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गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

कारपोरेट कपट का बढ़ता कारोबार

वर्ग-स्वार्थ की प्रबलता
नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के बीस साल होने पर हमने कहा था कि इस दौरान उसके खिलाफ जो संघर्ष चला उसमें बाजी नवउदारवाद समर्थकों के हाथ रही है। पांच साल बाद भी वही स्थिति है। पिछले पांच सालों में वामपंथी और सामाजिक न्याय की पक्षधर समेत मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियों, बुद्धिजीवियों, नागरिक समाज और मुख्यधारा मीडिया में नवउदारवादी व्यवस्था का समर्थन और स्वीकृति बढ़ी है। यह ध्यान देने और समझने की जरूरत है कि इस अरसे में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की परिघटना ने एक बड़ा फर्क डाला है। वह यह कि अब नवउदारवाद विरोध का पक्ष, जो अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग मुद्दों को लेकर अलग-अलग संगठनों/व्यक्तियों द्वारा संचालित जनांदोलनों के रूप में उभरा था और ज्यादातर नागरिक समाज व मुख्यधारा मीडिया की उपेक्षा के बावजूद लगातार अपनी ताकत बना रहा था, नवउदारवाद समर्थकों ने काफी पीछे धकेल दिया है। इसके साथ ही पिछले करीब दो दषकों में उभर कर आई वैकल्पिक राजनीति की विचारधारा और उस पर आधारित संघर्ष को मिटाने का काम भी तेज हुआ है। नवउदारवाद को मजबूत बनाने और गति प्रदान करने वाले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के पुरोधाओं ने राजनीतिक पार्टी बना कर पूंजीवाद के किसी भी विकल्प को पूरी तरह समाप्त करने का गहरा दांव चल दिया है। संविधान की विचारधारा पहले ही नवउदारवाद की एजेंट मुख्यधारा राजनीति द्वारा लगभग ध्वस्त की जा चुकी है। अब सीधे नवउदारवाद विरोधी संघर्ष की कोख से पैदा विकल्प की राजनीति को, सीधे नवउदारवाद की कोख से पैदा राजनीति ने धूमिल कर दिया है। 
आजादी के संघर्ष की सीख से हम जानते हैं पूंजीवादी साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष के दौर में उतार-चढ़ाव आते हैं। अब हम यह भी जान गए हैं कि 1947 में हासिल की गई जीत निर्णायक नहीं थी। आजादी को अधूरी माना भी गया था और उसे पूरा करने के कई दावेदार प्रयास हुए थे। उस विस्तार में जाने का यह मौका नहीं है। हकीकत यह है कि समस्त दावेदारों और प्रयासों के बावजूद भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में ‘दूसरी आजादी’, ‘तीसरी आजादी’ ‘दूसरी क्रांति’, ‘तीसरी क्रांति’ का षोर करते हुए पूंजीवादी साम्राज्यवाद षायद पहले से ज्यादा मजबूती के साथ देष में स्थापित हो गया है। वैष्विक परिस्थितिजन्य कई जटिल कारण इसके लिए जिम्मेदार हैं। उपनिवेषवादी दौर में जो साम्राज्यवादी बीज पड़ा था, वह नवउदारवाद के प्रभावस्वरूप फल-फूल उठा। उसने देष की राजनीति पर कब्जा जमा लिया। वह कमोबेष कारपोरेट की एजेंट बना दी गई। उसीका नतीजा है कि बहुत-से सच्चे जनांदोलनों और लोगों के संघर्ष के बावजूद नवउदारवाद की जीत उत्तरोत्तर पक्की होती गई है। वह आगे भी पक्की रहे; उसके विरोध की मुख्यधारा राजनीति में निहित कतिपय संभावनाएं भी निरस्त हो जाएं, इसके लिए नवउदारवाद ने अपनी राजनीति तैयार कर ली है। आम आदमी पार्टी (आप) के नाम से इस राजनीति के तहत गांधी के आखरी आदमी को पीछे धकेल कर करोड़पति ‘आम आदमी’ को राजनीति के केंद्र में स्थापित करने की मुहिम चलाई जा रही है। उम्मीद करनी चाहिए कि 1947 में मिली अधूरी आजादी को पूरा करने के दावेदार इस परिघटना पर गंभीरता से सोचने का काम करेंगे; नवउदारवाद के लाभार्थियों की नहीं, वंचितों के पक्ष की राजनीति स्थापित करने का उद्यम करेंगे। तभी नवउदारवाद की जीत और वैकल्पिक राजनीति की पराजय की इस परिघटना को उलटने आषा की जा सकती है।
लेकिन इसमें रोड़े बहुत हैं। चिंता का विषय कारपोरेट राजनीति के नए उभार का होना नहीं है। सरकारों का एनजीओकरण होगा तो एक दिन राजनीति का भी होगा, यह हम पहले से जानते थे। यह गुबारा अपने अंतविर्रोधों के चलते जल्दी ही फूट भी सकता है। बल्कि उसके फूटने की आषा में मुख्यधारा राजनीतिक दल और आषंका में खुद नई पार्टी के नेता परेषान रहते हैं। लेकिन यह उनका घरेलू मामला है। गुबारा फूटने पर भी विकल्प की राजनीति के लिए कुछ रास्ता नहीं बनने जा रहा है। नवउदारवादी पेटे में ऐसे ज्वार आगे भी आते रहेंगे। चिंता का विषय यह है कि अपने को वाम, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष बताने वाले लोग इस राजनीति की न केवल प्रषंसा कर रहे हैं, उससे सीख लेने का पाठ पढ़ और पढ़ा रहे हैं। राहुल गांधी से लेकर करमरेड करात तक ने इस नई राजनीति से सबक सीखने की बात की है। हमें राहुल गांधी से कुछ नहीं कहना है। कामरेड करात कहीं असका असली सबक न सीख लें, यह चिंता होती है। वह सबक है - नवउदारवाद विरोध की राजनीति नहीं चलनी है, लिहाजा, वह करनी भी नहीं चाहिए।
दिल्ली के चुनाव में ‘आप’ नेताओं के धन के लेन-देन संबंधी स्टिंग आॅपरेषन की सच्चाई षक के दायरे में हो सकती है, लेकिन वाम, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष मानी जाने वाली समझ का ‘स्टिंग आॅपरेषन’ षक के परे है।यह थोड़ा अजीब है कि सीपीआई और सीपीएम के मुकाबले सीपीआई (एमएल) के सदस्य/समर्थक ‘आप’ की प्रषंसा और जीत के जष्न में ज्यादा बढ़-चढ़ कर बोल रहे हैं। उनमें से एक साथी ने हमसे कहा कि ‘आप’ को उम्मीदवार मिलने में कठिनाई हो रही थी। वामपंथी पार्टियों को अपने उम्मीदवार ‘आप’ के उम्मीदवार बनाने चाहिए थे। हम उनकी बात सुन कर स्तब्ध रह गए। आगे यह नहीं पूछा कि वाम पार्टियों के उम्मीदवारों को सीधे ‘आप’ के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहिए था या गठबंधन बना कर? और, क्या ‘आप’ की तरफ से वैसा कोई प्रस्ताव उनके पास आया था?
सामान्य नागरिक समाज कारपोरेट पूंजीवाद के डिजाइन को नहीं समझ पाता और उसके पक्ष में स्ट्रेटेजी बनाने वालों की मंषा को भी। दिन-रात दो जून की रोटी और बच्चों की षिक्षा नौकरी के लिए हलकान आबादी तो भला क्या समझ पाएगी। नागरिक समाज में जो सीधे कारपोरेट पूंजीवाद के समर्थक हैं उनका कारपोरेट राजनीति के साथ होना स्वाभाविक है। लेकिन अपने को राजनीतिक समझ से लैस मानने वाले परिवर्तन की राजनीति के पक्षधर बुद्धिजीवी और राजनीतिक-सामाजिक नेता-कार्यकर्ता भी ‘आप’ को  विकल्प मान रहे हैं। हमने कहा था कि दिल्ली में कांग्रेस या बीजेपी की सरकार बनेगी। इस चुनावी नतीजे से हम अपनी गलतफहमी दूर करते हैं। हमने ऐसा केवल इसलिए नहीं कहा था कि दिल्ली में ये दोनों दावेदार पार्टियां हैं, बल्कि यह सोच कर कहा था कि कारपोरेट कपट के जाल को दिल्ली में बैठे समाजवादी तथा धर्मनिरपेक्ष सोच और पृष्ठभूमि के लोग कारपोरेट कपट के जाल को जरूर काट देंगे। उसका फायदा समाजवाद की पक्षधर पार्टियों और कथनी में पूंजीवाद का विरोध करने वाली बसपा-सपा जैसी सामाजिक न्याय की पक्षधर पार्टियों को मिल सकेगा। जाहिर है, फिर भी सरकार कांग्रेस या भाजपा की ही बनती, लेकिन नवउदारवाद विरोध की राजनीति की जगह भी बढ़ती।
‘आप’ के रणनीतिकार खुश हो सकते हैं कि उन्होंने राजनीति और संस्कृति का केंद्र मानी जाने वाली दिल्ली में वहां के प्रबुद्ध नागरिक समाज को पूरी तरह अपने पक्ष में लामबंद करके विजय हासिल की है। हम आगे देखेंगे कि जो भाजपा के साथ रहे, वे ‘आप’ के साथ भी थे और जो सीधे ‘आप’ के साथ थे, वे भाजपा के साथ भी हैं। ‘बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास/किराए के विचारों का उद्भास’ और ‘रक्तपायी वर्ग के साथ नाभिनाल-बद्ध से सब लोग’ - मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ के काव्यनायक की इन पंक्तियों को दिल्ली के विद्वत व सुसंस्कृत समाज ने निर्णायक रूप से चरितार्थ किया है। उसने दिखा दिखा दिया है कि समाजवाद में उसका विष्वास दिखावे का और सामान्य मध्यवर्ग के साथ जुड़ा स्वार्थ असली है।
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान ही उसने अपना वर्गस्वार्थी चरित्र प्रकट कर दिया था। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की हमने सतत समानांतर समीक्षा की है। उसमें हमने यह बताया कि भारत के नागरिक समाज ने अपने वर्ग-स्वार्थ से परिचालित होकर उसे और मजबूत करने के लिए यह आंदोलन खड़ा किया। साथ ही नवउदारवादी नीतियों के दुष्परिणाम स्वरूप तबाही का षिकार होने वाली मेहनतकष जनता को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की स्ट्रेटेजी के तहत आम आदमी पार्टी बनाई गई। दिल्ली के विधानसभा चुनाव में उसकी स्ट्रेटी को काफी हद तक सफलता मिली है। दिल्ली में उसकी जीत का जष्न दरअसल भारत के ‘महान’ मध्यवर्ग के वर्ग-स्वार्थ की जीत का जष्न है। यह स्वार्थ केवल आर्थिक और सामाजिक मजबूती का ही नहीं है, अपने को ईमानदार और नैतिक जताने का भी है। उसे ‘षुचिता’, ‘ईमानदारी’, और ‘नैतिकता’ का ऐसा ‘फील गुड’ हुआ है कि ‘आप’ सुप्रीमो केजरीवाल और उसने जो भानुमति का कुनबा जोड़ा है, उसके बारे में जरा भी आलोचना सुनने को तैयार नहीं है।
किसी आंदोलन की एक खासियत यह होती है कि उससे समाज का नैतिक स्तर कितना ऊपर उठा है। आपके पास कोई ज्यादा वाजिब कसौटी हो तो जरूर बताएं, हमारी कसौटी है कि इस आंदोलन, जिसे राजनीति का विरोधी और समाज की षक्ति का द्योतक कहा गया, से कम से कम नागरिक समाज की सामाजिकता पुष्ट होती। यानी समाज का संपन्न तबका विपन्नों के बारे में विचार और संवेदना से कुछ जुड़ता। वह पूरे आंदोलन को विपन्नता पैदा करने वाले उस नवसाम्राज्यवाद की ओर मोड़ देता, जिसके खिलाफ पिछले 25 सालों से हमारे दौर की कई बेहतरीन षख्सियतें संघर्षरत रही हैं। इस संघर्ष में उन्होंने एक तरह से अपनी आहुति दी है। हम बहुत ही स्पष्टता से कहना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने नागरिक समाज के पिछले दो दषकों में गिरते नैतिक स्तर को और नीचे गिराया है। बल्कि जिनका कुछ न कुछ ईमान बना हुआ था, वे भी एकबारगी उसमें बह गए।
‘आप’ की जीत के जष्न में ऐसा जताया जा रहा है कि भ्रष्ट नेताओं और राजनीति का इस घोर ईमानदार और नैतिक नागरिक समाज से कोई वास्ता नहीं है। उसकी पैदाइष और मजबूती में उसकी कोई भूमिका नहीं है। जैसे भ्रष्टाचार कोई ऊपरी बला है, वैसे ही भ्रष्ट नेता और राजनीति कहीं ऊपर से आन टपके हैं! ध्यान दीजिए, कल तक मनमोहन सिंह इनके लिए ईमानदारी के पुतले थे और सोनिया गांधी बहुतों के लिए त्याग की देवी। नब्बे के दषक के षुरू में लागू की गईं नई आर्थिक नीतियां भ्रष्टाचार का स्रोत ही नहीं बनने वाली थीं, अपने में खुला भ्रष्टाचार थीं। इसी नागरिक समाज ने न केवल मनमोहन सिंह जैसे गैर-राजनीतिक व्यक्ति और विष्व बैंक के नौकरशाह को 1991 में सिर-आंखों पर बिठाया, दो बार देश का प्रधानमंत्री भी बनाया। तब मनमोहन सिंह और कांग्रेस बुरे नहीं थे क्योंकि वेतन-भत्ते खूब बढ़ रहे थे, बेटा-बेटी विदेषों में पढ़ने और बड़े पैकेज पर नौकरियां करने जा रहे थे, बैठे ठाले देश-दुनिया घूमने के लिए एनजीओ बनाए रहे थे, राजनीतिक कार्यकर्ताओं को बिगाड़ा जा रहा था, वल्र्ड सोशल फोरम जैसे अंतराष्ट्रीय मजमे लगाए जा रहे थे। उस समय जो दिन-रात नागरिक समाज और पुलिस की प्रताड़नाएं सह कर नवसाम्राज्यवादी हमले का मुकाबला कर रहे थे, उन पर निर्लज्जतापूर्वक अव्यावहारिक, आदर्षवादी, असफल यहां तक कि देषद्रोही होने की तोहमत लगा रहे थे! एक के बाद एक घोटालों के बावजूद मनमोहन सिंह और कांग्रेस की नवउदारवादी नीतियों को बिना विराम दिए चलाने की हिम्मत के पीछे इसी ‘पाक दामन’ नागरिक समाज का बल रहा है, जो आज कांग्रेस को भ्रष्टाचार के लिए पानी पी-पी कर कोस रहा है।   
कारपोरेट राजनीति की नई बानगी का नयापन यही है कि उसने कारपोरेट लूट का षिकार जनता की सीधी स्वीकृति लेने का जाल बुन कर उस पर फेंका है। कारपोरेट और नागरिक समाज की मिलीभगत से जो कपटजाल तैयार किया गया, उसमें दिल्ली की झुग्गी-झोंपडि़यों और गंदी बस्तियों में रहने वाली अधपेट, कुपोषित, अषिक्षित मेहनतकष जनता फंस गई तो उसे दोष नहीं दिया जा सकता। बल्कि उसे अभी और फंसना है। ‘आप’ के स्ट्रेटेजिस्ट जाल को पूरे देश पर फैलाने की मुहिम में लग गए हैं। वे वहां भी पहुंचेंगे जहां कारपोरेट की लूट के खिलाफ विस्थापन, उत्पीड़न, हत्याओं और आत्महत्या के बावजूद लोग सीधा लोहा ले रहे हैं। हालांकि अब उनके साथ जुटने वाले लोगों में से कुछ साथ नहीं रह जाएंगे। वे ‘आप’ के एजेंट बनने को तैयार हो गए हैं।
मान लिया कि व्यवस्था परिवर्तन न हो सकता है, न उसकी राजनीति चल सकती है। यह लक्ष्य लेकर चलने वाली राजनीति परास्त होने के लिए अभिषप्त है। षुचिता, ईमानदारी और नैतिकता से लबालब कारपोरेट क्रांति के सिपाहियों से दिल्ली में बहुत छोटी-सी बात हम कहना चाहते हैं। वह उतनी बड़ी भी नहीं है, जितनी हमने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान कही थी कि कारपोरेट घरानों से लेकर नागरिक समाज तक जितने लोग भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के साथ जुटे हैं, वे खुद भ्रष्टाचार करना छोड़ दें तो देष की गरीब जनता को बहुत हद तक राहत मिल जाएगी। दिल्ली में गरीबों ने मंहगाई से राहत के वादे पर वोट दिया। कांग्रेस के पराजय का यही एक तात्कालिक कारण बना।
