गुरुवार, 10 नवंबर 2011

अमेरिका में "जन विरोध "

इस आन्दोलन का सर्वाधिक उल्लेखनीय मुद्दा वहा के धनाढ्य साम्राज्यी कम्पनिया , कारपोरेट घरानों की भारी लूट और उसके फलस्वरूप समाज में फैलती रही अबराबरी हैं | आंदोलनकारी कारपोरेट कम्पनियों के लूट के साथ वहा की सरकार द्वारा 2008 से विशाल वित्तीय व औद्योगिक कम्पनियों को राहत पैकेज देने का विरोध कर रहे हैं |इसे व अमेरिकी समाज में बैंक उद्योग जगत की हस्तियों की बढती तानाशाही कहकर विरोध कर रहे है |

अमेरिका चर्चा में है | एक अलग और नई वजह से | पिछले 4 - 5 सप्ताह से वहा "वाल स्ट्रीट पर कब्जा करो " का नया आन्दोलन खड़ा होगया हैं | सूचनाओं के अनुसार उस आन्दोलन में ज्यादातर लोग युवा वर्ग के हैं | पूर्ण व अर्द्ध बेरोजगार हैं | इसके अलावा उसमे प्रौढ़ एवं बूढ़े पुरुषो , महिलाओं की भी एक जमात शामिल है | न्यूयार्क शहर के 'वाल स्ट्रीट ' नाम के वित्तीय केंद्र से शुरू हुआ आन्दोलन अमेरिका तथा इटली , स्पेन जैसे यूरोपीय देशो तथा टोकियो व सिडनी जैसे एशियाई व आस्ट्रेलियाई महादीप के नगरो में फैलता जा रहा है |यह ' आन्दोलन ' विकासशील देशो में नही बल्कि विकसित राष्ट्रों में ही सीमित हैं | इस आन्दोलन का चरित्र कितना वास्तविक और गंभीर हैं | इस पर निश्चित होकर नही कहा जा सकता | यह भी नही कहा जा सकता की यह बेरोजगारी जैसी समस्याओ से ग्रस्त अमेरिकी जनता का स्वत: का उभार है या कोई प्रायोजित उभार हैं , जो अमेरिकी जनता में बढ़ रहे असंतोष व असमानता की समस्याओ को आगे करके खड़ा कर दिया गया हैं | इन तमाम शकाओ , दुविधाओ के वावजूद ' वाल स्ट्रीट पर कब्जा करो ' के मुद्दों की असलियत के बारे में शक - सुबहा करने की शायद कोई गुंजाइश नही हैं | वे मुद्दे अमेरिकी जनता के खासे बड़े हिस्से को अब प्रभावित करते जा रहे हैं |पहले 2008 में बहुप्रचारित अमेरिकी वित्तीय - संकट , फिर अब अमेरिकी सरकार के कर्ज़ - संकट के फलस्वरूप वहा के जनसाधारण के खासे बड़े हिस्से में अमेरिकी स्टैन्डर्ड से फैलती बढती अर्द्ध व पूर्ण बेरोजगारी के साथ पहले के अधिकाधिक एवं स्वछन्द उपभोग में कमी का संकट बढ़ता जा रहा हैं | बेरोजगार नौजवानों तथा अमेरिकी स्टैन्डर्ड के हिसाब से अभावग्रस्त हो रहे लोगो का बहुप्रचारित जमावड़ा इन्ही समस्याओं के चलते हुआ हैं | आन्दोलन में उनके विरोध के प्रमुख मुद्दों में , तेज़ी से बढती बेरोजगारी के साथ - साथ सरकारी व गैरसरकारी संस्थाओं में लगे लगाये लोगो की छटनी भी शामिल हैं | इसके अलावा इस आन्दोलन का सर्वाधिक उल्लेख्य्नीय मुद्दा वहा के धनाढ्य साम्राज्यी कम्पनियों , कारपोरेट घरानों की भारी लूट और उसके फलस्वरूप समाज में फैलती रही अब्राब्री हैं | आंदोलनकारी कारपोरेट कम्पनियों के लूट के साथ वहा की सरकार द्वारा 2008 से विशाल वित्तीय व औद्योगिक कम्पनियों को राहत पॅकेज देने का विरोध कर रहे हैं |उनका यह भी कहना है कि वित्तीय संकट और कर्ज़ संकट के चलते अमेरिकी जनता को बेकारी व उपभोग के संकट तथा घर मकान आदि के संकट झेलने पड़ रहे है | पर अमेरिकी बैंक व कारपोरेट जगत जमकर मुनाफ़ा लूट रहे है |आन्दोलनकारी कारपोरेट जगत द्वारा अपने पक्ष में सांसदों को मोड़ने के लिए धन देकर अपना गुट खड़ा करने (लाबिंग करने )का भी विरोध कर रहे है | इसे व अमेरिकी समाज में बैंक उद्योग जगत की हस्तियों की बढती तानाशाही कहकर विरोध कर रहे हैं | विरोध के अन्य मुद्दों में राजनीति में बढ़ रहा भ्रष्टाचार तथा पानी आदि के स्रोतों व सप्लाई का निजीकरण आदि का भी विरोध शामिल हैं | अमेरिकी आन्दोलन - कारियों व प्रदर्शन कारियों के ये मुद्दे गलत नही हैं | ठीक हैं | फिर औद्योगिक एवं बैंकिंग क्षेत्र के कारपोरेट शक्तियों की लूट के विरोध के साथ सरकार द्वारा उनको दीये जाने वाला प्रोत्साहन पॅकेज का विरोध इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वे अपनी बेकारी व अभाव को मुख्यत:वहा के