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शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

मीर जाफ़र की तलवार

रूस में प्रधानमंत्री मोदी ने गार्ड ऑफ़ ऑनर से पहले राष्ट्रगान के समय चल कर अपने उतावलेपन का परिचय दिया. रूसी अधिकारीयों ने आगे बढ़कर उनको रोका और राष्ट्रगान के समय खड़ा रहने के लिए प्रेरित किया. हमारे प्रधानमंत्री दो दिन की रूस यात्रा के बाद अफगानिस्तान की यात्रा पर फिर तुरंत पाकिस्तान की यात्रा पर हैं. रूस में उन्हें तोहफे के तौर पर महात्मा गाँधी की डायरी का पृष्ठ दिया और तलवार भी भेंट की. तलवार के बारे में यह कहा जाता है कि यह तलवार मीर जाफर के वंशजों की है. यह कौन सा सन्देश मोदी साहब को देने का प्रयास किया गया है. क्या नागपुर मुख्यालय की अंग्रेज भक्ति के ऊपर कटाक्ष तो नहीं किया गया है.  टीपू सुलतान की तलवार की जगह मीर जाफर की तलवार अब महत्वपूर्ण हो गयी है. कलकत्ता से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक 'द टेलीग्राफ' लिखता है- Putin's gift last night was an 18th- century sword from Bengal's Najafi dynasty of nawabs, started by Mir Jafar who was placed on the throne by the British after the Battle of Plassey in 1757.
                              कलकत्ता के राजनेता व साहित्यकार अरुण महेश्वरी लिखते  है -रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने कल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बंगाल के मीर जाफ़र के नज़ाफी नवाब वंश की तलवार भेंट की है । यह भेंट बहुत सांकेतिक प्रतीत होती है । भारत के इतिहास में जयचंदों और मीरजाफरों की एक समानांतर परंपरा रही है । मोहम्मद गोरी की सेना के हाथों पृथ्वीराज चौहान को हराने में कन्नौज के राजा जयचंद और 1757 की प्लासी की लड़ाई में क्लाइव के हाथों सिराज-उद-दौल्ला को पराजित करने में मीर जाफ़र की भूमिका की परंपरा । इसे आधुनिक काल में अंग्रेज़-भक्तों की परंपरा भी कहते है । पुतिन ने मोदी जी को मीर जाफ़र के वंशधरों की तलवार से नवाज़ कर क्या कोई ख़ास संदेश दिया है.
                        बाक़र गंज के सैयद में असग़र वजाहत ने लिखा है ----मीर मुहम्मद जाफ़र ख़ाँ थे जो बाद में शुजाउल मुल्क, हाशिमुद्दौला नवाब जाफर अली ख़ाँ बहादुर, महाबत जंग नवाब नाजि़म बंगाल, बिहार और उड़ीसा हुए। इन्हें उर्फे आम में मीर जाफर भी कहा जाता है। वही मीर जाफर हैं जिन्होंने प्लासी की लड़ाई में नवाब सिराजुद्दौला को धोखा दिया था। वही मीर जाफर जिन्होंने लॉर्ड क्लाइव, सेठ अमीचंद और जगतसेठ के साथ मिल कर सिराजुद्दौला का तख्ता पलट दिया था। वही मीर जाफ़र जिनके लड़के मीरन ने सिराजुद्दौला की हत्या करायी थी। वही मीर जाफ़र जिनका नाम इतिहास में जयचंद के साथ लिया जाता है। वही मीर जाफ़र जो विश्वासघात का प्रतीक बन चुके हैं।  जिनकी हवेली को आज भी नमक हराम की डियोढ़ी कहा जाता है। जिन्हें लोगों ने ग़द्दार-ए-अबरार यानी भले आदमी से विश्वासघात करने वाले की उपाधि दी थी। 
                  क्या इन दोनों बातों से देश का सम्मान बढ़ता है ? रोज-रोज मल्टी नेशनल कंपनियों सी इ ओ को लेकर उनके व्यापार बढाने के लिए जब प्रधानमंत्री स्तर पर इस तरह प्रयास किये जायेंगे तो निश्चित रूप से यह सब तो होगा ही. पहले जब कोई प्रधानमंत्री किसी देश की यात्रा पर जाता था तो सालों उसकी तैयारियां होती थी लेकिन हमारे मोदी साहब बगैर तैयारियों के हर देश में जनसभा करने पहुँच रहे हैं. वहीँ, एक आश्चर्यजनक घटनाक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज दोपहर बाद काबुल से दिल्ली लौटने के क्रम में लाहौर जाएंगे और अपने पाकिस्तानी समकक्ष नवाज शरीफ से मुलाकात करेंगे। मोदी की यह पहली पाकिस्तान यात्रा होगी। इसके बारे में मोदी ने खुद ट्वीट करके जानकारी दी। 

