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शनिवार, 17 सितंबर 2011

बढ़ता कृषि ऋण का बजट परन्तु घटता कृषि ऋण

बढ़ते बजटीय कृषि ऋण की असलियत यह है कि गैर कृषक हिस्सों का या बड़े जोत के मालिको आदि का हिस्सा तो बढ़ता जा रहा है लेकिन आम किसानो का यानी ज्यादातर छोटे व सीमांत किसानो का हिस्सा घटता जा रहा है
केन्द्रीय बजट में सरकार द्वारा पिछले 10 - 15 सालो से कृषि ऋण में लगातार और वह भी तेज़ी के साथ बढ़ोत्तरी की जाती रही है | उदाहरण - 2004 - 05 में केन्द्रीय बजट में कृषि ऋण की मात्रा 1।02.000 करोड़ रूपये घोषित की गयी थी | 2010 - 11 में यह रकम 3 लाख 75 हजार करोड़ रूपये थी | इस साल के बजट में इसे बढाकर 4. 75. 000 करोड़ रुपया कर दिया गया है | 95 - 96 में यह रकम 8000 करोड़ रूपये थी | जिसे 97 - 98 में बढाकर 22000 करोड़ रूपये कर दिया गया था | इन आकंड़ो से आप केन्द्रीय बजट में कृषि ऋण की बढती मात्रा का अंदाजा लगा सकते है | इसी के साथ पिछले दो सालो से सरकार कृषि कर्ज़ के व्याज दर में भी छुटे दे रही है | समय पर कर्ज़ चुकता कर देने वाले किसानो के लिए व्याज दर घटाकर 5 % तक कर दिया गया है | 95 - 96 के बाद से आती जाती रही विभिन्न पार्टियों व मोर्चो की सरकारे इसे अपने किसान व किसानो के हिमायती बजट के रूप में प्रस्तुत करती रही है |
फिर कृषि ऋणकी बजटीय चर्चाओं व प्रचारों में भी इसे ऐसे प्रस्तुत किया जाता रहा है मानो कृषि ऋण का समूचा या बड़ा हिस्सा किसानो को मिलता रहा है | ताकि उन्हें अपनी खेती किसानी में कर्ज़ की जरुरतो के लिए प्राइवेट महाजनों के पास न जाना पड़े | इस वर्ष के बजटीय भाषण में वित्त मंत्री ने बैंको को कृषि कार्य के लिए खासकर छोटे व सीमांत किसानो को ऋण देने में तेज़ी लाने के लिए भी कहा है |लेकिन बढ़ते कृषि ऋण , उस पर घटती व्याज दर और छोटे व सीमांत किसानो के लिए ऋण देने में तेज़ी लाने के बयानों , प्रचारों के विपरीत सच्चाई यह है कि कुल कृषि ऋण में छोटे व सीमांत किसानो का हिस्सा घटता गया है |
दैनिक समाचार पत्र " आज " ( 29 जुलाई ) में 'छोटे किसानो से दूर होता कृषि ऋण ' के नाम से प्रकाशित लेख में यह आकंडा दिया गया है की 1990 में कुल कृषि ऋण का 60 % हिस्सा छोटे व सीमांत किसानो को दिया गया था | पर 1995 में यह हिस्सा घटकर 52 % हो गया | फिर 2003 में यह घटकर 23.5 % और 2006 में 13.3% रह गया |
लेकिन तेज़ी से बढती कृषि ऋण की रकमों में देश के बहुसख्यक छोटे व सीमांत किसानो की हिस्सेदारी घट क्यों रही है ? इसका कारण है की कृषि ऋण को दो हिस्सों में बाट दिया जाता है - प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कृषि ऋण | प्रत्यक्ष ऋण सीधे किसानो को दिया जाता है , अल्पकालिक ,मध्यकालिक एवं दीर्घकालिक ऋणों के रूप में | जबकि अप्रत्यक्ष ऋण सीधे किसानो को न देकर कृषि उत्पादन में सहायता देने वाली गतिविधियों के लिए दिया जाता है | उदाहरण के लिए खाद , बीज, पानी , बिजली बोर्ड आदि को दिया गया ऋण | 1990 में बैंको द्वारा दिया जाने वाला अप्रत्यक्ष ऋण का हिस्सा 13।2 % था | बाद के दौर में यह प्रत्यक्ष कृषि ऋण के मुकाबले लगातार बढ़ता रहा | 2001 में यह बढकर 16.1%और 2006 में यह 27.9% हो गया | फिर अप्रत्यक्ष कृषि ऋण का दायरा भी लगातार बढ़ता रहा | उदाहरण 1994 में कृषि सम्बन्धित धंधे में लगे व्यापारी को 2001 में एग्रो क्लिनिक एवं एग्रो बिजनेस केन्द्रों को , 2002 में ग्रामीण इलाको में गोदाम , कोल्ड स्टोरेज और मंदी घर बनाने के लिए तथा 2007 से खाध्य एवं प्रसंस्करण उद्योगों को 10 करोड़ रूपये तक दिए जाने वाले कर्ज़ को अप्रत्यक्ष कृषि ऋण में शामिल कर दिया गया | अप्रत्यक्ष ऋणों के अलावा प्रत्यक्ष ऋणों में अनाजो एवं अन्य फसली प्रत्यक्ष ऋण में बागवानी , पशु - पालन , मत्स्य - पालन आदि को भी शामिल कर लिया गया

