सोमवार, 2 जनवरी 2012

साम्राज्यवादी शक्तियों का निशाना बने गद्दाफी - 1

पश्चिमी देशों द्वारा लिखी गई एक और स्क्रिप्ट के अनुसार लीबिया को स्वतंत्र लोकतांत्रिक राष्ट्र घोषित किया जा चुका है। लीबिया में गत फरवरी से शुरु हुआ जनविद्रोह आखिरकार आठ महीनों के संघर्ष के बाद पिछले दिनों तानाशाह कर्नल मोअम्मर गद्दाफी की मौत के पश्चात अपने पहले चरण को पूरा कर चुका है। पश्चिमी प्रभुत्व वाले विश्व मीडिया के सुनियोजित प्रोपेगंडे के मुताबिक लीबिया को एक क्रुर तानाशाह से मुक्त किया गया है। अब लीबिया को लेकर भी वही प्रश्न उठने लगे हैं कि क्या गद्दाफी उनके परिवार के चंगुल से लीबिया के मुक्त होने के बाद वहाँ अमन, शांति लोकतांत्रिक सरकार का वातावरण शीघ्र बन पाएगा? या फिर भविष्य में लीबिया का हश्र भी इराक अथवा अफगानिस्तान जैसा ही होने की संभावना है? नि:संदेह लीबिया के राजा इदरीस का 1969 में तख्ता पलटने के बाद मात्र 27 वर्ष की आयु में लीबिया के प्रमुख नेता के रूप में स्वयं को स्थापित करने वाले कर्नल मोअम्मर गद्दाफी ने अपने लगभग 40 वर्ष के तानाशाह शासन काल के दौरान अपने तानाशाही स्वभाव के अनुसार जमकर मनमानी की। अपने विरोधियों को बुरी तरह प्रताड़ित किया। उनके शासनकाल में कई बार सामूहिक हत्याकांड जैसी घटनाएँ उनके विरोधियों के साथ घटीं, कई बार उन्होंने अपने विरोधियों को कुचलने के लिए बड़े ही अमानवीय क्रुरतापूर्ण आदेश भी दिए। निश्चित रूप से यही कारण था कि लीबियाई नागरिकों के एक बड़े वर्ग में उनके प्रति नफरत तथा विद्रोह की भावना घर कर गई थी। परिणाम स्वरूप लीबिया की प्रगति के लिए तथा वहाँ की जनता की सुखसुविधाओं हेतु किए गए तमाम विकास संबंधी कार्यों के बावजूद वहाँ की जनता में उनके प्रति विद्रोह की भावना पनप रही थी। ज़ाहिर है लीबिया के इस राजनैतिक वातावरण पर पश्चिमी देशों की गिद्ध दृष्टि काफी लंबे समय से टिकी हुई थी और ये शक्तियाँ केवल मुनासिब वक्त का इंतज़ार कर रही थीं।
पश्चिमी देशों की मुँहमाँगी मुराद उस समय पूरी हो गई जबकि ट्यूनीशिया से शुरू हुए जनविद्रोह ने इसी वर्ष फरवरी में लीबिया को भी अपनी चपेट में ले लिया। सत्ता पर अपना कब्ज़ा बरकरार रखने के लिए उस समय भी गद्दाफी ने अपने ही देश के अपने विरोधियों को कुचलने के लिए सैन्यशक्ति का इस्तेमाल करना शुरु कर दिया था। गद्दाफी द्वारा की जा रही सैन्य कार्रवाई को एक बार फिर पश्चिमी शक्तियों ने पश्चिमी मीडिया के सहयोग से ब़ाचढ़ा कर प्रचारित किया। साम्राज्यवादी शक्तियों को गद्दाफी व उसकी सेना द्वारा उठाया जाने वाला यह कदम विश्व में मानवाधिकारों का अब तक का सबसे बड़ा उल्लंघन नज़र आया। परिणाम स्वरूप नाटो की वायुसेना ने लीबिया में सीधा हस्तक्षेप किया और आखिरकार आठ महीने तक चले इस संघर्ष में जीत नाटो की ही हुई। ताज़ा हालात के मुताबिक लीबिया में राजनैतिक कामकाज सँभालने के लिए अस्थाई रूप से बनी राष्ट्रीय अंतरिम परिषद ने देश में अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया तथा शीघ्र ही चुनाव कराए जाने की घोषणा भी कर दी गई है। दुनिया को लीबिया के विषय में यही बताया जा रहा है कि एक क्रुर तानाशाह के साथ जो कुछ भी होना चाहिए था लीबिया में वही देखने को मिला। इराक में सद्दाम हुसैन के शासन के पतन के समय भी लोकतांत्रिक