सुमन 

मंगलवार, 17 नवंबर 2015

आधुनिक कसाई कौन ? चेहरा पहचानने की ज़रुरत है

अपने बच्चों को IS की जद में जाने से बचाएं मुस्लिम: ओबामा , यह बयान अमेरिकी राष्ट्रपति का नितांत गलत है और यूज एंड थ्रो की नीति का परिचायक है और जब अमेरिका या साम्राज्यवादी मुल्क इस्तेमाल करने के बाद फेंकते हैं तो फेंकने के बाद वह चीज जब ज़ख्म देती है और फिर सेप्टिक बनकर उनके जिस्म निर्जीव बनाने लगती है तो वह तरह-तरह के सिद्धांत गढ़ने लगते हैं. कौन नहीं जनता है कि पश्चिमी देशों के दलाल बगदादी से पेट्रोलियम पदार्थ फ़ोकट दामों में खरीदते थे और फिर इन्ही देशों को बेच देते थे हथियारों की सप्लाई पेट्रोलियम पदार्थों के बदले में अमेरिकी व उसके मित्र देश कर रहे थे यही हालत अफगानिस्तान के सम्बन्ध में लादेन के साथ थे. अब वह चिल्ला रहे हैं कि मुस्लिम अपने बच्चों को आईएस की ज़द में जाने से बचाएँ. बगदादी को किसने पैदा किया था, लादेन को किसने पैदा किया था. इसका जवाब न ओबामा के पास है और न ही फ्रांस के राष्ट्रपति ओलंदे के पास है. यही लोग बगदादी के मेली-मददगार हैं और जब रूस ने बगदादी के ऊपर  बम्बार्ड करना शुरू किया तो यह लोग बगदादी का साथ छोड़ कर भाग खड़े हुए जिसकी प्रतिक्रिया स्वरूप बेरोजगार आतंकी पूरी दुनिया में मानवता के खिलाफ हमले करना शुरू कर दिया लेकिन अगर देखा जाए तो असली मानवता के दुश्मन कौन हैं तो मालूम चलेगा कि ओबामा और ओलंदे ही हैं. इस्लाम का चेहरा अगर शैतान के रूप में तब्दील किया है तो इन्ही साम्राज्यवादी देशों ने अपने नौकरों के माध्यम से किया है. इस्लाम तो शांति, करुणा और दया का दर्शन है. उसके पैगम्बर मोहम्मद साहब के ऊपर एक बुढ़िया रोज कूड़ा फेंकती थी और जब एक दिन उसने कूड़ा नहीं फेंका उनके ऊपर तो वह उसके घर जाकर मालूम करने गए थे. उस दर्शन का खौफनाक चेहरा मुनाफाखोर साम्राज्यवादी मुल्कों ने बदल दिया. इन साम्राज्यवादी देशों  की नकाब उतारते हुए रूस के राष्ट्रपति पुतिन का दावा महत्वपूर्ण है. उसने इनका मुखौटा उतार कर फेंक दिया है.
                               जिसका सबूत यह है कि आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट के पेरिस पर हुए हमले को लेकर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि आतंकी संगठन आईएस को कुछ देशों से पैसा पहुंच रहा है, जिसमें जी-20 से जुड़े देश भी शामिल हैं। उन्होंने दावा किया कि आईएस को फंडिंग करने की इस लिस्ट में कुल 40 देशों का नाम है। जिन देशों से पैसा पहुंच रहा है, उसे लेकर पुतिन ने खुफिया जानकारियां भी साझा कीं। पुतिन ने साथ ही कहा कि आईएस तेल का गैरकानूनी कारोबार करता है। इसे भी खत्म करने की जरूरत है।
 पेरिस हमले के बाद सीरिया के ऊपर आतंकवाद समाप्त करने के नाम पर जो साम्राज्यवादी मुल्क बम्बार्ड कर रहे हैं. क्या उनसे फूल झर रहे हैं. इन लोगों के हथियारों की प्रयोगशाला अफगानिस्तान, सीरिया, लीबिया है और यहाँ ये हथियारों का प्रयोग कर दुनिया के अन्दर अपने हथियार बेचने का सौदा करते हैं. युद्ध इनका जीवन है. शांति इनकी मौत है अगर यह जरा सा भी मानवतावादी हैं तो इनको चाहिए की अविलम्ब अपनी हथियार इंडस्ट्री को बंद करें. पूरी दुनिया में आतंकवादियों को हथियार सप्लाई करने का काम कौन कर रहा है यही सब अपने मुनाफे के लिए विभिन्न देशों को गुलाम बनाने का काम कौन कर रहा है, यही मुल्क. अमेरिका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक वहां के मूल निवासियों को समाप्त करने का काम इन्ही साम्राज्यवादी ताकतों ने किया है. यह चाहते हैं कि दुनिया के अन्दर विभिन्न नस्लों के लोग, विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं इनको समाप्त किया जाए इसलिए समय समय पर विभिन्न सिद्धांत गढ़ते रहते हैं. कभी सभ्यताओं का युद्ध, कभी भाषा का युद्ध, कभी धर्म का युद्ध. युद्ध में मरता कौन है, इंसान और मुनाफा, लूट और खसोट कौन करता है यह सब.
हम ! कुछ नहीं कहते