1990 से पहले बैंको को कृषि और ग्रामीण स्तर पर कृषि से सम्बन्ध क्षेत्रो के लिए अपने कुल ऋण का कम से कम 18 % देने का लक्ष्य निर्धारित था | इसमें सब के सब प्रत्यक्ष ऋण थे | लेकिन अब कृषि ऋण के नाम पर कृषि ऋण को व्यापारियों , बिचौलियों , उद्योगपतियों एवं सरकारी प्रतिष्ठानों को कर्ज़ के रूप में दिया जा रहा है | फिर प्रत्यक्ष कृषि ऋण में भी बड़ी जोत के मालिको को दिए जाने वाले कृषि ऋण का हिस्सा भी बढ़ता जा रहा है | 1995 - 96 से पहले प्रत्यक्ष ऋण में 25 हजार रूपये से कम ऋण लेने वाले किसानो का हिस्सा 66.1 % था | लेकिन 2006 में यह घटकर 18.1 % हो गया | दूसरी और 2 लाख से उपर के रीनो का हिस्सा 1990 में 7.8 %था , जो जो 2006 में बढकर 39.2 % हो गया | अब कृषि व्याज में घटती स्तिथि का फायदा उठाने वाला एक नकली किसान वर्ग भी पैदा हो गया है | यह वर्ग असली या फर्जी कागजात के बल पर कृषि ऋण हडपकर या तो उससे लाभकारी धंधा कर रहा है या फिर छोटे व सीमांत किसानो , मजदूरों , दस्तकारो को उचे व्याज दरो पर कर्ज़ देकर व्याज की कमाई कर रहा है | बढ़ते बजटीय कृषि ऋण की असलियत यह है कि इसमें गैर कृषक हिस्सों का या बड़े जोत के मालिको आदि का हिस्सा तो बढ़ता जा रहा है लेकिन आम किसानो का यानी ज्यादातर छोटे व सीमांत किसानो का हिस्सा घटता जा रहा है | उन्हें मजबूरी में कृषि कर्ज़ के लिए प्राइवेट महाजनों एवं माइक्रो फाइनेन्स जैसी कम्पनियों के दरवाजे पर जाना पड़ रहा है और भारी व्याज वाले कर्जो को लेने व देने कि मजबूरी को झेलना पड़ रहा है और हमारे देश के नीति बनाने वाले नीतिनियंता यह कहते नही थक रहे है कि देश हमारा उन्नति के पथ पर बढ़ता जा रहा है कितना बड़ा छलावा है ये शब्द ? सुनील दत्ता .पत्रकार
09415370672