दिल्ली के ईमानदार ‘आप’ के समर्थक नागरिक समाज से हमारा बस इतना निवेदन है कि वे अपने यहां काम वाली, दूध वाले, धोबी, पलंबर, बिजली वाले, सब्जी वाले के श्रम के दाम थोड़े बढ़ा दें। अब ‘स्वराज’ आ ही गया है या आने वाला है तो उन्हें कुर्सी-सोफा पर बिठा कर अपने कप में चाय पिलाना षुरू कर दें, जब घर में जन्मदिन या कोई और उत्सव हो तो कम से कम उनके बच्चों को अपने साथ ही केक-खाना दे दें। दिहाड़ी पर काम करने वाले मिस्त्रियों-मजदूरों का थोड़ा नैतिक साहस बढ़ाने के लिए उन्हें यह कहना छोड़ दें कि उन्होंने लूट मचा रखी है, दिहाड़ी ज्यादा लेते हैं और काम कुछ नहीं करके देते।
ईमानदारी और नैतिकता का जैसा जोश दिखाया जा रहा है उससे उत्साहित होकर कुछ और भी पहल करने की फरमाइश भी की जा सकती है, जिससे गरीबों-बेरोजगारों को राहत मिलेगी। भ्रष्ट और बेईमान कांग्रेस सरकार ने सातवें वेतन आयोग की जो घोषणा की है या बीच-बीच में जो डीए-टीए घोषित किए हैं, उनका विरोध कर दें। सातवें वेतन आयोग की घोषणा को वापस लेने के लिए सरकार पर दबाव डालें। नहीं लेती है तो आंदोलन करें। क्योंकि आंदोलन करने में उन्हें महारत हासिल है।
ये लोग ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे। दिल्ली में ‘आप’ की सरकार के बावजूद गरीबों के लिए मंहगाई की समस्या रहनी है। मनमोहन सिंह का यह सार्वभौम और षाष्वत सत्य स्थापित हो जाएगा कि मंहगाई को तो रहना ही है। इसे मंहगाई पर मोहर का चुनाव कह सकते हैं, जो मनमोहन सिंह के बच्चों ने लगाई है। मंहगाई रहेगी तो ऊपरी कमाई करनी ही होगी। यानी भ्रष्टाचार पर भी मोहर। जाहिर है, ऊपरी कमाई झुग्गी-झोंपड़ी वाले तो कर नहीं सकते। वही करेंगे जो तीन बार कांग्रेस का समर्थन कर चुके हैं। इस बार भी विकास पर उसकी राय कांग्रेस के पक्ष में थी। लेकिन उन्हें लगा अगर इस विकास के साथ बिजली-पानी मुफ्त मिल जाए तो क्या बुराई है?
‘आप’ द्वारा जुटाए गए कोष की पारदर्षिता की बड़ी बातें की गई हैं, गोया बाकी पार्टियां अपना हिसाब नहीं देती हों। यह भी तो कहा जा सकता है कि जो 20 करोड़ रुपया, जिसका एक-तिहाई विदेषों से आया है, दिखाया गया है वह दिखाने के दांत हैं। दिखाया इसलिए गया है कि विदेषी धन बैंक की मार्फत ही आ सकता है। उसे छिपाया नहीं जा सकता। दिल्ली की सभी 70 सीटों के 1483 वर्गकिलोमीटर के एरिया के लिए 20 करोड़ जुटाए तो पूरे देष के लिए कितना जुटाना होगा, इसका कुछ हिसाब अनुराग मोदी ने अपने एक लेख में दिया है। विदेष में बैठे लोगों ने न केवल धन दिया, चुनाव क्षेत्रों को गोद लिया, उम्मीदवारों को जिताने की स्ट्रेटेजी बनाई, मतदाताओं को फोन किए। उनका क्या मकसद हो सकता है? सिवाय इसके कि जिस व्यवस्था ने उन्हें देष और विदेष में प्रिविलेज्ड हैसियत में पहुचाया है, उस पर आंच नहीं आए!
‘आप’ के नेता जहां षुरू से अंत तक कपट-क्रीड़ा में लिप्त हैं, नवउदारवाद के सवाल पर कांग्रेस ने कभी कपट नहीं किया। कुछ दिनों तक मनमोहन सिंह ने उसे मानवीय चेहरा प्रदान करने की गफलत भरी बातें जरूर कीं, लेकिन जल्दी ही उन्होंने कह दिया कि नवउदारवादी विकास में मंहगाई से लेकर भ्रष्टाचार तक और विस्थापन से लेकर आत्महत्याओं तक सब चलेगा। आज ईमानदार और नैतिक बने नागरिक समाज ने उनका समर्थन किया। कांग्रेसी यह भी साफ कहते हैं कि वे नेहरू परिवार की पूजा इसलिए करते हैं क्योंकि उसी वजह से पार्टी में एकता रहती है। भाजपा सांप्रदायिकता के मामले में जो भी छल-कपट करती हो, नवउदारवाद के एजेंट की भूमिका में पूरी तरह पारदर्षी और ईमानदार है। आरएसएस ने ‘स्वदेषी’ का राग अलापना छोड़ दिया है। मोदी के नेतृत्व में, जो कहते हैं भारत में पांच सौ बड़े षहर बना दिए जाएं तो सारी समस्याएं हल हो जाएंगी, नवउदारवाद कांग्रेसी राज से ज्यादा तेजी से चलेगा। ‘आप’ और उसका नेता सीधे कारपोरेट का उत्पाद हैं, इसलिए ज्यादा ईमानदारी से नवउदारवाद का काम करेंगे; अमेरिका को भ्रष्टाचार रहित नवउदारवाद का दान ये लोग ही दे सकते हैं - इस सच्चाई को छिपाना नहीं चाहिए।
केजरीवाल की ईमानदारी का बाजार भाव कुछ ज्यादा ही बढ़ा हुआ है। उनके गुरु अण्णा ने कहा कि आंदोलन के दौरान मिले धन का हिसाब नहीं दिया गया है तो केजरीवाल ने जवाब देने के बजाय कहा कि जीवन में उन्होंने ईमानदारी के अलावा कुछ नहीं कमाया है। नागरिक समाज यह भावना भावित उद्गार सुन कर भाव विह्वल हो गया और कल तक ईमानदारी और नैतिकता के प्रतीक अण्णा के खिलाफ केजरीवाल के साथ एकजुट हो गया। आंदोलन के दौरान जब सूचना आई कि केजरीवाल सरकारी खर्चे पर विदेष गए थे। लौटने के बाद उन्हें नियमतः तीन साल नौकरी करनी थी। वरना 9 लाख रुपया जमा कराना था। उन्होंने उन्हीं के षब्दों में ‘करोड़ों कमाने का मौका प्रदान करने वाली नौकरी’ और करोड़ों का चंदा दिलाने वाली एनजीओ ‘पब्लिक काॅज रिसर्च फाउंडेषन’ की मार्फत ‘देषसेवा’ का काम पूरा करके सीधे राजनीति की मार्फत वह काम करने के लिए नौकरी से इस्तीफा दिया। लेकिन देय राषि नहीं लौटाई। आंदोलन के दौरान यह बात सामने आई तो नागरिक समाज को उसमें कांग्रेस का ‘हाथ’ नजर आ गया। उनके विभाग के साथियों ने पत्र लिख कर केजरीवाल की गलत और बचकाना बयानबाजी पर एतराज जताया। नागरिक समाज को षायद वह चिठ्ठी भी कांग्रेसी हाथ से लिखी नजर आई! ‘आप’ के तीन प्रमुख सदस्यों प्रषांत भूषण, मयंक गांधी, अंजलि दमनिया, पर संपत्ति संबंधी भ्रष्टाचार के आरोप लगे तो जांच के लिए खुद पार्टी नेता ने ‘आंतरिक लोकपाल’ की नियुक्ति कर दी। षायद अंतरात्मा की आवाज पर! उस ‘स्वराजी’ जांच में क्या निकला, आज तक पता नहीं चला है। ईमानदारों ने उन आरोपों को भी भ्रष्ट कांग्रेस की करतूत माना होगा। ‘आप’ से टूट कर बनी ‘बाप’ के कार्यकर्ता परचा निकाल कर अरविंद केजरीवाल के धोखों और बेईमानियों की ‘कहानी’ बताते घूमते हैं, लेकिन नागरिक समाज ने उधर कान देना मुनासिब नहीं समझा। ईमानदारों पर झूठे आरोप लगाने वाले असंतुष्ट तत्व कहां नहीं होते, जरूर उन्हें कांग्रेस ने उकसाया होगा, जैसे दिल्ली चुनाव के दौरान ‘आप’ नेताओं के धन के लेन-देन का स्टिंग आॅपरेषन करवा दिया!
दरअसल, मनमोहन सिंह के ये बच्चे यह सब अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं। नवसाम्राज्यवाद के पुरोधा अमेरिकी प्रतिष्ठान की संस्थाओं से लेकर अप्रवासी भारतीयों और देष के कारपोरेट घरानों से धन लेने में उन्हें वाकई कोई नैतिक बाधा नहीं होती है। इस मामले में वे कानून को भी कुछ नहीं मानते हैं। नैतिकता और कानून को लेकर बैठेंगे तो देष का काम कैसे करेंगे? लोगों को उनका षुक्रगुजार होना चाहिए कि वे अपने सौ काम छोड़ कर देष का काम करते हैं! ईमानदारी का अर्थ है नेता और सरकारें ईमानदारी से कारपोरेट का काम करें। ‘कारपोरेट ही सरकार हैं’, नवसाम्राज्यवाद के इस सूत्र को भारत और विदेषों में बसे मध्यवर्ग से पहले से ज्यादा व्यापक और पुख्ता स्वीकृति मिली है। इस पर कारपोरेट घरानों की भूमिका और खुषी स्वाभाविक है।
नागरिक समाज को ये बेईमानियां इसलिए बुरी नहीं लगतीं क्योंकि वह पूरा कैरियर यह करता रहा है। ऐसा नहीं करने वालों को वह पहले भी पागल करार देता था अब भी देता है। भारत माता की छाती पर जो भ्रष्टाचार का पहाड़ खड़ा हुआ है, वह इन्हीं बेईमानियों के सहारे खड़ा है। जो धन देता है वह अपना हित साधता है। अभी तक देष का यह कानून है कि चुनाव के लिए विदेषी धन नहीं लिया जा सकता। उस कानून में ऐसा प्रावधान नहीं है कि बाहर बसे भारतीयों या भारत में कारोबार करने वाली विदेषी कपनियों से धन लिया जा सकता है। इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने जनहित याचिका स्वीकार की। हमने खुद चुनाव आयोग को कांग्रेस, भाजपा और ‘आप’ को विदेषी स्रोत से मिले चुनावी चंदे की चुनाव के पूर्व जांच कराने का विस्तृत प्रतिवेदन दिया। नागरिक समाज या मीडिया ने उसका नोटिस लेना मुनासिब नहीं समझा। अलबत्ता गृह मंत्रालय ने जांच के आदेष जारी किए, जिसके बारे में अभी तक कोई जानकारी हासिल नहीं हुई है। बहरहाल, आगे काफी समय तक यह नागरिक समाज ‘आप’ बेईमानियों का ही नहीं, संविधान और कानून विरोधी कदमों का भी बचाव करेगा।   
हमारे एक मित्र ने हमें सलाह दी कि ‘आप’ ने सादगी से षासन चलाने की जो घोषणाएं की हैं, वे स्वागत योग्य हैं। कारपोरेट पूंजीवाद सादगी से चल सकता है, यह बड़ी मौलिक और रोचक कल्पना है! भारत में और भी ज्यादा, जहां पूंजीवाद में सामंतवाद नेहरू जी के जमाने से ही घुस कर बैठा हुआ है। चुनाव में घोषित 20 करोड़ रुपया खर्च करके दिल्ली में ‘आप’ की सरकार बनने जा रही है। षपथ ग्रहण समारोह के लिए रामलीला मैदान में इंतजाम किया जा रहा है। सारा अमला वहां लगेगा। इस कवायद में अतिरिक्त खर्चा होना ही है। यह एक बानगी है। देष में ऐसे कई नेता हुए हैं जिन्होंने नौटंकी के लिए नहीं, वास्तविकता में सादगी का निर्वाह किया। वे लोग एक छोटे राज्य में चुनाव के लिए 20 करोड़ रुपया बटोरने और खर्चने की बात सोच भी नहीं सकते थे। ‘आप’ ने षुचिता, ईमानदारी, नैतिकता की तरह सादगी को भी नया अर्थ दे दिया है!  
राजनीति की इस नई चाल से गरीबों के लिए संघर्ष करने की राजनीति खत्म होती चली जाएगी। कांग्रेस फिर उठ खड़ी होगी। भाजपा बढ़ती पर है ही। क्षेत्रीय पार्टियां भी आसानी से अपनी जमीन छोड़ने वाली नहीं हैं। जाति और क्षेत्र को आधार बना कर मजबूत हुईं पार्टियां भी हटने वाली नहीं हैं। क्योंकि ये सब कमोबेष नवउदारवाद की समर्थक हैं। तो नुकसान उन्हीं पार्टियों को पहुंचाने की कोषिष है जो नवउदारवाद विरोधी हैं। राजनीति धन और भीड़ इक्ठ्ठा करने से चलती, विचारधारा और संघर्ष से नहीं, यह संदेष इन लोगों ने दिया है। आजादी के संघर्ष के दौर से ही अनेक लोग और संगठन सामाजिक स्तर पर काम करने वाले रहे हैं। उन्हें दोहरा धक्का लगा है। एक तो लोग उन्हें षक की निगाह से देखेंगे कि ‘आप’ वाले भी पहले राजनीति को बुरा बताते थे, बल्कि सारी  समस्याओं की जड़ मानते थे, और फिर खुद राजनीति करने लगे। तो ये लोग भी अपनी राजनीतिक जमीन बना रहे हैं। दूसरा यह कि उनके काम को निरर्थक बताया जाएगा। ऐसे साथी चाहे तो गांधी से सीख सकते हैं जिन्होंने सक्रिय राजनीति के भीतर ही रचनात्मक काम की जगह निकाली थी।   
गांधी की बात चली है तो चर्चा को थोड़ा और बढ़ाया जा सकता है। कपट का जाल में बड़ी कही जाने वाली विभूतियों को भी फांसा गया है। गांधी उनमें से एक हैं। गांधी को कांग्रेस ने अपने मतलब से आॅल परपज बनाया हुआ है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में गांधी को कारपोरेट हित में आॅल परपज बना दिया गया है। लोहिया और बाबा साहब को कारपोरेट के हमाम में खींचने की कोषिषें लगातार हो रही हैं। आपको याद होगा जब ‘गांधी’ कुछ ज्यादा हो गया तो कुछ लोगों ने अण्णा हजारे से डाॅ. अंबेडकर का नाम लिवाया था। अब सुना है कुछ लोग केजरीवाल से उनका नाम लिवा रहे हैं। सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले लोगों को अपनी मान्यताओं का खुद जिम्मेदार होना चाहिए। किसी चिंतक के विचार आप नहीं मानते हैं तो झूठा नाम लेकर उनका अपमान करने का किसी को अधिकार नहीं है। खास कर तब जग आप आने को दूसरों को भ्रष्ट व अनैतिक और अपने को ईमानदार और नैतिक जता रहे हों। सभी जानते हैं केजरीवाल आरक्षण के विरोधी है। मंडल कमीषन की सिफारिषों के विरोध में भड़के आंदोलन से लेकर यूथ फाॅर इक्वेलिटी तक उनकी भूमिका देखी जा सकती है। दिल्ली में सरकार बनाने के मामले में उनका बर्ताव संसदीय लोकतंत्र की अवहेलना करने वाला है। कारपोरेट सहित सांप्रदायिक तत्वों से सांठ-गांठ करने में कोई गुरेज नहीं है। तब बाबा साहब का नाम लेने की क्या जरूरत है?
अनुसूचित जाति/जनजाति संगठनों के अखिल भारतीय परिसंघ और जस्टिस पार्टी के अध्यक्ष उदितराज ने दिल्ली में 16 दिसंबर 2013 को आयोजित रैली में केजरीवाल को आरक्षण पर अपना पक्ष रखने के लिए बुलावा दिया। एक विद्वान नेता के रूप में पहचान रखने वाले उदितराज पिछले करीब डेढ़ दषक से राजनीति में सक्रिय हैं। वे षुरू से ही नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के भी विरोधी रहे हैं, जिनका आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों के साथ विरोध है। यह हैरानी की बात है कि उदितराज को अभी तक अरविंद केजरीवाल का आरक्षण पर पक्ष पता नहीं है। यह आम जानकारी की बात है कि केजरीवाल और उनके सिपहसालार मनीष सिसोदिया आरक्षण विरोधी, दक्षिणपंथी और सवर्णवादी हैं। इसके प्रमाणस्वरूप इन दोनों लोगों के एनजीओ, इनके द्वारा बनाई ‘इंडिया अगेंस्ट करप्षन’ की टीम और अब आम आदमी पार्टी के भागीदारों, विचारों और गतिविधियों को देखा जा सकता है। 2006 में केंद्रीय विष्वविद्यालयों, आईआईटी, मेडिकल काॅलिज और प्रबंधन संस्थानों में पिछड़ा वर्ग के छात्रों को 27 प्रतिषत आरक्षण देने के सरकार के फैसले का विरोध करने के लिए बने संगठन ‘यूथ फाॅर इक्वेलिटी’ के गठन, फंडिंग और नेतृत्व में इन दोनों की संलिप्तता जगजाहिर है। मंडल आयोग की सिफारिषें लागू होने पर फैली आरक्षण विरोधी आग के दौरान उनका क्या पक्ष था, यह पता लगाया जाना चाहिए।