सुमन 

मंगलवार, 22 सितंबर 2015

अमेरिका को लाभ देने के लिए हथियारों की खरीद

गिरती हुई अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भारत द्वारा हथियारों की खरीद से नया जीवन मिलने की आशा है. भारत अब सऊदी अरबिया को भी पीछे छोड़ कर अमेरिकी हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार बन गया है. इससे पहले भारत सोवियत यूनियन से हथियारों की खरीद करता था और उनसे टेक्नोलॉजी लेकर फिर अपने वहां अपनी जरूरतों के अनुसार सुधार कर उत्पादन करता था. जिसका सबसे बढ़िया उदहारण ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल को भारत और रुस ने मिलकर उत्पादित किया, इस बात के लिए अमेरिका तैयार नहीं होता है.
    भारत के जो भी युद्ध हुए हैं वह मुख्यत: पाकिस्तान से ही हुए हैं. पाकिस्तान को अमेरिका हथियारों की सप्लाई करता रहा है और उसके हथियार बिकते रहे हैं किन्तु अब्दुल हमीद ने मात्र अपनी "गन माउन्टेड जीप" से उस समय अजेय समझे जाने वाले अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को दिए "पैटन टैंकों" को नष्ट कर दिया था।
 बुधवार से शुरु हो रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे से पहले भारत ने अमेरिका से हथियार सौदे को मंजूरी दे दी है। अमेरिकी एविएशन कंपनी बोइंग से करीब 15800 करोड़ रुपए  के  सौदे  के तहत भारत 22 अपाचे और 15 शिनूक हेलिकॉप्टर खरीदेगा। कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्युरिटी ने इस सौदे को मंजूरी दे दी है . अमेरिका का कोई भी वादा नहीं है की वह पाकिस्तान को हथियार नहीं बेचेगा. एक तरफ वह पाकिस्तान को हथियार भी बेचेगा और युद्ध के समय उसका राजनैतिक समर्थन भी करेगा.
           नागपुर की प्रयोगशाला से निकले देश के प्रधानमंत्री बनने तक नरेन्द्र दामोदर मोदी की राजनीति, विदेश नीति का यह कौन सा प्रयोग है की दोनों पडोसी मुल्कों के पास युद्ध के हथियार एक ही मुल्क द्वारा निर्मित होंगे. एक तरफ तो पाकिस्तान से ही निपटने की बात संघ की राजनीती करती है तो दूसरी तरफ वह पकिस्तान के आका अमेरिका को फायदा पहुंचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है. स्तिथि यहाँ तक पहुँच चुकी है की प्रधानमंत्री मोदी व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ उसी आका के इशारे पर कार्य करने के लिए तत्पर रहते हैं और अमेरिका यात्रा के बहाने दोनों देशों के प्रधानमंत्री अपनी-अपनी निष्ठा अमेरिका में प्रदर्शित करेंगे. 
जहाँ तक हथियारों की बात है अमरीकी अस्त्र रूसी अस्त्रों से बेहतर नहीं हैं इसीलिए वियतनाम युद्ध में अमेरिकी हारे थे और विएतनाम के पास रुसी हथियार उसके जीतने का मुख्य कारक था. यह भी याद रखा जाना चाहिए कि अमरीकी अस्त्रों पर आश्रित पाकिस्तान ने कभी रूसी अस्त्रों से लैस भारत के खिलाफ युद्ध नहीं जीता है लेकिन यह बात अमेरिकी समर्थक संघ के नियंतागणों को समझ में नहीं आती है क्यूंकि देशभक्ति, राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र स्वत: उन्होंने जारी करने का अधिकार ले रखा है. 
   देश की अर्थव्यवस्था हथियारों की खरीद से मजबूत नहीं होगी और अमेरिका के इशारे पर भारत पाकिस्तान का छाया युद्ध दोनों देशों को हथियार खरीदने के लिए मजबूर करता है. अगर अमेरिका हमारा वास्तविक शुभ चिन्तक है तो वह पाकिस्तान को मदद रोककर छाया युद्ध को समाप्त कर सकता है दोनों अपने-अपने देश की जनता की बुनियादी जरूरतों को पूरा कर सकते हैं. लेकिन हथियारों की बिक्री नहीं हो पायेगी और अमेरिका की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी. उस अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बचाए रखने के लिए तथा उसकी दादागिरी को दुनिया में कायम रखने के लिए यह हथियारों की खरीद उसको नया जीवन देगी.
सुमन 

