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शनिवार, 3 सितंबर 2016

बदसलूकी-आखिर जवाब मिला


अमेरिकी राष्ट्रपतिऔर उनके व्यवस्थापकों को आज चीन ने  मुंहतोड़ जवाब दिया जिसके तहत आज जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा  हांगझोऊ पहुंचे तो वहां पर चीनी अधिकारीयों ने उनके साथ गए प्रतिनिधिमंडल के साथ वैसा ही व्यवहार किया जैसा की वह व्यवहार अपने देश में जाने वाले दुसरे देशों के महत्वपूर्ण व्यक्तियों के साथ करते रहे हैं.  जैसे ही उनका विमान उतरा एक चीनी अधिकारी उनके दल के सदस्यों पर बरस पड़ा। चीनी अधिकारी ने उनसे कहा, यह उसका देश और और हवाई अड्डा है।
इतना ही नहीं अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सुसेन राइस और व्हाइट हाउस के पत्रकारों को भी जांच से छूट नहीं दी गई। आमतौर पर, ओबामा के साथ यात्रा पर जाने वाले पत्रकार विमान उतरने के बाद बोइंग 747 के विंग के नीचे खड़े हो जाते हैं जिससे वे राष्ट्रपति के विमान से बाहर निकलने की तस्वीरें ले सके। लेकिन, हांगझोऊ में ओबामा के विमान के उतरने के बाद चीनी सुरक्षा अधिकारियों ने एक नीली रस्सी लगा दी और पत्रकारों को उसके पीछे धकेल दिया।
चीनी अधिकारी यहीं नहीं रुके। उनमे से एक व्हाइट हाउस के अधिकारियों पर चिल्लाने लगा। वह पत्रकारों को वहां से जाने के लिए कहने लगा। तब व्हाइट हाउस की एक महिला अधिकारी ने उससे कहा-यह अमेरिकी राष्ट्रपति का विमान है। इसके जवाब में चीनी अधिकारी ने अंग्रेजी में कहा,'यह हमारा देश है। यह हमारा हवाई अड्डा है।'
इसके अलावा राइस और व्हाइट हाउस के वरिष्ठ अधिकारी बेन रोड्स ने जब नीली रस्सी उठाकर ओबामा के पास जाने की कोशिश की तो चीनी अधिकारी फिर नाराज हो गया। उसने राइस का रास्ता रोकने की भी कोशिश की। उसकी सीक्रेट सर्विस के एजेंटों से बहस हो गई। इस घटना के बाद ओबामा का काफिला हवाई अड्डे से रवाना हो गया। 
अमेरिका द्वारा कुछ भारतीयों के साथ की गयी बदसलूकी के उदहारण दिए जा रहे हैं. 
देवयानी प्रकरण में अमेरिका ने कूटनीतिक संरक्षण को आंशिक रूप से मानते हुए उनको वीजा 1 दे दिया और  अपने मुल्क से भगा दिया। जिस पर भारत ने अमेरिकी दूतावास के निदेशक स्तर के अधिकारी को संगीता रिचर्ड के अभिभावकों को अमेरिका ले जाने की प्रक्रिया में सहयोग करने के आरोप में भगा दिया और उसको भागने का समय 48 घंटे का दिया है। देवयानी को 12 दिसंबर को गिरफ्तार किया गया था। उन्हें 250,000 अमेरिकी डॉलर के बांड पर रिहा किया गया था। गिरफ्तारी के बाद कपड़े उतारकर देवयानी की तलाशी ली गयी थी और उन्हें नशेड़ियों के साथ रखा गया था जिससे भारत और अमेरिका के बीच तनातनी बढ़ गई। भारत ने जवाबी कार्रवाई करते हुए अमेरिकी राजनयिकों के विशेषाधिकार कम कर दिए।
                     आज़म खान साहब के साथ क्या-क्या हुआ वह भी पूरी तरीके से देश को बताया नही गया लेकिन जब देवयानी का मामला आया तो विडियो फुटेज से उनकी तलाशी का तरीका सामने आया। हरदीप पूरी, निरुपमा राव के साथ भी बदतमीजियां हुई थी। अब सवाल उठता है कि यह सब होने के बाद आप अमेरिका क्या करने जाते हैं निश्चित रूप से कुछ न कुछ व्यक्तिगत स्तर पर प्राप्ति की कामना अमेरिका यात्रा के लिए यह सब सहने को मजबूर करती है।
 शाहरुख खान को अमेरिका के न्यूयार्क हवाई अड्डे पर रोके रखने पर एसएम कृष्णा ने कहा था कि किसी भी हस्ती को रोके रखना, और बाद में माफी मांग लेने को अमेरिका ने आदत बना लिया है।
       इससे उनके राष्ट्रविरोधी देशविरोधी गतिविधियों पर तुरंत लगाम लगेगी। अमेरिका कभी भी भारत का स्वाभाविक मित्र नही रहा है और न हो ही सकता है क्यूंकि अमेरिका सम्राज्यवादी मुल्क है और आप साम्राजयवाद पीड़ित।
वे आए तो हमने सिर पे बैठाला हम गए तो लतियाया ......

हरदीप पुरी------------------मीरा शंकर

वे आए तो हमने सर पे बैठाला हम गए तो लतियाया इसी तर्ज पर अमेरिका हमारे देश से व्यवहार कर रहा है। क्या हमारा स्वभाव बन गया है, कि हम उनके लतियाने को भी अपना अहो भाग्य समझें और उलट कर उनके पैर की मालिश करने लगे कि सरकार चोट तो नहीं लगी।
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा पहले  भारत की यात्रा पर आये अपने सुरक्षा गार्डों तथा सैन्य अधिकारियों  के साथ हमारे देश ने उनका स्वागत किया, स्वागत गीत गाये। प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया तक उनकी हर एक अदा को प्रमुखता से प्रचारित व प्रसारित किया वहीँ जब हमारे देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी जी गए तो उनके ऊपर अमेरिकी राष्ट्रपति ने शराब गिरा दी थी। तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीज जब अमेरिका की यात्रा पर गए तो डलास एअरपोर्ट पर उनकी जामा तलाशी ली गयी और 2003 में रक्षा मंत्री जब ब्राजील जा रहे थे तब भी उनकी तलाशी ली गयी थी और हम आह भी नहीं कर पाए।
 संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के अस्थायी प्रतिनिधि शीर्ष राजनयिक हरदीप पूरी की ह्यूस्टन एअरपोर्ट पर पगड़ी की तलाशी देने के लिए कहा गया। तलाशी न देने पर उनके साथ बदसलूकी की गयी और एक कमरे में अघोषित रूप से कैद कर लिया गया। उनको तब रिहा किया गया जब उनके साथ चल रहे टी.एस.ए अधिकारीयों ने दखल दिया और अमेरिका में भारत की राजदूत मीरा शंकर की अपमानजनक तरीके से तलाशी ली गयी इन दोनों घटनाओ में हम सिर्फ विरोध दर्ज करा कर रह गए। इसके पूर्व भी भारत के नागरिक उड्डयन मंत्री श्री प्रफुल्ल पटेल से शिकागो के एअरपोर्ट पर बदतमीजी पूर्ण तरीके से पूछताछ की गयी थी।
चीन ने यह साबित कर दिया कि वह अमेरिका से किसी तरह से कमजोर नहीं है. अमेरिकियों ने भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम से भी बदसलूकी की थी और भारत नहीं बोला था. अब जब अमेरिका को जवाब मिला है तो उनको महसूस हुआ होगा कि सुरक्षा के नाम पर बदसलूकी जायज नहीं है.