उदितराज कारपोरेट पूंजीवाद के चरित्र की गहरी परख रखते हैं। केजरीवाल और उनकी पार्टी कारपोरेट पूंजीवाद की सीधी उपज हैं और कारपोरेट पूंजीवाद में आरक्षण का सिद्धांत मान्य नहीं होता। केजरीवाल पिछड़ा वर्ग के ही नहीं, दलित वर्ग के आरक्षण के भी विरोधी हैं। उन्हें कारपोरेट घरानों और देष-विदेष के अगड़े सवर्णों का आर्थिक और राजनीतिक समर्थन इसीलिए मिला है। उस समर्थन के बल पर वे सत्ता के लालची कुछ दलितों और पिछड़ों को साथ लेकर कारपोरेट और सवर्ण हितों की राजनीति करना चाहते हैं। बाबा साहेब अंबेडकर के षब्दों में यह ‘राजनीतिक डाकाजनी’ है। रैली में केजरीवाल आए नहीं। आते तो हो सकता है एससी-एसटी के आरक्षण का समर्थन कर देते। लेकिन वह उनका राजनीतिक पैंतरा भर होता। सांप्रदायिक राजनीति के रास्ते एक हद तक चुनावी कामयाबी हासिल करके नरेंद्र मोदी भी अपने को आगे चल कर धर्मनिरपेक्ष नेता बता सकते हैं। अटलबिहारी वाजपेयी और अडवाणी पहले यह कर चुके हैं।
25 साल बाद निर्णायक रूप से कह सकते हैं कि नवउदारवाद महज आर्थिक परिघटना नहीं है। उसने आर्थिक संसाधनों और श्रम पर ही कब्जा नहीं जमाया है, राजनीति के साथ विचार-षक्ति और अनुसंधान-शक्ति को भी अपनी गिरफ्त में लिया है। बल्कि कह सकते हैं कि कुदरती जीवनी-षक्ति और मानवीय जिजीविषा पर भी उसका कब्जा होता जा रहा है। तीसरी दुनिया के संदर्भ में नवउदारीकरण का यह विषिष्ट नवसाम्राजयवादी पहलू है, जिसके चलते उसके मुकाबले में न राजनीतिक नेतृत्व खड़ा हो पाता है, न बौद्धिक। 
समाजवादियों की नई षादी
जिन समाजवादियों ने (वाया अन्ना-रामदेव) केजरीवाल की चूडि़यां पहनी हैं, यह उनका पहला वरण नहीं है। वे भ्रश्ट किंतु सफल समाजवादियों से लेकर ईमानदार किंतु असफल समाजवादियों तक, और कांग्रेस से लेकर भाजपा तक सत्तर घाटों का पानी पी चुके हैं। दिल्ली में हमने देखा है समाजवादी पार्टी के खाते की एक राज्यसभा सीट खाली होने पर खाली बैठे कई समाजवादी सक्रिय हो जाते हैं। सुनते है सामंती दौर में बूढ़ी होती रानियां इस डर से कि उनके रनिवास वृद्धा-आश्रम न बन जाएं, अपने कुल की युवतियों को रानी-सुख भोगने का लालच देकर राजा से षादी करा देती थीं। रनिवास पर कब्जा राजा पर कब्जा होता था। जिसका राजा पर कब्जा वही पटरानी। केजरीवाल की नजरों में चढ़े रहने के लिए बुढ़ाते समाजवादी एक तरफ दिन-रात मेहनत करके दिखाने में लगे हैं कि वे थके नहीं हैं; दूसरी तरफ समाजवादी युवाओं को केजरीवाल की ‘रानी’ बनाने का झांसा देकर फांसने में लगे हैं। उन्हें फुसलाते हैं उनके साथ आने पर सम्मान मिलेगा और सत्ता भी। अपना सम्मान गंवा चुके लोग दूसरों को सम्मान की गारंटी दे रहे हैं!
दिल्ली की जीत और सरकार बनने की संभावना के बाद कई समाजवादी वृद्धात्माएं युवाओं को पीछे धकेल कर आगे आने की धक्का-मुक्की कर रही हैं। कहते हैं आत्मा कभी बूढ़ी नहीं होती। अपने संघर्श और अनुभव का वास्ता देते हैं कि केजरीवाल को समाजवादी बनाने में उनकी विषेशज्ञता सबसे ज्यादा काम आएगी। समाजवाद का कुछ ज्यादा ही दम भरने वाले एक पुराने समाजवादी ने बड़े नखरे के साथ केजरीवाल की चूडि़यां पहनी हैं। उन्हें सावधानी बरतनी चाहिए। बूढ़ी रानियों का नखरा ज्यादा नहीं सहा जाता है। हमें डर है सारे समाजवादी उधर टूट पड़े तो राषनिंग करनी पड़ेगी। कंप्युटर में लिस्ट बनेगी, टोपी देकर कहा जाएगा आप ‘वार रूम’ की उस खिड़की पर जाइए, अपना बायोडाटा लिखाइए, पहले आने वाले पहले पाएंगे, आते रहिए, टोपी उतारनी नहीं है, कुछ ज्यादा ले जाइए, घर वालों को भी पहनाइए! ये वही समाजवादी हैं जिनमें कोई कहता था ‘समाजवादियों पर किसी की सत्ता का रौब गालिब नहीं होता’ और कोई अपने को परम पवित्र समाजवादी मान कर दूसरों को हिकारत की नजर से देखते थे।
कारपोरेट पूंजीवाद की विचारधारा उत्तर आधुनिकता में इतिहास के अंत की काफी पहले घोषणा हो चुकी है। अब अकेला पूंजीवादी इतिहास ही नए-नए रूपों में नई देहरियां पार करता हुआ आगे बढ़ता है। एक साथी को ‘आप’ की जीत में इतिहास की ऐसी ही नई देहरी दिखाई दी है जिस पर खड़े होकर उन्होंने इस ‘नवेली’ राजनीति को ‘पालागन’ किया है। इतना ही नहीं, उन्होंने नवेली के संभावनाओं से भरपूर गर्भ में भी झांक कर देख लिया है। बेहतर होता वे उस गर्भ पर भी नजर डाल लेते जिससे यह पार्टी पैदा हुई है। तब षायद उन्हें पता चलता कि नवउदारवाद की कोख से पैदा और उसीकी दाइयों द्वारा पोषित पार्टी में नवउदारवाद के खात्मे की नहीं, मजबूती की पूरी संभावनाएं निहित हैं।
एक अन्य समाजवादी साथी ने हमारे लेख ‘कारपोरेट राजनीति की नई बानगी’ पर हमें पत्र लिखा। उस पत्र में उन्होंने एक अजीब बात लिखी कि जिस पत्रिका (समयांतर, अक्तूबर 2013) में लेख छपा है, वह लोहियावादी नहीं है। हालांकि पत्र लेख का अंग्रेजी संस्करण (मेनस्ट्रीम, 9 नवंबर 2013) आने के बाद लिखा गया है। हम ‘मेनस्ट्रीम’ के संपादक सुमित चक्रवर्ती जी का लेख प्रकाषित करने के लिए हृदय से आभार व्यक्त करते हैं। वरना कुछ ‘बदनाम’ हिंदी पत्रिकाओं के अलावा भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और उस पार्टी, जिसके लिए वह आंदोलन खड़ा किया गया था, की समीक्षा करने वाला लेख कहीं भी छप नहीं सकता। जाहिर है, साथी ने हिंदी में लिखे लेख का नोटिस लेना मुनासिब नहीं समझा। उसी तरह जैसे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, उसकी टीम और अंत में बनाई गई राजनीतिक पार्टी के बारे में हिंदी में लिखे हमारे कई लेखों का नोटिस उन्होंने नहीं लिया जो ‘युवा संवाद’ में छपते रहे हैं। ‘युवा संवाद’ को लोहिया-विरोधी पत्रिका शायद ही कोई माने। नवउदारवादी दौर ने भारतीय भाषाओं को काफी पीछे धकेला है। ‘सामयिक वार्ता’ जैसी पत्रिका में एक साथी का लेख अंग्रेजी के पक्ष में छपा। उसका जवाब डाॅ. मस्तराम कपूर ने दिया था। इस प्रकरण में हम आदरणीय साथी से इतना निवेदन करना चाहते हैं कि वे भले ‘लोकशक्ति’ पत्रिका में केजरीवाल के विचार-साक्षात्कार प्रकाषित करके उसे सच्ची लोहियावादी पत्रिका के रूप में प्रचारित-स्थापित करें; हमें लोहिया पर बहस करने लायक न समझें।
पत्र में यह भी लिखा था कि हम अगला लेख दिल्ली चुनाव के परिणाम आने के बाद लिखें। उन्हें इंतजार रहेगा। यानी जब पार्टी जीत कर आ जाएगी तब हम क्या कहेंगे? क्या कह पाएंगे? जीत सारी आलोचनाओं का मुंह बंद कर देती है। ‘आप’ की और भाजपा की जीत साझा है। कांग्रेस की हार कारपोरेट की हार नहीं है। मोदी ने इंग्लैंड और यूरोपियन यूनियन की हिमायत भी जीत ली है, कल को अमेरिका की हिमायत भी जीत ली जाएगी। तो क्या मोदी का समर्थन कर देना चाहिए? क्या कांग्रेस की जीत पर उसका विरोध बंद कर देना चाहिए था? 
किषन पटनायक ने ‘गुलाम दिमाग का छेद’ षीर्षक से एक बहुचर्चित लेख लिखा है जिसमें भारतीय बुद्धिजीवियों की दिमागी गुलामी का विष्लेषण है। वे होते तो देख पाते कि समाजवादियों में दिमाग की जगह खाली छेद ही रह गया है। लगातार पराजयों के बीच राजनीतिक सरोकार और सक्रियता बनाए रखने के लिए जिजीविषा की जरूरत होती है। लोहिया लगातार हारते रहे। गरीब उनकी जिजीविशा का स्रोत थे। वे कहते थे कि मेरे लिए इतना बहुत है कि इस देश के गरीब लोग मुझे अपना आदमी मानते हैं। आज गरीबों के साथ कपट करके कारपोरेट का कारोबार बढ़ाने वाले नेता और पार्टी के साथ समाजवादी जुट गए हैं।
प्रायः सभी आंदोलनों और विचारधारात्मक समूहों में समय-समय पर विचलन होता है। विचलन सत्ता की फिसलन न मानी जाए, इसके लिए नेता उसे सैद्धांतिक अथवा रणनीतिक जामा पहनाने की कोषिष करते हैं। भारत की राजनीति में ऐसे अनेक उदाहरण है जिनकी अलग-अलग मौकों पर अलग-अलग परिप्रेक्ष्य से व्याख्या करते हुए अक्सर मिसाल दी जाती है। समाजवादी जो कर रहे हैं वह विचलन नहीं, विचारधारात्मक व्यभिचार है। एक समय के महान आंदोलन की अभी तक की सबसे नीच टेªजेडी!
सांप्रदायिकता का सवाल और मुसलमानों की भूमिका
नवउदारवादी व्यवस्था आगे बढ़ेगी तो सांप्रदायिकता भी आगे बढ़ेगी, उपनिवेषवादी दौर से यह सबक मिला हमें मिला है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की अपनी समीक्षा (‘भ्रष्टाचार विरोध: विभ्रम और यथार्थ’ षीर्षक से राजकमल प्रकाशन से षीघ्र प्रकाष्य) में हमने यह विषेष जोर देकर और बार-बार कहा है कि नवउदारवाद, सांप्रदायिकता और सामाजिक न्याय-विरोध के घोल से तैयार भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन सबसे पहले और सबसे ज्यादा आरएसएस को फला है। इस परिघटना पर पर्दा डालने की कोषिष केवल खांटी नवउदारवादी और मुख्यधारा मीडिया ही नहीं कर रहे हैं, खुद सेकुलर खेमे के बुद्धिजीवी भी कर रहे हैं। वे प्रचारित करने में लगे हैं कि इस आंदोलन के प्रणेता केजरीवाल ने नरेंद्र मोदी को आगे बढ़ने से रोक दिया है। धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों के इस प्रचार पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
मान लिया जाए कि जीतने वाला ही सिंकदर होता है और उसका गुणगान जैसे राजतंत्र में होता था, उसी तरह लोकतंत्र में भी किया जाना जरूरी है। चुनाव जीतना ही कसौटी है तो फिर भाजपा, जिसने तीन राज्यों में भ्रष्ट कांग्रेस को परास्त करके सरकार बनाई है और दिल्ली में सबसे ज्यादा सीटें लेकर पहले नंबर की पार्टी है, का स्वागत भी होना चाहिए। उसे भी दिल्ली की जनता ने ही यह मेंडेट दिया है। भाजपा के सांप्रदायिक होने का तर्क नहीं चलेगा। सांप्रदायिक होने के बावजूद वह उस पूरे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में शामिल थी, जिसने नागरिक समाज, खास कर धर्मनिरपेक्षतावादियों को नया ‘देवता’ प्रदान किया है। केजरीवाल ने आज तक नरेंद्र मोदी, उनके द्वारा गुजरात में तैयार की गई हिंदुत्व की प्रयोगषाला, फरवरी 2002 में मुसलमानों का राज्य-प्रायोजित नरसंहार, उसे छिपाने के लिए किए गए षड़यंत्रों और बहुप्रचारित विकास के गुजरात माॅडल पर कभी कुछ नहीं बोला है। अपने मुंह से यह भी नहीं कहा है कि वह मोदी को रोकने निकले हैं।
कल तक सोनिया के सेकुलर सिपाही बने लोग यह सब कह रहे हैं। गुजरात का तीसरा विधासभा चुनाव मोदी ने आसानी से जीत लिया। नरसंहार के समय से ही बहुत-से लोग और संगठन वहां पीडि़तों को न्याय दिलाने की जद्दोजहद में लगे हैं। देश बचाने का दिन-रात ढोल पीटने वाले केजरीवाल और उनके कारिंदे वहां एक षब्द नहीं बोले। उनके गुरु अण्णा हजारे और उनकी खुद की बाबरी मस्जिद ध्वंस के संविधान और सभ्यता विरोधी कृत्य पर कोई टिप्पणी कम से कम हमें नहीं मिलती। जगजाहिर है कि दिल्ली में झुग्गी-झोंपड़ी वालों को छोड़ कर भाजपा और ‘आप’ का साझा वोट बैंक था। उन्होंने साफ कहा है कि केजरीवाल के ऊपर वे मोदी को वोट देंगे। तो केजरीवाल उनके ‘छोटे मोदी’ हैं। जिस प्रषांत भूषण पर धर्मििनरपेक्षतावादी दम भरते हैं, उन्होंने सबसे पहले कहा कि ‘आप’ को सरकार बनाने के लिए कांग्रेस से नहीं, भाजपा से मुद्दा आधारित समर्थन लेना चाहिए। मोदी का वीटो नहीं होता तो ‘आप’ के विधायक खुद ही भाजपा की सरकार बनवा देते। केजरीवाल को ‘छोटे गांधी’ का खिताब अता करने वाली किरण बेदी ने कहा है कि ‘आप’ और भाजपा की विचारधारा एक है। शाति भूषण और अडवाणी की जोड़ी पुरानी है जो ‘आप’ तक कायम है।
जैसे आधुनिकता और विज्ञान का साम्राज्यवादी पहलू होता है, वैसे ही साम्राज्यवादी आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी काम करता है। हिंदुत्ववादियों के साथ मोदी को केवल अंधविष्वासी, प्रतिक्रियावादी और राजनीतिक अवसरवादी तत्व ही बढ़ावा नहीं दे रहे हैं, आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण का दावा करने वाले भी दे रहे हैं। थोड़ा गहराई से देखें तो केजरीवाल को मोदी की काट बताने वाले ये लोग मोदी को ही बढ़ावा दे रहे हैं।   मजेदारी यह है कि मोदी के मामले में इनकी आपस में लाइन तय नहीं हुई है। बात-बात में गांधी का नाम लेने वाले एक ‘आप’ समर्थक साथी को देश की विदेषों तक फैली युवा शक्ति की तरह ‘आप’ और केजरीवाल की मजबूती में नरेंद्र मोदी का रास्ता साफ होता नजर आता है। ‘आप’ के चुनाव प्रचार में शामिल होने वाले ये साथी खुल कर कहते हैं कि मोदी जैसा दमदार नेता और कोई नहीं है। मजबूरी की धर्मनिरपेक्षता के बोझ तले दबी उनकी विकास के गुजरात माॅडल की प्रषंसा अवसर पाकर फूट निकली है।
दूसरी ओर माक्र्सवादियों, समाजवादियों और नवउदारवादियों की लाइन है जो केजरीवाल को मोदी को रोकने वाला ‘अवतार’ बता रहे हैं। दरअसल, सांप्रदायिकता का साइड बिजनेस करके कोई दूसरा षख्स सोनिया/कांग्रेस की जगह लेता है तो उसका सेकुलर सिपाही बनना होगा। वरना देष के संसाधनों की बिकवाली से नागरिक समाज का जो चोखा धंधा चल रहा है, उसे अकेले संघी हड़प जाएंगे। आजकल बड़े शहरों के अधिकांश वाम, लोकतांत्रिक और सेकुलर बुद्धिजीवियों के लिए धर्मनिरपेक्षता का यही मायना रह गया है। हमने सोचा था कि कारपोरेट कपट में साथ देने वाले ये लोग कम से कम धर्मनिरपेक्षता जैसे संगीन  सवाल पर जनता के साथ धोखा नहीं करेंगे। लेकिन, मुक्तिबोध के काव्यनायक केशब्दों में ‘पूंजी से जुड़ा हुआ हृदय बदल नहीं सकता’!
