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रविवार, 18 अक्टूबर 2015

नया वेद- संघियों का नरसंघारी वेद

वेद के समय में न तो मुसलमान थे न इसाई ही थे तो किन लोगो की हत्या गाय खाने के आरोप में कर दी जाती रही है इस बात कोई भी जवाब नागपुरी गैंग के पास नही है अगर वेद में यह कही नही  लिखा है तब  गौ मांस खाने वालो का वध कर दिया जाना चाहिए वाली यह बात कहाँ से आई .नागपुरी प्रयोगशाला में  दंगे भडकाने के जो रोज -रोज प्रयोग किए जाते है उसी समझ के तहत जानबूझकर यह कहानी भी प्रकाशित की गई है बुधि निरपेक्ष भक्तो ने मान लिया और गली -गली गाने लगे ,फिर गिरगिट की तरह रंग बदला हमने नही कहा-बात नही समझ पाए है लोग .जब तक शैतानो का चेहरा लोग नही पहचानेगे तब तक यह लोग झूठ दर झूठ बोलकर देश की एकता और अखंडता  को नुकसान पहुचाते रहेगे .
 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पाञ्चजन्य में गाय को मारने की अफवाह के बाद दादरी में इकलाख की पीटकर हत्या करने के मामले को सही ठहराया गया। पाञ्चजन्य के एक लेख में कहा गया है कि वेदों में गाय को मारने वाले पापियों की हत्या का आदेश दिया गया है. आरएसएस के डॉक्टर मनमोहन वैद्य ने कहा कि पाञ्चजन्य और आर्गेनाइजर आरएसएस के मुखपत्र नहीं हैं। 
दूसरा नाटक भी जारी हो गया है कि मोदी व अमित  शाह ने  हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा, विधायक संगीत सोम और सांसद साक्षी महाराज को चेतावनी दी है।अगर जरा सी नैतिकता शेष है तो निकालो पार्टी से -लेकिन यह सब बाते ऊपरी दिखावा है अन्दर से खुश बाहर से नाराज यह इनकी सोची समझी  रणनीति का हिस्सा है 
वेद  के समय में भी नरसंघार हुए थे और अब भी यह लोग नरसंघार  कर रहे है यह मानवीय तो हो नही सकते है जानवर के लिए हत्याए करने का आदेश जरुर देते रहेगे -यह इनकी फितरत है 
झूठ के यह सौदागर   कभी भी कुछ कह  सकते है गाँधी की हत्या के बाद कहा था कि गोडसे  से हमारा कुछ लेना देना नही है फिर आज भी गोडसे का प्रचार करते रहते है ---आज कहा  है कि पाञ्चजन्यमुख  पत्र नही है फिर कहेंगे कि  कौन मोदी -हमारे यहाँ कोई सदस्यता  रजिस्टर  ही नही होता है आज कहेगे जायज 'वेद के अनुसार गौ हत्‍या करने वाले को मौत की सजा, दादरी हिंसा जायज 'कल कहेगे हमने  कहा ही नही .
 -रणधीरसिंह सुमन 

मंगलवार, 28 जुलाई 2015

मोदी, आतंकवाद और भारतीय मुसलमान

अपनी अमरीका यात्रा के ठीक पहले, अन्तर्राष्ट्रीय समाचार चैनल सीएनएन के फरीद ज़कारिया को दिए अपने एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि भारत के मुसलमान, भारत के लिए जियेगें और मरेंगे और वे भारत का कुछ भी बुरा नहीं करेंगे। इसके बाद, गत 8 जुलाई को, कजाकिस्तान में एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने मध्य एशिया और भारत की साँझा इस्लामिक विरासत की चर्चा की और कहा कि यह विरासत, अतिवादी ताकतों और विचारों को हमेशा खारिज करेगी। प्रधानमंत्री ने फरमाया कि भारत और मध्य एशिया, दोनों की इस्लामिक विरासत प्रेम और समर्पण के सिद्धांतों पर आधारित और इस्लाम के उच्चतम आदर्शों  ज्ञान, पवित्रता, करुणा और कल्याण से प्रेरित है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी यह दावा किया कि भारतीय मुसलमान देशभक्त हैं और इस्लामिक स्टेट (आईएस) उन्हें आकर्षित नहीं कर सका है।
इन्हीं मोदी ने सन 2001 में दावा किया था कि ‘‘सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं होते परन्तु सभी आतंकवादी मुसलमान होते हैं’’। गुजरात के मुख्यमंत्री बतौर अपने चुनाव अभियानों में उन्होंने इस जुमले का जमकर इस्तेमाल किया था। सन 2002 के मुसलमानों के कत्लेआम के बाद, गुजरात का मीडिया मुस्लिम और इस्लाम विरोधी उन्माद भड़काने में लगा था। मोदी ने इस उन्माद को कम करने की कोई कोशिश नहीं की। उन्होंने काफी बाद में ‘‘सद्भावना उपवास’’ रखे परन्तु यह कहना मुश्किल है कि वे कितनी ईमानदारी और निष्ठा से उपवास कर रहे थे। मोदी ने दंगाईयों की वहशियाना हिंसा को औचित्यपूर्ण ठहराया था। उनके अनुसार, दंगे, साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में आगजनी की घटना - जिसे उन्होंने किसी भी जांच के पहले ही मुसलमानों का षड़यंत्र निरुपित कर दिया था - की प्रतिक्रिया थे।
गुजरात में मुसलमानों के नरसंहार के बाद, मोदी ने ‘गुजरात के गौरव’ को पुनस्र्थापित करने के लिए ‘गौरव यात्रा’ निकाली थी। उनका कहना था कि धर्मनिरपेक्षतावादियों द्वारा 2002 के दंगों के लिए सभी गुजरातियों को दोषी ठहराने से गुजरात के गौरव को चोट पहुँची है। मोदी के मुख्यमंत्रित्वकाल में, गुजरात की पुलिस ने अनेक मुसलमानों को सीमा के उस पार के आतंकी संगठनों से जुड़े आतंकवादी बताकर गोलियों से भून डाला था। सोहराबुद्दीन और इशरत जहां की हत्या की जांच हुई और इस मामले में गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह सहित कई पुलिस अधिकारी आरोपी बनाये गए।
प्रधानमंत्री मोदी यह स्पष्ट नहीं कर रहे हैं कि भारतीय मुसलमानों के उनके अलग-अलग, बल्कि
विरोधाभासी आंकलनों में से किसे वे सही मानते हैं। उनकी मुसलमानों के बारे में असली, ईमानदार राय क्या है? या, क्या उनकी सोच बदल गयी है? यदि हाँ, तो उन्हें ऐसी कौनसी नई जानकारी प्राप्त हुई है, जिसके चलते उनकी सोच में परिवर्तन आया है?
केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने पुलिस महानिदेशकों, महानिरीक्षकों और केंद्रीय पुलिस संगठनों के मुखियाओं के सम्मेलन को संबोधित करते हुए नवंबर 2014 में कहा था कि आईएस, भारतीय उपमहाद्वीप में पैर जमाने की कोशिश  कर रही है और अलकायदा ने गुजरात, असम, बिहार, जम्मू कश्मीर व बांग्लादेश  की बड़ी मुस्लिम आबादी को देखते हुए, भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी शाखा स्थापित कर दी है।
भारतीय मुसलमान और आतंकवाद
उपरलिखित प्रश्नों के उत्तर चाहे जों हों, इसमें कोई संदेह नहीं कि वैष्विक आतंकी नेटवर्कों में भारतीय मुसलमानों की उपस्थिति और भागीदारी बहुत कम है। भारत में 14 करोड़ मुसलमान रहते हैं। दुनिया में इंडोनेशिया को छोड़कर इतनी संख्या में मुसलमान किसी अन्य देश में नहीं रहते। इसके बावजूद, भारतीय सुरक्षाबल और गुप्तचर एजेंसियां अब तक केवल चार ऐसे भारतीय मुस्लिम युवाओं की पहचान कर सकी हैं, जिन्होंने आईएस के स्वनियुक्त इस्लामिक खलीफा अबुबकर बगदादी द्वारा शुरू किए गए युद्ध में हिस्सा लिया है। ये चार युवक हैं अरीब मज़ीद, शाहीन तनकी, फरहाद शेख और अमन टण्डेल।
इन चार युवकों के अतिरिक्त, समाचारपत्रों की खबरों के अनुसार, बैंगलुरू में रहने वाले, भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनी के एक 24 वर्षीय कर्मचारी मेंहदी मसरूर बिस्वास पर आरोप है कि वह अपने ट्विटर हैंडल के जरिए, आईएस के आतंकी मिशन का प्रचार कर रहा था और बगदादी के नेतृत्व वाली सेना में भर्ती होने के लिए युवकों को प्रेरित कर रहा था। मंेहदी को चैनल 4 को दिए गए उसके एक साक्षात्कार केे आधार पर पकड़ा गया।
अब इसकी तुलना 90 देशों के 20,000 विदेशियों से कीजिए, जो बगदादी की सेना में भर्ती हुए हैं। नेषनल काउंटर टेरोरिज्म सेंटर के निदेशक निकोलस रासम्यूसेन के अनुसार, इनमें से 3,400पश्चिमी  राष्ट्रों से हैं। अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस के निदेशक जेम्स क्लेपर के अनुसार, इनमें 180 अमेरिकी, 130 केनेडियन, 1200 फ्रांसीसी, 600 ब्रिटिश, 50 आस्ट्रेलियाई और 600 जर्मन शामिल हैं। इसके मुकाबले, भारत से मात्र चार और बांग्लादेश से मात्र 6 लोगों को आईएस का युद्ध लड़ने का दोषी पाया गया है। 
वैष्विक आतंकी संगठनोें में क्यों शामिल नहीं होते भारतीय?
हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों ने कभी इस प्रश्न  पर विचार नहीं किया कि आखिर क्या कारण है कि भारत के 14 करोड़ मुसलमानों में से आईएस में केवल चार भर्ती हुए। इस प्रश्न पर विचार करने की बजाए, वे यह आरोप लगाने में जुटे रहते हैं कि सभी मुसलमान आतंकवादी हैं। भारतीय मुसलमान देषभक्त हैं और भारत के हितों के खिलाफ नहीं जाएंगे, ये बातें मूलतः मुस्लिम-बहुल देशों की यात्राओं के दौरान कहीं गईं या विदेशी मीडिया से बातचीत में। और इनका उद्धेष्य अपनी ेउदारवादी छवि प्रस्तुत करना था।
जो भी हो, मूल प्रश्न यह है कि भारतीय मुसलमान, वैष्विक आतंकी संगठनों की ओर आकर्षित क्यों नहीं हुए? आईए, हम कुछ संभावित कारणों की चर्चा करें।
1.    भारतीय मुसलमानों का धार्मिक नेतृत्व मुख्यतः दारूल उलूम देवबंद और कुछ अन्य मदरसों जैसे नदवातुल उलेमा, लखनऊ से आता है। दारूल उलूम देवबंद का देश भर में फैले हजारों छोटे मदरसों और मकतबों पर नियंत्रण है। देवबंद के उलेमाओं के संगठन जमायत उलेमा-ए-हिन्द ने दिल्ली के रामलीला मैदान में हजारों मौलवियों और विद्यार्थियों की मौजूदगी में आतंकवाद के विरूद्ध फतवा जारी किया था। उन्होंने आतंकवाद को जड़मूल से उखाड़ फेंकने की शपथ भी ली थी। दारूल उलूम के रेक्टर हबीबुर रहमान के अनुसार, ‘‘इस्लाम हर तरह की अन्यायपूर्ण हिंसा, शान्ति भंग, खून खराबा, हत्या और लूटपाट का निषेध करता है और किसी भी स्वरूप में इनकी अनुमति नहीं देता।‘‘ जमायत ने लखनऊ, अहमदाबाद, हैदराबाद, कानपुर, सूरत, वाराणसी और कोलकाता में मदरसों के संचालकों की बैठकें और सम्मेलन आयोजित कर अपने आतंकवाद विरोधी संदेश  को उन तक पहुंचाया। जमायत ने एक ट्रेन बुक की, जिसमें उसके सदस्य और समर्थक देश भर में घूमे और शांति  और आतंकवाद-विरोध का संदेश फैलाया।
2.    इस्लाम, भारत में मुख्यतः शांतिपूर्ण ढंग से फैला है। भारत में इस्लाम पहली बार 7वीं सदी में केरल के तट पर अरब व्यवसायियों के साथ पहुंचा। इसका नतीजा यह है कि मुसलमान आज भी स्थानीय परंपराओें का पालन करते हैं औेर स्थानीय संस्कृति में घुलेमिले है। उनकी व गैर मुस्लिमों की सांस्कृतिक विरासत एक ही है। उदाहरणार्थ, लक्षद्वीप के मुसलमान मातृवंषी परंपरा का पालन करते हैं और केरल के मुसलमानों के लिए ओणम उतना ही बड़ा त्यौहार है, जितना कि गैर मुसलमानों के लिए। अमीर खुसरो ने होली पर रचनाएं लिखी हैं, मौलाना हसरत मोहानी नियमित रूप से मथुरा जाते थे और उन्हंे भगवान कृष्ण से बेइंतहा प्रेम था। रसखान ने भगवान कृष्ण पर कविताएं रची हैं, बिस्मिल्ला खान की शहनाई भगवान शिव को समर्पित थी और दारा शिकोह ने उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया था। ये हमारे देश की सांझा सांस्कृतिक परंपराओं के कुछ उदाहरण हैं, जिन्हें समाप्त करने की असफल कोशिश अंग्रेजों ने साम्प्रदायिक आधार पर देश को विभाजित कर की।
    भारत में इस्लाम के प्रभाव में वृद्धि मुख्यतः समावेशी  सूफी परंपराओं के कारण हुई, जिनकी ओर समाज के वंचित और हाशिए पर पड़े वर्ग सबसे अधिक आकर्षित हुए। सूफी (और भक्ति) संतों का मूलधर्म प्रेम था। वह्दतुलबूजूद (संसार में केवल एक ईश्वर है) और सुल्हकुल (पूर्ण शांति ) - ये सूफी परंपरा के मूल सिद्धांत थे। सूफी केवल ब्राह्यशांति की बात नहीं करते बल्कि अंतर्मन की शांति पर भी जोर देते थे। निजामुद्दीन औलिया रोज सुबह राम और कृष्ण के भजन गाया करते थे।
    कई नगरों और गांवों में ताजियों के जुलूस के दौरान हिन्दू महिलाएं आरती उतारती हैं। इस तरह की सांझा सांस्कृतिक जड़ों के चलते, भारतीय मुसलमानों के दिमागों में जेहाद का जहर भरना नामुमकिन नहीं तो बहुत मुष्किल जरूर है।  भारतीय मुस्लिम चेतना पर सूफी मूल्यों का गहरा प्रभाव है। एक आम भारतीय मुसलमान, अरब और दूसरे देषों के मुसलमानों की संस्कृति और अपनी संस्कृति में कुछ भी समानता नहीं पाता। वहाबी-सलाफी इस्लामिक परंपराओं को ‘‘सही परंपराएं‘‘ सिखाने के नाम पर फैलाने के लिए काफी संसाधन खर्च किए गए और गहन प्रयास हुए परंतु ये परंपराएं आज भी बहुत सीमित क्षेत्र में प्रभावी हैं। अलबत्ता हिन्दू राष्ट्रवादियों और उनके विमर्ष के मजबूत होते जाने से भारतीय मुसलमानों के अरबीकरण की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
    इसके विपरीत, कुछ पष्चिमी देशों में मुसलमानों में अलगाव का गहरा भाव है। उनमें से अधिकांश  एशियाई मूल के हैं और पष्चिमी संस्कृति में घुलमिल नहीं पाते। एशियाई मूल के लोग अपने समुदायों के बीच रहना पसंद करते हैं। युवाओं का सांस्कृतिक अलगाव, ‘सभ्यताओं के टकराव‘‘ के सिद्धांत के वशीभूत नस्लवादी शक्तियों द्वारा इस्लाम को निशाना बनाए जाने व ईराक और अफगानिस्तान के खिलाफ युद्ध में पष्चिमी सेनाओं की भागीदारी के कारण, इस्लामवादियों के लिए अपनी सेना में पष्चिमी देशों के युवकों को भर्ती करना अपेक्षाकृत आसान है।
3.     भारतीय मुसलमानों द्वारा की गई आतंकी गतिविधियों के लिए मुख्यतः प्रतिशोध की भावना जिम्मेदार है। 12 व 18 मार्च 1993 को मुंबई के झवेरी बाजार व अन्य स्थानों पर बम हमले, 28 जुलाई 2003 को इसी शहर के घाटकोपर में बेस्ट बस में बम धमाके और 11 जुलाई 2006 को लोकल ट्रेनों में हुए बम धमाके, वे कुछ आतंकी घटनाएं हैं जिनमें मुस्लिम युवक शामिल थे। परंतु इनमें से अधिकांश का उद्धेष्य मुंबई में 1992-93 के दंगों और सन्  2002 के गुजरात कत्लेआम का बदला लेना था। दिनांक 12 मार्च 1993 के बम धमाकों के  दोषी पाए गए कई आरोपियों ने मुकदमे के दौरान अपने बयानों में बताया कि उन्होने इस षड़यंत्र में हिस्सा इसलिए लिया था क्योंकि उन्होंने मुंबई में 1992-93 के दंगों में अपने प्रियजनों को मरते देखा था। न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण आयोग ने अपनी रपट (1998) में साम्प्रदायिक दंगों और बम धमाकों के परस्पर संबंध को इन शब्दों में व्यक्त किया था, ‘‘सिलसिलेवार बम धमाके, अयोध्या व बंबई के दिसंबर 1992 व जनवरी 1993 के घटनाक्रम की प्रतिक्रिया थे।‘‘  मुस्लिम युवकों के गुस्से और निराशा के भाव का कुछ पाकिस्तानी एजेसिंयों ने दुरूपयोग किया।
    परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि कई अन्य मुस्लिम देशों की तुलना में, भारतीय प्रजातंत्र बहुत बेहतर ढंग से काम कर रहा है। यद्यपि न्यायप्रणाली धीमी गति से काम करती है परंतु तीस्ता सीतलवाड जैसे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अथक प्रयासों से गुजरात दंगों के पीडि़तों को न्याय मिला है। कुछ अपराधियों को अदालतों ने सजा सुनाई हैं और वे अब जेल में हैं। इशरत जहां और सोहराबुद्दीन मामलों के आरोपियों पर मुकदमे चल रहे हैं। मानवाधिकार संगठनों के कड़े रूख के चलते, सुरक्षा बलों द्वारा फर्जी मुठभेड़ों में निर्दोषों को मार गिराने की घटनाओं में तेजी से कमी आई है। चूंकि भारत में पीडि़तों को न्याय मिलने की उम्मीद रहती है इसलिए वे प्रतिशोध की आग में नहीं जलते और यही कारण है कि आईएस को यहां से अपनी सेना के लिए लड़ाके नहीं मिल पा रहे हैं।
    यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में हाशिए पर पड़े वर्गों के लिए प्रजातांत्रिक स्पेस घटता जा रहा है। हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों को लग रहा है कि अब सैयां कोतवाल हो गए हैं और इसलिए वे बिना हिचक के मुसलमानों पर बेसिरपैर के आरोप लगा रहे हैं, उनका मताधिकार छीनने की मांग कर रहे हैं, उन्हें पाकिस्तान जाने को कह रहे हैं और मदरसों को आतंकवाद के अड्डे बता रहे हैं। अगर यही कुछ चलता रहा तो मुसलमानों को आईएस और अन्य आतंकवादी संगठनों के चंगुल से लंबे समय तक दूर रखना संभव नहीं होगा।
-इरफान इंजीनियर

