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शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

मुनाफे की कैद में है मीडिया-साईनाथ

मेरी जानकारी में आपका यह कान्फ्रेन्स तीन दिनों का है। तीन दिनों में औसतन क्या-क्या होता है, अपने देश में? ग्रामीण भारत में तीन दिन के अंदर अगर एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो) के डाटा का औसत लेते हैं, तो तीन दिन के अंदर 147 किसान इस देश में आत्महत्या करते हैं। आधे घंटे में एक किसान अपनी जान देता है। जब आपका कान्फ्रेन्स खत्म होगा, उन तीन दिनों में एक सौ पचास किसान आत्महत्या कर चुके होंगे। लेकिन यह सब आपके मीडिया को देखकर नजर नहीं आता। वहां यह प्रदर्शित नहीं होता है। सबसे नया 2012 का डाटा भी आ चुका है। डाटा ऑन लाइन है। आप देख सकते हैं। छत्तीसगढ़ ने इस बार जीरो आत्महत्या  दिखलाया है, पश्चिम बंगाल ने डाटा जमा नहीं कराया है। उसके बावजूद आंकड़ा 14,000 तक आ गया है। तीन दिनों में तीन हजार बच्चे कुपोषण और भूख से जुड़ी बीमारियों से मौत के शिकार बनते हैं। इन्हीं तीन दिनों मे ंसरकार बड़े-बड़े कॉरपोरेट हाउस को और कंपनियों को 6800 करोड़ तक की आयकर में छुट देती है। सरकार के पास पैसा, किसान और बच्चों के लिए तो है नहीं। लेकिन आप पांच लाख करोड़ रुपए की सालाना छुट दे सकते हैं। यह पांच लाख करोड़ भी पूरी कहानी नहीं है। यह पांच लाख करोड़ रुपए केन्द्र की बजट से निकलते हैं। राज्य सरकारों और केन्द्र सरकारों द्वारा दूसरी कई तरह की रियायतें अलग से दी जाती हैं। पांच लाख करोड़ में वह सब जुड़ा नहीं है।
बजट में एक सेक्शन है, एनेक्स-टू, उसका शिर्षक है, ‘स्टेटमेन्ट ऑफ रेवेन्यू फॉरगॉन’। इसमें सारी जानकारी विस्तार से होती है। साल 2007 से यह जानकारी मिल रही है। अभी छह साल का डेटा अपने पास है। कितना पैसा कन्शेसन में गया। तीन तरह के कन्शेसन हैं, ग्रेट कन्फिलक्ट इन्कम टैक्स, कस्टम ड्यूटी वेवर और एक्साइज ड्यूटी वेवर। इन तीनों में इस साल पांच लाख करोड़ लगाए गए, इसमें सब्सिडी अलग है। यह सिर्फ केन्द्रिय बजट से दिया गया। हमारे पास यूनिवर्सल पीडीएस के लिए पैसा नहीं है, हमारे लिए स्वास्थ्य के लिए पैसा नहीं है, हमारे पास बच्चों के कुपोषण के लिए पैसा नहीं है। हमारे यहां मनरेगा 365 दिन नहीं 100 दिन का रोजगार है और पीडीएस सीमित है। इस देश में सिर्फ लूट मार ही यूनिवर्सल है। यह सब मीडिया में नजर नहीं आता।
मेरा सिर्फ इतना कहना है कि भारत में मीडिया राजनीतिक तौर पर आजाद है। लेकिन वह मुनाफे के प्रभाव में है। यह मार्शल लॉ नहीं है। कोई सेंसरशिप नहीं है। मीडिया राजनीतिक तौर पर आजाद है। लेकिन वह मुनाफे की कैद में है। यह स्थिति है मीडिया की।
एक शब्द बार-बार मीडिया में पिछले तीन सालों से आ रहा है। आप सबने सुना होगा, एंकर ने बताया होगा। क्रोनी कैपिटलिज्म। इसमें दो शब्द है, पहला कैपिटलिज्म। यह आप सब जानते हैं। दूसरा है, क्रोनी। यह क्रोनी हम हैं। मीडिया। क्रोनी कैपिटलिज्म में मीडिया क्रोनी है। यह स्थिति है मीडिया की। आप सबने पढ़ा था, अप्रैल में शारदा चिट फंड जब कॉलेप्स हो गई। उस वक्त एक खबर आई, बीच मंे फिर गायब हो गई। खबर था, सात सौ पत्रकार नौकरी से निकाले गए। मैं प्रभावित हुआ। यह खबर आ गई क्योंकि अक्टूबर 2005 से अब तक 5000 पत्रकारों की नौकरी गई है और कोई रिपोर्टिंग नहीं हुई। उस दिन एनडीटीवी ने एक इमोशनल स्टोरी किया। ये पत्रकार अब क्या करेंगे? इनका ईएमआई है। इनके बच्चे स्कूल जाते हैं। अब इनका घर कैसे चलेगा? यह सब उसी एनडीटीवी में चल रहा था, जिसने उसी महीने एनडीटीवी प्रोफीट से अस्सी लोगों को बाहर निकाला था और एनडीटीवी से 70 लोगों को बाहर निकाला था। डेढ़ से नौकरी गया एनडीटीवी के एक मुम्बई ऑफिस से। पूरे स्टेट में नहीं। एक ऑफिस में।
अक्टूूबर 2008 में जब फायनेन्सल कॉलेप्स हुआ। उस वक्त से बहुत सारी तब्दिलियां आई। मीडिया में भ्रष्टाचार तो पुरानी चीज है। कुछ नई चीज नहीं है। बुरी पत्रकारिता भी पुरानी चीज है।
कॉन्टेन्ट ऑफ जर्नालिज्म का एक उदाहरण कुछ दिन पहले देखने को मिला, जब एक बाढ़ पीड़ित के कंधे पर बैठकर एक पत्रकार रिपोर्ट कर रहा था। अगर पीड़ित पत्रकार के कंधे पर बैठता तो ठीक है। लेकिन उस रिपोर्ट में मीडिया के परजीवी होने का संकेत नजर आता है।
20 साल पहले जब हम मीडिया मोनोपॉली कहते थे तो साहूजी और जैन साहब का अखबार तीन-चार शहरों से निकलता था। भारत ऐसा देश है, जहां दो शहरों से आपका अखबार निकलता है तो आप नेशनल प्रेस बन जाते हैं। लेकिन मोनोपौली क्या था, इंडियन एक्सप्रेस के मालिक थे रामनाथ गोयनका। साहू और जैन मालिक रहे। यह मोनोपॉली अब खत्म हो गया। आज मीडिया मोनोपॉली का मतलब कॉरपोरेट मोनोपॉली के अंदर मीडिया एक छोटा डिपार्टमेन्ट बन कर रह गया है। आज सबसे बड़ा मीडिया मालिक कौन है? मुकेश अंबानी। जबकि मीडिया उसका मुख्य कारोबार नहीं है। यह उसके बड़े कारोबार का एक छोटा सा डिपार्टमेन्ट है। आप मुकेश भाई को देखिए, एक साल पहले नेटवर्क 18 को खरीदा। मैं सच बता रहा हूं, उनको नहीं पता कि उन्होंने क्या खरीदा? इसके अलावा 22 चैनल आया इनाडू से। तेलगू चैनल छोड़कर सब बिक गया। इनाडू मीडिया में अच्छा नाम है। लेकिन इनाडू का अब असली नाम है मुकेश अंबानी। ईनाडू का चैनल देखिए, वे कोल स्कैम, कैश स्कैम को कैसे कवर कर रहे हैं? ईनाडू का फुल बके मुकेश भाई का है। टीवी 18 का फुल बुके मुकेश भाई का है। उनको नहीं पता कि उन्होंने क्या खरीदा है? यह है उनका मीडिया मोनोपॉली। रामनाथ गोयनका के मोनोपॉली की तुलना आप मुकेश भाई के एक छोटे से दूकान से भी नहीं कर सकते।
आप देखिए कॉरपोरेट स्टाइल कॉस्ट सेविंग क्या है? आप टेलीविजन चैनल में देख सकते हैं, अब समाचार चैनल में समाचार खत्म हो गया है, टॉक शो बढ़ गए हैं। टॉक शो इसलिए अधिक हो गए क्योंकि बातचीत सस्ती है। बातचीत फ्री है। मुम्बई-दिल्ली से बुलाते हैं और महीने-दो महीने के बाद हजार-डेढ़ हजार रुपए का चेक भेजते हैं। यहां सात-आठ लोगों को बिठाकर दो दिन बात करते हैं। टाइम्स नाउ थोड़ा अलग है, वहां नौ लोग बैठकर अर्णव को सुनते हैं। टॉक टीवी शो का एक गंभीर वजह यही है कि यह सस्ता पड़ता है। रिपोर्टर को गांव में भेजने में, अकाल, बाढ़ में भेजने में पैसा डालना पड़ेगा। इससे अच्छा है, पांच लोगों को बिठा दो। मुझे लगता है, मनिष तिवारी और रविशंकर प्रसाद तो हमेशा टीवी स्टूडियो में ही रहते हैं। एक स्टूडियो से निकलते हैं और दूसरे में जाते हैं।

