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शनिवार, 15 सितंबर 2012

हथियारों का अन्तराष्ट्रीय बाजार और भ्रष्टाचार



बढ़ते  रक्षा बजट के जरिये देश की सुरक्षा का कोई काम हो या न हो , लेकिन हथियार  कम्पनियों को जबर्दस्त लाभ दिया जा रहा है तथा उनके वैश्विक व्यापार बाजार  की सुरक्षा भी की जा रही है |

आधुनिक और अत्याधुनिक  हथियारों के  अन्तराष्ट्रीय बाजा के व्यापार को राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए
बढ़ाने की कोशिश है पर यह सच नही है बल्कि पूरी दुनिया के हथियारों के  सौदागरों को बड़ी पूंजी का मालिक बनाया जा रहा है | अपितु यह राष्ट्र पर  निभर बनाने व साथ -- साथ देश को असुरक्षित करता जा रहा है | एक  अन्तराष्ट्री संस्थान की रिपोर्ट में बताया गया की विश्व व्यापार व आयात  निर्यात में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार हथियार उद्योग में होता है |  प्रकाशित  सूचनाओं के अनुसार हथियारों के  विश्व व्यापार में विश्व की कुल 10 कम्पनियों का वर्चस्व है | यह बात जग  जाहिर है क़ि  ये कम्पनिया अमेरिका , इंग्लैण्ड , रूस फ्रांस , जर्मनी जैसे  देशो की साम्राज्यी कम्पनिया है | विश्व पैमाने  के हथियार उद्योग में  इन्ही कम्पनियों का वर्चस्व है | इनमे कोई व्यापारिक होड़ नही है | यह होड़ इन कम्पनियों के बीच है | राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर इन कम्पनियों के  आधुनिक हथियारों एवं अन्य साजो -- सामानों की माँग विश्व के सभी पिछड़े व  विकासशील देशो में न केवल बरकरार है बल्कि इन देशो के बीच मौजूद आपसी तनाव झगड़ो व युद्धों के कारण यह माँग बढती जा रही है | उदाहरण भारत --  पाकिस्तान के बीच तनाव व युद्ध की बारम्बार की स्थितियों के चलते राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर दोनों देशो द्वारा रक्षा बजट बढाने के साथ हथियारों की  खरीद को तेजी से बढाया जाता रहा है | रक्षा सौदों में सर्वाधिक  भ्रष्टाचार  के कारण में एक तो आधुनिक हथियार व  अन्य साजो सामान के उत्पादन व व्यापार में साम्राज्यी  कम्पनियों का ही विश्वव्यापी एक छत्र राज फिर निसंदेह:  आपसी होड़ | इन आधुनिक हथियारों के उत्पादन व व्यापार में कम्पनियों द्वरा
अधिकाधिक  मूल्य अर्थात उनके वास्तविक मूल्य से कई गुना ज्यादा वसूला जाता है जो अरबो में नही बल्कि खरबों में पहुंचता है , इस लिए इस मूल्य से करोड़ो , अरबो का कमीशन खोरी देने का काम भी आम तौर पर होता रहता है | आज से 25 वर्ष पहले बोफोर्स तोप में 60 करोड़ के कमीशन के साथ करोड़ो की दलाली की भी चर्चा बार - बार होती रही | इस भ्रष्टाचार का दुसरा बड़ा आधार विश्व के भारत , पाक जैसे लागभग 150 विकासशील पिछड़े देशो  के बीच आपसी तनाव तथा राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर हथियार कम्पनियों से अधिकाधिक हथियारों व साजो-- सामानों की उच्च मूल्यों पर बढाकर खरीदारी की जाती रही है | इसी के साथ रक्षा सौदों में राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर बरती जा रही गोपनीयता भी रक्षा सौदों के भ्रष्टाचार को और अधिक बढावा देने का एक कारण यह भी है |
रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार अन्तराष्ट्रीय स्तर की दलाली से लेकर , किसी देश के मंत्रियों , सांसदों , उच्च स्तरीय सैन्य व गैर सैन्य  अधिकारियों को करोड़ो की दलाली कमीशन देने तक ही सीमित नही है , बल्कि अन्य रूपों  में भी मौजूद है उदाहरण , ये साम्राज्यी कम्पनिया अपने देशो के अवकाश प्राप्त उच्च अधिकारियों से लेकर खासकर रक्षा अधिकारियों से लेकर खरीदार देशो के अवकाश प्राप्त रक्षा अधिकारियो को अपना स्थायी वेतन भोगी सेवक व दलाल बना लेती है | ताकि सौदों को पटाने में अपने देश के रक्षा मंत्रालय और सरकार पर खरीददार देशो के रक्षा मंत्रालय  और सरकार पर इन पूर्व संबंधो एवं प्रभावों का व्यापारिक इस्तेमाल किया जा सके | विदेशी पूंजी व तकनीक पर निर्भर और उनसे साठ -- गाठ करती रही भारत जैसे देशो की बड़ी कम्पनिया भी विभिन्न साम्राज्यी हथियार कम्पनियों की वकालत में जुट जाती है | इसके अलावा साम्राज्यी हथियार कम्पनियों द्वारा राजनितिक पार्टियों को अधिकाधिक चंदा देने से लेकर अपने देशो के रक्षा मंत्रियों , सांसदों आदि को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कमिशन भेट देना भी हथियार व्यापार का अन्तराष्ट्रीय दस्तूर बना हुआ है | जाहिर सी बात है की करोड़ो अरबो का यह भ्रष्टाचार हथियारों के अन्तराष्ट्रीय बिक्री व्यापार की कमाई के जरिये ही किया जाता है | इस कमाई का अंदाजा भारत -- पाक जैसे देशो के रक्षा बजट से लगाया जा सकता है , जो साल - दर-- साल बढ़ता जा रहा है | भारत में भी देश का बढ़ता बजट का 15 % से उपर पहुंचता है | लाखो -- करोड़ो के इस बजट का लगभग 60 % से 70 % हिस्सा अन्तराष्ट्रीय हथियार कम्पनियों के पास पहुंचता है | फिर बीते समय के साथ अधिकाश पुराने हथियार धरे - के धरे रह जाते है | उनकी जगह साम्राज्यी कम्पनिया अपनी नयी तकनीकि खोज -- प्रयोगों के जरिये नए आधुनिक हथियाओ को आगे ला देती है उसे खरीदने के जरिये दवाव डालने लग जाती है | फलस्वरूप बढ़ते रक्षा बजट के जरिये देश की सुरक्षा का कोई काम हो या न हो , लेकिन हथियार कम्पनियों के अधिकाधिक लाभ ( एकाधिकारी लाभ ) को तथा उनके वैश्विक व्यापार बाजार की सुरक्षा जरुर हो जाती है | साथ ही '' सुरक्षा '' होती है उन दलालों कमीशनखोरो   की , जिन्हें कम्पनी अपने लाभ का एक छोटा सा हिस्सा करोड़ो की रकम के रूप में खिला --- पिला देती है | यह काम केवल हथियार बेचने वाली साम्राज्यी कम्पनिया ही नही करती है , बल्कि सभी क्षेत्रो की साम्राज्यी कम्पनिया करती है | ऐसा करना वस्तुत: उनके साम्राज्यी चरित्र का अहम हिस्सा है | अपने वैश्विक व्यापार बिक्री के साथ वैश्विक बाजार को  एकाधिकार बढाने के लिए उपरोक्त भ्रष्टाचारी हथकंडे अपनाना भारत -- पाक जैसे देशो की सरकारों  , सांसदों , मंत्रियों तथा आला अधिकारियो को पोर -- पोर से भ्रष्ट बनाना , उनकी चारित्रिक विशेषता है |
साम्राज्यी कम्पनियों का यह लुटेरा व भ्रष्टाचारी चरित्र इस देश को देश के जनसाधारण को खोखला करता जा   रहा है | इसके अलावा विदेशी कम्पनियों के साथ गठ - जोड़ करती देश की बड़ी कम्पनिया भी यही काम करती रही है | देश की सत्ता सरकारे व अन्य हुक्मती हिस्से भी इन्हें बहुराष्ट्रीय व देशी कम्पनियों के हितो को बढाने और उसकी सुरक्षा करने में लगे रहे है | देश की आत्म निर्भरता तथा रक्षा -- सुरक्षा अब इनकी चिंता का मामला नही रह गया है | फल स्वरूप राष्ट्र व राष्ट्र का जन साधारण अधिकाधिक असुरक्षित होता जा रहा है | न ही राष्ट्र की आंतरिक एकता व सुरक्षा मजबूत हो पायी और न ही वाह्य सुरक्षा ही | इसका सबूत आंतरिक व  क्षेत्रीय उथल - पुथल व अलगाववादी झगड़ो -- विवादों से लेकर वाह्य घुस -  पैठियो   आदि के रूप में मौजूद है | साफ़ दिख रहा है की आधुनिक और अत्याधुनिक हथियारों के अन्तराष्ट्रीय व्यापार के जरिये बढाया जा रहा मामला राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने  की दिशा में नही जा रहा है बल्कि वह राष्ट्र को पर निर्भर बनाने के साथ -- साथ अधिकाधिक असुरक्षित भी करता जा रहा है | आज फिर इस देश के आम ---  आवाम को जागना होगा और मुझे कामरेड बल्ली सिंह चीमा की यह लाइन याद आ गयी >>>>>>>>>>>>>>>>>>>जनता के हौंसलों की सड़कों पर धार देख ।
सब-कुछ बदल रहा है चश्मा उतार देख ।