धनाढ्यतंम कम्पनियों की लूट में देख रहे है न कि सरकारों , पार्टियों व अफसरशाही आदि की कारगुजारियो में ही | इसी संदर्भ में यह भी महत्वपूर्ण है कि उन्होंने अपने आन्दोलन का क्षेत्र राजनीति के केंद्र वाशिगटन की जगह न्यूयार्क को और उसके वित्तीय केंद्र ' वाल स्ट्रीट' को बनाया हुआ है | इसी के साथ इस आन्दोलन के नकारात्मक पहलू भी ध्यान देने लायक है | उन्होंने अपने आन्दोलन में ईराक , अफगानिस्तान , लीबिया पर हो रही हमलावर कारवाइयो का कोई विरोध नही किया गया | जबकि उन कारवाइयो के लिए तेल - पेट्रोल की कम्पनियों से लेकर अमेरिकी हथियार कम्पनियों का ही सबसे ज्यादा दबाव रहा है और उन्हें इसका सबसे ज्यादा लाभ भी मिलता रहा है |इसी के साथ यह भी सच्चाई है कि अमेरिकी वित्तीय - संकट और अब कर्ज़ - संकट के बढने का एक सबसे बड़ा कारण भी अमेरिकी सरकार का बढ़ता युद्ध खर्च ही रहा है |उसी का परिणाम अमेरिकी जनता की बढती बेरोजगारी , गिरती क्रय शक्ति और गिरते उपभोग आदि के रूप में आता जा रहा है |इसके वावजूद अमेरिकी साम्राज्यी कारपोरेट जगत के विश्व व्यापी आर्थिक कुटनीतिक प्रभुत्व के लिए किए जा रहे कारवाइयो व हमलो का अमेरिकी जनता द्वारा विरोध न किया जाना , उसके द्वारा अमेरिकी साम्राज्यवादी प्रभुत्व को स्वीकारने और इस पर गर्व करने का भी परिलक्षण है | साथ ही अपनी बढती समस्याओं के प्रमुख कारण व कारक को नजर अंदाज़ करना भी है | उनकी यह चुप्पी 1947 से पहले ब्रिटिश शासन और उसके प्रभुत्व में हो रही लूट पर शांत रही या शान्ति के साथ लूट का उपभोग कर रही ब्रिटिश जनता की कार्बन कापी है | लेकिन यह भी निश्चित है कि अगर ब्रिटिश व अमेरिकी जनता दूसरे देशो की आर्थिक लूट और कुटनीतिक सांस्कृतिक व सैन्य प्रभुत्व का विरोध नही करती तो वहा के साम्राज्यी कारपोरेट जगत के लूट के फलस्वरूप अपनी बढती रही बेकारी व उपभोग की समस्याओं का भी स्थायी निदान नही निकाल सकती | लेकिन यह बात तो अमेरिका व यूरोपीय देशो की जनता के लिए सच है | उनके आन्दोलन के इस भारी कमी के वावजूद उनके आन्दोलन के मुद्दे भारत जैसे पिछड़े देशो के जनसाधारण के लिए निश्चित ही सबक देने वाले हैं | हमारे देश में अभी भी बढती महगाई , बेकारी तथा खेती किसानी आदि के संकटों के लिए लोग इस देश के और अमेरिका ब्रिटेन आदि देश कारपोरेट जगत के लूट को प्रमुखत: जिम्मेवार नही जान व मान पा रहे है | हम आर्थिक समस्याओं के कारणों को राजनितिक पार्टियों व नौकरशाही के कारगुजारियो तक में ही देखने के आदि बने हुए है | जबकि सरकारे व नौकरशाही देशी - विदेशी कारपोरेट जगत को लाभ देने और बदले में जन - समस्याओं को बढाने का काम करती जा रही हैं | सरकारे इसी लक्ष्य से उदारीकरणवादी , वैश्वीकरणवादी तथा निजीकरणवादी नीतियों को लागू करने में जी जान से जुटी हुई है |उसको आगे बढाने में लगी हुई है | धनाढ्य कम्पनियों को लाखो - करोड़ो के सलाना पॅकेज पर पॅकेज दीये जा रहे है |सबके फलस्वरूप आम लोगो में साधारण जीवन जी पाने तक का संकट बढ़ता जा रहा है |किसानो , मजदूरों , दस्तकारो द्वारा लाखो आत्महत्याए किए जाने का सिलसिला बढ़ता जा रहा है | राष्ट्र व समाज का छोटे से खुशहाल भारत और व्यापक रूप में बदहाल भारत में बटवारा बढ़ता जा रहा है | एक तरफ खरबपतियो , अरबपतियो और दूसरी तरफ सैकड़ापतियों के बीच अमीरी - गरीबी की भयंकर -असमानता बढती जा रही है | साधनहीन और औसत घरो के नौजवानों में भयंकर बेकारी , बेरोजगारी व अभावग्रस्तता बढती जा रही है | इसलिए अमेरिका में खड़ा हुआ आंदोलन वास्तविक हो या दिखावटी या प्रायोजित , पर उन मुद्दों को लेकर इस देश में देशी विदेशी कारपोरेट जगत की लूट और उसको बढाने वाली नीतियों , सुधारों तथा सत्ता सरकारों के विरुद्ध वास्तविक जन - आन्दोलन की , मेहनतकशो एवं नवयुवको के आन्दोलन की पूरी शिद्दत के साथ दरकार है , इन्तजार हैं |
ऐसे वक्त में मजाज लखनवी की वो बाते याद आ रही है .....