सुमन
लो क सं घ र्ष !

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

चीन समाजवाद या पूँजीवाद की ओर?-2

माओवाद की पृष्ठभूमि
यहाँ एक बात समझने की जरूरत है। अब वे भी खुलकर कहते हैं कि माओ ने 50 से 70 के दशकों में गलत नीतियाँ अपनाईं थीं। आज चीन में माओ कम ही दिखाई पड़ते हैं, हालाँकि उनका सम्मान जरूर है। माओ की देखरेख में लंबी छलांग, कुछ ही वर्षो में कम्युनिज्म लाने और 'सांस्कृतिक क्रांति’ की जो विनाशकारी नीतियाँ चलाई गई थीं, आज चीनी उनकी तीखी आलोचना करते हैं। चीन की उत्पादक शक्तियों का भारी विनाश हुआ था। इसलिए उसने पहले उत्पादन, संचार, आधारभूत संरचनाओं, बिजनेस और बाजार का विकास करने का निर्णय लिया। यह काफी हद तक ठीक है। इससे चीन का विकास अवश्य हुआ है। आज चीन विश्व की शक्तियों में से एक है। जीवन स्तर ब़ा है। चीन आज आधुनिक बदलते विश्व को समझने में सक्षम है। वह ज्यादा आसानी से नई चीजों को अपना रहा है। यह सब अच्छा है। पुराने विचार त्याग दिए जा रहे हैं। विज्ञान, तकनीक, मैनेजमेंट इत्यादि तेजी से अपनाए जा रहे हैं।
माओवाद की आलोचना करते हुए वे कहते हैं कि अब वे ऐसी गलती नहीं दोहराएँगे। वे जनता को खुश देखना चाहते हैं। वक्ताओं ने हमें बताया की "पहले हमारे मातापिता भूखे रहा करते थे, आज कम से कम उन्हें और मुझे पेट भर खाना तो मिल जाता है’. इस पर कुछ कहना काफी दुखदाई था। वे कहते हैं कि ठीक है, पूँजी आ रही है, कुछ लोग धनी बनते जा रहे हैं’ लेकिन सब मिलकर समाज और अर्थतंत्र में सहयोग दे रहे हैं। हम असमानता को आगे चलकर दूर करेंगे। बेकारी, भ्रष्टाचार और महँगाई है लेकिन इससे सामान्य विकास से इन्कार नहीं किया जा सकता, वे कहते हैं।
उन्होंने पुडोंग, शियाँ और बीजिंग में स्पष्ट कहा कि 'देखिए, विचारधारा खाना नहीं देती, आज हमें खाना और खुशहाली मिल रही है।
यदि साम्राज्यवाद का नाम लेने और उसकी आलोचना करने से समस्या हल हो जाए तो क्या बात, लेकिन ऐसा नहीं है। इसलिए अब हम साम्राज्यवाद की बात या उसकी आलोचना नहीं करते। हम जानते हैं कि वह क्या हैं लेकिन सोवियत संघ के समान हम शीत युद्ध में उससे टकराना नहीं चाहते।' हम अमरीका के साथ सभी खतरों में सहयोग और परस्पर दोस्ती कर रहे हैं।' बीजिंग और अन्य जगहों में उनके अंतर्राष्ट्रीय विभाग के नेताओं ने कहा कि 'अमरीका और चीन के बीच के संबंध परस्पर निर्भरता के हैं और वे एक दूसरे से अविभाज्य हैं।'
मार्केट या बजार का यही दशर्न पूरे चीन में काम कर रहा है।
इसे वे यह बताते हैं कि चीन ने 'क्रांति और वर्ग संघर्ष से बाजार और सबको धनी बनाने की नीति की ओर संक्रमण किया है।' यह माओ की पुरानी नीतियों पर चोट थी। लेकिन साथ ही इसमे गंभीर अंतर्विरोध और समस्याएँ भी छिपी हुई हैं। उन्होनें स्पष्ट किया कि वे माओवाद और माओवादियों से अब कोई संबंध नहीं रखते।
बाजारों की यात्रा
वहाँ बाजारों और दुकानों में जाना भी अपने आप में एक प्रकार से शिक्षाप्रद ही है। हमें शंघाई, शियाँ और बीजिंग में कई दुकानों में जाने का मौका मिला। डेलिगेशन के साथी खरीदारी भी करना चाहते थे। वहाँ बड़ेबड़े मॉल हैं जिनके सामने हमारे माल बच्चे लगते हैं। वे पूरी तरह पिश्चमी हैं। उनके अलावा ॔स्वयं कार्यशील’ व्यक्तियों की दुकानें और कारोबार हैं जिनमें आप मोलतोल कर सकते हैं। उनमें से कई निजी बनते जा रहे हैं। फिर पूरी तरह मोलतोल करने वाली दुकानें हैं जिनमें चीजों के दाम बड़ी तेजी से घटाए जा सकते हैं। मिनटों में ही दाम दस गुना कम हो जाते हैं! वे बड़ी ही दिलचस्प दुकानें हैं जिनमें खूब बिक्री होती है। इन दुकानों और बाजारों में निजीकरण की ओर तेज झुकाव साफ दिखाई देता है। उनके अलावा सरकारी दुकानें भी हैं।
चीन का अर्थतंत्र
चीनी विशेषज्ञ अपने देश के अर्थतंत्र को तीन हिस्सों में बाँटते हैं। लगभग 1/3 सरकारी या राजकीय क्षेत्र कहा जा सकता है, इसे वे ॔राज्य स्वामित्व वाले उद्यम’ कहते हैं। इनमें ज्यादातर आधारभूत रचनाएँ आती हैं। अन्य 1/3 हिस्से में वह भाग है जिसे वे ॔स्वयं कार्यशील’ कहते हैं, अर्थात वे जो अपना छोटे पैमाने का कारोबार चलाते हैं। वास्तव में यह हिस्सा भी तेजी से निजी व्यवसाय का रूप धारण करता जा रहा है। बाकी 1/3 बड़े पैमाने का निजी कारोबार है जिसमे मुख्य रूप से बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ, विदेशी और देशी पूँजी के तहत छोटे पूँजीवादी कारोबारी हैं। चीनी अधिकारियों ने हमें बताया की निकट भविष्य में सार्वजनिक या राजकीय क्षेत्र घटाकर 20 प्रतिशत तक पहुँचा दिया जाएगा।
पार्टी की भूमिका