सोमवार, 23 मार्च 2015

हिन्दू राष्ट्र, गाय व मुसलमान

भाग.1
उच्च जातियों के हिन्दुओं और हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों का गाय के प्रति . एक पशु बतौर व हिन्दू राष्ट्र के प्रतीक बतौर . ढुलमुल रवैया रहा है। कभी वे गाय के प्रति बहुत श्रद्धावान हो जाते हैं तो कभी उनकी श्रद्धा अचानक अदृश्य हो जाती है। हाल के कुछ वर्षों में, हिन्दू राष्ट्रवादियों ने गाय को एक पवित्र प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया है। और यह इसलिए नहीं कि सनातन धर्म की चमत्कृत कर देने वाली विविधता से परिपूर्ण धार्मिक.दार्शनिक ग्रंथ ऐसा कहते हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि गाय, हिन्दुओं को लामबंद करने और मुसलमानों को खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने के लिए अत्यंत उपयोगी है। ऐसा क्यों ? क्योंकि मुसलमानों के गौमांस भक्षण पर कोई धार्मिक प्रतिबंध नहीं है और इस धर्म के मानने वालों का एक तबका मांस व मवेशियों के व्यापार में रत है। मुस्लिम शासकों और धार्मिक नेताओं का भी गाय के प्रति ढुलमुल रवैया रहा है। कभी उन्होंने हिन्दुओं के साथ शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की खातिर गौवध को प्रतिबंधित किया तो कभी अपने सांस्कृतिक अधिकारों और अपनी अलग पहचान पर जोर दिया।
दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास के प्रोफेसर डीएन झा की पुस्तक 'द मिथ ऑफ होली काऊ' ;पवित्र गाय का मिथक कहती है कि प्राचीन भारत में न केवल गौमांस भक्षण आम था वरन् गाय की बलि भी दी जाती थी और कई अनुष्ठानों में गाय की बलि देना आवश्यक माना जाता था। कई ग्रंथों में इन्द्र भगवान द्वारा बलि दी गई गायों का मांस खाने की चर्चा है। चूंकि उस समय समाज, घुमंतु से कृषि.आधारित बन रहा था इसलिए मवेशियों का महत्व बढ़ता जा रहा थाए विशेषकर बैलों और गायों का। मवेशी, संपत्ति के रूप में देखे जाने लगे थे जैसा कि 'गोधन'शब्द से जाहिर है। शायद इसलिएए गाय की बलि पर प्रतिबंध लगाया गया और उस प्रतिबंध को प्रभावी बनाने के लिए उसे धार्मिक चोला पहना दिया गया। सातवीं से पांचवी सदी ईसा पूर्व के बीच लिखे गए ब्राह्मण ग्रंथों, जो कि वेदों पर टीकाएं हैं, में पहली बार गाय को पूज्यनीय बताया गया है। 
इसके बाद, भारत में बौद्ध और जैन धर्मों का उदय हुआ और सम्राट अशोक ने सभी पशुओं के प्रति दयाभाव को अपने राज्य की नीति का अंग बनाया। यहां तक कि उन्होंने जानवरों की चिकित्सा का प्रबंध तक किया और उनकी बलि पर प्रतिबंध लगा दिया, यद्यपि यह प्रतिबंध मवेशियों पर लागू नहीं था। कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में मवेशियों के वध को आम बताया गया है। इंडोनेशिया के बाली द्वीपसमूह के हिन्दू आज भी गौमांस खाते हैं। कुछ आदिवासी समुदायों में आज भी उत्सवों पर गाय की बलि चढ़ाई जाती है। कुछ दलित समुदायों को भी गौमांस से परहेज नहीं है। हिन्दुओं के गौमांस भक्षण पर पूर्ण प्रतिबंध, आठवीं सदी ईस्वी में लगाया गया,जब आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत दर्शन का समाज में प्रभाव बढ़ा। बौद्ध धर्म.विरोधी प्रचार भी आठवीं सदी में अपने चरम पर पहुंचाए जब शंकर ने अपने मठों का ढांचा, बौद्ध संघों की तर्ज पर बनाया। ग्यारहवीं सदी तक उत्तर भारत में हिन्दू धर्म एक बार फिर छा गया, जैसा कि उस काल में रचित संस्कृत नाटक 'प्रबोधचन्द्रोदय' से स्पष्ट है। इस नाटक में बौद्ध और जैन धर्म की हार का रूपक और विष्णु की आराधना है। तब तक उत्तर भारत के अधिकांश रहवासी शैव, वैष्णव या शक्त बन गए थे। 12वीं सदी के आते.आते, बौद्ध धर्मावलंबी केवल बौद्ध मठों तक सीमित रह गए और आगे चलकरए यद्यपि बौद्ध धर्म ने भारत के कृषक वर्ग के एक तबके को अपने प्रभाव में लिया, तथापि, तब तक बौद्ध धर्म एक विशिष्ट धार्मिक समुदाय के रूप में अपनी पहचान खो चुका था। वैष्णव, पशुबलि के विरोधी और शाकाहारी थे।
मुसलमानों का ढुलमुल रवैया
    मुस्लिम शासक और धार्मिक नेता, वर्चस्वशाली उच्च जाति के हिन्दुओं की भावनाओं का आदर करने और अपने सांस्कृतिक अधिकारों पर जोर देने के बीच झूलते रहे। मुगल बादशाह बाबर ने गौवध पर प्रतिबंध लगाया था और अपनी वसीयत में अपने पुत्र हुमांयू से भी इस प्रतिबंध को जारी रखने को कहा था। कम से कम तीन अन्य मुगल बादशाहों.अकबर, जहांगीर और अहमद शाह.ने भी गौवध प्रतिबंधित किया था। मैसूर के नवाब हैदरअली के राज्य में गौवध करने वाले के हाथ काट दिए जाते थे। असहयोग और खिलाफत आंदोलनों के दौरान गौवध लगभग बंद हो गया था क्योंकि कई मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने इस आशय के फतवे जारी किए थे और अली बंधुओं ने गौमांस भक्षण के विरूद्ध अभियान चलाया था। महात्मा गांधी ने हिन्दुओं से खिलाफत आंदोलन का समर्थन करने की जो अपील की थी, उसके पीछे एक कारण यह भी था कि इसके बदले  मुसलमान नेता गौमांस भक्षण के विरूद्ध प्रचार करेंगे। मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने इस अहसान का बदला चुकाया और गौवध के खिलाफ अभियान शुरू किया। इससे देश में अभूतपूर्व हिन्दू.मुस्लिम एकता स्थापित हुई और पूरे देश ने एक होकर अहिंसक रास्ते से ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ मोर्चा संभाला।
हाल में कई राज्यो द्वारा गौवध पर प्रतिबंध लगाने संबंधी कानून बनाए गए हैं। इनका विरोध गौमांस व्यापारी  व मांस उद्योग के श्रमिक कर रहे हैं। इनमें मुख्यतः कुरैशी मुसलमान हैं परंतु हिन्दू खटीक व अन्य गैर.मुसलमान भी यह व्यवसाय करते हैं। वे इस प्रतिबंध का विरोध मुख्यतः इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इससे उनके व्यावसायिक हितों को नुकसान पहुंचेगा। फिक्की और सीआईआई यह चाहते हैं कि उद्योगों और व्यवसायों पर सरकार का नियंत्रण कम से कम हो। अगर ये छोटे व्यवसायी भी ऐसा ही चाहते हैं तो इसमें गलत क्या है ? और यहां इस तथ्य को नहीं भुलाया जाना चाहिए कि मांस के व्यवसायियों में हिन्दू और मुसलमान दोनों शामिल हैं परंतु मीडिया केवल मुसलमानों के विरोध को महत्व दे रहा है और गैर.मुसलमानों द्वारा किए जा रहे विरोध का अपेक्षित प्रचार नहीं हो रहा है। गौवध पर प्रतिबंध और गौमांस के व्यवसाय के विनियमन को कई आधारों पर चुनौती दी जाती रही है, जिनमें से एक है संविधान के अनुच्छेद 19;1 द्वारा हर नागरिक को प्रदत्त 'कोई भी वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार' करने का मौलिक अधिकार। इसके अतिरिक्तए अनुच्छेद 25, जो कि सभी नागरिकों को किसी भी धर्म को मानने और उसका आचरण करने की स्वतंत्रता देता है,के आधार पर भी इस प्रतिबंध को अनुचित बताया जाता रहा है। उच्चतम न्यायालय ने इस प्रतिबंध को इस आधार पर उचित ठहराया है कि यह जनहित ;दुधारू व भारवाही पशुओं और पशुधन का संरक्षण,में है और यह व्यवसाय करने की स्वतंत्रता पर अनुचित प्रतिबंध नहीं है। धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के उल्लंघन के आधार पर चुनौती को यह कहकर खारिज कर दिया गया कि यद्यपि इस्लाम में गौमांस भक्षण की इजाजत है तथापि मुसलमानों के लिए गौमांस भक्षण अनिवार्य नहीं है।
गौवध संबंधी पुराने कानूनों का चरित्र मुख्यतः नियामक था और उनमें गौवध पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया था। इन कानूनों में गायों और दोनों लिंगों के बछड़ों के वध को प्रतिबंधित किया गया था परंतु राज्य सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकृत अधिकारी की इजाजत से, एक निश्चित आयु से ज्यादा के पशुओं का वध किया जा सकता था। इन कानूनों को शाकाहार.समर्थक नागरिकों ने इस आधार पर चुनौती दी थी कि वे राज्य के नीति निदेशक तत्वों में से एक, जिसमें'गायों,बछड़ों व अन्य दुधारू व भारवाही पशुओं के वध पर प्रतिबंध' लगाए जाने की बात कही गई है, का उल्लंघन हैं। उच्चतम न्यायालय ने मोहम्मद हमीद कुरैशी विरूद्ध बिहार राज्य प्रकरण में इस तर्क को इस आधार पर खारिज कर दिया कि एक निश्चित आयु के बाद, गौवंश की भारवाही पशु के रूप में उपयोगिता समाप्त हो जाती है और वे सीमित मात्रा में उपलब्ध चारे पर बोझ बन जाते हैं। अगर ये अनुपयोगी जानवर न रहें तो वह चारा दुधारू व भारवाही पशुओं को उपलब्ध हो सकता है। राज्यों ने अनुपयोगी हो चुके गौवंश के संरक्षण के लिए जो गौसदन बनाए थे, वे घोर अपर्याप्त थे। इस संबंध में दस्तावेजी सुबूतों के आधार पर न्यायालय ने कहा कि गौवध पर पूर्ण प्रतिबंध उचित नहीं ठहराया जा सकता और वह जनहित में नहीं है।
परंतु दूसरे दौर के गौवध.निषेध कानूनों में गौवध पर प्रतिबंध तो लगाया ही गया साथ ही,गौमांस खरीदने व उसका भक्षण करने वालों के लिए भी सजा का प्रावधान कर दिया गया। इस संबंध में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा बनाया गया कानून तो यहां तक कहता है कि गौमांस भंडारण करने व उसे पकाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सामान, जिनमें फ्रिज और बर्तन तक शामिल हैं, को भी जब्त किया जा सकता है। अर्थात अब पुलिसवाला हमारे रसोईघर में घुस सकता है और अगर वहां गौमांस पाया गया या उसके भंडारण या पकाने का इंतजाम मिला,तो हमें जेल की सलाखों के पीछे सात साल काटने पड़ सकते हैं।  
गौवध व हिन्दू राष्ट्रवादी संगठन
    गौवध के संबंध में जिस तरह का ढुलमुल रवैया हिन्दू व मुस्लिम धार्मिक व राजनैतिक नेताओं का था,कुछ वैसा ही हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों का भी रहा है। हिन्दुत्व चिंतक वी. डी. सावरकर ने गाय को श्रद्धा का पात्र बनाने का विरोध किया था। उनका कहना था कि गाय एक पशु है, हमें उसके प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और हिन्दुओं को करूणा व दयावश उसकी रक्षा करनी चाहिए। परंतु उनके लिए गाय किसी भी अन्य पशु के समान थी.न कम न ज्यादा। वे लिखते हैं 'गाय और भैंस जैसे पशु और पीपल व बरगद जैसे वृक्ष, मानव के लिए उपयोगी हैं इसलिए हम उन्हें पसंद करते हैं और यहां तक कि हम उन्हें पूजा करने के काबिल मानते हैं और उनकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है परंतु केवल इसी अर्थ में। क्या इसका यह अर्थ नहीं है कि अगर किन्हीं परिस्थितियों मेंए वह जानवर या वृक्ष मानवता के लिए समस्या का स्त्रोत बन जाए तब वह संरक्षण के काबिल नहीं रहेगा और उसे नष्ट करना,मानव व राष्ट्र हित में होगा और तब वह मानवीय व राष्ट्र धर्म बन जाएगा';समाज चित्र, समग्र सावरकर वांग्मय, खण्ड 2, पृष्ठ 678। सावरकर आगे लिखते हैं 'कोई भी खाद्य पदार्थ इसलिए खाने योग्य होता है क्योंकि वह हमारे लिए लाभदायक होता है परंतु किसी खाद्य पदार्थ को धर्म से जोड़ना, उसे ईश्वरीय दर्जा देना है। इस तरह की अंधविश्वासी मानसिकता से देश की बौद्धिकता नष्ट होती है' ;1935, सावरकरांच्या गोष्ठी, समग्र सावरकर वांग्मय, खण्ड 2, पृष्ठ 559 द्। 'जब गाय से मानवीय हितों की पूर्ति न होती हो या उससे मानवता शर्मसार होती हो,तब अतिवादी गौसंरक्षण को खारिज कर दिया जाना चाहिए' ;समग्र सावरकर वांग्मय,खण्ड 3, पृष्ठ 341,।'मैंने गाय की पूजा से जुड़े झूठे विचारों की निंदा इसलिए की ताकि गेंहू को भूंसे से अलग किया जा सके और गाय का संरक्षण बेहतर ढंग से हो सके';1938,स्वातंत्रय वीर सावरकर, हिन्दू महासभा पर्व,पृष्ठ 143।
खिलाफत आंदोलन के दौरान, जब मुसलमानों ने गौमांस भक्षण बंद कर दिया और गौवध का विरोध करने लगे तब सावरकर और हिन्दू राष्ट्रवादियों के लिए गाय वह मुद्दा न रही जिसका इस्तेमाल हिन्दुओं को एक करने और मुसलमानों को 'दूसरा' या 'अलग' बताने के लिए किया जा सके। परंतु सावरकर हिन्दुओं द्वारा गाय की पूजा करने का विरोध एक अन्य कारण से भी कर रहे थे। सावरकर लिखते हैंए 'जिस वस्तु की हम पूजा करें, वह हमसे बेहतर व महान होनी चाहिए। उसी तरहए राष्ट्र का प्रतीक, राष्ट्र की वीरता, मेधा और महत्वाकांक्षा को जागृत करने वाला होना चाहिए और उसमें देश के निवासियों को महामानव बनाने की क्षमता होनी चाहिए। परंतु गाय, जिसका मनमाना शोषण होता है और जिसे लोग जब चाहे मारकर खा लेते हैं, वह तो हमारी वर्तमान कमजोर स्थिति का एकदम उपयुक्त प्रतीक है। पर कम से कम कल के हिन्दू राष्ट्र के निवासियों का तो ऐसा शर्मनाक प्रतीक नहीं होना चाहिए' ;1936, क्ष.किरण, समग्र सावरकर वांग्मय, खण्ड 3ए पृष्ठ 237। 'हिन्दुत्व का प्रतीक गाय नहीं बल्कि नृसिंह है। ईश्वर के गुण उसके आराधक में आ जाते हैं। गाय को ईश्वरीय मानकर उसकी पूजा करने से संपूर्ण हिन्दू राष्ट्र गाय जैसा दब्बू बन जाएगाए वह घास खाने लगेगा। अगर हमें अपने राष्ट्र से किसी पशु को जोड़ना ही है तो वह पशु सिंह होना चाहिए। एक लंबी छलांग लगाकर सिंह अपने पैने पंजों से जंगली हाथियों के सिर को चीर डालता है। हमें ऐसे नृसिंह की पूजा करनी चाहिए। नृसिंह के पैने पंजे न कि गाय के खुर, हिन्दुत्व की निशानी हैं, ;1935, क्ष.किरण, समग्र सावरकर वांग्मयए खण्ड 3,पृष्ठ 167। सावरकर की मान्यता थी कि हिन्दुओं द्वारा गाय की पूजा करने से वे जरूरत से ज्यादा विनम्र, दयालु व सभी प्राणियों को समान मानने वाले बन जाएंगे। जबकि सावरकर तो राष्ट्रवाद का हिन्दूकरण और हिन्दुओं का सैन्यीकरण करना चाहते थे।
-इरफान इंजीनियर