सवाल है कि मोदी क्या एक नाम भर है? आरएसएस की कट्टर धारा किसी न किसी नेता में मूर्तिमान होती है। मोदी उसके सबसे बड़े प्रतिनिधि बन कर उभरे हैं। लेकिन इस कट्टर धारा के सार पर ध्यान देने की जरूरत है। वह वही है जो अभी लघु रूप में केजरीवाल में है। केजरीवाल के गुरु अण्णा हजारे ने पहली प्रषंसा मोदी की की थी। उनके आंदोलन के सहयोगी रामदेव ने मोदी को अपने आश्रम में बुला कर हिंदुओं का नेता घोषित किया। हमने चुनाव आयोग को पत्र लिख कर निवेदन किया था कि यह धर्म का राजनीति के लिए सीधे इस्तेमाल का मामला है, लिहाजा, इसकी जांच हो और रामदेव और नरेंद्र मोदी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो। धर्मनिरपेक्षता के इन झंडाबरदारों में से किसी ने साथ नहीं दिया। इंडिया अगेंस्ट करप्शन के एक महत्वपूर्ण सदस्य चेतन भगत आरएसएस के मोदी के पक्ष में किए गए फैसले से काफी पहले से देश-विदेश में उनके प्रचार में जुटे थे। पूरा भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन आरएसएस के इंतजाम में हुआ। प्रषांत भूषण को उनके चेंबर में घुस कर पीटने वालों और अफजल गुरु का षव मांगने दिल्ली आई कष्मीर घाटी की महिलाओं की मांग के पक्ष में प्रेसवार्ता को नहीं होने देने वालों की देषभक्ति आरएसएस मार्का थी। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में जुटे ज्यादातर ‘आदर्षवादी’ युवा मोदी के भक्त हैं। आरएसएस केवल संघ की षाखाओं और कार्यालयों के रजिस्टरों में ही नहीं चलता। वह वर्गस्वार्थ में अंधे नागरिक समाज की रगों में भी चलता है। आपने देखा ही घुर वामपंथियों से लेकर जनांदोलनकारियों तक अण्णा-रामदेव के आंदोलन में कूद पड़े थे।
मजेदारी देखिए इंडिया अगेंस्ट करप्शन की टीम के अण्णा हजारे, किरण बेदी, रामदेव, श्रीश्री रविषंकर, अग्निवेष जैसे ‘तत्वों’ से केजरीवाल को अलग निकाल लिया है। बाकियों की निंदा तथा केजरीवाल की प्रषंसा की जा रही है। हमारा कहना रहा है कि इंडिया अगेंस्ट करप्शन, कांग्रेस-भाजपा समेत ये सब एक ही टीम है। अण्णा हजारे तब बुरा नहीं था, जब उसने जंतर-मंतर से पहली प्रषंसा नरेंद्र मोदी की थी। केजरीवाल से चंदे का हिसाब मांग लिया तो बुरे बन गए। यह निष्चित रूप से धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक मूल्य के लिए संकट का समय है। जो षख्स मोदी के खिलाफ एक षब्द नहीं बोलता, उसे मोदी की काट बताया जा रहा है। कुछ उत्साही धर्मनिरपेक्षतावादी केजरीवाल से मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने का आह्वान तक कर रहे हैं।                         
इस कठिन दौर में मुस्लिम अवाम बड़ी भूमिका निभा सकता है। सांप्रदायिकता का जहर उस पर दोहरी मार करता है। दंगों में तबाही और उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप नौजवानों में अतिवादी भटकाव। अंतर्राष्ट्रीय हालातों के चलते उनमें से कुछ आतंकवादी बन जाते हैं। सेकुलर खेमे की पार्टियां उन्हें वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करती हैं। उससे कुछ मुसलमानों को राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी जरूर मिलती है, लेकिन बाकी समाज का अलगाव बढ़ता जाता है। हाल में हुए मुजफ्फर नगर दंगों के बाद वहां चल रहे राहत षिविर देखे जा सकते हैं। अलगावग्रस्त मुसलमान मुह देखी बातें करते हैं और कुछ भी खुल कर स्पष्ट नहीं कह पाते। सच्चर समिति की रपट ने यह बताया है कि यह अलगाव षिक्षा, रोजगार और व्यापार में उनकी बहुत कम हिस्सेदारी के चलते है। वे बिना राष्ट्रीय धारा में शामिल किए गए राष्ट्रवादी होने का बोझ ढोते हैं।
षिक्षित और तरक्की पसंद मुसलमानों से भी उनका अलगाव रहता है। उस अलगाव का षिक्षित और तरक्की पसंदों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन अपने दीन और हुनर में जीने वाले मुसलमानों पर पड़ता है। छोटे स्तर से लेकर बड़े स्तर तक धार्मिक हस्तियों पर उनकी निर्भरता बढ़ जाती है। अपने को टिकाए रहने के लिए उन्हें दीन को कुछ ज्यादा ही पकड़ कर रहना होता है। कई बार कट्टर धारा वाले मुल्ला-मौलवी इसका बेजा फायदा उठाते हैं।
हम यह नहीं कहते कि सच्चर कमेटी की सिफारिषें अंतिम हैं और उन पर बहस नहीं होनी चाहिए। लेकिन उनकी रोषनी में देश की सबसे बड़ी अकलियत को राष्ट्र की मुख्यधारा में लाने का काम जल्दी और तेजी से करना हर राजनीतिक पार्टी और सरकार का ध्येय होना चाहिए। जैसे हिंदू कट्टरता के कारण हैं, वैसे ही मुस्लिम कट्टरता के कारण हैं। उन कारणों को दूर करने की जरूरत है, न कि तौकीर रजा खान जैसी षख्सियतों से मुलाकात करके इस धारणा को पुष्ट करने की कि मुसलमानों का वोट लेने के लिए कट्टरता को सहलाना जरूरी है।
हमें एक आधुनिक, तर्क प्रधान, षिक्षित, समतापूर्ण और स्वावलंबी राष्ट्र बनना है, पिछले करीब तीन दषकों में यह लक्ष्य लगभग भुला ही दिया गया है। ऐसे हालात में रोज कुआं खोदा जाता है और रोज पानी पिया जाता है। कम से कम मुसलमानों को यह कवायद बंद कर देनी चाहिए। हर बार धर्मनिरपेक्षता का कोई न कोई दावेदार खड़ा हो जाता है और उसका वोट पक्का मान लेता है। बीजेपी को हराने की जिम्मेदारी अकेले मुसलमानों पर डाल दी गई है। उनका वोट लेकर नेता भले ही भाजपा के साथ मिल कर सरकार बना लें। हमने कहा है कि एक बार मुसलमान इस प्रवृत्ति के खिलाफ सत्याग्रह स्वरूप अपना वोट रोक लें। संभव हो तो उम्मीदवार भी न बनें।
इसके लिए बहुत काम करने की जरूरत होगी। सारे समाजी, धार्मिक और सियासी इदारे इस दिषा में काम करें। अलग-अलग पार्टियों के मुस्लिम नेता इससे जुड़ें। आधुनिक और प्रगतिषील सोच के साथ राष्ट्रीय स्तर पर यह कार्यक्रम चले। जहां भी संविधान के साथ छेड़छाड़ हुई है अथवा होती है, उसका सत्याग्रही प्रतिकार हो और पार्टियों को संवैधानिक शासन के लिए बाध्य किया जाए। मुसलमान, जैसा कि सच्चर कमेटी की रपट से सबको पता चल गया है, खुद में एक वंचित अवाम है। वह देश की बाकी वंचित अवाम के साथ मिल कर समाजवाद की दिशा में काम करे। लोहिया ने इसका सूत्र दिया है - दलित, आदिवासी, पिछड़े, महिलाएं और गरीब मुसलमान। लेकिन यह चुनावी गणित नहीं होना चाहिए। नवउदारवाद के लिए वही असली चुनौती होगी। नवउदारवादियों को आपस में निपटने दो। तब षायद इस देश का शासक वर्ग गंभीरता से सांप्रदायिकता की समस्या और उसे खत्म करने के उपायों पर गौर करेगा। कड़े कानून बनाने से सांप्रदायिकता नहीं रोकी जा सकती।
एक रास्ता और हो सकता है। नवउदारवाद के साथ सांप्रदायिकता नत्थी है और बढ़ती है। मुसलमान सेकुलर पार्टियों के पास जाना छोड़ दें। उन पार्टियों का साथ दें जो नवउदारवाद का मुकम्मल विरोध करती हैं और सेकुलर हैं। इससे उन पार्टियों को राजनीतिक जमीन मिलेगी जिसके चलते संविधान सम्मत सरकार चलाने का काम आगे बढ़ेगा। भाजपा कई राज्यों में सत्ता में रहती है और 6 साल केंद्र में भी सरकार का नेतृत्व कर चुकी है। सेकुलर के नाम पर मुसलमानों के वोट लेने वाली लगभग सभी पार्टियां भाजपा के साथ राज्यों और केंद्र में रह चुकी हैं। ‘टेक्टिकल वोटिंग’ का फार्मूला पुराना पड़ चुका है। मुसलमानों के समर्थन का इस्तेमाल पार्टियां धर्मनिरपेक्षता कायम करने के लिए नहीं, नवउदारवादी एजेंडा आगे बढ़ाने के लिए करती हैं। मुसलमान वोटों को लूटने के लिए निकले नए ‘ईमानदारों’ के ‘पुराने बेईमान’ खाते निकाल कर देख लीजिए। ये अमेरिका-इजरायल की धुरी से बंधे हैं और राजनीति में उसी धुरी की मजबूती करेंगे।
राजनीतिक मानस के निर्माण की चुनौती 
देष के श्रम और संसाधनों की लूट के साथ षिक्षा, स्वास्थ्य और बिजली-पानी-सड़क जैसी नागरिक सुविधाओं के निजीकरण में तेजी आई है। ग्रामीण और कस्बाई भारत सहित बड़े नगरों में अधिकांष आबादी न्यूनतम नागरिक सुविधाओं के अभाव में जीवन यापन करने को अभिषप्त है। गांवों, कस्बों और छोटे शहरों में फैलाया जा रहा पूंजीवादी विकास का माॅडल उन्हें गंदी बस्तियों में तब्दील कर रहा है। इस सबके बीच तरह-तरह के सौदर्यीकृत आलीशान भवन, होटल, रिजोर्ट, अस्पताल, स्कूल-काॅलेज, हवाई अड्डे, हाई वे, मैट्रो रेल, पार्क, स्टेडियम आदि बन रहे हैं। दिल्ली में स्थित विभिन्न राज्यों के भवन-सदन अपनी नई छटा में होटलों को मात करने वाले हैं। देशकी संसद को भी नया बनाने का प्रस्ताव है। कल राष्ट्रपति भवन भी नया बनाया जाएगा। देष के समस्त संसाधन और श्रम इस विकास कार्य में खप रहे हैं। श्रम वंचितों का है, संसाधन प्रकृति के और मौज-मजाशासक वर्ग का। मजेदारी यह है कि इस पूंजीवादी विकास से तबाह जनता से ही विकास की पुकार कराई जाती है।
विकास का यह सिलसिला रुकने वाला नहीं है।  दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति से ही उसे रोका जा सकता है। राजनीतिक इच्छाषक्ति राजनीतिक मानस से ही पैदा हो सकती है। राजनीतिक मानस के निर्माण की चुनौती नई आर्थिक नीतियां लागू होने के बाद से कठिन से कठिनतर होती गई है। एनजीओ आधारित जनांदेालनों ने न केवल अपने को अराजनीतिक रखने की जिद ठानी हुई है, राजनीति को बुरा बताने का भी बड़ा प्रचार किया है। उनके इस अड़ंगे से नवउदारवाद के विकल्प की राजनीति तो नहीं ही खड़ी हो पाती, मुख्यधारा राजनीति में जो नवउदारवाद विरोध की गुंजाइष होती है, वह भी ताकत नहीं पकड़ पाती। ये जनांदोलनकारी उल्टा सरकारों से संपर्क बना कर कुछ कानून बनाने की अपील करते हैं। विदेषी और कारपोरेट घरानों का धन लेने वाले एनजीओ आधारित जनांदोलनों का आधा बल सामने पड़ते ही सरकार के शरीर में चला जाता है। काफी जद्दोजहद के बाद नवउदारवाद से तबाह जनता की दिखावे की भलाई के कुछ कानून बन जाते हैं। लेकिन इसी बीच परमाणु करार, खुदरा में विदेषी निवेश, षिक्षा के कंपनीकरण, स्वास्थ्य समेत सभी नागरिक सुविधाओं के निजीकरण के कानून भी पास हो जाते हैं। इस तरह नवउदारवाद और उसकी समर्थक की राजनीति मजबूत होती चली जाती है और विरोध की राजनीति खड़ी ही नहीं हो पाती।
किषन पटनायक ने जनांदोलनों के राजनीतिकरण का सिद्धांत ही नहीं दिया, उस दिशा में सक्रिय प्रयास भी किए। 1995 में समाजवादी जन परिषद के गठन में समता संगठन के साथ इक्का-दुक्का जनांदोलनकारी समूह शामिल हुए। बाद में लगातार कोषिशकी गई कि वैष्वीकरण के दुष्प्रभावों का विरोध करने वाले ज्यादा से ज्यादा समूह जनपरिषद में षामिल होकर संघर्ष को राजनीतिक बनाएं। जनांदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम) को राजनीतिक बनाने के लिए किशन जी ने काफी प्रयास किया। ऐसा नहीं हो पाया और हालात बदतर होते चले गए। इसके दो प्रमुख कारण समझ में आते हैं। जनांदोलनकारियों की व्यक्तिवादिता और विदेषी फंडिंग। आज मेधा पाटकर ज्यादा जोर से नारा लगवाती हैं - ‘राजनीति धोखा है, धक्का मारो मौका है’। लेकिन केजरीवाल की राजनीति से उन्हें परहेज नहीं है।
कारपोरेट के पेट से पैदा पार्टी का रातों-रात तामझाम खड़ा हो गया है और उसके सााि भारत का नागरिक समाज भी। इस पार्टी ने स्थापना दी है कि राजनीतिक संघर्ष नहीं, सीधे चुनाव जीतने की स्ट्रेटेजी होनी चाहिए। इस राजनीति में किसी भी मोर्चे पर संघर्ष करने की जरूरत इसलिए नहीं है, क्योंकि सत्ता मिलने पर काम तो कारपोरेट का करना है। मोदी ने यह काम बखूबी कर दिखाया है। मोदी और केजरीवाल की राजनीति से अराजनीतिकरण की प्रक्रिया और तेज होगी। कारपोरेट और नौकरषाही हलकों में पिछले दिनों यह चर्चा चली चुकी है कि देष में नेताओं की जरूरत नहीं है। कंपनियों के सीईओ को सब तय करने की जिम्मेदारी सौंप देनी चाहिए। राजनीति का स्वरूप बदलने के साथ नेता की परिभाषा और छवि बदलना स्वाभाविक है। कुछ लोगों ने कहना षुरू भी कर दिया है कि मुकाबला केजरीवाल और नीलकरणी के बीच है।
अब रास्ता सीधे स्वतंत्रता और समाजवादी आंदोलन की विरासत और संविधान में प्रस्थापित समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों के आधार पर राजनीतिक विकल्प बनाने की जरूरत है। अभी तक की राजनीति से यह स्पष्ट हो गया है कि भारत में प्रगतिशील-परिवर्तकारी पार्टियों के लिए लोकतांत्रिक समाजवाद की स्थापना ही लक्ष्य हो सकता है। और, जैसा कि रविकिरण जैन कहते हैं, वह बिना सत्ता के विकेंद्रकरण के संभव ही नहीं है जिसका प्रावधान संविधान में ही है।
देश  में गरीब रहेंगे तो उनके हितों को लेकर संघर्ष करने वाले कुछ लोग हमेषा बने रहेंगे। लेकिन नागरिक समाज उन्हें नेता नहीं मानेगा। कारपोरेट की गोद में बैठ कर भावनाओं के साथ खिलवाड़ करके मजमा जमाने वाले नेता माने जाते हैं। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर अपना पहला लेख हमने लोहिया के इस कथन से शुरू किया था: ‘‘भारतीय समाज के पास अभी तक कोई राजनीतिक मानस नहीं है। जातियों, राजनैतिक परिवर्तनों से अक्षुण्ण जीवनयापन आदि का लंबा अतीत उस पर मजबूती से हावी है।’’ (राममनोहर लोहिया, ‘एंड पावर्टी’, 1950) अराजनीतिकरण की इस चुनौती का सामना करना ही होगा। गरीब हमेशा  पिटते और सहते ही जाएंगे, यह ध्रुव सत्य नहीं है। वर्ग-स्वार्थ की प्रबलता में जो एका शासक वर्ग ने किया है, उससे सबक लेकर हो सकता है मेहनतकष वर्ग भी संगठित हो जाए और सत्ता पर अपना कब्जा जमा ले। किसान मजदूरों के बुद्धिजीवी बेटे, जिनके बारे में हमने एक ‘समय संवाद’ में किशन पटनायक के हवाले से बताया था,शासक वर्ग का साथ छोड़ कर अपने स्वाभाविक वर्ग के साथ आ जाएं तो उन्हें रोकने का माद्दा किसमें होगा?
-प्रेम सिंह

