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सोमवार, 7 अक्टूबर 2019

अटल सरकार से मोदी सरकार आगे

अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने तीन आतंकवादियों को कंधार ले जाकर छोड़ा था वहीँ मोदी सरकार ने  11 आतंकवादियों को तालिबान को सौंप दिया और उसके बदले में तीन इंजिनियर की रिहाई कराई. अपहरण और फिरौती का उद्योग इन राष्ट्रवादी सरकारों में फल-फूल रहा है. कूटनीतिक साहस क्षमता का कहीं भी प्रदर्शन करने में ये सरकारें असफल हो रही हैं लेकिन अपने भाषणों में ये रुस्तमे विश्व हैं. इजराइल का नाम हमेशा रटने वाली यह सरकारें यह भी सबक नही ले पायीं कि कैसे आतंकियों के अपरहण उद्योग से निपटा जा सकता है. विश्व में कई घटनाएं ऐसी हुई हैं जिसमें आतंकियों को पकड़ा गया है या मारा गया है और अपर्हित लोगों को छुड़ाया गया है. 
 11 आतंकियों की अदला-बदली रविवार को किसी गुप्त स्थान पर हुई। छोड़े गए 11 आतंकियों में शेख अब्दुर रहीम और मौलावी अब्दुर राशिद शामिल है। दोनों क्रमश: कुनूर और निमरोज प्रांत के लिए तालिबान के गर्वनर के रूप में काम कर चुके हैं.
दोनों तरफ से रिहाई की प्रक्रिया अफगानिस्तान के लिए विशेष अमेरिकी दूत जल्मे खलीलजाद और तालिबान के प्रतिनिधि मुल्ला अब्दुल गनी बरदार के बीच बैठक में हुई।  
               अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मौलाना मसूद अजहर को रिहा किया गया था. इसी शातिर आतंकी ने साल 2000 में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का गठन किया था. जिसका नाम 2001 में भारतीय संसद पर हुए हमले के बाद सुर्खियों में आया था. 
         दूसरा आतंकी अहमद उमर सईद शेख. इस आतंकवादी को 1994 में भारत में पश्चिमी देशों के पर्यटकों का अपहरण करने के मामले में गिरफ्तार किया गया था. इसी आतंकी ने डैनियल पर्ल की हत्या की थी. अमेरिका में 9/11 के हमलों की योजना तैयार करने में भी उसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी. बाद में डेनियल पर्ल के अपहरण और हत्या के लिए पाकिस्तानी अधिकारियों ने उसे 2002 में गिरफ्तार कर लिया था.
           तीसरा आतंकी मुश्ताक अहमद ज़रगर. ये आतंकी रिहाई के बाद से पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में उग्रवादियों को प्रशिक्षण देने में एक सक्रिय हो गया था. भारत विरोधी आतंकियों को तैयार करने में उसकी खासी भूमिका थी.
अटल सरकार में अप्रहत प्लेन अमृतसर  में रुका हुआ था लेकिन हमारे कमांडों वहां तक नहीं पहुँच पाते हैं. ऐसा बोला जाता है कि उनको विमान से एयरपोर्ट भेजना था लेकिन किसी भी विमान का इंतजाम नहीं हो पाया था. और जब वह सड़क के रास्ते गये तो वहां भरी जाम की वजह से देरी हो जाती है.  
                          भारत की खुफिया एजेंसी रॉ के तत्कालीन प्रमुख ए. एस. दौलत ने अपनी अंग्रेजी पुस्तक 'कश्मीर:द वाजपई ईयर्स' में भी कहा है कि भारत उस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ गया था। दौलत ने अपनी पुस्तक में इस महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख नहीं किया कि उस अपहृत विमान में उनकी खुफिया एजेंसी रॉ का एक अधिकारी भी बैठा था जिसका नाम शशि भूषण सिंह तोमर था। यह अधिकारी काठमाण्डू स्थित भारतीय दूतावास में फर्स्ट सेक्रेटरी के तौर पर कार्य कर रहा था। तोमर की तत्कालीन कैबिनेट सचिव एन.के. सिंह से नजदीकी रिश्तेदारी थी।
अपहृत विमान में इतना ईंधन नहीं था कि उसे लाहौर या कंधार ले जाया जाता। इस कारण उसे अमृतसर हवाई अड्डे पर उतरना पड़ा, जहां अपहृर्ताओं ने गुरुग्राम निवासी रूपन कत्याल नामक एक यात्री को इतना घायल कर दिया कि बाद में उसकी विमान में ही मृत्यु हो गई थी। 25 वर्षीय कत्याल शादी के बाद हनीमून मनाने काठमाण्डू गया हुआ था। विमान में उसकी पत्नी रचना सहगल उसके साथ थी।
             

अमृतसर हवाई अड्डे को दिल्ली स्थित क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप का निर्देश था कि किसी तरह विमान को वहीं रोक कर रखा जाए पर ईंधन न भरा जाए। इस बीच हवाई अड्डे के निदेशक विजय मुलेकर के पास एक फोन आया जिसमें एक आदमी ने यह निर्देश दिया कि हवाई जहाज में ईंधन भर दिया जाए और उसे आगे उड़ान भरने दी जाए। फोन करने वाले आदमी ने अपना नाम सी. लाल बताया और कहा कि वह गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव है। विजय मुलेकर ने उसकी बात नहीं मानी और कहा कि 'मैं केवल दिल्ली स्थित क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप की ही बात मानूंगा।' जांच करने पर पता चला कि वह फोन एक यूरोपीय देश से आया था। यूरोप से आए इस फोन वाली घटना का जिक्र अंग्रेजी समाचार पत्रिका 'इंडिया टुडे' के 10 जनवरी, 2000 अंक में किया गया है। इस घटना की चर्चा अंग्रेजी पुस्तक 'आईसी 814 हाइजैक्ड! द इनसाइड स्टोरी' में भी पृष्ठ संख्या 203 पर की गई है। वहां सी. लाल की जगह जे. लाल लिखा हुआ है।
                इन्डियन एयरलाइन्स  फ्लाईट 814 (VT-EDW) का अपहरण शुक्रवार, 24 दिसम्बर 1999 को  लगभग 05:30 बजे विमान के भारतीय हवाई क्षेत्र में प्रवेश के कुछ ही समय बाद कर लिया गया था। जिसको इब्राहिम अतहर, बहावलपुर, पाकिस्तान, शाहिद अख्तर सईद, कराची, पाकिस्तान, सन्नी अहमद काजी, कराची, पाकिस्तान, मिस्त्री जहूर इब्राहिम, कराची, पाकिस्तान, शकीर, सुक्कुर, पाकिस्तान ने किया था.
पाकिस्तान से हर समय मुकाबला करने वाले लोग अमेरिकी साम्राज्यवाद के भी समर्थक हैं लेकिन पाकिस्तान अमेरिकी साम्राज्यवाद का मुख्य चहेता देश है और पाकिस्तान के माध्यम से ही तालिबान का निर्माण हुआ था. दोनों घटनाओं में तालिबान शामिल था और अफगानी 11 आतंकियों को छुड़ाने में उसके मुख्य भूमिका रही है लेकिन देश के नीति नियंता अमेरिकी मोह में फंस कर सही निर्णय लेने में असमर्थ साबित होते हैं. यही देश का दुर्भाग्य है.

-रणधीर सिंह सुमन 

शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

गोविल्स जंग नहीं शांति चाहिए

रजत शर्मा ने पूछा कि  26/11 की घटना के समय आप इनचार्ज होते तो क्या कर सकते थे ? 

मोदी ने जवाब दिया : पहली बात है जो मैंने गुजरात में किया कर देते मुझे देर नहीं लगती मै आज भी कहता हूँ.  पकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देना चाहिए,  पकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देना चाहिए ये लव लैटर लिखना बंद करना चाहिए. ये प्रणव मुखर्जी रोज एक चिट्ठी भेज रहे हैं. वो सवाल भेज रहे हैं ये जवाब देते फिरते हैं. गुनाह वो करे जवाब भारत सरकार दे रही है. 

रजत शर्मा कहते हैं कि लेकिन इंटरनेशनल प्रेशर भी तो होता है उसका भी ख्याल रखना पड़ेगा. 

मोदी ने जवाब दिया : इंटरनेशनल प्रेशर पैदा करने की ताकत आज हिंदुस्तान में है सौ करोड़ का देश का है पूरी दुनिया में हम प्रेशर पैदा कर सकते हैं कोई हम पर प्रेशर कैसे पैदा कर सकता है. ये उलटी गंगा क्यों चल रही है हैरान हूँ जी. पाकिस्तान हम को मार के चला गया , पाकिस्तान ने हम पर हमला बोल दिया मुंबई में और हमारे मंत्री जी अमेरिका गए और रोने लगे "ओबामा-ओबामा ये हमको मार कर चला गया बचाओ बचाओ" ये कोई तरीका होता है क्या ? पडोसी मार के चला गया और अमेरिका जाते हो अरे पाकिस्तान जाओ न. 

रजत शर्मा ने पूछा कि क्या तरीका होता है ? 

मोदी ने जवाब दिया :  पाकिस्तान जो भाषा में समझे समझाना चाहिए.

यह डायलाग किसी फिल्म के नहीं हैं. यह साक्षात्कार नवम्बर 2011 को इंडिया टीवी के रजत शर्मा को नरेन्द्र दामोदर मोदी ने दिया था. आज पठानकोट, गुरदासपुर और उसके बाद अब उरी की घटना इस इंटरव्यू की याद आते ही स्तिथि को बड़ी हास्यास्पद कर देती है. सोशल मीडिया पर फेक न्यूज़ की कटिंग की भरमार हो गयी है प्रतिष्ठित अखबारों में फेक न्यूज़ प्रकाशित करनी शुरू कर दी. उरी घटना के दुसरे दिन आतंकी मुठभेड़ में 10 मारे गए, पीओके में घुसकर सेना ने 20 आतंकी मारे जैसे समाचार आना शुरू हो गए. और अब यह लोग सिन्धु नदी के पानी को रोकने की बात शुरू कर रहे हैं.

आतंकवाद का श्रोत अमेरिकी साम्राज्यवाद है और उसी से इस समय हमारी विदेश नीति के तहत मित्रता है. पाकिस्तान की सेना और आईएसआई अमेरिकी साम्राज्यवाद से संचालित होती है. मोदी साहब आप भी अमेरिका बार-बार जाते हैं. वहां ओबामा को पकड़कर रोते हैं या हँसते हैं. कुछ कर डालिए ओबामा आपका मित्र है, आप बराक कहकर बुलाने की हिम्मत रखते हैं लेकिन पाकिस्तान को आप समझवा नहीं पाते हैं. युद्ध आपके बस की बात नहीं है. कारगिल जैसी नूराकुश्ती अटल बिहारी बाजपेयी लड़ चुके हैं आप भी इसी तरह का उपाय सोच रहे हैं. राफेल खरीद रहे हैं लेकिन सुरक्षा चूकें हो रही हैं उन चूकों के लिए कौन जिम्मेदार है यह आप निश्चित नही कर पा रहे हो. बडबोलेपन के आप माहिर हो. साम्राज्यवाद को जिन्दा रखने के लिए आप युद्ध कर सकते हो लेकिन भारतीय जनता की खुशहाली के लिए कूटनीतिक रास्ता निकलकर शांति का माहौल नहीं बना सकते हो. यही तुम्हारी सबसे बड़ी हार है. जंग की बजाये शांति चाहिए यह समझ विकसित करनी होगी. वैसे भारतीय इतिहास में आधुनिक गोविल्स का खिताब आपको मिल चुका है आप माने या न माने.

सुमन

रविवार, 18 सितंबर 2016

अब 56 इंच की जबान है

शहीदों को सलाम
बारामूला जनपद के उरी में सेना के 12 यूनिट के बेस पर आतंकी हमले में 17 जवान मारे गए और 19 जवान घायल हैं, 4 आतंकी मारे जा चुके है. दुखद स्तिथि है बगैर लडे फौज मारी जा रही है. चुनाव पूर्व प्रधानमंत्री के उम्मीदवार से लेकर गृह मंत्री तक पकिस्तान को चुनौती देते हुए चुनाव लड़ रहे थे. तरह-तरह के उत्तेजक डायलॉग बोल रहे थे और नकली राष्ट्रवाद की धारा बहाकर मतदाता को गुमराह कर सरकार बनाने की जोड़तोड़ में लगे थे और तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को मौनी बाबा घोषित कर रहे थे अब स्वयं मौन होकर मौनी बाबा की भूमिका आकर ट्वीट कर रहे हैं कि  'दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा'.
          प्रधानमंत्री जी सब कुछ जानते हैं और जान कर अनजान बनने का प्रदर्शन करते हैं. आई एस आई पाकिस्तानी की खुफिया एजेंसी है और पाकिस्तानी सेना को दिशा-निर्देश देने का काम अमेरिका करता है और आज प्रधानमंत्री का व्यक्तिगत दोस्त ओबामा है. सैनिक समझौते किये हैं और उसके बाद भी हमले जारी हैं और बगैर लडे पठानकोट एयरबेस से लेकर उरी बेस तक नुकसान हो रहा है. वहीँ, प्रधानमंत्री अचानक पकिस्तान की  यात्राएं की. शपथ ग्रहण में आमंत्रित किया, उपहारों का आदान-प्रदान किया लेकिन कोई बात काम नहीं आ रही है. विदेश नीति को बदल दिया है. अमेरिका जो पकिस्तान का मित्र था अब अपने देश का मित्र है. अमेरिका चुप है. दुनिया जानती है कि अमेरिका कभी किसी का मित्र नहीं रहा है, जिसका मित्र रहा उसको आस्तीन के सांप की तरह डंसा भी है चाहे वह पकिस्तान ही क्यूँ न हो. आज उसकी दुर्दशा का जिम्मेदार अमेरिका भी है जो अपनी आजादी से लेकर आज तक उसकी गोदी में बैठा रहा है. अब उसकी गोदी में एक तरफ नागपुर मुख्यालय की विदेश नीति बैठी हुई है. गाँधी की हत्या ब्रिटिश साम्राज्यवाद को हारने के कारण हुई थी और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के साथ नागपुर मुख्यालय था. अब देश की विदेश नीति अमेरिका परस्त है और उसके बाद भी हमले हो रहे हैं तो यह किसकी जिम्मेदारी है और कौन सी राजनीती का हिस्सा है. मुख्य मामला यह है कि सेना के जवान अदानी और अम्बानी के घरों के नहीं हैं बल्कि  हमारे जैसे मजदूर-किसानो के बेटें हैं. बेटे की मृत्यु होने पर कितना कष्ट होता है इसका एहसास इन राजनीतज्ञों को नहीं है. यह वाही लोग हैं जो कंधार आतंकवादियों को छोड़ने गए थे.
कश्मीर में कथित अलगाव वादियों को लेकर सरकार बनाने के लिए सत्तारूढ़ दल ने हर तरह के समझौते किये थे और तमाम सारे ऐसे लोगों को उम्मीदवार बनाया था जिनकी पृवत्ति अलगाव वादी थी. दुःख है कि सीना 56 इंच का नहीं है जबान 56 इंच की है.
वहीँ, उरी हमले पर बोले लालू प्रसाद- मोदी जी का 56 इंच का सीना सिकुड़ गया है और उनके बेटे तेजस्वी यादव ने कहा कि पाक को लव लेटर भेजने की बजाय कार्रवाई करें मोदी.
जम्मू एंड कश्मीर के राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रभारी और भाजपा के संगठन मंत्री राम माधव ने कहा
 अब ‘एक दांत के लिए पूरा जबड़ा’ की नीति अपनानी चाहिए. यह बात कहते हुए राम माधव को जबड़ा तोड़ने के लिए न तो पाकिस्तान के अनुमति की आवश्यकता है और न ही अमेरिका की. दिल्ली में भी सरकार है और कश्मीर में भी सरकार है


सुमन
लो क सं घ र्ष !

