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सोमवार, 4 नवंबर 2013

इरोम शर्मिला की भूख हड़ताल के तेरह साल :4 नवम्बर पर विशेष

शहीद भगत सिंह का जज़्बा, गांधी जी की राह

देश में दीपावली मनाई जा रही है। रोशनी की जा रही है। दीप जल रहे हैं। मोमबत्तियां जलाई जा रही हैं। ऐसे में हमसे बहुत दूर उत्तर पूर्व के राज्य मणिपुर में मानवाधिकार कार्यकर्ता, कवयित्री इरोम चानू शर्मिला इस लोकतंत्र के अंधेरे से संघर्ष कर रही है, अपने संघर्ष की मशाल जलाए हुए है। वह न सिर्फ हमारे ‘लोकतंत्र’ की नौकरशाही और सैनिक तंत्र का मुकाबला कर रही हैं बल्कि अपनी मृत्यु से भी पंजे लड़ा रही हैं। क्या हम इस दीवाली में अपने घरों, कस्बों और शहर में दीप व मोमबत्यिां जलाकर उनके साथ नहीं खड़े हो सकते हैं ? वह आज संघर्ष की जिस कठिन राह पर हैं, हमारे लिए जरूरी है कि हम उनके साथ अपनी एकजुटता जाहिर करें, उन्हें यह संदेश दें कि वह अकेली नहीं हंै। इस साल चार नवम्बर को उनकी भूख हड़ताल के तेरह साल पूरे हो गये। इतनी लम्बी भूख हड़ताल का कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता।
                         इरोम शर्मिला ने जब भूख हड़ताल की शुरुआत की थी, वे 28 साल की युवा थीं। कुछ लोगों को लगा था कि यह कदम एक युवा द्वारा भावुकता में उठाया गया है। लेकिन समय के साथ इरोम शर्मिला के इस संघर्ष की सच्चाई लोगों के सामने आती गई। आज वह एकतालीस साल की हो चुकी हैं। तमाम अवरोधों और मुश्किलों के बावजूद उनकी भूख हड़ताल आज भी जारी है। भले ही इन वर्षों में इरोम शर्मिला का कृषकाय शरीर और जर्जर व कमजोर हुआ हो पर कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना करने वाली उनकी आन्तरिक ताकत और इच्छा.शक्ति बढ़ी है। इसीलिए इसे मात्र भावुकता नहीं कहा जा सकता है बल्कि यह पूर्वोŸार भारत खासतौर से मणिपुर के ठोस यथार्थ की आँच में पका उनका विचार व दृढ इच्छा शक्ति है जिसके मूल में दमन और परतंत्रता के विरुद्ध दमितो.उत्पीडि़तों द्वारा स्वतंत्रता की दावेदारी है। इरोम शर्मिला  के संघर्ष में हमें इसी दावेदारी की अभिव्यक्ति मिलती है। इसके अन्तर में स्वतंत्रता की छटपटाहट और अदम्य साहस से लबरेज मौत को धता बता देने वाली ताकत है। इसीलिए आज इरोम शर्मिला इस्पात की तरह न झुकने, न टूटने वाली मणिपुर की ‘लौह महिला’ के रूप में जानी जाती हैं।
                      बात दो नवम्बर 2000 की है। मणिपुर की राजधानी इम्फाल से सटे मलोम में शान्ति रैली के आयोजन के सिलसिले में इरोम शर्मिला एक बैठक कर रही थीं। उसी समय मलोम बस स्टैण्ड पर सैनिक बलों द्वारा ताबड़तोड़ गोलियाँ चलाई गईं। इसमें करीब दस निरपराध लोग मारे गये। मारे गये लोगों में 62 वर्षीया वृद्ध महिला लेसंगबम इबेतोमी तथा बहादुरी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित सिनम चन्द्रमणि शामिल थीं। यह सब इरोम शर्मिला को आहत व व्यथित कर देने वाली घटना थी। वैसे यह कोई पहली घटना नहीं थी जिसमें सुरक्षा बलों ने नागरिकों पर गोलियाँ चलाई हो, दमन ढ़ाया हो पर इरोम शर्मिला के लिए यह दमन का चरम था। इस घटना के बाद इरोम के लिए शान्ति रैली निकाल कर सŸाा की कार्रवाइयों का विरोध अपर्याप्त या अप्रासंगिक लगने लगा। लिहाजा उन्होंने एलान किया कि अब यह सब बर्दाश्त के बाहर है। यह तो निहत्थी जनता के विरुद्ध सŸाा का युद्ध है। उन्होंने माँग की कि मणिपुर में लागू कानून सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम ;आफ्सपाद्ध हटाया जाय। इस एक सूत्री माँग को लेकर उन्होंने नैतिक युद्ध छेड़ दिया। तीन नवम्बर की रात में आखिर बार अन्न ग्रहण किया और चार नवम्बर की सुबह से उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी।
             इस भूख हड़ताल के तीसरे दिन सरकार ने इरोम शर्मिला को गिरफ्तार कर लिया। उन पर आत्महत्या करने का आरोप लगाते हुए धारा 309 के तहत कार्रवाई की गई और न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। तब से वह लगातार न्यायिक हिरासत में हैं। जवाहरलाल नेहरू अस्पताल का वह वार्ड जहाँ उन्हें रखा गया है, उसे जेल का रूप दे दिया गया है। वहीं उनकी नाक से जबरन तरल पदार्थ दिया जा रहा है। इस तरह इरोम शर्मिला को जिन्दा रखने का ‘लोकतांत्रिक’ नाटक पिछले एक दशक से ज्यादा समय से चल रहा है। उल्लेखनीय है कि धारा 309 के तहत इरोम शर्मिला को एक साल से ज्यादा समय तक न्यायिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता। इसलिए एक साल पूरा होते ही उन्हे रिहा करने का नाटक किया जाता है। फिर उन्हें गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत के नाम पर उसी सीलन भरे वार्ड में भेज दिया जाता है और जीवन बचाने के नाम पर नाक से तरल पदार्थ देने का सिलसिला चलाया जाता है।