मंगलवार, 24 जून 2014

अपने पड़ोसी से प्यार करो: नवाज़ शरीफ की भारत यात्रा

जब से भारत का बंटवारा हुआ है, तब से शायद ही कभी भारत और पाकिस्तान के आपसी रिश्ते मधुर रहे हों। किसी न किसी मुद्दे को लेकर, हमारे पड़ोसी से हमारे रिश्तों में कड़वाहट घुली ही रहती है। यहां तक कि आमजन, पाकिस्तान को हमारे ‘शत्रु’ के रूप में देखते हैं। यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शपथग्रहण समारोह में यद्यपि सभी सार्क देशों  के प्रतिनिधि पहुंचे थे तथापि मीडिया और जनता का सबसे अधिक ध्यान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ पर केन्द्रित था।  मोदी ने सभी सार्क देशों  के प्रमुखों को अपने षपथग्रहण समारोह (16 मई 2014) में आमंत्रित किया था। यह समारोह बहुत शान-ओ-शोकत के साथ सम्पन्न हुआ।
नवाज़  शरीफ को भारत का निमंत्रण स्वीकार करने में काफी परेशानियां आईं। उनके परिवार, जिसमें उनकी पुत्री शामिल हैं, ने ट्वीट कर कहा कि उन्हें यह निमंत्रण स्वीकार करना चाहिए। उनकी पुत्री का कहना था कि कोई कारण नहीं कि भारत और पाकिस्तान, उत्तरी और दक्षिणी कोरिया की तरह हमेशा एक-दूसरे के प्रति बैरभाव पाले रहें। क्या कारण है कि इन दोनों देशों के बीच उस तरह के मधुर संबंध नहीं रह सकते जैसे कि यूरोपियन यूनियन के देशों के हंै।शरीफ की पुत्री, दरअसल, पाकिस्तान के बहुसंख्यक लोगों की भावनाओं को स्वर दे रहीं थीं, जो कि चाहते हैं कि पाकिस्तान में प्रजातंत्र मजबूत हो और उसके भारत से अच्छे रिश्ते रहें। पाकिस्तान की आम जनता का यह मानना है कि भारत के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, पाकिस्तान में प्रजातंत्र की सफलता और देश   के विकास की आवष्यक शर्त हैं। कुछ सालों पहले मैं पाकिस्तान गया था और मुझे यह देखकर आष्चर्य हुआ कि वहां के लोगों में भारत के साथ दोस्ताना संबंध बनाने की कितनी उत्कट इच्छा है। जब भी कोई गैर-राजनीतिज्ञ भारतीय, पाकिस्तान जाता है, वहां के लोग जिस गर्मजोशी  से उसका स्वागत करते हैं, उसमें भी यही भावना प्रतिबिम्बित होती है। पाकिस्तान और भारत के बीच यदि शांति व मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित नहीं हो पा रहे हैं तो उसका कारण वहां का शक्तिशाली सेना-मुल्ला गठजोड़ है। इस बार भी जिस समय मोदी के निमंत्रण को स्वीकार करने या न करने पर पाकिस्तान सरकार विचार कर रही थी उसी समय अफ़गानिस्तान के हैरात में भारत के वाणिज्य दूतावास पर आतंकी हमला हुआ। पाकिस्तान के हाफिज सईदों की भृकटियां तन गईं और उन्होंने अपनी पुरानी धमकियां एक बार फिर दोहराईं। हम सबको याद है कि किस तरह, जब भारत और पाकिस्तान के बीच शांति प्रक्रिया जोर पकड़ रही थी, उसी समय मुंबई पर 26/11 का आतंकवादी हमला हुआ था। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत-पाक शांति प्रक्रिया और आतंकी हमलों में सीधा संबंध है। ये हमले उन आतंकी समूहों द्वारा किए जाते हैं जिन्हें पाकिस्तान की सेना के एक हिस्से का समर्थन प्राप्त है।
इसी तरह, जब पिछली एनडीए सरकार के मुखिया अटलबिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ शांति वार्ताएं शु रू कीं और बस से लाहौर पहुंचे, तब पाकिस्तान की सेना ने इस पहल का विरोध किया और कारगिल पर चढ़ाई कर दी। उस समय परवेज़ मुशर्रफ सेना प्रमुख थे। कारगिल पर पाकिस्तानी सेना के कब्जे के बाद भारतीय सैन्यबलों ने उसके खिलाफ कार्यवाही की। अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भी कड़े शब्दों में पाकिस्तान से कारगिल पर कब्जा छोड़ने के लिए कहा। अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान मैं ऐसे कुछ नागरिक कार्यकर्ताओं से भी मिला जो भारत के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों के प्रति प्रतिबद्ध हैं। ये लोग भारत में अपने साथियों के साथ मिलकर, पाक-भारत पीपुल्स फोरम जैसी संस्थाएं चला रहे हैं। वे शांति के अलावा अन्य मुद्दों पर भी जोर देते आए हैं, जिनमें उन निर्दोष मछुआरों को छोड़े जाने की मांगशामिल है जो गलती से दोनों देशों  की सीमाओं का अतिक्रमण करने के कारण पकड़कर जेलों में ठूंस दिए जाते हैं। इस बार नवाज़ शरीफ ने अपनी भारत यात्रा के पूर्व, पाकिस्तान की जेलों में बंद भारतीय मछुआरों को छोड़ने का आदेश जारी कर एक सकारात्मक कदम उठाया। कहने की आवष्यकता नहीं कि यदि दक्षिण एशिया मेंशांति स्थापित की जानी है तो वह भारत और पाकिस्तान के बीच अच्छे रिश्तों के बगैर संभव नहीं है। वहां मेरी मुलाकात उन लोगों से भी हुई जो ‘‘अमन की आषा’’ नामक संस्था के लिए काम कर रहे हैं। इस संस्था की स्थापना, भारत के एक प्रमुख दैनिक और पाकिस्तान से प्रकाशित एक अखबार ने मिलकर की है।
भारत में पाकिस्तान के खिलाफ सबसे तीखे स्वर में जो पार्टी बात करती है वह है भाजपा। परंतु भाजपा, पाकिस्तान पर शाब्दिक हमले तभी करती है जब वह सत्ता में नहीं होती। पाकिस्तान के प्रति भाजपा के रवैए में स्पष्ट विरोधाभास हैं। जब वह सत्ता में नहीं होती तब वह पाकिस्तान पर कटु हमले कर भारत की जनता को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने की कोशिश करती है। इसके विपरीत, सत्ता में आने पर वह पाकिस्तान की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाती है और शांति के कबूतर छोड़ती है। हम यह कैसे भूल सकते हैं कि हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री ने गोधरा कांड और उसके पश्चात हुए दंगों के बाद, पाकिस्तान और उसके राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ पर तीखे हमले कर, गुजरात की जनता को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत किया था। सन् 2002 के विधानसभा चुनाव में गुजरात में सैंकड़ों ऐसे होर्डिंग लगे थे जिनमें एक ओर मोदी की तस्वीर थी और दूसरी और मुशर्रफ की।  हालिया चुनाव अभियान के दौरान भी मोदी, पाकिस्तान को आंखे दिखाते रहते थे। उनकी पार्टी के एक अन्य सदस्य गिरीराज सिंह ने तो पाकिस्तान के बारे में लगभग गालीगलौच की भाषा मंे बात की थी। इस सबका उद्देश्य एक ऐसी मानसिकता विकसित करना है जिसमें यह माना जाता है कि भारतीय मुसलमान, पाकिस्तान के प्रति वफादार हैं और दोनों देशों  की क्रिकेट टीमों के बीच मैच, दरअसल एक युद्ध है। इस तरह, क्रिकेट, जो कि दोनों देशों के बीच दोस्ती का सेतु बना सकता है, का इस्तेमाल कटुता उत्पन्न करने के लिए किया जाता है। यह तथ्य भुला दिया जाता है कि पाकिस्तान की ओर से भारत में जासूसी करने के आरोप में मधु गुप्ता सहित जितने भी लोग पकड़े गए हैं, उनमें से अधिकांश हिन्दू हैं। इसके बाद भी, हर मुसलमान को पाकिस्तान के जासूस की तरह देखने की हमारी आदत गई नहीं है। पेशावर में जन्में हमारे देश के महान फिल्म कलाकार दिलीप कुमार को पाकिस्तान के उच्चतम नागरिक सम्मान निशान-ए-पाकिस्तान को स्वीकार करने के लिए कई बार अपमानित किया गया। यहां तक कि दिलीप कुमार की भारत के प्रति वफादारी पर भी प्रश्न चिन्ह लगाए जाते रहे हैं। सीमा पर होने वाली मामूली से मामूली मुठभेड़ का इस्तेमाल, पाकिस्तान के बारे में उल्टी-सीधी बातें कहने के लिए किया जाता है। भाजपा, हमेशा से कांग्रेस पर पाकिस्तान के प्रति ‘नर्म रवैया’ अपनाने का आरोप लगाती रही है। कुल मिलाकर, जब भाजपा सत्ता में नहीं होती तब पाकिस्तान-विरोधी दुष्प्रचार उसकी राजनैतिक रणनीति का प्रमुख हिस्सा रहता है।
भाजपा की गठबंधन साथी शिवसेना, एक और कदम आगे बढ़कर, पाकिस्तान व भारत के बीच रिश्ते बेहतर करने के  हर प्रयास में रोड़े खड़े करती आ रही है। शिवसेना कार्यकर्ताओं ने मुंबई में होने वाले भारत-पाकिस्तान किक्रेट मैच को रोकने के लिए वानखेड़े स्टेडियम की पिच खोद डाली थी। पाकिस्तान के कलाकारों के कार्यक्रमों में हंगामा और तोड़फोड़ करना भी शिवसेना का षगल रहा है। अभी भी, जब मोदी ने नवाज़ शरीफ को आमंत्रण भेजा तब शिवसेना ने यह धमकी दी कि वह शपथग्रहण समारोह का बहिष्कार करेगी। सौभाग्यवश, बाद में शिवसेना को अकल आ गई और उसके मुखिया ने शपथग्रहण समारोह में हिस्सा लिया।
यह दुर्भाग्य की बात है कि लगभग संपूर्ण दक्षिण एशिया में धार्मिक अल्पसंख्यक, तरह-तरह के कष्ट भोग रहे हैं। पाकिस्तान में ईसाई और हिन्दू, भारत में ईसाई और मुसलमान, बांग्लादेश में हिन्दू और बौद्ध, हिंसा का शिकार बनते आ रहे हैं और उन्हें डराया-धमकाया जाना आम है। सभी देशो  को आपसी बातचीत और सहयोग से यह सुनिष्चित करना चाहिए कि अपने-अपने देशों  में वे अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करें। हर व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है। अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, सार्क देशों  का मुख्य एजेंडा होना चाहिए। जिस देश में भी दो या दो से अधिक समुदाय एक दूसरे से घृणा करते रहेंगे या एक दूसरे के खिलाफ हिंसा करेंगे, वह देश कभी प्रगति नहीं कर सकता।
जहां तक पाकिस्तान का सवाल है, वहां प्रजातंत्र जितना मजबूत होगा, सेना की पकड़ उतनी ही कमजोर होगी और शांति प्रक्रिया जोर पकड़ेगी। दूसरी ओर, सेना जितनी मजबूत होगी, प्रजातंत्र उतना ही कमजोर होगा और भारत से रिश्ते उतने ही खराब होंगे। भारत में पाकिस्तान की तुलना में प्रजातंत्र की जड़ें काफी मजबूत हैं परंतु पाकिस्तान की प्रजातांत्रिक सरकार के प्रति सकारात्मक रूख रखना हमारे लिए आवश्यक है ताकि सेना, सामंतवादियों और कट्टरपंथी मुल्लाओं का गठजोड़ कमजोर पड़े और वहां प्रजातंत्र मजबूत हो। भारत और पाकिस्तान दोनों तरह-तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं। दोनों ही देशों  के लोगों को स्वास्थ, पोषण, शिक्षा व रोजगार संबंधी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में सेनाओं पर बढ़ता खर्च, दोनों ही देशों  की प्रगति को अवरूद्ध करेगा। जरूरी यह है कि दोनों देश रोटी, कपड़ा और मकान पर धन खर्च करें न कि टैंकों और बंदूकों पर।
-राम पुनियानी

मंगलवार, 20 मई 2014

राजनैतिक दलों के घोषणा पत्रों में अल्पसंख्यकों के लिए क्या है

चुनावों के पहले लगभग सभी मुख्य राजनैतिक दल अपने-अपने घोषणापत्र जारी करते हैं। कुछ लोग इन घोषणापत्रों में कोई रूचि नहीं लेते और ना ही उन्हें कोई महत्व देते हैं। उनका यह मत है कि पार्टियां अक्सर सत्ता में आने के बाद उनके द्वारा किए गए वायदे भूल जाती हैं। बसपा ने उत्तरप्रदेश  विधानसभा के जिस चुनाव में सत्ता हासिल की थी, उसके पहले उसने कोई घोषणापत्र जारी नहीं किया था। वैसे भी, हमारे देश में साक्षरता की दर को देखते हुए यह कहना मुष्किल है कि कितने लोग पार्टियों के घोषणापत्रों को पढ़ और समझ पाते होंगे। अधिकांश लोग नेताओं द्वारा जनसभाओं में किए जाने वाले जुबानी वायदों को अधिक महत्व देते हैं। अधिकांश मतदाता, पार्टियों के घोषणापत्रों के  आधार पर नहीं बल्कि जाति, नस्ल, भाषा, धर्म आदि के आधार पर वोट देते हैं। कुछ लोग लोकप्रियता व छवि के आधार पर अपनी पसंद का उम्मीदवार चुनते हैं।
इस सबके बावजूद, घोषणापत्र महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे राजनैतिक दलों की राजनैतिक और आर्थिक प्राथमिकताओं का दस्तावेज होते हैं। इस लेख में हम कुछ प्रमुख राजनैतिक पार्टियों के घोषणापत्रों का इस दृष्टिकोण से अध्ययन करेंगे कि उनमें अल्पसंख्यकों के लिए क्या है और क्या नहीं है। हमने केवल उन्हीं घोषणापत्रों का अध्ययन किया है जो अंग्रेजी या हिन्दी भाषाओं में हैं।
चूंकि अल्पसंख्यकों की आबादी कम होती है अतः फैसले लेने वाली संस्थाओं, जिनमें कार्यपालिका व
विधायिका शामिल हैं, में  उनका प्रभाव व उपस्थिति कम होती है। चंद दशकों पहले तक, शनैः शनैः अल्पसंख्यकों को राष्ट्र की मुख्यधारा में मिला लेना, कुछ देशों की नीति थी। इसका अर्थ यह था कि जहां अल्पसंख्यकों को सुरक्षा की पूरी गांरटी होगी वहीं उनसे यह अपेक्षा की जाएगी कि वे धीरे-धीरे बहुसंख्यकों की संस्कृति, परंपराओं, भाषा, धर्म आदि को अपना लें। अगर वे इस प्रक्रिया का विरोध करते थे तो उन पर अलगाववादी होने का आरोप लगाया जाता था और सुरक्षा पाने का उनका हक कमजोर हो जाता था।
संयुक्त राष्ट्रसंघ ने समय-समय पर यह कहा है कि अल्पसंख्यकों के मामले में दो नीतियां अपनाई जानी चाहिए। पहली यह कि उनके साथ किसी भी प्रकार के भेदभाव पर प्रतिबंध होना चाहिए। और दूसरी यह कि उन्हें उनकी विशिष्ट संस्कृति को सरंक्षित रखने व उसका विकास करने के पर्याप्त मौके व स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। जहां तक भारत का प्रष्न है, सच्चर समिति की रपट से यह साफ है कि अल्पसंख्यकों के साथ शिक्षा, नौकरियों, जीविकोपार्जन संबंधी योजनाओं, बैंक कर्जों, सरकारी ठेकों, आवास, स्वास्थ्य सेवाओं व कल्याणकारी योजनाओं आदि के मामले में भेदभाव किया जाता रहा है।
जहां तक सुरक्षा का सवाल है, सांप्रदायिक दंगों के दौरान, सिक्खों, ईसाईयों व मुसलमानों को निशाना बनाया जाता रहा है। उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा नियुक्त निमेश आयोग का यह निष्कर्ष है कि कई निर्दोष मुसलमान युवकों को आतंकवाद-निरोधक कानूनों के अंतर्गत गिरफ्तार कर, वर्षों सलाखों के पीछे रखा गया। सन् 2006 में हुए मालेगांव बम धमाकों के सिलसिले में बड़ी संख्या में मुस्लिम युवकों को छःह से अधिक वर्ष जेलों में बिताने पड़े। बाद में स्वामी असीमानंद ने यह कुबूल किया कि इन धमाकों के पीछे उनका हाथ था। जिन लोगों को आतंकी होने के आरोप में फर्जी मुठभेड़ों में सुरक्षाबलों द्वारा मार गिराया जाता है, उनमें मुसलमानों की बहुसंख्या होती है। इशरत जहां, जावेद शेख, सोहराबुद्दीन, कौसर बी, सादिक जमाल आदि फर्जी मुठभेड़ों के शिकारों में शामिल हैं।
यह आवष्यक है कि अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान की जाए, उनके साथ भेदभाव न हो और उन्हें उनकी संस्कृति व धर्म की संरक्षा का अधिकार हो। परंतु अधिकांष घोषणापत्रों में अल्पसंख्यकों के लिए ऐसी कल्याणकारी योजनाएं चलाने का वायदा किया गया है, जिनके अंतर्गत उन्हें पढ़ाई के लिए वजीफे, जीविकोपार्जन व उच्च शिक्षा के लिए कर्ज आदि उपलब्ध करवाए जाएंगे। इन योजनाओं के लिए जिस बजट की घोषणा की गई है, वह आवष्यकता से बहुत कम है। घोषणापत्रों में भारत की विविधवर्णी संस्कृति और विशेषकर अल्पसंख्यकों की विशिष्ट संस्कृति का संरक्षण करने का वायदा नहीं किया गया है। इससे ऐसा लगता है कि राजनैतिक दल यह चाहते हैं कि अल्पसंख्यक अंततः, देश की तथाकथित ‘मुख्यधारा’ को आत्मसात कर लें।
भाजपा का घोषणापत्र
इस घोषणापत्र की मुख्य थीम है सांस्कृतिक राष्ट्रवाद या हिन्दुत्व। इसमें भारत की प्राचीन सभ्यता का प्रभुत्वषाली वर्ग की दृष्टि से महिमामंडन  किया गया है। ऐसा बताया गया है कि भारतीय सभ्यता, हजारों वर्ष पुरानी है और प्राचीनकाल में इसकी अर्थव्यवस्था, व्यापार-व्यवसाय व संस्कृति अति विकसित थी। यह भी कहा गया है कि यूरोप व एशिया के किसी भी राष्ट्र की तुलना में, भारत, उद्योग व विनिर्माण के क्षेत्र में कहीं आगे था। घोषणापत्र की भूमिका में कहा गया है कि भारत ‘‘प्रचुरता, समृद्धि व सम्पन्नता की भूमि था, जहां लोग एक-दूसरे की फिक्र करते थे, संसाधनों का न्यायपूर्ण बंटवारा होता था और लोग प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर शांतिपूर्ण जीवन बिताते थे।’’
घोषणापत्र में उन नेताओं की सूची दी गई है जो भारतीय स्वाधीनता संग्राम के प्रेरणास्त्रोत थे परंतु इनमें एक भी गैर-हिन्दू का नाम नहीं है-यहां तक कि भगत सिंह और जवाहरलाल नेहरू का भी नहीं। घोषणापत्र, भारत को एक देष व एक राष्ट्र बताता है परंतु इसमें भारत की उस समृद्ध विविधता की चर्चा नहीं की गई है, जो उसकी ताकत थी और है। घोषणापत्र कहता है कि स्वतंत्र भारत का नेतृत्व (अर्थात नेहरू) भारत की आंतरिक जीवनषक्ति को नहीं पहचान पाया-वह जीवनषक्ति, जिसके कारण भारत अनेकों हमलों और लंबे विदेषी षासन (अर्थात सल्तनत, मुगल व ब्रिटिश) के बावजूद नष्ट नहीं हुआ और यह नेतृत्व भारत की आत्मा को पुनःप्रज्वलित नहीं कर सका। भाजपा का ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ पष्चिम की तकनीकी को तो अपनाएगा परंतु वह प्रशासन के ब्रिटिश सांगठनिक ढांचे (अर्थात प्रजातंत्र) को स्वीकार नहीं करेगा। घोषणापत्र के अनुसार, यह ढांचा भारतीय सभ्यता की आत्मा के अनुरूप नहीं है। क्या किसी को यह समझने के लिए अन्य किसी प्रमाण की आवष्यकता है कि भाजपा का ‘‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’’, भारतीय संविधान के विरूद्ध है।
भाजपा के घोषणापत्र में अल्पसंख्यक घोषणापत्र अल्पसंख्यकों के बारे में बहुत कुछ कहता है कि परंतु उनकी आर्थिक बेहतरी के लिए कोई ठोस वायदा नहीं करता और ना ही वह किसी ऐसे सांगठनिक ढांचे की स्थापना की बात कहता है जिससे यह सुनिष्चिित किया जा सके कि अल्पसंख्यकों को सुरक्षा मिलेगी और वे समानता के अपने संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल कर सकेंगे। अब तक भाजपा किसी भी ऐसे कदम का विरोध करती आई है, जिसका उद्देष्य अल्पसंख्यकों को उनकी विशिष्ट संस्कृति को संरक्षित करने का अधिकार या मौका उपलब्ध करवाना हो। वह ऐसी मांग करने वालों को अलगाववादी बताती रही है। परंतु अपने घोषणापत्र में भाजपा यह वायदा करती है कि वह अल्पसंख्यकों की ‘‘समृद्ध विरासत और संस्कृति को संरक्षित करेगी’’ (क्या बाबरी मस्जिद और 3000 अन्य मस्जिदों पर अपना हक जता के?)। वह यह वायदा भी करती है कि ‘‘अल्पसंख्यकों के प्राचीन स्मारकों और इमारतों का रखरखाव व पुनरूद्धार किया जायेगा’’ (क्या ताजमहल को शिवमंदिर बताकर? अभाविप के सदस्यों ने कुछ समय पहले, ताजमहल में तोड़फोड़ की थी। प्रष्न यह भी है कि प्राचीन स्मारक कब से अल्पसंख्यक व बहुसंख्यकों होने लगे हैं?)। वह प्राचीन अभिलेखों के डिजीटाईजेशन का वायदा भी करती है (क्या अब प्राचीन अभिलेखों का भी अल्पसंख्यकों व बहुसंख्यकों के बीच वर्गीकरण होगा?) वह उर्दू के संरक्षण और उसे बढ़ावा देने की बात भी कहती है (हिंदुत्ववादियों ने बिहार में 1967 में उर्दू विरोधी आंदोलन चलाया था जिसके नतीजे में रांची में दंगे भड़क उठे थे। बैंगलोर में आकाशवाणी द्वारा उर्दू में समाचार बुलेटिन प्रसारित करने पर दंगा हुआ था)। यह विडंबनापूर्ण है कि जहां घोषणापत्र में समृद्ध संस्कृति के संरक्षण की बात कही गई है वहीं ‘सांस्कृतिक विरासत’ वाले खंड में समान नागरिक संहिता लागू करने का वायदा भी किया गया है।
घोषणापत्र, मुस्लिम समुदाय के पिछड़ेपन पर मगरमच्छी आंसू बहाता है और कांग्रेस सरकार के उन्हीं कार्यक्रमों को लागू करने का वायदा करता है, जिनका भाजपा अब तक विरोध करती आई है। इनमें शामिल हैं मदरसों का आधुनिकीकरण और वक्फ संपत्तियों को अतिक्रमण से मुक्त करना।
कांग्रेस का घोषणापत्र
  कांग्रेस का घोषणापत्र उन्हीं पुराने कार्यक्रमों और योजनाओं को जारी रखने और लागू करने का वायदा करता है जो कांग्रेस के पिछले शासनकालों में या तो लागू की ही नहीं गईं या आधे-अधूरे ढंग से लागू की गईं। उसमें यह वायदा किया गया है कि पार्टी ‘‘राष्ट्र के अल्पसंख्यकों की भलाई के लिए ठोस व दीर्घावधि के कल्याणकारी कार्यक्रम चलाएगी’’। इनमें शामिल हैं अल्पसंख्यक समुदायों के बच्चों के लिए छात्रवृत्तियां और उनकी उच्च शिक्षा के लिए मौलाना आजाद शिक्षा फाउन्डेशन के जरिए मदद उपलब्ध करवाना। इसमें यह वायदा भी किया गया है कि वक्फ संपत्तियों का उचित प्रबंधन किया जायेगा और उन पर कब्जा करने या उनसे अनुचित लाभ उठाने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए कानून बनाया जायेगा। कांग्रेस सरकार, ऋण वितरण के मामले में अल्पसंख्यकों को प्राथमिकता देगी और यह सुनिष्चित करेगी कि उनमें उद्यमिता को प्रोत्साहित  किया जाये। घोषणापत्र में एक बार फिर यह वायदा किया गया है कि ‘‘सांप्रदायिक व लक्षित हिंसा विधेयक 2013, जिसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा संसद के समक्ष प्रस्तुत किया गया था, को प्राथमिकता के आधार पर पारित किया जायेगा।’’ घोषणापत्र इस संबंध में कुछ नहीं कहता कि यूपीए-1 व यूपीए-2 सरकारें इस विधेयक को कानून में क्यों नहीं बदल सकीं।
समाजवादी पार्टी
समाजवादी पार्टी, औद्योगिक पिछड़ेपन, गरीबी, निरक्षरता व बेरोजगारी की समस्याओं से निपटने का वायदा अपने घोषणापत्र में करती है और इन समस्याओं के लिए केन्द्र सरकार को दोषी बताती है। पार्टी के 2012 के उत्तरप्रदेश विधानसभा के घोषणापत्र व 2014 के लोकसभा चुनाव घोषणापत्र में लगभग एक से वायदे किए गए हैं। समाजवादी पार्टी के घोषणापत्र में अल्पसंख्यक के स्थान पर मुसलमान शब्द का इस्तेमाल किया गया है। पार्टी यह स्वीकार करती है कि मुसलमान, दलितों से भी अधिक पिछड़े हुए हैं और उन्हें सुरक्षा व प्रगति के अवसर उपलब्ध करवाने के लिए विशेष उपाय किए जाने की आवष्यकता है। पार्टी के घोषणापत्र में यह वायदा किया गया है कि सच्चर समिति व रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों  को लागू किया जाएगा। उसमें मांग की गई है कि संपूर्ण मुस्लिम समुदाय को अतिपिछड़ा घोषित किया जाना चाहिए और मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात में उसी तरह आरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए जिस तरह अनुसूचित जातियों को प्रदान किया जाता है।
घोषणापत्र में यह वायदा भी किया गया है जिन निर्दोष मुसलमान युवकों को आतंकवाद निरोधक कानूनों के अंतर्गत जेलों में रखा गया है, उन्हें रिहा किया जायेगा और यह सुनिष्चित किया जायेगा कि उन्हें मुआवजा और न्याय मिले। उनके साथ हुए अन्याय के लिए दोषी अधिकारियों को भी सजा दी जाएगी।
घोषणापत्र में मुस्लिम-बहुल जिलों में उर्दू माध्यम के प्राथमिक, माध्यमिक व उच्चतर माध्यमिक स्कूलों की स्थापना का वायदा भी किया गया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उर्दू भाषा को मुसलमानों से जोड़ा जा रहा है। घोषणापत्र कहता है कि कब्रिस्तानों की चहारदीवारी के निर्माण के लिए विशेष बजट प्रावधान किए जायेंगे ताकि कब्रिस्तानों की भूमि पर बेजा कब्जे न हो सकें। दरगाहों की सुरक्षा व विकास के लिए विशेष पैकेज दिया जायेगा। दरगाहों के विकास की बात अल्पसंख्यकों से संबंधित खंड में क्यों की गई है, यह कहना मुष्किल है क्योंकि दरगाहों पर मुसलमानों से ज्यादा हिन्दू जाते हैं। यह भी वायदा किया गया है कि सभी सरकारी आयोगों, बोर्डों व समितियों में अल्पसंख्यक समुदाय का कम से कम एक सदस्य नियुक्त किया जायेगा। वक्फ संपत्तियों पर अतिक्रमण हटाये जायेंगे और एक कानून बनाकर वक्फ बोर्ड की स्थापना की जाएगी, जो कि सभी वक्फ संपत्तियों की देखरेख करेगा। वक्फ संपत्तियांे को भूमि अधिग्रहण अधिनियम से बाहर रखा जायेगा। जिन उद्योगों में बड़ी संख्या में मुसलमान कारीगर हैं जैसे हैण्डलूम, हैण्डीक्राफ्ट, चूडी़, ताला, कैचीं व गलीचों का निर्माण, जरी, जरदोसी, बीड़ी उद्योग आदि को सरकारी अनुदान मिलेगा और इन्हें प्रोत्साहन दिया जायेगा। बुनकरों को बिजली के बकाया बिलों का भुगतान करने पर ब्याज और दंड की राशि नहीं देनी होगी। मुस्लिम समुदाय की जो लड़कियां उच्चतर माध्यमिक परीक्षा पास करंेगी, उनके विवाह या उच्च शिक्षा के लिए 30,000 रूपए का अनुदान दिया जायेगा। ऐसी मुस्लिम शिक्षण संस्थाएं, जो इसके लिए पात्र हैं, को विष्वविद्यालय का दर्जा दिया जायेगा। यह वायदा भी किया गया है कि उत्तरप्रदेश को दंगामुक्त प्रदेश बनाया जायेगा।
मुस्लिम समुदाय की बेहतरी के दो तरीके हैं। पहला यह कि उन्हें सभी क्षेत्रों में उनका वाजिब हक मिले, ऐसा सुनिष्चित किया जाए और यह भी सुनिष्चित हो कि उनके साथ कोई भेदभाव नहीं होगा। दूसरा तरीका यह है कि केवल मुसलमानों के लिए विशेष प्रावधान किए जाएं। संविधान, मुसलमानों के लिए विशेष प्रावधान किए जाने की इजाजत नहीं देता क्योंकि उसमें धर्म के आधार पर आरक्षण देने की कोई व्यवस्था नहीं है। आरक्षण का आधार केवल पिछड़ापन हो सकता है। जाहिर है कि अगर इस तरह के कदम उठाए भी जाते हैं तो उन्हें लागू करने में संविधानिक व कानूनी अड़चनें आयेंगी। ऐसा करने से गैर-मुसलमानों में रोष उत्पन्न हो सकता है और बहुसंख्यक वर्ग की सांप्रदायिक ताकतें मजबूत हो सकती हैं। समाजवादी पार्टी के घोषणापत्र में इसी दूसरी राह पर चलने की बात कही गई है जिसका नतीजा यह होगा कि अगर कोई विशेष प्रावधान किए भी गए तो उन्हें लागू करना संभव नहीं होगा।