   ( विकास संवाद के सातवें मीडिया संवाद में जैसा पत्रकार पालागुमी साईनाथ ने कहा)


आशीष कुमार 'अंशु'

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

कसाब की फाँसी और कारपोरेट मीडिया

    यह संयोग है कि शिव सेना नेता बालठाकरे की मौत का कवरेज खत्म हुआ और कसाब की फाँसी का कवरेज आरंभ हुआ। ठाकरे के कवरेज ने हिन्दुत्व को महिमामंडित किया और उनके मुस्लिम विरोधी नजरिए को निजी गुणों की  जय-जयकार के कोलाहल के जरिए छिपाया गया। इस तरह की प्रस्तुतियों के जरिए कारपोरेट मीडिया और खासकर टी.वी. न्यूज चैनलों की दिषा पहले से तय हो चुकी थी। कसाब को फाँसी दिए जाने पर एक नेता ने टी.वी. पर कहा कि कसाब को फाँसी पर लटकाकर केन्द्र सरकार ने बाल ठाकरे को बेहतरीन श्रद्धांजलि दी है। यह सच है कि 26/11 की घटना बड़ी आतंकी घटना थी। उसमें जितने बड़े पैमाने पर जन-धन की क्षति हुई और शिव सेना आम लोगों की भावनाओं को आघात पहुँचा उसकी भरपाई किसी भी तरह संभव नहीं है। कसाब को फाँसी दिए जाने के संदर्भ में कई बातें हैं जिन पर गौर किया जाना चाहिए। पहली बात यह है कि कसाब को फाँसी एक न्यायिक प्रक्रिया के तहत दी गई है। यह अकस्मात् घटित घटना नहीं है। फाँसी को सुरक्षा कारणों से गुप्त रखा गया था। हमारे अनुसार सुरक्षा कारणों से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है मीडिया का उपद्रव। सरकार ने मीडिया उपद्रव से बचने के लिए कसाब की फाँसी की प्रक्रिया को मीडिया से छिपाया। लेकिन कसाब के घर वालों से लेकर पाक सरकार तक, भारत के राष्ट्रपति से लेकर सेशन  जज तक सबको मालूम था कि फाँसी कब दी जाएगी। यह फाँसी इस मायने में महत्वपूर्ण है कि पहली बार किसी आतंकी को स्वतंत्र भारत में फाँसी दी गई। पंजाब, कश्मीर से लेकर उत्तर-पूर्व के राज्यों तक सक्रिय आतंकियों में से आज तक किसी को फाँसी की सजा नहीं दी गई।    कसाब की फाँसी का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है इसमें शामिल इंटरनेट प्रमाण। इन प्रमाणों के आधार पर ही भारत की सुरक्षा एजेंसियाँ यह सुनिष्चित कर पाईं कि आखिरकार कैसे और किस तरह आतंकियों के तार पाकिस्तान से जुड़े हैं। पाक में भी कौन से आतंकी और आई.एस.आई. के कौन से अधिकारी के निर्देष पर मुंबई हमला संपन्न किया गया। इस काम में अमरीकी संस्थाओं और एफ.बी.आई. ने भारत सरकार की मदद की और अदालत में आकर उनके अधिकारियों ने इंटरनेट प्रमाणों की पुष्टि भी की। इस घटना के बाद भारत सरकार की नींद टूटी और इंटरनेट फ्लो और सक्रियता की नजरदारी करने और समस्त दूरसंचार कम्युनिकेशन की राजनैतिक नजरदारी को नए सिरे से नियोजित किया गया।
    कसाब की फाँसी का एक अन्य पहलू यह भी है कि संभवतः यह पहला आतंक विरोधी मुकदमा था जिसे कम समय में उसके अंजाम तक पहुँचाया गया। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि मुंबई की घटना के बाद पाकिस्तान का आतंकियों के साथ आंतरिक अंतर्विरोध तेज हुआ है और अमरीका का भारत के प्रति नजरिया बदला है।
    मुंबई की 26/11 की घटना सामान्य आतंकी घटना नहीं थी। वह कई मायनों में सुरक्षा और कम्युनिकेशन के क्षेत्र में मूलगामी परिवर्तनों को लाने का बहाना बनी। जब यह घटना हुई तो उस समय टी.वी. चैनलों की बाढ़ आ चुकी थी और चैनलों ने मनमाने ढ़ंग से टी.वी. कवरेज दिखाया था। यहाँ तक कि पाक स्थित एक आतंकवादी के एक चैनल ने लाइव इंटरव्यू तक प्रसारित किया था। बाद में सरकारी दबाव में उस चैनल को प्रसारण रोकना पड़ा और मुंबई में न्यूज चैनलों के प्रसारण को रोका गया था। उस समय यह तथ्य सामने आ चुका था कि भारत के टी.वी. चैनलों के पास आतंकी कार्रवाई को कवरेज करने का अभी तक हुनर विकसित नहीं हुआ है। ठीक यही वह समझ है जिसके तहत भारत सरकार ने कसाब की खबरों को सेंसर करके रखा और फाँसी दिए जाने के बाद ही बताया कि कब फाँसी दी गई। इसके बाद न्यूज चैनलों में फाँसी के कवरेज को लेकर प्रतिस्पर्धा आरंभ हो गई। कसाब के टी.वी. कवरेज को समग्रता में पहले से चले आ रहे बालठाकरे की मृत्यु के हिन्दू न्यूज फ्लो के संदर्भ में देखने की जरूरत है। पहले मीडिया ने एक हिन्दुत्ववादी नेता को नायक बनाया और उसकी समस्त पृथकतावादी-साम्प्रदायिक राजनीति की, व्यक्तिगत गुणों की भूरि-भूरि प्रशसा करके एक तरह से वैधता प्रदान की। बाद में कसाब का कवरेज देते समय प्रच्छन्नतः आतंकवाद का महिमामंडन किया। इस क्रम में चैनलों ने सरकार के फैसले की गोपनीयता और प्रक्रिया पर हमले नियोजित किए और उन लोगों को व्यापक स्पेस दिया जो कसाब की सरेआम फाँसी देखना चाहते थे या जो लोग सरकार के प्रयासों से सहमत नहीं थे। आष्चर्य की बात यह है कि चैनलों में एकसिरे से गृहमंत्रालय का कोई अधिकारी नजर नहीं आया और सिर्फ केन्द्रीय गृहमंत्री, महाराष्ट्र के गृहमंत्री और मुख्यमंत्री के बयान थे। कुछ पुलिस अधिकारियों के भी बयान थे।
    इस खबर का क्रम कुछ इस प्रकार रखा गया-पहले खबर आई कि राष्ट्रपति ने फाँसी माफ करने का आवेदन खारिज कर दिया है। बाद में सीधे फाँसी की खबर और अंत में कसाब की फाँसी पर टुकड़ों में खबरें और मंत्रियों के बयान के बाद पुरानी फाइलें और पुरानी यादें और सरकार की विफलता का राग। कायदे से जब यह खबर आई कि राष्ट्रपति ने फाँसी की सजा माफ करने का आवेदन खारिज कर दिया है तो सीधे एक्षन तय था, उसमें विलम्ब नहीं किया जा सकता था। लेकिन किसी भी चैनल ने यह जानने या बताने की कोषिष नहीं की कि कसाब को फाँसी कब लगेगी? किसी भी चैनल ने केन्द्रीय गृहमंत्रालय का दरवाजा नहीं खटखटाया और ना ही कोई महाराष्ट्र के गृहमंत्री के पास पहुँचा। जबकि पाक में कसाब के घरवालों को संदेश जा चुका था, पाक को मैसेज जा चुका था। लेकिन हमारा मीडिया सरकारी भक्त की तरह चुपचाप देखता रहा, उसे यह खबर तब हाथ लगी जब फाँसी की कार्रवाई संपन्न हो गई। फाँसी लगाए जाने के बाद पुरानी फाइलों,क्लीपिंग आदि की मीडिया वर्षा आंरंभ हो गई। इस क्रम में चैनल भूल गए कि फाँसी दण्ड है, यह उत्सव नहीं है। न्यूज चैनलों ने फाँसी को दण्ड के दायरे से निकालकर गली-मुहल्ले की तू-तू मैं-मैं के टाॅकषो में बदल दिया। इस क्रम में मध्यवर्ग में पनप रही बर्बर मनोदषा के रूप भी सामने आए। यह सच भी सामने आया कि मध्यवर्ग के ज्ञानी-गुणी-स्वयंभू लोग लोकतंत्र के बजाय फासिज्म और फंडामेंटलिज्म के गुणों के प्रति ज्यादा आकर्षित हैं। वे फास्टफूड की फास्ट न्याय, तालिबानियों की तरह सरेआम फाँसी की माँग करने लगे। कसाब को फाँसी दी गई ,यह खबर थी, महाखबर नहीं थी। किसी खबर को जब महाखबर, उत्सव या मनोरंजन या आनंद में तब्दील कर दिया जाता है तो वह खबर का अर्थ खो देती है। इस अर्थ में टी.वी. चैनलों ने कसाब की खबर को प्रसारण के साथ ही मार डाला। यानी भारत सरकार की आतंकवाद विरोधी मुहिम में छेद कर दिया। यह प्रकारान्तर से आतंकवादी कसाब की सेवा है। कसाब को जितना स्पेस टी.वी. चैनलों ने दिया है उसकी तुलना में आतंकवाद विरोधी नजरिए को उतना स्पेस नहीं मिला। टी.वी. में स्पेस महत्वपूर्ण होता है, फलतः कसाब मरकर भी चैनलों में अमर हो गया।
    कसाब के प्रसंग में यह प्रसंग भी जरूरी है कि उस पर कितना खर्चा आया। कुल मिलाकर 29.5 करोड़ रूपये का खर्चा आया, इसमें कसाब के खाने पर चार साल में 42,313 रूपये, कसाब के कपडों पर 1,878 रूपये और चिकित्सा पर 39,829 रूपये मात्र खर्च किए गए। इसके अलावा जो भी खर्चा है वह सुरक्षा आदि मामलों पर किया गया है।
 -जगदीश्वर चतुर्वेदी