विचारधारा के समर्थकों की ऐसी ही राय थी। परंतु क्या पश्चिमी देशों के विशेषकर अमरीका के सहयोगी राष्ट्रों को दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक देशों में सत्ता पर काबिज़ वही तानशाह, क्रुर व अमानवीय प्रवृति के तानाशाह नज़र आते हैं जो अमरीका या अन्य पश्चिमी देशों की मुट्ठी में रहना पसंद नहीं करते? बारबार यह प्रश्न उठता है कि तेल उत्पादक देशों के वे तानाशाह जिनके अमरीका के साथ मधुर संबंध हैं वहाँ अमरीका लोकतंत्र स्थापित करने की बात क्यों नहीं करता?
अमरीकी पिट्ठू तमाम ऐसे देश हैं जहाँ मानवाधिकारों का इस क़दर हनन होता है कि महिलाओं को घर से बाहर निकलने तक की इजाज़त नहीं है, वे सार्वजनिक कार्यक्रमों व खेलकूद में हिस्सा नहीं ले सकतीं, स्कूलकॉलेज नहीं जा सकतीं, जहाँ बादशाह के विरुद्ध आवाज़ बुलंद करने वालों के मुंँह बलपूर्वक बंद कर दिए जाते हैं, जहाँ कभी लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया के दौर से देश की जनता न गुज़री हो वहाँ आखिर लोकतंत्र स्थापित करने की बात अमरीका व अन्य पश्चिमी देशों द्वारा क्यों नहीं की जाती? परंतु इन सब नकारात्मक व अलोकतांत्रिक परिस्थितियों के बावजूद ऐसे देशों के शासक चूँकि अमरीका के पिट्ठू हैं लिहाज़ा ऐसे देशों में इन्हें तानाशाही स्वीकार्य है और यदि यही तानाशाह सद्दाम अथवा गद्दाफी की तरह अमरीका की आँखों में आँखें डालकर देखने का साहस रखते हों तो गोया दुनिया में इनसे बुरा व क्रुर तानाशाह कोई भी नहीं? इन हालात में स्थानीय विद्रोह को हवा देने में यह पश्चिमी देश देर नहीं लगाते। गद्दाफी के तमाम तानाशाहीपूर्ण रवैयों तथा मनमानी के बावजूद एक सच्चाई यह भी है कि लीबिया के विकास के लिए विशेष सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा तथा उद्योग के क्षेत्र में लीबिया की जो हकीकत बयान की जाती है वह वास्तव में किसी विकसित राष्ट्र जैसी ही प्रतीत होती है। हाँ गद्दाफी के क्रुर स्वभाव को लेकर लीबिया की जनता में ज़रूर गद्दाफी के प्रति विरोध की भावना पनप रही थी। जनता की इस भावना का पहले तो गद्दाफी के स्थानीय राजनैतिक विरोधियों ने लाभ उठाया और बाद में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गद्दाफी से खुश न रहने वाली पिश्चमी ताकतों ने गद्दाफी के विरुद्ध छिड़े विद्रोह को ही अपना मज़बूत हथियार बनाया। नाटो की दखल अंदाज़ी से गद्दाफी को मौत की दहलीज़ तक पहुँचा दिया। पश्चिमी देशों की दखल अंदाज़ी ने गद्दाफ़ी से लीबिया को भले ही मुक्त करा दिया हो परंतु लीबिया के भविष्य को लेकर ज़बरदस्त खतरा भी मँडराने लगा है।

तनवीर जाफरी
मो. 09896219228
( क्रमश: )

2 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

दस दिनों तक नेट से बाहर रहा! केवल साइबर कैफे में जाकर मेल चेक किये और एक-दो पुरानी रचनाओं को पोस्ट कर दिया। लेकिन आज से मैं पूरी तरह से अपने काम पर लौट आया हूँ!
नववर्ष की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी होगी!

Rajesh Kumari ने कहा…

bahut achcha aalekh hai.bharat ko bhi jagruk rahne ki jaroorat hai desh ki aantrik sthiti par pashchimi deshon ki ya padosi deshon ki gidhdh vaali drashti humesha lagi rahti hai.ghar ki kamjori baahar vaalo ki takat ban jaati hai.