शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015

एक चमन के दो फूल

14-15 अगस्त 1947 में साम्राज्यवादी शक्तियांे ने एक चमन में लगे दो फूलों को अलग-अलग कर दिया था और भारत-पाकिस्तान बना दिए थे। विभाजन से पहले दोनों धर्मों के कट्टरवादी तबके आन्दोलन चला रहे थे कि दोनों धर्म के मानने वाले लोग एक साथ नहीं रह सकते हैं और धर्म के आधार पर भारत और पाकिस्तान बना। एक धर्म होने के बावजूद पाकिस्तान का विभाजन हो गया। भारत ने धर्म निरपेक्षता की नीति अपनाई और सरसब्ज बाग हुआ। वहीं पाकिस्तान ब्रिटिश साम्राज्यवाद से आजाद होने के बाद अमरीकी साम्राज्यवाद के खेमे में चला गया। साम्राज्यवादी लूट के चलते जो विकास होना चाहिए वह नहीं हुआ। जो शक्तियां ब्रिटिश कालीन भारत में हिन्दू राष्ट्र बनाने की रणनीति के तहत समाज में विघटनकारी बीज बो रही थीं वह आज पेड़ के रूप में धीरे-धीरे तैयार हुई। 2014 के चुनाव में वही ताकतें पाकिस्तान से 10 सर लाने की बात या युद्ध करने की बात करने लगी। कश्मीर सीमा पर आए दिन गोलाबारी होती रहती है वह भी अमरीकी साम्राज्यवाद के इशारे पर होती है। पाकिस्तान की सेना व आईएसआई अमरीकी नियंत्रित  हैं और आज अपना भी देश काफी कुछ अमरीकी खेमे में है। बाघा बाडर से लेकर हर बाडर पर शान्ति बनी रहती है और बराबर व्यापार भी चलता रहा है लेकिन क्या कारण हैं कि कश्मीर सीमा पर हमेशा छाया युद्ध चला करता है, मोदी से लेकर सुषमा स्वराज तक पाकिस्तान को नेश्तनाबूद कर देने की बात पिछले आम चुनाव में करते रहे हैं और देश के अंदर विषाक्त वातावरण तैयार किया गया लेकिन आज फिर वार्ता के दौर की बात शुरू हो गई और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पाकिस्तान की यात्रा भी कर आई हैं। इसके पहले का यह इतिहास रहा है कि कारगिल से पूर्व इन्हीं ताकतों ने बस सेवा से लेकर तमाम सारी वार्ताए की और फिर कारगिल का अघोषित युद्ध भी किया। उसी तरह की स्थितियां फिर देश में पैदा की जा रही हैं कि शान्ति वार्ताओं का दौर शुरू होगा और फिर साम्राज्यवादी ताकतों के इसारे पर युद्ध। यह भारतीय जनता के लिए एक बहुत ही घातक रणनीति साबित होती है। इस समस्या का समाधान तब तक नहीं हो सकता है जब तक साम्राज्यवादी ताकतों के इसारे पर कश्मीर सीमा पर लोग युद्धरत रहेंगे। विदेश नीति का पाकिस्तान के संदर्भ में अचानक बदलने का कारण यह भी है कि मोदी की व्यक्तिगत चमक भारतीय जनता में फीकी पड़ी है और उनका हिन्दुत्ववादी शक्तियों का अन्तिम अस्त्र कथित देशभक्ति व राष्ट्रवाद से पुनः जीवन पाने की कोशिश होती है और इन्हीं शब्दों से यह कई बार जीवन पा चुके हैं। मुख्य बात यह भी  है कि  दोनों देशों  की जनता में कोई टकराव नही है .
  बॉलीवुड के प्रभावशाली अभिनेता ओम पुुरी हाल ही पाकिस्तान में एक इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का हिस्सा बने।जहां उन्होंने पाकिस्तान में बस जाने की बात कही।ओमपुरी ने कहा कि दादरी भीड़ ने एक मुस्लिम शख्स को मारने की बात हमारे देश को शर्मिंदा कर देने वाली है।पाकिस्तान के तीन दिवसिय दौरे पर उन्होंने पाकिस्तानी मीडिया से कहा कि यदि उनके इस बयान पर भारत में कट्टरपंथी उन्हें परेशान करेंगे तो वे भारत छोड़ पाकिस्तान में आ बसेंगे।भारत में गोहत्या के मामले पर उन्होंने कहा कि जो भारत में गोहत्या को बैन करना चाहते है वे ढोंगी है।हम खुद ही बीफ निर्यात करके डॉलर कमाते है।पुरी ने बताया कि अगर पाकिस्तान भारत से अलग ना हुआ होता तो फिल्म इंडस्ट्री मुंबई की जगह लाहौर में होती।
उन्होंने आगे कहा कि 80 से 90 प्रतिशत लोग भारत में सेक्युलर है और वे पाकिस्तानियों से नफरत नहीं करते।भारतीय समाज में सारे लोग हिंसक नहीं है।चंद भ्रमित लोग है जो दोनों देशों के संबंधों को बिगाडऩा चाहते है।उन्होंने दोनों ही देश के लोगों से अनुरोध किया कि नफरत की राह छोड़कर आपस में मेलजोल की बात पर ध्यान दें।लोग क्यों जानवर की जैसी हरकतें करते है?अल्लाह भी निर्दोषों को मारने की इजाजत नहीं देता।
 इसी से सम्बन्धित   दूसरा मुद्दा आतंकवाद का है। आतंकवाद के नाम पर कथित राष्ट्रभक्ति का ज्वार शुरू होता है। जैसे-जैसे मोदी की चमक ढीली होती जा रही है वैसे-वैसे ही छदम्य आतंकवाद का खतरा दिखाई देने लगता है और इस समय जब उनकी चमक फीकी पड़ रही है तो तरह-तरह के समाचार आतंकवाद से सम्बन्धित प्रकाशित किये जा रहे हैं जिससे फिर उनको पुनः जीवन मिल सके। कौन नहीं जानता है कि तालीबान या आईएसआईएस को अमरीकी मदद से तैयार किया गया था और फिर उनका विनाश करने के लिए उन देशों के ऊपर भयानक बमबारी कर उन देशों को तबाह किये जाने की  बात उनकी  रणनीति का एक हिस्सा है। जब तक अमरीकी साम्राज्यवाद को परास्त नहीं किया जायेगा तब तक आतंकवाद दुनिया में समाप्त नहीं हो सकता है, साम्राज्यवाद का दूसरा स्वरूप ही आतंकवाद है। इस संबंध में भारतीय जनगण को सोचना होगा मीडिया द्वारा एक छदम्य आतंकवाद का वातावरण तैयार किया जा रहा है जो एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा है।
-रणधीर सिंह सुमन

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