                 दरअसल, इरोम शर्मिला जिस ‘आफ्सपा’ को हटाये जाने की माँग को लेकर भूख हड़ताल पर हैं, उस कानून के प्रावधानों के तहत सेना को ऐसा विशेषाधिकार प्राप्त है जिसके अन्तर्गत वह सन्देह के आधार पर बगैर वारण्ट कहीं भी घुसकर तलाशी ले सकती है, किसी को गिरफ्तार कर सकती है तथा लोगों के समूह पर गोली चला सकती है। यही नहीं, यह कानून सशस्त्र बलों को किसी भी दण्डात्मक कार्रवाई से बचाती है जब तक कि केन्द्र सरकार उसके लिए मंजूरी न दे। देखा गया है कि जिन राज्यों में ‘आफ्सपा’ लागू है, वहाँ नागरिक प्रशासन दूसरे पायदान पर पहुँच गया है तथा सरकारों का सेना व अर्द्धसैनिक बलों पर निर्भरता बढ़ी है। इन राज्यों में जनतंत्र शिथिल हुआ है और सैन्यीकरण की प्रक्रिया में तेजी आई है, जन आन्दोलनों को दमन का सामना करना पड़ा है तथा नागरिकों में अलगाव की भावना बढ़ी है। हालत यह है कि आज देश के पाचवें हिस्से में ‘आफ्सपा’ लागू है।
           इसी का चरम रूप हमे मणिपुर जैसे पूर्वोतर राज्य में देखने को मिलता है जहाँ ‘आफ्सपा’ शासन के 55 वर्षों में बीस हजार से ज्यादा नागरिकों को अपनी जानें गंवानी पड़ी है। इसी की देन एक तरफ अपमान, बलात्कार, गिरफ्तारी व हत्या है तो दूसरी तरफ तीव्र घृणा, आत्मदाह, आत्महत्या, असन्तोष व आक्रोश का विस्फोट है। इस संदर्भ में 2004 में मणिपुर की महिलाओं द्वारा किये संघर्ष की चर्चा करना प्रासंगिक होगा। उनके आक्रोश और चेतना का विस्फोट हमें देखने को मिला जब असम राइफल्स के जवानों द्वारा  थंगजम मनोरमा के साथ किये बलात्कार और हत्या के विरोध में मणिपुर की महिलाओं ने कांगला फोर्ट के सामने नग्न होकर प्रदर्शन किया। उन्होंने जो बैनर ले रखा था, उसमें लिखा था ‘भारतीय सेना आओ, हमारा बलात्कार करो’। इरोम शर्मिला इसी यथार्थ की मुखर अभिव्यक्ति हंै।
                  इरोम शर्मिला कोई आतंकवादी नहीं है। उसके प्रतिरोध का रास्ता शांतिपूर्ण व अहिंसक है। यही कारण है कि दुनिया में शांति व मानवाधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों को इरोम शर्मिला के संघर्ष ने आकर्षित किया है। इस संघर्ष को सम्मानित किया गया है। 2005 में इरोम को नोबल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया गया था। वहीं, 2007 में मानवाधिकारों के लिए ग्वांजु सम्मान, 2010 में रवीन्द्रनाथ ठाकुर शांति पुरस्कार जैसे अनगिनत पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। भले ही इरोम शर्मिला के संघर्ष को सम्मानित किया जा रहा हो लेकिन भारतीय राज्य उन्हें कोई स्वतंत्रता देने को तैयार नहीं है। उसकी नजर में वह कोई मानवाधिकार कार्यकर्ता नहीं बल्कि अपराधी है।
                          हालत तो यह है कि उन्हें सामान्य बंदियों की सुविधाओं और अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया है। पिछले साल अक्टूबर में उन्हें जब अदालत में पेश किया गया था, इरोम ने प्रेस कांफ्रेंस करने की इजाजत चाही थी लेकिन इरोम को अपनी बात प्रेस को कहने की स्वतंत्रता भी नहीं दी गई। वह ऐसी कैदी है जिससे मिलने जुलने की इजाजत भी नहीं है। उसे अकेलेपन में जीने के लिए बाध्य किया जा रहा है। बीते सप्ताह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दो सदस्यीय दल ने मणिपुर का दौरा किया। इस दल ने मणिपुर सरकार की इस बात के लिए कड़ी आलोचना की है कि वह इरोम को जिन्दा रखने के लिए जरूरी न्यूट्रिशियन नाक के रास्ते पहुंचा रही है लेकिन उसे अधिकारों से वंचित किये हुए है। उन्होंने राज्य सरकार के इस व्यवहार को अमानवीय और कानून विरुद्ध माना है। इसीलिए उन्होंने कहा कि इरोम के वो सारी स्वतंत्रता दी जाय जो किसी भी आंदोलनकारी को न्यायिक हिरासत में दी जाती है।   
            हमारी आजादी के संघर्ष के दो बड़े नायक रहे हैं - शहीद भगत सिंह और गांधी। इन दोनों नायकों की जो छवियां रही हैं, उसकी अनूठी एकता हमें इरोम शर्मिला के व्यक्तित्व और उनके आंदोलन में देखने को मिलती है।  जहां इरोम शर्मिला के अन्दर अपने उद्देश्य के लिए शहीद भगत सिंह सा आत्मोत्सर्ग का जज़्बा मिलता है, वहीं उनके आंदोलन की प्रेरणा गांधी हैं। यह प्रतिरोध संघर्ष की ऐसी राह है जिसमें रक्त का एक बूंद भी नहीं बहता लेकिन इसकी मारक क्षमता असीमित है। यह शांति के लिए अहिंसा का ऐसा मार्ग है जहां राज्य और उसकी शक्तियां लगातार बेनकाब हो रही हैं, वे आतंक व हिंसा का पर्याय बनती जा रही हैं।
                               हकीकत तो यह है कि इरोम शर्मिला का यह संघर्ष हमारे लोकतंत्र के खंडित चेहरे को सामने लाता है। यह राज्य व्यवस्था से लेकर हमारी न्याय व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करता है। इस साल मार्च में जब दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में इरोम को पेश किया गया, बार बार न्यायालय द्वारा इस बात पर जोर दिया जाता रहा कि वह अपने जीवन को खत्म करना चाहती है, वह आत्महत्या की राह पर है। इस अदालत में दिया उसका बयान गौरतलब है। उसने जोर देकर कहा कि मैं सामाजिक कार्यकर्ता हूं और मैं आत्महत्या के विरुद्ध हूं। मैं जिन्दगी से बेहद प्यार करती हूं। मैं शांति और इंसाफ चाहती हूं। मेरा आंदोलन अहिंसात्मक है तथा आफ्सफा को खत्म करने के लिए है। आफ्सफा जैसे कानून को खत्म कर दिया जाय, मैं अपना आंदोलन समाप्त कर दूंगी। इरोम अपनी इस भावना को अपनी कविता में भी अभिव्यक्त करती है: ‘कैदखाने के कपाट पूरे खोल दो/मैं और किसी राह पर नहीं जाऊँगी/ ३ण्ण्काँटों की बेडि़याँ खोल दो/होने दो मुझे अंधियार का उजाला’।
-कौशल किशोर