चीन का राज्य अपनी भूमिका में साफ अंतर ला रहा है। वह अन्य हिस्सों खासकर एम0एन0सी0 और एफ0डी0आई0 के लिए अधिक सुचारु परिस्थितियाँ खत्म कर रहा है, जिसे वे साफ खुले तौर पर कहते हैं। पार्टी की इकाइयाँ भी’ सामुदायिक विकास कार्यों’ में लगा दी गई हैं अर्थात वे विशोष आर्थिक क्षेत्रों (सेज) समेत सभी जगहों में आर्थिक विकास आसान बनाने का काम करती हैं। वे इस बात को नहीं छिपाते कि पार्टी का काम आर्थिक विकास और विदेशी निवेश को सुचारु बनाना है। पार्टी की केंद्रीय समिति (सी0सी0) में इस बार 6 अरबपतियों को शामिल किया गया है और धनी तबकों की भूमिका ब़ती जा रही है।
चीनी दस्तावेजों और पत्रपत्रिकाओं में तथा अधिकारियों और नेताओं ने स्पष्ट किया कि वैचारिक सिद्घांत आपको रोटी नहीं देते। उनके प्रकाशित दस्तावेज में लिखा उन्होंने दर्ज किया है चीन की पार्टी में वैचारिक समस्याएँ हैं। इसका कारण उनके अनुसार है 'विचारों की स्पष्टता से अस्पष्टता की ओर गमन, पार्टी में समाजवाद और कम्युनिज्म' से मिश्रित विचारों की ओर विकास, जिनमें 'चीनी विशिष्टताओं का समाजवाद, कन्फ्यूशियन सिद्घांत, सोशल डेमोक्रेसी, राष्ट्रवाद और देशभक्ति, भौतिकवाद और उपभोक्तावाद शामिल हैं'। फलस्वरूप, 'वाद शक्तिहीन हो चुका हैं'। (देखिए सेलअप, शंघाई, के दस्तावेज) कन्फ्युशियन और बुद्घा का उन्होंने कई बार उल्लेख किया। वर्तमान नेताओं का कई बार नाम लिया। ॔माक्र्स के विचारों की बात की’ (माक्र्स की नहीं), माओ का भी उल्लेख आलोचनाओं सहित किया। अखबारों में स्टॉक बाजार के इंडेक्स रोज छपते हैं। साथ ही ग्रहनक्षत्रों के आधार पर भविष्यवाणियाँ भी छपती हैं। पूछे जाने पर बताया गया कि 'इसकी हमारे लोगों में माँग बहुत है'!
आम चीनी आदमी बहुत मेहनती है। काम कर रही है। हमें बताया गया की उसकी स्थिति बेहतर हुई है और गरीबी कम हुई है। यह हो सकता है, लेकिन साफ था कि एक चीनी व्यक्ति अपनी रोजमर्रा की जिंदगी बसर करने के लिए काफी ज्यादा मेहनत करने पर मजबूर है। चीजें आम तौर पर महँगी कही जाएँगी। मुद्रास्फीति ब़ती जा रही है।
ऐतिहासिक स्थलों की यात्रा
हमारी यात्राएँ बड़ी सुंदर और शानदार रहीं। चीनियों ने बड़े ही सुंदर और सुचारु तरीके से रहने खाने और घूमने तथा बातचीत के कार्यक्रम आयोजित किए। प्रश्नों का बड़े ही धैर्य से जवाब दिया। वे समझते थे कि हमें कौन से सवाल परेशान कर रहे हैं।
हमनें बीजिंग से दो घंटे की दूरी पर दुनियाँ के सात आश्चर्यों में एक चीन की दीवार की यात्रा की। यह बड़ा ही सुखद अनुभव रहा। दीवार विशाल है और उसे देखने के कई प्वाइन्ट या जगहें हैं। बड़ी संख्या में भारतीयों समेत यात्री आते हैं।
फिर टी0एन0 में चौक, माओ का समाधि स्थल जहाँ उनका शरीर रखा हुआ है, ॔फॉरबिडन सिटी’ जो एक ऐतिहासिक महल है और कुछ अन्य जगहें देखीं।
इससे पहले शायन में 2200 वर्ष पुराने 6000 सैनिकों की मिट्टी और पत्थर से बनी मूर्तियों का क्षेत्र देखा। यह अत्यंत ही शिक्षाप्रद रहा। एक अन्य म्यूजियम में चीन का पूरा इतिहास देखने का अवसर मिला।
शियाँ के पास अतिसुंदर मॉडल ग्राम देखा जहाँ एक हजार किसान रहते हैं और जहाँ 160 मॉडल फ्लैट दो मंजिल वाले बने हुए हैं। वहाँ कुछ किसान पेंटिंग भी करते हैं। जाहिर है कुछ अति सुंदर पेंटिंग्स भी खरीदी। उनकी चित्रकारी बेहद शोभादार होती है।
विकास और भविष्य
इसमे शक नहीं की चीन बड़ी तेजी से बदलता और विकास करता जा रहा है। अब सवाल है कि वह जा किधर रहा है। मुझे ऐसा महसूस हुआ कि इसकी उन्हें बहुत चिंता कम से कम अभी नहीं है। कई सारे सवाल और समस्याएँ वे भविष्य के लिए रखे हुए हैं। अभी उन्हें इस बात की चिंता है कि उत्पादन और आधुनिकीकरण तेजी से हो, शहरीकरण द्रुत गति से हो और चीन विकसित देशों की पाँत में आ जाए, लोग खासकर युवाओं के लिए सभी आधुनिक सुख सुविधाएँ हों, शंघाई जैसे शहर और बसाए जाएँ, चौड़ी सड़कें, फ्लाइओवर, द्रुत रेलें, एक्सप्रेस रोड हों। शाम के वक्त चीन के शहर ऐसे जगमगाते हैं जैसे दीवाली हो।
इन सबके बीच ऐसा लगता है कि वैचारिक और समाजवाद के प्रश्न उन्होंने भविष्य के लिए रखे हुए हैं : 'देखा जाएगा', यह है रुख। यह कैसे होगा इसका कोई जवाब अभी वे देना नहीं चाहते। यदि सचमुच समाजवाद की ओर जाना चाहते हैं वे। अभी समाजवाद या पूँजीवाद का प्रश्न पृष्ठभूमि में है। साथ ही यह भी विवादस्पद प्रश्न है कि आज जो विकास हो रहा है, क्या वह पूँजीवाद को ब़ावा दे रहा है? क्या इतने बड़े पैमाने पर बड़ी पूँजी और एम0एन0सी0 के बगैर विकास नहीं हो सकता है? इसमे शक नहीं कि कुछ पूँजी की जरूरत है लेकिन इसके लिए छोटी और मँझोली पूँजी से सहयोग किया जा सकता है और विशाल मल्टीनेशनल से बचा जा सकता है।
इन सारे सवालों पर अभी चीनी अधिकारी और नेता कुछ कहना नहीं चाहते हैं। वे अपने विकास को ॔समाजवाद की प्राथमिक मंजिल बताते हैं जो कम से कम 2050 तक चलेगी'। वे इसे ॔चीनी रंग का समाजवाद’ भी कहते हैं।’ यह सब 'किधर जा रहा है' इसकी चिंता उन्हें होती नहीं दिखती है।
इस बीच वे तेज विकास करना चाहते हैं और बड़ी शक्ति बनना चाहते हैं, चाहे जैसे भी हो। 
  -अनिल राजिमवाले
मो0 09868525812