 -इरफान इंजीनियर

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

मुसलमान भाजपा को वोट क्यों देते हैं?


सन् १९९५ के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म ;सीएसएसएस ने एक सर्वेक्षण किया था। इस सर्वेक्षण से यह जाहिर हुआ कि लगभग १० प्रतिशत मुसलमान, भाजपा को मत देने का इरादा रखते थे। उस समय मुसलमान मतदाता कांग्रेस से इसलिए नाराज थे क्योंकि उसने बाबरी मस्जिद को अपनी निगरानी में ढ़ह जाने दिया था। उस दौर में उत्तरप्रदेश में मुस्लिम मतदाता,समाजवादी पार्टी की ओर चले गए और बिहार में लालू प्रसाद यादव की ओर। मुसलमानों का एक तबका, कांग्रेस के विकल्प के अभाव में, भाजपा को भी वोट देने को तैयार था। पश्चिमी उत्तरप्रदेश के एक मुसलमान मतदाता ने समुदाय के रोष को इन शब्दों में व्यक्त कियाए जिस पार्टी ने बाबरी मस्जिद गिरने दी,हम उसे गिरते देखना चाहते हैं'। परंतु आम मुसलमान के लिए उसकी व्यक्तिगत सुरक्षा, बाबरी मस्जिद से ज्यादा महत्वपूर्ण थी। बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद, देश के अनेक शहरों में भयावह दंगे हुए। जिन मुसलमानों ने भाजपा को वोट दिया भी, उन्होंने ऐसा कांग्रेस के विरूद्ध अपने गुस्से के चलते किया न कि भाजपा के प्रेमवश। स्थानीय चुनावों में अलबत्ता, कुछ मुसलमानों ने ऐसे शिवसेना.भाजपा उम्मीदवारों को मत अवश्य दिया जो उन्हें व्यक्तिगत रूप से पसंद आए। परंतु कुल मिलाकर, मुसलमान,भाजपा से दूर ही बने रहे।
महाराष्ट्र में १९८५ के विधानसभा चुनाव के दौरान, बाल ठाकरे अपनी सभाओं में भाषण शुरू करने से पहले वहां उपस्थित मुसलमानों को सभास्थल से चले जाने को कहते थे क्योंकि वे 'जो बोलेंगे वह मुसलमानों को सहन नहीं होगा'। वे खुलेआम कहते थे कि उन्हें मुसलमानों के वोट नहीं चाहिए। मुसलमानों का दानवीकरण कर वे सभी जातियों के हिन्दुओं का समर्थन प्राप्त करना चाहते थे। वे स्वयं को 'हिन्दू हृदय सम्राट' बताया करते थे। आगे चलकर,उन्हें धर्म के नाम पर वोट हासिल करने का दोषी पाया गया और २८ जुलाई १९८९ को उनका मत देने का अधिकार, छह वर्षों के लिए निलंबित कर दिया गया।
सन् २००८ में हम अहमदाबाद के बांबे होटल इलाके में पहुंचे। यह वह स्थान है जहां अहमदाबाद का नगर निगम पूरे शहर का कूड़ा.कचरा फेंका करता था। यह वह स्थल भी है जहां कि २००२ के कत्लेआम के पीडि़तों ने अपने आशियाने बसाए हैं.कचरे के पहाड़ के ऊपर। हमें बताया गया कि यहां बसने वाले मुसलमानों में से भी कुछ ने सन् २००७ में गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा को मत दिया था। हमने लोगों से बातचीत की और यह जानना चाहा कि क्या यह सही है और यदि हां, तो ऐसा क्यों हुआ। एक पीडि़त ने हमें बताया कि वह तो वोट देना ही नहीं चाहता था परंतु यह स्वतंत्रता भी उसे नहीं दी गई। भाजपा कार्यकर्ता उसे जबरदस्ती मतदान केन्द्र पर ले गए और उसे कार्यकर्ताओं व मतदान अधिकारी की निगरानी में भाजपा को वोट देना पड़ा। मुझे समझ नहीं आया कि मैं उस पर विश्वास करूं या ना करूं। परंतु यह भी सच है कि उसे झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं मिलने वाला था। वहां रहने वाले दंगा पीडि़त, पूरी तरह असहाय थे। उनका सामाजिक बहिष्कार हो रहा था और कोई गैर.मुस्लिम उन्हें रोजगार देने को तैयार नहीं था।
अमे तो जरूरिया
गुजरात में जिस समय शंकर सिंह वाघेला ने केशुभाई पटेल के नेतृत्व के विरूद्ध विद्रोह किया था और अपने समर्थक विधायकों को खजुराहो ले गए थेए उस समय दोनों गुट 'खजूरिया' व'हजूरिया' कहलाते थे। उसी दौर में सोनूभाई चौधरी नामक आदिवासी अधिकारों के लिए संघर्षरत एक प्रतिबद्ध कार्यकर्ता ने भाजपा की सदस्यता ले ली। हम लोगों को इस पर बहुत आश्चर्य हुआए धक्का भी लगा। जब मैं सोनूभाई से मिला तो मैंने उनसे जानना चाहा कि वे 'खजूरिया' है या 'हजूरिया' ;वाघेला गुट में या पटेल के साथ। सोनूभाई का उत्तर आदिवासियों की असहायता को रेखांकित करने वाला था। उन्होंने कहा, 'साहेब, अमे नाई हजूरिया, नाई खजूरिया। आमी तो जरूरिया'। दंगा पीडि़तों के जवाब ने मुझे सोनूभाई की याद दिला दी। हमें कई सुविधाएं बिना मांगे मिल जाती हैं। परंतु जो लोग हिंसा और सरकारी नीतियों के कारण लगभग भिखारी हो गए हैं उन्हें सरकारी सेवाओं की बहुत जरूरत होती है.भले ही वे कितनी भी खराब क्यों न हों। उन्हें जिंदा रहने के लिए सुरक्षा की जरूरत भी होती है। जिन लोगों के जीवन के लाले पड़े हुए हों,जिन्हें जीवन की मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हों,उनके पास वोट देने के मामले में कोई विकल्प नहीं होता। वे इस आशा से अपना वोट दानव को देते हैं कि इससे वह संतुष्ट रहेगा और उन्हें जीने देगा। गुजरात में कांग्रेस, राजनैतिक दृष्टि से बहुत कमजोर है। राज्य में केवल चंद नगरपालिकाएं ही उसके नियंत्रण में हैं। कांग्रेस के नियंत्रण वाली नगरपालिकाओं के साथ राज्य सरकार अनुदान के मामले में भेदभाव करती है। इसलिए,विकास के फल का छोटा सा टुकड़ा हासिल करने के लिए भी भाजपा की कृपा आवश्यक है। यहां तक कि गुजरात के मुसलमानों के लिए भाजपा की मदद के बिना अपना पहचानपत्र बनवाना भी असंभव है।

हर तरह के 'जरूरिया'
लगातार तीसरी बार चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बनने के बादए मोदी के मन में प्रधानमंत्री बनने की महत्वकांक्षा जाग उठी। इसके लिए जरूरी था कि वे अपनी लौह पुरूष की छवि को बदलकर 'विकास पुरूष'की बनाएं। हिन्दुत्ववादी छवि उन्हें गुजरात में तो जीत दिलवा सकती थी परंतु राष्ट्रीय स्तर पर शायद उन्हें इससे लाभ न मिलता।
जब उच्चतम न्यायालय ने सन् २००२ के दंगों के मामले में मोदी के विरूद्ध आरोप निर्धारित करने का निर्णय,विचारण न्यायालय पर छोड़ दिया तब मोदी ने यह दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें क्लीन चिट दे दी है। अपने क्लीन चिट के दावे को मजबूती देने के लिए उन्होंने पूरे गुजरात राज्य में 'सद्भावना मिशन' शुरू की,जिसके अंतर्गत उन्होंने कई स्थानों पर एक दिन का उपवास रखा।'सद्भावना मिशन' पूरी तरह से खोखली थी क्योंकि इसमें न तो कभी यह स्वीकार किया गया कि दंगों के मामले में कोई भीए किसी भी प्रकार से दोषी है और ना ही दंगों के लिए किसी प्रकार की ग्लानि या पश्चाताप व्यक्त किया गयाए माफी मांगना तो दूर की बात है। मिशन का एक ही लक्ष्य थारू मोदी की छवि को चमकाना ताकि उनकी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पूरी हो सके। मोदी ने'सद्भावना मिशन' कार्यक्रमों में कुछ मुस्लिम नेताओं को भी बुलाया। ऐसे ही एक कार्यक्रम में उन्होंने एक मौलवी से टोपी पहनने से इंकार कर दिया था। उन्होंने मुसलमानों के एक छोटे.से व्यापारी तबके को अपने साथ लेने में सफलता भी हासिल कर ली.मुख्यतः उन्हें कुछ लाभ उपलब्ध करवाकर। ऐसे मुसलमानों का चेहरा बने जफर सरेसवाला जो, जब भी उनसे कहा जाता है, सार्वजनिक मंचों से मोदी का बचाव करने और उनका गुणगान करने में जुट जाते हैं। बोहरा समुदाय के पुरोहित वर्ग को भी अपने साम्राज्य को बचाने के लिए राजनैतिक संरक्षण की जरूरत थी। उसने अपने अनुयायियों से कहा कि वे अपनी पारंपरिक टोपियां लगाकर मोदी की हर रैली व सभा में जाएं। मोदी की जय.जयकार कर रहा मुसलमानों का श्रेष्ठी वर्ग एक अलग प्रकार का जरूरिया है, जिसे राजनैतिक संरक्षण की जरूरत इसलिए है क्योंकि गुजरात में सामान्य प्रक्रिया से कुछ होता ही नहीं है। व्यवसायी वर्ग हमेशा शासक दल का साथ देता है और इसलिए आश्चर्य नहीं कि गुजरात के बोहरा व खोजा मुसलमान, भाजपा के जुलूस में शामिल हो गए हैं। भाजपा के लगातार चार बार सत्ता में आने के बाद उनके सामने कोई रास्ता भी नहीं बचा था।
भाजपा ने मोदी की छवि को बदलने के लिए जरूरिया मुसलमानों से हाथ मिला लिया और फरवरी २०१३ में सलाया ;जिला जामनगरद्ध के नगरपालिका चुनाव में २७ वार्डों में से २४ में मुस्लिम उम्मीदवार खड़े कर सुर्खियां बटोरीं। भाजपा के सभी २४ मुसलमान उम्मीदवार चुनाव जीत गए। तथ्य यह है कि कस्बे की ३३,००० आबादी में से ९० प्रतिशत मुसलमान हैं और मुसलमानों के कारण भाजपा पहली बार वहां चुनाव जीत सकी। अर्थात् मुसलमानों ने भाजपा को जिताया ना कि भाजपा ने मुसलमानों को।
हमारी मुलाकात भुज ;कच्छ जिला के भाजपाई मुस्लिम पार्षद से हुई। वे काफी समृद्ध हैं और एक बंगले में रहते हैं। वे कुछ शैक्षणिक संस्थाएं चलाते हैं और जमीन.मकान आदि बेचने.खरीदने के धंधे में भी हैं। राज्य सरकार के संरक्षण के बिना उनका व्यवसाय चल ही नहीं सकता था। उनकी मजबूरी थी कि वे मोदी की जय.जयकार करें। हम इसी जिले के अंजर के तीन मुस्लिम पार्षदों में से एक से भी मिले। उन्होंने कहा कि वे मुसलमानों के शुभचिन्तक हैं। उनका दावा था कि वे भाजपा में इसलिए शामिल हुए हैं ताकि अपने समुदाय का भला कर सकें। अंजर की लगभग २० प्रतिशत आबादी मुस्लिम है और वहां के तीनों मुसलमान पार्षद भाजपा के हैं। बाकी दोनों, इन पार्षद महोदय के चेले थे। ये पार्षद स्थानीय बाहुबली थे और शासक दल को नाराज नहीं कर सकते थे। परंतु उनका दावा यह था कि उन्हें अपने समुदाय की खातिर गुंडागर्दी करनी पड़ती है। अंजर के नागरिकों ने मुझे बताया कि वहां के शेख टिम्बा, देवादिया नाका और एकता नगर जैसे मुस्लिम इलाकों में पानी, बिजलीए सड़क व सीवेज जैसी सुविधाओं की भारी कमी है। पार्षद ने मुझे बताया कि उन्होंने नगरपालिका के मुस्लिम इलाकों में बिजली के खम्बे लगवाने और सीवेज की व्यवस्था को सुधारने के लिए ३ करोड़ रूपए की राशि मंजूर करवाई है। परंतु इसके बदले उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि मुसलमान,केवल और केवल भाजपा को मत दें। ३ करोड़ रूपए के बदले १२ए००० वोट! सौदा बुरा नहीं था।

