शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

चीन के बहाने अमेरिकी युद्धोन्माद


प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया में अक्सर चीन की सैन्य तैयारियों के सम्बन्ध में समाचार आते रहते हैं और युद्ध को लेकर तमाम तरह की अटकलबाजियां भी सुनाई देती हैं और हद तो तब हो गयी कि जब पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बुश ने कहा कि अमेरिका है चीन का पहला निशाना, इसके बाद भारत का नंबर। अमेरिकी साम्राज्यवादियों का हित इसीमें है कि भारत और चीन में अगर युद्ध हो जाए तो उसकी बिगड़ी हुई आर्थिक स्तिथि में सुधार आ सकता है और यह दोनों विकास शील देशों कि अर्थव्यवस्था लुंज-पुंज हो जाएगी। इसी उद्देश्य से अमेरिकी मीडिया और उसके समर्थक भारतीय मीडिया के लोग युद्ध उन्माद पैदा करने कि कोशिश में लगे रहते हैं।
1962 के चीन-भारत युद्ध के बाद हजारों किलोमीटर लम्बी सीमा पर भारतीय सैनिको व चीनी सैनिको कि झड़पें नहीं होती हैं और एक शांति का वातावरण बना रहता है भारत को अधिकार है कि अपनी सीमाओं कि सुरक्षा हेतु सभी तैयारियां रखनी चाहिए और हमारा देश इसको करता रहता भी है। चीन भी अपनी सीमाओं को सुरक्षित बनाने के लिये रोटीन वे में कार्य करता रहता है। पिछला युद्ध भी हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारों के समय हुआ था और उस युद्ध का मुख्य कारण सी.आइ.ए की तिब्बत में जारी गतिविधियाँ थी। जब अमेरिकी साम्राज्यवाद की मुख्य दुश्मन श्रीमती इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री थी तब भारत में अशांति फ़ैलाने के लिये सी.आइ.ए सिक्किम में षड्यंत्र कर रहा था और भारत सरकार ने समय रहते ही सैनिक कार्यवाई कर वहां के राजा चोग्याल को पद्युचुत कर दिया था। आज भी देश के अन्दर चल रही आतंकी घटनाओ के पीछे कहीं न कहीं प्रत्यक्ष-प्रत्यक्ष रूप से अमेरिकी साम्राज्यवादियों का ही हाथ है। चीन भारत का स्वाभाविक मित्र है, अमेरिका कभी भी हमारा मित्र नहीं रहा है न ही हो सकता है। हमने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़कर स्वतंत्रता प्राप्त की है और अब अमेरिकी साम्राज्यवाद से निपटना पड़ेगा अन्यथा हमारी आर्थिक ताकत को बर्बाद करने के लिये यह तरह-तरह के हथकंडे अपनाता रहेगा। इसलिए भारत और चीन दोनों के हित में यह है कि युद्ध किसी भी कीमत पर न हो और यह युद्ध नही होगा।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

6 टिप्‍पणियां:

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

अमेरिका दुश्मन हो सकता है, है लेकिन चीन दोस्त? नरेंद्र मोदी की यात्रा का असर आप पर भी पड़ गया क्या?

वीरेन्द्र जैन ने कहा…

आप बहुत सही सोच रहे हैं। अमेरिका जबरद्स्ती भारत को चीन से लड़वाना चाहता है और भारत के सत्तारूढ नेता अमेरिका से अनुमति के बिना नाक भी नहीं छिनकते हैं

Arunesh c dave ने कहा…

निश्चित ही पाकिस्तान की तरह भारत को भी अमेरिका के पिठ्ठू बनने की भारी कीमत चुकानी होगी

Vijai Mathur ने कहा…

नेताजी सुभाष चंद्र बॉस के नारे-'एशिया फार एशियन्स'पर अमल करते हुये भारत,पाकिस्तान ,बांग्ला देश और चीन को परस्पर सहयोग द्वारा एकजुट रह कर 'अमेरिकी साम्राज्यवाद' का मुक़ाबला करना चाहिए। चीन से युद्ध न होने की आपकी सदाशा का हम भी समर्थन करते हैं।

तेजवानी गिरधर ने कहा…

very nice

सुधीर कुमार ने कहा…

सुमनजी, इसमें कतई दो राय नहीं है कि अमेरिका किसी का दुश्मन नहीं है और वह किसी का दोस्त तो हो ही नहीं सकता... सबसे अहम कि अमेरिका की पूरी नजर भारत और चीन के बाजार पर है.... इस पर और आगे कहने की जरूरत नहीं... अब कल के ही मामले को लीजिए, पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम को लेकर,,,, जांच के लिए न्यूयॉर्क के जेएफके हवाईअड्डे पर वहां के अधिकारियों को दो बार तलाशा.... इसके पहले और भी ऐसे वाकये.... फिर भारत अभी सोच रहा है प्रतिक्रिया के लिए....
इधर, देश में शासन और प्रशासन की पंगुता का हाल तो देख ही रहे हैं जनाब.... फिर