रविवार, 30 दिसंबर 2012

चीन समाजवाद या पूँजीवाद की ओर?-1

अभी हाल में पिछले महीने एक राजनैतिक प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में चीन जाने का मौका मिला. यह चीन को देखने और समझने तथा वहाँ के ऐतिहासिक स्थलों को देखने का सुनहरा अवसर था। हम मुख्यतः तीन जगहों पर गए शंघाई, शियाँ और बीजिंग तथा एकाध ग्रामीण जगहों पर। शंघाई बहुत पुराना व्यापारिक शहर है और आज तो वह अत्यंत ही विशाल बन गया है। उसकी आबादी ाई करोड़ से ज्यादा ही है. हमें वहाँ के पूर्वी और अधिक विकसित हिस्से, पुडोंग, में रहने और घूमने का अवसर मिला। पुडोंग मात्र पिछले तीन दशकों में विकसित हुआ है। पहले यह एक ग्रामीण और दलदल वाला इलाका था। आज यह गगनचुंबी इमारतों से भरा हुआ है। यदि नदी के एक ओर खड़े हो जाएँ तो दुनियाँ के विशालतम टॉवरों की लाइन दिखाई देगी। उनमे से एक में हम गए जो विश्व की तीसरी सबसे ऊँची इमारत है। उसके 283 वें मीटर पर से शंघाई का अविस्मरणीय दृश्य दीख पड़ता है। शाम की गोधूलि बेला में घुमावदार नदियों के दोनों ओर ऊँची और दमकती बिल्डिंगें चकाचौंध करने को काफी हैं। पुडोंग उपनगर में 50 लाख लोग रहते हैं।
शंघाई, पुडोंग, शियाँ और बीजिंग जहाँ कहीं हम गए, चौड़ी सड़कें, तेज भागती विदेशी कारें, सार्वजनिक और निजी दुकानें और यातायात के साधन दिखाई दिए। सफाई की तारीफ करनी होगी, क्या मजाल की कागज का एक टुकड़ा भी दीख जाए। मैंने इसे एक विशोष मुद्दा बना रखा था और मुझे शायद ही कहीं कोई कागज दिखाई पड़ा हो। हाँ, एक मॉडल ग्राम में मात्र एक स्थल पर एक कूड़े का ेर जरूर मिला, शायद गलती से। इससे यह नतीजा नहीं निकालना चाहिए कि सारा चीन ऐसा ही है। इसके विपरीत भी सुन रखा है, गंदगी इत्यादि के बारे में। ट्रॉफिक बहुत अनुशासित है।
पुडोंग अकाडमी में
हम यहीं ठहरे थे। इसका पूरा नाम है चीन एग्जीक्युटिव लीडरिशप अकाडमी पुडोंग अर्थात ॔सेलअप’। बहुत बड़ी अकाडमी है जो हमारे आई0आई0टी0, बिजनेस मैनेजमेंट और राजनैतिक स्कूलों का मिलाजुला रूप है। पिश्चमी सभ्यता और संस्कृति अपनाने की पूरी कोशिश दिखाई पड़ती है। साथ ही पिश्चमी मैनेजमेंट, तरीके और नाम भी। वहाँ हमने कई विद्वानों से मुलाकात की, उनसे बातचीत की और सवाल जवाब किए तथा लेक्चर भी सुने। फिर ेर सारे सवाल दागे जो स्वाभाविक ही था। उन्होंने बड़े ही धैर्य के साथ जवाब दिया।
उन्होंने तथा अन्य जगहों पर राजनैतिक एवं सरकारी नेताओं ने कई बातें साफ कीं। साम्राज्यवाद, पूँजीवाद, समाजवाद, बाजार, अमीरों की संख्या में वृद्धि, अरबपतियों का विकास, बेकारी, मुद्रास्फीति वगैरह के बारे में खुलकर बातें हुईं। हमें वहाँ का ॔सेज’ तथा मुक्त व्यापार केन्द्र भी दिखाया गया। चीन में अन्य जगहों में भी हमने निजी संस्थाएँ देखीं सुनीं। निजी बाजारों और दूकानों में भी गए।
बड़े पैमाने पर बाजार अर्थव्यवस्था का विकास
उन सभी ने स्पष्ट कर दिया कि आज और अभी चीन का सारा जोर बाजार अर्थतंत्र के विकास पर है। यदि कोई चीन में ॔समाजवाद’ के स्पष्ट चिह्नों को पाने की कोशिश करता है तो उसे निराशा ही हाथ लगेगी। हम अपने देश में कई जिन बातों का विरोध करते हैं या उनके बारे में संशय प्रकट करते हैं, वे सारी चीजें चीन में धड़ल्ले से लागू की जा रही हैं।
आज चीन में मार्केट’ या बाजार शब्द सबसे आम शब्द है। मार्केट, खुशहाली, धनी बनो’ (गेट रिच), इत्यादि जैसी बातें प्रमुखता से की जाती हैं। चीन के बड़े शहरों, खासकर समुद्री किनारे के इलाकों पर स्थित शहरों में विदेशी पूँजी बड़े पैमाने पर बुलाई जा रही है, उन्हें विभिन्न प्रकार की सुविधाएँ दी जा रही हैं, और तरहतरह से लुभाया जा रहा है। चीनी अधिकारियों, नेताओं और विद्वानों का कहना है अभी उन्हें तेज विकास और खुशहाली की जरूरत है ताकि लोग बेहतर जीवन बिता सकें। इसके लिए डब्लू0टी0ओ0 में शामिल होने के बाद चीन ने विशोष तौर पर अपना देश खोल दिया है।
केवल पुडोंग में जहाँ 1990 में केवल मुट्ठी भर विदेशी कम्पनियाँ थीं आज उनके प्रतिष्ठानों की संख्या ब़कर 20 हजार से  अधिक हो गई हैं। जहाँ विदेशी पूँजी उस क्षेत्र में केवल 3 करोड़ 40 लाख डॉलर का निवेश था, आज यह ब़कर 53 अरब डॉलर तक पहुँच गया है। केवल पुडोंग में ही 500 विदेशी मल्टी नेशनल कम्पनियाँ, अर्थात बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ आज बिजनेस कर रही हैं : यह बात उन्होंने उस क्षेत्र के एग्जीविशन में बड़े ही गर्व के साथ बताईं। इसे सुनकर हम दंग रह गए। इतना ही नहीं, अरबपतियों की संख्या आज ब़कर 50 के नजदीक पहुँच रही है। अभी हाल के चीनी कम्युनिस्ट पार्टी महाधिवेशन में चुनी गई केंद्रीय समिति में 6 अरबपति शामिल किए गए हैं।
जब हमनें उनसे पूछा कि इससे आपको खतरा नहीं है तो उन्होंने जवाब दिया कि आज चीन को उनकी जरूरत है। अरबपति और धनी होना 'बुरी बात नहीं है', उनका जवाब था। कैसे? क्योंकि वे चीनी अर्थव्यवस्था के विकास में सहयोग कर रहे हैं। चीनी समाज उनके अनुसार सौहार्द्र पूर्ण विकास कर रहा है जिसमें वर्ग संघर्ष की कोई गुँजाइश नहीं है। वे कहते हैं कि हम धनियों को नियंत्रित कर लेंगे।
असल में वे चीन के विकास को 'समाजवादी बाजार अर्थतंत्र' बताते हैं। उनके अनुसार चीन का समाजवाद विकास की प्राथमिक मंजिल में है जो कम से कम सन 2050 तक चलेगा। उसके बाद ही अन्य बातों पर विचार हो सकेगा।
जाहिर है, ऐसी बातें पचा पाना हमारे लिए जरा मुश्किल ही है। इसमें कोई शक नहीं कि चीन में आर्थिक विकास बहुत हो रहा है। उसके विकास की दर विकासमान देशों में सबसे ज्यादा, 6.5 प्रतिशत है। यह आँकड़ा विश्व मंदी और दूसरे कारणों से 9 प्रतिशत से घट गया है। सड़कें, फ्लाईओवर, रेलें,
आधारभूत संरचनाएँ इत्यादि बहुत विकसित हैं। सड़कें साफ सुथरी हैं, जिन पर भारी संख्या में वाहन दौड़ रहे हैं।
लेकिन क्या गरीब भी नहीं ब़ रहे है? क्या सुदूर ग्रामीण इलाकों में ऐसी ही सुविधाएँ हैं और सबको हैं? हमें इस पर संदेह है। वे भी नहीं छिपते, एक आँकड़े पर गौर कीजिए। सन 2010 में समूचे चीन में ग्रामीण से शहरी इलाकों की ओर 25 करोड़ से अधिक लोगों का माइग्रेशन (प्रवास) हुआ जिससे प्रवासी मजदूरों की संख्या में बड़ी वृद्धि हुई। उनके खाने पीने, रहने, पॄाई, इत्यादि का जाहिर है इंतजाम पूरा नहीं हो पाया है, और इस पर हमने पूछा तो उन्होंने कोई बहुत संतोषजनक और साफ जवाब नहीं दिया। साथ ही यह भी पष्ट है कि वे अब कम छिपाते हैं या छिपाने की क्षमता रखते हैं। आपको गरीबी जहाँतहाँ दिख ही जाएगी।
हम यह नहीं कहते की जादू की छड़ी के समान सबकुछ छूमंतर हो जाएगा। लेकिन बड़ी विदेशी कम्पनियों की भारी पैमाने पर पूँजी का आना, चीनी पूँजीपतियों को ब़ावा देना और भी इतने बड़े पैमाने पर, अरबपतियों को छूट देना इत्यादि, समाजवाद की आरंभिक मंजिल’ से भी मेल नहीं खाता है। हम कुछ पूँजी का आना समझ सकते है। सारा विकास देश के अंदर ही और बिना पूँजी के नहीं हो सकता है। लेकिन आप भविष्य में इन विशाल बड़े पूँजीपतियों को समाजवाद की ओर कैसे मोड़ेंगे? उत्तर वहाँ तो नहीं मिला।
-अनिल राजिमवाले