मुस्लिम पार्षद परंतु मुस्लिम विधायक नहीं
भाजपा ने सन् २०१२ के विधानसभा चुनाव में एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया। मोदी की छवि बदलने की उसकी इच्छा और सद्भावना मिशन के बावजूद, भाजपा,मुसलमानों को पार्षदों की चंद सीटों से ज्यादा कुछ देने को तैयार नहीं थी। इस चुनाव में भाजपा की विजय हुई परंतु विधानसभा में मुसलमान विधायकों की संख्या ५ से घटकर २ रह गई। मुसलमान, गुजरात की आबादी का लगभग १० प्रतिशत हैं और इस हिसाब से १८२ सदस्यों वाली विधानसभा में कम से कम १८ मुसलमान विधायक होने चाहिए थे।
हाल में राजस्थान, मध्यप्रदेश और दिल्ली विधानसभाओं के चुनाव हुए। इनमें भाजपा ने कुल मिलाकर लगभग ५०० टिकट बांटे परंतु उसके मुसलमान उम्मीदवारों की संख्या केवल ६ थी। इन राज्यों में करीब ५० ऐसे निर्वाचन क्षेत्र हैं जिनमें मुसलमानों की खासी आबादी है। पिछली विधानसभाओं में १७ मुसलमान विधायक थे परंतु इस बार भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चे के शीर्ष पदाधिकारियों को भी भाजपा ने टिकट नहीं दिया। आरिफ अकील, मध्यप्रदेश की विधानसभा में एकमात्र मुस्लिम विधायक हैं और वे कांग्रेस के टिकट पर चुने गए हैं। राजस्थान में भाजपा ने ४ मुस्लिम उम्मीदवारों को खड़ा किया जिनमें से २ जीते। राजस्थान की आबादी में मुसलमानों का प्रतिशत ८.५ है और इस हिसाब से कम से कम १७ मुसलमानों को वहां की विधानसभा का सदस्य होना चाहिए था। दिल्ली में मुस्लिम आबादी लगभग १२ प्रतिशत है परंतु वहां की 70सदस्यीय विधानसभा के लिए हुए चुनाव में भाजपा ने केवल एक मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा किया। भाजपा केवल उन्हीं निर्वाचन क्षेत्रों में मुसलमान उम्मीदवार खड़ा करती है जिनमें मुसलमानों का पूर्ण बहुमत होता है और किसी गैर.मुसलमान को टिकट देकर चुनाव जीतना लगभग असंभव होता है।

मुसलमानों की नीति निर्धारण व कानून बनाने जैसे मसलों में कोई भागीदारी नहीं होती।

भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व में जो मुसलमान हैं वे केवल शोपीस हैं। उन्हें इसलिए रखा गया है ताकि कुछ मुसलमानों को भाजपा की ओर आकर्षित किया जा सके या कम से कम यह सुनिश्चित हो सके कि मुसलमान एकजुट होकर भाजपा के खिलाफ वोट न दें। भाजपा के मुस्लिम नेताओं में से कुछ वे हैं जो मुस्लिम कट्टरवाद की प्रतिक्रियास्वरूप इस पार्टी में आए हैं। इनमें सिकन्दर बख्त, मुख्तार अब्बास नकवी और आरिफ मोहम्मद खान जैसे कुछ नेता शामिल हैं। परंतु भाजपा के मजबूत होने से मुस्लिम कट्टरवाद कमजोर नहीं होता। उल्टे,वह और मजबूत होता है। आम मुसलमान कट्टरपंथी नेताओं की तरफ झुकने लगते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि कट्टरपंथी नेता ही समुदाय को एक कर उसकी रक्षा कर सकते हैं। उदाहरणार्थ, गुजरात में मुसलमानों में कट्टरवाद बढ़ा है। कुछ मुसलमानों ने भाजपा की सदस्यता अवश्य ले ली है परंतु वे मुख्यतः ऐसे नेता हैं जिन्हें कांग्रेस या किसी अन्य दल ने या तो टिकट नहीं दिया या वह पद नहीं दिया जिसकी उन्हें अपेक्षा थी। उदारणार्थ, नजमा हेपतुल्ला भारत की उपराष्ट्रपति बनना चाहती थीं। जब कांग्रेस ने उन्हें यह पद नहीं दिया तो वे भाजपा में शामिल हो गईं। शाहनवाज हुसैन भी भाजपा में बहुत तेजी से आगे बढ़े। वे सन् १९९९ में बनी भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के चंद मुस्लिम चेहरों में से एक थे। इन मुसलमान नेताओं को न तो मुसलमानों की सुरक्षा की फिक्र है और ना ही बाबरी ध्वंस जैसे मुद्दों पर वे कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। वे भाजपा को अधिक समावेशी दल बनने की ओर ले जाने में भी सफल नहीं रहे हैं। उनका काम सिर्फ यह है कि वे भाजपा की 'इंडिया फर्स्ट' जैसी नीतियों का ढोल बजाएं और यह कहते फिरें कि मुसलमान 'राष्ट्रवादी'बनें और उस दोयम दर्जे की नागरिकता से प्रसन्न रहें जो हिन्दुत्ववादी ताकतें उन्हें देना चाहती हैं।
    -इरफान इंजीनियर

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

यहाँ एक बच्चे के खून से जो लिखा हुआ है उसे पढ़ो...अन्तिम भाग

दंगे राजनैतिक लाभ के लिए करवाए जाते हैं यह तो पहले भी कहा जाता रहा है। इस बार सभी राजनैतिक दलों ने इसे सार्वजनिक तौर पर स्वीकार भी कर लिया। केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार िशंदे ने तो यहाँ तक कह दिया कि चुनाव से पहले इस तरह के और दंगे भी करवाए जा सकते हैं। 1, नवम्बर को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक सवाल के जवाब में कहा कि मुज़फ्फरनगर में कुछ शरारती राजनैतिक तत्व हैं जो माहौल को खराब करने के लिए एक वारदात को दबाना और दूसरी को उछालना चाहते हैं। भाजपा पर राजनैतिक लाभ के लिए दंगा करवाने का आरोप लगभग सभी दलों ने खुले रूप से लगाया है। ऐसा मानने वालों की संख्या बहुत बड़ी है कि दंगे का माहौल तैयार करने की शुरुआत संघ परिवार और भाजपा से जुड़े हुए नेताओं ने ध्रुवीकरण की राजनीति के लिए की थी। उन्हें अपने लक्ष्य में सफल होते देख अन्य दलों के नेता समाज को बाँटने के उनके इस अभियान का विरोध करने के बजाय भड़की हुई भावनाओं पर राजनैतिक रोटी सेकने के लिए उसमें शामिल हो गए। अगर देश एंव समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को अन्य दलों के नेताओं ने निभाया होता तो भी इस साम्प्रदायिक हवा को रोका या इसकी तीव्रता को कम अवश्य किया जा सकता था। कुल मिला कर यदि देखा जाए तो मूल्यविहीन और सिद्वान्तविहीन राजनीति भी इसकी ज़िम्मेदार है। बेहतर भविष्य और सेकुलर लोकतंत्र की रक्षा के लिए हमें राजनीति में मूल्यों और सिद्वान्तों की वकालत करने वालों को महत्व देना ही होगा।
मोबाइल : 09455571488
-मसीहुद्दीन संजरी
 लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

सोमवार, 30 दिसंबर 2013

यहाँ एक बच्चे के खून से जो लिखा हुआ है उसे पढ़ो...2

सवाल यह है कि प्रशासन क्या कर रहा था और सरकार की आँखें बन्द क्यों थीं? सरकार के पास दंगा होने की आशंका की खुफिया जानकारी भी थी। समाचार पत्रों में दंगे की सम्भावना की खबरें छप रही थीं। धारा 144 लगा दी गई थी। फिर भी महापंचायत होने दी गई। भड़काऊ भाषण, ज़हरीले नारों और हथियारों से लैस भीड़ का दृश्य वहाँ मौजूद उच्च पुलिस अधिकारियों के सामने था। पंचायत समाप्त होने से घंटों पहले इसमें भाग लेने आए लोगों द्वारा हत्या की वारदातें अंजाम दी जा चुकी थी। पंचायत समाप्त होने के बाद प्रशासन के पास हालात को सँभालने के लिए पर्याप्त समय था। इसके बावजूद सरकार और प्रशासन ने जिस तरह स्थिति से निपटने में आपराधिक लापरवाही का प्रदशर्न किया उससे साफ तौर पर लगता है कि उस समय कानून व्यवस्था बनाए रखने में इनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी बल्कि यह कहा जाए कि तीनों की मंशा एक ही थी तो गलत नहीं होगा। फिरकापरस्त दंगा करवाना चाहते थे प्रशासन उसे रोकना नहीं चाहता था और सरकार की शान्ति बनाए रखने में कोई रुचि नहीं थी। इसका कारण सरकार व प्रशासन की अक्षमता और संवेदनहीनता थी, दंगाइयों के साथ मिली भगत या दंगा उपरान्त राजनैतिक लाभ हासिल करने की जुगत। मगर सच्चाई यही है कि दंगाइयों ने हत्या के बाद सबूत मिटाने के लिए लाशों को जलाया, बहाया और मिट्टी के नीचे दबा दिया। प्रशासन ने फाँसी पर लटकी हुई लाशों को आत्महत्या साबित करने का प्रयास किया। एफ.आई.आर. दर्ज करने में बाधाएँ उत्पन्न कीं। सत्ताधारी दल ने इसे कभी जातीय संघर्ष बताने की कोशिश की तो कभी सरकार के मंत्रियों ने अपनी रिपोर्ट में राहत कैम्पों में दंगा पीड़ितों को जबरन रोक कर अपना धंधा चलाने का आरोप लगाया। इन सभी प्रयासों का मात्र एक कारण था कि दंगे की व्यापकता और जघन्यता दुनिया पर ज़ाहिर न हो। सरकार और प्रशासन के लिए कानून व्यवस्था की बहाली और दंगा पीड़ितों के पुनर्वास के मुकाबले में तथ्यों पर परदा डालने के मायने ज़्यादा थे। यही कारण है कि सरकारी तौर पर सिर्फ 62 मौतें बताई गईं जबकि मानवाधिकार और सामाजिक संगठनों के प्रयासों से कुछ और हत्याओं से परदा उठा और आँकड़ा 100 पार कर गया। हालाँकि उन सभी की प्राथमिकी अभी तक दर्ज नहीं हो पाई है। इसके अलावा एक बड़ी संख्या लापता व्यक्तियों की है जिनके बारे में आशंका है कि उनकी हत्या हो चुकी है। यही स्थिति घर छोड़ कर जाने वाले दंगा पीड़ितों की संख्या की भी है। सरकार द्वारा इसे भी कम करके बताने का हर सम्भव प्रयास किया गया और फिर दंगा पीड़ितों के प्रति अपनी संवेदनहीनता को छुपाने के लिए राहत कैम्प चलाने वालों को ही सरकार के मंत्रियों ने कटघरे में खड़ा कर दिया।
मुज़फ्फरनगर, शामली व अन्य जगहों पर छोटे बड़े तीन दर्जन से भी ज़्यादा राहत कैम्प काम कर रहे थे। मुज़फ्फरनगर में सज़ाक, तौली, बासी कलां, बु़ाना, सखीपुर, जौला, जोगी खेड़ा लोई, चरथावल, मीरापुर और शामली में मलकपुर, कान्धला, कैराना, खुरगान, मंसूरा, जलालाबाद, सुंता, रसूलपुर के अलावा ग्रामीण अंचलों में छोटे बड़े राहत कैम्पों में दंगा पीड़ितों ने पनाह ले रखी थी। शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या को अपने रिश्तेदारों और सगे
संबधिंयों के यहाँ भी पनाह मिल गई थी। इनमें कई कैम्प ऐसे थे जहाँ एक साथ दस हजार तक दंगा पीड़ितों ने शरण ली थी। प्रदेश सरकार ने कैम्पों में दंगा पीड़ितों की मदद उनके खाने पीने रहने की व्यवस्था करने का कोई आँकड़ा अब तक नहीं दिया है। कुछ कैम्पों के आयाजकों ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि सरकार की तरफ से उनको एक पैसे की भी कोई सहायता नहीं मिली। समाजवादी सरकार के मुस्लिम नेता और अखिलेश सरकार के विधायक मंत्री पहले की तरह कुछ ऐसे बिन्दुओं की खोज में लगे रहे जिससे पार्टी और सरकार का बचाव किया जा सके। सरकार के वरिष्ठ मंत्री आज़म खान जो उस क्षेत्र के प्रभारी भी हैं, ने दो परस्पर विरोधी भूमिकाएँ अदा करके सबको हैरत में डाल दिया। पहले तो उन्होंने मीडिया के सामने अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा किया। विरोध स्वरूप आगरा में पार्टी कार्यकारिणी की बैठक में नहीं गए। मुलायम सिंह के भाई रामगोपाल यादव और कुछ वरिष्ठ सपा नेताओं ने उनके खिलाफ मोर्चा भी खोल दिया। परन्तु विधान सभा के मानसून सत्र में सदन के अन्दर आज़म खान ने ही सरकार का पूरी ताकत के साथ बचाव करके सबको आश्चर्य में डाल दिया। हालाँकि गृह मंत्रालय का पदभार मुख्यमंत्री के पास होने के कारण यह ज़िम्मेदारी उनकी थी। तीन चार दिनों के भीतर ऐसा कौन सा चमत्कार हुआ जिससे आज़म खान का ह्रदय परिवर्तन हो गया यह तो वही बता पाएँगे। परन्तु जनता इसे उनकी राजनैतिक अदाकारी के रूप में ही देखती है। जब राहुल गांधी ने यह कहा कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. के लोग मुज़फ्फरनगर के 1015 मुस्लिम नौजवान जिनके भाई बहन दंगे में मारे गए हैं, से बात कर रहे हैं तो आज़म खान ने बहुत तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। लेकिन अखिलेश सरकार के मुज़फ्फरनगर सद्भावना मिशन पर गए मंत्री समूह ने अपनी रिपोर्ट में दुर्भावना वश जब ह कहा कि मदरसे के लोग दंगा पीड़ितों को जबरन कैम्पों में रोक कर अपनी दुकान चला रहे हैं तो इस पर आज़म खान ने कोई टिप्पणी करना उचित नहीं समझा। हालाँकि वह यह अच्छी तरह जानते थे कि सरकार ने दंगा पीड़ितों की वापसी पर उनकी सुरक्षा का कोई बन्दोबस्त नहीं किया था। उन्हें यह भी मालूम था कि जो लोग अपने गाँव गए थे उनको मुकदमें वापस लेने के लिए
धमकियाँ दी जा रही थीं। बुाना के हुसैनपुर में खेत में काम कर रहे तीन मुसलमानों की 30, सितम्बर को की जाने वाली हत्या ने साबित भी कर दिया है कि असुरक्षा की आशंका बेबुनियाद नहीं थी और मंत्री समूह की रिपोर्ट में जो कुछ भी कहा गया वह बदनीयती पर आधारित था। यदि राहुल
गांधी और मंत्री समूह की रिपोर्ट को जोड़ कर देखा जाए तो यह आरोप बहुत आसानी से लगाया जा सकता है कि आई.एस.आई. और दंगा पीड़ित मुस्लिम युवकों की मुलाकात उन्हीं मदरसों में होती थी। राहुल के बयान और शिवपाल की अध्यक्षता वाले मंत्री समूह की इस रिपोर्ट को खुफिया एवं जाँच एजेंसियों में मौजूद साम्प्रदायिक मानसिकता के लोगों को आतंकवाद के नाम पर मदरसों को घेरने और मुसलमानों को प्रताड़ित करने का अवसर प्रदान करने के रूप में भी देखा जा सकता है। इस प्रकार इसे मुसलमानों को पीड़ित और प्रताड़ित कर उनमें असुरक्षा की भावना उत्पन्न करके सुरक्षा देने के नाम पर राजनैतिक ठगी जारी रखने की कोशिश भी कहा जा सकता है। यहाँ इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि मुसलमानों के हित की बात करने वाली पार्टियों ने सुरक्षा के नाम पर उन्हें गोलबन्द करके सबसे अधिक छला है। भाजपा और शिवसेना जैसे दलों ने उन्हें इसका अवसर भी खूब दिया है। लेकिन जैसे ही मुसलमानों के हित की कोई बात आती है साम्प्रदायिक दल और संगठन तुष्टिकरण का राग अलापने लगते हैं। उसके बाद इन तथाकथित सेकुलर और साम्प्रदायिक दलों के बीच नूरा कुश्ती शुरू हो जाती है। थोड़े समय बाद ही सेकुलर दल हथियार डाल देते हैं और मुसलमानों को यह संदेश देने में लग जाते हैं कि वह तो कुछ करना चाहते हैं परन्तु स्थितियाँ प्रतिकूल हैं। केवल राजनैतिक स्तर पर ही नहीं बल्कि न्यायिक स्तर पर भी मुसलमानों के मामले में यह बार बार देखने को मिला है। आन्ध्र प्रदेश में रिज़र्वेशन का मामला रहा हो या यू.पी. में आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाह मुस्लिम युवकों की रिहाई का मुद्दा जानबूझ कर ऐसी कमियाँ छोड़ी गईं कि अदालत में जाकर केस गिर जाए और उसके बाद फिर वही राग कि हम तो करना चाहते हैं लेकिन ़ ़ ़। अखिलेश सरकार ने तो एक तीसरा रास्ता भी निकाल लिया है। मुसलमानों के खिलाफ उसी समुदाय के लोगों को इस्तेमाल करने का। खालिद मुजाहिद की हिरासत में मौत के मामले में पंचनामा की बात हो या फिर मुज़फ्फरनगर का दौरा करने वाली टीम में तीन मुसलमानों को शामिल किया जाना इसी नई रणनीति का हिस्सा लगता है। खालिद मुजाहिद के पंचनामे में शामिल मुसलमान यह नहीं कह पाए कि उसमें खालिद के परिवार का भी प्रतिनिधित्व होना चाहिए और दंगों की जाँच का हिस्सा रहने वाले मुस्लिम मंत्री इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाए कि दल के अगुवा से यह कह सकें कि जिन लुटे पिटे लोगों की जाँच उन्हें करनी थी उन पीड़ितों से कैम्पों में जाकर उनका दुख दर्द भी सुन लिया जाए। ऐसे लोगों से दंगा पीड़ितों की मदद करने वालों पर कीचड़ उछालने वाली मंत्री समूह की रिपोर्ट पर उंगली रखने की उम्मीद करना सिर्फ धोखा है। इस तरह के मुस्लिम नेता अपने समाज में सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं सरकार में अपने समाज का नहीं। मुस्लिम समाज को यह सब समझना होगा और अपने व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन भी लाना होगा।   
क्रमश:
-मसीहुद्दीन संजरी
 लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

