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मंगलवार, 3 जनवरी 2012

साम्राज्यवादी शक्तियों का निशाना बने गद्दाफी - 2

इस पूरे घटनाक्रम में पश्चिमी ताकतों का साथ पश्चिमी मीडिया द्वारा पूर्ववत दिया गया। इराक व अफगानिस्तान युद्ध की ही तरह लीबिया को भी दुनिया ने पश्चिमी मीडिया की नज़रों से ही देखा व समझा है। सी0एन0एन0 तथा अन्य कुछ प्रमुख पश्चिमी मीडिया संगठन दुनिया को जो दिखाना व सुनाना चाहते हैं, दुनिया वही देखती व सुनती है। इराक की ही तरह यही लीबिया में भी हुआ है। गद्दाफी द्वारा लीबिया के विकास के लिए किए गए कार्यों को कभी भी विश्व मीडिया ने प्रचारित नहीं किया। जबकि गद्दाफी द्वारा ाए गए ज़ुल्मोसितम को कई गुना ब़ाचढ़ा कर हमेशा पेश किया जाता रहा। वर्तमान विद्रोह के हालात में भी गद्दाफी समर्थक सेना द्वारा विद्रोहियों पर किए जा रहे हमलों को कई गुना ब़ाकर बताया जा रहा था। परंतु गद्दाफी की मौत होने तक उनके द्वारा लीबिया के विकास के लिए किए गए कामों का इसी मीडिया ने कहीं कभी कोई ज़िक्र नहीं किया। हाँ गद्दाफी की मौत के बाद अब यह ज़रूर सुना जा रहा है कि गद्दाफी को मारने वाले व्यक्ति को सज़ा दी जाएगी।
कर्नल गद्दाफी कट्टरपंथी व रूविदी विचारधारा के सख्त विरोधी थे। वे एक अरबअफ्रीकी कबीलाई मुस्लिम तानाशाह होने के बावजूद एक धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के व्यक्ति थे। पश्चिमी देश भी शायद दुनिया में ऐसे ही धर्मनिरपेक्ष शासक चाहते हैं परंतु अपने पिट्ठू रूविदी शासकों को छोड़कर। ऐसे में गद्दाफी के शासन के अंत के बाद अब लीबिया में अभी से इस प्रकार के स्वर बुलंद होने लगे हैं गोया
आधुनिकता की राह पर आगे ब़ता हुआ लीबिया इस सत्ता परिवर्तन के बाद धार्मिक प्रतिबद्धताओं की गिरफ्त में भी आता दिखाई दे रहा है। यदि ऐसा हुआ तो यह रास्ता अफगानिस्तान व पाकिस्तान जैसी मंज़िलों की ओर ही आगे ब़ता है और यदि लीबिया उस रास्ते पर आगे ब़ा तो लीबिया का भविष्य क्या होगा? इस बात का अभी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है। सवाल यह है कि क्या अमरीका अथवा नाटो देश लीबिया के इन ज़मीनी हालात से वाकिफ नहीं हैं। या फिर किसी दूरगामी रणनीति के तहत जानबूझ कर इस सच्चाई से आँखें मूँदे बैठे हैं। दूसरी स्थिति लीबिया में सत्ता संघर्ष की भी पैदा हो सकती है। कर्नल गद्दाफी का अंत तो ज़रूर हो गया है मगर उस कबीलाई समुदाय का अंत नहीं हुआ जिससे कि गद्दाफी का संबंध था तथा जो लीबिया में अपनी मज़बूत स्थिति रखते हैं। आने वाले समय में गद्दाफी समर्थंक ये शक्तियाँ चुनाव में हिस्सा ले सकती हैं तथा सत्ता पर अपने वर्चस्व के लिए सभी हथकंडे अपना सकती हैं। यदि ऐसी स्थिति में लीबिया को गृह युद्ध का सामना करना पड़ा तो निश्चित रूप से पश्चिमी शक्तियाँ ही इसकी ज़िम्मेदार होंगी।
गोया साफतौर पर यह नज़र आता है कि लीबिया को गद्दाफी की तानाशाही व उसकी क्रुरता का बहाना लेकर तबाह व बर्बाद करने की एक सुनियोजित साज़िश रची गई और इराक के घटनाक्रम की ही तरह लीबिया के तेल भंडारों पर अपना नियंत्रण स्थापित करने की चालें पश्चिमी देशों द्वारा बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से चली जा रही हैं। इराक की ही तरह लीबिया भी दुनिया के दस प्रमुख तेल उत्पादक देशों में एक है। लिहाज़ा पश्चिमी देशों को अपने दुश्मन राष्ट्राध्यक्ष की मुट्ठी में लीबिया की तेल संपदा का होना अच्छा नहीं लगा। नतीजतन इन साम्राज्यवादी देशों ने बैठेबिठाए कर्नल गद्दाफी को दुनिया का सबसे क्रुर तानाशाह तथा मानवाधिकारों का हननकर्त्ता बताते हुए उसे मौत की मंज़िल तक पहुँचा दिया। परंतु अंत में यह कहना भी गलत नहीं होगा कि सद्दाम हुसैन रहे हों अथवा कर्नल गद्दाफी इन सभी तानाशाहों को भी यह ज़रूर सोचना चाहिए था कि साम्राज्यवादी पश्चिमी देशों की गिद्ध दृष्टियाँ चूँकि इन देशों की प्राकृतिक तेल संपदा पर टिकी हुई हैं लिहाज़ा उन्हें इन पर नियंत्रण करने हेतु कोई न कोई बहाना तो अवश्य चाहिए। नि:संदेह इन तानाशाहों ने अपने स्वार्थपूर्ण व क्रुरतापूर्ण कारनामों के चलते इन शक्तियों को अपनेअपने देशों में घुसपैठ करने व देश को तबाह करने का सुनहरा अवसर प्रदान किया है। प्रश्न यह है कि अमरीका व पश्चिमी देशों की छलपूर्ण नीतियों का यह सिलसिला कभी समाप्त भी होगा या फिर उनकी इस प्रकार की मनमानी भविष्य में भी यूँही चलती रहेगी?