शनिवार, 17 नवंबर 2012

कुपोषण व भुखमरी का अंत नही


विश्व भूख सूचकांक में भारत
सुनील दत्ता
1995 - 96 के बाद से पिछले 16 - 17 सालो में इसमें कोई सुधार नही हुआ | 1996 में  इसके भूख सूचकांक का स्कोर 22.6 था | अब 2012 में इसका 65 वे पायदान पर रहकर इसके सूचकांक का स्कोर 22.9 है
विश्व भूख सूचकांक  में शामिल कुल 79 देशो में भारत 65 वे नम्बर पर है | साफ़ है कि भारत विश्व के भूख से सर्वाधिक पीड़ित देशो में से एक है | केवल 14 देश इससे ज्यादा पीड़ित है | इससे उपर के विकसित , विकासशील व पिछड़े देशो की स्थिति भारत से बेहतर है | भारत के पडोसी देशो में बंगला देश को छोड़कर बाकी सभी देशो की -- लंका , पाकिस्तान , नेपाल की स्थिति भारत से बेहतर है | बांग्ला देश 68 वे नम्बर पर अर्थात भारत से तीन अंक नीचे है तो नेपाल 60 वे नम्बर पर , पाकिस्तान 57 वे नम्बर पर और लंका 37 वे नम्बर से क्रमश: 5 अंक 8 अंक और 28 अंक उपर है | फिर इसके अलावा हर समय चीन के आर्थिक वृद्धि व विकास की तुलना और उसे अपना प्रमुख प्रतियोगी बताने के वावजूद भूख की स्थिति में भारत और चीन की स्थिति में भारी अंतर है | चीन सूची में लगभग भुखमुक्त देश के रूप में दुसरे नम्बर पर है , अर्थात भारत से 63 अंक उपर है |
फिर मामला केवल विश्व भूख सुचाकांक में कितना उपर या नीचे के रैंक या नम्बर का ही नही है , बल्कि उसकी गिरती व चढती दशा का भी है | बहुतेरे देशो का रैंक चढती दिशा का भी है | अर्थात पहले वे विश्व भूख सुचाकांक में काफी निचले पायदान पर थे , पर अब उन्होंने अपने देशो में भूख की स्थिति में कुछ सुधार और वह भी उत्तरोत्तर सुधार हासिल किया है | यहाँ तक कि अफ्रीका के अत्यंत पिछड़े देशो की स्थितियों में भी कुछ सुधार हुआ है | पर भारत की स्थिति में कोई सुधार नही हुआ है | सूचनाओं के अनुसार 1995-- 96 के बाद से पिछले 16 -- 17 सालो में इसमें कोई सुधार नही हुआ है |1996 में इसके भूख सुचाकांक का स्कोर 22.6 था |अब 2012 में इसका 65 वे पायदान पर रहकर इसके सूचकांक का स्कोर 22.9 है |
अहम सवाल है कि देश के बहुप्रचारित  तीव्र आर्थिक वृद्धि व विकास के इस दौर में राष्ट्र में भूख कुपोषण की स्थिति में सुधार हुआ क्यों नही  ?  वह ज्यो का त्यों क्यों कर रह गया |
लेकिन इस सवाल पर आने से पहले यह जान लेना बेहतर रहेगा कि बिश्व भूख सूचकांक के लिए किसी देश में कुपोषित व अल्प पोषित स्थिति का निर्धारण प्रमुखत: देश के बच्चो के औसत से कम वजन ,, तथा शिशु मृत्यु दर की स्थितियों से निर्धारित किया जाता है | बात भी ठीक है , कयोंकि भूख व कुपोषण से नवजात शिशुओ से लेकर 5 -- 6 साल के बच्चो का सर्वाधिक प्रभावित होना एकदम स्वाभाविक है और इसे प्रत्यक्ष: देखा व समझा जा सकता है | कयोंकि गर्भावस्था से लेकर बच्चो की यह प्रारम्भिक अवस्था उनके सर्वाधिक तीव्र शारीरिक वृद्धि एवं मानसिक विकास की होती है | इसीलिए भूख व कुपोषण का प्रभाव भी उन पर सबसे ज्यादा व गहरा होता है | विश्व भूख सूचकांक को  इंटरनेशनल फ़ूड पालिसी रिसर्च इंस्टीटयूट द्वारा तैयार व जारी कराया जाता है | दिलचस्प बात यह भी है कि भूख , कुपोषण के इस व ऐसे अन्य आंकड़ो का वास्तविक इस्तेमाल अब किसी राष्ट्र व समाज से भूख व कुपोषण मिटाने की दिशा में लक्षित नही रह गया है | इसकी जगह उसका वास्तविक इस्तेमाल राष्ट्र व समाज में भूख व गरीबी की इन स्थितियों को दिखाकर ऐसे आर्थिक नीतियों सुधारों को लागू करना हो गया है , जो भूख कुपोषण तथा अभाव गरीबी की समस्याओं से मुक्त धनाढ्य , उच्च एवं सुविधा प्राप्त मध्यम वर्गियो की सेवा कर रही है | उनकी धनाढ्यता उच्च्त; एवं सुख सुविधा को बढाती जा रही है | साथ ही आम समाज में सर्वाधिक निम्न वर्ग को तथा अधिकाँश निम्न मध्यम वर्गियो को बढती महगाई , बेकारी , अभाव , गरीबी , भुखमरी , कुपोषण के गर्त में ढकेलती जा रही है |
यही कारण है कि इस देश में 1995 -- 96 से लेकर 2012 तक के 17 सालो के दौरान आर्थिक वृद्धि एवं विकास की रफ़्तार तेज होने के वावजूद भूख सूचकांक की स्थितियों में कोई बदलाव नही हुआ है |
इस बीच शासकीय एवं प्रचार माध्यमी बयानों प्रचारों के जरिये यह भी समझाया जाता रहा है कि देश के जनसाधारण में मौजूद अभाव भूख एवं कुपोषण को दूर करने के लिए इन आर्थिक सुधारों को लागू किया जाना और इसका फल जनसाधारण तक पहुंचाया जाना जरूरी है | लेकिन यही नही होना था और हुआ भी नही | कयोंकि इन नीतियों प्रस्तावों के जरिये जनसाधारण की स्थितियों में वास्तविक एवं स्थायी सुधार की जगह उसका कटाव -- घटाव होना था और वह होता भी रहा | उसे अधिकाधिक संकटों में ढकेलता जाता रहा | साधनहीन व अधिकारहीन बनाने का काम किया जाता रहा | भूख सूचकांक में भारत की स्थिति की सूचना देते हुए प्रचार माध्यमी विद्वान् यह देना नही भूले है कि इन वर्षो में भारतवासियों की औसत आय दो गुनी हो गयी है | जबकि प्रचार माध्यमी व हुकुमती हिस्से यह बात बखूबी जानते है कि इस औसत में 10% धनाढ्य एवं उच्च वर्ग के खरबपतियों , अरबपतियो व करोडपतियो  की आय तथा 15% मध्यम व्र्गियो के लाखो की आय तथा लगभग 75% जनसाधारण का नगण्य ( हजार या सैकड़ो की आय ) का औसत शामिल है |
इस सच्चाई के वावजूद राजनितिक तथा विद्वान् इस औसत के जरिये समूचे देशवासियों की आमदनी दुगनी बताने से बाज नही आते !! यह जनसाधारण के साथ धोखाधड़ी नही तो और क्या है  ? इनके इस रुख -- रवैये से हुकुमती व प्रचार माध्यमी हिस्सों द्वारा देश में भूख व कुपोषण की स्थितियों पर रोना रोने की सच्चाई को भी समझा जा सकता है | तेज आर्थिक वृद्धि से देश में गरीबी , भुखमरी दूर करने के झूठे प्रचारों को भी समझा जा सकता है | इसे सबूत के रूप में खाद्यान्नों के भंडार भरे रहने के वावजूद उसके वितरण में किये जाने के प्रति उपेक्षा को भी देखा व समझा जा सकता है | फिर इसका सबसे बड़ा सबूत भुखमरी मिटाने के लिए आवश्यक कृषि क्षेत्र पर चौतरफा बढाये जा रहे संकतो से और संकट ग्रस्त होते तथा आत्म हत्या करते किसानो के रूप में भी देखा व समझा जा सकता है |
इस देश के हुक्मरान व प्रचार माध्यमी स्तम्भ भी जानते है कि गरीबो को सस्ता अनाज दे देने मात्र से उनकी कुपोषण व भुखमरी का अंत नही होता है | इसके वावजूद वे इसे व अन्य सामाजिक सेवाओं को ही अभाव व भुखमरी से पीड़ित  जनसाधारण का इलाज मानते व बताते रहे है | लेकिन क्यों ? ताकि अभाव गरीबी भूख एवं कुपोषण से पीड़ित होते जा रहे तथा जनसाधारण को यह लगे कि उनकी समस्याओं पर चिंताए हो रही है | उसके लिए फौरी व दूरगामी समाधान निकालने का प्रयास किये जा रहे है | यह जन शाधारण के साथ गरीबी , भूख , कुपोषण से पीड़ित जन समुदाय के साथ नौनिहालों व बच्चो के साथ की जा रही धोखाधड़ी है | धनाढ्य वर्गीय तथा जनविरोधी नीतियों सुधारों के जरिये जनसाधारण के व्यापक हिस्से को अधिकाधिक गरीबी भुखमरी व कुपोषण की तरफ ढकेलनेकी चलाई जा रही प्रक्रिया है | साथ ही उन्हें भूख , कुपोषण से मुक्त कराने देने के प्रचारों की धोखाधड़ी भी है
-सुनील दत्ता 
पत्रकार

