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मंगलवार, 24 नवंबर 2015

आतंकवाद पर नंगे है -यह सब

आतंकवाद के मुद्दे पर अमेरिकी व नाटो देश अब बुरी तरह बेनकाब होना शुरू हो चुके हैं. बगदादी के खिलाफ चल रहे युद्ध में नाटो सदस्य तुर्की ने सीरिया की सीमा में रूसी वार प्लेन को मार गिराया है और यह आरोप लगाया है कि उस विमान ने तुर्की की सीमा को क्रॉस किया था. दक्षिण पश्चिम एशिया काफी समय से अशांति का क्षेत्र बना हुआ है. जिसके मुख्य जिम्मेदार अमेरिकी व नाटो सदस्य देश हैं. यह वही मुल्क है जोकि आतंकवाद को समाप्त करने के लिए विभिन्न देशों में सरकारों को गिरा कर अपनी कठपुतली सरकार बनाने का काम कर रहे हैं. आतंकवाद के नाम पर आतंकी संगठनो को यह पहले बनाते हैं और फिर उनको नष्ट करने के नाम पर उस देश के नागरिकों के उपर हवाई हमले करते हैं, इस तरह से इन देशों ने लाखों लोगों की हत्याएं कर दी हैं और लाखों लोगों को बेघर कर दिया है यह लोग इस क्षेत्र की सम्पूर्ण मानव प्रजाति को नष्ट करने पर तुले हुए हैं. मानवता का कोई मामला नहीं रह गया है दैत्य दानव की तरह से सस्ते में पेट्रोल खरीदना और फिर आतंकी संगठनो को हथियार की सप्लाई करना मुनाफा इनका मुख्य उद्देश्य है. अगर यही नीतियां दुनिया में जारी रही तो मानव की तमाम सारी नस्लों को यह नष्ट कर देंगे. तुर्की, अमेरिका और फ्रांस साथ हैं। वहीं, रूस खुद आईएसआईएस पर हमले कर रहा है
वहीँ, कलकत्ता विश्वविद्यालय  के प्रोफेसर  जगदीश्‍वर चतुर्वेदी लिखते है आईएस की भाड़े की फौज को देखकर ऐसा लग रहा है कि यह नया फिनोमिना है। लेकिन सच यह है कि भाड़े की फौज खड़ी करना,आतंकी हमले करना,स्थिर सरकारों को गिराना और उनके स्थान पर कठपुतली सरकारों को बिठाने का धंधा बहुत पहले से सीआईए करता रहा है। मध्यपूर्व में दाखिल होने के पहले अनेक देशों में भाड़े के सैनिकों की भर्ती करके हमला करने,हमला गुटों को हथियार देने,पैसा देने,प्रशिक्षण देने आदि के काम भी सीआईए करता रहा है। मीडिया में आईएस और उसकी भाड़े की सेना का कवरेज कुछ इस तरह आ रहा है कि यह कोई नई बात हो। शीतयुद्ध के दौरान सीआईए ने भाड़े की सेना खड़ी करने के मामले में विशेषज्ञता हासिल कर ली थी और अनेक देशों में जनता के द्वारा चुनी गयी सरकारों को गिराया,उनके खिलाफ भाड़े के सैनिकों के जरिए युद्ध चलाए, उन देशों में अस्थिरता पैदा की । 
रूस के लड़ाकू विमान को नाटो सदस्य देश द्वारा मार गिराए जाने की घटना के बाद एक बड़े युद्ध की भूमिका बन रही है. जिसमें उस क्षेत्र के निवासियों को ही मरना है, अपंग होना है. संयुक्त राष्ट्र संघ, सुरक्षा परिषद् जैसे संगठन साम्राज्यवादी मुल्कों के आगे काफी पहले ही बौने साबित हो गए हैं. सी आई ए अपनी नापाक गतिविधियाँ जारी किये हुए है. उसकी योजनाओं को समाप्त करने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ  के पास कोई योजना नहीं है. सी आई ए पहले भी दुनिया में किस देश में कौन शासक होगा यह तय करता आया है. उसकी इच्छा के विपरीत अगर कोई शासक हुआ तो उसके कत्लेआम करने की एक बड़ी परंपरा है.