बोल ! अरी, ओ धरती बोल !
राज सिंहासन डाँवाडोल!

बादल, बिजली, रैन अंधियारी, दुख की मारी परजा सारी
बूढ़े़, बच्चे सब दुखिया हैं, दुखिया नर हैं, दुखिया नारी
बस्ती-बस्ती लूट मची है, सब बनिये हैं सब व्यापारी

बोल ! अरी, ओ धरती बोल !

कलजुग में जग के रखवाले चांदी वाले सोने वाले,
देसी हों या परदेसी हों, नीले पीले गोरे काले
मक्खी भुनगे भिन-भिन करते ढूंढे हैं मकड़ी के जाले,
बोल ! अरी, ओ धरती बोल !

क्या अफरंगी, क्या तातारी, आँख बची और बरछी मारी!
कब तक जनता की बेचैनी, कब तक जनता की बेजारी,
कब तक सरमाए के धंदे, कब तक यह सरमायादारी,
बोल ! अरी, ओ धरती बोल !

नामी और मशहूर नहीं हम, लेकिन क्या मज़दूर नहीं हम
धोखा और मज़दूरों को दें, ऐसे तो मज़बूर नहीं हम,
मंज़िल अपने पाँव के नीचे, मंज़िल से अब दूर नहीं हम,
बोल ! अरी, ओ धरती बोल !

बोल कि तेरी खिदमत की है, बोल कि तेरा काम किया है,
बोल कि तेरे फल खाये हैं, बोल कि तेरा दूध पिया है,
बोल कि हमने हश्र उठाया, बोल कि हमसे हश्र उठा है,
बोल कि हमसे जागी दुनिया
बोल कि हमसे जागी धरती
बोल ! अरी, ओ धरती बोल !
राज सिंहासन डाँवाडोल!

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

3 टिप्‍पणियां:

कविता रावत ने कहा…

bahut badiya samyik vishay par saarthak aalekh aur ant mein मजाज लखनवी ji ki sateek rachna
बोल ! अरी, ओ धरती बोल !
राज सिंहासन डाँवाडोल!
ki prastuti hetu aabhar!

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

अबराबरी ठीक नहीं लग रहा…गैरबराबरी…तत्सम शब्द नहीं है बराबर, शायद हिन्दी का भी नहीं…अमेरिका में जो हो रहा है, उस पर इतनी जल्दी विचार निश्चित नहीं किया जाना चाहिए…वह देश कुछ अजीब सा है…

Vijai Mathur ने कहा…

निश्चय ही हमारे देश की जनता की आँखें खोलने वाली बाते वहाँ हो रही हैं लेकिन जनता जागना चाहे तब न?