लेखक-कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं।
मो0- 09331762360

सोमवार, 2 जुलाई 2012

दलाल मीडिया का खेल : यशवंत जेल में


यशवंत गिरफ्तार हो गए !छिनैती ,रंगदारी मांगने और जान से मारने की धमकी देने के आरोप में नोएडा पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया |यशवंत भड़ास4मीडिया के संपादक हैं ,मेरे मित्र हैं और तमाम खट्टे -मीठे अनुभवों के बावजूद हम दोनों के बीच एक-दूसरे को सम्मान देने का का रिश्ता हमेशा बना रहा है |यशवंत की कल हुई गिरफ्तारी के बाद जिस तरह से बड़े अखबारों में ख़बरें आयी और फिर वेब पर अपने -अपने तरीके से लोग यशवंत के पक्ष और विपक्ष में भड़ास निकालते देखे गए ,वैसा होना लाजिमी था |लेकिन यशवंत की गिरफ्तारी को सिर्फ एक पत्रकार की गिरफ्तारी से जोड़ कर देखना गलत है |इसे मीडिया वर्सेज मीडिया की तरह देखा जाना चाहिए |यशवंत की गिरफ्तारी के तत्काल बाद जिस तरह से देश के बड़े अखबारों ने झन्नाटेदार अंदाज में चार कालम की खबर चलाई और जिस तरह से वेब के भीतर और वेब के बाहर मौजूद पत्रकारों ने अपनी -अपनी दुश्मनी निकालने में सक्रियता दिखाई ,वो आश्चर्यजनक है |बताते चले कि यशवंत के खिलाफ एफआईआर आइबीएन-७ की बहुचर्चित एंकर साक्षी जोशी और उनके पति विनोद कापडी द्वारा कराई गयी है ,यहाँ बता देना भी जरुरी है कि यशवंत ने अपने पोर्टल पर कुछ समय पहले साक्षी और उनके पति (जो कि उस वक्त अविवाहित थे )की अन्तरंग तस्वीरें और एक खबर लगाईं थी ,उसके पहले अविनाश दास ने मोहल्ला लाइव पर वही खबर लगाईं और फिर साक्षी से फोन पर हुई बहस के बाद (जैसा कि वो कहते हैं )वो खबर उतार चुके थे |कई पोर्टलों ने उन दिनों बारी- बारी से साक्षी की एक अन्य पत्रकार के साथ कथित बेवफाई की ख़बरें छापी थी |

एक बात बिलकुल पानी की तरह साफ़ है कि यशवंत की गिरफ्तारी साक्षी ,विनोद कापडी और दिल्ली के मीडिया बाजार में शीर्ष पर बैठे घोड़ों और यूपी पुलिस की मिलीभगत का परिणाम है ,ये भी साफ़ है कि इस गिरफ्तारी का मतलब सिर्फ और सिर्फ विनोद कापडी एंड कंपनी द्वारा यशवंत को अपनी ताकत दिखाना है ,ऐसी कई कोशिशें वो पहले भी कर चुके हैं ,लेकिन सफल नहीं हुए |खैर एक ख़बरों की खबर लेने वाले पोर्टल के समपादक के खिलाफ इस तरह की कार्यवाही को लेकर कोई आश्चर्य भी व्यक्त नहीं करना चाहिए ,लेकिन जिस तरह से यशवंत की गिरफ्तारी के बाद वेब पर सक्रिय धुरंधर पूरे जोश मे अपना -अपना राग ,अपने अपने स्वर में अलापने लगे वो जरुर पीड़ा देता है |मोहल्ला लाइव के माडरेटर अविनाश दास जिनके पास लोगों के चरित्र चित्रण का एक लंबा अनुभव रहा है और जिनकी यशवंत के साथ दुश्मनी किसी से छुपी नहीं है | कहते हैं कि यशवंत शराब के नशे में गाली-गलौज करते हैं। मूर्खतापूर्ण अहंकार और जरूरत से ज्‍यादा आत्‍मविश्‍वास के चलते यशवंत के खिलाफ ये कार्यवाही हुई ,सिर्फ इतना ही नहीं अविनाश ने बेहद चतुराई के साथ उन वेब पत्रकारों का नाम लेकर उनसे इस मामले में स्टेंड लेने को कहा जिनमे से कोई भी मोहल्ला लाइव का लेखक नहीं है |स्पष्ट है अविनाश इस मौके का इस्तेमाल भी हमेशा की तरह अपने फायदे के लिए कर रहे हैं |एक अन्य वेबसाईट में यशवंत को भिखारी बता कर कहा गया कि उसके पैसे मांगने की आदत है !

