शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

मुसलमान भाजपा को वोट क्यों देते हैं?


सन् १९९५ के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म ;सीएसएसएस ने एक सर्वेक्षण किया था। इस सर्वेक्षण से यह जाहिर हुआ कि लगभग १० प्रतिशत मुसलमान, भाजपा को मत देने का इरादा रखते थे। उस समय मुसलमान मतदाता कांग्रेस से इसलिए नाराज थे क्योंकि उसने बाबरी मस्जिद को अपनी निगरानी में ढ़ह जाने दिया था। उस दौर में उत्तरप्रदेश में मुस्लिम मतदाता,समाजवादी पार्टी की ओर चले गए और बिहार में लालू प्रसाद यादव की ओर। मुसलमानों का एक तबका, कांग्रेस के विकल्प के अभाव में, भाजपा को भी वोट देने को तैयार था। पश्चिमी उत्तरप्रदेश के एक मुसलमान मतदाता ने समुदाय के रोष को इन शब्दों में व्यक्त कियाए जिस पार्टी ने बाबरी मस्जिद गिरने दी,हम उसे गिरते देखना चाहते हैं'। परंतु आम मुसलमान के लिए उसकी व्यक्तिगत सुरक्षा, बाबरी मस्जिद से ज्यादा महत्वपूर्ण थी। बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद, देश के अनेक शहरों में भयावह दंगे हुए। जिन मुसलमानों ने भाजपा को वोट दिया भी, उन्होंने ऐसा कांग्रेस के विरूद्ध अपने गुस्से के चलते किया न कि भाजपा के प्रेमवश। स्थानीय चुनावों में अलबत्ता, कुछ मुसलमानों ने ऐसे शिवसेना.भाजपा उम्मीदवारों को मत अवश्य दिया जो उन्हें व्यक्तिगत रूप से पसंद आए। परंतु कुल मिलाकर, मुसलमान,भाजपा से दूर ही बने रहे।
महाराष्ट्र में १९८५ के विधानसभा चुनाव के दौरान, बाल ठाकरे अपनी सभाओं में भाषण शुरू करने से पहले वहां उपस्थित मुसलमानों को सभास्थल से चले जाने को कहते थे क्योंकि वे 'जो बोलेंगे वह मुसलमानों को सहन नहीं होगा'। वे खुलेआम कहते थे कि उन्हें मुसलमानों के वोट नहीं चाहिए। मुसलमानों का दानवीकरण कर वे सभी जातियों के हिन्दुओं का समर्थन प्राप्त करना चाहते थे। वे स्वयं को 'हिन्दू हृदय सम्राट' बताया करते थे। आगे चलकर,उन्हें धर्म के नाम पर वोट हासिल करने का दोषी पाया गया और २८ जुलाई १९८९ को उनका मत देने का अधिकार, छह वर्षों के लिए निलंबित कर दिया गया।
सन् २००८ में हम अहमदाबाद के बांबे होटल इलाके में पहुंचे। यह वह स्थान है जहां अहमदाबाद का नगर निगम पूरे शहर का कूड़ा.कचरा फेंका करता था। यह वह स्थल भी है जहां कि २००२ के कत्लेआम के पीडि़तों ने अपने आशियाने बसाए हैं.कचरे के पहाड़ के ऊपर। हमें बताया गया कि यहां बसने वाले मुसलमानों में से भी कुछ ने सन् २००७ में गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा को मत दिया था। हमने लोगों से बातचीत की और यह जानना चाहा कि क्या यह सही है और यदि हां, तो ऐसा क्यों हुआ। एक पीडि़त ने हमें बताया कि वह तो वोट देना ही नहीं चाहता था परंतु यह स्वतंत्रता भी उसे नहीं दी गई। भाजपा कार्यकर्ता उसे जबरदस्ती मतदान केन्द्र पर ले गए और उसे कार्यकर्ताओं व मतदान अधिकारी की निगरानी में भाजपा को वोट देना पड़ा। मुझे समझ नहीं आया कि मैं उस पर विश्वास करूं या ना करूं। परंतु यह भी सच है कि उसे झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं मिलने वाला था। वहां रहने वाले दंगा पीडि़त, पूरी तरह असहाय थे। उनका सामाजिक बहिष्कार हो रहा था और कोई गैर.मुस्लिम उन्हें रोजगार देने को तैयार नहीं था।
अमे तो जरूरिया
गुजरात में जिस समय शंकर सिंह वाघेला ने केशुभाई पटेल के नेतृत्व के विरूद्ध विद्रोह किया था और अपने समर्थक विधायकों को खजुराहो ले गए थेए उस समय दोनों गुट 'खजूरिया' व'हजूरिया' कहलाते थे। उसी दौर में सोनूभाई चौधरी नामक आदिवासी अधिकारों के लिए संघर्षरत एक प्रतिबद्ध कार्यकर्ता ने भाजपा की सदस्यता ले ली। हम लोगों को इस पर बहुत आश्चर्य हुआए धक्का भी लगा। जब मैं सोनूभाई से मिला तो मैंने उनसे जानना चाहा कि वे 'खजूरिया' है या 'हजूरिया' ;वाघेला गुट में या पटेल के साथ। सोनूभाई का उत्तर आदिवासियों की असहायता को रेखांकित करने वाला था। उन्होंने कहा, 'साहेब, अमे नाई हजूरिया, नाई खजूरिया। आमी तो जरूरिया'। दंगा पीडि़तों के जवाब ने मुझे सोनूभाई की याद दिला दी। हमें कई सुविधाएं बिना मांगे मिल जाती हैं। परंतु जो लोग हिंसा और सरकारी नीतियों के कारण लगभग भिखारी हो गए हैं उन्हें सरकारी सेवाओं की बहुत जरूरत होती है.भले ही वे कितनी भी खराब क्यों न हों। उन्हें जिंदा रहने के लिए सुरक्षा की जरूरत भी होती है। जिन लोगों के जीवन के लाले पड़े हुए हों,जिन्हें जीवन की मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हों,उनके पास वोट देने के मामले में कोई विकल्प नहीं होता। वे इस आशा से अपना वोट दानव को देते हैं कि इससे वह संतुष्ट रहेगा और उन्हें जीने देगा। गुजरात में कांग्रेस, राजनैतिक दृष्टि से बहुत कमजोर है। राज्य में केवल चंद नगरपालिकाएं ही उसके नियंत्रण में हैं। कांग्रेस के नियंत्रण वाली नगरपालिकाओं के साथ राज्य सरकार अनुदान के मामले में भेदभाव करती है। इसलिए,विकास के फल का छोटा सा टुकड़ा हासिल करने के लिए भी भाजपा की कृपा आवश्यक है। यहां तक कि गुजरात के मुसलमानों के लिए भाजपा की मदद के बिना अपना पहचानपत्र बनवाना भी असंभव है।