रविवार, 29 दिसंबर 2013

यहाँ एक बच्चे के खून से जो लिखा हुआ है उसे पढ़ो...1

 अमानवीय, पाष्विक, बर्बर या ऐसी कोई संज्ञा मुज़फ्फरनगर, श्यामली और आस-पास घटित होने वाली घटनाओं को अंजाम देने वालों के लिए पर्याप्त होगी? आचर्य और बेशर्मी की बात तो यह है कि इसे जायज़ ठहराने की उसी तरह की कोशिश की गईं जिस तरह  गुजरात दंगों को गोधरा कांड की प्रतिक्रिया बताने का प्रयास किया गया था। उत्तर-प्रदेश में इस तरह के साम्प्रदायिक षड्यंत्र पिछले कई दंगों के मामले में पहले ही बेनकाब हो चुके हैं। इन दंगों में आमतौर से दंगाइयों ने समाज में विष घोलने और भावनाएँ भड़काने के लिए महिलाओं के साथ अभद्रता को हथियार रूप में प्रयोग  किया है। फैज़ाबाद में तो हिन्दू लड़की से छेड़छाड़ के साथ ही मूर्तियों के खंडित करने की अफवाह भी फैलाई गई थी। बाद में यह तथ्य खुलकर सामने आगया कि मूर्तियाँ सही सलामत थीं। उनकी वीडियो भी जारी हो गई। किसी लड़की के साथ छेड़छाड़ का कोई मामला कहीं दर्ज नहीं हुआ। यहाँ तक कि कोई यह बताने वाला भी नहीं था कि पीडि़त लड़की कौन और कहाँ की रहने वाली थी। इस बात के भी कई प्रमाण मिले कि दंगा पूर्व नियोजित था और लड़की के साथ छेड़छाड़ या मूर्तियों को खंडित करने की अफवाह जानबूझ कर गढ़ी गई थी। मुज़फ्फरनगर, शामली, मेरठ और बाग़पत में होने वाले दंगे के लिए भी बहाना यही बनाया गया कि जाट लड़की से मुसलमान लड़के ने छेड़छाड़ की थी। हालाँकि यह बात सही नहीं थी। मामला 27, अगस्त को मोटर साइकिल और साइकिल की टक्कर के बाद उपजे विवाद से शुरू हुआ था। बात बढ़ गई और कंवाल ग्राम निवासी शाहनवाज़ की सचिन और गौरव नामक दो जाट युवकों ने चाकू मार कर हत्या कर दी। मुहल्ले के लोगों ने इन दोनों हमलावरों को भी मार डाला। दोनों पक्षों की तरफ से लिखवाई गई एफ.आई.आर. में भी मोटरसाइकिल और साइकिल की टक्कर को ही विवाद का कारण बताया गया है। इस घटना से फिरकापरस्तों को पीढि़यों से चले आ रहे मुसलमान-जाट शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व को दंगों की आग में जलाने का मौका मिल गया। नफरत के सौदागरों ने मोटर साइकिल-साइकिल टक्कर की जगह लड़की के साथ छेड़छाड़ का प्रचार करना शुरू कर दिया। इस आग में घी डालने के लिए यू ट्यूब से पाकिस्तान की एक वीडियों डाउन लोड की गई जिसमें कुछ दाढ़ी टोपी वालों को एक व्यक्ति की पिटाई करते दिखाया गया था। इस वीडियो द्वारा प्रचारित किया जाने लगा कि मुसलमान जाट लड़के की पिटाई कर रहे हंै और विभिन्न माध्यमों से इसका बहुत व्यापक स्तर पर वितरण होने लगा। कथित रूप से यह काम भाजपा  विधायक संगीत सिंह सोम ने किया था। वातावरण इतना दूषित कर दिया गया कि इससे निपटने के लिए विभिन्न खापों ने पंचायतों का दौर शुरू कर दिया और 7, सितम्बर को कई खापों ने मिलकर ’बहू-बेटी बचाओ’ महापंचायत बुलाई जिसमें जमकर साम्प्रदायिक भाषण बाज़ी हुई। उसके बाद बड़े पैमाने पर दंगा भड़क गया। एक बार फिर यह प्रचारित किया गया कि पंचायत से वापसी पर मुसलमानों ने जाटों पर हमला कर दिया जिससे दंगा भड़का। यह बात सही है कि पंचायत से वापसी पर दोनों समुदाय के लोगों में कई स्थानों पर टकराव हुआ जिसमें दोनांे तरफ के लोग हताहत और घायल भी हुए थे। हमले की शुरुआत करने के मामले में परस्पर विरोधी आरोप भी हैं। परन्तु जहाँ तक दंगों की शुरूआत की बात है तथ्य कुछ और ही कहते हैं।
    5, सितम्बर को एक खाप पंचायत के बाद नफीस नामक व्यक्ति को चाकू मार दिया गया। 7, सितम्बर को होने वाली महापंचायत में शामिल होने के लिए बड़े पैमाने पर हथियारों के साथ मुसलमानों के खिलाफ साम्प्रदयिक नारे लगाते हुए लोग नगला मंदौड़ में इकट्ठा हुए। कहा जाता है कि यह संख्या एक लाख से भी अधिक थी। दोपहर में ही गढ़ी दौलत, कांधला निवासी नफीस अहमद ड्राइवर जो किराए पर महापंचायत में अपनी बोलेरो लेकर गया था उसकी हत्या कर दी गई। 4 बजे शाम में नंगला बुज़ुर्ग निवासी असगर पुत्र अल्लाह बन्दा को मार डाला गया। दिन में ही लपेड़ा निवासी फरीद पुत्र दोस्त मुहम्मद, सलमान पुत्र अमीर हसन, गढ़ी फीरोज़ाबाद निवासी नज़र मुहम्मद पुत्र मूसा, लताफत पुत्र मुस्तफा की भी हत्या कर दी गई। इन घटनाओं के बाद फैलने वाली अफवाहों से एक बड़े दंगे की पृष्ठिभूमि तैयार हो गई। पंचायत से वापसी पर रास्ते में हथियारों के प्रदर्षन और नारेबाज़ी से कई स्थानों पर टकराव हुए और मुज़फ्फरनगर तथा शामली पूरी तरह दंगे की चपेट में आ गया। इसकी लपटें मेरठ और बाग़पत तक भी पहुँच गईं। करीब डेढ़ सौ गाँव मुसलमानों से खाली हो गए। उनके घरों को जला दिया गया। 7, अगस्त की रात से जो आगज़नी, हत्या, और बलात्कार की घटनाएँ हुईं उसे सही मायने में दंगा कहा ही नहीं जा सकता क्योंकि इसका शिकार वह गरीब मुसलमान मज़दूर हुए जो पीढि़यों से जाट किसानों के यहाँ मज़दूरी करते आ रहे थे। उनके पास अपनी खेती नहीं थी। व्यवसाय के नाम पर लोहारी, बढ़ईगीरी या नाई के काम करते थे और इसके लिए भी उन्हीं जाटों पर आश्रित थे। सामाजिक स्तर पर उनकी जाट किसानों के सामने सर उठाने की भी हैसियत नहीं थी। इस एकतरफा दंगें में नौजवान, बूढ़ों, बच्चों, महिलाओं की निर्मम हत्या की गई। महिलाओं और नाबालिग लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार की एक साथ इतनी घटनाएँ उत्तर प्रदेश में पहले कभी नहीं हुई। इन घटनाओं को अंजाम देने का जो तरीका इक्कीसवीं सदी के मानव ने अपनाया उसका कोई उदाहरण दुनिया के किसी प्रजाति के जानवरों के इतिहास में नहीं मिलता। बुज़ुर्ग दम्पत्ति को आरा मशीन से काट कर टुकड़े-टुकड़े कर दिया। महिलाओं और कम उम्र लड़कियों के साथ उनके परिजनों के सामने सामूहिक बलात्कार किया गया। दूध पीते बच्चे को गोद में लिए हुए महिला को बच्चे समेत जि़न्दा आग में जला दिया गया। जले हुए शवों को अलग करने का प्रयास जब विफल रहा तो दोनों को एक साथ ही दफन कर दिया गया। कितने ही लोगों की हत्या कर सबूत मिटाने के लिए लाशों को नहर में बहा दिया गया, जला दिया गया या खेतों में मिट्टी के नीचे दबा दिया गया।
 क्रमश:
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मसीहुद्दीन संजरी
 लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

