैनिक बलों द्वारा ताबड़तोड़ गोलियाँ चलाई गईं। इसमें करीब दस निरपराध लोग मारे गये। मारे गये लोगों में 62 वर्षीया वृद्ध महिला लेसंगबम इबेतोमी तथा बहादुरी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित सिनम चन्द्रमणि शामिल थीं। यह सब इरोम शर्मिला को आहत व व्यथित कर देने वाली घटना थी। वैसे यह कोई पहली घटना नहीं थी जिसमें सुरक्षा बलों ने नागरिकों पर गोलियाँ चलाई हो, दमन ढ़ाया हो पर इरोम शर्मिला के लिए यह दमन का चरम था। इस घटना के बाद इरोम के लिए शान्ति रैली निकाल कर सŸाा की कार्रवाइयों का विरोध अपर्याप्त या अप्रासंगिक लगने लगा। लिहाजा उन्होंने एलान किया कि अब यह सब बर्दाश्त के बाहर है। यह तो निहत्थी जनता के विरुद्ध सŸाा का युद्ध है। उन्होंने माँग की कि मणिपुर में लागू कानून सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम ;आफ्सपाद्ध हटाया जाय। इस एक सूत्री माँग को लेकर उन्होंने नैतिक युद्ध छेड़ दिया। तीन नवम्बर की रात में आखिर बार अन्न ग्रहण किया और चार नवम्बर की सुबह से उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी।
             इस भूख हड़ताल के तीसरे दिन सरकार ने इरोम शर्मिला को गिरफ्तार कर लिया। उन पर आत्महत्या करने का आरोप लगाते हुए धारा 309 के तहत कार्रवाई की गई और न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। तब से वह लगातार न्यायिक हिरासत में हैं। जवाहरलाल नेहरू अस्पताल का वह वार्ड जहाँ उन्हें रखा गया है, उसे जेल का रूप दे दिया गया है। वहीं उनकी नाक से जबरन तरल पदार्थ दिया जा रहा है। इस तरह इरोम शर्मिला को जिन्दा रखने का ‘लोकतांत्रिक’ नाटक पिछले एक दशक से ज्यादा समय से चल रहा है। उल्लेखनीय है कि धारा 309 के तहत इरोम शर्मिला को एक साल से ज्यादा समय तक न्यायिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता। इसलिए एक साल पूरा होते ही उन्हे रिहा करने का नाटक किया जाता है। फिर उन्हें गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत के नाम पर उसी सीलन भरे वार्ड में भेज दिया जाता है और जीवन बचाने के नाम पर नाक से तरल पदार्थ देने का सिलसिला चलाया जाता है।
                 दरअसल, इरोम शर्मिला जिस ‘आफ्सपा’ को हटाये जाने की माँग को लेकर भूख हड़ताल पर हैं, उस कानून के प्रावधानों के तहत सेना को ऐसा विशेषाधिकार प्राप्त है जिसके अन्तर्गत वह सन्देह के आधार पर बगैर वारण्ट कहीं भी घुसकर तलाशी ले सकती है, किसी को गिरफ्तार कर सकती है तथा लोगों के समूह पर गोली चला सकती है। यही नहीं, यह कानून सशस्त्र बलों को किसी भी दण्डात्मक कार्रवाई से बचाती है जब तक कि केन्द्र सरकार उसके लिए मंजूरी न दे। देखा गया है कि जिन राज्यों में ‘आफ्सपा’ लागू है, वहाँ नागरिक प्रशासन दूसरे पायदान पर पहुँच गया है तथा सरकारों का सेना व अर्द्धसैनिक बलों पर निर्भरता बढ़ी है। इन राज्यों में जनतंत्र शिथिल हुआ है और सैन्यीकरण की प्रक्रिया में तेजी आई है, जन आन्दोलनों को दमन का सामना करना पड़ा है तथा नागरिकों में अलगाव की भावना बढ़ी है। हालत यह है कि आज देश के पाचवें हिस्से में ‘आफ्सपा’ लागू है।
           इसी का चरम रूप हमे मणिपुर जैसे पूर्वोतर राज्य में देखने को मिलता है जहाँ ‘आफ्सपा’ शासन के 55 वर्षों में बीस हजार से ज्यादा नागरिकों को अपनी जानें गंवानी पड़ी है। इसी की देन एक तरफ अपमान, बलात्कार, गिरफ्तारी व हत्या है तो दूसरी तरफ तीव्र घृणा, आत्मदाह, आत्महत्या, असन्तोष व आक्रोश का विस्फोट है। इस संदर्भ में 2004 में मणिपुर की महिलाओं द्वारा किये संघर्ष की चर्चा करना प्रासंगिक होगा। उनके आक्रोश और चेतना का विस्फोट हमें देखने को मिला जब असम राइफल्स के जवानों द्वारा  थंगजम मनोरमा के साथ किये बलात्कार और हत्या के विरोध में मणिपुर की महिलाओं ने कांगला फोर्ट के सामने नग्न होकर प्रदर्शन किया। उन्होंने जो बैनर ले रखा था, उसमें लिखा था ‘भारतीय सेना आओ, हमारा बलात्कार करो’। इरोम शर्मिला इसी यथार्थ की मुखर अभिव्यक्ति हंै।