गुरुवार, 18 अगस्त 2016

शासक नरभक्षी हो गए हैं क्या

जम्मू एंड कश्मीर में लगभग 40 दिनों से सेना और जनता में राजनीतिक विफलता के कारण छाया युद्ध हो रहा है. जनता की ओर से लगभग 70 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं, कई हजार लोग घायल हैं. वहीँ हमारी सेना के भी लोग मारे गए हैं, भारी संख्या में घायल हैं. विपरीत परिस्तिथियों में काम करने के कारण उनके कार्यक्षमता पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है. सेना दुश्मनों से लड़ने के लिए होती है, नागरिकों से नहीं लेकिन दुर्भाग्य है कि हमारे देश में सेना का उपयोग अपनी ही जनता के खिलाफ किया जा रहा है.  कश्मीर में जहाँ सांसद और विधायक निर्वाचित हैं. स्वायत्तशासी संस्थाएं हैं पता नही वह क्या कर रही हैं. कर्फ्यू लगा हुआ है इन्टरनेट की सेवाएं बंद हैं. मोबाइल बंद है, अखबारों के ऊपर सरकार द्वारा प्रतिबन्ध न होने के बावजूद भी प्रकाशन व वितरण ठप सा हो गया है. अघोषित आपातकाल है. 15 अगस्त को प्रधानमंत्री बलूचिस्तान व पाक अधिकृत कश्मीर के लोगों को राजनीतिक समर्थन देकर विश्व को कौन सा सन्देश देना चाहते हैं. उनकी पार्टी के लोग कश्मीर का सवाल मुसलमान सवाल के रूप में देखते हैं और प्रधानमंत्री बलूचिस्तान व पाक अधिकृत कश्मीर के मुसलमान जनता की चिंता ज्यादा किये हुए हैं. 
                वहीँ, विदेश मंत्री स्तर की वार्ता शुरू करने का प्रस्ताव भी चल रहा है. सरकार की विदेश नीति और गृह नीति अलिखित है. जब जो चाहे इन नीतियों के सम्बन्ध में भाषण देना शुरू कर दे वही गृह नीति व विदेश नीति हो जाती है. 
   जम्मू एंड कश्मीर में चाहे जनता मरे या हमारी सेना दोनों दुखद हैं. शासक संवादहीनता के शिकार हैं. भारतीय नागरिक मर रहे हैं. नरभक्षी शासकों की जुबान चुप है. संवाद के माध्यम से राजनीतिक  तरीके से समस्या का समाधान हो सकता है. ताकत से नहीं जीता जा सकता है. सीमा पर एक तरफ तो मोर्टार व गोलियां चल रही होती हैं तो वहीँ बाघा बॉर्डर व हुसैनी वाला बॉर्डर पर पाकिस्तान से ही मिठाइयों का आदान प्रदान हो रहा है. जिससे यह साबित होता है कि शासक नरभक्षी हो गए हैं. इंसान के मरने से उनके ऊपर कोई असर नही होता है. 

सुमन 

रविवार, 13 मार्च 2016

पाकिस्तान के सामने मुर्गी

गुरु श्री श्री रविशंकर का विश्व सांस्कृतिक महोत्सव मंच पर गृहमंत्री राजनाथ सिंह व  श्रीश्री रविशंकर  मौजूद थे,  तभी मंच से  पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगे. इस समाचार को पढकर किसी भक्त को गुस्सा  नही आएगा न ही कोई मुकदमा ही लिखा जाएगा क्योकि बीजेपी जिसने संविधान में उल्लेखित बहुलतावाद और धर्मनिरपेक्षता के प्रति कभी भी बहुत आस्था नहीं दिखाई है, अब अपनी विचारधारा के ख़िलाफ़ सवाल उठाने वालों को आंखें दिखा रही है. वह अपने विरोधियो को बदनाम करने के लिए कुछ भी कर सकती है 
     जेएनयू में जो भी कुछ सरकार  ने किया वह सब उसके मानसिक दिवालिएपन का नतीजा था. उसके बाद संघियों  ने चेतावनी  भरे शब्दों  में कहा  कि देशद्रोही गतिविधिया बर्दाश्त नहीं होंगी और जब गृह मंत्री के सामने श्री श्री रविशंकर ने पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा लगाया तो आज सबकी बोलती बंद है. मेरा पाकिस्तान या हिंदुस्तान जिंदाबाद या अमेरिका जिन्दाबाद से राष्ट्रवाद या देश का, देश की संप्रभुता से कोई सम्बन्ध नहीं है. तमाम सारे देश हैं उन सारे देशों में दुनिया भर के देशों के लोग रहते हैं. जो जिस देश का होता है वह अपने देश को जिंदाबाद करता है. कभी-कभी एक दुसरे का सम्मान प्रदर्शित करने के लिए उस देश का जिंदाबाद कर दिया जाता है जैसा आम तौर पर सरकारी सभाओं में भी होता है. 
शासक वर्ग में जबसे उल्लुओं की नयी जमात पैदा हुई है. वह दिन में देख ही नहीं पाती है और जब रात होती है तब उसकी आँखें खुलती हैं. तब तक काफी देर हो जाती है. ब्रिटिश कालीन भारत में यह जमात सो रही थी और महात्मा गाँधी से लेकर बहुत सारे स्वतंत्रता सेनानियों की वजह से जब आज स्वतंत्रता का दीपक जल रहा है तो उस दीपक के प्रकाश में इन उल्लुओं की आँखें बंद हो जाती हैं और यह चिल्लाने लगते हैं देशभक्त, राष्ट्रभक्त जिसका यह स्वयं भी अर्थ नहीं समझते हैं. किसी देश के जिंदाबाद कर देने से या मुर्दाबाद कर देने से कोई विशेष परिवर्तन नहीं होता है. यह सिर्फ प्रतीक है. इन सब की देश भक्ति अंग्रेजों के समय में देखने को मिलती थी इसीलिए इन लोगों ने एक भी कंकर अंग्रेजों को नहीं मारा था. आजादी के महानायक गाँधी की हत्या कर उनकी चरित्र की हत्या आज भी करके गोडसेवाद का नारा दे रहे हैं. यह रंगे सियार गाँधी की जयकार करेंगे फिर गोडसे का मंदिर भी बनायेंगे. अमेरिका के कहने पर पाकिस्तान के सामने मुर्गी बन जाते हैं लेकिन कोई दूसरा अगर पाकिस्तान को आँख दिखाए तो यह उन्हें बर्दाश्त नहीं होता है. 

सुमन 

शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

भारतीय सेना के अतिरिक्त भी सेनायें हैं

देश में भारतीय सेना के अतिरिक्त बहुत सारी सेनायें हैं जो धर्म के नाम पर गठित की गयी हैं. उनका अलग कानून अलग संविधान है. उनका कानून, उनका संविधान, उनके संचालकों के अनुसार ही चलता है बाकी जनता को उनके कानून, उनके संविधान के सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं होती है. यही बात पडोसी देश पाकिस्तान में भी है. वहां पर भी धर्म आधारित सेनायें हैं जिनका अपना संविधान है और कानून है. यह मुख्य समानता है. यह सारी सेनायें कब कौनसा फरमान जारी कर दें और उनके समर्थक उस कार्य को करने के लिए अमादा हो जाएँ. इन सेनाओं के ऊपर देश का संविधान कानून लागू करना एक दुरूह कार्य है.
             मध्य प्रदेश में नयी सेना का उदय हुआ इस सेना का नाम गौ सेना है. गौ सेना ने कुशीनगर एक्सप्रेस के खडवा रेलवे स्टेशन पर ट्रेन की तलाशी लेनी शुरू कर दी और बताया कि बीफ की तलाशी ली जा रही है. एक धर्म विशेष के लोगों की पिटाई भी की गयी. मोहम्मद हुसैन और उनकी पत्नी नसीब बानो ने इसकी शिकायत जी आर पी में की और कुछ गिरफ्तारियां भी हुई हैं.
दूसरी तरफ दिल्ली स्तिथ पकिस्तान एयरलाइन्स के दफ्तर में जमकर तोड़फोड़ की गयी. यह कार्यवाई हिन्दू सेना ने की. पूरे देश में कभी श्री राम सेना, कभी कृष्ण सेना, कभी हिन्दू सेना और कभी शिव सेना और आज गौ सेना भी आ गयी. इन सेनाओं में शिव सेना सबसे बड़ी सेना है. महाराष्ट्र में सरकार की साझीदार भी शिव सेना है.
पाकिस्तान में धर्म की आड़ में बहुत सारे ताकतवर संगठन काम करते हैं जिनमें जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा, तालिबान, अलक़ाएदा व जमात-उद-दावा जैसे सैकड़ों सेनायें या संगठन हैं जो सरकार से अपने को ऊपर मानते हैं. पठानकोट हमले को लेकर पाकिस्तान ने एक बहुत बड़ी कार्रवाई की है. जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादी मौलाना मसूद अजहर को पाकिस्तान ने हिरासत में ले लिया है. मसूद अजहर के साथ उसके भाई रऊफ को भी हिरासत में लिया गया है. मसूद अजहर से पाकिस्तान पूछताछ कर रहा है. मसूद अजहर वो ही आतंकवादी है जिसे भारत की जेल से छुड़ाया गया था. आतंकवादियों ने एयर इंडिया के विमान का अपहरण कर लिया था. विमान छोड़ने के एवज में मसूद अजहर को छुड़ाया गया था. यह समाचार दुनिया को सुनाने के लिए प्रसारित किया गया लेकिन वहीँ पकिस्तान सरकार यह भी कह रही है कि मौलाना मसूद अजहर की गिरफ्तारी सुरक्षात्मक है. इसके पूर्व मुंबई पर हुए 26/11 के आतंकी हमले का मास्टरमाइंड और आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के सरगना जकीउर रहमान लखवी को रावलपिंडी की अदियाला जेल से रिहा कर दिया गया था। पाकिस्तान अपने वहां नरमी बरतता है जैसे हमारे वहां कानून और संविधान न मानने वालों के प्रति नरमी बरती जाती है.
सवाल यह है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है इसलिए यहाँ यह सेनाएं कुछ-कुछ कमजोर हैं. पकिस्तान इस्लामी राष्ट्र रहा है इसलिए देश की सेना के अतिरिक्त महा सेना के जो संगठन हैं वह कई- कई देशों में अपनी कार्यवाहीयां करते रहते हैं लेकिन अगर यही स्तिथि रही तो देश के अन्दर संविधान और कानून का राज पीछे हो जायेगा और इन्ही सेनाओं की मर्जी से देश चलेगा यह सबसे बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण दिन होगा. 

सुमन
लो क सं घ र्ष !

बुधवार, 13 जनवरी 2016

आतंक का शीर्षासन

भारत पाकिस्तान के संबंधों के बीच आतंकी घटनाएं महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है. कहा यह जाता है कि पाकिस्तानी सेना व खुफिया एजेंसी आई एस आई के ऊपर राजनैतिक नेताओं की कमांड ढीली रहती है और भारत विरोध में यह दोनों संगठन महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं. महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि पूरी दुनिया में आतंकी संगठनो को पैदा करने का काम अमेरिका और उसकी खुफिया एजेंसियां करती हैं और जब आतंकी संगठन गठित करने का उद्देश्य पूरा हो जाता है तो उसका विनाश करने के लिए भी वही आते हैं.
          प्रधानमंत्री मोदी ने पाकिस्तान को पठानकोट आतंकी घटना के सबूत उपलब्ध कराये. पाकिस्तान सरकार ने सबूतों को इनकार किया लेकिन आज वहीँ पाकिस्तान ने पठानकोट हमला मामले में जैश-ए- मोहम्मद के तीन आतंकियों को गिरफ्तार किया है। जियो टीवी के हवाले से तीन आतंकियों को गिरफ्तार करने की खबर आई है। इस हमले को लेकर पाक में कई जगहों पर छापे मारे गए हैं। जैश के कई ठिकानों पर छापा मारा गया है। गिरफ्तार व्यक्तियों में अजहर मसूद का रिश्तेदार भी है.
                दूसरी तरफ मुंबई के सीनियर जर्नलिस्ट बलजीत परमार का कहना है कि 26 दिसंबर के दिन दाउद लाहौर में ही था। उनका कहना है कि वो न केवल लाहौर में था बल्कि रावलपिंडी पैलेस भी पहुंचा था। परमार का दावा है कि डॉन इस शादी समारोह में पूरे परिवार के साथ शरीक हुआ था। इतना ही नही इस समारोह में शामिल होने के लिए भारत का एक कारोबारी और मुंबई से कुछ लोग भी पहुंचे थे। परमार 80 के दशक में दाउद से दो बार मिलने का दावा भी कर चुके है। यह समाचार आतंकी लोगों के राजनीतिक गठजोड़ को दर्शाता है. दोनों समाचार परस्पर एक दूसरे के विरोधी हैं. इनका विश्लेषण करना सरल नहीं है. अगर यह खबर सही है तो हमारे प्रधानमंत्री अगर शादी समारोह में रुकते तो दाउद से भी मुलाकात हो जाती और गृह मंत्री राजनाथ सिंह को दाउद को ढूंढने की जरूरत नहीं होती.

आतंक या आतंकवाद का सीधा सम्बन्ध साम्राज्यवाद से है. साम्राज्यवाद जनता को भय में रखने के लिए पहले आतंकी संगठनो को जन्म देता है और अपना उद्देश्य पूरा होते ही वह जनता के समक्ष अपनी ताकत दिखाने के लिए नष्ट भी करता है. पूरी दुनिया में आतंकियों को हथियार सप्लाई करने का काम साम्राज्यवादी देश ही करते हैं. आतंक और आतंकवाद को समाप्त के नारे के साथ लाखों लोगों को बेघर बार होना पड़ता है. लाखों जाने जाती हैं और उनकी हड्डियों पर साम्राज्यवादी शक्तियां अपने नाटक का प्रदर्शन करती हैं.
                भारत पाक संबंधों में मुख्य समस्या साम्राज्यवादी अमेरिका है. उसी के इशारे पर आतंकवाद का पदमासन से लेकर शीर्षासन होता रहता है.  
पाकिस्तान और अपने देश की सरकारें जनता को भ्रमित करने के लिए तथा छद्म राष्ट्रवाद को पैदा करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाती हैं. जिससे जनता का ध्यान महंगाई, बेरोजगारी, भुखमरी से हट सके. 