दरअसल सवाल ये नहीं है कि यशवंत कैसे हैं और उनके साथ वेब पत्रकारों के अनुभव कैसे रहे हैं ,सवाल ये है कि क्या वेब पत्रकारों की स्थिति मीडिया के पूरे सिस्टम में इतनी कमजोर सतह पर है कि जो चाहे आये और धक्का देकर चला जाए ?हाल के वर्षों में हिंदुस्तान के कई वेब पत्रकारों के खिलाफ कार्यवाही की गयी हैं ,अलोक तोमर के जीवित रहने तक ऐसे किसी भी कोशिश के लिए साझा विरोध का मंच तैयार हो जाता था लेकिन टुकड़ों में बंटे वेब मीडिया के पत्रकारों ने अब या तो खुद को मीडिया का सबसे कमजोर खम्भा मान लिया है या फिर वे ऐसी स्थिति से बचने की कोशिश करने लगे हैं |
अपनी गिरफ्तारी के बारे में यशवंत सिंह जो कहानी बता रहे हैं वह यह है कि इसमें कोई दो राय नहीं है कि उन्होंने उस संपादक को फोन किया था जिसका नाम विनोद कापड़ी है. विनोद कापड़ी इंडिया टीवी के प्रबंध संपादक हैं और संभवत: शुक्रवार की देर रात यशवंत सिंह ने पहले विनोद कापड़ी के मोबाइल पर फोन किया. फोन नहीं उठा तो उन्होंने विनोद कापड़ी की पत्नी साक्षी के नंबर पर डायल कर दिया. खुद यशवंत सिंह कहते हैं कि साक्षी ने इसका विरोध किया कि इतनी रात में किसी के मोबाइल पर फोन करने का यह कौन सा तरीका है? खैर इसके बाद दो चार एसएमएस दोनों तरफ से आये गये और दोनों अपनी अपनी जगह शांत हो गये|
सुबह एक बार फिर शुरूआत यशवंत सिंह ने की. उन्होंने साक्षी जोशी को एक एसएमएस भेजा कि असल में रात में उन्होंने एक जरूरी काम से फोन किया था. उन्होने नोएडा में एक घर बुक किया है और उसकी किश्त अदा करने के लिए पैसे इकट्ठा कर रहे हैं इसलिए मित्रों से मदद मांग रहे हैं. उन्होंने बीस हजार रूपये के मदद की बात एसएमएस में कही. यशवंत सिंह ने बड़ी सादगी से स्वीकार किया कि वे तो रात की घटना का पैच अप करने के लिए सुबह पैसे वाली बात कर रहे थे लेकिन यही बात उन्हें भारी पड़ गई. इसके बाद आनन फानन में क्या हुआ मालूम नहीं लेकिन शनिवार को यशवंत सिंह को उस वक्त गिरफ्तार कर लिया गया जब वे समाचार प्लस के नोएडा स्थित दफ्तर से बाहर आ रहे थे. यशवंत सिंह खुद कहते हैं कि लगता है पुलिस उनके फोन को सर्वेलेन्स पर लिए हुए थी और उनके नंबर पर एक फाल्स काल आई जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

साभार- नेटवर्क 6

हमारा मत है कि यशवंत सिंह ने क्या किया यह घटना की या नहीं की यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि यशवंत ने बड़े-बड़े दलाल मीडिया घरानों के खेल को जनता तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। किस तरह से विज्ञापन सर्कुलेसन में फर्जी तरीके अपनाये जाते हैं और मुनाफा कमाया जाता है। उनके लिये नियम कानून कुछ भी नहीं हैं। आम लोगों को इस बात की जानकारी नहीं होती है। किसी समय में इन मीडिया घरानों के गोरखधंधे को स्वर्गीय कमलेश्वर ने "गंगा" पत्रिका निकाल कर उनके मालिकों व संपादकों को गंगा स्नान कराया था। आज जरूरत इस बात की है कि मीडिया घरानों के भ्रष्टाचार, ब्लैक मेलिंग के सम्बन्ध में जनता को जानकारी मिले।

सुमन

लो क सं घ र्ष !

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

महान पत्रकार, पत्रकारिता जगत के सिरमौर - रूसी करंजिया


"बाती बुझ गयी-
देह दीप की व बाती
जिससे अहंकार त्रस्त थे
और नरभक्षी हवाएं बदहवास,
आज का नवजात इतिहास-
जब भी बोलेगा
यही बोलेगा"

पत्रकारिता जगत के निर्भीक महामानव रूसी करंजिया की याद आते ही उपरोक्त पंक्तियाँ बरबस होठों पर आ जाती हैं। एक पत्रकार बंधु ने रूसी को जब उपरोक्त पंक्तियाँ सुनाई तो रूसी करंजिया का मुखमंडल मुस्कान की झीनी आभा से दमक उठा था। उनके आसपास बैठे लोग चकित थे- उनकी आकृति की उर्जमायी छवि देखकर। रूसी करंजिया पंचानवे बसंत देख चुके थे। दुनिया को दिखा चुके थे कि निर्भीक एवं स्वतन्त्र पत्रकारिता के माने क्या होते हैं, कितने और क्या-क्या होते हैं उसके पहलू और पराक्रम। जाना तो था ही उन्हें, सो चले गए, किन्तु अपनी जो विरासत छोड़ गए उस पर, उनके जाते ही, एक चुनौतीबाचक प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया है- है कोई शेर की छातीवाला वीर इस मीडिया में, जो रूसी करंजिया को आगे बाधा सके? रूसी करंजिया भारत में टेबोलायड पत्रकारिता के जनक माने जाते हैं। सही अर्थों में वे देश के प्रथम खोजी पत्रकार थे। ऐसे समय जब सारे अख़बार 'व्यवस्था पत्र' का चोला धारण कर रहे थे, करंजिया का अखबार व्यवस्था को बेपर्द कर रहा था। जिन व्यवस्था - पुरुषों के काले कारनामों का करंजिया ने पर्दाफाश किया उन्होंने उनकी खोजी पत्रकारिता को 'पीत पत्रकारिता' करार देने की लाख कोशिशें की। किन्तु उनका कोई असर नहीं पड़ा- न करंजिया की सेहत पर न 'ब्लित्ज' के तेवरों-ताकत पर, न ही पाठकों के चाव पर।
'ब्लित्ज' का मतलब ही - आक्रमण, धावा, चढ़ाई। व्यवस्था का चाहे जो भी अंग अथवा अवयब हो, 'ब्लित्ज' का नाम सुनते ही खौफ लगता था। 'ब्लित्ज' समाचार पत्र के पाठकों की पहली पसंद होता था। रूसी करंजिया ने 'ब्लित्ज' साप्ताहिक के निर्भीक एवं स्वतन्त्र चरित्र को कभी विचलित या कलंकित नही होने दिया। उन्होंने 'इंडियन एक्सप्रेस' के संपादक 'फ्रेंक मोरेस' को अपना गुरु माना था। मोरेस के निधन पर उन्होंने कहा था- फ्रेंक की रचना के बाद भगवन ने अपना सांचा तोड़ दिया। यह टिपण्णी स्वयं करंजिया के लिये भी शत प्रतिशत सटीक है। रूसी अपने समय के सबसे महान संपादक थे, सबसे सज्जन और सबसे उदार व्यक्ति भी। वे अपने देश के प्रति अत्यंत संवेदनशील थे। जीवन के उत्तरार्ध में उनके विचारों में भारी बदलाव आया। वे सचमुच बदल गए। इसी कारण वे मीडिया के नज़ारे पर लगभग आधी सदी तक छाये रहे। प्रत्येक स्तर प्रत्येक क्षेत्र के लोगों ने उनकी साहसिक पत्रकारिता को सराहा। वे विश्व के नेताओं से सीधा- संपर्क साधते और संवाद करते थे, और अपने साप्ताहिक पत्र में उनक नेताओं के चित्र के साथ अपना चित्र भी प्रकाशित करते थे। मिस्र के नासिर से, रूस के खुश्चेव, कास्त्रो और ईरान के शाह तक तमाम विश्व-विभूतियों के साथ चित्र छपने से करंजिया देश विदेश में विख्यात हो गए थे। वे मीडिया में अपनी पहचान ' क्रांतियों के इतिहासकार और क्रांतिकारियों के जीवनी- लेखक' के रूप में स्थापित करना चाहते थे। यह पहचान उन्होंने डंके की चोट पर बनायीं-अपनी विशुद्ध विनम्रता को बरकरार रखते हुए। अपनी प्रसिद्धि और प्रभाव को वे तुच्छ मानते थे और किसी भी व्यक्ति से किसी भी समय मिलने में संकोच नहीं करते थे।

राम किशोर

रविवार, 22 जनवरी 2012

जनता की अदालत में मीडिया ‘तय करो किस ओर हो तुम ’