                  इरोम शर्मिला कोई आतंकवादी नहीं है। उसके प्रतिरोध का रास्ता शांतिपूर्ण व अहिंसक है। यही कारण है कि दुनिया में शांति व मानवाधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों को इरोम शर्मिला के संघर्ष ने आकर्षित किया है। इस संघर्ष को सम्मानित किया गया है। 2005 में इरोम को नोबल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया गया था। वहीं, 2007 में मानवाधिकारों के लिए ग्वांजु सम्मान, 2010 में रवीन्द्रनाथ ठाकुर शांति पुरस्कार जैसे अनगिनत पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। भले ही इरोम शर्मिला के संघर्ष को सम्मानित किया जा रहा हो लेकिन भारतीय राज्य उन्हें कोई स्वतंत्रता देने को तैयार नहीं है। उसकी नजर में वह कोई मानवाधिकार कार्यकर्ता नहीं बल्कि अपराधी है।
                          हालत तो यह है कि उन्हें सामान्य बंदियों की सुविधाओं और अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया है। पिछले साल अक्टूबर में उन्हें जब अदालत में पेश किया गया था, इरोम ने प्रेस कांफ्रेंस करने की इजाजत चाही थी लेकिन इरोम को अपनी बात प्रेस को कहने की स्वतंत्रता भी नहीं दी गई। वह ऐसी कैदी है जिससे मिलने जुलने की इजाजत भी नहीं है। उसे अकेलेपन में जीने के लिए बाध्य किया जा रहा है। बीते सप्ताह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दो सदस्यीय दल ने मणिपुर का दौरा किया। इस दल ने मणिपुर सरकार की इस बात के लिए कड़ी आलोचना की है कि वह इरोम को जिन्दा रखने के लिए जरूरी न्यूट्रिशियन नाक के रास्ते पहुंचा रही है लेकिन उसे अधिकारों से वंचित किये हुए है। उन्होंने राज्य सरकार के इस व्यवहार को अमानवीय और कानून विरुद्ध माना है। इसीलिए उन्होंने कहा कि इरोम के वो सारी स्वतंत्रता दी जाय जो किसी भी आंदोलनकारी को न्यायिक हिरासत में दी जाती है।   
            हमारी आजादी के संघर्ष के दो बड़े नायक रहे हैं - शहीद भगत सिंह और गांधी। इन दोनों नायकों की जो छवियां रही हैं, उसकी अनूठी एकता हमें इरोम शर्मिला के व्यक्तित्व और उनके आंदोलन में देखने को मिलती है।  जहां इरोम शर्मिला के अन्दर अपने उद्देश्य के लिए शहीद भगत सिंह सा आत्मोत्सर्ग का जज़्बा मिलता है, वहीं उनके आंदोलन की प्रेरणा गांधी हैं। यह प्रतिरोध संघर्ष की ऐसी राह है जिसमें रक्त का एक बूंद भी नहीं बहता लेकिन इसकी मारक क्षमता असीमित है। यह शांति के लिए अहिंसा का ऐसा मार्ग है जहां राज्य और उसकी शक्तियां लगातार बेनकाब हो रही हैं, वे आतंक व हिंसा का पर्याय बनती जा रही हैं।
                               हकीकत तो यह है कि इरोम शर्मिला का यह संघर्ष हमारे लोकतंत्र के खंडित चेहरे को सामने लाता है। यह राज्य व्यवस्था से लेकर हमारी न्याय व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करता है। इस साल मार्च में जब दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में इरोम को पेश किया गया, बार बार न्यायालय द्वारा इस बात पर जोर दिया जाता रहा कि वह अपने जीवन को खत्म करना चाहती है, वह आत्महत्या की राह पर है। इस अदालत में दिया उसका बयान गौरतलब है। उसने जोर देकर कहा कि मैं सामाजिक कार्यकर्ता हूं और मैं आत्महत्या के विरुद्ध हूं। मैं जिन्दगी से बेहद प्यार करती हूं। मैं शांति और इंसाफ चाहती हूं। मेरा आंदोलन अहिंसात्मक है तथा आफ्सफा को खत्म करने के लिए है। आफ्सफा जैसे कानून को खत्म कर दिया जाय, मैं अपना आंदोलन समाप्त कर दूंगी। इरोम अपनी इस भावना को अपनी कविता में भी अभिव्यक्त करती है: ‘कैदखाने के कपाट पूरे खोल दो/मैं और किसी राह पर नहीं जाऊँगी/ ३ण्ण्काँटों की बेडि़याँ खोल दो/होने दो मुझे अंधियार का उजाला’।
-कौशल किशोर