सुमन 

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

मीर जाफ़र की तलवार

रूस में प्रधानमंत्री मोदी ने गार्ड ऑफ़ ऑनर से पहले राष्ट्रगान के समय चल कर अपने उतावलेपन का परिचय दिया. रूसी अधिकारीयों ने आगे बढ़कर उनको रोका और राष्ट्रगान के समय खड़ा रहने के लिए प्रेरित किया. हमारे प्रधानमंत्री दो दिन की रूस यात्रा के बाद अफगानिस्तान की यात्रा पर फिर तुरंत पाकिस्तान की यात्रा पर हैं. रूस में उन्हें तोहफे के तौर पर महात्मा गाँधी की डायरी का पृष्ठ दिया और तलवार भी भेंट की. तलवार के बारे में यह कहा जाता है कि यह तलवार मीर जाफर के वंशजों की है. यह कौन सा सन्देश मोदी साहब को देने का प्रयास किया गया है. क्या नागपुर मुख्यालय की अंग्रेज भक्ति के ऊपर कटाक्ष तो नहीं किया गया है.  टीपू सुलतान की तलवार की जगह मीर जाफर की तलवार अब महत्वपूर्ण हो गयी है. कलकत्ता से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक 'द टेलीग्राफ' लिखता है- Putin's gift last night was an 18th- century sword from Bengal's Najafi dynasty of nawabs, started by Mir Jafar who was placed on the throne by the British after the Battle of Plassey in 1757.
                              कलकत्ता के राजनेता व साहित्यकार अरुण महेश्वरी लिखते  है -रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने कल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बंगाल के मीर जाफ़र के नज़ाफी नवाब वंश की तलवार भेंट की है । यह भेंट बहुत सांकेतिक प्रतीत होती है । भारत के इतिहास में जयचंदों और मीरजाफरों की एक समानांतर परंपरा रही है । मोहम्मद गोरी की सेना के हाथों पृथ्वीराज चौहान को हराने में कन्नौज के राजा जयचंद और 1757 की प्लासी की लड़ाई में क्लाइव के हाथों सिराज-उद-दौल्ला को पराजित करने में मीर जाफ़र की भूमिका की परंपरा । इसे आधुनिक काल में अंग्रेज़-भक्तों की परंपरा भी कहते है । पुतिन ने मोदी जी को मीर जाफ़र के वंशधरों की तलवार से नवाज़ कर क्या कोई ख़ास संदेश दिया है.
                        बाक़र गंज के सैयद में असग़र वजाहत ने लिखा है ----मीर मुहम्मद जाफ़र ख़ाँ थे जो बाद में शुजाउल मुल्क, हाशिमुद्दौला नवाब जाफर अली ख़ाँ बहादुर, महाबत जंग नवाब नाजि़म बंगाल, बिहार और उड़ीसा हुए। इन्हें उर्फे आम में मीर जाफर भी कहा जाता है। वही मीर जाफर हैं जिन्होंने प्लासी की लड़ाई में नवाब सिराजुद्दौला को धोखा दिया था। वही मीर जाफर जिन्होंने लॉर्ड क्लाइव, सेठ अमीचंद और जगतसेठ के साथ मिल कर सिराजुद्दौला का तख्ता पलट दिया था। वही मीर जाफ़र जिनके लड़के मीरन ने सिराजुद्दौला की हत्या करायी थी। वही मीर जाफ़र जिनका नाम इतिहास में जयचंद के साथ लिया जाता है। वही मीर जाफ़र जो विश्वासघात का प्रतीक बन चुके हैं।  जिनकी हवेली को आज भी नमक हराम की डियोढ़ी कहा जाता है। जिन्हें लोगों ने ग़द्दार-ए-अबरार यानी भले आदमी से विश्वासघात करने वाले की उपाधि दी थी। 
                  क्या इन दोनों बातों से देश का सम्मान बढ़ता है ? रोज-रोज मल्टी नेशनल कंपनियों सी इ ओ को लेकर उनके व्यापार बढाने के लिए जब प्रधानमंत्री स्तर पर इस तरह प्रयास किये जायेंगे तो निश्चित रूप से यह सब तो होगा ही. पहले जब कोई प्रधानमंत्री किसी देश की यात्रा पर जाता था तो सालों उसकी तैयारियां होती थी लेकिन हमारे मोदी साहब बगैर तैयारियों के हर देश में जनसभा करने पहुँच रहे हैं. वहीँ, एक आश्चर्यजनक घटनाक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज दोपहर बाद काबुल से दिल्ली लौटने के क्रम में लाहौर जाएंगे और अपने पाकिस्तानी समकक्ष नवाज शरीफ से मुलाकात करेंगे। मोदी की यह पहली पाकिस्तान यात्रा होगी। इसके बारे में मोदी ने खुद ट्वीट करके जानकारी दी। 

सुमन 

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015

एक चमन के दो फूल

14-15 अगस्त 1947 में साम्राज्यवादी शक्तियांे ने एक चमन में लगे दो फूलों को अलग-अलग कर दिया था और भारत-पाकिस्तान बना दिए थे। विभाजन से पहले दोनों धर्मों के कट्टरवादी तबके आन्दोलन चला रहे थे कि दोनों धर्म के मानने वाले लोग एक साथ नहीं रह सकते हैं और धर्म के आधार पर भारत और पाकिस्तान बना। एक धर्म होने के बावजूद पाकिस्तान का विभाजन हो गया। भारत ने धर्म निरपेक्षता की नीति अपनाई और सरसब्ज बाग हुआ। वहीं पाकिस्तान ब्रिटिश साम्राज्यवाद से आजाद होने के बाद अमरीकी साम्राज्यवाद के खेमे में चला गया। साम्राज्यवादी लूट के चलते जो विकास होना चाहिए वह नहीं हुआ। जो शक्तियां ब्रिटिश कालीन भारत में हिन्दू राष्ट्र बनाने की रणनीति के तहत समाज में विघटनकारी बीज बो रही थीं वह आज पेड़ के रूप में धीरे-धीरे तैयार हुई। 2014 के चुनाव में वही ताकतें पाकिस्तान से 10 सर लाने की बात या युद्ध करने की बात करने लगी। कश्मीर सीमा पर आए दिन गोलाबारी होती रहती है वह भी अमरीकी साम्राज्यवाद के इशारे पर होती है। पाकिस्तान की सेना व आईएसआई अमरीकी नियंत्रित  हैं और आज अपना भी देश काफी कुछ अमरीकी खेमे में है। बाघा बाडर से लेकर हर बाडर पर शान्ति बनी रहती है और बराबर व्यापार भी चलता रहा है लेकिन क्या कारण हैं कि कश्मीर सीमा पर हमेशा छाया युद्ध चला करता है, मोदी से लेकर सुषमा स्वराज तक पाकिस्तान को नेश्तनाबूद कर देने की बात पिछले आम चुनाव में करते रहे हैं और देश के अंदर विषाक्त वातावरण तैयार किया गया लेकिन आज फिर वार्ता के दौर की बात शुरू हो गई और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पाकिस्तान की यात्रा भी कर आई हैं। इसके पहले का यह इतिहास रहा है कि कारगिल से पूर्व इन्हीं ताकतों ने बस सेवा से लेकर तमाम सारी वार्ताए की और फिर कारगिल का अघोषित युद्ध भी किया। उसी तरह की स्थितियां फिर देश में पैदा की जा रही हैं कि शान्ति वार्ताओं का दौर शुरू होगा और फिर साम्राज्यवादी ताकतों के इसारे पर युद्ध। यह भारतीय जनता के लिए एक बहुत ही घातक रणनीति साबित होती है। इस समस्या का समाधान तब तक नहीं हो सकता है जब तक साम्राज्यवादी ताकतों के इसारे पर कश्मीर सीमा पर लोग युद्धरत रहेंगे। विदेश नीति का पाकिस्तान के संदर्भ में अचानक बदलने का कारण यह भी है कि मोदी की व्यक्तिगत चमक भारतीय जनता में फीकी पड़ी है और उनका हिन्दुत्ववादी शक्तियों का अन्तिम अस्त्र कथित देशभक्ति व राष्ट्रवाद से पुनः जीवन पाने की कोशिश होती है और इन्हीं शब्दों से यह कई बार जीवन पा चुके हैं। मुख्य बात यह भी  है कि  दोनों देशों  की जनता में कोई टकराव नही है .
  बॉलीवुड के प्रभावशाली अभिनेता ओम पुुरी हाल ही पाकिस्तान में एक इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का हिस्सा बने।जहां उन्होंने पाकिस्तान में बस जाने की बात कही।ओमपुरी ने कहा कि दादरी भीड़ ने एक मुस्लिम शख्स को मारने की बात हमारे देश को शर्मिंदा कर देने वाली है।पाकिस्तान के तीन दिवसिय दौरे पर उन्होंने पाकिस्तानी मीडिया से कहा कि यदि उनके इस बयान पर भारत में कट्टरपंथी उन्हें परेशान करेंगे तो वे भारत छोड़ पाकिस्तान में आ बसेंगे।भारत में गोहत्या के मामले पर उन्होंने कहा कि जो भारत में गोहत्या को बैन करना चाहते है वे ढोंगी है।हम खुद ही बीफ निर्यात करके डॉलर कमाते है।पुरी ने बताया कि अगर पाकिस्तान भारत से अलग ना हुआ होता तो फिल्म इंडस्ट्री मुंबई की जगह लाहौर में होती।
उन्होंने आगे कहा कि 80 से 90 प्रतिशत लोग भारत में सेक्युलर है और वे पाकिस्तानियों से नफरत नहीं करते।भारतीय समाज में सारे लोग हिंसक नहीं है।चंद भ्रमित लोग है जो दोनों देशों के संबंधों को बिगाडऩा चाहते है।उन्होंने दोनों ही देश के लोगों से अनुरोध किया कि नफरत की राह छोड़कर आपस में मेलजोल की बात पर ध्यान दें।लोग क्यों जानवर की जैसी हरकतें करते है?अल्लाह भी निर्दोषों को मारने की इजाजत नहीं देता।
 इसी से सम्बन्धित   दूसरा मुद्दा आतंकवाद का है। आतंकवाद के नाम पर कथित राष्ट्रभक्ति का ज्वार शुरू होता है। जैसे-जैसे मोदी की चमक ढीली होती जा रही है वैसे-वैसे ही छदम्य आतंकवाद का खतरा दिखाई देने लगता है और इस समय जब उनकी चमक फीकी पड़ रही है तो तरह-तरह के समाचार आतंकवाद से सम्बन्धित प्रकाशित किये जा रहे हैं जिससे फिर उनको पुनः जीवन मिल सके। कौन नहीं जानता है कि तालीबान या आईएसआईएस को अमरीकी मदद से तैयार किया गया था और फिर उनका विनाश करने के लिए उन देशों के ऊपर भयानक बमबारी कर उन देशों को तबाह किये जाने की  बात उनकी  रणनीति का एक हिस्सा है। जब तक अमरीकी साम्राज्यवाद को परास्त नहीं किया जायेगा तब तक आतंकवाद दुनिया में समाप्त नहीं हो सकता है, साम्राज्यवाद का दूसरा स्वरूप ही आतंकवाद है। इस संबंध में भारतीय जनगण को सोचना होगा मीडिया द्वारा एक छदम्य आतंकवाद का वातावरण तैयार किया जा रहा है जो एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा है।
-रणधीर सिंह सुमन

शनिवार, 22 अगस्त 2015

लफ्फाजों की महाभारत

महाभारत  के नायक
उफ़ा में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने मिलकर दोनों पक्ष सभी लंबित मुद्दों पर चर्चा के लिए सहमति बनी , जिसमें भारत और पाकिस्तान ने मुम्बई आतंकी हमले से संबंधित मुकदमे में तेजी लाने का निर्णय, दिल्ली में मिलेंगे भारत-पाकिस्तान के NSA डीजी BSF और DGMI की बैठक, दोनों पक्षों ने 15 दिनों के भीतर एक-दूसरे के मछुआरों और उनकी नौकाओं को छोड़ने का निर्णय, मुंबई हमले के वॉयस सैंपल मुहैया कराएंगे व नवाज शरीफ ने पीएम मोदी को दिया सार्क सम्मेलन में आने का न्योता दिया.
दो तीन दिन से लगातार दाउद से लेकर कश्मीर के अलगाववादी नेताओं की नजरबंदी और फिर नजरबंदी को वापस लेना तथा अलगाववादी नेताओं की जेलों से रिहाई आदि का हाई प्रोफाइल ड्रामा देश की जनता को देखने को मिल रहा है. न पाकिस्तान दाउद को भारत को सौंपने जा रहा है न ही भारत पाकिस्तान से अच्छे सम्बन्ध रखना चाहता है. अगर भारत-पाकिस्तान के सम्बन्ध अच्छे हो जायेंगे तो तथाकथित राष्ट्रवादी देशभक्तों की दुकाने अपने आप बंद हो जाएँगी, लेकिन ड्रामा चल रहा है इस ड्रामे का अंत अगर हो जाता है तो दोनों देशों के राष्ट्रवादी एक इंच जमीन न देने का नारा लगाने वाले लोगों की राजनीति समाप्त हो जाएँगी. चुनाव में कई दलों को इस नाटक से वोट का प्रतिशत बढ़ता है इसलिए यह सब होता रहता है. हिंदी साहित्य में भी अगर पकिस्तान और कश्मीर न होता तो आधी कवितायेँ नहीं लिखी जाती और बहुत सारे लोग कवि बनने से वंचित रह जाते. पिछली एनडीए सरकार में कारगिल की घुसपैठ या युद्ध या सीमापार फायरिंग कुछ भी नाम दे, नूराकुश्ती का ही परिणाम था और राष्ट्रवादियों ने ताबूत घोटाला कर डाला था. देश की जनता का ध्यान हटाने के लिए यह सब होता रहता है और लफ्फाजों का युद्ध मीडिया में घमासान रूप से जारी रहता है.
वहीँ, उग्र हिन्दुवत्व वाला दल शिवसेना के नेता संजय राउत ने कहा कि'दाऊद का भजन बंद करो, अगर आप में हिम्मत है तो पाकिस्तान में घुसो और उसे पकड़ कर लेकर आइए।' यह दल हमेशा उग्र राष्ट्रवाद की बात करता है लेकिन देश बकी एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचाने के लिए कोई कोर-कसर नही छोड़ता है. कभी भाषा के नाम पर, कभी प्रान्त के नाम पर यह अपने देश के नागरिकों के खिलाफ भी तलवारें भांजता रहता है. 
 यह सब हाई प्रोफाइल ड्रामा जान बूझकर जनता का ध्यान दूसरी तरफ करने के लिए किया जाता है वहीँ, दूसरी तरफ सरकार कॉर्पोरेट सेक्टर को फायदा पहुंचाने के लिए जो काम कर रही होती है, उसकी तरफ लोगों का ध्यान न जाए और उसकी बहस संसद में भी न होने पाए उसके लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाती है. यह सरकार सोमवार को पेट्रोलियम क्षेत्र की सरकारी कंपनी इंडियन ऑयल कार्पोरेशन (आइओसी) में अपनी 10 प्रतिशत हिस्सेदारी का विनिवेश करने जा रही है. सरकार का कहना है कि इससे सरकारी खजाने में 9,500 करोड रुपये आने की उम्मीद है. सरकार ने इंडियन ऑयल कार्पोरेशन में अपनी 10 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने के लिये 387 रुपये का न्यूनतम शेयर मूल्य तय किया. इससे पहले किये गये तीन विनिवेश से 3,000 करोड रुपये जुटाये गये. सरकार ने चालू वित्त वर्ष के दौरान विनिवेश से 69,500 करोड रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है. इस तरह से सार्वजानिक क्षेत्र को सस्ते दामों पर उद्योगपतियों को बेचने का काम जारी है जिसकी चर्चा न इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में है न प्रिंट मीडिया में है. सरकार में स्थापित नेतागण पाकिस्तान से लफ्फाजी की महाभारत करते रहते हैं और एक विशेष प्रकार का उन्माद जनता में पैदा करते हैं ताकि जनता उनके द्वारा किये जा रहे कार्यों के सम्बन्ध में सोचने व समझने की स्तिथि में न रह जाए यही आतंकवाद के नाम पर सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. लफ्फाजी की महाभारत ज़ारी रहेगी, कॉर्पोरेट सेक्टर जनता से जल,जंगल, जमीन छीनता रहेगा. सरकार उसकी गुलामी करती रहेगी. 