तनवीर जाफरी
मो. 09896219228
समाप्त

सोमवार, 2 जनवरी 2012

साम्राज्यवादी शक्तियों का निशाना बने गद्दाफी - 1

पश्चिमी देशों द्वारा लिखी गई एक और स्क्रिप्ट के अनुसार लीबिया को स्वतंत्र लोकतांत्रिक राष्ट्र घोषित किया जा चुका है। लीबिया में गत फरवरी से शुरु हुआ जनविद्रोह आखिरकार आठ महीनों के संघर्ष के बाद पिछले दिनों तानाशाह कर्नल मोअम्मर गद्दाफी की मौत के पश्चात अपने पहले चरण को पूरा कर चुका है। पश्चिमी प्रभुत्व वाले विश्व मीडिया के सुनियोजित प्रोपेगंडे के मुताबिक लीबिया को एक क्रुर तानाशाह से मुक्त किया गया है। अब लीबिया को लेकर भी वही प्रश्न उठने लगे हैं कि क्या गद्दाफी व उनके परिवार के चंगुल से लीबिया के मुक्त होने के बाद वहाँ अमन, शांति व लोकतांत्रिक सरकार का वातावरण शीघ्र बन पाएगा? या फिर भविष्य में लीबिया का हश्र भी इराक अथवा अफगानिस्तान जैसा ही होने की संभावना है? नि:संदेह लीबिया के राजा इदरीस का 1969 में तख्ता पलटने के बाद मात्र 27 वर्ष की आयु में लीबिया के प्रमुख नेता के रूप में स्वयं को स्थापित करने वाले कर्नल मोअम्मर गद्दाफी ने अपने लगभग 40 वर्ष के तानाशाह शासन काल के दौरान अपने तानाशाही स्वभाव के अनुसार जमकर मनमानी की। अपने विरोधियों को बुरी तरह प्रताड़ित किया। उनके शासनकाल में कई बार सामूहिक हत्याकांड जैसी घटनाएँ उनके विरोधियों के साथ घटीं, कई बार उन्होंने अपने विरोधियों को कुचलने के लिए बड़े ही अमानवीय व क्रुरतापूर्ण आदेश भी दिए। निश्चित रूप से यही कारण था कि लीबियाई नागरिकों के एक बड़े वर्ग में उनके प्रति नफरत तथा विद्रोह की भावना घर कर गई थी। परिणाम स्वरूप लीबिया की प्रगति के लिए तथा वहाँ की जनता की सुखसुविधाओं हेतु किए गए तमाम विकास संबंधी कार्यों के बावजूद वहाँ की जनता में उनके प्रति विद्रोह की भावना पनप रही थी। ज़ाहिर है लीबिया के इस राजनैतिक वातावरण पर पश्चिमी देशों की गिद्ध दृष्टि काफी लंबे समय से टिकी हुई थी और ये शक्तियाँ केवल मुनासिब वक्त का इंतज़ार कर रही थीं।
पश्चिमी देशों की मुँहमाँगी मुराद उस समय पूरी हो गई जबकि ट्यूनीशिया से शुरू हुए जनविद्रोह ने इसी वर्ष फरवरी में लीबिया को भी अपनी चपेट में ले लिया। सत्ता पर अपना कब्ज़ा बरकरार रखने के लिए उस समय भी गद्दाफी ने अपने ही देश के अपने विरोधियों को कुचलने के लिए सैन्यशक्ति का इस्तेमाल करना शुरु कर दिया था। गद्दाफी द्वारा की जा रही सैन्य कार्रवाई को एक बार फिर पश्चिमी शक्तियों ने पश्चिमी मीडिया के सहयोग से ब़ाचढ़ा कर प्रचारित किया। साम्राज्यवादी शक्तियों को गद्दाफी व उसकी सेना द्वारा उठाया जाने वाला यह कदम विश्व में मानवाधिकारों का अब तक का सबसे बड़ा उल्लंघन नज़र आया। परिणाम स्वरूप नाटो की वायुसेना ने लीबिया में सीधा हस्तक्षेप किया और आखिरकार आठ महीने तक चले इस संघर्ष में जीत नाटो की ही हुई। ताज़ा हालात के मुताबिक लीबिया में राजनैतिक कामकाज सँभालने के लिए अस्थाई रूप से बनी राष्ट्रीय अंतरिम परिषद