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

महान पत्रकार, पत्रकारिता जगत के सिरमौर - रूसी करंजिया


"बाती बुझ गयी-
देह दीप की व बाती
जिससे अहंकार त्रस्त थे
और नरभक्षी हवाएं बदहवास,
आज का नवजात इतिहास-
जब भी बोलेगा
यही बोलेगा"

पत्रकारिता जगत के निर्भीक महामानव रूसी करंजिया की याद आते ही उपरोक्त पंक्तियाँ बरबस होठों पर जाती हैं एक पत्रकार बंधु ने रूसी को जब उपरोक्त पंक्तियाँ सुनाई तो रूसी करंजिया का मुखमंडल मुस्कान की झीनी आभा से दमक उठा था उनके आसपास बैठे लोग चकित थे- उनकी आकृति की उर्जमायी छवि देखकर रूसी करंजिया पंचानवे बसंत देख चुके थे दुनिया को दिखा चुके थे कि निर्भीक एवं स्वतन्त्र पत्रकारिता के माने क्या होते हैं, कितने और क्या-क्या होते हैं उसके पहलू और पराक्रम जाना तो था ही उन्हें, सो चले गए, किन्तु अपनी जो विरासत छोड़ गए उस पर, उनके जाते ही, एक चुनौतीबाचक प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया है- है कोई शेर की छातीवाला वीर इस मीडिया में, जो रूसी करंजिया को आगे बाधा सके? रूसी करंजिया भारत में टेबोलायड पत्रकारिता के जनक माने जाते हैं सही अर्थों में वे देश के प्रथम खोजी पत्रकार थे ऐसे समय जब सारे अख़बार 'व्यवस्था पत्र' का चोला धारण कर रहे थे, करंजिया का अखबार व्यवस्था को बेपर्द कर रहा था जिन व्यवस्था - पुरुषों के काले कारनामों का करंजिया ने पर्दाफाश किया उन्होंने उनकी खोजी पत्रकारिता को 'पीत पत्रकारिता' करार देने की लाख कोशिशें की किन्तु उनका कोई असर नहीं पड़ा- करंजिया की सेहत पर 'ब्लित्ज' के तेवरों-ताकत पर, ही पाठकों के चाव पर
'ब्लित्ज' का मतलब ही - आक्रमण, धावा, चढ़ाई व्यवस्था का चाहे जो भी अंग अथवा अवयब हो, 'ब्लित्ज' का नाम सुनते ही खौफ लगता था 'ब्लित्ज' समाचार पत्र के पाठकों की पहली पसंद होता था रूसी करंजिया ने 'ब्लित्ज' साप्ताहिक के निर्भीक एवं स्वतन्त्र चरित्र को कभी विचलित या कलंकित नही होने दिया उन्होंने 'इंडियन एक्सप्रेस' के संपादक 'फ्रेंक मोरेस' को अपना गुरु माना था मोरेस के निधन पर उन्होंने कहा था- फ्रेंक की रचना के बाद भगवन ने अपना सांचा तोड़ दिया यह टिपण्णी स्वयं करंजिया के लिये भी शत प्रतिशत सटीक है रूसी अपने समय के सबसे महान संपादक थे, सबसे सज्जन और सबसे उदार व्यक्ति भी वे अपने देश के प्रति अत्यंत संवेदनशील थे जीवन के उत्तरार्ध में उनके विचारों में भारी बदलाव आया वे सचमुच बदल गए इसी कारण वे मीडिया के नज़ारे पर लगभग आधी सदी तक छाये रहे प्रत्येक स्तर प्रत्येक क्षेत्र के लोगों ने उनकी साहसिक पत्रकारिता को सराहा वे विश्व के नेताओं से सीधा- संपर्क साधते और संवाद करते थे, और अपने साप्ताहिक पत्र में उनक नेताओं के चित्र के साथ अपना चित्र भी प्रकाशित करते थे मिस्र के नासिर से, रूस के खुश्चेव, कास्त्रो और ईरान के शाह तक तमाम विश्व-विभूतियों के साथ चित्र छपने से करंजिया देश विदेश में विख्यात हो गए थे वे मीडिया में अपनी पहचान ' क्रांतियों के इतिहासकार और क्रांतिकारियों के जीवनी- लेखक' के रूप में स्थापित करना चाहते थे यह पहचान उन्होंने डंके की चोट पर बनायीं-अपनी विशुद्ध विनम्रता को बरकरार रखते हुए अपनी प्रसिद्धि और प्रभाव को वे तुच्छ मानते थे और किसी भी व्यक्ति से किसी भी समय मिलने में संकोच नहीं करते थे