सुमन 

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के अधिकार



सेंटर फॉर सोसायटी एण्ड सेक्युलरिज्म ;सीएसएसएसद्धए मुंबई ने काठमाण्डू में आयोजित पीपुल्स सार्क रीजनल कन्वर्जेन्स मीट में 24 नवंबर 2014 को 'दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के अधिकार' विषय पर सत्र का आयोजन किया।  इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य, दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के उल्लंघन की प्रकृति को समझना और जनसंगठनों का ऐसा मजबूत गठजोड़ खड़ा करना था, जिससे इन उल्लंघनों से मुकाबला करने के लिए पहले से विद्यमान व्यवस्था को और शक्तिशाली बनाया जा सके और इसके लिए नए तंत्र विकसित किए जा सकें। दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के घोषणापत्र का मसविदा तैयार करने की प्रक्रिया का शुभारंभ भी इस सत्र के एजेण्डे में शामिल था।
भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका व बांग्लादेश से आए लगभग 40 प्रतिनिधियों ने इस सत्र में भागीदारी की। सत्र की शुरूआत सभी उपस्थित प्रतिभागियों के परिचय से हुई। तत्पश्चात, सीएसएसएस के निदेशक इरफान इंजीनियर ने सत्र के आयोजन के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर विमर्श की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यक वर्गों में चेतना का उदय साम्राज्यवादी दौर में हुआ जब हमारे विदेशी शासकों ने बड़ी संख्या में लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान जाने पर मजबूर किया ताकि उन्हें सस्ता श्रम उपलब्ध हो सके। आबादी के इस स्थानांतरण से देशों की सीमाएं बदलीं और नई राजनीतिक व्यवस्थाओं ने जन्म लिया। विभिन्न क्षेत्रों में नए लोगों के बसने का एक प्रभाव यह हुआ कि दक्षिण एशिया के एक देश में जो समुदाय बहुसंख्यक था वह दूसरे देश में अल्पसंख्यक बन गया। इससे परिस्थितियां जटिल होती गईं।
अल्पसंख्यकों द्वारा उनके अधिकारों की मांग को राज्य अपनी सत्ता के लिए चुनौती मानता आया है। यद्यपि अल्पसंख्यकों की स्थिति में सुधार के लिए नेहरू.लियाकत सहित कई समझौते हुए परंतु शीतयुद्ध के काल मेंए दक्षिण एशिया, साम्राज्यवादी हितों के टकराव और हिंसा व षडयंत्रों का केंद्र बनकर उभरा। इससे विभिन्न समुदायों के बीच आपसी बैरभाव तो बढ़ा हीए धार्मिक कट्टरता में भी तेजी से वृद्धि हुई और क्षेत्र की सुरक्षा और शांति को खतरा पैदा हो गया। इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए अल्पसंख्यक, जो दक्षिण एशिया में पहले से ही हाशिए पर थे।
सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज के हर्षमंदर ने अपने मुख्य वक्तव्य में कहा कि अल्पसंख्यक समुदायों और सरकारों के आपसी रिश्ते सहज और सामान्य नहीं हैं। अल्पसंख्यकों को यह लगता है कि वे वंचना के शिकार हैं। धार्मिक पहचान, समाज को विभाजित कर रही है। उन्होंने कहा कि प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता का मूल तत्व यह है कि हम विविधता का सम्मान करें और समानताएं ढूंढना बंद करें। यही दक्षिण एशिया और यूरोप में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा का फर्क है। यूरोप में धर्मनिरपेक्षता, वहां के समाज में घुलमिल जाने के रूप में परिभाषित की जा रही है। इसका एक उदाहरण है फ्रांस में पगड़ी व हिजाब पहनने पर प्रतिबंध। उन्होंने कहा कि राज्य के दमन और विविधता की उपेक्षा के कारण, लोग उस देश में स्वयं को सुरक्षित समझते हैं जहां उनके समुदाय का बहुमत हो। दक्षिण एशिया की विविधता ने उसकी संस्कृति को समृद्ध किया है। परंतु समृद्ध संस्कृति के साथ.साथ यह भी जरूरी है कि किसी भी देश में अल्पसंख्यक स्वयं को सुरक्षित समझें और बिना आतंक या डर के अपना जीवनयापन कर सकें। हर एक को यह स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वह किसी भी धर्म का पालन करे या कोई भी धर्म न माने या नास्तिकता में विश्वास रखे। यही सच्चा प्रजातंत्र है। दुर्भाग्यवश,दक्षिण एशिया में प्रजातंत्र की इस मूल आत्मा का हनन हो रहा है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचला जा रहा है। बर्मा जैसे कई देशों में तो मानवाधिकारों के उल्लंघन पर चर्चा करना तक प्रतिबंधित है। ऐसे मुद्दों पर चर्चा के लिए गुप्त बैठकें आयोजित करनी पड़ती हैं क्योंकि सरकार किसी भी प्रकार की मतविभिन्नता को क्रूरता से कुचल देती है।
इसके बाद,विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने अपने.अपने देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति का विवरण दिया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि श्री मंदर द्वारा व्यक्त की गई चिंताएं एकदम सही थीं। अल्पसंख्यकों की समस्या का चरित्र मूलतः राजनैतिक है और प्रजातांत्रिक अधिकारों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को उपयुक्त व पर्याप्त महत्व मिलना चाहिए। अल्पसंख्यकों की समस्याओं के बढ़ने का एक कारण है आक्रामक बाजार.आधारित अर्थव्यवस्था,जो कि मध्यम वर्ग की मानसिकता पर गहरा प्रभाव डाल रही है। श्रेष्ठी वर्ग यह चाहता है कि हाशिए पर पटक दिए गए लोगों और अल्पसंख्यकों की कीमत पर समाज में उसका वर्चस्व बना रहे। इसलिए यह आवश्यक है कि पूंजीवाद जैसी विचारधाराओं पर हल्ला बोला जाए जो कि अमीरों और गरीबों के बीच की खाई को औरचौड़ा कर रही हैं। बाजार.आधारित अर्थव्यवस्था से असंतुलित विकास हो रहा हैए जो समावेशी नहीं है। बांग्लादेश से आए मोइनुद्दीन ने कहा कि बांग्लादेश में कई धार्मिक,नस्लीय व सैक्स.आधारित अल्पसंख्यक समूह हैं। देश में हिजड़ा समुदाय एक महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक समुदाय है। अल्पसंख्यकों को ढेर सारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बांग्लादेश में हिंदू आबादीए जो कि सन् 1947 में 27 प्रतिशत थीए घटकर 10 प्रतिशत रह गई है। देश में अल्पसंख्यकों को अपने रहवास के इलाकों से पलायन करने पर मजबूर किया जा रहा है।
श्रीलंका के के.के. बालकृष्णन ने कहा कि वहां की आबादी में 72 प्रतिशत हिस्सा सिंहलियों का है जबकि 12.13 प्रतिशत तमिल, 8 प्रतिशत मुसलमान और लगभग 7 प्रतिशत भारतीय तमिल हैं,जो कि मुख्यतः वहां के बागानों में काम करते हैं। श्रीलंका में अल्पसंख्यकों के साथ नस्ल व वर्ग के आधार पर भेदभाव किया जाता है। भारतीय तमिलों के भी हाल बेहाल हैं।
पाकिस्तान में स्थिति और भी खराब है। वहां अल्पसंख्यकों की अर्थव्यवस्था और विकास में तनिक भी हिस्सेदारी नहीं है। नौकरशाही में अल्पसंख्यकों की भागीदारी न के बराबर है। यद्यपि पाकिस्तान में सरकारी नौकरियों में अल्पसंख्यकों के लिए 5 प्रतिशत पद आरक्षित हैं तथापि उन्हें कभी जिम्मेदार व ऊँचे पदों पर नियुक्त नहीं किया जाता। उन्हें अक्सर महत्वहीन पद दिए जाते हैं। विभाजन के दौरान, जिस समय दोनो देशों से हिंदुओं और मुसलमानों का बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा था, उस समय अल्पसंख्यकों ने पाकिस्तान में रहने का निर्णय इसलिए किया क्योंकि उन्हें उस धरती से प्यार था, जिसमें वे पले.बढ़े थे। केवल वे ही हिंदू पाकिस्तान छोड़कर जा सके जो धनी थे और जिनके पास एक नए स्थान पर जिंदगी शुरू करने के लिए आवश्यक संसाधन और योग्यता थी। दमनकारी जाति व्यवस्था और अमानवीय अछूत प्रथा के कारण भील और कोली समुदायों की बड़ी आबादी ने पाकिस्तान छोड़कर भारत न जाने का निर्णय किया। आज भी 80 लाख भील और कोली पाकिस्तान में रह रहे हैं। परंतु भारतीय उपमहाद्वीप के अन्य देशों की तरह, पाकिस्तान में भी उनके साथ जाति के आधार पर भेदभाव होता रहा और उन्हें शिक्षा व अन्य क्षेत्रों में समान अवसर नहीं मिले। इस भेदभाव का एक सुबूत यह है कि जहां हिंदू आबादी का 80 प्रतिशत अनुसूचित जातियां हैं,वहीं अर्थव्यवस्था, प्रशासन, संसद आदि में उनका प्रतिनिधित्व मात्र 20 प्रतिशत है। स्पष्टतः, अल्पसंख्यकों की राजनीति में भागीदारी को रोकने की कोशिश की जा रही है। अगर सत्ता और राजनैतिक प्रक्रिया में उन्हें आनुपातिक प्रतिनिधित्व दिया जाना है तो अल्पसंख्यक समुदायों को संसद में अधिक सीटें दी जानी चाहिए।
परंतु जब हम अल्पसंख्यकों और उनके अधिकारों की चर्चा करते हैं तब यह जरूरी है कि हम अल्पसंख्यक समुदायों को एकाश्म न मानें और ना ही हम उन्हें ऐसा समूह समझें, जिसकी आवश्यकताएं, महत्वाकाक्षाएं और अनुभव एक ही हैं। जाति की तरहए लिंग भी भेदभाव का आधार है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं को विवाह करते समय इस्लाम अपनाने पर मजबूर किया जाता है। वहां बलात्कार आम है और ये महिलाओं के लिए मानसिक और शारीरिक यंत्रणा का सबब बनते हैं। अतः अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर कोई भी चर्चा तब तक पूरी नहीं होगी जब तक कि उसमें लैंगिक न्याय की बात शामिल न हो। अल्पसंख्यकों के अधिकारों के किसी भी घोषणापत्र को लागू करते समय यह ध्यान में रखा जाना होगा कि उसमें महिलाओं के अधिकारों के लिए उचित स्थान हो।
पाकिस्तान की तरह,भारत में भी अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं को हजार दुःख हैं। उनके साथ भी बलात्कार और शारीरिक शोषण की घटनाएं बहुत आम हैं। मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान यह प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से सामने आयी। जब मुसलमानों के खिलाफ हिंसा हो रही थी तब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने उसे रोकने के लिए पर्याप्त और उचित कदम नहीं उठाए। यहां तक कि मुस्लिम समुदाय के विधायक भी मूकदर्शक बने रहे।
टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल सांइसेज,मुंबई के प्रोफेसर रानू जैन ने कहा कि भारत में अल्पसंख्यकों के प्रति नीतियों पर बहस होनी चाहिए क्योंकि वे काफी हद तक अस्पष्ट हैं। उदाहरणार्थ, अल्पसंख्यक समुदाय को ही परिभाषित नहीं किया गया है। नतीजे मेंए उच्चतम न्यायालय यह तय कर रहा है कि कौन.सा समुदाय अल्पसंख्यक है और उस समुदाय को अल्पसंख्यकों के लिए नियत सुविधाएं दी जा रही हैं। इससे शक्तिशाली समुदायों को जोड़तोड़ करने का मौका मिल रहा है। भारत में इसी अस्पष्टता का लाभ उठाकर जैनियों और पारसियों ने भी अपने.अपने समुदायों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिलवा दिया है और उन्हें राज्य द्वारा हर किस्म का प्रोत्साहन दिया जा रहा है। यद्यपि यह सही है कि जैनियों और पारसियों की आबादी कम है परंतु यह भी सच है कि दोनों समुदाय विकसित,शिक्षित और समृद्ध हैं और उन्हें उन अल्पसंख्यक समुदायों की कीमत पर सुविधाएं उपलब्ध करवाई जा रही हैं, जो पिछड़े, गरीब और अशिक्षित हैं। भारत में अमीरों और गरीबों के बीच भारी अंतर है। मुट्ठीभर रईस यह जानते भी नहीं कि गरीबों को किस तरह की हिंसा, भेदभाव और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। संपन्न वर्ग तो बस अपनी ताकत में बढ़ोत्तरी करना चाहता है। मीडिया और शिक्षा व्यवस्था का इस हद तक सांप्रदायिकीकरण हो चुका है कि ये दोनों संस्थाएं अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों के प्रति संवेदनशील नहीं हैं। निराशा के इस घनघोर अंधेरे में सच्चर समिति की रपट, आशा की किरण बनकर उभरी थी परंतु उसकी अधिकांश सिफारिशों को आज तक लागू नहीं किया गया है। ऐसे में जरूरी है कि अल्पसंख्यकों की चिंताओं पर खुलकर चर्चा की जाए और ऐसे नियम.कानून बनाए जाएं जिनसे सांप्रदायिक आधार पर भेदभाव रूक सके। साथ हीए सांप्रदायिक हिंसा पर नजर रखे जाने की भी जरूरत है। भारत के अल्पसंख्यकों की समस्याओं के बारे में कश्मीर से आए बशीर अहमद ने एक महत्वपूर्ण बात कही। कश्मीर में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वे जिस इलाके में रहते हैंए वहां पर हिंदू पंडित अल्पसंख्यक हैं।  उन्होंने कहा कि घाटी से पंडितों का पलायन दुर्भाग्यपूर्ण है। वे वहां से इसलिए चले गए क्योंकि उनके मन में असुरक्षा का भाव घर कर गया था। उन्होंने कहा कि जब हम अल्पसंख्यकों के संबंध में नीतियों के निर्माण पर चर्चा करें तब हमें अल्पसंख्यकों के अंदर के अल्पसंख्यकों का भी ध्यान रखना होगा।
सत्र के अंत में पाकिस्तान से आए करामत अली और इरफान इंजीनियर ने पूरी चर्चा का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया और भविष्य की कार्यवाही की रूपरेखा बताई। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों को विधानमंडलों और निर्णय लेने वाली संस्थाओं में तो पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना ही चाहिएए आर्थिक नीतियों और विकास की प्रक्रिया के निर्धारण में भी उनकी भूमिका होनी चाहिए। अल्पसंख्यकों को यह हक मिलना चाहिए कि वे अपनी संस्कृति की रक्षा कर सकें और अपनी पहचान को सुरक्षित रख सकें। सांप्रदायिक हिंसा और कत्लेआम को रोकने के लिए कानून बनाए जाने चाहिए और उन्हें कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए। अकेले भारत में स्वतंत्रता से लेकर अब तक सांप्रदायिक दंगों में लगभग 40,000 लोग मारे जा चुके हैं। परंतु बहुत कम दोषियों को सजा मिल सकी है। अतः यह आवश्यक है कि पूरे दक्षिण एशिया में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं की निष्पक्ष जांच करने के लिए एक आयोग का गठन किया जाए। जो लोग हिंसा के कारण अपने गांवए घर छोड़ने पर मजबूर कर दिए जाते हैं वे शिक्षा और रोजगार से तो मेहरूम होते ही हैंए उनमें मजहबी कट्टरता भी बढ़ती है। अगर अल्पसंख्यकों को सुरक्षा दी जाए और सत्ता में उनकी हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए तो कट्टरपंथी तत्व कमजोर पड़ेंगे और धार्मिक पहचान के आधार पर ध्रुवीकरण कम होगा।
इस सत्र में हुई चर्चा के आधार पर अल्पसंख्यक अधिकारों के घोषणापत्र की अवधारणा पर विचार करने हेतु एक मसविदा समिति का गठन किया गया जिसमें इरफान इंजीनियर,रानू जैन, हर्षमंदर, करामत अली व बशीर अहमद शामिल हैं। सम्मेलन में यह मांग की गई कि सार्क देशों को दक्षिण एशिया आयोग की नियुक्ति करना चाहिए जिसमें हर सार्क देश से एक.एक पुरूष और महिला प्रतिनिधि शामिल हो और जो क्षेत्र में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर नजर रखे।
-नेहा दभाड़े