मो -  09807519227










गुरुवार, 7 मार्च 2013

न आह भरने वाला है, न वाह कहने वाला है

वितमंत्री पी चिदंम्बरम द्वारा पेश बजट के संबंध में प्रमुखता से कहा जा रहा है कि यह ‘न आह भरने वाला है, न वाह कहने वाला है’। इस बजट से न तो मंहगाई कम होगी, न आम जनता को राहत मिलेगी, न राजकोषीय घाटा कम होगा और चाहे जितने दावे किये जायें, इससे विकास दर भी बढ़ने वाला नहीं है। यह भी कहा जा रहा कि अगले साल चुनाव है, यह उसे ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। कुलमिला कर यह यथास्थितिवादी बजट है। जब हम कहते हैं कि इससे यथस्थिति बनी रहेगी तो इसका तात्पर्य यही है कि ‘काॅरपोरेट को छूट तथा , पर बोझ’ की नीति जारी रहेगी।
वैसे सरकार के अधिकांश आर्थिक फैसले बजट के हिस्से नहीं बनते हैं। वह कैबिनेट के स्तर पर लिये जाते हैं। यहां तक कि उनके लिए संसद की मंजूरी ली जाय, यह जरूरत भी नहीं समझी जाती है। जैसे बजट के पहले रेल भाड़ा में बढ़ोतरी की गई। इसके लिए डीजल की कीमत में आई वृद्धि को आधार बनाया गया। रेलमंत्री पवन बंसल द्वारा संसद में पेश रेल बजट तो बस उसका पूरक सा लगता है। यही नीति पेट्रेलियम पदार्थों की कीमतों के संबंध में अपनाई जा रही है। इधर वितमंत्री ने बजट पेश किया। दूसरे दिन तेल कंपनियों द्वारा पेट्रोल की कीमत बढ़ा दी गई।
सरकार कह रही है कि यह कंपनियों का फैसला है। इससे उसका लेना देना नहीं है। लेकिन भुगतना तो देश की जनता को पड़ रहा है, फिर इससे वह अपना मुंह कैसे मोड़ सकती है। एक पखवारे में दूसरी बार पेट्रोल की कीमत बढ़ाई गई। इन दोनांे बढ़ोतरी को मिला दिया जाय तो अब प्रति लीटर पेट्रोल के लिए उपभोक्ता को रुपये 3.66 ज्यादा खर्च करने पड़े रहे हैं। सरकार ने तेल कंपनियों को कीमत तय करने का अधिकार 26 जून 2010 को दिया था। उस वक्त पेट्रोल की कीमत 55 रुपये प्रति लीटर थी जबकि करीब ढ़ाई साल बाद आज की तारीख में पेट्रोल 76.20 रुपये प्रति लीटर हो गया है। कीमत में वृद्धि की यह दर 38.5 प्रतिशत है। इसी तरह साल 2010 में डीजल सैŸाीस रुपये प्रति लीटर था जो आज 51.32 रुपये प्रति लीटर हो गया है। यह बढ़ोतरी 38.7 प्रतिशत है।
जहां पेट्रोल की कीमतों को सरकार के नियंत्रण से मुक्त रखा गया था, वहीं डीजल की कीमतों का निर्धारण सरकार द्वारा किया जाता रहा है। तेल कंपनियों का अरसे से सरकार पर इस बात का दबाव था कि वह पेट्रोल की तरह डीजल को भी अपने नियंत्रण से मुक्त करे। आखिरकार तेल कंपनियों के लिए वह सुनहरा दिन आ ही गया जब डीजल को बाजार के हवाले कर दिया गया। इस साल 17 जनवरी को सरकार ने यह नीतिगत फैसला लिया कि वह डीजल के मूल्य निर्धारण को अपने नियंत्रण से मुक्त करेगी और चरणबद्ध तरीके से डीजल पर दी जाने वाली सब्सिडी समाप्त की जाएगी। सरकार का तर्क रहा है कि वह प्रति लीटर 9 रुपये की सहायता देती है। अब नये फार्मूले के तहत प्रति माह डीजल की कीमत में पचास पैसे की वृद्धि की जाएगी। इस तरह अगले साल जून के बाद सरकार को डीजल के मद में आगे कोई सहायता नहीं देनी पड़ेगी। अपने इस फैसले से उसने जनता पर ‘जोर का झटका धीरे से’ लगाया है।
सरकार के इस फैसले पर तेल कंपनियों द्वारा खूब जश्न मनाया गया। इंडियन आॅयल काॅरपोरेशन ;आई0 ओ0 सी0 के सीएमडी आर एस बुटोला की ओर से दिल्ली के पाच सितारा होटल क्लैरिजेज में आर्थिक जगत तथा बाजार की मदद करने वाले पत्रकारों व मीडियाकर्मियों को दावतें दी गईं जिन्होंने पेट्रोलियम पदार्थों पर दी जाने वाली सरकारी सब्सिडी को राजकोषीय घाटे व अर्थव्यवस्था की दुर्गति   के लिए मुख्य कारक के रूप में प्रचारित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। यह तेल कंपनियों के साथ इनकी भी जीत थी। इस जीत के जश्न में इनके शराब के प्याले खूब टकराये।
हम देखते हैं कि सरकार बार बार इस बात का रोना रोती है कि उसे पेट्रोलियम पदार्थों के लिए भारी विŸाीय सहायता देनी पड़ती है। इसकी वजह से उसे राजकोषीय घाटा उठाना पड़ रहा है। इससे आमदनी व खर्च के बीच असंतुलन कायम हो गया है। सरकार सब्सिडी का बोझ नहीं उठा सकती। सवाल है कि आखिर राजकोषीय घाटे के नाम पर सब्सिडी खत्म करने वाली जो पेट्रो पालिसी अपनाई जा रही है, क्या यही एकमात्र विकल्प है या यह कितना जायज है ? इसका दूसरा विकल्प क्या यह नहीं है कि आमदनी बढ़ाई जाय ? लेकिन देखा जा रहा है कि आमदनी बढ़ाने के उपाय पर सरकार का नजरिया टालने का है। जनरल एंटी एवायडेंस रुल ;गारद्ध जैसे आमदनी के संभावित बड़े श्रोत के संबंध में सरकार का ऐसा ही नजरिया सामने आया है। मान लिया जाय कि पेट्रोलियम पदार्थों पर सरकार द्वारा दिया जाने वाला धन ‘बोझ’ है, लेकिन आमदनी बढ़ाने वाले जनरल एंटी एवायडेंस रुल ;गार को 2016 तक के लिए वितमंत्री द्वारा टाल देना क्या आमदनी के बड़े श्रोत को रोक देना नहीं है ?
गौर करने की बात है कि एक तरफ सरकार द्वारा डीजल को बाजार के हवाले करने का फैसला लिया गया, उसी वक्त एसोचैम के दबाव में सरकार ने गार को टालने का भी फैसला लिया। गार ऐसा नियम है जिसके तहत उन कंपनियों को टैक्स अदा करना होगा जो भारत में कारोबार करती हैं, भले ही वे कहीं भी पंजीकृत हों। देखने में आया है कि दर्जनों कंपनियां ऐसे कारोबार के माध्यम से भारी टैक्स की चोरी कर रही हैं।  सवाल है कि जिस टैक्स कानून से सरकार को भारी आमदनी होती, उसे किसके हित में टाल दिया गया ? इसके पीछे सरकार का तर्क है कि इससे देशी विदेशी निवेशक नाराज हो जायेंगे। सवाल है कि क्या उनकी नाराजगी को ध्यान में रखकर टैक्स की चोरी को रोकने वाले कानून को टालना कहां तक जायज है ? साफ है कि एक तरफ सब्सिडी में कटौती और दूसरी तरफ गार को टालना, इसके पीछे सरकार किसका हित साधने में लगी है ?
सरकार इस पर भी विचार करने को तैयार नहीं है कि वह देश के उद्दयोगपतियों को टैक्स के मद में हर साल लाखों करोड़ की छूट देती है। 2008 में मंदी के नाम पर कंपनियों को बेल आऊट का बड़ा पैकेज दिया गया था जिसके तहत उन्हें टैक्स में राहत, कर्ज में छूट दी गई थी। इस पर आज पुनर्विचार की जरूरत है। इनकार नहीं किया जा सकता कि सरकार का काम है कि वह कंपनियों के हितों को देखे तथा यह सुनिश्चित करे कि वे कानून के दायरे में काम करें, वहीं जनता की जीवन दशा को उन्नत करना, उन्हें राहत प्रदान करना तथा उन पर कोई अतिरिक्त बोझ न पड़े, यह देखना भी सरकार का कार्यभार है। लेकिन आज कंपनियों को छूट देना और जनता पर बोझ लादना यही सरकार की दिशा व नीति है। इसी नीति का परिणाम है कि जहां कंपनियों को खुश करने के लिए टैक्स की चोरी करने वाले कानून ‘गार’ को टाल दिया गया, वहीं बजट से सब्सिडी के बोझ को कम करने के लिए डीजल को बाजार के हवाले कर दिया गया। अर्थात् लोक हार गया और काॅरपोरेट जीत गया। 
-कौशल किशोर