सुमन 

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

झूठों का सौदागर ओबामा



अमरीकी
राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा अपने बयानबाजी के बाद हिटलर के प्रचार मंत्री गोविल्स को भी पीछे छोड़ दिया है। उन्होंने एक बयान में कहा था कि ईराक से अमरीकी सेनायें पूरी तरह से वापस हो जाएँगी जबकि असलियत यह है कि बगदाद स्थित अमेरिकी दूतावास में २० ००० अमरीकी तैनात हैं अगर उनके सादे कपड़ों के नीचे देखा जाये तो वह सभी अमेरिकी सैनिक अधिकारी हैं। अमरीका हमेशा स्वतंत्र मुल्कों को गुलाम बनाने का आदि रहा है और अपनी रणनीति के तहत ईराक को गुलाम बनाया है लेकिन उसके मंसूबे पूरे नहीं होंगे। ईरान ने उसके ड्रोन को अपने कब्जे में ले लिया है और बराबरी के साथ धमका भी रहा है यदि अमेरिका ने हमला किया तो ईराक के प्रधानमंत्री नूरी मलेकी जो ईरान के साथ अपने संबंधो को प्रगाढ़ बना रहे हैं वह ईरान के साथ खड़े हुए नजर आ सकते हैं। यह अमरीका की मुख्य चिंता है इसीलिए अमरीका अपनी फौजों को सादी वर्दी में तैनात कर रहा है।
पाकिस्तान में 28 सैनिकों की हत्या नाटो सेनाओं द्वारा किये जाने के बाद वहां की सरकार ने शम्स हवाई अड्डे को खाली करा लिया है। अफगानिस्तान में लड़ रही नाटो सेनाओं के खाद्य व अन्य जरूरत की सप्लाई भी प्रभावित हो रही है। दूसरी तरफ अमेरिका में वाल स्ट्रीट आन्दोलन के गति पकड़ने के कारण पूर्वी तटों पर स्थित बंदरगाहों पर काम बंद है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था भी मंदी के चपेट में है इसलिए अमरीका के पास झूठ की सौदागरी के अतिरिक्त कुछ शेष नहीं है। अगर ईरान पर हमला करने की स्तिथि में अमेरिकी होते तो उनका स्वर दूसरा होता।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

रविवार, 27 नवंबर 2011

पाकिस्तान का साम्राज्यवादियों के साथ रहने का हश्र

पाकिस्तान के बनने के बाद से ही वह अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ रहा है साम्राज्यवादियों ने पाकिस्तान के विकास को पूरी तरह से अवरुद्ध किया और आर्थिक रूप से अपना गुलाम बना लिया अफगानिस्तान के बहाने अब वह पाकिस्तान की संप्रभुता को पूरी तरह से नष्ट करने पर तुला हुआ है जिसकी परिणिति ओसामा के एनकाउन्टर के रूप में हुई है और हद तो तब हो गयी कि जब अभी नाटो सेनाओं ने 28 पाकिस्तानी सैनिको को मार गिराया इस नाटो हमले में काफी सैनिक घायल भी हुए हैं पाकिस्तान बेचारा कर भी क्या सकता है विरोध जताया उधर से माफ़ी नामा तुरंत गया ब्रिटिश भारत में भी जिस राजा को तुरंत परास्त नही किया जा सकता था उसके साथ भी इसी तरह की हरकतें ब्रिटिश साम्राज्यवादी करते थे और जब राजा विरोध करता था तो माफ़ी मांग लेते थे और फिर उसके बाद ब्रिटिश सेनायें के ताकतवर होते ही उस राज्य को अपने में मिला लेते थे
पाकिस्तान के पास अमेरिकियों व नाटो सेनाओं से बचने का कोई विकल्प बाकी है तो वह चीन के साथ दोस्ती ही है। चीन की दोस्ती से उसकी लाज शायद ही बच सके क्यूंकि चीन भी उसकी रक्षा करने के लिये युद्ध में जाना पसंद नही करेगा।
साम्राज्यवाद मगरमच्छ है प्रतिदिन उसको भोजन के लिये मगरमच्छ की तरह मांस की आवश्यकता है। साम्राज्यवाद प्राकृतिक स्रोत्रों के दोहन के लिये उसको दुनिया के अधिकांश देशों को गुलाम बनाना उसकी मजबूरी है। भोजन के लिये दोस्त और दुश्मन का फर्क यहीं ख़त्म हो जाता है।