गुरुवार, 31 जुलाई 2014

पाकिस्तान की नीव सिंध में मोहम्मद बिन कासिम रखी थी


हिंदुस्तान का नया इतिहास लिखा जाएगा - पाकिस्तान का भी नया इतिहास है
चुनावी राजनीति उन कई रास्तों में से केवल एक है जिनका इस्तेमाल निहित स्वार्थी तत्व अपने राजनीतिक एजेण्डे को लागू करने के लिए करते हैं। लोगों के दिमागों पर कब्जा करना, उनकी सोच बदलना और किसी विशिष्ट विचारधारा का प्राधान्य स्थापित,करना ,वे अन्य तरीके हैं,जिनके रास्ते राजनैतिक एजेण्डे की नींव रखी जाती है और उसे लागू किया जाता है। यही कारण है कि इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में परिवर्तन और इतिहास के सांप्रदायिक संस्करण का पठन.पाठन, कई दक्षिण एशियाई देशों की संप्रदायवादी राष्ट्रवादी शक्तियों की रणनीति का हिस्सा है। पाकिस्तान में सांप्रदायिक तत्व कहते हैं कि पाकिस्तान की नीव, आठवीं सदी में सिंध पर मोहम्मद बिन कासिम की विजय के साथ रखी गई थी। हम जानते हैं कि राजाओं के साम्राज्यों और आधुनिक राष्ट्र.राज्यों के बीच अंतर को इस तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता परंतु जब सांप्रदायिक ताकतों के हाथों में सत्ता होती है तब किसी भी चीज को तोड़.मरोड़ कर इस ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है कि लोगों के दिमागों में गलत धारणाएं घर कर जावें। यही कारण है कि एन.डी.ए. के पिछले शासनकाल ;1999.2004 में इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में इस तरह के परिवर्तन किए गए थे जिनसे गुजरे जमाने को सांप्रदायिक चश्मे से देखा.दिखाया जा सके। इस बार, भाजपा ने पूर्ण बहुमत से अपनी सरकार बनाई है और शिक्षा के क्षेत्र में जिस तरह के परिवर्तनों की योजना बनाई जा रही है, वह पहले से भी अधिक खतरनाक है।
प्रोफेसर वाय. सुदर्शन राव को भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद ;आईसीएचआर का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। प्रोफेसर रावए इतिहास के क्षेत्र में किसी विशेष अकादमिक उपलब्धि के लिए नहीं जाने जाते हैं। वे मुख्यतः रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों की ऐतिहासिकता सिद्ध करने की परियोजनाओं में व्यस्त रहे हैं। अपने साथी विद्वानों द्वारा अपने शोधपत्रों की आलोचनाध्विश्लेषण करवाने की बजाए वे अपने तर्क मुख्यतः ब्लॉगों के जरिए प्रस्तुत करते रहे हैं। और इन ब्लॉगों पर उनका लेखन,उनके विचारधारात्मक झुकाव को परिलक्षित करता है। यद्यपि वे यह दावा करते हैं कि आरएसएस से उनका कोई लेनादेना नहीं है तथापि उनके लेखन में हिन्दू राष्ट्र का एजेण्डा स्पष्ट प्रतिबिम्बित होता है। वे हिन्दुओं के प्राचीन इतिहास और जाति व्यवस्था का महिमामंडन करते हैं और भारतीय समाज की सारी बुराईयों के लिए 'विदेशी' मुस्लिम शासकों को दोषी ठहराते हैं। उनके अनुसारए 'भारतीय समाज में व्याप्त जिन सामाजिक रस्मों.रिवाजों पर अंग्रेजीदां भारतीय बुद्धिजीवियों और पश्चिमी विद्वानों ने प्रश्न उठाए हैं, उन सभी की जड़ें उत्तर भारत में लगभग सात शताब्दियों तक चले मुस्लिम शासन में खोजी जा सकती हैं।' उनका तर्क है कि 'प्राचीनकाल में ;जाति व्यवस्था सुचारू रूप से काम कर रही थी और इससे किसी को कोई शिकायत नहीं थी।'
अगर प्रोफेसर राव ने अछूत प्रथा, जाति व्यवस्था और उन अन्य सामाजिक कुरीतियों का तार्किक अध्ययन किया होता, जिन्हें भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रणेताओं ने निंदनीय करार दिया था,तो उन्हें यह समझ में आता कि जातिप्रथा के कुप्रभाव का कारण मुस्लिम बादशाह नहीं बल्कि हिन्दू धर्मग्रंथ हैं,जो तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था को प्रतिबिम्बित करते हैं। शनैः शनैः सामाजिक श्रम विभाजन,जातिप्रथा में परिवर्तित हो गया जिसमें व्यक्ति की जाति,उसके कर्म नहीं वरन् उसके जन्म से निर्धारित होने लगी। हिन्दू समाज में ऊँच.नीच और शुद्धता.अशुद्धता की अवधारणाएं, मुस्लिम शासनकाल के बहुत पहले से विद्यमान थीं।
मुस्लिम राजाओं ने जातिप्रथा की सामाजिक व्यवस्था से कोई छेड़छाड़ नहीं की। वैसे भी, यह उनका लक्ष्य नहीं था। उल्टे, मुस्लिम समुदाय, जाति व्यवस्था की चपेट में आ गया और मुसलमान अनेक जातियों,उपजातियों में बंट गए। जहां पाकिस्तान के सांप्रदायिक इतिहासविद्, अविभाजित भारत में हिन्दू धर्म व हिन्दुओं के अस्तित्व से ही इंकार करते हैं वहीं भारत के सांप्रदायिक तत्वए भारतीय समाज की सभी कुप्रथाओं के लिए 'बाहरी' प्रभाव को दोषी ठहराते हैं। इसी तर्ज पर आईसीएचआर के नए मुखिया,जातिप्रथा की बुराईयों के लिए बाहरी कारक ;मुस्लिम शासन को दोषी ठहरा रहे हैं। प्रोफेसर राव के काल्पनिक इतिहास में अप्रिय प्रसंगों पर पर्दा डाल दिया जाता है और ऐसा चित्र खींचा जाता है मानो सभी बुराईयों के लिए मुस्लिम राजा जिम्मेदार हों। वे यह भूल जाते हैं कि मुस्लिम राजाओं ने भारत की सामाजिक व्यवस्था को जस का तस स्वीकार कर लिया था और उनकी प्रशासनिक मशीनरी में हिन्दू व मुसलमान दोनों शामिल थे। औरंगजेब के दरबारियों में से एक.तिहाई से भी अधिक हिंदू थे। अपनी संकीर्ण विचारधारा के पिंजरे में बंद प्रोफेसर साहब चाहते हैं कि हम यह भूल जाएं कि जाति व्यवस्था और दमनकारी लैंगिक ऊँच.नीच को मनुस्मृति में औचित्यपूर्ण ठहराया गया है और यह पुस्तक, भारत में मुस्लिम शासन प्रारंभ होने के 1000 वर्ष पहले लिखी गई थी।
ऋग्वेद और मनुस्मृति में कई जगह यह कहा गया है कि नीची जातियों के लोगों के लिए ऊँची जातियों के व्यक्तियों के नजदीक आना भी प्रतिबंधित था और उन्हें गांवों के बाहर बसाया जाता था। निःसंदेह, इसका यह अर्थ नहीं है कि ऋग्वैदिक काल में कठोर जाति व्यवस्था अस्तित्व में आ चुकी थीए जिसके अंतर्गत समाज को विभिन्न वर्णों में विभाजित किया जाता है। यह व्यवस्था मनुस्मृति के काल और उसके बाद भारतीय समाज में मजबूती से स्थापित हुई।
'वजस्नेही संहिता' ;जिसकी रचना 10वीं सदी ईसा पूर्व के आसपास हुई थी में चांडाल और पालकसा शब्दों का प्रयोग है। 'छान्दोग्योपनिषद' ;8वीं सदी ईसा पूर्वमें स्पष्ट कहा गया है 'जिन लोगों के कर्म निम्न हैं वे जल्दी ही कुत्ता या चांडाल बनकर पैदा होंगे' ;छान्दोग्योपनिषद 5ए 10.7।
भारत में मुस्लिम आक्रांताओं की पहली लहर 11वीं सदी में आई और यूरोपवासियों ने भारत में 17वीं.18वीं सदी में कब्जा करना शुरू किया। इसके सैकड़ों वर्ष पहले से शूद्रों को समाज से बाहर माना जाता था और 'उच्च' जातियों के सदस्यों के उनके साथ खानपान या वैवाहिक संबंधों पर प्रतिबंध था। जाति व्यवस्था को कायम रखने के लिए शुद्धता.अशुद्धता की अवधारणाओं को सख्ती से लागू किया जाता था। शूद्रों को अछूत माना जाता था और इसी कठोर सामाजिक विभाजन का वर्णन, मनु के 'मानव धर्मशास्त्र' में है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक एम. एस.गोलवलकर,वर्ण व्यवस्था के समर्थक थे। 'वह हिन्दू सामाजिक व्यवस्था की उन तथाकथित कमियों में से एक नहीं है जो हमें हमारे प्राचीन गौरव को पुनः हासिल करने से रोक रही है' ;एमएस गोलवलकर, 'व्ही ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड', भारत पब्लिकेशन्स, नागपुर, 1939, पृष्ठ 63। इसी बात को बाद में उन्होंने दूसरे शब्दों में कहा,'अगर कोई विकसित समाज यह समझ जाए कि समाज में अलग.अलग वर्ग, वैज्ञानिक सामाजिक ढांचे के कारण हैं और वे समाज रूपी शरीर के विभिन्न अंगों की तरह हैं, तो यह विभिन्नता कोई कलंक नहीं रह जाती' ;'आर्गनाईजर', 1 दिसंबर 1952, पृष्ठ 7। संघ परिवार के एक अन्य प्रमुख विचारक दीनदयाल उपाध्याय फरमाते हैं'चार वर्णों की हमारी अवधारणा यह है कि हम विभिन्न वर्णों को विराट पुरूष के विभिन्न अंग मानते हैं.ये अंग न केवल एक दूसरे के पूरक हैं वरन उनमें एकता भी है। उनके हित और उनकी पहचान एक है.अगर इस विचार को जीवित नहीं रखा गया तो जातियां एक.दूसरे की पूरक बनने की बजाए टकराव का कारण बन जाएंगी। परंतु यह एक विरूपण होगा' ;डी उपाध्याय, 'इंटीग्रल ह्यूमेनिज्म', भारतीय जनसंघ, नई दिल्ली, 1965, पृष्ठ 43।
जाति व्यवस्था और अछूत प्रथा के उन्मूलन के संबंध में अंबेडकर और गोलवलकर के विचारए संघ परिवार की असली मानसिकता को उजागर करते हैं। अंबेडकर, मनुस्मृति को जाति व्यवस्था का पोषक मानते थे और उन्होंने एक आंदोलन शुरू किया था जिसके अंतर्गत इस पुस्तक को सार्वजनिक रूप से जलाया जाता था, जबकि गोलवलकर,मनु और उनकी संहिता का महिमामंडन करते हैं।
जहां तक इस तर्क का प्रश्न है कि ';जाति व्यवस्था सुचारू रूप से काम कर थी और इससे किसी को कोई शिकायत नहीं थी' इस हद तक सही है कि उच्च जातियों को इससे कोई शिकायत नहीं थी क्योंकि इससे उनका हित साधन होता था। नीची जातियां इस दमनकारी और अमानवीय व्यवस्था की शिकार थीं। यह भी सही है कि जाति व्यवस्था के प्रति किसी व्यक्ति या वर्ग के असंतोष व्यक्त करने का कोई लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। चूंकि नीची जातियों को पढ़ने.लिखने का हक ही नहीं था अतः उनके द्वारा उनके असंतोष को दर्ज करने का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता।  बुद्ध के समय से जाति व्यवथा का विरोध शुरू हुआ। बल्कि बौद्ध धर्म ही जातिगत ऊँच.नीच के विरूद्ध एक आंदोलन था। कबीर और उनके जैसे अन्य मध्यकालीन संतों ने नीची जातियों की आह को वाणी दी और यह बताया कि किस तरह वे जाति व्यवस्था के लाभार्थियों के हाथों दुःख भोग रहे हैं। और ठीक इन्हीं लाभार्थी जातियों की वकालत प्रोफेसर राव कर रहे हैं। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद में जो परिवर्तन किए गए हैं उनसे यह स्पष्ट है कि आने वाले समय में हमें अपने भूतकाल   और जातिगत व लैंगिक ऊँचनीच को किस तरह से देखने पर मजबूर किया जाएगा.