जलसे-जुलूस नाटक, हर शै पे बन्दिशें,
करते हैं और क्या-क्या भारत के ज़ार देख।

तू ने दमन किया तो हम और बढ़ गए,
पहले से आ गया है हम में निखार देख ।

हैं बेलचों, हथौड़ों के हौंसले बुलन्द,
ये देख दु्श्मनों को चढ़ता बुखार देख ।

तेरी निजी सेनाएँ रोकेंगी क्या इन्हें,
सौ मर गए तो आए लड़ने हज़ार देख ।

सच बोलना मना है गाँधी के देश में,
फिर भी करे हिमाक़त ये ख़ाकसार देख । 

-सुनील दत्ता
 पत्रकार

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

भूमि अधिग्रहण पर विश्व बैंक का किसान विरोधी सुझाव


दैनिक जागरण एक जून के अंक में " खेती की खतरनाक खरीद के नाम से प्रकाशित लेख में कृषि नीतियों के विशेषज्ञ लेखक देवेद्र शर्मा ने एक महत्त्वपूर्ण सुचना दी है | यह कि , 2008 में विश्व बैंक ने अपनी विश्व विकास रिपोर्ट में यह कहा है कि - " भूमि भुत महत्त्वपूर्ण संसाधन है , किन्तु वह ऐसे लोगो के ( यानी किसानो ) के हाथो में संकेंद्रित है , जो उनका कुशलता से उपयोग नही कर पा रहे है | इसलिए भूमि को बड़े संसाधन को उन लोगो के दे दिया जाना चाहिए जो उसका कुशलता से उपयोग कर सके | लेखक ने इसका मतलब स्पष्ट करत हुए कहा कि विश्व बैंक के सुझावों के अनुसार भूमि संसाधन का कुशलता पूर्वक उपयोग करने कि क्षमता पूंजी विहीन , अभाव ग्रस्त , किसानो के पास नही बल्कि आधुनिक संसाधनों से सम्पन्न धनाढ्य लोगो के ही पास है | इसलिए किसानो कि खेती अर्थात विशालकाय कम्पनियों द्वारा संचालित नियर्त्रित खेती में बदल दिया जाना चाहिए | लेखक ने आगे बताया है की इन्ही सुझावों के अनुसार काम भी किया जा रहा है | किसानो को जमीन से बेदखल करने और उसे धनाढ्य हिस्सों को सौपने की प्रक्रिया लम्बे समय से चलाई जा रही है | इस देश में ही नही बल्कि अन्य पिछड़े देशो में भी येही प्रक्रिया चलाई जा रही है |
पड़ोसी देश चीन में भी वंहा की सरकार द्वारा भूमि - अधिग्रहण के जरिये भारी संख्या में किसानो की कृषि भूमि से बेदखली किया है | यह सब देश की जनतांत्रिक कंही जाने वाली सत्ता - सरकार द्वारा धनाढ्य एवं उच्च तबको के हितो , स्वार्थो की अन्धाधुन पूर्ति के लिए एकदम नग्न रूप में किसानो विरोधी , जनविरोधी चरित्र अपना लेने का सबूत है की विश्व बैंक के सुझावों के अनुरूप ही सत्ता - सरकारे कृषि भूमि को किसानो से चिनकर उसका अधिकाधिक कुशलता से उपयोग करने वाली धनाढ्य कम्पनियों को सौपने को तैयार है | हमारे देश के कई विद्वान एवं उच्च स्तरीय अर्थशास्त्री भी येही बात कर रहे है | जाहिर सी बात है की विद्वान अर्थशास्त्री की यह बात उनकी अपनी सोच नही है | बल्कि वह धनाढ्य कम्पनियों की वकालत मात्र ही है | यह वकालत प्रचार माध्यमी जगत में भी इस रूप में चलती रही है कि , " विकास के लिए जमीन कि आश्यकता से इनकार नही किया जा सकता |
