शनिवार, 12 नवंबर 2011

डी0 ए0 पी ० खाद की भारी महंगाई .... किसानो को सरकार बर्बाद करने पे तुली है


आखिर रासायनिक खादों की इतनी तेज़ मूल्य बृद्धि क्यों ? इसका उलटा सीधा जबाब भी कही से सरकारों और प्रचार माध्यमी विद्वानों द्वारा नही दिया जा रहा है | फिर इस मूल्य पर भी डी०ए0 पी ० खाद किसानो को नही मिल पा रही है | साफ़ बात है कि उसके उत्पादन को कम करके मूल्य बढाया जा रहा हैं | यह मामला कम्पनियों को ज्यादा उत्पादन की जहमत उठाये बिना अधिकाधिक लाभ देने का है | साथ ही किसानो को अधिकाधिक घाटे में ढकेलने की भी साजिश है सरकार की |

खाद्यानो की महगाई का एक प्रमुख कारण खेती के लागत कि बढती महगाई भी हैं | इसलिए नही कि किसान अपनी बढती लागत जोडकर खाद्यान का मूल्य बढ़ा देता हैं | ऐसा करने में किसान सक्षम ही नही हैं | क्योंकि वह जैसे - तैसे लागत लगाकर उत्पादन तो कर देता हैं , फिर उनके हाथ में कुछ नही रह जाता | लेकिन बढ़ते लागत खर्च के चलते किसानो द्वारा खेतो में खाद , दवाई , सिंचाई आदि के लागत में कमी कटौती करना तय हैं | उसी के फलस्वरूप कृषि उत्पादन का गिरना तय है | फिर उसके जरिये खाद्यानो का बाज़ार मूल्य आमतौर पर चढना या चढाया जाना भी तय है | इस हकीकत के वावजूद रासायनिक खादों के अभाव एवं मूल्य वृद्धि का सिलसिला पिछले कई सालो से बढाया जाता रहा है | इस समय रबी की बुआई का सीजन सर पे है | उसके लिए खेती के पोषक तत्वों के साथ उसकी उर्वरा शक्ति को बढाने वाली डी ० ए0 पी0 भारी मूल्य वृद्धि के वावजूद बाज़ार से गायब हैं | केन्द्रीय सरकार ने पिछले साल के केन्द्रीय बजट में ही खादों के मूल्य निर्धारण की नई नीति घोषित करते हुए इसका अधिकार खाद कम्पनियों को दे दिया था | नतीजा बार - बार मूल्य वृद्द्धि के रूप में हमारे सामने हैं | सभी जानते है कि पेट्रोल मूल्य निर्धारण का अधिकार पाकर तेल - पेट्रोल कम्पनिया पेट्रोल की कीमते बार - बार बढ़ा रही है | उसी तरह से मार्च - अप्रैल 2010 में घोषित हुए नई उर्वरक नीति के तहत छूटे पाकर रासायनिक खाद कम्पनिया अब उसके मूल्य को बार - बार बढाती जा रही है और सरकारे उन्हें लागू करती जा रही है | पेट्रोल मूल्य वृद्धि पर तो कुछ न कुछ चर्चा के साथ कुछ तर्क - कुतर्क दीये जाते रहे है | पर रासायनिक खादों के इतनी तेज़ मूल्य वृद्धि पर कही कोई चर्चा तक नही है | जबकि पिछले साल इसी सीजन में डी ० ए ० पी ० की सरकार द्वारा घोषित कीमत 472 रुपया प्रति बोरी ( 50 किलो ) थी |फिर चार - पांच माह बाद के बाद ही इसकी कीमत 605 रूपये प्रति बोरी पहुच गयी | खरीफ की बाई के समय तक इसकी कीमत 700 रूपये के उपर आ गयी थी | नई खेप आने के बाद इसकी कमत 1000 रूपये प्रति बोरी पहुचने की आशंका है | यही हाल यूरिया का भी रहा है |आखिर रासायनिक खादों की इतनी तेज़ मूल्य वृद्धि क्यों ? इसका उलटा - सीधा जबाब भी कही से सरकारों और प्रचार माध्यमि विद्वानों द्वारा नही दिया जा रहा है | फिर इस मूल्य पर भी डी ० ए ० पी ० खाद किसानो को नही मिल पा रही है | साफ़ बात है कि उसके उत्पादन को कम करके मूल्य बढाया जा रहा है | यह केवल चोर बाजारी का मामला नही हो सकता और न ही है |चोर बाजारी , काला बाजारी तो खाद के अभाव व महगाई के साथ ही चलती रही है | यह मामला कम्पनियों को ज्यादा उत्पादन कि जहमत उठाये बिना अधिकाधिक लाभ देने का है | साथ ही किसानो को अधिकाधिक घाटे में ढकेलने का भी हैं | किसानो को घाटे में ढकेलने का काम रासायनिक खादों पर डी जाने वाली सब्सिडी को घटाते हुए भी किया जाता रहा है | पिछले साल यूरिया पर सब्सिडी घटाने तथा पोटाश फासफोरस सल्फर जैसे पोषक तत्वों पर सब्सिडी देने की नीति घोषित कि गयी थी |हो सकता है , खाद कम्पनियों को यह सब्सिडी मिली हो , पर किसान को तो वह कही भी दिखाई नही पड़ी | अन्यथा पोषक तत्व मुहैया करें वाली डी ० ए ० पी ० का मूल्य इतना तेज़ कैसे बढ़ जाता | सरकारों का और उससे ज्यादा कई प्रचार माध्यमि विद्वानों द्वारा यह प्रचारित किया जाता रहा है की यूरिया मूल्य वृद्धि से क्खेती को दीर्घकालीन