         -राम पुनियानी

मंगलवार, 24 जून 2014

अपने पड़ोसी से प्यार करो: नवाज़ शरीफ की भारत यात्रा

जब से भारत का बंटवारा हुआ है, तब से शायद ही कभी भारत और पाकिस्तान के आपसी रिश्ते मधुर रहे हों। किसी न किसी मुद्दे को लेकर, हमारे पड़ोसी से हमारे रिश्तों में कड़वाहट घुली ही रहती है। यहां तक कि आमजन, पाकिस्तान को हमारे ‘शत्रु’ के रूप में देखते हैं। यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शपथग्रहण समारोह में यद्यपि सभी सार्क देशों  के प्रतिनिधि पहुंचे थे तथापि मीडिया और जनता का सबसे अधिक ध्यान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ पर केन्द्रित था।  मोदी ने सभी सार्क देशों  के प्रमुखों को अपने षपथग्रहण समारोह (16 मई 2014) में आमंत्रित किया था। यह समारोह बहुत शान-ओ-शोकत के साथ सम्पन्न हुआ।
नवाज़  शरीफ को भारत का निमंत्रण स्वीकार करने में काफी परेशानियां आईं। उनके परिवार, जिसमें उनकी पुत्री शामिल हैं, ने ट्वीट कर कहा कि उन्हें यह निमंत्रण स्वीकार करना चाहिए। उनकी पुत्री का कहना था कि कोई कारण नहीं कि भारत और पाकिस्तान, उत्तरी और दक्षिणी कोरिया की तरह हमेशा एक-दूसरे के प्रति बैरभाव पाले रहें। क्या कारण है कि इन दोनों देशों के बीच उस तरह के मधुर संबंध नहीं रह सकते जैसे कि यूरोपियन यूनियन के देशों के हंै।शरीफ की पुत्री, दरअसल, पाकिस्तान के बहुसंख्यक लोगों की भावनाओं को स्वर दे रहीं थीं, जो कि चाहते हैं कि पाकिस्तान में प्रजातंत्र मजबूत हो और उसके भारत से अच्छे रिश्ते रहें। पाकिस्तान की आम जनता का यह मानना है कि भारत के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, पाकिस्तान में प्रजातंत्र की सफलता और देश   के विकास की आवष्यक शर्त हैं। कुछ सालों पहले मैं पाकिस्तान गया था और मुझे यह देखकर आष्चर्य हुआ कि वहां के लोगों में भारत के साथ दोस्ताना संबंध बनाने की कितनी उत्कट इच्छा है। जब भी कोई गैर-राजनीतिज्ञ भारतीय, पाकिस्तान जाता है, वहां के लोग जिस गर्मजोशी  से उसका स्वागत करते हैं, उसमें भी यही भावना प्रतिबिम्बित होती है। पाकिस्तान और भारत के बीच यदि शांति व मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित नहीं हो पा रहे हैं तो उसका कारण वहां का शक्तिशाली सेना-मुल्ला गठजोड़ है। इस बार भी जिस समय मोदी के निमंत्रण को स्वीकार करने या न करने पर पाकिस्तान सरकार विचार कर रही थी उसी समय अफ़गानिस्तान के हैरात में भारत के वाणिज्य दूतावास पर आतंकी हमला हुआ। पाकिस्तान के हाफिज सईदों की भृकटियां तन गईं और उन्होंने अपनी पुरानी धमकियां एक बार फिर दोहराईं। हम सबको याद है कि किस तरह, जब भारत और पाकिस्तान के बीच शांति प्रक्रिया जोर पकड़ रही थी, उसी समय मुंबई पर 26/11 का आतंकवादी हमला हुआ था। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत-पाक शांति प्रक्रिया और आतंकी हमलों में सीधा संबंध है। ये हमले उन आतंकी समूहों द्वारा किए जाते हैं जिन्हें पाकिस्तान की सेना के एक हिस्से का समर्थन प्राप्त है।
इसी तरह, जब पिछली एनडीए सरकार के मुखिया अटलबिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ शांति वार्ताएं शु रू कीं और बस से लाहौर पहुंचे, तब पाकिस्तान की सेना ने इस पहल का विरोध किया और कारगिल पर चढ़ाई कर दी। उस समय परवेज़ मुशर्रफ सेना प्रमुख थे। कारगिल पर पाकिस्तानी सेना के कब्जे के बाद भारतीय सैन्यबलों ने उसके खिलाफ कार्यवाही की। अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भी कड़े शब्दों में पाकिस्तान से कारगिल पर कब्जा छोड़ने के लिए कहा। अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान मैं ऐसे कुछ नागरिक कार्यकर्ताओं से भी मिला जो भारत के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों के प्रति प्रतिबद्ध हैं। ये लोग भारत में अपने साथियों के साथ मिलकर, पाक-भारत पीपुल्स फोरम जैसी संस्थाएं चला रहे हैं। वे शांति के अलावा अन्य मुद्दों पर भी जोर देते आए हैं, जिनमें उन निर्दोष मछुआरों को छोड़े जाने की मांगशामिल है जो गलती से दोनों देशों  की सीमाओं का अतिक्रमण करने के कारण पकड़कर जेलों में ठूंस दिए जाते हैं। इस बार नवाज़ शरीफ ने अपनी भारत यात्रा के पूर्व, पाकिस्तान की जेलों में बंद भारतीय मछुआरों को छोड़ने का आदेश जारी कर एक सकारात्मक कदम उठाया। कहने की आवष्यकता नहीं कि यदि दक्षिण एशिया मेंशांति स्थापित की जानी है तो वह भारत और पाकिस्तान के बीच अच्छे रिश्तों के बगैर संभव नहीं है। वहां मेरी मुलाकात उन लोगों से भी हुई जो ‘‘अमन की आषा’’ नामक संस्था के लिए काम कर रहे हैं। इस संस्था की स्थापना, भारत के एक प्रमुख दैनिक और पाकिस्तान से प्रकाशित एक अखबार ने मिलकर की है।
भारत में पाकिस्तान के खिलाफ सबसे तीखे स्वर में जो पार्टी बात करती है वह है भाजपा। परंतु भाजपा, पाकिस्तान पर शाब्दिक हमले तभी करती है जब वह सत्ता में नहीं होती। पाकिस्तान के प्रति भाजपा के रवैए में स्पष्ट विरोधाभास हैं। जब वह सत्ता में नहीं होती तब वह पाकिस्तान पर कटु हमले कर भारत की जनता को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने की कोशिश करती है। इसके विपरीत, सत्ता में आने पर वह पाकिस्तान की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाती है और शांति के कबूतर छोड़ती है। हम यह कैसे भूल सकते हैं कि हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री ने गोधरा कांड और उसके पश्चात हुए दंगों के बाद, पाकिस्तान और उसके राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ पर तीखे हमले कर, गुजरात की जनता को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत किया था। सन् 2002 के विधानसभा चुनाव में गुजरात में सैंकड़ों ऐसे होर्डिंग लगे थे जिनमें एक ओर मोदी की तस्वीर थी और दूसरी और मुशर्रफ की।  हालिया चुनाव अभियान के दौरान भी मोदी, पाकिस्तान को आंखे दिखाते रहते थे। उनकी पार्टी के एक अन्य सदस्य गिरीराज सिंह ने तो पाकिस्तान के बारे में लगभग गालीगलौच की भाषा मंे बात की थी। इस सबका उद्देश्य एक ऐसी मानसिकता विकसित करना है जिसमें यह माना जाता है कि भारतीय मुसलमान, पाकिस्तान के प्रति वफादार हैं और दोनों देशों  की क्रिकेट टीमों के बीच मैच, दरअसल एक युद्ध है। इस तरह, क्रिकेट, जो कि दोनों देशों के बीच दोस्ती का सेतु बना सकता है, का इस्तेमाल कटुता उत्पन्न करने के लिए किया जाता है। यह तथ्य भुला दिया जाता है कि पाकिस्तान की ओर से भारत में जासूसी करने के आरोप में मधु गुप्ता सहित जितने भी लोग पकड़े गए हैं, उनमें से अधिकांश हिन्दू हैं। इसके बाद भी, हर मुसलमान को पाकिस्तान के जासूस की तरह देखने की हमारी आदत गई नहीं है। पेशावर में जन्में हमारे देश के महान फिल्म कलाकार दिलीप कुमार को पाकिस्तान के उच्चतम नागरिक सम्मान निशान-ए-पाकिस्तान को स्वीकार करने के लिए कई बार अपमानित किया गया। यहां तक कि दिलीप कुमार की भारत के प्रति वफादारी पर भी प्रश्न चिन्ह लगाए जाते रहे हैं। सीमा पर होने वाली मामूली से मामूली मुठभेड़ का इस्तेमाल, पाकिस्तान के बारे में उल्टी-सीधी बातें कहने के लिए किया जाता है। भाजपा, हमेशा से कांग्रेस पर पाकिस्तान के प्रति ‘नर्म रवैया’ अपनाने का आरोप लगाती रही है। कुल मिलाकर, जब भाजपा सत्ता में नहीं होती तब पाकिस्तान-विरोधी दुष्प्रचार उसकी राजनैतिक रणनीति का प्रमुख हिस्सा रहता है।
भाजपा की गठबंधन साथी शिवसेना, एक और कदम आगे बढ़कर, पाकिस्तान व भारत के बीच रिश्ते बेहतर करने के  हर प्रयास में रोड़े खड़े करती आ रही है। शिवसेना कार्यकर्ताओं ने मुंबई में होने वाले भारत-पाकिस्तान किक्रेट मैच को रोकने के लिए वानखेड़े स्टेडियम की पिच खोद डाली थी। पाकिस्तान के कलाकारों के कार्यक्रमों में हंगामा और तोड़फोड़ करना भी शिवसेना का षगल रहा है। अभी भी, जब मोदी ने नवाज़ शरीफ को आमंत्रण भेजा तब शिवसेना ने यह धमकी दी कि वह शपथग्रहण समारोह का बहिष्कार करेगी। सौभाग्यवश, बाद में शिवसेना को अकल आ गई और उसके मुखिया ने शपथग्रहण समारोह में हिस्सा लिया।
यह दुर्भाग्य की बात है कि लगभग संपूर्ण दक्षिण एशिया में धार्मिक अल्पसंख्यक, तरह-तरह के कष्ट भोग रहे हैं। पाकिस्तान में ईसाई और हिन्दू, भारत में ईसाई और मुसलमान, बांग्लादेश में हिन्दू और बौद्ध, हिंसा का शिकार बनते आ रहे हैं और उन्हें डराया-धमकाया जाना आम है। सभी देशो  को आपसी बातचीत और सहयोग से यह सुनिष्चित करना चाहिए कि अपने-अपने देशों  में वे अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करें। हर व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है। अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, सार्क देशों  का मुख्य एजेंडा होना चाहिए। जिस देश में भी दो या दो से अधिक समुदाय एक दूसरे से घृणा करते रहेंगे या एक दूसरे के खिलाफ हिंसा करेंगे, वह देश कभी प्रगति नहीं कर सकता।
जहां तक पाकिस्तान का सवाल है, वहां प्रजातंत्र जितना मजबूत होगा, सेना की पकड़ उतनी ही कमजोर होगी और शांति प्रक्रिया जोर पकड़ेगी। दूसरी ओर, सेना जितनी मजबूत होगी, प्रजातंत्र उतना ही कमजोर होगा और भारत से रिश्ते उतने ही खराब होंगे। भारत में पाकिस्तान की तुलना में प्रजातंत्र की जड़ें काफी मजबूत हैं परंतु पाकिस्तान की प्रजातांत्रिक सरकार के प्रति सकारात्मक रूख रखना हमारे लिए आवश्यक है ताकि सेना, सामंतवादियों और कट्टरपंथी मुल्लाओं का गठजोड़ कमजोर पड़े और वहां प्रजातंत्र मजबूत हो। भारत और पाकिस्तान दोनों तरह-तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं। दोनों ही देशों  के लोगों को स्वास्थ, पोषण, शिक्षा व रोजगार संबंधी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में सेनाओं पर बढ़ता खर्च, दोनों ही देशों  की प्रगति को अवरूद्ध करेगा। जरूरी यह है कि दोनों देश रोटी, कपड़ा और मकान पर धन खर्च करें न कि टैंकों और बंदूकों पर।
-राम पुनियानी

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

गुजरात कत्लेआम और नरेन्द्र मोदी

हाल (जनवरी 2014) में एक टेलीविजन चैनल पर प्रसारित अपने साक्षात्कार में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने यह कहकर हंगामा खड़ा कर दिया कि संभव है कि कुछ कांग्रेसजन, सन् 1984 के सिक्ख-विरोधी दंगों में शामिल रहे हांे। उन्होंने यह भी कहा कि सन् 2002 के गुजरात कत्लेआम के लिए मोदी भी दोषी हैं।
इस साक्षात्कार पर कई विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आईं। अरविन्द केजरीवाल ने सन् 1984 के दंगों की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) के गठन का वायदा दिल्ली विधानसभा चुनाव के पहले ही कर दिया था। उनकी सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है और संभवतः जल्दी ही 1984 के त्रासद खूनखराबे की जांच के लिए विशेष जांच दल नियुक्त कर दिया जाएगा। यहां यह कहना समीचीन होगा कि इतना समय गुजर जाने के बाद, जांच का कोई विशेष अर्थ नहीं रह जाता क्योंकि अब तक अधिकांश सुबूत नष्ट या गुम हो चुके होंगे। परंतु फिर भी, न्यायिक प्रक्रिया मशीनरी को सक्रिय कर जो कुछ भी किया जा सकता है, किया जाना चाहिए। दंगों के पीडि़तों के साथ न्याय होना चाहिए। कहने की आवष्यकता नहीं कि सभी दंगा पीडि़तों को, चाहे वे किसी भी धर्म के क्यों न हों, न्याय मिलना चाहिए। कश्मीरी पंडितों के साथ भी न्याय होना चाहिए और उनके पुनर्वास की व्यवस्था की जानी चाहिए। जब भी गुजरात की भयावह हिंसा के पीडि़तों को न्याय दिलवाने की बात होती है तब कश्मीरी पंडितों और सिक्ख दंगों के मुद्दे उछाल दिए जाते हंै। यह मूल मुद्दे से लोगों का ध्यान हटाने के प्रयास के अतिरिक्त कुछ नहीं है।
दो गलत चीजें मिलकर सही नहीं हो जातीं। - ग - = $ केवल गणित में होता है। किसी धार्मिक समुदाय के खिलाफ ंिहंसा से, उस समुदाय को न्याय नहीं मिल जाता जिसके साथ अन्याय हुआ हो। इसी तरह, भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय को इस आधार पर उचित ठहराना कि पाकिस्तान या बांग्लादेश  में हिन्दुओं के साथ अन्याय हो रहा है, पूरी तरह अमानवीय है। सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों, को सभी देशों  में, हमेशा  न्याय मिलना चाहिए। किसी एक स्थान या देश  में अन्याय को सहना, हर जगह अन्याय को सहने के समकक्ष है।
राहुल गांधी की गुजरात के बारे में टिप्पणी के जवाब में भाजपा प्रवक्ताओं ने जोर देकर कहा कि मोदी को एसआईटी और अदालत से क्लीन चिट मिल चुकी है। यह दुष्प्रचार है। गुजरात की हिंसा के शुरूआती दौर से ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग गुजरात मंे हिंसा प्रायोजित करने के लिए मोदी को दोषी ठहराता रहा है। यद्यपि एसआईटी ने यह दावा किया है कि मोदी पर मुकदमा चलाने का कोई आधार नहीं है परन्तु एसआईटी की रपट में ही ऐसी कई बातें हैं जिनसे यह जाहिर होता है कि मोदी ने दंगों के दौरान और उनके बाद, वह नहीं किया जो उन्हें करना चाहिए था और वह किया जो उन्हें नहीं करना था। मोदी के समर्थक कहते हैं कि दिल्ली में तीन दिन तक सेना नहीं बुलाई गई थी परंतु वे यह भूल जाते हैं कि दिल्ली की हिंसा पर तीन दिनों में नियंत्रण स्थापित कर लिया गया था। इसके विपरीत, गुजरात में 27 फरवरी 2002 से लेकर मई तक हिंसा जारी रही। हिंसा तभी रूकी जब तत्कालीन प्रधामनंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने केपीएस गिल को हिंसा पर नियंत्रण करने के लिए विशेष रूप से गुजरात भेजा। इस मसले पर मोदी की लगातार निंदा की जाती रही और यह निंदा आधारहीन या बकवास नहीं है।
उच्चतम न्यायालय ने गुजरात सरकार को लताड़ लगाते हुए कहा था ‘‘जब गुजरात जल रहा था तब वहां के नीरो बांसुरी बजा रहे थे।‘‘ अटलबिहारी वाजपेयी तक ने मोदी से राजधर्म का पालन करने के लिए कहा था। गुजरात में जिस तरह का वातावरण बन गया था, उसी के चलते उच्चतम न्यायालय ने  दंगों से संबंधित दो बड़े मामलों को राज्य से बाहर स्थानांतरित किया था। गुजरात में आतंक के इस वातावरण का सृजन अगर मोदी ने नहीं किया था तो फिर किसने किया था? न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत के ताजा निर्णय के बाद, मल्लिका साराभाई ने कहा, ‘‘गुजरात की किसी अदालत से यह अपेक्षा करना बेकार है कि वह मोदी को क्लीन चिट के अलावा कुछ और देगी‘‘। एसआईटी की रपट की व्याख्या भी गलत ढंग से की गई है। एसआईटी और न्यायमित्र राजू रामचन्द्रन - दोनों की नियुक्ति उच्चतम न्यायालय ने की थी। यह कहना कि एसआईटी ने मोदी को क्लीन चिट दे ही है, पूरी तरह सच नहीं है। तथ्य यह है कि एसआईटी ने 2010 की अपनी रपट में कहा था कि गुलबर्ग सोसायटी और अन्य स्थानों पर मुसलमानांें पर भयावह हिंसक हमलों पर सरकार की प्रतिक्रिया वैसी नहीं थी जैसी कि अपेक्षा की जाती है। मुख्यमंत्री ने गुलबर्ग सोसायटी व नरोदा पाटिया की दिल दहलाने वाली घटनाओं को यह कहकर खारिज कर दिया था कि प्रत्येक क्रिया की विपरीत एवं समान प्रतिक्रिया होती है। राजू रामचन्द्रन का यह स्पष्ट मत है कि एसआईटी की रपट के आधार पर मोदी को अभियोजित किया जा सकता है।
याद रहे कि राष्ट्रीय मानाविधकार आयोग ने 31 मई 2002 को जारी अपनी रपट में निष्कर्ष स्वरूप कहा था कि ‘गुजरात में राज्य, लोगों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने में पूर्णतः विफल रहा‘‘। न्यायमित्र ने अपनी अंतिम रपट में मोदी पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 166, 153-अ व 153-ब के तहत मुकदमा चलाए जाने की अनुषंसा की है। तो फिर कहां है क्लीन चिट? राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मोदी को दोषी बताया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त न्यायमित्र का मत है कि मोदी के विरूद्ध मुकदमा चलाया जा सकता है। तीसर,े जकिया जाफरी मामले में न्याय प्रक्रिया की शुरूआत ही हुई है। अदालत के निर्णय के बाद जकिया जाफरी ने कहा कि वे ऊँची अदालत में अपील करंेगीं। हमारे देश  में न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत से न्यायिक प्रक्रिया शुरू होती है, खत्म नहीं। यह कहना कि मोदी को गुजरात दंगांे के मामले में क्लीन चिट मिल गई है, तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करना है। यह झूठा प्रचार एक विशिष्ट उद्देष्य से किया जा रहा है।
हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि मोदी के नजदीकी साथी बाबू बजरंगी और माया कोडनानी, गुजरात दंगों में हिंसा भड़काने और उसमें भाग लेने के दोषी पाए गए हैं और उन्हें कड़ी सजाएं सुनाई गई हैं। तहलका के स्टिंग आपरेषन से यह स्पष्ट है कि बाबू बजरंगी व उनके साथियों की मोदी की सरकार से मिलीभगत थी। ‘‘सिटीजन्स फाॅर जस्टिस एण्ड पीस‘‘ के तत्वाधान में गठित जन न्यायाधिकरण ने भी दंगों मंे मोदी की भूमिका को रेखांकित किया है। इस जन न्यायाधिकरण में पी बी सावंत जैसे जानेमाने न्यायविद् शामिल थे। गुजरात दंगों से संबंधित केवल चन्द मामलों में न्याय हुआ है और वह भी इसलिए संभव हो पाया क्योंकि पीडि़तों और मानवाधिकारों के रक्षकों ने इसके लिए एक लंबी और कठिन लड़ाई लड़ी। न्याय की इस प्रक्रिया को आगे बढाए जाने की जरूरत है। गुजरात सरकार ने पीडि़तों के न्याय पाने की राह में हर संभव बाधा खडी़ की है। क्लीन चिट के दावों में कोई दम नहीं है। दुष्प्रचार की गहरी धुंध के बावजूद  ध्यान से देखने पर मोदी के खून से रंगे हाथ स्पष्ट दिखलाई दे रहे हैं।
 -राम पुनियानी