लेखक वरिष्ठ साहित्यकार व स्वतंत्र पत्रकार हैं










गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

फ़ैज़: इंकलाब का शायर या मुहब्बत का ?

               "फ़ैज़ के जन्म दिवस पर विशेष"

फ़ैज़ अहमद फै़ज़ ;13 फरवरी - 20 नवम्बर 1984द्ध की जन्मशती पिछले साल मनायी गई। फै़ज़ इस महाद्वीप के ऐसे कवि रहे हैं जो भाषा व देश की दीवारों को तोड़ते हैं। वे ऐसे शायर हैं जिन्होंने अपनी शायरी से लोगों के दिलों में जगह बनाई। हमारे अन्दर इंकलाब का अहसास पैदा किया तो वहीं मुहब्बत के चिराग भी रोशन किये। दुनिया फ़ैज़ को इंकलाब के शायर के रूप में जानती है लेकिन वे अपने को मुहब्बत का शायर कहते थे। इंकलाब और मुहब्बत का ऐसा मेल विरले ही कवियों में मिलता है। यही कारण है कि फ़ैज़ जैसा शायर मर कर भी नही मरता। वह हमारे दिलों में धड़कता है। वह उठे हुए हाथों और बढ़ते कदमों के साथ चलता है। वह हजार हजार चेहरों पर नई उम्मीद व नये विश्वास के साथ खिलता है और लोगों के खून में नये जोश की तरह जोर मारता है।
फ़ैज़ उर्दू कविता की उस परंपरा के कवि हैं जो मीर, गालिब, इकबाल, नज़ीर, चकबस्त, ज़ोश, फि़राक, मखदूम से होती हुई आगे बढ़ी है। यह परंपरा है, आवामी  शायरी की परंपरा। उर्दू की वह शायरी जो माशूकों के लब व रुखसार ;चेहरा, हिज्र व विसाल ;ज़ुदाई-मिलन, दरबार नवाजी, खुशामद और केवल कलात्मक कलाबाजियों तक सीमित रही है, इनसे अलग यह परंपरा आदमी और उसकी हालत, अवाम और उसकी जिन्दगी से रू ब रू होकर आगे बढ़ी है। फ़ैज़ इस परंपरा से यकायक नहीं जुड़ गये। उन्होंने अपनी शुरुआत रूमानी अन्दाज में की थी तथा ‘मुहब्बत के शायर’ के रूप में  अपनी इमेज बनाई थी।
1930 के बाद वाले दशक के दौरान फैली भुखमरी, किसानों-मजदूरों के आंदोलन, गुलामी के विरुद्ध आजादी की तीव्र इच्छा आदि चीजों ने हिंदुस्तान को झकझोर रखा था। इनका नौजवान फ़ैज़ पर गहरा असर पड़ा। इन चीजों ने उनकी रुमानी सोच को नए नजरिये से लैस कर दिया। नजरिये में आया हुआ बदलाव शायरी में कुछ यूँ ढ़लता है:
‘पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से 
लौट आती है इधर को भी नजर क्या कीजे 
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे
और भी गम है जमाने में मुहब्बत के सिवा
 मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न मांग’
इस दौर में फ़ैज़ यह भी कहते हैं - ‘अब मैं दिल बेचता हूं और जान खरीदता हूं’। फ़ैज की शायरी में आया यह बदलाव ‘नक्शे फरियादी’ के दूसरे भाग में साफ दिखता है। हालत का बयान कुछ इस कदर होता है:
‘जिस्म पर क़ैद है, जज़्बात पर जंजीरें हैं
फिक्र महबूस (बन्दी) है, गुफ्तार पे ताजीरें (प्रतिबंध) हैं'
साथ ही यह विश्वास भी झलकता है - ये स्थितियां बदलेंगी, ये हालात बदलेंगे। शायर कहता है:
‘चन्द रोज और मिरी जान ! फकत चंद ही रोज
जुल्म की छांव में दम लेने पे मजबूर हैं हम
...........लेकिन अब जुल्म की मी’याद के दिन थोड़े हैं
इक जरा सब्र, कि फरियाद के दिन थोड़े हैं।’
फ़ैज़ का यह विश्वास समय के साथ और मजबूत होता गया। कविता का आयाम व्यापक होता गया। कविता आगे बढ़ती रही। यह जनजीवन और उसके संघर्ष के और करीब आती गई। इस दौरान न सिर्फ फ़ैज़ की कविता के कथ्य में बदलाव आया, बल्कि उनकी भाषा भी बदलती गयी है। जहां पहले उनकी कविता पर अरबी और फारसी का प्रभाव नजर आता था, वहीं बाद में उनकी कविता जन मानस की भाषा, अपनी जमीन की भाषा के करीब पहंुचती गई है। ऐसे बहुत कम रचनाकार हुए हैं, जिनमें कथ्य और उसकी कलात्मकता के बीच ऐसा सुन्दर संतुलन दिखाई पड़ता है। फ़ैज़ की यह चीज तमाम कवियों-लेखकों के लिए अनुकरणीय है, क्योंकि इस चीज की कमी जहां एक तरफ नारेबाजी का कारण बनती है, वहीं कलावाद का खतरा भी उत्पन्न करती हैं।