ने देश में अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया तथा शीघ्र ही चुनाव कराए जाने की घोषणा भी कर दी गई है। दुनिया को लीबिया के विषय में यही बताया जा रहा है कि एक क्रुर तानाशाह के साथ जो कुछ भी होना चाहिए था लीबिया में वही देखने को मिला। इराक में सद्दाम हुसैन के शासन के पतन के समय भी लोकतांत्रिक विचारधारा के समर्थकों की ऐसी ही राय थी। परंतु क्या पश्चिमी देशों के विशेषकर अमरीका के सहयोगी राष्ट्रों को दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक देशों में सत्ता पर काबिज़ वही तानशाह, क्रुर व अमानवीय प्रवृति के तानाशाह नज़र आते हैं जो अमरीका या अन्य पश्चिमी देशों की मुट्ठी में रहना पसंद नहीं करते? बारबार यह प्रश्न उठता है कि तेल उत्पादक देशों के वे तानाशाह जिनके अमरीका के साथ मधुर संबंध हैं वहाँ अमरीका लोकतंत्र स्थापित करने की बात क्यों नहीं करता?
अमरीकी पिट्ठू तमाम ऐसे देश हैं जहाँ मानवाधिकारों का इस क़दर हनन होता है कि महिलाओं को घर से बाहर निकलने तक की इजाज़त नहीं है, वे सार्वजनिक कार्यक्रमों व खेलकूद में हिस्सा नहीं ले सकतीं, स्कूलकॉलेज नहीं जा सकतीं, जहाँ बादशाह के विरुद्ध आवाज़ बुलंद करने वालों के मुंँह बलपूर्वक बंद कर दिए जाते हैं, जहाँ कभी लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया के दौर से देश की जनता न गुज़री हो वहाँ आखिर लोकतंत्र स्थापित करने की बात अमरीका व अन्य पश्चिमी देशों द्वारा क्यों नहीं की जाती? परंतु इन सब नकारात्मक व अलोकतांत्रिक परिस्थितियों के बावजूद ऐसे देशों के शासक चूँकि अमरीका के पिट्ठू हैं लिहाज़ा ऐसे देशों में इन्हें तानाशाही स्वीकार्य है और यदि यही तानाशाह सद्दाम अथवा गद्दाफी की तरह अमरीका की आँखों में आँखें डालकर देखने का साहस रखते हों तो गोया दुनिया में इनसे बुरा व क्रुर तानाशाह कोई भी नहीं? इन हालात में स्थानीय विद्रोह को हवा देने में यह पश्चिमी देश देर नहीं लगाते। गद्दाफी के तमाम तानाशाहीपूर्ण रवैयों तथा मनमानी के बावजूद एक सच्चाई यह भी है कि लीबिया के विकास के लिए विशेष सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा तथा उद्योग के क्षेत्र में लीबिया की जो हकीकत बयान की जाती है वह वास्तव में किसी विकसित राष्ट्र जैसी ही प्रतीत होती है। हाँ गद्दाफी के क्रुर स्वभाव को लेकर लीबिया की जनता में ज़रूर गद्दाफी के प्रति विरोध की भावना पनप रही थी। जनता की इस भावना का पहले तो गद्दाफी के स्थानीय राजनैतिक विरोधियों ने लाभ उठाया और बाद में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गद्दाफी से खुश न रहने वाली पिश्चमी ताकतों ने गद्दाफी के विरुद्ध छिड़े विद्रोह को ही अपना मज़बूत हथियार बनाया। नाटो की दखल अंदाज़ी से गद्दाफी को मौत की दहलीज़ तक पहुँचा दिया। पश्चिमी देशों की दखल अंदाज़ी ने गद्दाफ़ी से लीबिया को भले ही मुक्त करा दिया हो परंतु लीबिया के भविष्य को लेकर ज़बरदस्त खतरा भी मँडराने लगा है।