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

चीन के बहाने अमेरिकी युद्धोन्माद


प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया में अक्सर चीन की सैन्य तैयारियों के सम्बन्ध में समाचार आते रहते हैं और युद्ध को लेकर तमाम तरह की अटकलबाजियां भी सुनाई देती हैं और हद तो तब हो गयी कि जब पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बुश ने कहा कि अमेरिका है चीन का पहला निशाना, इसके बाद भारत का नंबर। अमेरिकी साम्राज्यवादियों का हित इसीमें है कि भारत और चीन में अगर युद्ध हो जाए तो उसकी बिगड़ी हुई आर्थिक स्तिथि में सुधार आ सकता है और यह दोनों विकास शील देशों कि अर्थव्यवस्था लुंज-पुंज हो जाएगी। इसी उद्देश्य से अमेरिकी मीडिया और उसके समर्थक भारतीय मीडिया के लोग युद्ध उन्माद पैदा करने कि कोशिश में लगे रहते हैं।
1962 के चीन-भारत युद्ध के बाद हजारों किलोमीटर लम्बी सीमा पर भारतीय सैनिको व चीनी सैनिको कि झड़पें नहीं होती हैं और एक शांति का वातावरण बना रहता है भारत को अधिकार है कि अपनी सीमाओं कि सुरक्षा हेतु सभी तैयारियां रखनी चाहिए और हमारा देश इसको करता रहता भी है। चीन भी अपनी सीमाओं को सुरक्षित बनाने के लिये रोटीन वे में कार्य करता रहता है। पिछला युद्ध भी हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारों के समय हुआ था और उस युद्ध का मुख्य कारण सी.आइ.ए की तिब्बत में जारी गतिविधियाँ थी। जब अमेरिकी साम्राज्यवाद की मुख्य दुश्मन श्रीमती इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री थी तब भारत में अशांति फ़ैलाने के लिये सी.आइ.ए सिक्किम में षड्यंत्र कर रहा था और भारत सरकार ने समय रहते ही सैनिक कार्यवाई कर वहां के राजा चोग्याल को पद्युचुत कर दिया था। आज भी देश के अन्दर चल रही आतंकी घटनाओ के पीछे कहीं न कहीं प्रत्यक्ष-प्रत्यक्ष रूप से अमेरिकी साम्राज्यवादियों का ही हाथ है। चीन भारत का स्वाभाविक मित्र है, अमेरिका कभी भी हमारा मित्र नहीं रहा है न ही हो सकता है। हमने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़कर स्वतंत्रता प्राप्त की है और अब अमेरिकी साम्राज्यवाद से निपटना पड़ेगा अन्यथा हमारी आर्थिक ताकत को बर्बाद करने के लिये यह तरह-तरह के हथकंडे अपनाता रहेगा। इसलिए भारत और चीन दोनों के हित में यह है कि युद्ध किसी भी कीमत पर न हो और यह युद्ध नही होगा।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