फ़ैज़ की खासियत उनकी निर्भीकता, जागरुकता और राजनीतिक सजगता है। फ़ैज़ ने बताया कि एक कवि-लेखक को राजनीतिक रूप से सजग होना चाहिए तथा हरेक स्थिति का सामना  करने के लिए उसे तैयार रहना चाहिए। अपनी निर्भीकता की वजह ही उन्हें पाकिस्तान के फौजी शासकों का निशाना बनना पड़ा। दो बार उन्हें गिरफ्तार किया गया। जेलों में रखा गया। रावलपिंडी षडयंत्र केस में फँसाया गया। 1950 के बाद चार बरस उन्होंने जेल में गुजारे। शासकों का यह उत्पीड़न उन्हें तोड़ नहीं सका, बल्कि इस उत्पीड़न ने उनकी चेतना, उनके अहसास तथा उनके अनुभव को और गहरा किया। फ़ैज़ की कविताओं पर बात करते समय उनके उस पक्ष पर भी, जिसमें उदासी व धीमापन है, विचार करना प्रासंगिक होगा। यह उदासी व धीमापन फ़ैज़ की उन रचनाओं में उभरता है जो उन्होंने जेल की चहारदीवारी के अन्दर लिखी थीं। एक कवि जो घुटन भरे माहौल में जेल की सींकचों के भीतर कैद है, उदास हो सकता है। लेकिन सवाल है कि क्या कवि उदास होकर निष्क्रिय हो जाता है ? धीमा होकर समझौता परस्त हो जाता है ? फ़ैज़ जैसा कवि हमेशा जन शक्ति के जागरण के विश्वास के साथ अपनी उदासी से आत्म संघर्ष  करता है और यह आत्म संघर्ष फ़ैज़ की कविताओं में भी दिखाई देता है। फ़ैज़ उन चीजों से, जो मानव को कमजोर करती हैं, संघर्ष करते हुए जिस तरह सामने आते है, वह उनकी महानता का परिचायक है। वे कहते हैं -
‘हम परवरिशे-लौहो कलम करते रहेंगे/जो दिल पे गुजरती है रक़म करते रहेंगे।’
या और भी:-
‘मता-ए-लौह-औ कलम छिन गई तो क्या गम है/कि खून-ए-दिल में डुबो ली हैं उँगलियाँ मैंने/जबाँ पे मुहर लगी है तो क्या रख दी हैं/हर एक हल्का-ए-जंजीर में जुबाँ मैंने’
इन पंक्तियों में एक कवि के रचना कर्म की सोद्देश्यता झलकती है।
वैसे फ़ैज़ ने ‘मुहब्बत के शायर’ के रूप में अपनी पहचान बनाई थी। इस नजरिये से हम उनकी पूरी कविता यात्रा पर गौर करें तो पायेंगे कि फ़ैज़ का यह रूप अर्थात मुहब्बत के एक शायर का रूप समय के साथ निखरता गया है तथा उनके इस रूप में और व्यापकता व गहराई आती गई है। शुरुआती दौर में जहां उनका अन्दाज रूमानी था, बाद में समय के साथ उनका नजरिया वैज्ञानिक होता गया है। जहाँ पहले शायर हुस्न-ओ-इश्क की मदहोशियों में डूबता है, वहीं बाद में सामाजिक राजनीतिक बदलाव की आकांक्षा से भरी उस दरिया में डूबता है, जिस दरिया के झूम उठने से बदलाव का सैलाब फूट पड़ता है। जहाँ पहले माशूक के लिए चाहत है, समय के साथ यह चाहत शोषित पीडि़त इन्सान के असीम प्यार में बदल जाती है। इसी अथाह प्यार का कारण है कि दुनिया में जहां कहीं दमन-उत्पीड़न की घटनाएं घटती हैं, फ़ैज़ इनसे अप्रभावित नहीं रह पाते हैं। वे अपनी कविता से वहाँ तुरन्त पहुँचते हैं। जब ईरान में छात्रों को मौत के अंधेरे कुएँ में धकेला गया, जब साम्राज्यवादियों द्वारा फिलस्तीनियों की आजादी पर प्रहार किया गया, जब बेरूत में भयानक नर संहार हुआ - फै़ज़ ने इनका डटकर विरोध किया तथा इन्हें केन्द्रित कर कविताएँ लिखीं। इनकी कविताओं में उनके प्रेम का उमड़ता हुआ जज़्बा तथा उनकी घृणा का विस्फोट देखते ही बनता है। जनता के इसी अथाह प्यार के कारण ही फ़ैज़ अपने को ‘मोहब्बत का शायर’ कहते थे, जब कि सारी दुनिया उन्हें इंकलाब के शायर के रूप में जानती है। दरअसल, फ़ैज़ के मोहब्बत के दायरे में सारी दुनिया समा जाती है। उनका इंकलाब मुहब्बत से अलग नहीं, बल्कि उसी की जमीन पर खड़ा है। उनकी कविता में मुहब्बत नये अर्थ, नये संदर्भ में सामने आती है जिसमें व्यापकता व गहराई है।