गुरुवार, 28 जून 2012

अमरीका की साम्राज्यावादी गतिविधियाँ और नया विश्व परिदृश्य भाग -2


आखिर क्यों अमरीका ने विश्व जनमत का उल्लंघन किया और अनदेखी? इसका जवाब है तेल! इस पूरी राजनीति के पीछे इराक़ और अरब देशो के तेल पर कब्जा करना असली उद्देश्य था। दूसरे शब्दों में सारी उक्त बातें, आतंकवाद, अमरीका को ख़तरे, इराक़ और दूसरी जगहों पर तानाशाही का होना और जनतंत्र का नहीं होना इत्यादि के बारे में लंबीचौड़ी बातों की जड़ में तेल और दूसरे कच्चे मालों और स्रोतों पर कब्जा करने के उद्देश्य छिपे हुए थे।
यहाँ अमरीका का विशिष्ट परंपरागत सम्राज्यवादी रूप सामने आ जाता है। बुश ने एक बार तो यह भी कहा कि गॉड’ ने सपने में आकर उन्हे इराक़ को बचाने के लिए कहा है और फिर इसके विपरीत प्रेसीडेंट का पद त्याग करते वक्त उन्होंने कहा कि इराक़ में अमरीका का जाना एक ग़लती थी, एक ग़लत सूचना के आधार पर वे ऐसा कर बैठे! कितने हल्के ंढग से, कितनी आसानी से यह सब कह दिया। उन्होंने यह तक नहीं सोचा कि उतनी दूर से आकर इराक़ की सभ्यता, संस्कृति, पुराने इतिहास, परंपरा, उसके गाँवों, शहरों, सड़कों, मकानों इत्यादि को बर्बाद करने और इराक़ियों को अपमानित करने का उन्हें क्या हक था? वे आते हैं और एक सार्वभौम राष्ट्र के राष्ट्रपति सद्दाम को फाँसी पर पहुंचा देते हैं! कहाँ गए जनतंत्र और विश्व संबंधों के नियम क़ानून? सद्दाम की तानाशाही को तो एक समय खुद अमरीका ने सहायता देकर खड़ा किया था। तानाशाही से निपटने के तरीके हैं, और किसी दूसरे देश में घुसपैठ करने का हक नहीं है।
सम्राज्यवाद के लिए ख़तरे
वास्तव में अमरीका अपने को इतना असुरक्षित समझता है कि उसे दूर दराज के कमजोर देशों से भी खतरा दिखाई देता है। इराक़ की घटनाओं के बाद आतंकवाद घटा नहीं, बढ़ा है। इसकी ज़िम्मेदारी अमरीका पर है। इराक़ में सफलता के बाद उसने समझा कि वह ईरान तथा अन्य देशों पर भी उसी तरह हमला करके उन्हें अपने कब्ज़े में कर लेगा। लेकिन उसे पता नहीं था कि अब उसके सहयोगी भी उसका साथ देने को तैयार नहीं हैं। दुनिया के देश अब इराक़ को दोहराना नहीं चाहते। इसीलिए अमरीका ईरान में इराक़ जैसा कुछ नहीं कर पा रहा है। इस बीच रूस और कुछ अन्य देश ज्यादा सक्रिय होकर अमरीका का विरोध कर रहे हैं जिनमें चीन, भारत और दूसरे देश शामिल हैं। रूस ने साफ कहा है कि इराक़ जैसा हस्तक्षेप नहीं होने देगा। इस बार यू।एन. की भूमिका भी बढ़ा गई है। लीबिया में भी अमरीका अप्रत्यक्ष रूप से ही काम कर पाया और सीरिया एवं अन्य देशों के मामले में उसे बहुत ही घूमकर चलना पड़ रहा है। उसकी नज़रें अफगानिस्तान, पाकिस्तान और फिर भारत पर भी हैं। साथ ही मध्य एशिया के पूर्व सोवियत गणतंत्रों के देश भी उसके निशाने पर हैं। तो क्या अमरीका सफल हो पाएगा?. नहीं, अब इतना आसान नहीं है।
बदलती परिस्थिति
अमरीका यह भूल रहा है कि अब एक नया ज़माना और नई परिस्थिति चल रही है। पुराने ंढग से साम्राज्यवाद काम नहीं कर सकता। नई सूचना एवं तकनीकी क्रांति के ज़माने में विकासमान देश भी अपने को मजबूत और आत्मविश्वास भरा महसूस कर रहे हैं। आज ब्रिक्स के रूप में भारत, चीन, ब्राज़ील और अन्य देश अमरीका के सामने खड़े हो जाते हैं। वे उसे चुनौती दे रहे हैं, जबकि आज कोई सोवियत संघ नहीं है। इतिहास में पहली बार विकासमान देशों की विकास दर विकसित देशों से आगे निकल कर 3 गुना से अधिक हो गई है। आज विश्व साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था गहन संकट में फँसा हुआ है। इससे निकलने के लिए वह छटपटा रहा है लेकिन रास्ता नहीं मिल रहा है।
इसलिए पुराने साम्राज्यवादी तरीक़ों के द्वार बंद होते जा रहे हैं, और नए तरीके क्या होंगे यह उन्हें नहीं पता। आज पहली बार अमरीका पीछे हटने को मजबूर है। अमरीका एक बात नहीं समझता और ना ही समझने की कोशिश कर रहा है। इतिहास और समाज विकास संबंधी जिन समस्याओं का सोवियत संघ सामना कर रहा था, वे अन्य रूपों में अमरीका तथा अन्य विकसित पूँजीवादी और साम्राज्यवादी देशों के सामने भी खड़ी हो रही हैं। केंद्रीकृत राष्ट्र, जनतंत्र की कमी, आदेशों और फ़तवों से राज करना, दूसरे देशों पर धौंस जमाना, उन्हें डराना
धमकाना, अत्याधुनिक हथियारों का प्रदशर्न और होड़, सूचना पर रोक लगाने की कोशिश करना, अमरीकी अत्याचारों को छिपाने की असफल कोशिशों करना, जैसे कई तरीके हैं जो अब नहीं कामयाब होते, ख़ासकर सूचना क्रांति के दौर में. इराक़ में अपनी काली करतूतों और दमनकारी तरीकों को अमरीका छिपा नहीं सका।
साम्राज्यवाद के कई पुराने तरीके अब कारगर नहीं रह गए, इसलिए स्वयं साम्राज्यवाद के लिए ही संकट पैदा होता जा रहा है।
इसके अलावा, आज दुनिया एक ध्रुवीय नहीं रह गई है। अब वह बहु ध्रुवीय बनती जा रही हैं। इनमें, रूस, चीन, ब्रिक्स के विकासमान देश अपनी अधिक असरदार भूमिका अदा कर रहे हैं।
स्वयं साम्राज्यवाद की अर्थ व्यवस्था में ही कई परिवर्तन हो रहे हैं जिन्हें समझने की ज़रूरत है। आज वह जिस संकट और मंदी से गुजर रहा है वह 1930 के दशक के संकट से काफ़ी अलग है। आज विश्व पूँजीवाद, उत्पादक पूँजी और गैर उत्पादक वित्त पूँजी के हिस्सों में बँट गया है। उत्पादक पूँजी को कसीनो’ पूँजीवाद और जमा वित्त पूँजी से आज़ाद होना पड़ेगा।
साम्राज्यवाद नई उत्पादक और संचार शक्तियों का प्रयोग करने में स्वयं को असमर्थ पा रहा है। उनका बेहतर इस्तेमाल गैर साम्राज्यवादी देश कर रहे हैं। एक नए किस्म की विकास की धारा चल पड़ी है। साम्राज्यवादी तौर तरीके काम नहीं आएँगे। आज अमरीका अत्याधुनिक हथियार निर्मित किए जा रहा है, क्यों? किससे ख़तरा है? किसी से नहीं, इसलिए वह काल्पनिक ख़तरे पैदा कर उनसे लड़ने के लिए हवा में तलवार भाँज रहा है। अन्य विकसित पूँजीवादी देशों समेत दुनिया के लोग इसे समझ चुके हैं, और यही है अमरीका की त्रासदी।
उसे समझना पड़ेगा कि यह नव तकनीकी सूचना संचार का युग है, इसलिए दूसरे देशों के साथ पुराने तरीके से पेश नहीं आ सकता है। कोई भी केंद्रीकृत, जबरन तरीके, संरचनाएँ, संगठन, सरकार और राज्य इत्यादि नहीं चल सकता या उतनी आसानी से नहीं चल सकता। यह समझने में अमरीका देर कर रहा है, लेकिन यह उसे समझना ही होगा।
इसीलिए लैटिन अमरीका के दर्जन से अधिक देशों में जनवादी और वामपंथी सरकारें कायम हो गयी हैं, यूरोप की हाल कि घटनाएँ कोई साम्राज्यवाद के लिए सुसमाचार नहीं हैं। विश्व एक भारी ऐतिहासिक परिवर्तन के कगार पर खड़ा है।
-अनिल राजिमवाले
मोबाइल : 09868525812