भूमि अधिग्रहण पर विश्व बैंक का किसान विरोधी सुझाव


दैनिक जागरण एक जून के अंक में " खेती की खतरनाक खरीद के नाम से प्रकाशित लेख में कृषि नीतियों के विशेषज्ञ लेखक देवेद्र शर्मा ने एक महत्त्वपूर्ण सुचना दी है | यह कि , 2008 में विश्व बैंक ने अपनी विश्व विकास रिपोर्ट में यह कहा है कि - " भूमि भुत महत्त्वपूर्ण संसाधन है , किन्तु वह ऐसे लोगो के ( यानी किसानो ) के हाथो में संकेंद्रित है , जो उनका कुशलता से उपयोग नही कर पा रहे है | इसलिए भूमि को बड़े संसाधन को उन लोगो के दे दिया जाना चाहिए जो उसका कुशलता से उपयोग कर सके | लेखक ने इसका मतलब स्पष्ट करत हुए कहा कि विश्व बैंक के सुझावों के अनुसार भूमि संसाधन का कुशलता पूर्वक उपयोग करने कि क्षमता पूंजी विहीन , अभाव ग्रस्त , किसानो के पास नही बल्कि आधुनिक संसाधनों से सम्पन्न धनाढ्य लोगो के ही पास है | इसलिए किसानो कि खेती अर्थात विशालकाय कम्पनियों द्वारा संचालित नियर्त्रित खेती में बदल दिया जाना चाहिए | लेखक ने आगे बताया है की इन्ही सुझावों के अनुसार काम भी किया जा रहा है | किसानो को जमीन से बेदखल करने और उसे धनाढ्य हिस्सों को सौपने की प्रक्रिया लम्बे समय से चलाई जा रही है | इस देश में ही नही बल्कि अन्य पिछड़े देशो में भी येही प्रक्रिया चलाई जा रही है |
पड़ोसी देश चीन में भी वंहा की सरकार द्वारा भूमि - अधिग्रहण के जरिये भारी संख्या में किसानो की कृषि भूमि से बेदखली किया है | यह सब देश की जनतांत्रिक कंही जाने वाली सत्ता - सरकार द्वारा धनाढ्य एवं उच्च तबको के हितो , स्वार्थो की अन्धाधुन पूर्ति के लिए एकदम नग्न रूप में किसानो विरोधी , जनविरोधी चरित्र अपना लेने का सबूत है की विश्व बैंक के सुझावों के अनुरूप ही सत्ता - सरकारे कृषि भूमि को किसानो से चिनकर उसका अधिकाधिक कुशलता से उपयोग करने वाली धनाढ्य कम्पनियों को सौपने को तैयार है | हमारे देश के कई विद्वान एवं उच्च स्तरीय अर्थशास्त्री भी येही बात कर रहे है | जाहिर सी बात है की विद्वान अर्थशास्त्री की यह बात उनकी अपनी सोच नही है | बल्कि वह धनाढ्य कम्पनियों की वकालत मात्र ही है | यह वकालत प्रचार माध्यमी जगत में भी इस रूप में चलती रही है कि , " विकास के लिए जमीन कि आश्यकता से इनकार नही किया जा सकता |
उद्योग , वाणिज्य , व्यापार , यातायात , संचार आदि के विकास विस्तार के लिए जमीनों की आश्यकता से इनकार नही किया जा सकता | तीव्र विकास के वर्तमान दौर में भूमि और कृषि भूमि के अधिकाधिक अधिग्रहण की आश्यकता से इनकार नही किया जा सकता | इन पाठो , प्रचारों के साथ किसानो से जमीने चिनकर उन्हें धनाढ्य कम्पनियों के देने में विश्व बैंक , देश व् विदेश के उच्च कोटि के अर्थशास्त्री गण देश की केन्द्रीय प्रांतीय सरकारे तथा प्रचार माध्यम जगत के बहुसख्यक हिस्से एक जुट है | इनके पीछे देश - दुनिया के धनाढ्य कम्पनिया खड़ी है और उनका वरदहस्त इनके उपर है | आधिनिक विकास के लिए किसानो और गावो की विनाश करना इनका प्रमुख लक्ष्य बन गया है |
अत : किसानो द्वारा भूमि अधिग्रहण के विरोध में जगह - जगह चलाया जा रहा आन्दोलन केवल ' अपनी जमीन बचाओ ' अपना गाव बचाओ ' आन्दोलन के रूप में ख्त्न नही हो जाना चाहिए | बल्कि यह देश - प्रदेश के गाव बचाओ किसान बचाओ के रूप में आगे बढ़ जाना चाहिए | प्रदेश व्यापी , देश व्यापी हो जाना चाहिए अधिकाधिक संगठित एवं एकताबद्ध हो जाना चाइये | फिर इस विरोध को भूमि अधिग्रहण के विरोध तक ही सिमित नही रहना चाहिए | बल्कि सरकार के जरिये भूमि का मालिकाना पा रही कम्पनियों के विरोध के रूप में भी आगे बढना चाहिए | चुकी भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया वैश्वीकरणवादी निजीकरण वादी नीतियों का अहम हिस्सा है | इन नीतियों के तहत निजी लाभ मालिकाना बढाने की छुट पाते रहे धनाढ्य एवं उच्च तबको के कृषि भूमि पर मालिकाने का बढ़ाव विस्तार है | इसलिए किसानो एवं ग्रामवासियों को इस बात को जरुर जानना समझना चाहिए की भूमि अधिग्रहण के विरोध के लिए वैश्वीकरणवादी तथा निजीकरणवादी नीतियों का विरोध अत्यंत आश्यक है | अपरिहार्य है |खाद्यानो की बढती महगाई की मार सहते जा रहे गैरकृषक जन साधारण हिस्से को भी इस विरोध इस विरोध में किसानो के साथ होना चाहिए ............... जागो -जागो कब तक सोते रहोगे लोगो .........

' थका पिसा मजदूर वही दहकान वही है |
कहने को भारत , पर हिन्दुस्तान वही है ||

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

गुरुवार, 19 मई 2011

चीन ने अमेरिका से कहा वह पाकिस्तान से दूर रहे

यह दोस्ती भी रंग लाएगी

विगत दिनों अमेरिका ने पाकिस्तान को बगैर किसी सूचना दिए। एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन को मारकर उसकी लाश समुद्र में डाल दी थी। इस प्रकरण के बाद पाकिस्तान की संप्रभुता व एक स्वतन्त्र देश की हैसियत को काफी गहरा धक्का लगा था। पाकिस्तान को अब अपनी हैसियत का एहसास अमेरिकन साम्राज्यवाद के द्वारा उठाये गए कदमो के बाद हुई है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी चीन यात्रा पर गए हैं। चीन की भी आवश्यकता है कि वह पाकिस्तान को अपने साथ रखे चीन ने सीधे-सीधे यहाँ तक कहा है कि अमेरिका पाकिस्तान से दूर रहे और पाकिस्तान पर कोई हमला करता है तो वह हमला चीन पर माना जायेगा।
जियाबाओ ने कहा, 'मुझे विश्वास है हमारी इस मुलाकात से दोनों देशों के दोस्ती के रिश्ते और संबंध और मजबूत होंगे। चीन पाकिस्तान में परमाणु ऊर्जा के संयंत्र लगाकर और उसे लड़ाकू विमान शीघ्र से शीघ्र बेचकर दक्षिण एशिया में पाकिस्तान की स्थिति मजबूत करना चाहता है और अमेरिका को अपनी ताकत दिखाना चाहता है।
भारत आजादी के बाद से अमेरिकन गुट से अलग रहा है इसीलिए उसकी स्तिथि मजबूत रही है। पकिस्तान अपनी आजादी के बाद से ही अमेरिका का पिछलग्गु देश रहा है इसीलिए आज उसको अपनी इज्जत बचाने में भी लाले लग रहे हैं। आज वक्त की जरूरत है कि भारत, पाकिस्तान चीन को अच्छे पडोसी के रूप में रहने की आदत डालनी चाहिए और अगर तीनो देश मिलजुल कर काम करें तो बहुत सारा रुपया जो रक्षा सौदों में खर्च हो जाता है वह इन देशों के विकास में खर्च हो सकता है भारत, पाकिस्तान चीन दुनिया की एक बड़ी ताकत भी बन सकते हैं

सुमन
लो क सं घ र्ष !