सोमवार, 30 सितंबर 2013

मुसलमान, भारत के नागरिक नहीं, वोट बैंक

देषी-विदेषी कारपोरेट घरानों की हित-पोषक अर्थव्यवस्था स्थायी रूप से तभी चल सकती है जब राजनीति भी कारपोरेट घरानों की हित-पोषक बन जाए। नब्बे के दषक के षुरू में नई आर्थिक नीतियां लागू किए जाने के बाद से भारत की मुख्यधारा राजनीति का चरित्र कमोबेष कारपोरेट-सेवी बनता गया है। कारपोरेट पूंजीवाद के अलावा कोई अन्य विचारधारा और सिद्धांत वहां काम करते नजर नहीं आते। अलबत्ता, कारपोरेट पूंजीवाद की विचारधारा सांप्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद, वंषवाद, परिवारवाद, व्यक्तिवाद आदि को अपने आगोष में लेकर जीवन के हर क्षेत्र और तबके में तेजी से घुसपैठ बनाती जा रही है। बड़ी पूंजी और बड़ी टेक्नोलाॅजी से चलने वाला मीडिया इसमें सबसे बड़ी भूमिका निभा रहा है। पहले मिश्रित अर्थव्यवस्था और पिछले करीब 25 सालों में नवउदारवादी आर्थिक नीतियों का लाभ उठाने वाला ज्यादातर मध्यवर्ग, जिसे आजकल नागरिक समाज कहा जाता है और जिसके एक्टिविज्म की खासी चर्चा होती है, कारपोरेट पूंजीवाद का समर्थक बन गया है। ऐसे में, संविधान में प्रस्थापित लोकतंत्र, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों पर आधारित संविधान की विचारधारा भारत की राजनीति का निर्देष-बिंदु नहीं रह गई है। वह विष्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विष्व व्यापार संगठन और उनके ऊपर अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान के निर्देषों का पालन करती है। यह कारपोरेट पाॅलिटिक्स का दौर है, आम आदमी पार्टी (आप) के रूप में जिसकी एक नई बानगी सामने आई है।
आम आदमी पार्टी मुख्यधारा मीडिया में काफी छाई रहती है। लेकिन इसके चरित्र को लेकर गंभीर विष्लेषण, जो लघु पत्रिकाओं में ही संभव है, देखने में नहीं आता। हमने ‘युवा संवाद’ के अपने मासिक काॅलम ‘समय संवाद’ में इस पार्टी के चरित्र की कुछ पड़ताल की है। यह लेख उसी कड़ी में लिखा गया है। इस विषय पर लिखे गए पहले के लेखों की तरह यह हिंदी अथवा अंग्रेजी के किसी अखबार में प्रकाषित नहीं हो सकता था। अंग्रेजी के ‘दि हिंदू’ और हिंदी के ‘जनसत्ता’ मुख्यधारा मीडिया में कुछ अलग पहचान वाले अखबार हैं। लेकिन आम आदमी पार्टी के समर्थन में वे सबसे आगे नजर आते हैं। मुख्यधारा मीडिया के साथ आम आदमी पार्टी की गहरी यारी का कारण यही है कि दोनों का घराना - कारपोरेट पूंजीवाद - एक है।  
आम आदमी पार्टी बनाने और चलाने वाले इंडिया अंगेस्ट करप्षन (आईएसी) के नाम से बनी टीम के प्रमुख नेता थे। आईएसी में सांप्रदायिक, प्रतिक्रियावादी, यथास्थितिवादी, स्त्री-विरोधी, धर्म व अध्यात्म का धंधा करने, अंधविष्वास फैलाने और एनजीओ चलाने वालों की खासी तादाद थी। विष्व बैंक से पुरस्कार प्राप्त अन्ना हजारे इस टीम के प्रमुख बनाए गए, जिन्होंने अपने गांव को एनजीओ की मार्फत ‘स्वर्ग’ बना दिया था। उन्हें प्रमुख बनाने वाले अरविंद केजरीवाल भारत से राजनीतिक एक्टिविज्म को खत्म करने वाले प्रमुख एनजीओ सरगनाओं में से एक थे। दोनों में जो अंतर दिखाई देता है, वह इसलिए कि अन्ना हजारे 70 के दषक की उपज हैं और केजरीवाल सीधे नवउदारवादी दौर की संतान हैं। आईएसी के तत्वावधान में षुरू हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के संचालन में आरएसएस ने और फैलाने में मुख्यधारा मीडिया ने केंद्रीय भूमिका निभाई। भारत के सभी कारपोरेट घराने और उनकी संस्थाएं उसके पूर्ण समर्थन में थीं। इस आंदोलन के कर्ताओं के लिए भ्रष्टाचार ऐसी ताली है जो एक हाथ से बजती है; जिसमें नेताओं को घूस देकर राष्ट्र की संपत्ति को लूटने वाले कारपोरेट घरानों और कारपोरेट पूंजीवाद के सेफ्टी वाल्व एनजीओ को सच्चा सदाचारी माना जाता है। ‘भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की राख से पैदा’ हुई आम आदमी पार्टी का चरित्र आईएसी और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के चरित्र से अलग नहीं हो सकता। अतः उसे भारत में पिछले 25 सालों से बन रही कारपोरेट पाॅलिटिक्स की एक नई बानगी के रूप में देखा जाना चाहिए।
नवउदारवाद की षुरूआत के साथ उसका प्रतिरोध भी षुरू हो गया था। नवउदारवाद के बरक्स वैकल्पिक राजनीति के निर्माण की भी षुरूआत हो गई थी। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और आम आदमी पार्टी ने वैकल्पिक राजनीति के प्रयासों को भारी नुकसान पहुंचाया है। इस मायने में वह मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियों से ज्यादा खतरनाक है। नवउदारवाद की अनुगामी मुख्यधारा राजनीति वैकल्पिक राजनीति को परास्त कर देती है। लेकिन इस पार्टी ने नवउदारवाद के विकल्प की राजनीति को खत्म करने का बीड़ा उठाया हुआ है। उसने सबसे गहरी चोट वैकल्पिक राजनीति की किषन पटनायक द्वारा प्रवर्तित धारा को दी है। इस बार, अपने को किषन पटनायक की धारा का समाजवादी कहने वालों ने विरासत के प्रति द्रोह किया है। लोकतांत्रिक प्रगतिषील खेमे से केवल कुछ समाजवादी ही इस पार्टी के स्थापनाकार और पैरोकार बने हैं। 
थोड़ा पीछे लौटें तो पाएंगे कि इस पार्टी के प्रमुख लोगों में कुछ कांग्रेस और कुछ भाजपा-आरएसएस का काम करते थे। नवउदारवाद और कारपोरेट घरानों से ऐसे लोगों का कोई विरोध हो ही नहीं सकता। एक सूत्र में कहें तो ‘आम आदमी पार्टी के नेता कांग्रेस के मौसेरे, भाजपा के चचेरे और कारपोरेट के सगे भाई हैं।’ कांग्रेस का काम करने वालों के बीच सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार समिति (नैक) में जगह पाने की प्रतिस्पद्र्धा चलती रहती है। जानकार बताते हैं कि केजरीवाल को नैक में और प्रषांत भूषण को केबिनेट में ससम्मान रख लिया जाता तो यह सब बखेड़ा खड़ा नहीं होता। षांति भूषण कांग्रेस की इस ‘नाइंसाफी’ को लेकर खासे आक्रोष में रहते थे कि चिदंबरम, सिबल, सिंघवी जैसे वकीलों को बड़े ओहदे देने वाली कांग्रेस ने उनके बड़े वकील बेटे को बाहर रखा हुआ है। जब से आम आदमी पार्टी बनी है, वे चर-अचर से  कहते पाए जाते हैं कि पहले दिल्ली और 2014 में देष फतह कर लिया जाएगा! यानी कांग्रेस से उनकी अनदेखी करने का बदला ले लिया जाएगा।
आज तक देष में जितनी राजनीतिक पार्टियां बनी हैं, उनमें किसी का भी एकमात्र लक्ष्य आम आदमी पार्टी की तरह तत्काल और येन-केन-प्रकारेण चुनाव लूटना नहीं रहा है। केवल चुनाव लड़ने और जीतने को ही राजनीति मानने वाली पार्टी, असफलता और सफलता दोनों में, मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियों से ज्यादा नीचे फिसल सकती है। पिछले दिनों हमें उत्तराखंड के गांव कांडीखाल में युवाओं के लिए आयोजित राष्ट्र सेवा दल के षिविर में जाने का अवसर मिला। वहां आए अंग्रेजी साप्ताहिक ‘जनता’ के संपादक डाॅ. जीजी पारीख से हमने पूछा कि महाराष्ट्र में जो समाजवादी साथी आप में षामिल हुए हैं उनका उत्साह कैसा है? डाॅ. पारीख ने बताया कि वे सभी दिल्ली विधानसभा के चुनाव पर आंख गड़ाए हुए हैं। अगर दिल्ली में आप की सरकार बन जाती है तो वे पार्टी में रहेंगे, अन्यथा कुछ और सोचेंगे। यह बच्चा भी बता सकता है कि दिल्ली में कांग्रेस-भाजपा के अलावा किसी अन्य पार्टी की सरकार नहीं बन सकती। अलबत्ता, दोनों को बहुमत में कुछ सीटें कम पड़ जाएं और आप को कांग्रेस-भाजपा के नक्षेकदम पर चलते हुए कुछ सीटें मिल जाएं तो उसके नेता दोनों के साथ जा सकते हैं।
कारपोरेट पाॅलिटिक्स की नई बानगी पेष करने वाली इस पार्टी की कुछ हाल की गतिविधियों पर गौर करें तो उसके चरित्र को अच्छी तरह समझा जा सकता है। भारत की ज्यादातर राजनीतिक पार्टियां मुसलमानों को वोट बैंक मानती हैं। आम आदमी पार्टी के नेताओं की नजर में भी मुसलमान, भारत के नागरिक नहीं, वोट बैंक हैं। पिछले दिनों मीडिया में खबर थी कि कुछ खास मुसलमानों को आप में षामिल किया गया। वर्तमान दौर में कह सकते हैं, ‘मीडिया मेहरबान तो गधा पहलवान’। जैसे मोदी का प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में अवतार मीडिया की देन है (आरएसएस की उतनी नहीं), उसी तरह केजरीवाल भी मीडिया की रचना है। मीडिया आम आदमी पार्टी की खबरें ही नहीं देता, बल्कि उस रूप में देता है जैसा पार्टी का मीडिया प्रकोष्ठ चाहता है। आप के नेताओं ने चाहा कि खबर इस तरह प्रसारित हो कि लोगों में यह संदेष जाए कि देष के सबसे बड़े धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय मुसलमानों में आम आदमी पार्टी की घुसपैठ हो गई है।
यहां ‘खास मुसलमान’ वाली बात पर भी गौर करने की जरूरत है। राजनीतिक पार्टियां खास मुसलमानों की मार्फत पूरे मुस्लिम समुदाय को वोट बैंक बनाती हैं। खास मुसलमान केवल सेकुलर पार्टियों को ही नहीं, कुछ न कुछ भाजपा को भी उपलब्ध हो जाते हैं। भारत की राजनीति पिछले दो दषकों में अमेरिका-इजरायल की धुरी से बंध गई है तो उसमें इन खास मुसलमानों की भी खासी भूमिका है। आप में षामिल होने वाले खास मुसलमानों को लगा होगा कि सत्ता में आने पर पार्टी उन्हें बड़े ओहदे देगी। आजकल इसे ही धर्मनिरपेक्षता कहा जाता है।    
आप में भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा जैसी पार्टियों के नेताओं के षामिल होने की खबरें मीडिया में छपती हैं। अभी इन पार्टियों की छंटोड़ (काने-गले होने के चलते ढेर से अलग निकाल दिए जाने वाले फल-सब्जियां) आप में षामिल हो रही है। चुनाव नजदीक आते-आते टिकट न मिलने पर असंतुष्ट होने वाले कुछ स्थापित नेता भी आप में षामिल हो सकते हैं। इस राजनीति की तार्किक परिणति झुग्गियों, पुनर्वास काॅलोनियों और गांवों में षराब और नोट बांटने में होगी। आप का कांग्रेस-भाजपा को टक्कर देने लायक धनबल चुनाव आने तक बना रहेगा तो षराब व नोट बांटने वाले स्वयं यह काम संभाल लेंगे। विचारधारा और सिद्धांत विहीन राजनीति की मंजिल सत्ता की अंधी गली के अलावा कुछ नहीं हो सकती।  
आजकल आप द्वारा किए जाने वाले खर्च और उसे मिलने वाले धन की खासी चर्चा सुनने को मिलती है। यह भी प्रचारित किया जा रहा है प्रत्येक उम्मीदवार को चुनाव खर्च के लिए पार्टी की ओर से कितने लाख रुपये दिए जाएंगे। तीस-पैंतीस लाख का आंकड़ा बताया जाता है जो वास्तविकता में एक करोड़ पहुंच ही जाएगा। उम्मीदवारों के लिए यह बहुत बड़ा लालच है। आप द्वारा खेला जाने वाला पैसे का यह खेल आम चुनाव आने तक किस कदर बढ़ जाएगा, इसका अंदाजा अभी से लगाया जा सकता है। आप की अभी तक की राजनीतिक गतिविधियों से यह स्पष्ट हो गया है कि उसके नेता, अन्य मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियों की तरह, राजनीति को सबसे पहले पैसे का खेल मानते हैं। यानी वे गरीब देष में मंहगे चुनावों के हामी हैं, जिन्हें भविष्य में कारपोरेट राजनीति के रास्ते पर और मंहगे होते जाना है।
आप पार्टी के प्रमुख नेताओं को किस स्रोत से कितना विदेषी धन मिलता है, इसका कुछ ब्यौरा भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान ‘समयांतर’ में प्रकाषित हुआ था। अब तो काम काफी बढ़ गया है। धन की बाढ़ भी चाहिए। दरअसल, आप नेताओं की अभी तक की कुल योग्यता पैसा बनाने और झींटने की रही है। आगे फोर्ड फाउंडेषन जैसी नवसाम्राज्यवाद की पुरोधा संस्थाओं और कारपोरेट घरानों से ज्यादा से ज्यादा धन झींटने में इस योग्यता का उत्कर्ष देखने को मिलेगा। देष-विदेष के लोग खुद पैसा दे रहे हैं, यह कोई बचाव नहीं है। सब जानते हैं, पैसा ही पैसे को खींचता है।
मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियों की तरह आप का भी किसानों, आदिवासियों, दलितों, मजदूरों, कारीगरों, छोटे दुकानदारों/व्यापारियों, छात्रों, बेरोजगारों से सरोकार नहीं है। यह मध्यवर्ग द्वारा मध्यवर्ग की मध्यवर्ग के लिए बनी पार्टी है। ऐसा मध्यवर्ग जो नवसाम्राज्यवादी लूट में हिस्सा पाता है और अपने को नैतिक भी जताना चाहता है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में वह इतने बड़े पैमाने पर यह जताने के लिए कूदा था कि पिछले 25 सालों से जो विस्थापन और आत्महत्याओं का दौर उसकी आंखों के सामने चला, उसमें सहभागिता के बावजूद उसकी नैतिक चेतना मरी नहीं है। मध्यवर्ग द्वारा खड़ा किया गया वह तमाषा इतना जबरदस्त था कि कई जेनुइन विचारक व जनांदोलनकारी भी उसकी चपेट में आ गए। 
हाल में आप पार्टी के एक नेता को यूजीसी की समिति से निकाले जाने का प्रकरण मीडिया में काफी चर्चित रहा। भारत में कुकुरमुत्तों की तरह निजी विष्वविद्यालय खुल गए हैं। खुद देष के राष्ट्रपति प्राईवेट विष्वविद्यालयों का विज्ञापन करते हैं। विदेषी विष्वविद्यालयों को लाने की पूरी तैयारी है। भारत के राज्य और केंद्रीय विष्वविद्यालयों को बरबाद करने की मुहिम सरकारों ने छेड़ी हुई है। इसका नवीनतम उदाहरण दिल्ली विष्वविद्यालय में चार साला बीए प्रोग्राम (एफवाईयूपी) को थोपना है। ऐसे में सरकार की समितियों से बाहर आकर षिक्षा पर होने वाले नवउदारवादी हमले का डट कर मुकाबला करने की जरूरत है। कई संगठन और व्यक्ति पूरे देष में यह काम कर रहे हैं। आप नेता को कारण बताओ नोटिस मिलने पर बिना जवाब दिए यूजीसी की समिति की सदस्यता से इस्तीफा देना चाहिए था और अपनी पार्टी स्तर पर षिक्षा के निजीकरण व बाजारीकरण के विरोध में जुट जाना चाहिए था।
लेकिन उन्होंने इसे मीडिया इवेंट बना दिया और सवाल उठाया कि अगर वे कांग्रेस की सदस्यता लेते तो क्या सरकार तब भी उनकी यूजीसी समिति की सदस्यता पर सवाल उठाती? हालांकि उन्हें सरकार से पूछना ही था तो यह पूछते कि समाजवादी जन परिषद (सजप) का सदस्य रहते वे समिति में रह सकते थे, तो आप पार्टी का सदस्य रहते क्यों नहीं रह सकते? समिति का सदस्य बनाए जाते समय वे जिस राजनीतिक पार्टी के सदस्य थे, उसका नाम छिपा ले जाने का यही अर्थ हो सकता है कि वे करीब दो दषक पुरानी सजप की सदस्यता को गंभीरता से नहीं लेते थे। दरअसल, सरकारी संस्थाओं की सदस्यता, सभी जानते हैं, सरकारी नजदीकियों से मिलती है। विद्वता हमेषा उसकी कसौटी नहीं होती। खुद विद्वता की कसौटी आजकल एक-दूसरे को ऊपर उठाना और नीचे गिराना हो गई है। अगर किसी विद्वान की किसी समिति की सदस्यता चली जाती है तो उसमें बहुत परेषान होने की बात नहीं है। परेषानी की बात यह है कि विभिन्न समितियों में विद्वानों की उपस्थिति के बावजूद सरकारें निजीकरण को हरी झंडी दिखा रही हैं। ऐसे में कोई सरोकारधर्मी विद्वान किसी समिति में कैसे रह सकता है?    
कहा जाता है कि अपने पर रीझे रहने वाले लोग खुद माला बनाते हैं और खुद ही अपने गले में डाल लेते हैं। आप के नेता, जो पहले अलग-अलग चैनलों और सरकारों के लिए सर्वे करते थे, अपने लिए सर्वे करके जीत के दावे कर रहे हैं। राजनीतिक षालीनता की सारी सीमाएं उलांघते हुए विरोधी पार्टियों के नेताओं को बेईमान और अपने को ईमानदार प्रचारित कर रहे हैं। उन्होंने विरोधी पार्टियों के चुनाव चिन्हों को भी विरूपित किया है, जिसकी षिकायत एक पार्टी ने चुनाव आयोग से की है। इतना ही नहीं, राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को उन्होंने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति का जरिया बना लिया है। किराए के कार्यर्ता तिरंगा लहराते हैं और फेंक कर चल देते हैं। दरअसल, ये आत्ममुग्ध लोग हैं। आत्ममुग्धता - ‘हम सबसे अच्छे हैं’ - से ग्रस्त लोगों का मनोविष्लेषणात्मक अध्ययन बड़ा रोचक हो सकता है। आत्ममुग्ध लोग अपने होने को चमत्कार की तरह लेते हैं, और मानते हैं कि उनका किया हर पाप भी पवित्र होता है। वे अपने गुणग्राहक आप होते हैं और पतन की अतल गहराइयों में गिरने के बावजूद उदात्तता की भंगिमा बनाए रहते हैं। दुनिया की सारी दूध-मलाई मारने के बावजूद वे अपने को सारी दुनिया द्वारा सताया हुआ जताते हैं। दुनिया और भारत के साहित्य में आत्ममुग्ध (नारसिसिस्ट) नायकों की लंबी फेहरिस्त मिलती है। वास्तविकता में वे कई जटिल कारणों से मानसिक रोगी  होते हैं, लेकिन भ्रम समस्त रोगों का डाॅक्टर होने का पालते और फैलाते हैं। आईएसी, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और आप में आत्मव्यामोहित ‘नायकों’ की फेहरिस्त देखी जा सकती है। हम परिघटना पर हम केवल इतना कहना चाहते हैं कि तानाषाही और फासीवाद का रास्ता यहीं से षुरू होता है। मीडिया की मार्फत अफवाहबाजी का जो सिलसिला इन महाषयों ने षुरू किया, नरेंद्र मोदी उसीमें से निकल कर आया है।     
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान गांधी का काफी नाम लिया गया। अन्ना हजारे को, जिन्होंने जंतर-मंतर से पहली प्रषंसा हजारों नागरिकों का राज्य-प्रायोजित नरसंहार करने वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की की, लगातार गांधीवादी कहा और लिखा जाता रहा। अरविंद केजरीवाल अपने को उन्हीं का षिष्य कहते हैं। इसीलिए ‘गुजरात का षेर’ से ‘भारत माता का षेर’ बने नरेंद्र मोदी के खिलाफ आज तक कुछ नहीं लिखा या बोला है। कष्मीर पर दिए गए बयान की प्रतिक्रिया में प्रषांत भूषण पर हमला अन्ना हजारे और रामदेव के भक्तों ने ही किया था। अफजल गुरु के पार्थिव षरीर को श्रीनगर से आई महिलाओं को सौंपने की मांग को लेकर प्रैस क्लब में निष्चित की गई प्रैस वार्ता नहीं होने देने वाले हुड़दंगियों में आप के कार्यकर्ता भी षामिल थे। आप में प्रतिक्रियावादी लोगों की भरमार है। आप के नेताओं को चुनाव जीतना है तो उन्हें पुचकार कर रखना होगा।
गांधी साधन और साध्य को अलग करके नहीं देखते थे। इस पार्टी के नेता चुनाव जीतने के लिए कुछ भी करने की नीयत से परिचालित हैं। वास्तव में इस पार्टी के निर्माण और लक्ष्य दोनों में कपट समाया हुआ है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान राजनीति और नेताओं के प्रति गहरी घृणा का प्रचार किया गया। हालांकि नीयत पहले से ही राजनीतिक पार्टी बनाने की थी, जो अन्ना हजारे की अनिच्छा के बावजूद बना ली गई। यह भी सुना गया कि केजरीवाल रामलीला मैदान में अन्ना का अनषन खत्म करने के पक्ष में नहीं थे। क्योंकि अनषन पर अन्ना की मृत्यु हो जाने की स्थिति में केजरीवाल अन्ना की जगह लेकर राजनीति की उड़ान भर सकते थे। वे पहले ही डरे हुए थे कि बाबा रामदेव राजनीति की दौड़ में आगे न निकल जाएं। इस सारे दंद-फंद का लक्ष्य भी कपट से भरा था - नवउदारवाद की मार से बदहाल गरीब भारत की आबादी को उससे लाभान्वित होने वाले अमीर भारत के पक्ष में हांका जा सके। 
आप के प्रचार की षैली कांग्रेस जैसी है। जिस तरह पूरी कांग्रेस राहुल गांधी की नेतागीरी जमाने के लिए कारिंदे की भूमिका निभाती है, आप के नेता-कार्यकर्ता केजरीवाल के कारिंदे बने हुए हैं। जिस पार्टी के षुरू में ही इस कदर व्यक्तिवाद हावी हो, सत्ता मिलने पर वह और मजबूत ही होगा। आप पार्टी में व्यक्तिवाद के चलते एक टूट हो चुकी है। पार्टी आगे चली तो और टूटें भी हो सकती हैं। व्यक्तिवाद पूंजीवादी मूल्य है। भारत की राजनीति में यह सामंतवाद के साथ मिलकर परिवारवाद, वंषवाद, क्षेत्रवाद जैसे गुल खिलता है। जैसे बड़ी पार्टियां अंधाधुंध प्रचार करके अपने नेता के नाम की पट्टी मतदाताओं की आंखों पर बांध देना चाहती हैं, वही रास्ता आप पार्टी के रणनीतिकारों ने अपनाया है। पोस्टर, बैनर, होर्डिंग के अलावा मोबाइल और नेट पर एक ही आदमी के नाम का प्रचार किया जा रहा है। वह भी सीधे मुख्यमंत्री के रूप में। आप घर-दफ्तर में बैठे हैं, किसी कार्यक्रम में षिरकत कर रहे हैं, गाड़ी चला रहे हैं, आपके मोबाइल पर लिखित या रिकार्ड की गई आवाज में अन्ना हजारे के षिष्य अरविंद केजरीवाल का मैसेज आ जाएगा। अंधाधुंध प्रचार अंधाधुंध धन के बिना नहीं हो सकता। यानी ये ‘अच्छे’ और ‘ईमानदार’ लोग सीख दे रहे हैं कि राजनीति करनी है तो कांग्रेस और भाजपा से सीख लो! लोकतंत्र में प्रचार का यह तरीका फासिस्ट रुझान लिए है, जिसमें केवल एक नेता की छवि मतदाताओं के ऊपर दिन-रात थोपी जाती है।
कहा जाता है सावन के अंधे को सब हरा हरा-हरा नजर आता है। सत्ता के अंधे आप के नेताओं का भी यही हाल है। वे हर इंसान और घटना को चुनाव के चष्मे से देखते हैं। दुर्गाषक्ति नागपाल का निलंबन हुआ तो बिना उनसे मिले उन्हें आप से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव कर दिया। पार्टी के पंजीकरण से पहले ही दिल्ली विधानसभा की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी गई। तभी से कहीं मुसलमान उम्मीदवार तलाषा जा रहा है, कहीं दलित, कहीं जाट, कहीं पंजाबी, कहीं सिख। दान-दाता तो तलाषे जा ही रहे हैं। दिल्ली में आप से चुनाव लड़ने के लिए कैसे-कैसे लोगों को किस-किस तरह से एप्रोच किया गया है और किया जा रहा है, उसकी पूरी कहानी छप जाए तो वह एक अच्छा राजनीतिक प्रहसन होगा। 
हमें एक साथी ने बताया कि प्रकाष झा की फिल्म ‘सत्याग्रह’ में आम आदमी पार्टी की टोपी, जिस पर ‘मैं आम आदमी हूं’ लिखा होता है, पहने लोग दिखाए गए हैं। यह भी पता चला कि थियेटर के बाहर आप के कार्यकर्ता टोपी लगा कर खड़े थे। हो सकता है यह दिखाने के लिए केजरीवाल और प्रकाष झा के बीच कुछ धन का लेन-देन हुआ हो। या प्रकाष झा बहुत-से भले लोगों की तरह कायल हों कि ‘मैं आम आदमी हूं’ की टोपी पहनने वाले लोग वाकई आम आदमी की भलाई का काम करने वाले हैं। जिस तरह से आप के नेता सब जगह टोपी का प्रदर्षन करते हैं, वह विचारणीय है। राजनीतिक पार्टी के विषेष कार्यक्रमों में टोपी लगाना समझ में आता है। हालांकि, तब भी टोपी न लगाई जाए तो उससे कुछ फर्क नहीं पड़ना चाहिए। क्योंकि टोपी जिस विचार का प्रतीक है, उसके प्रति आंतरिक दृढ़ता है तो टोपी यानी दिखावे की जरूरत नहीं रह जाती। डाॅ. लोहिया पार्टी कार्यकर्ताओं के लाल टोपी पहनने के खिलाफ थे। उनका मानना था कि क्रांति का विचार नेता-कार्यकर्ता के मन में होना चाहिए। दिखावे से षुरू होने वाली राजनीति का अंत अंततः पूर्ण पाखंड में होगा।
लाखों-करोड़ों में खेलने वाले लोग जब ‘मैं आम आदमी हूं’ की टोपी लगाते हैं, तो उसका पहला और सीधा अर्थ गरीबों का उपहास उड़ाना है। ‘आम आदमी’ की अवधारणा पर थोड़ा गंभीरता से सोचने की जरूरत है। आजादी के संघर्ष के दौर में और आजादी के बाद आम आदमी को लेकर राजनीतिक और बौद्धिक हलकों में काफी चर्चा रही है, जिसका साहित्य और कला की बहसों पर भी असर पड़ा है। साहित्य में आम आदमी की पक्षधरता के प्रगतिवादियों के अतिषय आग्रह से खीज कर एक बार हिंदी के ‘व्यक्तिवादी’ साहित्यकार अज्ञेय ने कहा कि ‘आम आदमी आम आदमी ... आम आदमी क्या होता है?’ उनका तर्क था कि साहित्यकार के लिए सभी लोग विषिष्ट होते हैं। राजनीति से लेकर साहित्य तक जब आम आदमी की जोरों पर चर्चा षुरू हुई थी, उसी वक्त आम आदमी का अर्थ भी तय हो गया था। उस अर्थ में गांधी का आखिरी आदमी कहीं नहीं था। आम आदमी की पक्षधरता और महत्ता की जो बातें हुईं, वे षुरू से ही ‘मेहनत-मजदूरी’ करने वाले गरीब लोगों के लिए नहीं थीं।
मध्यवर्ग ने आम आदमी की अवधारणा में अपने को ही फिट करके उसकी वकालत और मजबूती में सारे प्रयास किए हैं और आज भी वही करता है। आम आदमी मध्यवर्गीय अवधारणा है। उसका गरीब अथवा गरीबी से संबंध हो ही नहीं सकता था। क्योंकि मध्यवर्ग को अपने केंद्र में लेकर चलने वाली आधुनिक औद्योगिक सभ्यता का यह वायदा रहा है कि वह किसी को भी गरीब नहीं रहने देगी। दूसरे षब्दों में, जो गरीब हैं, उन्हें दुनिया में नहीं होना चाहिए। भारत का यह ‘महान’ मध्यवर्ग, जो नवउदारवाद के पिछले 25 सालों में खूब मुटा गया है, आम आदमी के नाम पर अपनी स्थिति और मजबूत करना चाहता है। वह सब कुछ अपने लिए चाहता हैं, लेकिन गरीबों का नेता होने की अपनी भूमिका को छोड़ना नहीं चाहता। इस पाखंड ने भारत की गरीब और आधुनिकता में पिछड़ी मेहनतकष जनता को अपार जिल्लत और दुख दिया है। भारत का मध्यवर्ग मुख्यतः अगड़ी सवर्ण जातियों से बनता है। यही कारण है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और उससे निकली पार्टी का वर्णाधार अगड़ी सवर्ण जातियां हैं, जिनका साथ दबंग पिछड़ी जातियां देती हैं। इसी आधार पर आप के नेता युवकों का आह्वान करते हैं कि वे जातिवादी नेताओं को छोड़ कर आगे आएं और मध्यवर्ग नाम की नई जाति में षामिल हों। यहां उनकी जाति भी ऊंची होगी और वर्ग-स्वार्थ भी बराबर सधेगा।
यह देख कर काफी हैरानी होती है कि कई साथी आम आदमी पार्टी से आषाएं पाले हैं। उन्हें कांग्रेस और भाजपा के बाद आप ही नजर आती है। ऐसा भी नहीं है कि उनमें सभी ‘आम आदमी’ की तरह देष के लोकतांत्रिक वामपंथी आंदोलन और पार्टियों से अनभिज्ञ हों। उनमें षिक्षक और पत्रकार भी षामिल हैं। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, जिसे यही लोग चला रहे थे, की पूरी हवा निकल जाने के बावजूद आप पार्टी के जीतने और उससे कुछ होने की उम्मीद रखने वालों के बारे में यही कहा जा सकता है कि ज्यादातर नागरिक समाज में राजनीतिक मानस का लोप हो गया है। यही कारण है कि कारपोरेट पूंजीवाद की पक्षधर राजनीति की जगह तेजी से बढ़ती जा रही है और उसका विरोध करने वाली पार्टियों को पैर टेकने तक की जगह मुष्किल से मिल पाती है।   
   -प्रेम सिंह
         