उद्योग , वाणिज्य , व्यापार , यातायात , संचार आदि के विकास विस्तार के लिए जमीनों की आश्यकता से इनकार नही किया जा सकता | तीव्र विकास के वर्तमान दौर में भूमि और कृषि भूमि के अधिकाधिक अधिग्रहण की आश्यकता से इनकार नही किया जा सकता | इन पाठो , प्रचारों के साथ किसानो से जमीने चिनकर उन्हें धनाढ्य कम्पनियों के देने में विश्व बैंक , देश व् विदेश के उच्च कोटि के अर्थशास्त्री गण देश की केन्द्रीय प्रांतीय सरकारे तथा प्रचार माध्यम जगत के बहुसख्यक हिस्से एक जुट है | इनके पीछे देश - दुनिया के धनाढ्य कम्पनिया खड़ी है और उनका वरदहस्त इनके उपर है | आधिनिक विकास के लिए किसानो और गावो की विनाश करना इनका प्रमुख लक्ष्य बन गया है |
अत : किसानो द्वारा भूमि अधिग्रहण के विरोध में जगह - जगह चलाया जा रहा आन्दोलन केवल ' अपनी जमीन बचाओ ' अपना गाव बचाओ ' आन्दोलन के रूप में ख्त्न नही हो जाना चाहिए | बल्कि यह देश - प्रदेश के गाव बचाओ किसान बचाओ के रूप में आगे बढ़ जाना चाहिए | प्रदेश व्यापी , देश व्यापी हो जाना चाहिए अधिकाधिक संगठित एवं एकताबद्ध हो जाना चाइये | फिर इस विरोध को भूमि अधिग्रहण के विरोध तक ही सिमित नही रहना चाहिए | बल्कि सरकार के जरिये भूमि का मालिकाना पा रही कम्पनियों के विरोध के रूप में भी आगे बढना चाहिए | चुकी भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया वैश्वीकरणवादी निजीकरण वादी नीतियों का अहम हिस्सा है | इन नीतियों के तहत निजी लाभ मालिकाना बढाने की छुट पाते रहे धनाढ्य एवं उच्च तबको के कृषि भूमि पर मालिकाने का बढ़ाव विस्तार है | इसलिए किसानो एवं ग्रामवासियों को इस बात को जरुर जानना समझना चाहिए की भूमि अधिग्रहण के विरोध के लिए वैश्वीकरणवादी तथा निजीकरणवादी नीतियों का विरोध अत्यंत आश्यक है | अपरिहार्य है |खाद्यानो की बढती महगाई की मार सहते जा रहे गैरकृषक जन साधारण हिस्से को भी इस विरोध इस विरोध में किसानो के साथ होना चाहिए ............... जागो -जागो कब तक सोते रहोगे लोगो .........

' थका पिसा मजदूर वही दहकान वही है |
कहने को भारत , पर हिन्दुस्तान वही है ||

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672
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