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

उम्मीदवार दे रहे हैं मज़हबी ज्ञान की परीक्षा

पाकिस्तान में चुनाव
 कड़ुवाहट पैदा करने वाले बहुत सारे समाचारों के बीच एक अच्छी ख़बर आई है। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ख़लिदा जि़या ने देश में ईश निंन्दा क़ानून बनाने की दक्षिण पंथी मज़हबी संगठनांे की मांग को अस्वीकार करते हुए उनके उग्र आन्दोलन के आगे झुकने से इंकार कर दिया है। पाकिस्तान में इस तरह के क़ानून के दुरुपयोग से विश्व अच्छी तरह परिचित है। इसका अवसाद वहां के सामाजिक माहौल में अब भी महसूस किया जा सकता है। पाकिस्तान के उसी पंजाब में जहां आधुनिकता व पारम्परिकता के बीच, देश के दूसरे हिस्सांे के समान तीखा संघर्ष चलता रहा है, वहां की प्रान्तीय हुकूमत ने स्कूली पाठयक्रम में बड़ी तब्दीली करते हुए पाठय सामग्री में धार्मिक पाठों की संख्या सीमित कर दी है। विशेष रूप से दसवीं कक्षा की उर्दू पाठय पुस्तक में। हलांकि वहां इस तब्दीली का तीखा विरोध हुआ और तत्कालीन मुख्यमंत्री शहबाज़ शरीफ की लानत-मलामत भी हुई। जाते-जाते शहबाज ने तबदीली रद्द करने की हामी भी भर दी। परन्तु उनकी जगह आये कार गुजार मुख्यमंत्री नज्मसेठी ने, धार्मिक पाठों को फिर से शामिल करने से इन्कार कर दिया। इस पृष्ठ भूमि में देखिए तो वहां के युवाओं के बड़े प्रतिशत द्वारा देश के लिये इस्लामी शरीअत का समर्थन चांैकाता भी है, चिन्ता भी पैदा करता है। ये स्थिति अपने देश के युवाओं में नरेन्द्र मोदी की बढ़ती लोकप्रियता से बहुत अलग नहीं है। भारत हो या पाकिस्तान दोनों जगह आगामी चुनाव में धर्म निरपेक्ष आधुनिकता वदियों तथा साम्प्रदायिक रूढि़वादियों के बीच बड़ी टक्कर होने जा रही है। इतना अन्तर अवश्य है कि पाकिस्तान में ये टक्कर अधिक उग्र और हिंसक हो सकती है। क्योंकि वहां का चुनाव आयोग स्वयं इस विवाद की एक पार्टी बना हुआ है। उसकी निगरानी लोकतंत्र और जनवाद के मसीहा की हैसियत प्राप्त कर चुके जस्टिस इफि़्तखा़र चैधरी कर रहे है। चुनाव आयोग नामांकन करने वाले सम्भावित उम्मीदवारों से उनकी इस्लामी ज्ञान की परीक्षा ले रहा है। यह परीक्षा गुपचुप तरीकें से नहीं बल्कि सार्वजनिक रूप से हो रही है। यानि की इसमें टी.वी. के क्विज़ प्रोग्राम का भी सहारा लिया गया है। निश्चय ही यह परीक्षा हमारे समय की गहरे तक चिन्तित करने वाली बड़ी त्रासदी है। यद्यपि इस आधार पर अभी तक कोई नामांकन रद्द नही हुआ है, फिर भी ख़तरे बने हुये है। वो क्षण यकीनन इतिहास के रोचक प्रसंग की तरह याद कियें जायेगें, जिनमें शरीअत कानून की प्रबल प़क्ष धर जामाअते इस्लामी के एक उम्मीदवार उस्मान शरीफ इस परीक्षा में उत्तीर्ण नही हो पाये। एक रिपोर्ट के अनुसार उनसे इस्लाम का ‘‘तीसरा कलमा’’ सुनाने को कहा गया लेकिन वो पहला कलमा ही सुना पाये। कुछ पाकिस्तान का क़ौमी तराना नही सुना सके तो कुछ मज़हब के बुनियादी उसूल नही बता पायें। ऐसे में हालात की बिडम्बना उबारने वाली सआदत हसन मंन्टो की ‘‘स्याह हाशिए’’ मे संकलित एक छोटी कहानी याद आती है।
        बम्बई में विभाजन के दंगो के दौरान एक मुसलमान एक हिन्दू रिक्शे वाले को मारने के लिये खुला चाकू लेकर उसके पीछे दौड़ता है। एक मक़ाम पर वो उसे जा दबोचता है। और नीचे गिराकर उसकी छाती पर चढ़ बैठता है। उसकी ओर चाकू तान कर कहता है, ‘‘पढ़ कलमा नहीं तो मारा’’ कलमा पढ़ने का मतलब उसके निकट मुसलमान हो जाना था। हिन्दू रिक्शे वाला बहुत छटपटाया ,बड़ी मिन्नत समाजत की, हाथ पैर जोड़े लेकिन इस्लामी जोश ठंडा नही पड़ा। रिक्शे वाले ने बचने का कोई उपाय न देख, अंन्ततः छाती पर चढे़ नंगा चाकू ताने हुए आदमी से कहा ‘‘अच्छा बताओ कैसे पढं़े कलमा’’? चाकू वाला हाथ सहसा ढीला हुआ, वो अपलक अवाक सा उसे देखता रह गया। उसका गरीबां छोड़ते हुए और छाती से उठते हुए उस आदमी ने कहा ‘‘यह तो मुझे भी नही मालूम कि कलमा कैसे पढ़ा जाता है’’
        पाकिस्तानी चुनाव आयोग के इस कृत्य से समूचे उप महाद्वीप के धर्म निरपेक्ष आधुनिकता वादियों का चिन्तित होना स्वाभाविक है। इस तरह की घटनाओं से दूसरे देशों के रूढि़वादी पोंगा पण्डितों तथा धार्मिक आस्था का राजनैतिक इस्तेमाल करने वालों को शक्ति प्राप्त होती है तथा समाज में उनका स्पेस विस्तार पाता है। इस्लामी या मुस्लिम एकता के परख़च्च्ेा उड़ाने वाले ऐतिहासिक संघर्ष से गुजर चुके बंग्लादेश में ईश निन्दा कानून के पक्ष में चला आन्दोलन जिसकी प्रकट मिसाल है। मुक्ति युद्ध से गद्दारी करने वालो को मृत्यु दण्ड दिये जाने के फैसले की मुखा़लिफ़त मे बड़ी संख्या में युवकों का सड़कों पर उतरना भी इसी सिलसिले की एक कड़ी मानी जा सकती है। याद किया जा सकता है कि वहां तस्लीमा नसरीन के खिलाफ़
विरोध व निन्दा का उग्र आन्दोलन जमाअते इस्लामी ने मुक्ति युद्ध के दौरान किये गये अपनेे अपराधों की ओर से ध्यान हटाने के लिये ही चलाया था।
        पाकिस्तान में उसके जन्म से ही सियासी नेताओं, पार्टियों तथा शासको द्वारा वहां के लुटे पिटे अवाम के प्रति किये गये लगातार विश्वास घात (जो संयोग से हमारे यहां भी होता रहा है।) के कारणों वहां के आवाम का सियासी नेताओं व पार्टियों पर सेे विश्वास बुरी तरह डगमगा गया है। राजनीति के प्रति विरक्ति का  भाव व्यापक होता गया। मोह भंग की तकलीफ़ उन्हे धर्म के करीब ले गयी यद्यपि धार्मिक गुरूओं-मौलानाओं तथा धर्म की राजनीति करने वालों ने भी उनके साथ  बड़ा विश्वासघात किया। लेकिन इसको क्या कीजिये कि पुर्नउत्थानवाद की मादकता हकीकतों को धुँधलाने में अधिक समर्थ साबित होती हेै। वहां चुनाव आयोग की इस सक्रियता को यदि एक ओर धर्म निरपेक्षता व उदारवाद की राजनीति करने वाली शक्तियों एवं सोच को कमजोर करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। तो दूसरी ओर समूची सियासी बिरादरी  को हास्यास्पद बनाने के प्रयास के रूप मे भी। ज़ाहिर सी बात है         ऐसे में विक्षोभ भरी आपत्तियां भी हो रही है और क़ानूनी कार्यवाही की धमकियां भी दी जा रही है। कुछ लोग तो वहां के संविधान में पाकिस्तान को इस्लामी राष्ट्र की हैसियत ही से असहमति प्रकट कर रहे है। ऐसे में इस समाचार पर सन्देह करने का कोई कारण नज़र नही आता है कि शराब पीने व बेचने पर लगी पाबन्दी को हटाने के अभियान से जुड़े एक उम्मीदवार को इसी कारण चुनाव लड़ने से प्रतिबन्धित कर दिया गया है।
        पाकिस्तान के अवाम को इस चुनाव से बड़ी आशाएँ है? निष्पक्षता के सिद्धांत को कड़ाई से लागू करते हुए टैक्स व बैंक क़जऱ्ों की अदायगी के साथ ही शैक्षिक प्रमाण-पत्रों व अपराधी पृष्ठिभूमि की बारीक जाँच ने लोगों में नई उम्मीद जगाई है। पख़्तून इलाक़े की दो क़बीलाई महिलाओं द्वारा पहली बार किए गये नामांकन तथा चुनाव प्रक्रिया में स्त्री सक्रियता ने गहमा गहमी को बढ़ाया है। पहली बार अपना कार्यकाल पूरा करने का श्रेय प्राप्त अतीत का हिस्सा बन चुकी पार्लयामेन्ट ने औरतों के पक्ष में कई क़ानून बनाए हंै।
        इस प्रकाश में देखें तो चुनाव आयोग द्वारा उम्मीदवारों के धार्मिक ज्ञान की परीक्षा लोकतांत्रिक मूल्यों तथा चुनाव की बुनियादी आचार संहिता का उपहास उड़ाने जैसा है। इसे तुरन्त रोकाजाना पकिस्तान सहित समूचे उपमहाद्वीप के हित में है।
   
   -शकील सिद्दीकी
  
    मो0. 09839123525


गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

सिन्धु स्नान से जिन्ना याद आये

पाकिस्तान में  कहा जाता है कि सिन्धु नदी के स्नान से बेवफाई आ जाती है। लाल कृष्ण अडवानी जब पाकिस्तान यात्रा पर गए तो शायद सिन्धु स्नान कर लिया था, तभी उनको जिन्ना याद आने लगे थे लेकिन अब सिन्धु स्नान का असर कम हो रहा है और भारतीय राजनीति में समन्वय वादी नेता के रूप में अपनी छवि स्थापित करना चाहते हैं। बाबरी मस्जिद ध्वंस के नायक और देश में साम्प्रदायिकता की लहर चलाने वाले अडवानी प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं इसी लिए नागपुर मुख्यालय की छुपी हुई रणनीति के तहत गुजरात नरसंहार के नायक नरेन्द्र मोदी का नाम प्रधानमन्त्री पद के लिए उछाला गया है जिससे एनडीए के घटक दलों को यह सन्देश जाए कि यदि नरसंहारी प्रधानमंत्री नही चाहते हो तो उनसे कम अडवानी  को प्रधानमंत्री का दावेदार मान लो इसी रणनीति के तहत शिवसेना जैसी उग्र हिन्दुवात्वादी पार्टी भी नरेन्द्र मोदी का विरोध कर रही है और अंत में अडवानी को नागपुर मुख्यालय प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाना चाहता है लेकिन सबसे बड़ा खतरा यह है की अडवानी  ने अगर पुन: सिन्धु स्नान कर लिया तो देश के साथ कितना वफ़ा करेंगे। इन हिंदुत्व वादियों का इतिहास रहा है मुंह में राम बगल में छुरी। 

सुमन
लो क सं घ र्ष ! 

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

दो सरहदों के बीच फसे इदरीस की कहानी


इदरीस आलम  मूल रूप से कानपुर नगर के ही रहने वाले है | उनके अब्बू  स्व अहमद जान लेदर के बैग बनाने का कारोबार करते थे | इदरीस  की अम्मी का नाम स्वा आलिया बेगम है | जिनका परिवार पाकिस्तान से कुछ ताल्लुकात रखता था | इदरीस  के परिवार में उनके अलावा उनका एक बड़ा भाई और उनकी दो बहने भी है | इदरीस  का कानपुर नगर के मिश्री बाजार मूलगंज में अपना पुस्तैनी मकान भी है | इदरीस जी ने उर्दू में आठवी तक शिक्षा हासिल की है | इसके बाद वे अपने अब्बू के कारोबार में बैठने लगे और कुछ समय बाद उन्होंने अपना स्वयं का चमड़े का कारोबार स्थापित कर लिया | जिसमें उनका एक साझीदार और कई सारे कारीगर भी उनके साथ थे | इस काम में उन्होंने काफी सोहरत भी हासिल की पर  ( इदरीस  के कथन के अनुसार ) उनके साझीदार द्वारा उनके साथ बईमानी करने के कारण उनका काफी नुकसान और बदनामी दोनों हुई जिसके कारण वह अपना कारोबार बंद करके, अपने मामू के घर पाकिस्तान के कराची में चले गए ( ९० दिन के वीजा पर और  यह सन 1987 की बात है | ) वहाँ वे अपने मामू के कारोबार में हाथ बटाने लगे | इसी दौरान ( सन 1988 में ) अपने मामू की लड़की के साथ उनकी शादी हो गयी और वह पूरी तरह पाकिस्तान में ही बस गए | इस दौरान उनके भारतीय पासपोर्ट की समय सीमा ख़त्म हो गयी जिसके बाद उन्होंने पाकिस्तान के निवासी के तौर पर पाकिस्तान का पासपोर्ट , मतदाता पहचान पत्र, निवास प्रमाण पत्र आदि सभी बनवा लिया | और पाकिस्तान के नागरिक बन कर रहने लगे | ( इन सब काम में उनके मामू का ज्यादा दबाव था )
अब असली कहानी १० मई 1999 से शुरू होती है जब वह अपने बीमार पिता से मिलने के लिए १५ दिनों के टूरिस्ट वीजा पर भारत आते है | और यहाँ से गलतिया होना शुरू होती है | सबसे पहली गलती इदरीस  की रही कि उन्होंने अपने कानपुर आने की सूचना न तो L.I.U Office  में दी और न ही किसी पुलिस स्टेशन में | ( जबकि यह नियम / कानून के खिलाफ है | ) इसके बाद २४ मई को उनके अब्बू जान का देहांत हो गया और उनके वीजा की तारीख भी समाप्त हो गयी | अब परिस्तिथी ऐसी है कि शोक में डूबा हुआ व्यक्ति अपने पिता के अंतिम क्रियाक्रम में शामिल हो या फिर अपने वीजा को लेकर  L.I.U ऑफिस में रिपोर्ट करे | वास्तव में यह निर्णय बहुत कठिन था  | पर अब इसे इदरीस  की गलती कहे या फिर उनके भाग्य की, कि वह दो-तीन दिन तक अपने पिता के गम में ही डूबे रहे और उन्होंने L.I.U ऑफिस में रिपोर्ट नहीं किया | ( पर L.I.U के अधिकारी कहते है कि उन्होंने कानपुर आने के २-३ महीने के बाद भी L.I.U में कोई सूचना नहीं दी और उन्हें किसी की शिकायत पर गिरफ्तार किया गया | ) जबकि इदरीस  का कहना है कि पारिवारिक स्तिथी सामान्य होने पर, वह खुद अपना वीजा लेकर L.I.U ऑफिस में गए थे जहाँ पर उन्हें संदिग्ध दिखाकर कोतवाली में बंद कर दिया गया | ( यहाँ पर यह बात ध्यान देने की है कि यह १९९९ का वह दौर था जब भारत -पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध छिड़ा था ) १० दिन कोतवाली में रहने के बाद उनकी जमानत हो गयी और उन पर विदेशी अधिनियम की धारा १४ के तहत over stay को लेकर कानपुर न्यायलय में मुकदमा चलने लगा | इस बीच इदरीस
कभी L.I.U. की निगरानी में रहे तो कुछ समय के लिए उन्हें एक गेस्ट हाउस में रखा गया , तो कुछ समय के लिए मुसाफिर खाने में | इसके साथ ही इस दौरान उन्होंने अपने चमड़े के कारोबार को फिर से शुरू किया और उसी की मदद से अपना मुकदमा लड़ा और कुछ धन एकत्रित किया जिसे उन्होंने अपने पत्नी और बच्चो के पास खर्च के लिए भी भेजा | आखिरकार न्यायलय की धीमी चाल और भ्रस्टाचार के आंगे इदरीस को अपने हथियार डालने पड़े और उन्होंने कोर्ट के सामने अपनी  गलती को कबूल किया ( L.I.U. के कहने पर ) जिसके बाद 6 अगस्त २००९ को न्यायलय ने उनपर ५०० रु का जुर्माना और उनके द्वारा पूर्व में काटी गयी सजा लगाते हुए उन्हें वापस अटारी बोर्डर पर छोड़ने का आदेश L.I.U. को दिया | 16 अगस्त २००९ को इदरीस  अपने वतन वापस लौटने की ख़ुशी में सरोबोर होकर  L.I.U. officers  के साथ अटारी बोर्डर पर गए पर उनकी ख़ुशी में उस समय ग्रहण लग गया जब अटारी बोर्डर पर मौजूद सैन्य अधिकारियो ने उन्हें बोर्डर क्रास कराने से मना कर दिया और पाक दूतावास से N.O.C. लाने को कहा |  जिसके बाद  L.I.U. उन्हें वापस कानपुर ले आयी और उन्हें यह समझाते हुए वापस कानपुर के मुसाफिर खाने में रख दिया गया कि वे N.O.C. के लिए पाक दूतावास से संपर्क करेंगे | तब से अब तक इदरीस लगातार D.M. , S.D.M. , or L.I.U. कार्यालयों के चक्कर काट रहे है लेकिन अब तक उन्हें  N.O.C. का कागज नहीं मिल पाया जबकि इस बीच उन्हें मुसाफिर खाने से भी निकाल दिया गया और जिसके बाद से वे सड़को पर पागलो की तरह फिर रहे है | इसी बीच में उनकी दिमागी हालत भी ख़राब हो गयी थी  जिसके लिए उन्हें हैलेट हॉस्पिटल में भर्ती होना पड़ा था | जहाँ पर वे काफी समय तक शेल्टर होम में समय काटते रहे पर शायद उनकी किस्मत में शेल्टर होम की छत भी नसीब नहीं थी इसलिए उन्हें वहाँ से भी भगा दिया गया | अब न तो उनके पास कोई स्थायी रहने का ठिकाना है और नहीं खाने का कोई ठिकाना है | बस बेसहारो की तरह कभी किसी के दर पर मदद मांगने को चले जाते है तो कभी किसी स्टेशन या चौराहे पर पड़े रहते है | भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अनुसार ऐसे पाक राष्ट्रिको , जिनका मामला अभी विचाराधीन है या जब तक उनके वापस पाकिस्तान जाने के सभी दस्तावेज पूरे नहीं हो जाते , के रहने, खाने, स्वास्थ एवं सुरक्षा की जिम्मेदारी सम्बंधित राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन की है | पर स्थानीय प्रशासन के अनुसार उनके पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है और न ही इसके के लिए उनके पास कोई FUND है , तो ऐसे मामलो की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की होनी चाहिए | केंद्र और राज्य सरकार के इस झगड़े के बीच बेचारे इदरीस की जिंदगी पिस रही है | उसका परिवार उससे दूर होता जा रहा है |