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

लीबिया में जनतंत्र की स्थापना या साम्राज्यी तेल कम्पनियों की तानाशाही की स्थापना


यह लीबियाई राष्ट्र में गद्दाफी की शासन सत्ता को हटाकर जनतंत्र की स्थापना करना नही है , बल्कि लीबिया की राष्ट्रवादी रुझानो वाली सरकार को हटाकर लीबियाई राष्ट्र पर साम्राज्यी ताकतों , कम्पनियों की तानाशाही स्थापित करना है | उन्हें लीबिया और उसके तेल पेट्रोल की लूट की मनमानी छुट देना तथा उनकी धुर हिमायती या कहिये पिठ्ठू सत्ता सरकार को स्थापित करना है।

अब तक लीबिया के शासक कर्नल गद्दाफी लीबिया के विद्रोहियों द्वारा साम्राज्य वादी ताकतों ने मरवा दिया | त्रिपोली और अन्य तमाम क्षेत्रो पर विद्रोहियों की ;राष्ट्रीय अस्थाई कौसिल ' की नयी अंतरिम सरकार का कब्जा हो चुका है | हालाकि ' राष्ट्रीय 'नाम की यह कौसिल और उसकी सरकार पूर्णतया अन्तराष्ट्रीय नाटो सेना के नियंत्रण में है और उस पर पूरी तरह से निर्भर भी है | वह फ्रांस , इंग्लैण्ड जैसे साम्राज्यी नाटो देशो के प्रभुत्व में है | नाटो देशो ने खासकर फ्रांस और ब्रिटेन ने विद्रोहियों की मदद क्यों की ? क्या कर्नल गद्दाफी के बहुप्रचारित 40 साल तक तानाशाही राज्य की जगह लीबिया के लोगो के जनतांत्रिक शासन की स्थापना के लिए ? क्या फरवरी 2011 से आज तक नाटो सेनाओं के हवाई हमलो से लेकर उनके हथियारों से लड़ रहे विद्रोही सैनिक दरअसल लीबियाई जनता के लोग है ? क्या कर्नल गद्दाफी के शासन को बचाने के लिए लड़ रहे लोग लीबियाई जनता नही है ? क्या वे मात्र कर्नल गद्दाफी के विश्वास पात्र सैनिक व उनके कबीले के लोग है ? जैसा की प्रचार होता रहा है | अगर उपरोक्त प्रचार सच होते तो 65 लाख की आबादी वाले देश लीबिया में यह युद्ध बहुत पहले ही खत्म हो जाना चाहिए था | कहा एक तरफ विद्रोही बताई जाने वाली लीबियाई जनता और फ्रांस , ब्रिटेन व अन्य नाटो देशो के आधुनिकतम हवाई व जमीनी हमले और कहा लीबिया के कबीले के लोग और गद्दाफी के विश्वस्त सैनिक ! दोनों में कही कोई समानता ही नही बैठती | फिर भी यह युद्ध महीनों खीचा और खीच रहा है | अभी भी कर्नल गद्दाफी के सेना लड़ रही है | युद्ध के दौरान नाटो सेना और उससे मदद लेते विद्रोहियों को कई जगह पीछे भी धकेलती और हराती भी रही है | यह स्थिति इस बात की सूचक है की नाटो सेनाओं के बूते लड़ने वाले लोग लीबिया की आम जनता नही है , बल्कि वे मुख्यत:फ्रांस व ब्रिटेन के तरफदार लीबियाई व गैर लीबियाई लोग है | हो सकता है की उनके प्रचारों , प्रभावों से बहकी हुयी लीबियाई जनता का भी एक हिस्सा हो , परन्तु व्यापक लीबियाई जनता उनके साथ नही है और न ही नाटो देश लीबियाई जनता के जनतंत्र के लिए वहा लड़ने ही पहुचे है |
वे वहा किसलिए पहुचे है ? जैसे - जैसे यह युद्ध आगे बढ रहा है और यह लग रहा है कि , फिलहाल वहा के तेल - पेट्रोल भण्डार पर गद्दाफी की सत्ता का नियंत्रण नही रह पायेगा , वैसे - वैसे इसका खुलासा भी होने लगा है | हमले के पीछे छिपे उद्देश्यों के तथ्यगत - यह गोपनीय समझौता अब सामने आ रहा है , की, फ्रांस ने विद्रोहियों से यह करार पहले से ही कर रखा है की लीबिया अपने तेल का 35 % हिस्सा फ्रांसीसी तेल कम्पनियों को दे देगा | इसी तरह से विद्रोहियों के दुसरे बड़े मददगार साम्राज्यवादी ब्रिटेन की तेल कम्पनियों के लिए ब्रिटेन सरकार द्वारा लीबिया में किये जा रहे प्रयासों की भी खबरे आ रही है | इस काम में ब्रिटिश पेट्रोलियम कम्पनियों ने ब्रिटिश सरकार के इन्टरनेशनल डेवलपमेंट मंत्री एलन डकन को ऐसे समझौतों के लिए आगे किया हुआ है श्री डकन के वहा की तेल कम्पनियों के साथ पहले से ही घनिष्ठ सम्बन्ध रहे है | ब्रिटिश तेल कम्पनियों के इसी उद्देश्य के मद्देनजर ब्रिटिश सरकार और उसकी नाटो सेना युद्ध के दौरान विद्रोहियों को पेट्रोल सप्लाई करने और कर्नल गद्दाफी की