-कौशल किशोर
मो - 08400208031
        09807519227

बुधवार, 9 जनवरी 2013

लूट व दमन भूमंडलीकरण की संस्कृति है।

कामरेड वासुदेव पाण्डेय की पहली बरसी पर सेमिनार
कामरेड वासुदेव पाण्डेय ने पिछले साल 6 जनवरी 2012 को हमारा साथ छोड़ा। उस वक्त उनकी उम्र अस्सी के पास थी। जो लोग भी प्रदेश के श्रमिक आंदोलन के इतिहास तथा बासुदेव पाण्डेय के व्यक्तित्व और आंदोलन में उनके योगदान से परिचित हैं, उनके लिए कामरेड पाण्डेय का निधन अत्यन्त दुखद और पीड़ा दायक रहा है। एक दौर था जब कानपुर के टेक्सटाइल, जूट, चमड़ा से लेकर प्रदेश की चीनी मिलों, कताई मिलों, बिजली, सीमेंट उद्दयोग, राज्य निगमों, राज्य कर्मचारियों, संगठित असंगठित क्षेत्रों में मजदूर संगठनों की अच्छी स्थिति थी। न सिर्फ मजदूरों के बीच वामपंथी विचारधारा का खासा प्रभाव था बल्कि एस एम बनर्जी, राम आसरे, हरीश तिवारी जैसे जुझारू व समर्पित श्रमिक नेताओं की टीम थी। बासुदेव पाण्डेय उसी टीम में शामिल थे।
बासुदेव पाण्डेय की यह विशेषता थी कि प्रदेश के छोटे से बड़े आंदेालनों में हर जगह वे मौजूद रहते थे। श्रमायुक्त कार्यालय या किसी मिल गेट पर धरना प्रदर्शन हो, विधानसभा के सामने रैलियाँ हो, बिजली मजदूरों के आंदोलन हो, स्कूटर्स इण्डिया व राज्यनिगमों के निजीकरण के विरुद्ध संघर्ष हो, बासुदेव पाण्डेय जुलूस में नारे लगाते, सभा को संबोधित करते, लाठी खाते या जेल जाते मिल जाते। नई आर्थिक नीति के खिलाफ प्रदेश में जो आंदोलन चला उसमें बासुदेव पाण्डेय ने केन्द्रक की भूमिका निभाई। वे वामपंथी विचारधारा तथा एटक जैसे वामपंथी ट्रेड यूनियन के नेता थे लेकिन उनके अन्दर कोई वैचारिक संकीर्णता नहीं थी। वे मजदूर आंदोलन की व्यापक एकता के पक्षधर थे। इसके लिए कांग्रेस के मजदूर संगठन इंटक तथा भाजपा की विचारधारा के मजदूर संगठन भारतीय मजदूर संघ से एकता बनाने में भी उन्हें हिचक नहीं थी।
बासुदेव पाण्डेय की स्कूली शिक्षा ज्यादा नहीं थी। उनकी पाठशाला श्रमिकों का संगठन व संघर्ष था। सामाजिक शिक्षा व जीवन ज्ञान उन्हें यहीं मिला। बासुदेव पाण्डेय के अन्दर बचपन से सामाजिक सवालों पर पहलकदमी लेने की प्रवृति थी। यही खूबी उन्हें मजदूर आंदोलन की ओर ले आई। इसी आंदोलन के दौरान मजदूरों की मुक्ति के सपने देखने उन्होंने शुरू किये। इसी प्रक्रिया में माक्र्सवाद और कम्युनिस्ट पार्टी तक पहुँचे। उनकी राजनीतिक यात्रा का आरम्भ बोल्”ोविक पार्टी से हुआ था। बाद में इस पार्टी का भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में विलय हो गया। इस विलय के साथ वे भी कम्युनिस्ट पार्टी में आ गये और सारी जिन्दगी वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े रहे।
बासुदेव पाण्डेय 1956 में बिजली विभाग की सेवा में आये। बिजली विभाग से अपनी नौकरी की शुरुआत की थी। वे हाइड्रो इलेक्ट्रिक इंपलाइज यूनियन के निर्माणकर्ताओं में थे। उन दिनों बिजली कर्मचारियों के ख्याति प्राप्त नेता हरीश तिवारी थे। वे बिजली कर्मचारी संघ के अध्यक्ष थे। तिवारी जी के साथ मिलकर बासुदेव पाण्डेय ने बिजली कर्मचारियों को नये सिरे से संगठित किया। उसे प्रदेश स्तर पर विस्तार दिया। वे इस संघ के कार्यवाहक अध्यक्ष, अध्यक्ष, महामंत्री जैसे पदों पर कार्य किया।
बासुदेव पाण्डेय को बिजलीकर्मचारियों के आंदोलन में भाग लेने की वजह से 1963 में नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था। बाद में उनकी बहाली हुई लेकिन तब तक मजदूर आंदोलन में वे बहुत आगे निकल चुके थे। फिर से बिजली विभाग की सेवा करने की जगह मजदूर आंदोलन के लिए काम करना उन्होंने ज्यादा जरूरी समझा और अपना सारा जीवन संगठन व आंदोलन को समर्पित करते हुए पूरावक्ती कार्यकर्ता बन गये। ट्रेड यूनियन दफतर, बिजली कर्मचारीसंघ का कार्यालय व मजदूरों का घर ही उनका घर हो गया। अपने अन्तिम सांस तक वे कम्युनिस्ट पार्टी व श्रमिक आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता व नेता बने रहे। निधन के समय वे बिजली कर्मचारी संघ के महामंत्री तथा एटक के प्रदेश अध्यक्ष थे। उनकी उम्र अस्सी को पार कर गई थी, स्वास्थ्य भी उनका साथ नहीं देता था लेकिन अपनी परवाह किये बिना संगठन के काम में वे लगे रहते थे।
का0 वासुदेव पाण्डेय की पहली बरसी पर लखनऊ में सेमिनार का आयोजन हुआ। विषय था ‘भूमण्डलीकरण का वर्तमान दौर और श्रमिक आंदोलन के समक्ष चुनौतियां’। कार्यक्रम लखनऊ के यू0 पी0 प्रेस क्लब में बीते इतवार को वासुदेव पाण्डेय मेमोरियल फाउण्डेशन की ओर से आयोजित किया गया। अध्यक्षता बैंक कर्मचारियों के नता व इप्टा के प्रदेश महामंत्री राकेश ने की। सेमिनार को यू0 पी0 टी0 यू0 सी0 के प्रदेश अध्यक्ष अरविन्द राज स्वरूप तथा गिरि संस्थान के समाज विज्ञानी हिरण्मय धर ने संबोधित किया। संचालन ओ0 पी0 पाण्डेय ने किया। उदघाटन करते हुए एटक के राष्ट्रीय सचिव सदरुद्दीन राना ने कहा कि कामरेड वासुदेव पाण्डेय श्रमिक आंदोलन के समर्पित नेता व कार्यकर्ता थे। उनका सपना शोषणविहीन समाज का निर्माण था। अपनी सारी जिन्दगी उन्होंने इसी सपने को साकार करने के लिए संघर्ष किया। आज श्रमिक आंदोलन के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। ऐसे वक्त कामरेड वासुदेव पाण्डेय कों याद करने का मतलब उनके सपने और ंसंघर्ष की विरासत को जिन्दा रखना है। आज का दिन हमारे लिए संकल्प का दिन है।
वक्ताओं का कहना था कि निजीकरण, उदारीकरण और भूमंडलीकरण की इस व्यवस्था ने आम आदमी  के जीवन व देश के लिए संकट को बढ़ाया है। समाज में विषमता बढ़ी है। सŸाा के जिस भी कोने को देखिए वहां भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार है। श्रम कानूनों का सीधे उलंघन हो रहा है। संगठित क्षेत्रों को असंगठित बनाया जा रहा है। बेरोजगारों की फौज खड़ी हो रही है। श्रमजीवी जनता को संगठन बनानें के बुनियादी अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। एफडीआई जैसे कानून बनाये जा रहे हैं। पूछा जाना चाहिए कि इनसे किनका भला होने वाला है। लोकतंत्र खतरे में पड़ा है। लूट व दमन इस भूमंडलीकरण की संस्कृति है। इसे भूमंडलीकरण की जगह अमेरीकीकरण कहना ज्यादा सही होगा। यह पूंजीवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था का सबसे क्रूर, जनविरोधी व नवीनतम रूप है। वहीं, धर्म, जति व नकली सवालों पर मजदूरों को विभाजित किया जा रहा है।
वक्ताओं का यह भी कहना था कि इस भूमंडलीकरण ने श्रमिक जनता के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं। इसने उनके अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है। ऐसे में उनके पास संघर्ष के सिवाय कोई दूसरा विकल्प नहीं है। आगामी 21 व 12 फरवरी को राष्ट्रव्यापी हड़ताल होने जा रही है। ऐसे संघर्षों के द्वारा ही श्रमिक जनता अपना प्रतिरोध दर्ज कर सकती है। हालत कितनी बुरी है कि आज कांग्रेस व भाजपा से जुड़े संगठनों को भी इन नीतियों का विरोध करना पड़ रहा है और संघर्ष में उतरना पड़ रहा है। यह नई व स्वागतयोग्य बात है।