राम किशोर

मंगलवार, 22 मार्च 2011

नाटो भारत पर भी हमला करेगा.............?

मानवता की रक्षा हेतु

विश्व में साम्राज्यवादी शक्तियां बड़ी बेशर्मी के साथ एशिया के मुल्कों को गुलाम बनाने का कार्य कर रही हैं। जब इनकी कठपुतली संयुक्त राष्ट्र संघ ने किसी देश के ऊपर हमला करने की बात होती है। तो भारत, चीन, रूस, ईरान सहित कई मुल्क संयुक्त राष्ट्र संघ में अनुपस्थित हो जाते हैं और जब नाटो की सेनायें कार्यवाई शुरू कर देती हैं तो यह घडियाली आंसू बहाने शुरू कर देते हैं। चीन लीबिया में जारी घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं और लीबिया में जो हो रहा है उसपर अफसोस जाहिर करता है। चीन ने अपने बयान में लीबिया में विद्रोहियों और गद्दाफी सेनाओं के बीच जारी संघर्ष के सीज फायर की मांग भी नहीं की है और कहा है कि चीन उत्तरी अफ्रीका के स्वतंत्र राष्ट्र लीबिया की स्वतंत्रता, स्वप्रभुता और एकता का सम्मान करता है। बयान में कहा गया है कि हम उम्मीद करते हैं कि जल्द ही लीबिया में जारी संघर्ष थम जाएगा और नागरिकों को सुरक्षा प्रदान की जाएगी। ईरान ने इन हमलों की निंदा करते हुए कहा है कि लीबिया के तेल पर कब्जा करने का पश्चिमी देशों का यह घिनौना अपराध है। हालांकि ईरान ने लीबिया में गद्दाफी के विरोध में हो रहे प्रदर्शन का समर्थन करते हुए कहा है कि यह गद्दाफी के खिलाफ इस्लामिक क्रांति है। ईरान ने यह भी कहा है कि लीबिया के लोगों को पश्चिमी देशों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। वो अपने खास मकसदों को हल करने के लिए उनके साथ होने का दिखावा कर रहे हैं।
रूस ने भी लीबिया पर हुए मिसाइल हमलों की निंदा करते हुए कहा दोनों ओर से तुरंत संघर्ष विराम होना चाहिए। रुस ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र के बल प्रयोग के संकल्प को जल्दबाजी में अपनाया गया है। रूस के विदेश मंत्रालय ने द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि हम लीबिया और लीबिया पर हमला कर रहीं गठबंधन सेनाओं से अपील करते हैं कि वो शांति बहाली के लिए प्रयास करें।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा,''लीबिया में जारी संघर्ष की स्थिति को लेकर भारत चिंतित है. जैसा कि हमने पहले कहा था इस तरह के प्रयास स्थिति को नियंत्रण में लाने की कोशिश करें न कि आम नागरिकों के लिए मुश्किलें और बढ़ाएं.''