सेना को सप्लाई रोकने की जिम्मेदारी सभालती रही है | इनके अलावा अमेरिकी तेल कम्पनिया भी इसी प्रयास में जुटी है | अमेरिकी लीबिया पर नाटो सैन्य हमले की अगुवाई नही कर रहा था | संभवत: वह ईराक और अफगानिस्तान के बाद लीबिया में अगुवाई करके फसना और अपने मौजूदा दौर के कर्ज़ संकट को बढाना नही चाहता है | लेकिन लीबिया के तेल - पेट्रोल में अपनी हिस्सेदारी बनाने में अमेरिकी तेल कम्पनिया पीछे भी नही रहना चाहती | इसलिए अमेरिकी सरकार लीबिया की बर्बाद हो चुकी नागरिक सेवाओं को चुस्त - दुरुस्त करने के नाम पर लीबिया में घुसपैठ करके तेल डील करने में लगी हुई है | जहा तक कर्नल गद्दाफी के शासन के दौर में तेल कम्पनियों के अधिकारों का मामला है , तो गद्दाफी ने साम्राज्यी तेल कम्पनियों को पहले तो लगभग देश से बाहर कर दिया था , लेकिन' लाक हीड़ बमबारी 'के बाद लीबिया पर लगे संयुक्त राष्ट्र के सालो - साल के प्रतिबंधो को हटाये जाने के उपरान्त उन्होंने
साम्राज्यी तेल कम्पनियों को देश में दुबारा आने का निमंत्रण दे दिया था | लेकिन इस निमंत्रण में विदेशी कम्पनियों को पूरी स्वतंत्रता के साथ नही बल्कि खासे प्रतिबंधो व शर्तो के साथ ही बुलावा दिया गया था | कयोंकि गद्दाफी व उनकी बाथ सोशलिस्ट पार्टी अपनी तमाम कमजोरियों के वावजूद अपने राष्ट्रीय हितो को लेकर साम्राज्यी ताकतों व साम्राज्यी कम्पनियों की विरोधी रही है | सउदी अरब , कुवैत , जैसी शेखशाही सत्ता सरकारों की तरह की तरह अमेरिका व दूसरी हिमायती या पिठ्ठू सरकार नही रही है | वर्तमान दौर के वैश्वीकरण में अमेरिका , इंग्लैण्ड व फ्रांस जैसी साम्राज्यी ताकतों और साम्राज्यी कम्पनिया ख़ास कर उन देशो कि महाताकतवर पेट्रोल कम्पनिया अपने उपर किसी हद तक कोई भी प्रतिबन्ध लगाने वाली किसी राष्ट्रवादी ताकत को बर्दाश्त नही कर सकती है | इसीलिए सद्दाम हुसैन के बाद कर्नल गद्दाफी का नम्बर तो लगना ही था और वह लगा भी | ताकि साम्राज्यवादी ताकतों और उनकी पेट्रोल कम्पनियों को पूरा - पूरा अधिकार व छूट मिले | विश्व में लीबिया के अव्वल दर्जे के पेट्रोल पर उनका एकाधिकार स्थापित हो | विद्रोहियों का ' राष्ट्रीय कौसिल ' नाम का नया सत्ताधारी संगठन लीबियाई राष्ट्र के विरोध में यही काम कर रहा है | यह लीबियाई राष्ट्र में गद्दाफी की शासन सत्ता को हटाकर जनतंत्र कि स्थापना करना नही है ,बल्कि लीबिया कि राष्ट्रवादी रुझानो वाली सरकार को हटाकर लीबियाई राष्ट्र पर साम्राज्यी ताकतों , कम्पनियों की तानाशाही स्थापित करना है | उन्हें लीबिया और उसके तेल पेट्रोल के लूट की मनमानी छूट देना तथा उनकी धुर हिमायती या कहिये पिठ्ठू सत्ता सरकार को स्थापित करना है | ताकि साम्राज्यी ताकतों और उनकी तेल पेट्रोल कम्पनियों को लीबिया के तेल पेट्रोल के लूट की पूरी छूट मिले और उस पर उनका नियंत्रण स्थापित हो जाए | दुनिया के अन्य देशो में और हमारे देश में भी साम्राज्यी हितो के अनुसार ऐसे ही परिवर्तन एकदम शांतिपूर्ण तरीके से हो रहे है | साम्राज्यी पूंजी और साम्राज्यी कम्पनियों की बढती अधिकारपूर्ण घुसपैठ के साथ उनके सहयोगी व हिमायती बने इन देशो के धनाढ्य व उच्च हिस्सों की छूटे व अधिकार भी निरन्तर बढ़ते जा रहे है | जबकि जनसाधारण के अधिकार व छूटो में लगातार कटौतिया बढती जा रही है | यह परिवर्तन देश के बहुसख्यक जनता के जनतंत्र का द्योतक नही है , बल्कि लोकतंत्र के नाम पर जनसाधारण पर अमेरिका जैसी साम्राज्यी ताकतों के साथ देश की धनाढ्य कम्पनियों और उच्च हिस्सों की तानाशाही का द्योतक है | लीबिया में यही काम युद्ध के जरिये हो रहा है | कर्नल गद्दाफी के राष्ट्रवादी जनतांत्रिक सत्ता की जगह साम्राज्यी ताकतों , साम्राज्यी तेल पेट्रोल कम्पनियों की तानाशाही सत्ता पिठ्ठुओं , हिमायतियो कि तानाशाही सत्ता स्थापित की जा रही है और वह भी जनतंत्र की स्थापना के नाम पर |