मो -  09807519227










शनिवार, 2 नवंबर 2013

मोदी : राजनैतिक फायदे के लिए इतिहास का दुरूपयोग

मोदी के पितृ संगठन आरएसएस की राजनीति, इतिहास, विशोषकर मध्यकालीन इतिहास, को तोड़नेमरोड़ने पर आधारित है। राजाओं को धर्म के चश्मे से देखा जाता है, मुस्लिम राजाओं का दानवीकरण किया जाता है और ऐतिहासिक तथ्यों को न केवल तोड़ामरोड़ा जाता है वरन इतिहास के बारे में सफेद झूठ भी कहे जाते हैं। इन सब को आधार बनाकर, मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाई जाती है। इतिहास का विरूपण ही वह नींव है, जिस पर संघ की राजनीति आधारित है। नरेन्द्र मोदी इसी रणनीति को अपना रहे हैं। परंतु वे मध्यकालीन की जगह आधुनिक इतिहास को तोड़मरोड़ रहे हैं और काफी निचले दर्जे की बातें कर रहे हैं। अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में उन्होंने दो आमसभाओं को संबोधित किया और एक साक्षात्कार दिया। और इन तीनों में ही उन्होंने यह दिखा दिया कि राजनैतिक लाभ के लिए वे किस हद तक गिर सकते हैं।
सरदार पटेल के स्मारक के उद्घाटन समारोह में मोदी ने कहा कि भारत का प्रथम प्रधानमंत्री सरदार पटेल को होना था। यह भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दो बड़े और महान नेताओं महात्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू की छवि को आघात पहुंचाने का प्रयास था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को पूरे देश का समर्थन प्राप्त था। उन्हें सभी क्षेत्रों, धर्मों, लिंगों और जातियों के लोग ईश्वर की तरह पूजते थे। देश का प्रधानमंत्री कौन हो, यह चुनने का अधिकार गांधी जी को दिया गया। और उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के नेहरू को इस पद के लिए चुना। महात्मा गांधी ने यह निर्णय विभिन्न कारकों पर गहन विचार करके ही लिया होगा क्योंकि सरदार पटेल और नेहरू, दोनों ही उनके बहुत प्रिय चेले थे। वे दोनों को बहुत अच्छी तरह से समझते थे। पटेल देश के उपप्रधानमंत्री व गृहमंत्री बने और इस हैसियत से उन्होंने देश में फैले 550 राजेरजवाड़ों का भारतीय संघ में विलय करवाया। यह भारत के लिए उनका बहुत बड़ा योगदान था। प्रधानमंत्री के बतौर नेहरू ने औद्योगिक विकास, शिक्षा और विदेशी मामलों में देश की नीतियों की नींव रखी और वे ॔आधुनिक भारत के निर्माता’ कहलाए। उन्होंने भारत को औद्योगिकीकरण और शिक्षा की राह पर तेजी से आगे ब़ाया और उनके द्वारा रखी गई नींव पर ही भारत आज विश्व की एक बड़ी आर्थिक शक्ति बन सका है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि पंडित नेहरू के मंत्रीमंडल के साथियों का इस वृहद कार्य में महत्वपूर्ण योगदान रहा होगा। उनकी कुछ नीतियों की आलोचना करने में कुछ भी गलत नहीं है परंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय समाज को सामंती खांचे से बाहर निकालना, महिलाओं और नीची जातियों को गुलामी से मुक्त करना और स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व जैसे प्रजातांत्रिक मूल्यों पर आधारित समाज का निर्माण, उन्हीं के महान नेतृत्व में हुआ था। सरदार पटेल की विरासत