पूर्व में ईराक में कल्पित रासायनिक हथियारों की आड़ लेकर ईराक पर हमला किया गया। मीडिया ने नाटो सेनाओं को मित्र सेना की संज्ञा देकर ईराक पर कब्ज़ा करा दिया। अफगानिस्तान पर भी कब्ज़ा कर लिया गया। हजारो लाखो लोग मारे गए। घर-बेघर हो गए उस समय भी साम्राज्यवाद विरोधी तथाकथित शक्तियां घडियाली आंसू बहाती रहीं। आज लीबिया में कई दिनों से नाटो सेनायें कल्पित मानवीय आध्जारों को लेकर बम वर्षा कर रही हैं। मानवता की सबसे ज्यादा चिंता फ्रांस, इंग्लैंड, अमेरिका को है। जापान में दुनिया की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी है उस त्रासदी में ये देश विशेष कुछ नागरिकों की मदद नहीं कर रहे हैं उसका मुख्य कारण है जापान उनका अघोषित गुलाम देश है। इन देशों को सबसे ज्यादा नागरिक अधिकारों की चिंता लीबिया में है क्योंकि लीबिया का तेल भंडार सबके लिये सुलभ है। उस पर कब्ज़ा करने के लिये नागरिक अधिकारों का बहाना लेकर हमला किया जा रहा है और फिर लीबिया पर कब्ज़ा कर लिया जाएगा। यमन, बहरीन, सौदी अरबिया जैसे मुल्कों में भी आन्दोलन चल रहे हैं उनमें दखालान्जादी इसलिए नहीं होती है क्योंकि वे साम्राज्यवादियों के पिट्ठू मुल्क हैं। फ्रांस से लेके यूरोप के बड़े-बड़े देशों में महंगाई, बेरोजगारी को लेकर बड़े-बड़े धरना प्रदर्शन हो रहे हैं और यदि आन्दोलन ही संप्रभुता दरकिनार कर हस्ताक्षेप का आधार है तो इन देशों में कौन हस्ताक्षेप करेगा।
भारत में कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर भारत तक सेना कमान संभाले हुए है। बराबर कोई न कोई प्रथक्तावादी आन्दोलन जारी है। भारत के उपभोक्ता बाजार तथा प्राकृतिक सम्पदा पर कब्ज़ा करने के लिये नाटो सेनाओ को अच्छा आधार मिल सकता है और संयुक्त राष्ट्र संघ इन प्रदेशों में लोकतंत्र मानव अधिकार स्थापित करने के लिये सैनिक हस्ताक्षेप की अनुमति भी दे सकता है ? हमारे देश में अमेरिकन व ब्रिटिश साम्राज्यवादी एजेंटो की कमी नहीं है वह शक्तियां सिर्फ वाह वाही में सब कुछ करने के लिये तैयार बैठी रहती हैं जो साम्राज्यवादी शक्तियां चाहती हैं। तभी तो भारत इंग्लैंड, फ्रांस, पुर्तगाल जैसे साम्राज्यवादी देशों का गुलाम रहा है विश्व आर्थिक संकट के कारण साम्राज्यवादी मुल्कों की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं रह गयी है। आर्थिक संकट से उभरने के लिये यह साम्राज्यवादी शक्तियां कुछ भी कर सकती हैं। शांति इनकी मौत है युद्ध इनकी जिंदगी है। हमारे देश को चाहिए कि अपनी अस्मिता के लिये दुनिया के छोटे छोटे देशों की अस्मिता के लिये अपनी गुटनिरपेक्ष निति को जारी रखे। साम्राज्यवादी शक्तियों से दूरी आवश्यक है।
चाइना में अमेरिका और उसके साम्राज्यवादी मित्र बहुदलीय व्यवस्था लागू करने के नाम पर नोबेल पुरस्कार चाइना विरोधियों को देते रहते हैं। ईरान में अमेरिका व उसके पिट्ठू देशों द्वारा कई बार अपनी पिट्ठू सरकार बनाने की कोशिश की जा चुकी है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !
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