-कौशल किशोर

रविवार, 22 जनवरी 2012

जनता की अदालत में मीडिया ‘तय करो किस ओर हो तुम ’

उत्तर प्रदेश के चुनाव में जहां जनता की अदालत में जन प्रतिनिधि हैं, वहीं 22 जनवरी को लखनऊ में एक और अदालत लगी। इस अदालत का आयोजन अलग दुनिया ने वाल्मीकि रंगशाला में किया था। इसमें लेखक, पत्रकार, संपादक, बुद्धिजीवी, जन संगठनों के कार्यकर्ता, मानवाधिकार कार्यकर्ता आदि मौजूद थे। जनता की इस अदालत में मीडिया थी। कैसी है आज मीडिया ? क्या हो इसकी भूमिका ? इसका जायजा लेने के लिए शुरू हुई इस गोष्ठी में प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया के इतिहास, उसकी परंपरा, उसके सरोकार और सामाजिक भूमिका पर चर्चा हुई।

गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए राजनीतिक व सामाजिक चिंतक प्रोफेसर रमेश दीक्षित ने कहा कि आज मीडिया उनके पक्ष में खड़ा दिखता है जो शोषक हैं। रमेश दीक्षित ने प्रसिद्ध पत्रकार अखिलेश मिश्र की पुस्तक ‘पत्रकारिता: मिशन से मीडिया तक’ का हवाला देते हुए कहा कि मिश्रजी मीडिया के लिए कहते थे कि इसका मतलब है मध्यस्थ्ता या बिचैलिया। आज तो मसाला बेचने वाले हो या उद्दयोग चलाने वाले अखबार की दुनिया में आ गये हैं। कारपोरट अपने हितों के लिए मीडिया के क्षेत्र में क्रियाशील है। इन मालिकों को संपादक नहीं दलाल चाहिए। ऐसा दलाल कि जब वह दिल्ली से आये तो उनकी मुलाकात वह मंत्री से करा सके। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि मीडिया की सकारात्मक भूमिका भी है। यदि ऐसा नहीं होता तो हम गुजरात जनसंहार को नहीं जान पाते । यह दुधारी तलवार है। वह चाहे तो हाशिए पर पडे लोगों की आवाज बन सकता है या काॅरपोरेट के हितों का पक्षपोषक बन सकता है।

वरिष्ठ आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि आजादी के पहले मीडिया मिशन हुआ करता था। आजादी की लड़ाई की जरूरत के तहत अखबार निकले। नेहरूजी ने ‘नेशनल हेराल्ड’ जैसे अखबार शुरू किये। आजादी के बाद यह रोजगार में तब्दील हुआ। आज यह व्यवसाय हो गया है। भूमंडलीकरण के इस दौर में अखबार का दायरा संकुचित हो गया है। आस पड़ोस से हम कट गये हैं। हम तक बाराबंकी की खबरें भी नहीं पहुँच पाती। हमारे नेशनल मीडिया से कश्मीर,, पूर्वोतर भारत, दलितों, आदिवासियों की खबरें गायब हैं। पश्चिम के देशों के न्यूज रुम की हम चर्चा करें तो पाते हैं कि उन्होंने अपने न्यूज रुम को लोकतांत्रिक बनाया जाहं उनके समाज का प्रतिनिधित्व है, वहीं हमारे विषमतामूलक समाज का हमारे मीडिया में प्रतिनिधत्व नहीं है। दलित, आदिवासी, मुसलमानों आदि अखबारों में निर्णायक पदों पर नही के बराबर हैं।

‘जन अदालत में मीडिया’ पर केन्द्रित इस गोष्ठी में अपना विचार रखने के लिए तथा आज की मीडिया के बारे में लोगों के क्या विचार हैं, यह मीडियाकर्मी तक पहुँचान के लिए लखनऊ से निकलने वाले अखबारों के संपादकों, पत्रकारों व मीडियाकर्मियों को इस गोष्ठी में आमंत्रित किया गया था। लेकिन ‘जनसंदेश टाइम्स’ के संपादक व कवि डा0 सुभाष राय को छोड़कर कोई नही यहां उपस्थित था।