सोमवार, 10 जून 2013

मौलाना आजाद और शिक्षा

सच्चर समिति ने मुसलमानों के  शैक्षणिक पिछड़ेपन का अत्यंत गहन  अध्ययन किया है। समिति ने यह पाया है कि मुसलमान, शिक्षा के मामले में लगभग हर स्तर पर पिछड़े हैं। उनकी साक्षरता दर, राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के पहले स्कूल छोड़ने वाले मुसलमान बच्चों का प्रतिशत काफी अधिक है और इसलिए, स्नातक व स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में भर्ती होने वाले मुसलमान विद्यार्थियों की संख्या, उनकी आबादी के अनुपात में बहुत कम है। मुसलमानों के इस शैक्षणिक पिछड़ेपन के लिए कई अलग.अलग कारणों को जिम्मेदार बताया जा जाता है। मूलतः, दो प्रकार की बातें कही जाती हैं। पहली यह कि इस स्थिति के लिए इस्लाम जिम्मेदार है क्योंकि वह धर्मनिरपेक्ष शिक्षा के खिलाफ है। कुछ अन्य लोग, इस्लाम को दोषी ठहराने की बजाय, मुसलमानों को कटघरे में खड़ा करते हैं। उनका कहना है कि मुसलमानों की अपने बच्चों को स्कूल भेजने में रूचि ही नहीं है। दूसरे कारण को सही मानने वाले लोग हमारी शिक्षा व्यवस्था का अध्ययन और विवेचन कर यह पता लगाना चाहते हैं कि अल्पसंख्यकों, दलितों व आदिवासियों को इस व्यवस्था में पर्याप्त तवज्जो क्यों नहीं मिल रही है। इसके विपरीत, पहले कारण को सही मानने वालों में से बहुसंख्यक या तो साम्प्रदायिक सोच रखते हैं या फिर बिना सोच.समझे, जल्दबाजी में अपनी राय बनाने के आदि हैं। दूसरे कारण में विश्वास रखने वालों में शिक्षाविदों की खासी संख्या है और विशेषकर ऐसे शिक्षाविदों की, जो शैक्षणिक पिछड़ेपन की समस्या से जूझ रहे हैं।
मुसलमानों में शैक्षणिक पिछड़ेपन के कारण
मुसलमानों में शैक्षणिक पिछड़ेपन के पीछे सबसे बड़ा कारण है गरीबी। मुसलमानों में भाषाई और क्षेत्रीय आधारों पर व जाति.बिरादरियों के कारण बहुत विविधता है। वे मुस्लिम बिरादरियां, जिनकी अपेक्षाकृत बेहतर आमदनी है, शैक्षणिक रूप से भी आगे हैं। उदाहरणार्थ बोहरा, खोजा और मेमनय मेहतरों, बागवानों और तेलियों से शिक्षा के मामले में कहीं आगे हैं। अंसारी और कुरैशी जैसी बिरादरियां भी अपने बच्चों को शिक्षा दिलवाने में रूचि ले रही हैं और उनके कई सदस्य, व्यावासायिक पाठ्यक्रमों में भी दाखिला ले रहे हैं। मुसलमानों में शिक्षा की प्यास और उसके महत्व का अहसास, बाबरी ध्वंस और उसके बाद हुए दंगों के समय से तेजी से बढ़ा है। शिक्षा को एक ऐसी कुंजी के रूप में देखा जा रहा है जो आपको इस तरह की सुरक्षित नौकरियां और रोजगार दिलवा सकती है, जो दंगों के दौरान नष्ट नहीं होती। दसवीं और बारहवीं कक्षाओं की परीक्षाओं में मुस्लिम लड़कियां मेरिट लिस्ट में स्थान पा रही हैं। हाल में एक तथ्यान्वेषण मिशन के दौरान जब हम एक कॉन्वेंट स्कूल में पहुंचे तो हमने देखा कि घरेलू कामकाज कर अपनी जीविका चलाने वाली एक मुस्लिम महिला, स्कूल के प्राचार्य से बहस में जुटी है। प्रिंसिपल का कहना था कि स्कूल की फीस इतनी अधिक है कि वह उसे चुका न सकेगी परन्तु महिला का तर्क था कि उसे चाहे एक वक्त भूखा ही क्यों न रहना पड़े या और घरों में काम क्यों ना करना पड़े, परन्तु वह अपने बच्चे को उसी स्कूल में पढ़ायेगी।
गरीब मुस्लिम परिवारों को, आमदनी की खातिर, अपने छोटे बच्चों को काम.धंधों में लगा देना पड़ता है। ज़रदोसी, कालीन, चूड़ियां और कई अन्य उद्योगों में काम करने वाले बाल श्रमिकों में मुसलमान बच्चों की संख्या खासी है। कई मुस्लिम बच्चों का कौशल का स्तर काफी ऊँचा होता है परन्तु किसी औपचारिक प्रशिक्षण व प्रमाणपत्र के अभाव मेंए उन्हें अच्छी आमदनी वाले काम नहीं मिल पाते। कम आय का असर अगली पीढ़ी पर भी पड़ता है। एक पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी के लिए आय के कोई स्थायी स्त्रोत नहीं छोड़ जाती और नतीजे में गरीबी का दुष्चक्र चलता रहता है। साम्प्रदायिक दंगों के दौरान अपनी कड़ी मेहनत से जुटाई गई थोड़ी.बहुत संपत्ति भी मुस्लिम परिवार खो बैठते हैं। उन्हें न पर्याप्त मुआवजा मिलता है और ना ही उनका पुनर्वास होता है। मुसलमानों के छोटे से मध्यम वर्ग में से भी कई परिवार निम्न वर्ग में खिसक गये हैं क्योंकि दंगों में उनके छोटे.मोटे व्यवसाय नष्ट हो गए। लगभग 75 से 80 प्रतिशत मुसलमान, शारीरिक श्रम या हस्तकौशल से अपनी आजीविका कमा रहे हैं।
अक्सर मुसलमान अपने ही मोहल्लों में रहते हैं, जो शहरों या गांव के बाहरी इलाकों में बसाये जाते हैं। इन मोहल्लों में सड़क, पानी व बिजली की सुविधाओं और बैंकिंग व शैक्षणिक संस्थाओं का अभाव रहता है। चूँकि ऐसे मोहल्लों में अक्सर स्कूल नहीं होते इसलिए बच्चों को दूर के स्कूलों में पढ़ने जाना पड़ता है। इससे शिक्षा का खर्च बढ़ जाता है। दूर के स्कूलों में बच्चों, विशेषकर लड़कियों, को भेजने से मां.बाप डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि साम्प्रदायिक हिंसा भड़कने की स्थिति में उनके बच्चों को नुकसान पहंुचाया जा सकता है। यही कारण है कि मुस्लिम अभिभावक अपने बच्चों को पढ़ाई पूरी होने से पहले ही स्कूल से निकाल लेते हैं। सच्चर समिति की रपट के अनुसार, किसी इलाके की आबादी में मुसलमानों का अनुपात जितना ज्यादा होता है, उस इलाके में मूलभूत सुविधाओं की उतनी ही कमी होती है।
एक अन्य कारण है मुस्लिम बच्चों के प्रति स्कूल प्रबंधनों का भेदभावपूर्ण रवैया। हमारे दिमाग में भी पूर्वाग्रह होते हैं। हम में से कई को लगता है कि मुस्लिम बच्चों को उर्दू माध्यम से पढ़ना चाहिए भले ही उर्दू उनकी मातृभाषा न हो। यह मानकर चला जाता है कि वे पढ़ाई.लिखाई में फिसड्डी होंगे। इसके अलावा, स्कूलों का अजनबी वातावरण, वहां सरस्वती वंदनाए गीता की पढ़ाई, सूर्य नमस्कार और इसी तरह की अन्य गतिविधियों के कारण भी मुस्लिम बच्चे अपनी शिक्षा जारी नहीं रखते।
मुसलमानों के शैक्षणिक पिछड़ेपन का एक अन्य कारण है राजनैतिक ढांचे में उनका कम प्रतिनिधित्व। अधिकांश प्रजातांत्रिक, राजनैतिक संस्थाओं में उनकी उपस्थिति, उनकी आबादी के अनुपात के एक.तिहाई से भी कम है। जरूरत पड़ने पर अभिभावकों को कोई ऐसा व्यक्ति नजर नहीं आता जिससे वे कोई जानकारी हासिल कर सकें या प्रमाणपत्र आदि प्राप्त कर सकें। मुस्लिम प्रबंधन वाले अच्छे स्कूल बहुत कम हैं। कई ऐसे मुस्लिम ट्रस्ट हैं जो शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना करना चाहते हैं परन्तु सरकारें अक्सर उनकी मदद नहीं करतीं। उन्हें जमीन नही दी जाती, उन्हें अनुदान नहीं मिलता और यहां तक कि उन्हें मान्यता देने में भी आनाकानी की जाती है।
राजनैतिक नेतृत्व में मुसलमानों की संख्या कम तो है हीए उनके नेताओं की सोच के कारण भी कई समस्याएं उभर रही हैं। समुदाय का राजनैतिक नेतृत्व अक्सर उच्च जाति के धर्मपरिवर्तित मुसलमानों, जिन्हें अशरफ कहा जाता है, के हितों की रक्षा करता है। यह नेतृत्व केवल पहचान से जुड़े मुद्दे उछालता रहता है और कुरान की चहारदीवारी में रहते हुए भीए शरीयत कानूनों में किसी प्रकार के बदलाव की  मुखालिफत करता है। सत्ताधारी वर्ग भी यह चाहता है कि शरीयत कानूनों और इस्लामिक विधिशास्त्र की मध्यकालीन विवेचना को ही स्वीकृति मिली रहे। यह विवेचना न केवल महिलाओं के साथ भेदभाव करती है वरन् कुरान की मूल आत्मा की खिलाफ भी है। मुस्लिम पर्सनल ला के मुद्दे पर शोर मचाकर राजनैतिक नेतृत्व यह सोचता है कि उसने अपने कर्तव्य का पालन कर दिया। चंद अपवादों को छोड़कर, ऐसे मुसलमान नेताओं की संख्या गिनीचुनी है, जो मुसलमानों की शिक्षा और उनकी रोजी.रोटी से जुड़े मुद्दे उठाते हों।
भारत में अच्छे प्राथमिक और उच्चतर माध्यमिक स्कूलों की भारी कमी है। ये स्कूल मुख्यतः शहरी इलाकों में हैं और इनमें मुसलमानो को आसानी से प्रवेश नहीं मिलता। भारतीय राज्य को यह अहसास हो गया है कि अगर देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा, पिछड़ा और अशिक्षित बना रहेगा तो देश प्रगति नहीं कर सकेगा। इसलिए सच्चर समिति की नियुक्ति की गई और प्रधानमंत्री के नये पंद्रह सूत्रीय कार्यक्रम जैसे कुछ कदम उठाये गए। ये कार्यक्रम मुसलमानों की समस्याओं में से सिर्फ एक.गरीबी.पर केन्द्रित हैं। इन कार्यक्रमों में शामिल हैं मुस्लिम बच्चों के लिए वजीफे, होस्टल की सुविधाएं, शैक्षणिक ऋण और कई अन्य चीजें। परन्तु इस कार्यक्रम के साथ कई समस्याएं हैं.पर्याप्त धनराशि का अभाव, नौकरशाही में इच्छाशक्ति की कमी और समुदाय की असली समस्याओं से निपटने के लिए उचित नीतियों का अभाव। स्थान की कमी के कारण हम यहां मुसलमानों में शिक्षा को प्रोत्साहन देने वाले कार्यक्रमों की विफलता के कारणों पर चर्चा नहीं करेंगे। गरीबी इसके कई कारणों में से सिर्फ एक है और इससे मुकाबला करने की सरकार द्वारा, आधे.अधूरे मन से ही सही, कुछ कोशिश की जा रही है परन्तु विभिन्न कारणों से सफलता का प्रतिशत काफी कम है।
मौलाना आजाद की शिक्षा के संबंध में सोच
अगर मौलाना आजाद भारत सरकार को शिक्षा संबंधी अपनी नीतियों को लागू करने के लिए राजी करने में सफल हो जाते तो आज का परिदृश्य कुछ अलग ही होता। उनके लिए भारत सरकार की शिक्षा नीति, उसकी उद्योग नीति से भी अधिक महत्वपूर्ण थी। स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री की हैसियत से मौलाना आजाद हमारी शिक्षा व्यवस्था को मजबूती देना और उसका प्रजातांत्रिकरण करना चाहते थे। वे चाहते थे कि शिक्षा का इस तरह से प्रजातांत्रिकरण किया जाए कि उच्च जातियों और वर्गों का उस पर कसा शिकंजा ढीला पड़ सके।
उनके चार लक्ष्य थे:- 
प्राथमिक से माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा के लोकव्यापीकरण के जरिए निरक्षरता पर प्रहार। प्रौढ शिक्षा व महिलाओं की शिक्षा पर जोर।    
2. बिना जाति, समुदाय या वर्ग के भेदभाव केए पूरे भारतीय समाज में शिक्षा के अवसरों की समानता सुनिश्चित करना।
3. त्रिभाषा फार्मूला एवं
4. पूरे राष्ट्र में मजबूत प्राथमिक शिक्षा तंत्र की स्थापना।
मौलाना आजाद का यह मत था कि हर व्यक्ति को ऐसी शिक्षा पाने का हक है जो उसे उसकी क्षमताओं का पूरा विकास करने और मानव जीवन को उसकी संपूर्णता में जीने का अवसर प्रदान करे। ऐसी शिक्षा पाना हर व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है। राज्य तब तक यह दावा नहीं कर सकता कि उसने अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर दिया है जब तक कि वह प्रत्येक व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त करने और स्वयं का विकास करने के आवश्यक साधन उपलब्ध नहीं करवा देता  .रोजगार का मुद्दा अलग है। राज्य को अपने सभी नागरिकों को माध्यमिक स्तर तक शिक्षा की सुविधा उपलब्ध करवानी चाहिए।
मौलाना आजाद का यह मानना था कि कुछ ही समय पहले विदेशी शासन से मुक्त हुए भारतीयों में एक अच्छे नागरिक के गुण विकसित करने और उन्हें जाति और लैंगिक भेदभाव की प्रवृति से मुक्ति दिलाने में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका है। उनकी मान्यता थी कि नागरिकों को समानता का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए और उन्हें भारत की धार्मिक, नस्लीय और भाषायी विविधता के संबंध में संवेदनशील बनाया जाना चाहिए। मौलाना आजाद का मानना था कि प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के लोकव्यापीकरण के लिए भारत को अपने कुल बजट का कम से कम दस फीसदी हिस्सा शिक्षा पर खर्च करना होगा। हमारे देश में अब तक शिक्षा के लिए कभी भी छः प्रतिशत से अधिक बजट का आवंटन नहीं किया गया और सामान्यताः तो दो से तीन प्रतिशत बजट ही शिक्षा पर खर्च किया जाता है। मौलाना चाहते थे कि शिक्षा के बजट को मुख्यतः प्राथमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा और महिला व प्रौढ़ शिक्षा पर खर्च किया जाए। इसके लिए गांव और कस्बों में स्कूलों के ढांचे को मजबूती देना आवश्यक होगा और हिंदुओं, ईसाइयों और मुसलमानों की इन स्कूलों तक बराबर पहुंच को सुनिश्चित करना होगा। भारत के स्कूल, बच्चों को समानता और न्याय के मूल्यों से परिचित करवायेंगे और उन्हें भारत की विविधता का सम्मान करना सिखायेंगे। मौलाना आजाद का जोर सभी धर्मों के मूल्यों को स्कूलों के पाठ्यक्रमों में शामिल करने पर था।
असल में हुआ यह कि भारतीय राज्य ने न केवल शिक्षा पर काफी कम खर्च किया अपितु बजट का बहुत बड़ा हिस्सा आई।आई.टी., आई.आई.एम., एम्स व जे.एन.यू. जैसे उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना पर खर्च कर दिया गया। इनमें से अधिकांश संस्थान महानगरों में हैं और इनमें वे ही विद्यार्थी प्रवेश पा सकते हैं जो कि महंगे निजी स्कूलों में पढ़ने के बाद अंग्रेजी में होने वाली इन संस्थानों की प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के लिए महंगी कोचिंग ले सकते हैं। इन प्रतिष्ठित संस्थानों के दरवाजे गरीबों और कमजोरों के लिए बंद हैं। अनुसूचित जातियों, जनजातियों, पिछड़ों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों को इन संस्थानों में प्रवेश पाने में खासी दिक्कत पेश आती हैं। उच्च शिक्षा के इन चंद उच्च.स्तरीय द्वीपों की स्थापनाए प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों की कीमत पर की गई है। एक आईआईटी या आईआईएम की स्थापना पर जितना खर्च होता है, उससे हजारों नहीं तो सैंकड़ों प्राथमिक शालाएं खोली जा सकती हैं।
निष्कर्ष
इस्लाम शिक्षा पर बहुत जोर देता है। तीय निधि व इब्नमज़ा के अनुसार इब्ने अब्बास ने बताया कि अल्लाह के पैगम्बर ने कहा धर्मशास्त्र का एक विद्वान, शैतान पर एक हजार श्रृद्धालुओं से ज्यादा भारी पड़ता है। मुसलमानों का पहला और सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य यह है कि वे ज्ञान हासिल करें, इस ज्ञान का उपयोग अपने जीवन में करें और इस ज्ञान का प्रकाश पूरे समाज में फैलाएं। कोई व्यक्ति तब तक सच्चा मुसलमान कहलाने के काबिल नहीं है तब तक कि वह इस्लाम का असली अर्थ न समझ ले। कोई व्यक्ति केवल  मुस्लिम परिवार में जन्म लेने से मुसलमान नहीं बनता बल्कि वह अपने ज्ञान और कर्मों से मुसलमान बनता है। इस्लाम का तार्किकता पर बहुत जोर है। परन्तु मुस्लिम धार्मिक और राजनैतिक नेताओं ने इस्लाम के इस पक्ष पर कभी जोर नहीं दिया। शायद मौलाना आजाद इस्लाम की अपनी समझ से प्रेरित होकर ही ज्ञान और शिक्षा फैलाने की बात कर रहे थे।
शिक्षा वह अस्त्र है जो किसी भी समुदाय के सदस्यों को सामूहिक सामाजिक जीवन में हिस्सा लेने और उसमें अर्थपूर्ण योगदान देने की क्षमता प्रदान करता है। शिक्षा हमें वह मूल्य देती है जो शान्तिपूर्ण सामूहिक जीवन, पर्यावरण व प्रकृति की रक्षा, ज्ञान का विकास और बेहतर समझ पैदा करने में हमारी मदद करते हैं। शिक्षा हमें वह कौशल या ज्ञान भी देती है जिसके जरिए हम अपनी रोजी.रोटी कमा सकते हैं।
शिक्षा एक अनवरत प्रक्रिया है। हम जीवन के अपने संघर्ष सेए अन्य व्यक्तियों के संपर्क में आने से और अपने विभिन्न अनुभवों से कुछ न कुछ सीखते रहते हैं। हम अपने परिवार और समुदाय से भी ज्ञान प्राप्त करते हैं। परन्तु अर्थपूर्ण शिक्षा केवल ज्ञान के केन्द्रों अर्थात् स्कूल, कालेज, अनुसंधान संस्थान, विश्वविद्यालय व अन्य शिक्षा संस्थान हैं। उच्च स्तर की व्यावसायिक शिक्षा तक पहुंच,
उच्च वर्ग तक सीमित  है। भारत में मुसलमानों को इन संस्थाओं में बहुत कम संख्या में प्रवेश मिला पाता है। मजे की बात यह है कि मुसलमानों के शैक्षणिक पिछड़ेपन के लिए उन्हें ही दोषी ठहराया जाता है। अगर हम मौलाना आजाद के बताए रास्ते पर चले होते तो सारे राष्ट्र को इससे लाभ होता। अभी भी बहुत देर नहीं हुई है। हम अब भी मौलाना आजाद के सपनों को साकार करने के काम में जुट सकते हैं।

-इरफान इंजीनियर

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