पर मोदीआरएसएस कब्जा जमाने का प्रयास कर रहे हैं। यह इस तथ्य के बावजूद कि पटेल, भारतीय राष्ट्रवाद के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध थे। वे गांधी जी के निष्ठावान अनुयायी थे और पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष थे। आरएसएस इनमे से कुछ भी नहीं है। आरएसएस और मोदी तो उन सभी मूल्यों के कट्टर विरोधी हैं, जिन पर सरदार पटेल की पूर्ण आस्था थी। मोदी की पहली कोशिश यह है कि वे पंडित नेहरू की भूमिका और उनके योगदान को कम करके बतायें। एक हिन्दी दैनिक को दिए साक्षात्कार में उन्होंने यह तक कह डाला कि नेहरू ने सरदार पटेल की अंतिम यात्रा में भाग नहीं लिया था। इस झूठ की पोल तुरन्त खुल गई। द टाईम्स ऑफ इंडिया ने सरदार पटेल के अंतिम संस्कार की खबर को मुखपृष्ठ पर छापा था और इसमें स्पष्ट शब्दों में कहा गया था कि राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद व प्रधानमंत्री पंडित नेहरू इस मौके पर मौजूद थे। अखबार ने नेहरू द्वारा पटेल को दी गई श्रृद्घांजलि भी प्रकाशित की थी जिसमें उन्होंने कहा था कि सरदार पटेल की भारत को स्वतंत्र कराने और नए भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका थी। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने एक वीडियो क्लिप अपने ब्लाग पर अपलोड की है, जिसमें नेहरू को अंतिम संस्कार में भाग लेते हुए दिखाया गया है। यह भी स्मरणीय है कि मोरारजी देसाई ने अपनी आत्मकथा (खण्ड 1, पृष्ठ 271, पैरा2) में अंतिम यात्रा में पंडित नेहरू की उपस्थिति की चर्चा की है।
यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि आरएसएस व मोदी एक ऐसे व्यक्ति को अपने आदशर के रूप में प्रचारित कर रहे हैं, जिसने राष्ट्रपिता की हत्या के बाद उनके संगठन पर रोक लगाई थी। आरएसएस के मुखिया एम.एस. गोलवलकर को सरदार पटेल ने एक पत्र में लिखा, ॔॔उसके (आरएसएस) नेताओं के भाषण साम्प्रदायिकता के जहर से भरे हुए थे। अंतिम नतीजा यह हुआ कि समाज में साम्प्रदायिकता का ऐसा जहरीला वातावरण बन गया, जिसमें इतनी भयावह त्रासदी (गांधी की हत्या) संभव हो सकी’’। (सरदार पटेल के पत्र के अंश, जिन्हें ॔आउटलुक’ पत्रिका के अप्रैल 27, 1998 के अंक में प्रकाशित किया गया था)। ॔आउटलुक’ का यही अंक हमें बताता है कि गांधी जी की मृत्यु पर आरएसएस ने खुशियां मनाईं और मिठाई बांटी। मोदी, गोडसे का अधूरा काम पूरा कर रहे हैं। वे भारतीय राष्ट्रवाद पर हिन्दू राष्ट्रवाद के हमले के प्रतीक हैं। हिन्दू राष्ट्रवादी गोडसे ने गांधी पर इसलिए हमला किया क्योंकि वे भारतीय राष्ट्रवाद के प्रतीक थे। अब एक नया हिन्दू राष्ट्रवादी, नरेन्द्र मोदी, महात्मा गांधी पर प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी पसंद को लेकर आक्रमण कर रहा है। मोदी का यह कहना कि नेहरू के स्थान पर सरदार पटेल को देश का प्रधानमंत्री होना था, नेहरू की छवि को आघात पहुंचाने का प्रयास तो है ही, उससे भी ब़कर, यह गांधी पर धा हमला है। और इसमें आश्चर्य की कोई बात भी नहीं है। मोदी उस हिन्दू राष्ट्रवाद के पैरोकार हैं, जिसे गांधी और उनकी विचारधारा