उत्तर प्रदेश के चुनाव में जहां जनता की अदालत में जन प्रतिनिधि हैं, वहीं 22 जनवरी को लखनऊ में एक और अदालत लगी। इस अदालत का आयोजन अलग दुनिया ने वाल्मीकि रंगशाला में किया था। इसमें लेखक, पत्रकार, संपादक, बुद्धिजीवी, जन संगठनों के कार्यकर्ता, मानवाधिकार कार्यकर्ता आदि मौजूद थे। जनता की इस अदालत में मीडिया थी। कैसी है आज मीडिया ? क्या हो इसकी भूमिका ? इसका जायजा लेने के लिए शुरू हुई इस गोष्ठी में प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया के इतिहास, उसकी परंपरा, उसके सरोकार और सामाजिक भूमिका पर चर्चा हुई।

गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए राजनीतिक व सामाजिक चिंतक प्रोफेसर रमेश दीक्षित ने कहा कि आज मीडिया उनके पक्ष में खड़ा दिखता है जो शोषक हैं। रमेश दीक्षित ने प्रसिद्ध पत्रकार अखिलेश मिश्र की पुस्तक ‘पत्रकारिता: मिशन से मीडिया तक’ का हवाला देते हुए कहा कि मिश्रजी मीडिया के लिए कहते थे कि इसका मतलब है मध्यस्थ्ता या बिचैलिया। आज तो मसाला बेचने वाले हो या उद्दयोग चलाने वाले अखबार की दुनिया में आ गये हैं। कारपोरट अपने हितों के लिए मीडिया के क्षेत्र में क्रियाशील है। इन मालिकों को संपादक नहीं दलाल चाहिए। ऐसा दलाल कि जब वह दिल्ली से आये तो उनकी मुलाकात वह मंत्री से करा सके। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि मीडिया की सकारात्मक भूमिका भी है। यदि ऐसा नहीं होता तो हम गुजरात जनसंहार को नहीं जान पाते । यह दुधारी तलवार है। वह चाहे तो हाशिए पर पडे लोगों की आवाज बन सकता है या काॅरपोरेट के हितों का पक्षपोषक बन सकता है।

वरिष्ठ आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि आजादी के पहले मीडिया मिशन हुआ करता था। आजादी की लड़ाई की जरूरत के तहत अखबार निकले। नेहरूजी ने ‘नेशनल हेराल्ड’ जैसे अखबार शुरू किये। आजादी के बाद यह रोजगार में तब्दील हुआ। आज यह व्यवसाय हो गया है। भूमंडलीकरण के इस दौर में अखबार का दायरा संकुचित हो गया है। आस पड़ोस से हम कट गये हैं। हम तक बाराबंकी की खबरें भी नहीं पहुँच पाती। हमारे नेशनल मीडिया से कश्मीर,, पूर्वोतर भारत, दलितों, आदिवासियों की खबरें गायब हैं। पश्चिम के देशों के न्यूज रुम की हम चर्चा करें तो पाते हैं कि उन्होंने अपने न्यूज रुम को लोकतांत्रिक बनाया जाहं उनके समाज का प्रतिनिधित्व है, वहीं हमारे विषमतामूलक समाज का हमारे मीडिया में प्रतिनिधत्व नहीं है। दलित, आदिवासी, मुसलमानों आदि अखबारों में निर्णायक पदों पर नही के बराबर हैं।

‘जन अदालत में मीडिया’ पर केन्द्रित इस गोष्ठी में अपना विचार रखने के लिए तथा आज की मीडिया के बारे में लोगों के क्या विचार हैं, यह मीडियाकर्मी तक पहुँचान के लिए लखनऊ से निकलने वाले अखबारों के संपादकों, पत्रकारों व मीडियाकर्मियों को इस गोष्ठी में आमंत्रित किया गया था। लेकिन ‘जनसंदेश टाइम्स’ के संपादक व कवि डा0 सुभाष राय को छोड़कर कोई नही यहां उपस्थित था।

सुभाप राय गौतम बुद्ध की एक कहानी सुनाते हुए इस गोष्ठी में हस्तक्षेप किया और कहा कि बुद्ध जैसी दृष्टि यदि आज पत्रकारों में होती तो ऐसी स्थिति नहीं होती। आज अखबार की खबरों को मैनेज किया जाता है। आज यही प्रशिक्षण दिया जाता है कि इसे ऐसे मैनेज करो जिससे टी आर पी बढ़े, विज्ञापन मिले। किसी तरह पैसा आना चाहिए। यही दबाव अखबार पर है, सरोकार व दृष्टि का दबाव नहीं है। जो प्रतिबद्ध है, उनके लिए संकट है। खबरें भी प्रबंधित हैं। पाठकों को आज ग्राहक समझाा जाता है और अखबार उत्पाद हो गये हैं। मीडिया के संकट की चर्चा करते हुए सुभाष राय ने कहा कि जो संकट है, वह दृष्टि व सरोकार का है। दृष्टि के बिना खबर अपनी संपूर्णता में सामने नहीं आ सकती। अखबारों में वे संकट में हैं जो प्रतिबद्ध हैं, जिनके पास दृष्टि व सरोकार है। ऐसे लोगों की मदद के लिए पाठकों को आगे आना चाहिए। इससे हालत बदलेंगे।

गोष्ठी की शुरुआत दलित चिंतक अरुण खोटे के आधार वक्तव्य से हुई। उनका कहना था कि आज का मीडिया अस्सी के दशक वाला मीडिया नहीं है जहाँ मीडिया के लिए सामाजिक सरोकार प्रमुख होते थे। नब्बे के दशक के बाद वैश्वीकरण की जो प्रक्रिया शुरू हुई, उसके बाद बाजारीकरण की प्रक्रिया तेज हुई। अब जनता और उसके सवालों से मीडिया संचालित नहीं होता आज मीडिया को काॅरपोरेट चलाता है। एक दौर था जब जनता के मुद्दे जनता उठाती थी। मीडिया उसके अनुसार चलता था। आज हालत यह है कि मीडिया मुद्दे उठा रहा है। जैसे करप्शन का मुद्दे को लें, यह मीडिया का मुद्दा बना हुआ है। लेकिन वह भ्रष्टाचार नहीं है जिसका सामना रोज रिक्शेवाले, गरीब.गुरबा लोंगों को करना पड़ता है। यह तो खाये.पीये लोगों का मुद्दा है जो स्वयं इसमें शामिल है। जहां तक वैकल्पिक मीडिया की बात है, यह अवधारणा अभी तक सफल नहीं हुई है। यह उनलोगों को जोड़ने में सफल नहीं हुआ है जिनके लिए यह है। ऐसे में विचारणीय सवाल है कि मीडिया की कोई सामाजिक भूमिका है ?

इस मौके पर ‘लोकसंघर्ष’ के संपादक रणधीर सिंह सुमन ;बाराबंकीद्ध ने कहा कि पुंजीवाद पहले मजबूत नहीं था और अखबार स्वतंत्र थे। लेकिन जब से अमरीकी साम्राज्यवाद का प्रभाव व हस्तक्षेप बढ़ा है, मीडिया का संकट भी गहराया है। अमरीका की जरूरत है कि यहां तनाव और युद्ध जैसी हालत बनी रहे। इसीलिए आज मीडिया द्वारा यह चीन विरोधी प्रचार चलाया जा रहा है। चीन द्वारा युद्ध की तैयारी जैसी बातें मीडिया द्वारा प्रचारित है। आंकड़े बताते हैं कि चीन की सीमा पर सबसे कम खर्च आता है। मीडिया का ऐसा ही चरित्र है।

उर्दू मैग्जीन ‘अफकार.ए.मिली’ ;दिल्लीद्ध के विशेष संवाददाता अबू ज़फ़र ने कहा कि मीडिया का सारा नजरिया बदल गया है। हमें पढ़ाया गया कि जो घटा है, उसे ही सामने लाना है। न्यूज में व्यूज नहीं होना चाहिए। इमोशन व भाव नहीं हो। हालत यह है कि मीडिया आधी खबरें ही लोगों तक पहुँचाता है। अतंकवादी घटनाओं की खबरें पुलिस के बयान पर आधारित होती हैं। यदि कोई युवक पकड़ा जाता है और उसे पुलिस आतंकवादी बताती है तो वह खबर अखबार के लिए सुर्खियों में छपती है। इस तरह की खबरों का श्रोत पुलिस हुआ करती है। लेकिन वह युवक पर कोई दोष सिद्ध नहीं होने या निर्दोष होने पर छूट जाना मीडिया के लिए कोई खबर नहीं। यह एक विशेष किस्म की मानसिकता की वजह से होता है। यही मानसिकता आज मीडिया पर हावी है। इसके विरुद्ध मास मूवमेंट चलाने की जरूरत है।