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

मंगलवार, 22 मार्च 2011

नाटो भारत पर भी हमला करेगा.............?

मानवता की रक्षा हेतु

विश्व में साम्राज्यवादी शक्तियां बड़ी बेशर्मी के साथ एशिया के मुल्कों को गुलाम बनाने का कार्य कर रही हैं। जब इनकी कठपुतली संयुक्त राष्ट्र संघ ने किसी देश के ऊपर हमला करने की बात होती है। तो भारत, चीन, रूस, ईरान सहित कई मुल्क संयुक्त राष्ट्र संघ में अनुपस्थित हो जाते हैं और जब नाटो की सेनायें कार्यवाई शुरू कर देती हैं तो यह घडियाली आंसू बहाने शुरू कर देते हैं। चीन लीबिया में जारी घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं और लीबिया में जो हो रहा है उसपर अफसोस जाहिर करता है। चीन ने अपने बयान में लीबिया में विद्रोहियों और गद्दाफी सेनाओं के बीच जारी संघर्ष के सीज फायर की मांग भी नहीं की है और कहा है कि चीन उत्तरी अफ्रीका के स्वतंत्र राष्ट्र लीबिया की स्वतंत्रता, स्वप्रभुता और एकता का सम्मान करता है। बयान में कहा गया है कि हम उम्मीद करते हैं कि जल्द ही लीबिया में जारी संघर्ष थम जाएगा और नागरिकों को सुरक्षा प्रदान की जाएगी। ईरान ने इन हमलों की निंदा करते हुए कहा है कि लीबिया के तेल पर कब्जा करने का पश्चिमी देशों का यह घिनौना अपराध है। हालांकि ईरान ने लीबिया में गद्दाफी के विरोध में हो रहे प्रदर्शन का समर्थन करते हुए कहा है कि यह गद्दाफी के खिलाफ इस्लामिक क्रांति है। ईरान ने यह भी कहा है कि लीबिया के लोगों को पश्चिमी देशों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। वो अपने खास मकसदों को हल करने के लिए उनके साथ होने का दिखावा कर रहे हैं।
रूस ने भी लीबिया पर हुए मिसाइल हमलों की निंदा करते हुए कहा दोनों ओर से तुरंत संघर्ष विराम होना चाहिए। रुस ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र के बल प्रयोग के संकल्प को जल्दबाजी में अपनाया गया है। रूस के विदेश मंत्रालय ने द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि हम लीबिया और लीबिया पर हमला कर रहीं गठबंधन सेनाओं से अपील करते हैं कि वो शांति बहाली के लिए प्रयास करें।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा,''लीबिया में जारी संघर्ष की स्थिति को लेकर भारत चिंतित है. जैसा कि हमने पहले कहा था इस तरह के प्रयास स्थिति को नियंत्रण में लाने की कोशिश करें न कि आम नागरिकों के लिए मुश्किलें और बढ़ाएं.''