इसलिए पसंद नहीं थी क्योंकि वह भारत की विभिन्नता को स्वीकार करने की हामी थी। शायद ये लोग नहीं समझते कि ऐसा करके वे सरदार पटेल का भी अपमान कर रहे हैं क्योंकि सरदार भी भारतीय धर्मनिरपेक्षता और बहुवाद के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध थे और भारत को बहुवादी और धर्मनिरपेक्ष देश बनाने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पटेल ने गांधी जी के धर्मनिरपेक्ष भारत के निर्माण के सपने को पूरा करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मोदी के एक और झूठ का पर्दाफाश किया है। उन्होंने कहा कि मोदी ने पटना में अपने भाषण में कहा कि सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य, गुप्त राजवंश के थे जबकि वे मौर्य वंश के थे। इसी तरह, मोदी ने कहा कि सिकंदर गंगा के तट तक आ पहुंचा था। जबकि सच यह है कि सिकंदर सतलुज के तट से ही यूनान लौट गया था। मोदी ने इतिहास की अपनी अज्ञानता का भरपूर प्रदशर्न करते हुए कहा कि तक्षिशला, बिहार में है, जबकि तक्षिशला भारत के पिश्चमी भाग में थी और इस समय पाकिस्तान में है। मोदी ने पटना में अपनी आमसभा में ये सब झूठ जनता को लुभाने के लिए कहे। पटना की आमसभा को ॔हुंकार सभा’ का नाम दिया गया था। हुंकार का अर्थ होता है किसी बात को जोर से और अहंकार के अंदाज में कहना। और यह फासीवादी मानसिकता का प्रतीक है। मोदी ने अपनी सभा में विरोधियों को ॔चुनचुनकर उखाड़ फेंकने’ की बात भी कही। हिटलर ने भी ठीक यही किया था। उसने भी कम्युनिश्टों, ट्रेड यूनियनों और यहूदियों को चुनचुनकर उखाड़ फेंका था। इस समय मोदी का ध्यान उनके राजनैतिक विरोधियों पर केंद्रित है परन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उनकी हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा का पुराना नारा है ॔॔पहले कसाई फिर ईसाई’’। कुल मिलाकर, एक अत्यंत खतरनाक परिदृश्य उभर रहा है। गांधी जी की प्रधानमंत्री पद के लिए पसंद पर आक्रमण कर, भारतीय राष्ट्रवाद पर हल्ला बोला जा रहा है। जनता को भड़काने के लिए गोएबल्स के अंदाज में इतिहास को तोड़ामरोड़ा जा रहा है और उसी भाषा का इस्तेमाल हो रहा है, जो फासीवादियों की याद दिलाती है।
इस समय आरएसएसभाजपा-मोदी की किसी भी अन्य राजनैतिक गठबंधन से तुलना करना बेमानी और खतरनाक है। भाजपा एक अलग तरह की पार्टी है, जिसका अंतिम लक्ष्य हिन्दू राष्ट्र की स्थापना है। और इसके नेता मोदी चाहकर भी अपने खूनी पंजों को छुपा नहीं पा रहे हैं। जो लोग भाजपा और मोदी की किसी अन्य दल से तुलना करते हैं वे गंभीर भूल कर रहे हैं, जिसकी देश को आने वाले समय में, प्रजातंत्र के खात्मे के तौर पर, भारी कीमत चुकानी होगी। हमें यह याद रखना चाहिए कि हिटलर भी प्रजातांत्रिक तरीके से सत्ता में आया था। परंतु सत्ता में आने के तुरंत बाद उसने प्रजातंत्र का गला घोंट दिया और देश पर फासीवाद लाद दिया। उसके लिए उसने एक ओर अपने गुंडों की सेना का उपयोग किया तो दूसरी ओर विभिन्न क्षेत्रों में अपने विचारधारा के समर्थकों का।
खतरे की घंटी बज चुकी है। हम सबको उठकर खड़े हो जाना चाहिए।
-राम पुनियानी

मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

दादा गजेन्द्र सिंह समाज के हर वर्ग के प्रेरणा दायक


  बाराबंकी। पूर्व विधायक, समाज सुधारक स्व0 गजेन्द्र सिंह की प्रथम पुण्य तिथि के अवसर पर पूर्व अध्यक्ष जिला बार एसोसिएशन बृजेश दीक्षित की अध्यक्षता में गांधी भवन देवां रोड पर एक स्मृति सभा का आयोजन किया गया।
    कार्यक्रम का प्रारम्भ महन्त गुरूशरण दास ने स्व0 गजेन्द्र सिंह के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धासुमन पेश करते हुए किया।
    इस अवसर पर अपने संबोधन में बृजेश दीक्षित ने कहा कि दादा गजेन्द्र सिंह समाज के हर वर्ग के प्रेरणा दायक थे। उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि उनके विचारों का अनुसरण करने में ही है।
    गांधी वादी विचारक एवं गांधी समारोह ट्रस्ट के अध्यक्ष प0 राजनाथ शर्मा ने पूर्व विधायक को अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए कहा कि उनका जीवन एक सच्चे एवं निर्भीक इंसान के जीवन की अभिव्यक्ति थी और गांधी समारोह ट्रस्ट के वह संस्थापक सदस्य थे और उन्हीं की प्रेरणा से ट्रस्ट द्वारा अनेको कार्यक्रम सम्पन्न कराए गए।

    वरिष्ठ पत्रकार हशमतउल्ला ने पूर्व विधायक के जीवन व उनके कार्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वह बहुआयामी व्यक्तित्व के मालिक थे। एक ओर जहां वह एक निर्भीक व बेबाक राजनेता थे तो वहीं उर्दू व हिन्दी साहित्य के प्रेमी थे, उन्हें यदि रामायण की चौपाइयों , गीत, श्लोक व प्रमुख कवियों की कविताएं कठस्थ थी तो वहीं उर्दू के ऐसे नायाब अशआर याद थे जो किसी ने कभी सुने भी न हों।
    फखरूद्दीन अली अहमद कमेटी के पूर्व चेयरमैन निहाल रिजवी ने दादा गजेन्द्र सिंह के साथ बिताए गए अपने समय का स्मरण करते हुए कहा कि जिले में राजनीति की युवा पीढ़ी को तैयार करने में दादा की अहम भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि वह एक निर्भीक राजनेता थे और आम आदमी के सरोकारो के पैरोकार थे।
    जिला उपभोक्ता फोरम के पूर्व सदस्य हुमायू नईम खां ने दादा गजेन्द्र सिंह को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि वह अपने आदर्शों से कभी समझौता न करने वाले इंसान थे और सामाजिक समस्याओं के प्रति उनकी संवेदनाओं ने सदैव उन्हें आम इंसानों के करीब रखा।
    वरिष्ठ प्रवक्ता जवाहर लाल नेहरू परास्नातक महाविद्यालय डा. राजेश मल्ल ने अपने संबोधन में कहा कि दादा गजेन्द्र सिंह ने राजनीति में अपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के प्रवेश पर वह सदैव चिन्तित रहे और इसका विरोध करने के दृष्टिकोण से ही वह काफी समय तक एक राज्यमंत्री द्वारा राष्ट्रीय ध्वजारोहण किए जाने के खिलाफ अपनी आवाज बुलन्द करते हुए अपनी गिरफ्तारी देते रहे।
    इस अवसर पर पवन कुमार वैश्य, बृजमोहन वर्मा, डा. उमेश चन्द्र वर्मा, डा. एस.एम. हैदर, प्राचार्य रामस्वरूप यादव, पूर्व विधायक शिवकरन सिंह, हरिशरण दास, राकेश कुमार सिंह, दिलीप गुप्ता एडवोकेट, उपेन्द्र सिंह, श्रीमती नीरज सिंह, अजय सिंह, प्रशान्त मिश्र, सुरेन्द्र नाथ मिश्र, हरि गुप्ता, राजेन्द्र बहादुर सिंह, पुष्पेन्द्र कुमार सिंह, सलाम मोहम्मद, विजय प्रताप सिंह, आनंद सिंह, अरविन्द वर्मा, गनेश सिंह, धीरेन्द्र सिंह, राजेश्वर दयाल बाजपेयी, मेराज अहमद ने भी अपने विचार रखते हुए दिवंगत राजनेता  को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
    कार्यक्रम के अंत में रणधीर सिंह सुमन ने आए हुए सभी आगुन्तकों के प्रति अपना आभार व्यक्त किया।