लाभ यह होगा कि उसकी उर्वरा शक्ति नष्ट होने से बच जायेगी | लेकिन इस समय खेती कि उर्वरा शक्ति को बढाने वाली डी0 ए0 पी0 के तेज़ी से चदते मूल्य और कमी पर उनके लेख , चर्चाये कही नही दिखाई पड़ रही हैं | क्या पता वे इसका फायदा बताने वाले किसी बौद्धिक खोज में लगे हो | किसानो के प्रति और कृषि उत्पादन वृद्धि के प्रति सरकारों का तथा प्रचार माध्यमी जगत का यह रवैया तब हैं , जब पिछले ढेड साल से राष्ट्र के आर्थिक विकास वृद्धि में भी सबसे ज्यादा योगदान कृषि क्षेत्र का रहा हैं | यह योगदान सरकारों की वर्षो से कृषि के प्रति बढती उपेक्षा के वावजूद रहा हैं | जबकि सरकारों से तमाम किस्म के छूटो रियातो के साथ लाखो , करोड़ो का प्रोत्साहन पॅकेज पाने के वावजूद उद्योग जगत की वृद्धि व विकास दर में पिछले 8 - 10 महीनों से गिरावट की खबरे आती रही हैं | खासकर निजी क्षेत्र के तमाम बड़े प्रतिष्ठान तमाम छूटो , सहायताओ के साथ विश्व व्यापी मंदी के नाम पर भारी पैकेजों के खाने के बाद भी नकारा बनते जा रहे हैं | लेकिन सरकारे सारा राष्ट्रीय धन इन्ही को देने पर वर्षो से आमदा है | किसानो के सौ फीसदी न्याय संगत छूटो को काटकर खादों , दवाओं आदि के मूल्य को बेतहाशा बढाकर उन्हें रौदने पर लगी हुई हैं | यह काम आज से नही हो रहा है बल्कि पिछले 15 - 20 सालो से हूँ रहा हैं | अब उसकी रफ़्तार और तेज़ की जा रही है कि इसका लक्ष्य ' खाद्यान्न सुरक्षा ' को नही बल्कि' खाद्यान्न असुरक्षा ' को बढावा देना हैं | दूसरे इसका लक्ष्य किसानो से खेती व खेत को छुड़वाना भी हैं | इसलिए सवाल केवल डी0ए0 पी ० कि बढती महगाई का नही हैं बल्कि खेती में निरंतर बढती लागत मूल्य का , फिर किसान के लिए कृषि उत्पादों के कम या असंतुलित मूल्य का हैं | उसके फलस्वरूप खेती के बढ़ते संकटों और किसानो पर बढ़ते कर्ज़ संकट का हैं | खादों का बढ़ता मूल्य और अभाव तो उसका एक हिस्सा हैं | यह संकट जान बुझकर बढाया जा रहा हैं | अन्तराष्ट्रीय आर्थिक नीतियों और डंकल - प्रस्ताव आदि के तहत बढाया जा रहा हैं , ताकि किसान खेती से निराश हो जाए |उसे छोड़ने के लिए तैयार हो जाए , ताकि कृषि भूमि को किसानो से छीनकर उद्योग व्यापार के मालिको को बिल्डरों , डेवलपरो , आदि को दिया जा सके | किसानो पर बढाये जा रहे संकट के पीछे धनाढ्य कम्पनियों के हितो में काम करती आ रही सत्ता सरकारों का यह लक्ष्य अब किसानो को जरुर समझ लेना चाहिए | उन्हें अब आज डी0 ए0 पी ० तो कल यूरिया और वह भी अपने खेत के लिए हासिल करने के बारे में ही नही सोचना चाहिए बल्कि इसे मुख्यत:इसे किसानी और कृषि भूमि के निरंतर बढ़ते संकट के एक अंग के रूप में देखना चाहिए | केवल तभी तक अपने - अपने लिए खाद की तलाश कर रहे किसानो को अपनी व्यापक समस्याओं को लेकर संगठित होने कि अनिवार्य आवश्यकता समझ में आ सकेगी और तभी वे संगठित होकर किसान विरोधी नीतियों के विरुद्ध , सत्ता सरकारों के विरुद्ध तथा कम्पनियों कि लूट के विरुद्ध भी मोर्चा खोल सकेंगे | उसी के जरिये आवश्यकता अनुसार खाद , बीज हासिल करने के प्रयासों से वे अपनी समस्याओं का समाधान निकाल सकने में सफल नही हो पायंगे |
आज जरूरत है की इस देश का आम किसान जागे |

ऐसे में नागार्जुन बाबा की यह लाइन याद आ रही हैं ..........

हम कुछ नहीं हैं
कुछ नहीं हैं हम
हाँ, हम ढोंगी हैं प्रथम श्रेणी के
आत्मवंचक... पर-प्रतारक... बगुला-धर्मी
यानी धोखेबाज़
जी हाँ, हम धोखेबाज़ हैं
जी हाँ, हम ठग हैं... झुट्ठे हैं
न अहिंसा में हमारा विश्वास है
मन, वचन, कर्म... हमारा कुछ भी स्वच्छ नहीं है
हम किसी की भी 'जय' बोल सकते हैं
हम किसी को भी धोखे में डाल सकते हैं

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

3 टिप्‍पणियां:

तेजवानी गिरधर ने कहा…

बहुत अच्छा आलेख है, सही मुद्दा उठाया है

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

धोखेबाज हैं…नागार्जुन ने कहा ही, अब हम क्या कहें?

khalid a khan ने कहा…

ashar dar lekh sahi muda kafi mehnnet ki hai aap me badhai ho bhai