रविवार, 24 जून 2012

अमरीका की साम्राज्यावादी गतिविधियाँ और नया विश्व परिदृश्य भाग 1


सोवियत संघ के अस्तित्व तक अमरीका अपनी गतिविधियों के लिए उसे ज़िम्मेदार ठहराता था। अमरीका के अनुसार उसे सोवियत ख़तरे का सामना करने के लिए सारे विश्व में सैनिक अड्डे स्थापित करना तथा नएनए अत्याधुनिक हथियारों का उत्पादन करना और बेचना ज़रूरी था। सोवियत संघ के पतन के बाद इस तर्क का आधार ख़त्म हो गया और हथियारों की होड़ और सारी दुनिया में सैनिक अड्डे बनाने का कोई औचित्य नहीं रह गया। कई लोग यह आशा और अपेक्षा करने लगे कि कम से कम अब तो अमरीका युद्धों की तैयारियों और दूसरे देशों में अड्डे बनाने तथा उनमे सैनिक हस्तक्षेप करने या आक्रमण करने से बाज आएगा।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पिछले दो दशकों के अनुभव बताते हैं कि इसके विपरीत अमरीका ने दुनिया में अपनी सैनिक गतिविधियाँ और भी अधिक ब़ाई हैं। यह समझा जाता है कि सोवियत पतन के बाद अब तो दुनिया उसके लिए खुला मैदान बन गई है जहाँ वह कुछ भी कर सकता है, कहीं भी अपनी फ़ौजें भेज सकता है, किसी को भी डराधमका सकता है और अन्य कई प्रकार से कमजोर देशों को दबा सकता है। उसे मालूम है कि अब सोवियत संघ के नहीं रहने से डरने वाली कोई बात नहीं रह गई और उसे अब कोई रोक नहीं सकता है। उसने एक ध्रुवीय दुनिया की घोषणा तक कर डाली अर्थात अब दुनिया में एक ही महाशक्ति रह गई है जिसके आगे सबको झुकना पड़ेगा। अब खुलकर हथियारों और युद्धों का खेल खेला जा सकता है। लेकिन उसकी सारी महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ पूरी नहीं हुई हैं, यहाँ रुक कर हम कुछ बातों पर विचार करेंगे।

साम्राज्यवाद का चरित्र?

दुनिया तेज़ी से बदल रही है। इसे नहीं समझने का ख़ामियाजा सोवियत संघ तथा कुछ अन्य देशों को भुगतना पड़ा था। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि शक्तिशाली साम्राज्यवादी देश इस भ्रम से मुक्त हैं. वे भी बदलती दुनिया को नहीं समझ रहे हैं और अपनी पुरानी नीतियों पर ही चलने की कोशिश जारी रखे हुए हैं। हम यह कह सकते हैं की दुनिया बदल गई लेकिन साम्राज्यवादी सोच या दृष्टि नहीं बदली है।
किसी जमाने में अमरीका, इंग्लैंड, जर्मनी इत्यादि देश दूसरे देशों को गुलाम बनाए रखते थे और जब चाहे तब अपनी फ़ौजें उन देशों में भेज दिया करते थे। विश्व साम्राज्यवादी अर्थ व्यवस्था का जन्म हुआ और दुनिया के बहुत सारे देशों को गुलाम बना लिया गया।
आज दुनिया में बहुत सारे परिवर्तन हो गए हैं। ना सिर्फ़ सोवियत एवं कुछ अन्य देशों का पतन हो सकता है बल्कि एक वैज्ञानिक और तकनीकी क्रांति या एस0टी0आर0 चल रही है जो लोगों के सामने विकास की नई संभावनाएँ खोल दे रही है।
इसे सम्राज्यवाद नियंत्रित करना चाहता है और वह नहीं चाहता कि इसका फायदा आम लोगों और कमजोर देशों को मिले। इससे भी ब़कर वह अकूत तेल भंडारों, खनिज क्षेत्रों, हथियारों के बाज़ारों, तथा अन्य कई प्रकार के मुनाफ़े के स्रोतों का भरपूर लाभ उठना चाहता है। साम्राज्यवाद के कई स्वरूप ज़रूर बदले हैं लेकिन उसका मूल चरित्र नहीं बदला है। दुनिया के तेल भंडारों पर कब्जा करने के लिए उसने अपनी सेनाओं को लामबंद किया है और उन्हें अत्याधुनिक हथियारों से लैस किया है। इराक़ में जिस तरह उसने दखलंदाजी की और फिर बड़े पैमाने पर हमला किया उससे उसका साम्राज्यवादी चरित्र ही उजागर होता है।
अमरीका तेल की राजनीति कुछ उसी तरह चला रहा है जैसे औपनिवेशिक साम्राज्यवादी युग में, खास तौर पर प्रथम और द्वितीय विश्व युद्धों के युग में साम्राज्यवादी चलाया करते थे। पहले यह देश किसी ना किसी बहाने अपनी सेना अरब और एशिया के देशों में भेज कर उन देशों और उनके तेल भंडारों पर कब्जा कर लेते थे और फिर वहाँ पर उनकी कठपुतली या सीधी खुद की सरकारें स्थापित कर दी जाती थीं।
हाल में अमरीका ऐसे ही तरीके अपनाने की कोशिश कर रहा है। उसने इराक़ में 2003 में पूर्व नियोजित तरीके से अपनी फौजें भेजीं। उसने बहाने पहले से तैयार करके रखे, यह जानते हुए कि इनका कोई आधार नहीं और ये पूरी तरह झूठ है। उसने चारो ओर यह ढिंोरा पीटा कि इराक़ बड़े पैमानें पर अत्याधुनिक न्यूक्लियर हथियार या डब्लू.एम.डी. बना रहा है जिसकी जानकारी उसे सी.आई.ए. से मिली, ऐसा बताया। वास्तव में सी.आई.ए. और अन्य को ऐसी झूठी तथा फर्जी रिपोर्टें तैयार करने को कहा गया। प्रेस और टी.वी तथा सारी दुनिया में उच्च दबाव का प्रचार चलाया गया। यू.एन. जाँच कमीशन ने बारबार कहा कि वह जाँच कर रहा है और उसे इसके कोई सबूत अभी नहीं मिले हैं, और यह कि अभी वार्ता के ज़रिए समस्या का हल निकाला जाना चाहिए, सैनिक हस्तक्षेप सही नहीं होगा।
ज्यादातर विश्व जनमत और सरकारों के मत भी इराक़ में सैनिक आक्रमण के विरोध में थे। खुद कई पिश्चमी देशों की सरकारें इस अमरीकी रुख़ के विरोध में और शांतिपूर्ण वार्तालाप तथा अधिक से अधिक आर्थिक नाकेबंदी के हक में थीं। इनमें से एक फ्रांस था जिसने अंत तक अमरीकी कार्रवाई का तीखा विरोध किया था। विकासमान देशों की सरकारें और जनता तो विरोध में थी ही। लेकिन अमरीका ने पहले ही मन बना लिया था और उसी के अनुसार सैनिक तैयारियाँ भी कर रहा था। उसे तो सिर्फ़ कोई बहाना चाहिए था और बहाना नहीं मिलने पर खुद ही कुछ बना लेता। उसे इराक़ में डाका डालने की जल्दी थी और सारे विश्व जनमत तथा स्वयं यू.एन. के नियम क़ानूनों और विश्व संबंधों को नियंत्रित करने वाले तौर तरीकों और क़ानूनों का खुलकर उल्लंघन करते हुए उसने बड़े पैमाने पर इराक़ की जनता और उसकी आज़ादी पर हमला बोल दिया। उस समय की घटनाओं को यदि हम याद करें तो स्मरण होगा कि लगभग सभी चाहते थे अमरीका की हार हो और इराक़ी जनता जीते। मीडिया भी इसी विचार का था। लेकिन कई कारणों से इराक की हार हो गई, जिसमें अमरीका के अत्याधुनिक हथियार और इराक़ के राजनैतिक ढांचे का तानाशाही चरित्र मुख्य कारणों में शामिल था।

-अनिल राजिमवाले

क्रमश:

शुक्रवार, 2 मार्च 2012

भारत या अमरीकी पिट्ठू

यह जानकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि अमरीकी सेनाएं दक्षिणी एशिया के देशों में पाकिस्‍तान के अलावा भारत, श्रीलंका, बांग्‍लादेश, नेपाल के अलावा मालदीव में भी मौजूद हैं। पेंटागन के शीर्ष कमांडर ने खुलासा किया है कि भारत में अमरीकी सेना के खास दस्‍ते की तैनाती की गई है। चीन, भारत, उत्तरी कोरिया और अंतरराष्ट्रीय खतरों से निपटने के लिए बनाया गया है। यह कमांड पहले तो खतरे को अपने तरीके से रोकने की कोशिश करता है। लेकिन अगर तब भी बात नहीं बनी तो एशिया प्रशांत इलाके में बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई के लिए हमेशा तैयार रहता है।
भारत गुट निरपेक्ष आन्दोलन का अध्यक्ष और नेता भी रहा है। छोटे-छोटे जन गणों की आशा का संचार केंद्र रहा है। पता नहीं कब भारत अमेरिकी साम्राज्यवाद का पिट्ठू हो गया है। जैसे बहरीन से लेकर तमाम सारे छोटे छोटे देशों में अमरीकियों ने जेलखाने सी.आई.ए के अड्डे, सैनिक अड्डे बना कर उनकी संप्रभुता का हनन कर लिया है। यह उसी तरह का खतरा है जैसे विधिक अधिकार पत्र के द्वारा सर टामस रो को मुग़लकालीन भारत में व्यापार करने की अनुमति मिली थी और अंत में तिगडम ताल करके भारत को ब्रिटिश आधीन भारत के रूप में परिवर्तित कर दिया था। अभी मालदीव में जो परिवर्तन हुए हैं इस समाचार के आने के बाद यह पुष्टि होती है कि वहां के सत्ता परिवर्तन में अमेरिकी साम्राज्यवादियों का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष हाथ जरूर है।
हमारे देश में तो अमरीकी साम्राज्यवादियों के पैसे से पलने वाले एन.जी.ओ से लेकर राजनीतिक दल तक हैं। केंद्र में सत्तारूढ़ दल में इतना नैतिक साहस भी नहीं था कि वह खुलेआम इस कृत्य को जनता के बीच में ले जाती।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

साम्राज्यवादी शक्तियों का निशाना बने गद्दाफी - 2

इस पूरे घटनाक्रम में पश्चिमी ताकतों का साथ पश्चिमी मीडिया द्वारा पूर्ववत दिया गया। इराक व अफगानिस्तान युद्ध की ही तरह लीबिया को भी दुनिया ने पश्चिमी मीडिया की नज़रों से ही देखा व समझा है। सी0एन0एन0 तथा अन्य कुछ प्रमुख पश्चिमी मीडिया संगठन दुनिया को जो दिखाना व सुनाना चाहते हैं, दुनिया वही देखती व सुनती है। इराक की ही तरह यही लीबिया में भी हुआ है। गद्दाफी द्वारा लीबिया के विकास के लिए किए गए कार्यों को कभी भी विश्व मीडिया ने प्रचारित नहीं किया। जबकि गद्दाफी द्वारा ाए गए ज़ुल्मोसितम को कई गुना ब़ाचढ़ा कर हमेशा पेश किया जाता रहा। वर्तमान विद्रोह के हालात में भी गद्दाफी समर्थक सेना द्वारा विद्रोहियों पर किए जा रहे हमलों को कई गुना ब़ाकर बताया जा रहा था। परंतु गद्दाफी की मौत होने तक उनके द्वारा लीबिया के विकास के लिए किए गए कामों का इसी मीडिया ने कहीं कभी कोई ज़िक्र नहीं किया। हाँ गद्दाफी की मौत के बाद अब यह ज़रूर सुना जा रहा है कि गद्दाफी को मारने वाले व्यक्ति को सज़ा दी जाएगी।
कर्नल गद्दाफी कट्टरपंथी व रूविदी विचारधारा के सख्त विरोधी थे। वे एक अरबअफ्रीकी कबीलाई मुस्लिम तानाशाह होने के बावजूद एक धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के व्यक्ति थे। पश्चिमी देश भी शायद दुनिया में ऐसे ही धर्मनिरपेक्ष शासक चाहते हैं परंतु अपने पिट्ठू रूविदी शासकों को छोड़कर। ऐसे में गद्दाफी के शासन के अंत के बाद अब लीबिया में अभी से इस प्रकार के स्वर बुलंद होने लगे हैं गोया
आधुनिकता की राह पर आगे ब़ता हुआ लीबिया इस सत्ता परिवर्तन के बाद धार्मिक प्रतिबद्धताओं की गिरफ्त में भी आता दिखाई दे रहा है। यदि ऐसा हुआ तो यह रास्ता अफगानिस्तान व पाकिस्तान जैसी मंज़िलों की ओर ही आगे ब़ता है और यदि लीबिया उस रास्ते पर आगे ब़ा तो लीबिया का भविष्य क्या होगा? इस बात का अभी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है। सवाल यह है कि क्या अमरीका अथवा नाटो देश लीबिया के इन ज़मीनी हालात से वाकिफ नहीं हैं। या फिर किसी दूरगामी रणनीति के तहत जानबूझ कर इस सच्चाई से आँखें मूँदे बैठे हैं। दूसरी स्थिति लीबिया में सत्ता संघर्ष की भी पैदा हो सकती है। कर्नल गद्दाफी का अंत तो ज़रूर हो गया है मगर उस कबीलाई समुदाय का अंत नहीं हुआ जिससे कि गद्दाफी का संबंध था तथा जो लीबिया में अपनी मज़बूत स्थिति रखते हैं। आने वाले समय में गद्दाफी समर्थंक ये शक्तियाँ चुनाव में हिस्सा ले सकती हैं तथा सत्ता पर अपने वर्चस्व के लिए सभी हथकंडे अपना सकती हैं। यदि ऐसी स्थिति में लीबिया को गृह युद्ध का सामना करना पड़ा तो निश्चित रूप से पश्चिमी शक्तियाँ ही इसकी ज़िम्मेदार होंगी।
गोया साफतौर पर यह नज़र आता है कि लीबिया को गद्दाफी की तानाशाही व उसकी क्रुरता का बहाना लेकर तबाह व बर्बाद करने की एक सुनियोजित साज़िश रची गई और इराक के घटनाक्रम की ही तरह लीबिया के तेल भंडारों पर अपना नियंत्रण स्थापित करने की चालें पश्चिमी देशों द्वारा बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से चली जा रही हैं। इराक की ही तरह लीबिया भी दुनिया के दस प्रमुख तेल उत्पादक देशों में एक है। लिहाज़ा पश्चिमी देशों को अपने दुश्मन राष्ट्राध्यक्ष की मुट्ठी में लीबिया की तेल संपदा का होना अच्छा नहीं लगा। नतीजतन इन साम्राज्यवादी देशों ने बैठेबिठाए कर्नल गद्दाफी को दुनिया का सबसे क्रुर तानाशाह तथा मानवाधिकारों का हननकर्त्ता बताते हुए उसे मौत की मंज़िल तक पहुँचा दिया। परंतु अंत में यह कहना भी गलत नहीं होगा कि सद्दाम हुसैन रहे हों अथवा कर्नल गद्दाफी इन सभी तानाशाहों को भी यह ज़रूर सोचना चाहिए था कि साम्राज्यवादी पश्चिमी देशों की गिद्ध दृष्टियाँ चूँकि इन देशों की प्राकृतिक तेल संपदा पर टिकी हुई हैं लिहाज़ा उन्हें इन पर नियंत्रण करने हेतु कोई न कोई बहाना तो अवश्य चाहिए। नि:संदेह इन तानाशाहों ने अपने स्वार्थपूर्ण व क्रुरतापूर्ण कारनामों के चलते इन शक्तियों को अपनेअपने देशों में घुसपैठ करने व देश को तबाह करने का सुनहरा अवसर प्रदान किया है। प्रश्न यह है कि अमरीका व पश्चिमी देशों की छलपूर्ण नीतियों का यह सिलसिला कभी समाप्त भी होगा या फिर उनकी इस प्रकार की मनमानी भविष्य में भी यूँही चलती रहेगी?