प्रगतिशील महिला एसोसिएशन की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ताहिरा हसन ने कहा कि इस व्यवस्था के साथ खड़े होकर इसका बदलाव संभव नहीं है। यह व्यवस्था काॅरपोरेट द्वारा संचालित है। मीडिया भी इसी के द्वारा नियंत्रित है। दलितों के सवाल, पास्को में हजारों मछुआरों व किसानों का अपनी संपदा से बेदखल किया जाना और इसके खिलाफ उनका संघर्ष मीडिया के विषय नहीं हैं। सोनभद्र में गरीबों की झोपडि़यां जला दी गईं, पर ये मीडिया के लिए खबर नहीं है। जिस मीडिया ने अन्ना के आंदोलन को क्रान्ति व दूसरी आजादी कहकर लगातार प्रचारित किया, वही इरोम शर्मिला के सवाल पर चुप दिखता है। हमारे लिए जरूरी है कि मीडिया को कठघरे में खड़ा करते हुए भूमंडलीकरण व फसीवाद के खिलाफ हमारा संघर्ष हो।

गोष्ठी को ‘लोकसंघर्ष’ के संपादक रणधीर सिंह सुमन, आजमगढ़ से आये मानवाधिकार कार्यकर्ता मसरुद्दीन, पत्रकार सुबोध श्रीवास्तव, नाटककार राजेश कुमार, जसम के संयोजक कौशल किशोर ने भी संबोधित किया। संचालन अलग दुनिया के के0 के0 वत्स ने किया।

- कौशल किशोर

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

मीडिया पर खुफिया नियंत्रण भाग 3

मुम्बई सीरियल धमाकों के तुरन्त बाद मीडिया में आने वाली खबरों की शुरुआत पुणे और वाराणसी की घटना के बाद वाले समाचारों से भिन्न नहीं थी। हालाँकि इस बार इंडियन मुजाहिदीन का ईमेल भी नहीं था। 13 जुलाई की शाम को लगातार बारिश के कारण जाँच में कई प्रकार की बाधाएँ थीं। अफवाहों के कारण यातायात बाधित होने की आशंका से स्थानीय प्रशासन ने थोड़े समय के लिए मोबाइल नेटवर्क जाम कर दिया था। धमाके के बाद से समाचार पत्रों के प्रकाशन में दो से तीन घण्टे का समय भी बाकी था। शायद इतने कम समय में जाँचदल के घटना स्थल पर पहुँचने पर कोई निश्चित जानकारी हासिल कर पाना भी संभव नहीं हो पाता। यदि कोई सुराग हाथ आ भी जाता तो यह तय कर पाने के लिए समय नहीं था कि जाँच हित में उसे सार्वजनिक किया जाए अथवा नहीं। केन्द्रीय गृहमंत्री ने धमाकों से पूर्व किसी भी खुफिया जानकारी के होने से साफ इंकार किया था। ऐसे में अगले ही दिन कई समाचार पत्रों में इस समाचार से खुफिया एजेंसी (आई0बी0) की भूमिका एक बार फिर संदेह के घेरे में आती है। ‘‘धमाकों से दहली मुम्बई’’ ’......इन हमलों के पीछे इंडियन मुजाहिदीन और लश्कर-ए-तोयबा का हाथ होने की आशंका है’ (दैनिक जागरण 14 जुलाई पृष्ठ-1) ‘‘मुम्बई में आतंकी हमला’’ .....विस्फोटों के पीछे इंडियन मुजाहिद्दीन और लश्कर-ए-तोयबा का हाथ होने की आशंका जताई जा रही है....’’ (हिन्दुस्तान 14 जुलाई पृष्ठ-1) यही नहीं अगले दिनों के समाचार पत्रों में देश के कई क्षेत्रों के कथित इंडियन मुजाहिदीन माड्यूल्स पर यकीन की हद तक शक जाहिर करने वाले समाचार खुफिया एजेंसियों के हवाले से प्रकाशित होते रहे। इन समाचारों के शीर्षकों से ही उनके प्रायोजित होने का संदेह होता है। ‘‘आई0एम0 माड्यूल्स की तलाश में आजमगढ़ में छापे’’ ‘‘ जाँच एजेंसियाँ खाली हाथ’’ कहीं आत्मघाती हमला तो नहीं’’ (हिन्दुस्तान 15 जुलाई पृष्ठ-1) ‘‘आई0एम0 के भटकल ग्रुप का हाथ’’ ‘‘मानव बम इस्तेमाल भी जाँच के घेरे में’’ जाँच एजेंसियाँ खाली हाथ’’ (दैनिक जागरण 15 जुलाई पृष्ठ-1) ‘‘ब्लास्ट का यूपी कनेक्शन तलाश रही ए0टी0एस0’’ (दैनिक जागरण 15 जुलाई पृष्ठ-13) ‘‘शक की सुई आत्मघाती हमलावर पर’’ (अमर उजाला 15 जुलाई पृष्ठ-1) ‘‘पुलिस की जाँच दायरे में हैं कई आतंकी संगठन’’ (अमर उजाला 15 जुलाई पृष्ठ-13) एक ही दिन के अखबार के इन समाचार शीर्षकों से स्पष्ट होता है कि उन्हें कोई अज्ञात शक्ति नियंत्रित कर रही है। वह शक्ति यह तय कर चुकी है कि इन धमाकों का आरोप इंडियन मुजाहिदीन पर ही डालना है और वह लगातार एक-एक चीज़ की निगरानी भी कर रही है। मुम्बई के झाबेरी बाजार में आत्मघाती हमला होने के समाचार लगभग सभी समाचार पत्रांे में 15 जुलाई को छपे तो 16 जुलाई को ‘‘धमाकों के पीछे हो सकता है कोई नया संगठन’’ शीर्षक से प्रकाशित समाचार में कहा गया.... जाँच अधिकारियों का मानना है कि पिछले कुछ महीनों में आन्ध्र प्रदेश और केरल से कुछ कम उम्र मुस्लिम युवकों के फिदाईन संगठन में शामिल होने की खुफिया एजेंसियों ने जानकारी दी थी।’’ (अमर उजाला 16 जुलाई पृष्ठ-13) पहले फिदाईन हमले की आशंका जताने वाला समाचार और अगले दिन खुफिया एजेंसियों के हवाले से आने वाली इस खबर को जोड़कर देखा जाए तो साफ तौर पर यह लगता है कि आत्मघाती हमला साबित होने की सूरत में भी यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है कि जाँच की जो दिशा पहले तय की जा चुकी है उस पर कोई आँच न आने पाए। लगभग एक सप्ताह तक चलने वाले इस अभियान में इंडियन मुजाहिदीन के भूत को सिर पर उठाए खुफिया एजेंसियाँ देश भर में भ्रमण करती रहीं। कभी कोलकाता से तार जोड़ने का समाचार छपा तो कभी वाराणसी विस्फोट से। कई जगहों से पूछताछ और मुस्लिम युवकों को हिरासत में लेकर यातना देने के समाचार भी आए। फैज उसमानी की मुम्बई क्राइम ब्रांच द्वारा पूछताछ के दौरान टार्चर किए जाने से मृत्यु भी हो गई। जेलोें में बंद धमाकांे के आरोपियों से भी पूछताछ की गई। इस पूरी कवायद से देश भर में दो बड़े समुदायों के बीच भय और संदेह का वातावरण निर्मित होने में अवश्य मदद मिली परन्तु तीन महीने बाद भी गुत्थी नहीं सुलझ सकी। जाँच के गलत दिशा में जाने का यह एक और सुबूत है।
पुणे और वाराणसी धमाकों के बाद बगैर किसी ठोस सुराग के इंडियन मुजाहिदीन और मुस्लिम समुदाय के खिलाफ मीडिया बाजी को लेकर मानवाधिकार संगठनों और सभ्य समाज ने कड़ी आपत्ति जताई थी। शायद इसी वजह से मुम्बई सीरियल
धमाकों के बाद केन्द्रीय गृह मंत्री, गृह सचिव और स्वयं मुम्बई ए0टी0एस0 चीफ ने लगातार यह बात दोहराई कि ऐसा कोई सुराग नहीं मिला है जिससे स्पष्ट रूप से किसी संगठन या व्यक्ति पर उँगली उठाई जाए। फिर भी धमाकों के बाद इंडियन मुजाहिदीन और उसके नाम पर मुसलमानों के खिलाफ पहले से भी ज्यादा आक्रामक मीडिया अभियान पर सीधे इंटेलीजेंस ब्यूरो पर उँगली उठ रही है। आई0बी0 पर यह भी आरोप लग रहा है कि वह भगवा आतंकवाद पर परदा डालने और अपनी नाकामियों से जनता का ध्यान हटाने के लिए मीडिया को हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रही है। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।