पूर्व में ईराक में कल्पित रासायनिक हथियारों की आड़ लेकर ईराक पर हमला किया गया। मीडिया ने नाटो सेनाओं को मित्र सेना की संज्ञा देकर ईराक पर कब्ज़ा करा दिया। अफगानिस्तान पर भी कब्ज़ा कर लिया गया। हजारो लाखो लोग मारे गए। घर-बेघर हो गए उस समय भी साम्राज्यवाद विरोधी तथाकथित शक्तियां घडियाली आंसू बहाती रहीं। आज लीबिया में कई दिनों से नाटो सेनायें कल्पित मानवीय आध्जारों को लेकर बम वर्षा कर रही हैं। मानवता की सबसे ज्यादा चिंता फ्रांस, इंग्लैंड, अमेरिका को है। जापान में दुनिया की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी है उस त्रासदी में ये देश विशेष कुछ नागरिकों की मदद नहीं कर रहे हैं उसका मुख्य कारण है जापान उनका अघोषित गुलाम देश है। इन देशों को सबसे ज्यादा नागरिक अधिकारों की चिंता लीबिया में है क्योंकि लीबिया का तेल भंडार सबके लिये सुलभ है। उस पर कब्ज़ा करने के लिये नागरिक अधिकारों का बहाना लेकर हमला किया जा रहा है और फिर लीबिया पर कब्ज़ा कर लिया जाएगा। यमन, बहरीन, सौदी अरबिया जैसे मुल्कों में भी आन्दोलन चल रहे हैं उनमें दखालान्जादी इसलिए नहीं होती है क्योंकि वे साम्राज्यवादियों के पिट्ठू मुल्क हैं। फ्रांस से लेके यूरोप के बड़े-बड़े देशों में महंगाई, बेरोजगारी को लेकर बड़े-बड़े धरना प्रदर्शन हो रहे हैं और यदि आन्दोलन ही संप्रभुता दरकिनार कर हस्ताक्षेप का आधार है तो इन देशों में कौन हस्ताक्षेप करेगा।
भारत में कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर भारत तक सेना कमान संभाले हुए है। बराबर कोई न कोई प्रथक्तावादी आन्दोलन जारी है। भारत के उपभोक्ता बाजार तथा प्राकृतिक सम्पदा पर कब्ज़ा करने के लिये नाटो सेनाओ को अच्छा आधार मिल सकता है और संयुक्त राष्ट्र संघ इन प्रदेशों में लोकतंत्र मानव अधिकार स्थापित करने के लिये सैनिक हस्ताक्षेप की अनुमति भी दे सकता है ? हमारे देश में अमेरिकन व ब्रिटिश साम्राज्यवादी एजेंटो की कमी नहीं है वह शक्तियां सिर्फ वाह वाही में सब कुछ करने के लिये तैयार बैठी रहती हैं जो साम्राज्यवादी शक्तियां चाहती हैं। तभी तो भारत इंग्लैंड, फ्रांस, पुर्तगाल जैसे साम्राज्यवादी देशों का गुलाम रहा है विश्व आर्थिक संकट के कारण साम्राज्यवादी मुल्कों की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं रह गयी है। आर्थिक संकट से उभरने के लिये यह साम्राज्यवादी शक्तियां कुछ भी कर सकती हैं। शांति इनकी मौत है युद्ध इनकी जिंदगी है। हमारे देश को चाहिए कि अपनी अस्मिता के लिये दुनिया के छोटे छोटे देशों की अस्मिता के लिये अपनी गुटनिरपेक्ष निति को जारी रखे। साम्राज्यवादी शक्तियों से दूरी आवश्यक है।
चाइना में अमेरिका और उसके साम्राज्यवादी मित्र बहुदलीय व्यवस्था लागू करने के नाम पर नोबेल पुरस्कार चाइना विरोधियों को देते रहते हैं। ईरान में अमेरिका व उसके पिट्ठू देशों द्वारा कई बार अपनी पिट्ठू सरकार बनाने की कोशिश की जा चुकी है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !
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