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

भूमि अधिग्रहण पर विश्व बैंक का किसान विरोधी सुझाव


दैनिक जागरण एक जून के अंक में " खेती की खतरनाक खरीद के नाम से प्रकाशित लेख में कृषि नीतियों के विशेषज्ञ लेखक देवेद्र शर्मा ने एक महत्त्वपूर्ण सुचना दी है | यह कि , 2008 में विश्व बैंक ने अपनी विश्व विकास रिपोर्ट में यह कहा है कि - " भूमि भुत महत्त्वपूर्ण संसाधन है , किन्तु वह ऐसे लोगो के ( यानी किसानो ) के हाथो में संकेंद्रित है , जो उनका कुशलता से उपयोग नही कर पा रहे है | इसलिए भूमि को बड़े संसाधन को उन लोगो के दे दिया जाना चाहिए जो उसका कुशलता से उपयोग कर सके | लेखक ने इसका मतलब स्पष्ट करत हुए कहा कि विश्व बैंक के सुझावों के अनुसार भूमि संसाधन का कुशलता पूर्वक उपयोग करने कि क्षमता पूंजी विहीन , अभाव ग्रस्त , किसानो के पास नही बल्कि आधुनिक संसाधनों से सम्पन्न धनाढ्य लोगो के ही पास है | इसलिए किसानो कि खेती अर्थात विशालकाय कम्पनियों द्वारा संचालित नियर्त्रित खेती में बदल दिया जाना चाहिए | लेखक ने आगे बताया है की इन्ही सुझावों के अनुसार काम भी किया जा रहा है | किसानो को जमीन से बेदखल करने और उसे धनाढ्य हिस्सों को सौपने की प्रक्रिया लम्बे समय से चलाई जा रही है | इस देश में ही नही बल्कि अन्य पिछड़े देशो में भी येही प्रक्रिया चलाई जा रही है |
पड़ोसी देश चीन में भी वंहा की सरकार द्वारा भूमि - अधिग्रहण के जरिये भारी संख्या में किसानो की कृषि भूमि से बेदखली किया है | यह सब देश की जनतांत्रिक कंही जाने वाली सत्ता - सरकार द्वारा धनाढ्य एवं उच्च तबको के हितो , स्वार्थो की अन्धाधुन पूर्ति के लिए एकदम नग्न रूप में किसानो विरोधी , जनविरोधी चरित्र अपना लेने का सबूत है की विश्व बैंक के सुझावों के अनुरूप ही सत्ता - सरकारे कृषि भूमि को किसानो से चिनकर उसका अधिकाधिक कुशलता से उपयोग करने वाली धनाढ्य कम्पनियों को सौपने को तैयार है | हमारे देश के कई विद्वान एवं उच्च स्तरीय अर्थशास्त्री भी येही बात कर रहे है | जाहिर सी बात है की विद्वान अर्थशास्त्री की यह बात उनकी अपनी सोच नही है | बल्कि वह धनाढ्य कम्पनियों की वकालत मात्र ही है | यह वकालत प्रचार माध्यमी जगत में भी इस रूप में चलती रही है कि , " विकास के लिए जमीन कि आश्यकता से इनकार नही किया जा सकता |
उद्योग , वाणिज्य , व्यापार , यातायात , संचार आदि के विकास विस्तार के लिए जमीनों की आश्यकता से इनकार नही किया जा सकता | तीव्र विकास के वर्तमान दौर में भूमि और कृषि भूमि के अधिकाधिक अधिग्रहण की आश्यकता से इनकार नही किया जा सकता | इन पाठो , प्रचारों के साथ किसानो से जमीने चिनकर उन्हें धनाढ्य कम्पनियों के देने में विश्व बैंक , देश व् विदेश के उच्च कोटि के अर्थशास्त्री गण देश की केन्द्रीय प्रांतीय सरकारे तथा प्रचार माध्यम जगत के बहुसख्यक हिस्से एक जुट है | इनके पीछे देश - दुनिया के धनाढ्य कम्पनिया खड़ी है और उनका वरदहस्त इनके उपर है | आधिनिक विकास के लिए किसानो और गावो की विनाश करना इनका प्रमुख लक्ष्य बन गया है |
अत : किसानो द्वारा भूमि अधिग्रहण के विरोध में जगह - जगह चलाया जा रहा आन्दोलन केवल ' अपनी जमीन बचाओ ' अपना गाव बचाओ ' आन्दोलन के रूप में ख्त्न नही हो जाना चाहिए | बल्कि यह देश - प्रदेश के गाव बचाओ किसान बचाओ के रूप में आगे बढ़ जाना चाहिए | प्रदेश व्यापी , देश व्यापी हो जाना चाहिए अधिकाधिक संगठित एवं एकताबद्ध हो जाना चाइये | फिर इस विरोध को भूमि अधिग्रहण के विरोध तक ही सिमित नही रहना चाहिए | बल्कि सरकार के जरिये भूमि का मालिकाना पा रही कम्पनियों के विरोध के रूप में भी आगे बढना चाहिए | चुकी भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया वैश्वीकरणवादी निजीकरण वादी नीतियों का अहम हिस्सा है | इन नीतियों के तहत निजी लाभ मालिकाना बढाने की छुट पाते रहे धनाढ्य एवं उच्च तबको के कृषि भूमि पर मालिकाने का बढ़ाव विस्तार है | इसलिए किसानो एवं ग्रामवासियों को इस बात को जरुर जानना समझना चाहिए की भूमि अधिग्रहण के विरोध के लिए वैश्वीकरणवादी तथा निजीकरणवादी नीतियों का विरोध अत्यंत आश्यक है | अपरिहार्य है |खाद्यानो की बढती महगाई की मार सहते जा रहे गैरकृषक जन साधारण हिस्से को भी इस विरोध इस विरोध में किसानो के साथ होना चाहिए ............... जागो -जागो कब तक सोते रहोगे लोगो .........

' थका पिसा मजदूर वही दहकान वही है |
कहने को भारत , पर हिन्दुस्तान वही है ||

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672
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