तनवीर जाफरी
मो. 09896219228
( क्रमश: )

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

लीबिया में जनतंत्र की स्थापना या साम्राज्यी तेल कम्पनियों की तानाशाही की स्थापना


यह लीबियाई राष्ट्र में गद्दाफी की शासन सत्ता को हटाकर जनतंत्र की स्थापना करना नही है , बल्कि लीबिया की राष्ट्रवादी रुझानो वाली सरकार को हटाकर लीबियाई राष्ट्र पर साम्राज्यी ताकतों , कम्पनियों की तानाशाही स्थापित करना है | उन्हें लीबिया और उसके तेल पेट्रोल की लूट की मनमानी छुट देना तथा उनकी धुर हिमायती या कहिये पिठ्ठू सत्ता सरकार को स्थापित करना है।

अब तक लीबिया के शासक कर्नल गद्दाफी लीबिया के विद्रोहियों द्वारा साम्राज्य वादी ताकतों ने मरवा दिया | त्रिपोली और अन्य तमाम क्षेत्रो पर विद्रोहियों की ;राष्ट्रीय अस्थाई कौसिल ' की नयी अंतरिम सरकार का कब्जा हो चुका है | हालाकि ' राष्ट्रीय 'नाम की यह कौसिल और उसकी सरकार पूर्णतया अन्तराष्ट्रीय नाटो सेना के नियंत्रण में है और उस पर पूरी तरह से निर्भर भी है | वह फ्रांस , इंग्लैण्ड जैसे साम्राज्यी नाटो देशो के प्रभुत्व में है | नाटो देशो ने खासकर फ्रांस और ब्रिटेन ने विद्रोहियों की मदद क्यों की ? क्या कर्नल गद्दाफी के बहुप्रचारित 40 साल तक तानाशाही राज्य की जगह लीबिया के लोगो के जनतांत्रिक शासन की स्थापना के लिए ? क्या फरवरी 2011 से आज तक नाटो सेनाओं के हवाई हमलो से लेकर उनके हथियारों से लड़ रहे विद्रोही सैनिक दरअसल लीबियाई जनता के लोग है ? क्या कर्नल गद्दाफी के शासन को बचाने के लिए लड़ रहे लोग लीबियाई जनता नही है ? क्या वे मात्र कर्नल गद्दाफी के विश्वास पात्र सैनिक व उनके कबीले के लोग है ? जैसा की प्रचार होता रहा है | अगर उपरोक्त प्रचार सच होते तो 65 लाख की आबादी वाले देश लीबिया में यह युद्ध बहुत पहले ही खत्म हो जाना चाहिए था | कहा एक तरफ विद्रोही बताई जाने वाली लीबियाई जनता और फ्रांस , ब्रिटेन व अन्य नाटो देशो के आधुनिकतम हवाई व जमीनी हमले और कहा लीबिया के कबीले के लोग और गद्दाफी के विश्वस्त सैनिक ! दोनों में कही कोई समानता ही नही बैठती | फिर भी यह युद्ध महीनों खीचा और खीच रहा है | अभी भी कर्नल गद्दाफी के सेना लड़ रही है | युद्ध के दौरान नाटो सेना और उससे मदद लेते विद्रोहियों को कई जगह पीछे भी धकेलती और हराती भी रही है | यह स्थिति इस बात की सूचक है की नाटो सेनाओं के बूते लड़ने वाले लोग लीबिया की आम जनता नही है , बल्कि वे मुख्यत:फ्रांस व ब्रिटेन के तरफदार लीबियाई व गैर लीबियाई लोग है | हो सकता है की उनके प्रचारों , प्रभावों से बहकी हुयी लीबियाई जनता का भी एक हिस्सा हो , परन्तु व्यापक लीबियाई जनता उनके साथ नही है और न ही नाटो देश लीबियाई जनता के जनतंत्र के लिए वहा लड़ने ही पहुचे है |