रणधीर सिंह सुमन
एडवोकेट
जिला-बाराबंकी

सोमवार, 25 मार्च 2013

गांधी मार डालो

अमेरिका रूस से इसलिये डरता था कि अगर दुनिया में समाजवाद के विचार का फैलाव हुआ तो एक दिन अमरीका के लोग भी पूंजीवाद को उखाड फेंकेंगे . इसलिये अमरीका ने रूस के समाजवादी स्वरूप से घबरा कर ओसामा को भडकाया कि देखो रूस तो कम्युनिस्ट है और नास्तिक है .देखो ये तुम्हारे अल्लाह को भी नहीं मानता, इसलिये तुम इससे लड़ो और हम इसके लिये आपको हथियार और ट्रेनिंग देंगे . फिर रूस के टुकड़े होने के बाद अमरीका ने अपने उसी प्यादे ओसामा को आतंकवादी कह कर मार डाला और अपने सारे पाप छुपा लिये .
इसी तरह ब्रिटेन ने भारत में हिन्दू महासभा और संघ को खड़ा किया था और उन्हें भडकाया था कि देखो गांधी हिंदुओं का अहित कर रहा है इसे मार डालो .

गांधी की हत्या में गोडसे के साथ जिस दूसरे आदमी को सज़ा हुई थी उसका नाम नाना आप्टे था. वह ब्रिटिश गुप्तचर संगठन का एजेंट था और उसे इस काम के लिये नियमित पैसे मिलते थे . वह एक दुश्चरित्र व्यक्ति था उसने एक सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली बच्ची के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाये जिसके फलस्वरूप वह बालिका गर्भवती हो गई थी .

गांधी को मारने में भले ही गोली गोडसे ने चलाई थी लेकिन उसका गुरु नाना आप्टे ही था .

गांधी की हत्या ब्रिटिश गुप्तचर संगठन ने इसलिये करवाई थी क्योंकि गांधी ने बिहार और बंगाल के दंगे जादुई तरीके से शांत करवा दिये थे . और इसके बाद गांधी ने घोषणा की  थी कि अब वे भारत से हिंदुओं को वापिस पकिस्तान लेकर जायेंगे और पकिस्तान से मुसलमानों को वापिस भारत लेकर आयेंगे .और इस बंटवारे को वो नहीं मानेंगे .

गांधी की इस योजना से अंग्रेज घबरा गये . क्योंकि पकिस्तान को तो पश्चिमी साम्राज्यवादी खेमे ने अरब के तेल क्षेत्र और एशिया पर अपना दबदबा बनाये रखने के लिये एक फौजी अड्डे के रूप में बनाया था . उन्हें लगा कि गांधी हमारा बना बनाया खेल बिगाड़ सक्ता है . इसलिये उन्होंने अपनी ही पैदाइश हिन्दू महासभा और संघ में अपने लोगों को गांधी को खत्म करने का आदेश दे दिया .
 
 -हिमांशु कुमार 

 
Share |