मंगलवार, 22 मार्च 2011

नाटो भारत पर भी हमला करेगा.............?

मानवता की रक्षा हेतु

विश्व में साम्राज्यवादी शक्तियां बड़ी बेशर्मी के साथ एशिया के मुल्कों को गुलाम बनाने का कार्य कर रही हैं। जब इनकी कठपुतली संयुक्त राष्ट्र संघ ने किसी देश के ऊपर हमला करने की बात होती है। तो भारत, चीन, रूस, ईरान सहित कई मुल्क संयुक्त राष्ट्र संघ में अनुपस्थित हो जाते हैं और जब नाटो की सेनायें कार्यवाई शुरू कर देती हैं तो यह घडियाली आंसू बहाने शुरू कर देते हैं। चीन लीबिया में जारी घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं और लीबिया में जो हो रहा है उसपर अफसोस जाहिर करता है। चीन ने अपने बयान में लीबिया में विद्रोहियों और गद्दाफी सेनाओं के बीच जारी संघर्ष के सीज फायर की मांग भी नहीं की है और कहा है कि चीन उत्तरी अफ्रीका के स्वतंत्र राष्ट्र लीबिया की स्वतंत्रता, स्वप्रभुता और एकता का सम्मान करता है। बयान में कहा गया है कि हम उम्मीद करते हैं कि जल्द ही लीबिया में जारी संघर्ष थम जाएगा और नागरिकों को सुरक्षा प्रदान की जाएगी। ईरान ने इन हमलों की निंदा करते हुए कहा है कि लीबिया के तेल पर कब्जा करने का पश्चिमी देशों का यह घिनौना अपराध है। हालांकि ईरान ने लीबिया में गद्दाफी के विरोध में हो रहे प्रदर्शन का समर्थन करते हुए कहा है कि यह गद्दाफी के खिलाफ इस्लामिक क्रांति है। ईरान ने यह भी कहा है कि लीबिया के लोगों को पश्चिमी देशों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। वो अपने खास मकसदों को हल करने के लिए उनके साथ होने का दिखावा कर रहे हैं।
रूस ने भी लीबिया पर हुए मिसाइल हमलों की निंदा करते हुए कहा दोनों ओर से तुरंत संघर्ष विराम होना चाहिए। रुस ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र के बल प्रयोग के संकल्प को जल्दबाजी में अपनाया गया है। रूस के विदेश मंत्रालय ने द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि हम लीबिया और लीबिया पर हमला कर रहीं गठबंधन सेनाओं से अपील करते हैं कि वो शांति बहाली के लिए प्रयास करें।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा,''लीबिया में जारी संघर्ष की स्थिति को लेकर भारत चिंतित है. जैसा कि हमने पहले कहा था इस तरह के प्रयास स्थिति को नियंत्रण में लाने की कोशिश करें न कि आम नागरिकों के लिए मुश्किलें और बढ़ाएं.''
पूर्व में ईराक में कल्पित रासायनिक हथियारों की आड़ लेकर ईराक पर हमला किया गया। मीडिया ने नाटो सेनाओं को मित्र सेना की संज्ञा देकर ईराक पर कब्ज़ा करा दिया। अफगानिस्तान पर भी कब्ज़ा कर लिया गया। हजारो लाखो लोग मारे गए। घर-बेघर हो गए उस समय भी साम्राज्यवाद विरोधी तथाकथित शक्तियां घडियाली आंसू बहाती रहीं। आज लीबिया में कई दिनों से नाटो सेनायें कल्पित मानवीय आध्जारों को लेकर बम वर्षा कर रही हैं। मानवता की सबसे ज्यादा चिंता फ्रांस, इंग्लैंड, अमेरिका को है। जापान में दुनिया की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी है उस त्रासदी में ये देश विशेष कुछ नागरिकों की मदद नहीं कर रहे हैं उसका मुख्य कारण है जापान उनका अघोषित गुलाम देश है। इन देशों को सबसे ज्यादा नागरिक अधिकारों की चिंता लीबिया में है क्योंकि लीबिया का तेल भंडार सबके लिये सुलभ है। उस पर कब्ज़ा करने के लिये नागरिक अधिकारों का बहाना लेकर हमला किया जा रहा है और फिर लीबिया पर कब्ज़ा कर लिया जाएगा। यमन, बहरीन, सौदी अरबिया जैसे मुल्कों में भी आन्दोलन चल रहे हैं उनमें दखालान्जादी इसलिए नहीं होती है क्योंकि वे साम्राज्यवादियों के पिट्ठू मुल्क हैं। फ्रांस से लेके यूरोप के बड़े-बड़े देशों में महंगाई, बेरोजगारी को लेकर बड़े-बड़े धरना प्रदर्शन हो रहे हैं और यदि आन्दोलन ही संप्रभुता दरकिनार कर हस्ताक्षेप का आधार है तो इन देशों में कौन हस्ताक्षेप करेगा।
भारत में कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर भारत तक सेना कमान संभाले हुए है। बराबर कोई न कोई प्रथक्तावादी आन्दोलन जारी है। भारत के उपभोक्ता बाजार तथा प्राकृतिक सम्पदा पर कब्ज़ा करने के लिये नाटो सेनाओ को अच्छा आधार मिल सकता है और संयुक्त राष्ट्र संघ इन प्रदेशों में लोकतंत्र मानव अधिकार स्थापित करने के लिये सैनिक हस्ताक्षेप की अनुमति भी दे सकता है ? हमारे देश में अमेरिकन व ब्रिटिश साम्राज्यवादी एजेंटो की कमी नहीं है वह शक्तियां सिर्फ वाह वाही में सब कुछ करने के लिये तैयार बैठी रहती हैं जो साम्राज्यवादी शक्तियां चाहती हैं। तभी तो भारत इंग्लैंड, फ्रांस, पुर्तगाल जैसे साम्राज्यवादी देशों का गुलाम रहा है विश्व आर्थिक संकट के कारण साम्राज्यवादी मुल्कों की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं रह गयी है। आर्थिक संकट से उभरने के लिये यह साम्राज्यवादी शक्तियां कुछ भी कर सकती हैं। शांति इनकी मौत है युद्ध इनकी जिंदगी है। हमारे देश को चाहिए कि अपनी अस्मिता के लिये दुनिया के छोटे छोटे देशों की अस्मिता के लिये अपनी गुटनिरपेक्ष निति को जारी रखे। साम्राज्यवादी शक्तियों से दूरी आवश्यक है।
चाइना में अमेरिका और उसके साम्राज्यवादी मित्र बहुदलीय व्यवस्था लागू करने के नाम पर नोबेल पुरस्कार चाइना विरोधियों को देते रहते हैं। ईरान में अमेरिका व उसके पिट्ठू देशों द्वारा कई बार अपनी पिट्ठू सरकार बनाने की कोशिश की जा चुकी है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !
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