वे वहा किसलिए पहुचे है ? जैसे - जैसे यह युद्ध आगे बढ रहा है और यह लग रहा है कि , फिलहाल वहा के तेल - पेट्रोल भण्डार पर गद्दाफी की सत्ता का नियंत्रण नही रह पायेगा , वैसे - वैसे इसका खुलासा भी होने लगा है | हमले के पीछे छिपे उद्देश्यों के तथ्यगत - यह गोपनीय समझौता अब सामने आ रहा है , की, फ्रांस ने विद्रोहियों से यह करार पहले से ही कर रखा है की लीबिया अपने तेल का 35 % हिस्सा फ्रांसीसी तेल कम्पनियों को दे देगा | इसी तरह से विद्रोहियों के दुसरे बड़े मददगार साम्राज्यवादी ब्रिटेन की तेल कम्पनियों के लिए ब्रिटेन सरकार द्वारा लीबिया में किये जा रहे प्रयासों की भी खबरे आ रही है | इस काम में ब्रिटिश पेट्रोलियम कम्पनियों ने ब्रिटिश सरकार के इन्टरनेशनल डेवलपमेंट मंत्री एलन डकन को ऐसे समझौतों के लिए आगे किया हुआ है श्री डकन के वहा की तेल कम्पनियों के साथ पहले से ही घनिष्ठ सम्बन्ध रहे है | ब्रिटिश तेल कम्पनियों के इसी उद्देश्य के मद्देनजर ब्रिटिश सरकार और उसकी नाटो सेना युद्ध के दौरान विद्रोहियों को पेट्रोल सप्लाई करने और कर्नल गद्दाफी की सेना को सप्लाई रोकने की जिम्मेदारी सभालती रही है | इनके अलावा अमेरिकी तेल कम्पनिया भी इसी प्रयास में जुटी है | अमेरिकी लीबिया पर नाटो सैन्य हमले की अगुवाई नही कर रहा था | संभवत: वह ईराक और अफगानिस्तान के बाद लीबिया में अगुवाई करके फसना और अपने मौजूदा दौर के कर्ज़ संकट को बढाना नही चाहता है | लेकिन लीबिया के तेल - पेट्रोल में अपनी हिस्सेदारी बनाने में अमेरिकी तेल कम्पनिया पीछे भी नही रहना चाहती | इसलिए अमेरिकी सरकार लीबिया की बर्बाद हो चुकी नागरिक सेवाओं को चुस्त - दुरुस्त करने के नाम पर लीबिया में घुसपैठ करके तेल डील करने में लगी हुई है | जहा तक कर्नल गद्दाफी के शासन के दौर में तेल कम्पनियों के अधिकारों का मामला है , तो गद्दाफी ने साम्राज्यी तेल कम्पनियों को पहले तो लगभग देश से बाहर कर दिया था , लेकिन' लाक हीड़ बमबारी 'के बाद लीबिया पर लगे संयुक्त राष्ट्र के सालो - साल के प्रतिबंधो को हटाये जाने के उपरान्त उन्होंने