तनवीर जाफरी
मो. 09896219228
समाप्त

सोमवार, 2 जनवरी 2012

साम्राज्यवादी शक्तियों का निशाना बने गद्दाफी - 1

पश्चिमी देशों द्वारा लिखी गई एक और स्क्रिप्ट के अनुसार लीबिया को स्वतंत्र लोकतांत्रिक राष्ट्र घोषित किया जा चुका है। लीबिया में गत फरवरी से शुरु हुआ जनविद्रोह आखिरकार आठ महीनों के संघर्ष के बाद पिछले दिनों तानाशाह कर्नल मोअम्मर गद्दाफी की मौत के पश्चात अपने पहले चरण को पूरा कर चुका है। पश्चिमी प्रभुत्व वाले विश्व मीडिया के सुनियोजित प्रोपेगंडे के मुताबिक लीबिया को एक क्रुर तानाशाह से मुक्त किया गया है। अब लीबिया को लेकर भी वही प्रश्न उठने लगे हैं कि क्या गद्दाफी व उनके परिवार के चंगुल से लीबिया के मुक्त होने के बाद वहाँ अमन, शांति व लोकतांत्रिक सरकार का वातावरण शीघ्र बन पाएगा? या फिर भविष्य में लीबिया का हश्र भी इराक अथवा अफगानिस्तान जैसा ही होने की संभावना है? नि:संदेह लीबिया के राजा इदरीस का 1969 में तख्ता पलटने के बाद मात्र 27 वर्ष की आयु में लीबिया के प्रमुख नेता के रूप में स्वयं को स्थापित करने वाले कर्नल मोअम्मर गद्दाफी ने अपने लगभग 40 वर्ष के तानाशाह शासन काल के दौरान अपने तानाशाही स्वभाव के अनुसार जमकर मनमानी की। अपने विरोधियों को बुरी तरह प्रताड़ित किया। उनके शासनकाल में कई बार सामूहिक हत्याकांड जैसी घटनाएँ उनके विरोधियों के साथ घटीं, कई बार उन्होंने अपने विरोधियों को कुचलने के लिए बड़े ही अमानवीय व क्रुरतापूर्ण आदेश भी दिए। निश्चित रूप से यही कारण था कि लीबियाई नागरिकों के एक बड़े वर्ग में उनके प्रति नफरत तथा विद्रोह की भावना घर कर गई थी। परिणाम स्वरूप लीबिया की प्रगति के लिए तथा वहाँ की जनता की सुखसुविधाओं हेतु किए गए तमाम विकास संबंधी कार्यों के बावजूद वहाँ की जनता में उनके प्रति विद्रोह की भावना पनप रही थी। ज़ाहिर है लीबिया के इस राजनैतिक वातावरण पर पश्चिमी देशों की गिद्ध दृष्टि काफी लंबे समय से टिकी हुई थी और ये शक्तियाँ केवल मुनासिब वक्त का इंतज़ार कर रही थीं।
पश्चिमी देशों की मुँहमाँगी मुराद उस समय पूरी हो गई जबकि ट्यूनीशिया से शुरू हुए जनविद्रोह ने इसी वर्ष फरवरी में लीबिया को भी अपनी चपेट में ले लिया। सत्ता पर अपना कब्ज़ा बरकरार रखने के लिए उस समय भी गद्दाफी ने अपने ही देश के अपने विरोधियों को कुचलने के लिए सैन्यशक्ति का इस्तेमाल करना शुरु कर दिया था। गद्दाफी द्वारा की जा रही सैन्य कार्रवाई को एक बार फिर पश्चिमी शक्तियों ने पश्चिमी मीडिया के सहयोग से ब़ाचढ़ा कर प्रचारित किया। साम्राज्यवादी शक्तियों को गद्दाफी व उसकी सेना द्वारा उठाया जाने वाला यह कदम विश्व में मानवाधिकारों का अब तक का सबसे बड़ा उल्लंघन नज़र आया। परिणाम स्वरूप नाटो की वायुसेना ने लीबिया में सीधा हस्तक्षेप किया और आखिरकार आठ महीने तक चले इस संघर्ष में जीत नाटो की ही हुई। ताज़ा हालात के मुताबिक लीबिया में राजनैतिक कामकाज सँभालने के लिए अस्थाई रूप से बनी राष्ट्रीय अंतरिम परिषद ने देश में अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया तथा शीघ्र ही चुनाव कराए जाने की घोषणा भी कर दी गई है। दुनिया को लीबिया के विषय में यही बताया जा रहा है कि एक क्रुर तानाशाह के साथ जो कुछ भी होना चाहिए था लीबिया में वही देखने को मिला। इराक में सद्दाम हुसैन के शासन के पतन के समय भी लोकतांत्रिक विचारधारा के समर्थकों की ऐसी ही राय थी। परंतु क्या पश्चिमी देशों के विशेषकर अमरीका के सहयोगी राष्ट्रों को दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक देशों में सत्ता पर काबिज़ वही तानशाह, क्रुर व अमानवीय प्रवृति के तानाशाह नज़र आते हैं जो अमरीका या अन्य पश्चिमी देशों की मुट्ठी में रहना पसंद नहीं करते? बारबार यह प्रश्न उठता है कि तेल उत्पादक देशों के वे तानाशाह जिनके अमरीका के साथ मधुर संबंध हैं वहाँ अमरीका लोकतंत्र स्थापित करने की बात क्यों नहीं करता?
अमरीकी पिट्ठू तमाम ऐसे देश हैं जहाँ मानवाधिकारों का इस क़दर हनन होता है कि महिलाओं को घर से बाहर निकलने तक की इजाज़त नहीं है, वे सार्वजनिक कार्यक्रमों व खेलकूद में हिस्सा नहीं ले सकतीं, स्कूलकॉलेज नहीं जा सकतीं, जहाँ बादशाह के विरुद्ध आवाज़ बुलंद करने वालों के मुंँह बलपूर्वक बंद कर दिए जाते हैं, जहाँ कभी लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया के दौर से देश की जनता न गुज़री हो वहाँ आखिर लोकतंत्र स्थापित करने की बात अमरीका व अन्य पश्चिमी देशों द्वारा क्यों नहीं की जाती? परंतु इन सब नकारात्मक व अलोकतांत्रिक परिस्थितियों के बावजूद ऐसे देशों के शासक चूँकि अमरीका के पिट्ठू हैं लिहाज़ा ऐसे देशों में इन्हें तानाशाही स्वीकार्य है और यदि यही तानाशाह सद्दाम अथवा गद्दाफी की तरह अमरीका की आँखों में आँखें डालकर देखने का साहस रखते हों तो गोया दुनिया में इनसे बुरा व क्रुर तानाशाह कोई भी नहीं? इन हालात में स्थानीय विद्रोह को हवा देने में यह पश्चिमी देश देर नहीं लगाते। गद्दाफी के तमाम तानाशाहीपूर्ण रवैयों तथा मनमानी के बावजूद एक सच्चाई यह भी है कि लीबिया के विकास के लिए विशेष सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा तथा उद्योग के क्षेत्र में लीबिया की जो हकीकत बयान की जाती है वह वास्तव में किसी विकसित राष्ट्र जैसी ही प्रतीत होती है। हाँ गद्दाफी के क्रुर स्वभाव को लेकर लीबिया की जनता में ज़रूर गद्दाफी के प्रति विरोध की भावना पनप रही थी। जनता की इस भावना का पहले तो गद्दाफी के स्थानीय राजनैतिक विरोधियों ने लाभ उठाया और बाद में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गद्दाफी से खुश न रहने वाली पिश्चमी ताकतों ने गद्दाफी के विरुद्ध छिड़े विद्रोह को ही अपना मज़बूत हथियार बनाया। नाटो की दखल अंदाज़ी से गद्दाफी को मौत की दहलीज़ तक पहुँचा दिया। पश्चिमी देशों की दखल अंदाज़ी ने गद्दाफ़ी से लीबिया को भले ही मुक्त करा दिया हो परंतु लीबिया के भविष्य को लेकर ज़बरदस्त खतरा भी मँडराने लगा है।

तनवीर जाफरी
मो. 09896219228
( क्रमश: )

मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

अमेरिका एशिया को गुलाम बनाने की ओर अग्रसर

ब्रिटिश साम्राज्यवाद की मुक्ति के बाद एशियाई मुल्कों को अमेरिकी साम्राज्यवाद ने पूरी तरीके से अपनी मुट्ठी में लेने के लिये और लोकतंत्र के बहाने उसने कई मुल्कों में अपने पिट्ठू शासक नियुक्त कर लिये हैं। अफगानिस्तान से लीबिया (अफ्रीकी मुल्क) तक उसके पिट्ठू शासक ही राज कर रहे हैं। सीरिया में लोकतंत्र के बहाने अमेरिकी साम्राज्यवाद अपना पिट्ठू शासक नियुक्त करने की दिशा में अग्रसर है। विशेष बात यह भी है कि जो मुल्क ब्रिटिश साम्राज्यवाद के अधीन नहीं भी रहे हैं उनको भी अमेरिकी साम्राज्यवाद ने अपने खेमे में कर लिया है।

ईरान में ब्रिटीश दूतावास पर ईरानी जनता के द्वारा किये गए प्रदर्शन और तोड़फोड़ के बाद ईरान के खिलाफ अमेरिकी मीडिया के माध्यम से पूरी दुनिया में दुष्प्रचार कार्य तेजी पर हैं। ईरान ने अमेरिकी जासूसी विमान को मार गिराने का दवा किया है। अमेरिकी व उसके मित्र देश ईरान की जासूसी कर रहे हैं और उसके आन्तरिक मामलों में हस्ताक्षेप कर वहां की सरकार को नेस्तनाबूत करना चाहते हैं।वहीँ, ईरान पर कब्ज़ा करने के लिये पाकिस्तान का भी समर्थन चाहिए इसके लिये वह शासकों को मानाने में लगा हुआ है। चीन की आर्थिक ताकत को नष्ट करने के लिये अमेरिकी मीडिया की कोशिश है कि वह भारत और चीन को आपस में लड़ा कर दोनों देशों की ताकत को नष्ट कर दे।जिस गति से अमेरिका व नाटो सेनायें एशियाई मुल्कों में अपने पिट्ठू शासक नियुक्त कर रही है उससे लगता है कि शीघ्र ही एशिया अमेरिकी साम्राज्यवादियों की प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से उपनिवेश होगी।
सुमन
लो क सं घ र्ष !

रविवार, 27 नवंबर 2011

पाकिस्तान का साम्राज्यवादियों के साथ रहने का हश्र

पाकिस्तान के बनने के बाद से ही वह अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ रहा है। साम्राज्यवादियों ने पाकिस्तान के विकास को पूरी तरह से अवरुद्ध किया और आर्थिक रूप से अपना गुलाम बना लिया। अफगानिस्तान के बहाने अब वह पाकिस्तान की संप्रभुता को पूरी तरह से नष्ट करने पर तुला हुआ है। जिसकी परिणिति ओसामा के एनकाउन्टर के रूप में हुई है और हद तो तब हो गयी कि जब अभी नाटो सेनाओं ने 28 पाकिस्तानी सैनिको को मार गिराया। इस नाटो हमले में काफी सैनिक घायल भी हुए हैं। पाकिस्तान बेचारा कर भी क्या सकता है। विरोध जताया उधर से माफ़ी नामा तुरंत आ गया। ब्रिटिश भारत में भी जिस राजा को तुरंत परास्त नही किया जा सकता था। उसके साथ भी इसी तरह की हरकतें ब्रिटिश साम्राज्यवादी करते थे और जब राजा विरोध करता था तो माफ़ी मांग लेते थे और फिर उसके बाद ब्रिटिश सेनायें के ताकतवर होते ही उस राज्य को अपने में मिला लेते थे।
पाकिस्तान के पास अमेरिकियों व नाटो सेनाओं से बचने का कोई विकल्प बाकी है तो वह चीन के साथ दोस्ती ही है। चीन की दोस्ती से उसकी लाज शायद ही बच सके क्यूंकि चीन भी उसकी रक्षा करने के लिये युद्ध में जाना पसंद नही करेगा।
साम्राज्यवाद मगरमच्छ है प्रतिदिन उसको भोजन के लिये मगरमच्छ की तरह मांस की आवश्यकता है। साम्राज्यवाद प्राकृतिक स्रोत्रों के दोहन के लिये उसको दुनिया के अधिकांश देशों को गुलाम बनाना उसकी मजबूरी है। भोजन के लिये दोस्त और दुश्मन का फर्क यहीं ख़त्म हो जाता है।

रविवार, 13 नवंबर 2011

अमेरिकी कुत्ते को राष्ट्राध्यक्ष जैसा सम्मान


देश के पूर्व राष्ट्रपति कलाम की अमेरिका ने 29 सितम्बर 2011 को प्लेन में जैकेट व जूते उतरवाकर ले जाया गया और फिर थोड़ी देर बाद वापस कर दिया गया। इस तरह हमारे देश के राजनेताओं की अमेरिकियों द्वारा हमेशा बेइज्जती की जाती है। इसके पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई के चेहरे के ऊपर शराब गिराना, रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीज की नंगा जोरी लेना सहित नौकरशाहों राजदूतों की तलाशी के नाम पर बेइज्जती करने की काफी घटनाएं हो चुकी हैं और हर बार घटना का खुलासा घटना हो जाने के काफी दिनों के बाद होता है। हमारे देश के राजनेता, नौकरशाह बेशर्म भी बहुत हैं। विदेश यात्रा का नाम आ जाए तो कुछ भी करने के लिये तैयार हैं इसका एक मात्र अपवाद पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी थे। जिन्होंने विभिन्न देशों की संसद के अध्यक्षों के सम्मलेन में इसलिए भाग लेने से इनकार कर दिया क्यूंकि उन्होंने ने कहा था कि वहां जाकर तलाशी के नाम पर मुझे अपनी बेइज्जती नही करानी है।
इसके विपरीत अमेरिकी कुत्ता भी अगर हमारे देश में आ जाये तो हम उसे राष्ट्राध्यक्ष जैसे सम्मान देने के लिये आतुर रहते हैं। देश के अन्दर एक बहुत बड़ी जमात अमेरिकियों की मानसिक गुलामी करने वालों की है। पहले यही जमात ब्रिटिश साम्राज्यवादियों को इस देश में स्थापित किया था। आज जरूरत इस बात की है कि अमेरिकी साम्राज्यवादियों को मुंह तोड़ जवाब दिया जाए अन्यथा सीरिया, ईरान के बाद यह हमारे देश को भी गुलाम बनाने की कोशिश करेगा।

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

अमेरिका में "जन विरोध "