-मसीहुद्दीन संजरी
समाप्त
मो. 9455571488

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

मीडिया पर खुफिया नियंत्रण भाग 2

भगवा आतंकवाद से परदा उठते ही प्रज्ञा सिंह ठाकुर और कर्नल पुरोहित एण्ड कम्पनी की गिरफ्तारी के साथ-साथ उनके द्वारा कराए गए बम धमाकों का आरोप मुसलमान युवकों पर मढ़ने की साजिश का पर्दा भी फाश हो गया। आतंकवाद के नाम पर अब चलने वाली एक तरफा बहस को एक और रुख मिल गया। खुफिया एजेंसियों की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे। विशेष रूप से समझौता एक्सप्रेस धमाके को लेकर इन्टेलीजेंस ब्यूरो (आई0बी0) पर प्रत्यक्ष रूप से टिप्पणियाँ होने लगीं। 26/11 के मुम्बई पर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी हमले के दौरान भगवा आतंकवाद का खुलासा करने वाले तत्कालीन मुम्बई ए0टी0एस0 चीफ हेमन्त करकरे संदिग्ध परिस्थितियों में शहीद हो गए। उसके बाद देश में होने वाली सभी आतंकी घटनाओं के पश्चात खुफिया एवं अन्य बेनामी सूत्रों के हवाले से सघन मीडिया अभियान की शुरुआत हो गई। खास बात यह कि साध्वी और उसके साथियों की गिरफ्तारी के बाद मुम्बई ए0टी0एस0 की कहानी से ज्यादा रुचि मीडिया ने उन समाचारों में दिखाई जिनमें उन गिरफ्तारियों का विरोध किया गया था। आतंकवाद को लेकर संघ परिवार के तेवर बदल गए। हेमंत करकरे को धमकियाँ मिलने लगीं। परन्तु इस विषय पर एक दो खबरों के अपवाद को छोड़ दें तो कोई मीडिया अभियान नहीं चला। पुलिस रिमाण्ड के दौरान साध्वी पर बल प्रयोग को लेकर अडवाणी जी नाराज हो गए तो प्रधानमंत्री के विशेष सलाहकार उन्हें मनाने उनके निवास तक गए। जो शक्तियाँ आतंकवाद के मामले में सरकार के नरम रवैये की कटु आलोचक थीं व्यक्ति और संगठन का नाम बदलते ही पुलिस के तौर तरीके में उन्हें इतनी सख्ती नजर आई कि बिलबिला उठे। भगवा आतंकवाद के खुलासे से उत्पन्न नई परिस्थितियों को बदलने और पुरानी हालत बहाल करने के लिए यह सभी शक्तियाँ एक जुट प्रयास में लग र्गइं। जिसके नतीजे में अगले धमाके से ही शक्तिशाली मीडिया अभियान की शुरुआत भी हो गई।
13.02.2010 का पुणे जर्मन बेकरी धमाका हो या 07.12.2010 का शीतला घाट, वाराणसी विस्फोट, 13.07.11 का मुम्बई सीरियल ब्लास्ट हो या 13.09.11 की दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर की घटना, इन सभी वारदातों के बाद खुफिया सूत्रों के हवाले से मीडिया में लगातार आने वाले समाचारों में भगवा आतंकवाद से जनता का ध्यान हटाकर जेहादी आतंकवाद को पूरी तरह फिर से स्थापित करने के प्रयासों की झलक साफ दिखाई देती है।
पुणे धमाके के तुरन्त बाद इंडियन मुजाहिदीन और उसके पाकिस्तानी कनेक्शन की खबरें अलग-अलग सूत्रों से आना शुरू हो र्गइं। घटना को अंजाम देने वाले माड्यूल्स के तार कभी पुणे और मुम्बई से जुड़े बताए गए तो कभी उत्तर प्रदेश और भटकल से। अभी कडि़याँ जुड़ भी नहीं पा रही थीं कि जल्दबाजी में भटकल के एक युवक को गिरफ्तार कर लिया गया। इससे पहले कि ए0टी0एस0 उसके दोषी होने का प्रथम दृष्टया कोई सुबूत दे पाती उसने अपनी बेगुनाही अदालत में साबित कर दी। शीतला घाट वाराणसी के धमाके के पश्चात खुफिया एजेंसियों ने एक बार फिर शक की सुई इंडियन मुजाहिदीन की तरफ घुमाई। इस बार आई0एम0 का कथित आजमगढ़ माड्यूल निशाने पर रहा। कुछ मुस्लिम युवकों के नाम भी उछाले गए। इस घटना को अंजाम देने वाले सूत्रधारोें के बारे में खुफिया एजेंसियों (आई0बी0 तथा रा) के हवाले से कभी यह खबर आई कि वे शारजाह में हैं तो कभी पाकिस्तान में। जाहिर सी बात है कि शीतला घाट पर फटने वाले बम को उतनी दूर से उछाला नहीं जा सकता था। इसके लिए यहाँ पर कुछ लोगों की मौजूदगी आवश्यक थी। ऐसी स्थिति में इन सम्पर्क सूत्रों तक पहुँचे बगैर सूत्रधारों तक पहुँचने की थ्योरी कितनी हास्यास्पद और दुर्भावना पूर्ण है। लगभग एक साल बीत जाने के बाद भी अब तक जाँच में कोई प्रगति नहीं हो पाई है। इससे जाहिर होता है कि जाँच की दिशा ही गलत थी और इसकी जिम्मेदारी खुफिया एवं जाँच एजेंसियों पर ही जाती है। समाचार माध्यमों पर खुफिया एजेंसियों का कितना नियंत्रण है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुम्बई धमाकों के बाद पिछले विस्फोटों को अंजाम देने वाले संगठनों की जो सूची समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई है उसमें पुणे और वाराणसी धमाकों के सामने इंडियन मुजाहिदीन का नाम अंकित है। हालाँकि उनको अभी हल नहीं किया जा सका है।

-मसीहुद्दीन संजरी
क्रमश:

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

मीडिया पर खुफिया नियंत्रण भाग १


दिल्ली से प्रकाशित होने वाले उर्दू समाचार पत्र ‘सहरोजा दावत’ में सुप्रीम कोर्ट के वकील एन0डी0 पंचोली से बातचीत पर आधारित एक लेख ‘‘मीडिया इन्टेलीजेन्स के जेरे कन्ट्रोल (अधीन)’’ के शीर्षक से प्रकाशित हुआ, जिसमें कहा गया है ‘‘ इस वक्त सरकारों ने अवाम (जनता) को गुमराह करने के लिए मीडिया का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। यही नहीं उस पर इन्टेलीजेन्स का भी कंट्रोल है। खुफिया संस्थाएँ (एजेंसियाँ) जिस तरह की खबरें चाहती हैं मीडिया उसी तरह की खबरें उसी अंदाज में पेश करता है। इससे अवाम की ताकत घटी है और यह जमहूरियत (लोकतंत्र) के लिए बड़ा खतरा है। क्योंकि जो बातें आनी चाहिए वे नहीं आती हंै और जो आ रही हैं उन्हें तोड़ मरोड़ कर पेश किया जा रहा है।’’ विद्वान अधिवक्ता, माओवाद और आतंकवाद समेत देश की आन्तरिक सुरक्षा के समक्ष चुनौतियों तथा सरकार एवं खुफिया एजेंसियों की भूमिका पर चर्चा कर रहे थे। आतंकवाद की समस्या से निपटने के लिए खुफिया एवं जाँच एजेंसियाँ पिछले कुछ सालों से लगातार सवालों के घेरे में रही हैं। इन्टेलीजेन्स ब्यूरो (आई0बी0) समेत पूरे खुफिया तंत्र पर साम्प्रदायिक आधार पर मुसलमानों के प्रति भेदभाव पूर्ण रवैया अपनाने का आरोप भी लगता रहा है। हर आतंकी वारदात के बारे में खुफिया एजेंसियों और उनके बेनामी सूत्रों के हवाले से प्रकाशित होने वाले समाचार श्रृंखलाओं से इन आरोपों को बल मिलता है तो जाँच एजेंसियों की कार्यशैली इसे और गंभीर बना देती है।
जहाँ तक आतंकी वारदातों के पश्चात खुफिया एजेंसियों और विभिन्न सूत्रों के हवाले से आने वाले समाचारों, सुर, दिशा, आक्रामकता और कुछ मामलों में निष्तेजता का प्रश्न है वह परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहा है। भगवा आतंकवाद के सामने आने से पहले किसी घटना को अंजाम देने वाले सम्भावित संगठनों या व्यक्तियों के नामों को लेकर सूत्रों के हवाले से छपने वाले समाचार बहुत कम देखने को मिलते थे। घटना के तुरन्त बाद लश्कर, हूजी, या हिजबुल जैसे संगठनों के साथ सिमी का नाम जोड़ दिया जाता है। शुरुआती दौर में गिरफ्तार होने वाले कथित आतंकियों में कुछ कश्मीरियों के साथ उत्तर, मध्य या दक्षिण भारत के कुछ मुसलमानों के नाम शामिल हुआ करते थे। कश्मीर के अलगाववादी आन्दोलन और इन घटनाओं में कश्मीरियों के नाम शामिल होने के कारण जेहादी आतंकवाद तथा उससे मुसलमानों के जुड़ाव को आम स्वीकार्यता प्राप्त हो गई थी। इसलिए किसी मीडिया ट्रायल या अभियान की आवश्यकता ही नहीं रह जाती थी। आतंकवाद से मुक्ति दिलाने के नाम पर फर्जी इनकाउन्टरों का भी एक दौर आया। कई मामलों में सच्चाई मीडिया तक पहुँची भी परन्तु वह कोई खबर नहीं बन पाई। आजमगढ़ से हकीम तारिक और जौनपुर से मौलाना खालिद को क्रमशः 12 और 16 दिसम्बर को उठा लिया गया। जब उन्हें किसी अदालत में पेश नहीं किया गया तो फर्जी इनकाउन्टर में मार दिए जाने की आशंका को लेकर आन्दोलन शुरू हो गया। आतंकवाद के नाम पर होने वाली नाइंसाफियों के खिलाफ भारत का यह पहला भरपूर आंदोलन था। अन्ततः इन दोनों को 22 दिसम्बर 2007 को बाराबंकी रेलवे स्टेशन से हथियार तथा गोला बारूद के साथ हूजी के खूँखार आतंकी के तौर पर गिरफ्तार दिखाया गया। अब तक जो समाचार पत्र उनके अपहरण और तलाश की खबरें छाप रहे थे अचानक उन्हें कट्टर धार्मिक, हूजी एरिया कमाण्डर और आतंकवादी लिखने लगे। पूर्व की खबरों के बिल्कुल उलट पुलिस की कहानी को वैधता प्रदान करने वाले समाचारों से खुफिया एवं जाँच एजेंसियों का मीडिया पर अंकुश का पता चलता है। उन दोनों की गिरफ्तारी की सत्यता जानने के लिए गठित जस्टिस निमेष कमीशन की जाँच के तीन साल से भी अधिक समय से लंबित होने में भी इन एजेंसियों की भूमिका है। बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ पर काफी बहस हो चुकी है और यह सिलसिला अब भी जारी है। परन्तु एक बात बहुत यकीन के साथ कही जा सकती है कि यदि जेहादी आतंकवाद को आम स्वीकार्यता प्राप्त नहीं होती और मीडिया पर इन एजेंसियों की इतनी मजबूत पकड़ न होती तो देश की राजधानी में, दिन के उजाले में दो मासूमों की फर्जी मुठभेड़ में हत्या न होती।

-मसीहुद्दीन संजरी
क्रमश:

शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

कल हुजी था आज इंडियन मुजाहिद्दीन है आने वाले दिनों में लतखोरीलाल होगा

दिल्ली हाई कोर्ट के गेट नंबर पांच पर बम विस्फोट कर 12 लोगों की हत्या कर दी गयी जिससे सामान्य जनों में दहशत का भाव भी पैदा हुआ और जिन परिवारों के सदस्यों की हत्या हो गयी या घायल हैं उनकी तकलीफों को भी आसानी से समझा नहीं जा सकता है लेकिन सामान्य जन शोक संवेदना के अतिरिक्त कर भी क्या सकते हैं। लेकिन दूसरी तरफ भारतीय खुफिया एजेंसी इलेक्ट्रोनिक व प्रिंट मीडिया तरह-तरह की सगूफेबाजी करके अपनी गैर जिम्मेदाराना स्तिथि का परिचय दे रहे हैं। घटना के बाद ही इलेक्ट्रोनिक मीडिया खुफिया सूत्रों के हवाले से प्रचार करना शुरू कर दिया कि इसमें हूजी आतंकवादी संगठन ने ईमेल भेज कर बम विस्फोट कर जिम्मेदारी ले ली है। हिन्दुवत्व वादी तत्वों ने अफजल गुरु की फांसी से बम विस्फोट को सम्बद्ध कर दिया और तरह-तरह की बयानबाजी शुरू हो गयी। अगले दिन ही एक ईमेल प्राप्त होता है कि इंडियन मुजाहिद्दीन ने बम विस्फोट की जिम्मेदारी ले ली है। पुलिस ने दो व्यक्तियों के दाढ़ी नुमा स्केच जारी कर दिए हैं और कहा की संभावित आतंकी यह हैं इस तरह देश भर में उस तरह की दाढ़ी रखने वाले 18 व्यक्तियों को हिरासत में ले लिया गया।
पहली बात तो यह है की यदि कोई सबूत या संदिग्ध व्यक्ति है तो उसका हल्ला इलेक्ट्रोनिक व प्रिंट मीडिया से मचा कर खुफिया एजेंसियां क्या साबित करना चाहती हैं। यदि कोई आतंकी हमले की आशंका है तो उससे निपटने के उपाय करने चाहिए न की उसका प्रोपोगंडा करना चाहिए। अब हो यह रहा है कि कोई भी आतंकी घटना होने पर पहले से ही इलेक्ट्रोनिक व प्रिंट मीडिया द्वारा एक पृष्टभूमि तैयार कर दी जाती है और एक समुदाय विशेष के लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया जाता है उनकी विवेचना का स्तर शेखचिल्ली की कहानियों की तरह होता है। विधि के अनुरूप कार्यवाई ही नहीं होती है। 161 सी.आर.पी.सी के तहत होने वाले गवाहों के बयान अघोषित रूप से प्रिंट मीडिया व इलेक्ट्रोनिक मीडिया में आ जाते हैं उसके बाद विवेचना में वही सब लिख दिया जाता है जबकि 161 सी.आर.पी.सी के बयान आरोप पत्र तक गोपनीय होते हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि किसी भी आतंकी घटना की जांच विधि के अनुरूप करके दोषियों को सजा कराने की है किन्तु ऐसा न करके जिम्मेदार लोग अफवाहबाजी उड़वा कर सांप्रदायिक रूप दे देते हैं। फर्जी ईमेल आदि से जिम्मेदारी ले लेने की थोथी बातों से अर्थ नहीं निकलता है। अगर इसी तरह से जिम्मेदारी लेने के आधार पर विवेचनाएं होती रहेंगी तो लतखोरीलाल भी कहेगा की अमुक आतंकी घटना मैंने की है और पूरे देश का इलेक्ट्रोनिक मीडिया व प्रिंट मीडिया उसके प्रचार प्रसार के लिये कार्य करता हुआ नजर आएगा।

सुमन
लो क सं घ र्ष !
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