कहते है उम्मीद पर दुनिया टिकी है , तो देखते है यह उम्मीद नाम की चीज इदरीस जी को वापस उनके वतन पहुंचाती है कि नहीं |आशा है उनकी सभी उम्मीदे जल्दी पूरी होंगी |


-के.एम्. भाई

गुरुवार, 28 मार्च 2013

धर्म आधारित भेदभाव समाप्त हो


पाकिस्तान के आम लोग भारत
से शांतिपूर्ण संबंध चाहते हैं


पाकिस्तान की मेरी हालिया (1828 फरवरी 2013) 11दिवसीय यात्रा के दौरान मैंने यह महसूस किया कि जहां तक भारत के प्रति रूख का प्रश्न है, वहां का समाज दो स्पष्ट तबकों में बंटा हुआ है। एक तबका उन लोगों का है जो भारत व पाकिस्तान के बीच दोस्ती चाहते हैं और दूसरी तरफ वे लोग हैं जो वहां भारत के विरूद्ध घृणा फैलाकर अपना दबदबा कायम रखना चाहते हैं। ये लोग भारत के प्रति दुर्भावना तो रखते ही हैं, वे अपने कारनामों से अपने देश को भी कमजोर कर रहे हैं। पहले तबके में हैं वहां के बुद्धिजीवी, कालेज और विश्वविद्यालयों के शिक्षक, एन.जी.ओ. के कार्यकर्ता, शायर, कहानीकार व अन्य रचनाधर्मी। यह वह वर्ग है जो पाकिस्तान में व्याप्त अशांति से परेशान है, जो चाहता है कि धर्म आधारित भेदभाव समाप्त हो।
मैं पाकिस्तान, उस सम्मान को ग्रहण करने गया था, जो अमरीका की एक संस्था ने मुझे प्रदान किया था। यह संस्था दक्षिण एशिया में शांति और सद्भाव कायम करने के लिये प्रयासरत है। अन्यों के अतिरिक्त यह सम्मान, पाकिस्तान की एक महिला को भी दिया गया था। इस महिला का नाम है शीमा पाकिस्तान की एक प्रसिद्ध नृत्यांगना हैं। वे भारतीय शास्त्रीय नृत्यकला में पारंगत हैं। वे स्वयं तो नृत्य करती ही हैं पाकिस्तान की बेटियों को भी नृत्य का प्रशिक्षण देती हैं। पाकिस्तान के तानाशाह जियाउल-हक ने उन्हें नृत्यकला सिखाने से मना किया था परन्तु वे तानाशाह के सामने नहीं झुकीं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के बड़े लोग तो मुजरा सुनते हैं और उन्हें नृत्य करने से मना करते हैं। तब से लेकर आज तक नृत्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता में किसी प्रकार की कमी नहीं आयी है।
सम्मान प्रदान करने के लिये 19 फरवरी को करांची में एक समारोह आयोजित किया गया था। समारोह में करांची के अनेक जानेमाने लोगों ने भाग लिया। समारोह में सभी वक्ताओं ने भारतपाक मित्रता और दोनों देशों के बीच शांति की आवश्यकता पर जोर दिया। समारोह में करांची के अनेक साहित्यकारों, शायरों और बुद्धिजीवियों ने अपने विचार प्रगट किये। सभी वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि यदि दोनों देशों के आम लोग आपस में घुलतेमिलते रहेंगे तो यह शांति की सबसे बड़ी गारंटी होगी।
अमरीकी संस्था ॔एसोसिएशन फार कम्यूनल हार्मोनी॔ की ओर से प्रीतम रोहिला ने सम्मान प्रदान किया। रोहिला ने बताया कि बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद, अमरीका में निवासरत भारतपाक मूल के अनेक व्यक्तियों ने इस संस्था की स्थापना की। यह संस्था दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत एवं पाकिस्तान के ऐसे लोगों को सम्मानित करती है जो अपनेअपने देशों में सौहार्द और दोस्ती के लिये काम करते हैं और जो यह मानते हैं कि पाकिस्तान व भारत के मधुर संबंध, दक्षिण एशिया में शांति की पहली शर्त है। रोहिला ने कहा कि उनकी व उनके साथियों की यह मान्यता है कि सरकारें चाहे कोशिश करें या न करें, आम जनता को शांति के लिये प्रयासरत रहना चाहिये। करांची के जानेमाने चिंतक करामत अली ने कहा कि दक्षिण एशिया के सभी देशों को एक संधि पर हस्ताक्षर करना चाहिये, जिसके अंतर्गत वे आपस में युद्ध न करने का वचन दें। उन्होंने कहा कि इन देशों को अपनी सेनाओं और रक्षा बजट में कटौती करनी चाहिये। वीजा जारी करने में उदारता बरती जाये।
कार्यक्रम में बोलते हुये सुप्रसिद्ध शायरा फहमीदा रियाज ने कहा कि भारत व पाकिस्तान के बीच बेहतर संबंधों से अतिवादी हिंसक गतिविधियां समाप्त हो सकती हैं। कार्यक्रम को पाकिस्तान के एक और चिंतक एवं सामाजिक सुधारक डॉ. बी.एम. कुट्टी ने भी संबोधित किया। डॉ. कुट्टी उन लोगों में से हैं जो पिछले 40 वर्षों से पाकिस्तान के मजदूरों के कल्याण के लिए प्रयासरत हैं और इस उद्धेश्य से एक संस्था भी चला रहे हैं।
मैंने कार्यक्रम में कहा कि धर्मनिरपेक्षता ही दक्षिण एशिया के देशों की समस्याओं का प्रभावी हल है। मैंने कहा कि पाकिस्तान के निर्माता कायदे आजम जिन्ना भी पाकिस्तान को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाना चाहते थे। आज पाकिस्तान की बहुसंख्यक जनता भी यही चाहती है। मैंने कहा कि इतिहास, पाकिस्तान के उन शासकों को कभी माफ नहीं करेगा जिन्होंने जिन्ना के इस सपने को चूरचूर कर दिया। मैंने कहा कि धर्मनिरपेक्षता के बारे में जानबूझकर दुष्प्रचार किया जाता है। भारत में भी ऐसे लोग और संगठन हैं जो धर्मनिरपेक्षता को बदनाम करते हैं। शीमा किरमानी ने इस अवसर पर अंग्रेजी की कविता भी पॄकर सुनाई जिसका भावार्थ था
"मैं तुम्हारे युद्ध के नगाड़ों पर नहीं नाचूंगी,
मैं घृणा की धुन पर नहीं नाचूंगी।
मैं तुम्हारे लिए किसी को नहीं मारुंगी।
मैं तुम्हारे लिए अपनी जान नहीं दूंगी।
मैं तुम्हारे बमों की आवाज पर नहीं नाचूंगी।
परन्तु मैं नाचूंगी,
हां मैं नाचूंगी, विरोध करने के लिये,
मैं नाचूंगी,
अस्तित्व में बने रहने के लिए
हां मैं नाचूंगी, शांति के लिये
जब तक वह स्थापित नहीं हो जाती।’’

करांची प्रवास के दौरान हमें वहां के विश्वविद्यालय जाने का अवसर मिला। विश्वविद्यालय में हमने अन्तर्राष्ट्रीय संबंध विषय के एम.ए. के विद्यार्थियों को संबोधित किया। एम.ए. क्लास में कम से कम 100 विद्यार्थी थे। विद्यार्थियों में छात्राओं का बहुमत था। कम ही छात्रायें बुर्का पहिने थीं। यद्यपि उनमें से कुछ अपना सिर के थीं। मैंने कक्षा में काफी अनुशासन पाया। हाजिरी लगने के बाद एक छात्रा ने क्लासरूम में प्रवेश करना चाहा। परन्तु क्लास के प्रोफेसर ने उससे कहा तुम लेट हो, भीतर नहीं आ सकतीें। इसी तरह क्लास के दौरान एक युवक आया और उसने प्रोफेसर से अनुरोध किया कि वे क्लास छोड़ दें ताकि छात्रछात्रायें क्रिकेट मैच देख सकें। इस पर प्रोफेसर ने उससे पूछा कि तुम क्लास के भीतर कैसे आये। क्लास जारी रहेगी।
मेरे संक्षिप्त भाषण के बाद छात्रछात्राओं ने अनेक प्रश्न पूछे। उनमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि भारत ने अभी तक पाकिस्तान के अस्तित्व को क्यों नहीं स्वीकारा है? मैंने उन्हें बताया कि यह आरोप सरासर बेबुनियाद है। मैंने कहा कि वैसे यह बात सच है कि हमारे देश के सबसे बड़े नेता, जिन्हें हम राष्ट्रपिता कहते हैं, देश के विभाजन के विरोधी थे। वे कहते थे कि भारत का विभाजन केवल उनकी मृत देह पर होगा। परन्तु जब पाकिस्तान बन ही गया तो गांधीजी ने भी पाकिस्तान के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया था। विभाजन के बाद भारत को केन्द्रीय बैंक के रिजर्व कोष में पाकिस्तान के हिस्से के बतौर उसे 55 करोड़ रूपये देना बाकी रह गया था। गांधी जी भारत सरकार को बार बार कहते थे कि पाकिस्तान की उधारी शीघ्र चुकाओ। परन्तु उधारी चुकाने में देरी हो रही थी। इस पर भारत सरकार पर दबाव बनाने के लिये महात्मा गांधी ने अनशन प्रारंभ कर दिया। इसके बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान को 55 करोड़ रूपये दे दिये। गांधी जी का रवैया देश के कुछ लोगों को अच्छा नहीं लगा। ऐसे लोगों में नाथूराम गोडसे भी शामिल था। पाकिस्तान को उसका वाजिब हक दिलवाने का गांधीजी का यह प्रयास कुछ लोगों को मुसलमानों और पाकिस्तान का तुष्टिकरण लगा। यही वे लोग थे जिन्होंने बाद में गांधी जी की हत्या की। इस तरह, हमारे देश के सबसे बड़े नेता ने पाकिस्तान के हित की खातिर अपनी जान दे दी। पाकिस्तान को मान्यता देने का इससे बड़ा सुबूत और क्या हो सकता है।
अपने भाषण के अंत में मैंने कहा कि मेरा एक सपना है जो मैं उनसे बांटना चाहता हूँ। मैंने उन्हें याद दिलाया कि अमरीका के एक बड़े नेता थे डॉ. मार्टिन लूथर किंग ॔॔जूनियर’’। वे वहां के काले लोगों के अधिकारों के लिये संघर्ष करते थे। उन्होंने एक दिन एक जोशीला भाषण दिया। अपने भाषण के बीच में वे बारबार दुहराते थे कि ’आई हेव ए ड्रीम॔ (मेरा यह सपना है)।
मैंने कहा कि मेरा भी एक सपना है। और वह यह कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश मिलकर एक महासंघ बना लें। ठीक वैसे ही जैसे यूरोप के देशों ने मिलकर यूरोपीय संघ बनाया है। यूरोप के देशों ने आपस में अनेक युद्ध लड़े। इनमें दो महायुद्ध शामिल हैं। इन युद्धों में करोड़ों लोगों की जान गयी और अरबों की संपत्ति स्वाहा हो गई। इतनी बड़ी जनधन की हानि के बाद अब यूरोपीय देशों ने यह निर्णय किया है कि वे आपस में युद्ध नहीं लड़ेंगे। क्या हम भी युद्ध लड़तेलड़ते थक नहीं गये हैं? पिछले 66 वर्षों में हमने स्वयं का कितना नुकसान किया है। इन वर्षों में हमने अपनी सीमाओं की रक्षा पर जितना खर्च किया है, यदि वह खर्च नहीं हुआ होता तो शायद हम तीनों देशों का एक भी व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे रही रह जाता। हम महासंघ बनायें, युद्ध न करने की कसम खायें, आपस में व्यापार करें, बिना वीजा के तीनों देशों में कहीं भी आजा सकें। मैंने कहा कि स्वार्थी तत्व ही हमें आपस में लड़ाते हैं। इन स्वार्थी तत्वों में पश्चिम के वे देश शामिल हैं जो पहिले ऐसी परिस्थिति पैदा करते हैं जिससे हम आपस में लड़ें और लड़ाई के लिये वे अपने उत्पादित किये गये हथियार हमें बेचते हैं। हमें इन चालाकियों को समझना चाहिये और आपस में न लड़ने की कसम खाना चाहिये।
इतना कहने के बाद मैंने विद्यार्थियों से पूछा कि क्या वे मेरे इस सपने को पूरा करने में सहायक होंगे। क्या वे अपने देश में ऐसे प्रयास करेंगे जिससे युद्ध समर्थक लोगों की आवाज दबे? इस पर सभी छात्रछात्राओं ने जोरदार तालियां बजाकर मेरे सपने को पूरा करने का आश्वासन दिया। उनके इस समर्थन से यह स्वयंसिद्ध कि पाकिस्तान के आम नागरिक शांति चाहते हैं।

-एल. एस. हरदेनिया
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