इस आन्दोलन का सर्वाधिक उल्लेखनीय मुद्दा वहा के धनाढ्य साम्राज्यी कम्पनिया , कारपोरेट घरानों की भारी लूट और उसके फलस्वरूप समाज में फैलती रही अबराबरी हैं | आंदोलनकारी कारपोरेट कम्पनियों के लूट के साथ वहा की सरकार द्वारा 2008 से विशाल वित्तीय व औद्योगिक कम्पनियों को राहत पैकेज देने का विरोध कर रहे हैं |इसे व अमेरिकी समाज में बैंक उद्योग जगत की हस्तियों की बढती तानाशाही कहकर विरोध कर रहे है |

अमेरिका चर्चा में है | एक अलग और नई वजह से | पिछले 4 - 5 सप्ताह से वहा "वाल स्ट्रीट पर कब्जा करो " का नया आन्दोलन खड़ा होगया हैं | सूचनाओं के अनुसार उस आन्दोलन में ज्यादातर लोग युवा वर्ग के हैं | पूर्ण व अर्द्ध बेरोजगार हैं | इसके अलावा उसमे प्रौढ़ एवं बूढ़े पुरुषो , महिलाओं की भी एक जमात शामिल है | न्यूयार्क शहर के 'वाल स्ट्रीट ' नाम के वित्तीय केंद्र से शुरू हुआ आन्दोलन अमेरिका तथा इटली , स्पेन जैसे यूरोपीय देशो तथा टोकियो व सिडनी जैसे एशियाई व आस्ट्रेलियाई महादीप के नगरो में फैलता जा रहा है |यह ' आन्दोलन ' विकासशील देशो में नही बल्कि विकसित राष्ट्रों में ही सीमित हैं | इस आन्दोलन का चरित्र कितना वास्तविक और गंभीर हैं | इस पर निश्चित होकर नही कहा जा सकता | यह भी नही कहा जा सकता की यह बेरोजगारी जैसी समस्याओ से ग्रस्त अमेरिकी जनता का स्वत: का उभार है या कोई प्रायोजित उभार हैं , जो अमेरिकी जनता में बढ़ रहे असंतोष व असमानता की समस्याओ को आगे करके खड़ा कर दिया गया हैं | इन तमाम शकाओ , दुविधाओ के वावजूद ' वाल स्ट्रीट पर कब्जा करो ' के मुद्दों की असलियत के बारे में शक - सुबहा करने की शायद कोई गुंजाइश नही हैं | वे मुद्दे अमेरिकी जनता के खासे बड़े हिस्से को अब प्रभावित करते जा रहे हैं |पहले 2008 में बहुप्रचारित अमेरिकी वित्तीय - संकट , फिर अब अमेरिकी सरकार के कर्ज़ - संकट के फलस्वरूप वहा के जनसाधारण के खासे बड़े हिस्से में अमेरिकी स्टैन्डर्ड से फैलती बढती अर्द्ध व पूर्ण बेरोजगारी के साथ पहले के अधिकाधिक एवं स्वछन्द उपभोग में कमी का संकट बढ़ता जा रहा हैं | बेरोजगार नौजवानों तथा अमेरिकी स्टैन्डर्ड के हिसाब से अभावग्रस्त हो रहे लोगो का बहुप्रचारित जमावड़ा इन्ही समस्याओं के चलते हुआ हैं | आन्दोलन में उनके विरोध के प्रमुख मुद्दों में , तेज़ी से बढती बेरोजगारी के साथ - साथ सरकारी व गैरसरकारी संस्थाओं में लगे लगाये लोगो की छटनी भी शामिल हैं | इसके अलावा इस आन्दोलन का सर्वाधिक उल्लेख्य्नीय मुद्दा वहा के धनाढ्य साम्राज्यी कम्पनियों , कारपोरेट घरानों की भारी लूट और उसके फलस्वरूप समाज में फैलती रही अब्राब्री हैं | आंदोलनकारी कारपोरेट कम्पनियों के लूट के साथ वहा की सरकार द्वारा 2008 से विशाल वित्तीय व औद्योगिक कम्पनियों को राहत पॅकेज देने का विरोध कर रहे हैं |उनका यह भी कहना है कि वित्तीय संकट और कर्ज़ संकट के चलते अमेरिकी जनता को बेकारी व उपभोग के संकट तथा घर मकान आदि के संकट झेलने पड़ रहे है | पर अमेरिकी बैंक व कारपोरेट जगत जमकर मुनाफ़ा लूट रहे है |आन्दोलनकारी कारपोरेट जगत द्वारा अपने पक्ष में सांसदों को मोड़ने के लिए धन देकर अपना गुट खड़ा करने (लाबिंग करने )का भी विरोध कर रहे है | इसे व अमेरिकी समाज में बैंक उद्योग जगत की हस्तियों की बढती तानाशाही कहकर विरोध कर रहे हैं | विरोध के अन्य मुद्दों में राजनीति में बढ़ रहा भ्रष्टाचार तथा पानी आदि के स्रोतों व सप्लाई का निजीकरण आदि का भी विरोध शामिल हैं | अमेरिकी आन्दोलन - कारियों व प्रदर्शन कारियों के ये मुद्दे गलत नही हैं | ठीक हैं | फिर औद्योगिक एवं बैंकिंग क्षेत्र के कारपोरेट शक्तियों की लूट के विरोध के साथ सरकार द्वारा उनको दीये जाने वाला प्रोत्साहन पॅकेज का विरोध इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वे अपनी बेकारी व अभाव को मुख्यत:वहा के धनाढ्यतंम कम्पनियों की लूट में देख रहे है न कि सरकारों , पार्टियों व अफसरशाही आदि की कारगुजारियो में ही | इसी संदर्भ में यह भी महत्वपूर्ण है कि उन्होंने अपने आन्दोलन का क्षेत्र राजनीति के केंद्र वाशिगटन की जगह न्यूयार्क को और उसके वित्तीय केंद्र ' वाल स्ट्रीट' को बनाया हुआ है | इसी के साथ इस आन्दोलन के नकारात्मक पहलू भी ध्यान देने लायक है | उन्होंने अपने आन्दोलन में ईराक , अफगानिस्तान , लीबिया पर हो रही हमलावर कारवाइयो का कोई विरोध नही किया गया | जबकि उन कारवाइयो के लिए तेल - पेट्रोल की कम्पनियों से लेकर अमेरिकी हथियार कम्पनियों का ही सबसे ज्यादा दबाव रहा है और उन्हें इसका सबसे ज्यादा लाभ भी मिलता रहा है |इसी के साथ यह भी सच्चाई है कि अमेरिकी वित्तीय - संकट और अब कर्ज़ - संकट के बढने का एक सबसे बड़ा कारण भी अमेरिकी सरकार का बढ़ता युद्ध खर्च ही रहा है |उसी का परिणाम अमेरिकी जनता की बढती बेरोजगारी , गिरती क्रय शक्ति और गिरते उपभोग आदि के रूप में आता जा रहा है |इसके वावजूद अमेरिकी साम्राज्यी कारपोरेट जगत के विश्व व्यापी आर्थिक कुटनीतिक प्रभुत्व के लिए किए जा रहे कारवाइयो व हमलो का अमेरिकी जनता द्वारा विरोध न किया जाना , उसके द्वारा अमेरिकी साम्राज्यवादी प्रभुत्व को स्वीकारने और इस पर गर्व करने का भी परिलक्षण है | साथ ही अपनी बढती समस्याओं के प्रमुख कारण व कारक को नजर अंदाज़ करना भी है | उनकी यह चुप्पी 1947 से पहले ब्रिटिश शासन और उसके प्रभुत्व में हो रही लूट पर शांत रही या शान्ति के साथ लूट का उपभोग कर रही ब्रिटिश जनता की कार्बन कापी है | लेकिन यह भी निश्चित है कि अगर ब्रिटिश व अमेरिकी जनता दूसरे देशो की आर्थिक लूट और कुटनीतिक सांस्कृतिक व सैन्य प्रभुत्व का विरोध नही करती तो वहा के साम्राज्यी कारपोरेट जगत के लूट के फलस्वरूप अपनी बढती रही बेकारी व उपभोग की समस्याओं का भी स्थायी निदान नही निकाल सकती | लेकिन यह बात तो अमेरिका व यूरोपीय देशो की जनता के लिए सच है | उनके आन्दोलन के इस भारी कमी के वावजूद उनके आन्दोलन के मुद्दे भारत जैसे पिछड़े देशो के जनसाधारण के लिए निश्चित ही सबक देने वाले हैं | हमारे देश में अभी भी बढती महगाई , बेकारी तथा खेती किसानी आदि के संकटों के लिए लोग इस देश के और अमेरिका ब्रिटेन आदि देश कारपोरेट जगत के लूट को प्रमुखत: जिम्मेवार नही जान व मान पा रहे है | हम आर्थिक समस्याओं के कारणों को राजनितिक पार्टियों व नौकरशाही के कारगुजारियो तक में ही देखने के आदि बने हुए है | जबकि सरकारे व नौकरशाही देशी - विदेशी कारपोरेट जगत को लाभ देने और बदले में जन - समस्याओं को बढाने का काम करती जा रही हैं | सरकारे इसी लक्ष्य से उदारीकरणवादी , वैश्वीकरणवादी तथा निजीकरणवादी नीतियों को लागू करने में जी जान से जुटी हुई है |उसको आगे बढाने में लगी हुई है | धनाढ्य कम्पनियों को लाखो - करोड़ो के सलाना पॅकेज पर पॅकेज दीये जा रहे है |सबके फलस्वरूप आम लोगो में साधारण जीवन जी पाने तक का संकट बढ़ता जा रहा है |किसानो , मजदूरों , दस्तकारो द्वारा लाखो आत्महत्याए किए जाने का सिलसिला बढ़ता जा रहा है | राष्ट्र व समाज का छोटे से खुशहाल भारत और व्यापक रूप में बदहाल भारत में बटवारा बढ़ता जा रहा है | एक तरफ खरबपतियो , अरबपतियो और दूसरी तरफ सैकड़ापतियों के बीच अमीरी - गरीबी की भयंकर -असमानता बढती जा रही है | साधनहीन और औसत घरो के नौजवानों में भयंकर बेकारी , बेरोजगारी व अभावग्रस्तता बढती जा रही है | इसलिए अमेरिका में खड़ा हुआ आंदोलन वास्तविक हो या दिखावटी या प्रायोजित , पर उन मुद्दों को लेकर इस देश में देशी विदेशी कारपोरेट जगत की लूट और उसको बढाने वाली नीतियों , सुधारों तथा सत्ता सरकारों के विरुद्ध वास्तविक जन - आन्दोलन की , मेहनतकशो एवं नवयुवको के आन्दोलन की पूरी शिद्दत के साथ दरकार है , इन्तजार हैं |
ऐसे वक्त में मजाज लखनवी की वो बाते याद आ रही है .....

बोल ! अरी, ओ धरती बोल !
राज सिंहासन डाँवाडोल!

बादल, बिजली, रैन अंधियारी, दुख की मारी परजा सारी
बूढ़े़, बच्चे सब दुखिया हैं, दुखिया नर हैं, दुखिया नारी
बस्ती-बस्ती लूट मची है, सब बनिये हैं सब व्यापारी

बोल ! अरी, ओ धरती बोल !

कलजुग में जग के रखवाले चांदी वाले सोने वाले,
देसी हों या परदेसी हों, नीले पीले गोरे काले
मक्खी भुनगे भिन-भिन करते ढूंढे हैं मकड़ी के जाले,
बोल ! अरी, ओ धरती बोल !

क्या अफरंगी, क्या तातारी, आँख बची और बरछी मारी!
कब तक जनता की बेचैनी, कब तक जनता की बेजारी,
कब तक सरमाए के धंदे, कब तक यह सरमायादारी,
बोल ! अरी, ओ धरती बोल !

नामी और मशहूर नहीं हम, लेकिन क्या मज़दूर नहीं हम
धोखा और मज़दूरों को दें, ऐसे तो मज़बूर नहीं हम,
मंज़िल अपने पाँव के नीचे, मंज़िल से अब दूर नहीं हम,
बोल ! अरी, ओ धरती बोल !

बोल कि तेरी खिदमत की है, बोल कि तेरा काम किया है,
बोल कि तेरे फल खाये हैं, बोल कि तेरा दूध पिया है,
बोल कि हमने हश्र उठाया, बोल कि हमसे हश्र उठा है,
बोल कि हमसे जागी दुनिया
बोल कि हमसे जागी धरती
बोल ! अरी, ओ धरती बोल !
राज सिंहासन डाँवाडोल!

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

शुक्रवार, 6 मई 2011

अमेरिकन साम्राज्यवाद में सूरज अस्त नहीं होगा और न ही चाँद डूबेगा

ब्रिटिश साम्राज्यवाद की सीमाओं में सूरज अस्त नहीं होता था। आने वाले दिनों में अमेरिकन साम्राज्यवाद के तहत दुनिया उसकी गुलाम होगी तब यह कहना उचित होगा कि न सूरज अस्त होता है न चाँद डूबता है। अफगानिस्तान, ईराक, कुवैत सहित एशिया व अफ्रीका के काफी मुल्कों को अमेरिकन साम्राज्यवाद ने अपना गुलाम बना लिया है। बहाना चाहे आतंकवाद का हो, परमाणु हथियार का हो, लोकतंत्र स्थापित करने का चाहे मामला हो इन बहानो के तहत वह दुनिया को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से गुलाम बनाने का एक हिस्सा होते हैं। भारत को जब ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने गुलाम बनाया था तो तरह-तरह के हथकंडे, बहाने वह लोग ढूंढ कर पहले से रखते थे और फिर उन्ही बहानों को लेकर पूरे देश पर अधिपत्य कर लिया था। अमेरिकन साम्राज्यवाद के पास दुनिया को गुलाम बनाने के लिये संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी मजबूत संस्था भी है। अमेरिकियों के इशारे पर यह संस्था लीबिया में नो फ्लाई जोन का प्रस्ताव पारित कर सकती है किन्तु नो फ्लाई जोन में नाटो को युध्मारक विमान उड़ाने की खुली छूट है। नाटो सेनाओ को तानाशाह कर्नल गद्दाफी से ज्यादा भयानक नरसंहार करने की खुली आजादी भी संयुक्त राष्ट्र संघ देता है। ईराक में अमेरिकी कार्यवाइयों के समय अमेरिका व उसकी समर्थक फौजें नरसंहार कर रही थी तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् जैसी संस्थाएं अप्रत्यक्ष रूप से उनका समर्थन कर रही थी। उस समय लोकतंत्र, समानता, न्याय, विश्व बंधुत्व अमेरिकी राष्ट्रपति के पैरों के नीचे था। अब अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान के अन्दर एबटाबाद दोहराने की जब भी जरूरत महसूस होगी दोहराया जायेगा। वहीँ, पाकिस्तान के विदेश सचिव सलमान बशीर ने कहा है कि अगर कोई देश पकिस्तान के अन्दर घुसने की जुर्रत करता है तो उसका मुंहतोड़ जवाब दिया जायेगा। इस तरह की बयानबाजी के बाद अमेरिकन पकिस्तान की आर्थिक मदद रोक कर उसकी सार्वभौमिकता व संप्रभुता का हरण कर उसको गुलाम बना लेगा।
चीन, ईरान, उत्तर कोरिया, भारत जैसे देश अमेरिकन साम्राज्यवादियों के प्रस्ताव के समय संयुक्त राष्ट्र में बहिष्कार जैसे अस्त्र का इस्तेमाल कर उसको मनमानी करने का पूरा मौका देते रहेंगे। पकिस्तान के बाद किसी न किसी बहाने उक्त देशों में से किसी का नंबर लगेगा। और धीरे धीरे ग्लोबल दुनिया का बेताज बादशाह अमेरिकन साम्राज्यवाद होगा और हमें उसकी गुलामी करने के लिये मानसिक रूप से तैयार होना पड़ेगा।

सुमन
लो क सं घ र्ष !
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