सुभाप राय गौतम बुद्ध की एक कहानी सुनाते हुए इस गोष्ठी में हस्तक्षेप किया और कहा कि बुद्ध जैसी दृष्टि यदि आज पत्रकारों में होती तो ऐसी स्थिति नहीं होती। आज अखबार की खबरों को मैनेज किया जाता है। आज यही प्रशिक्षण दिया जाता है कि इसे ऐसे मैनेज करो जिससे टी आर पी बढ़े, विज्ञापन मिले। किसी तरह पैसा आना चाहिए। यही दबाव अखबार पर है, सरोकार व दृष्टि का दबाव नहीं है। जो प्रतिबद्ध है, उनके लिए संकट है। खबरें भी प्रबंधित हैं। पाठकों को आज ग्राहक समझाा जाता है और अखबार उत्पाद हो गये हैं। मीडिया के संकट की चर्चा करते हुए सुभाष राय ने कहा कि जो संकट है, वह दृष्टि व सरोकार का है। दृष्टि के बिना खबर अपनी संपूर्णता में सामने नहीं आ सकती। अखबारों में वे संकट में हैं जो प्रतिबद्ध हैं, जिनके पास दृष्टि व सरोकार है। ऐसे लोगों की मदद के लिए पाठकों को आगे आना चाहिए। इससे हालत बदलेंगे।

गोष्ठी की शुरुआत दलित चिंतक अरुण खोटे के आधार वक्तव्य से हुई। उनका कहना था कि आज का मीडिया अस्सी के दशक वाला मीडिया नहीं है जहाँ मीडिया के लिए सामाजिक सरोकार प्रमुख होते थे। नब्बे के दशक के बाद वैश्वीकरण की जो प्रक्रिया शुरू हुई, उसके बाद बाजारीकरण की प्रक्रिया तेज हुई। अब जनता और उसके सवालों से मीडिया संचालित नहीं होता आज मीडिया को काॅरपोरेट चलाता है। एक दौर था जब जनता के मुद्दे जनता उठाती थी। मीडिया उसके अनुसार चलता था। आज हालत यह है कि मीडिया मुद्दे उठा रहा है। जैसे करप्शन का मुद्दे को लें, यह मीडिया का मुद्दा बना हुआ है। लेकिन वह भ्रष्टाचार नहीं है जिसका सामना रोज रिक्शेवाले, गरीब.गुरबा लोंगों को करना पड़ता है। यह तो खाये.पीये लोगों का मुद्दा है जो स्वयं इसमें शामिल है। जहां तक वैकल्पिक मीडिया की बात है, यह अवधारणा अभी तक सफल नहीं हुई है। यह उनलोगों को जोड़ने में सफल नहीं हुआ है जिनके लिए यह है। ऐसे में विचारणीय सवाल है कि मीडिया की कोई सामाजिक भूमिका है ?

इस मौके पर ‘लोकसंघर्ष’ के संपादक रणधीर सिंह सुमन ;बाराबंकीद्ध ने कहा कि पुंजीवाद पहले मजबूत नहीं था और अखबार स्वतंत्र थे। लेकिन जब से अमरीकी साम्राज्यवाद का प्रभाव व हस्तक्षेप बढ़ा है, मीडिया का संकट भी गहराया है। अमरीका की जरूरत है कि यहां तनाव और युद्ध जैसी हालत बनी रहे। इसीलिए आज मीडिया द्वारा यह चीन विरोधी प्रचार चलाया जा रहा है। चीन द्वारा युद्ध की तैयारी जैसी बातें मीडिया द्वारा प्रचारित है। आंकड़े बताते हैं कि चीन की सीमा पर सबसे कम खर्च आता है। मीडिया का ऐसा ही चरित्र है।

उर्दू मैग्जीन ‘अफकार.ए.मिली’ ;दिल्लीद्ध के विशेष संवाददाता अबू ज़फ़र ने कहा कि मीडिया का सारा नजरिया बदल गया है। हमें पढ़ाया गया कि जो घटा है, उसे ही सामने लाना है। न्यूज में व्यूज नहीं होना चाहिए। इमोशन व भाव नहीं हो। हालत यह है कि मीडिया आधी खबरें ही लोगों तक पहुँचाता है। अतंकवादी घटनाओं की खबरें पुलिस के बयान पर आधारित होती हैं। यदि कोई युवक पकड़ा जाता है और उसे पुलिस आतंकवादी बताती है तो वह खबर अखबार के लिए सुर्खियों में छपती है। इस तरह की खबरों का श्रोत पुलिस हुआ करती है। लेकिन वह युवक पर कोई दोष सिद्ध नहीं होने या निर्दोष होने पर छूट जाना मीडिया के लिए कोई खबर नहीं। यह एक विशेष किस्म की मानसिकता की वजह से होता है। यही मानसिकता आज मीडिया पर हावी है। इसके विरुद्ध मास मूवमेंट चलाने की जरूरत है।

प्रगतिशील महिला एसोसिएशन की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ताहिरा हसन ने कहा कि इस व्यवस्था के साथ खड़े होकर इसका बदलाव संभव नहीं है। यह व्यवस्था काॅरपोरेट द्वारा संचालित है। मीडिया भी इसी के द्वारा नियंत्रित है। दलितों के सवाल, पास्को में हजारों मछुआरों व किसानों का अपनी संपदा से बेदखल किया जाना और इसके खिलाफ उनका संघर्ष मीडिया के विषय नहीं हैं। सोनभद्र में गरीबों की झोपडि़यां जला दी गईं, पर ये मीडिया के लिए खबर नहीं है। जिस मीडिया ने अन्ना के आंदोलन को क्रान्ति व दूसरी आजादी कहकर लगातार प्रचारित किया, वही इरोम शर्मिला के सवाल पर चुप दिखता है। हमारे लिए जरूरी है कि मीडिया को कठघरे में खड़ा करते हुए भूमंडलीकरण व फसीवाद के खिलाफ हमारा संघर्ष हो।

गोष्ठी को ‘लोकसंघर्ष’ के संपादक रणधीर सिंह सुमन, आजमगढ़ से आये मानवाधिकार कार्यकर्ता मसरुद्दीन, पत्रकार सुबोध श्रीवास्तव, नाटककार राजेश कुमार, जसम के संयोजक कौशल किशोर ने भी संबोधित किया। संचालन अलग दुनिया के के0 के0 वत्स ने किया।

- कौशल किशोर
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