साम्राज्यी तेल कम्पनियों को देश में दुबारा आने का निमंत्रण दे दिया था | लेकिन इस निमंत्रण में विदेशी कम्पनियों को पूरी स्वतंत्रता के साथ नही बल्कि खासे प्रतिबंधो व शर्तो के साथ ही बुलावा दिया गया था | कयोंकि गद्दाफी व उनकी बाथ सोशलिस्ट पार्टी अपनी तमाम कमजोरियों के वावजूद अपने राष्ट्रीय हितो को लेकर साम्राज्यी ताकतों व साम्राज्यी कम्पनियों की विरोधी रही है | सउदी अरब , कुवैत , जैसी शेखशाही सत्ता सरकारों की तरह की तरह अमेरिका व दूसरी हिमायती या पिठ्ठू सरकार नही रही है | वर्तमान दौर के वैश्वीकरण में अमेरिका , इंग्लैण्ड व फ्रांस जैसी साम्राज्यी ताकतों और साम्राज्यी कम्पनिया ख़ास कर उन देशो कि महाताकतवर पेट्रोल कम्पनिया अपने उपर किसी हद तक कोई भी प्रतिबन्ध लगाने वाली किसी राष्ट्रवादी ताकत को बर्दाश्त नही कर सकती है | इसीलिए सद्दाम हुसैन के बाद कर्नल गद्दाफी का नम्बर तो लगना ही था और वह लगा भी | ताकि साम्राज्यवादी ताकतों और उनकी पेट्रोल कम्पनियों को पूरा - पूरा अधिकार व छूट मिले | विश्व में लीबिया के अव्वल दर्जे के पेट्रोल पर उनका एकाधिकार स्थापित हो | विद्रोहियों का ' राष्ट्रीय कौसिल ' नाम का नया सत्ताधारी संगठन लीबियाई राष्ट्र के विरोध में यही काम कर रहा है | यह लीबियाई राष्ट्र में गद्दाफी की शासन सत्ता को हटाकर जनतंत्र कि स्थापना करना नही है ,बल्कि लीबिया कि राष्ट्रवादी रुझानो वाली सरकार को हटाकर लीबियाई राष्ट्र पर साम्राज्यी ताकतों , कम्पनियों की तानाशाही स्थापित करना है | उन्हें लीबिया और उसके तेल पेट्रोल के लूट की मनमानी छूट देना तथा उनकी धुर हिमायती या कहिये पिठ्ठू सत्ता सरकार को स्थापित करना है | ताकि साम्राज्यी ताकतों और उनकी तेल पेट्रोल कम्पनियों को लीबिया के तेल पेट्रोल के लूट की पूरी छूट मिले और उस पर उनका नियंत्रण स्थापित हो जाए | दुनिया के अन्य देशो में और हमारे देश में भी साम्राज्यी हितो के अनुसार ऐसे ही परिवर्तन एकदम शांतिपूर्ण तरीके से हो रहे है | साम्राज्यी पूंजी और साम्राज्यी कम्पनियों की बढती अधिकारपूर्ण घुसपैठ के साथ उनके सहयोगी व हिमायती बने इन देशो के धनाढ्य व उच्च हिस्सों की छूटे व अधिकार भी निरन्तर बढ़ते जा रहे है | जबकि जनसाधारण के अधिकार व छूटो में लगातार कटौतिया बढती जा रही है | यह परिवर्तन देश के बहुसख्यक जनता के जनतंत्र का द्योतक नही है , बल्कि लोकतंत्र के नाम पर जनसाधारण पर अमेरिका जैसी साम्राज्यी ताकतों के साथ देश की धनाढ्य कम्पनियों और उच्च हिस्सों की तानाशाही का द्योतक है | लीबिया में यही काम युद्ध के जरिये हो रहा है | कर्नल गद्दाफी के राष्ट्रवादी जनतांत्रिक सत्ता की जगह साम्राज्यी ताकतों , साम्राज्यी तेल पेट्रोल कम्पनियों की तानाशाही सत्ता पिठ्ठुओं , हिमायतियो कि तानाशाही सत्ता स्थापित की जा रही है और वह भी जनतंत्र की स्थापना के नाम पर |

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672
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