हर तरह के 'जरूरिया'
लगातार तीसरी बार चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बनने के बादए मोदी के मन में प्रधानमंत्री बनने की महत्वकांक्षा जाग उठी। इसके लिए जरूरी था कि वे अपनी लौह पुरूष की छवि को बदलकर 'विकास पुरूष'की बनाएं। हिन्दुत्ववादी छवि उन्हें गुजरात में तो जीत दिलवा सकती थी परंतु राष्ट्रीय स्तर पर शायद उन्हें इससे लाभ न मिलता।
जब उच्चतम न्यायालय ने सन् २००२ के दंगों के मामले में मोदी के विरूद्ध आरोप निर्धारित करने का निर्णय,विचारण न्यायालय पर छोड़ दिया तब मोदी ने यह दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें क्लीन चिट दे दी है। अपने क्लीन चिट के दावे को मजबूती देने के लिए उन्होंने पूरे गुजरात राज्य में 'सद्भावना मिशन' शुरू की,जिसके अंतर्गत उन्होंने कई स्थानों पर एक दिन का उपवास रखा।'सद्भावना मिशन' पूरी तरह से खोखली थी क्योंकि इसमें न तो कभी यह स्वीकार किया गया कि दंगों के मामले में कोई भीए किसी भी प्रकार से दोषी है और ना ही दंगों के लिए किसी प्रकार की ग्लानि या पश्चाताप व्यक्त किया गयाए माफी मांगना तो दूर की बात है। मिशन का एक ही लक्ष्य थारू मोदी की छवि को चमकाना ताकि उनकी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पूरी हो सके। मोदी ने'सद्भावना मिशन' कार्यक्रमों में कुछ मुस्लिम नेताओं को भी बुलाया। ऐसे ही एक कार्यक्रम में उन्होंने एक मौलवी से टोपी पहनने से इंकार कर दिया था। उन्होंने मुसलमानों के एक छोटे.से व्यापारी तबके को अपने साथ लेने में सफलता भी हासिल कर ली.मुख्यतः उन्हें कुछ लाभ उपलब्ध करवाकर। ऐसे मुसलमानों का चेहरा बने जफर सरेसवाला जो, जब भी उनसे कहा जाता है, सार्वजनिक मंचों से मोदी का बचाव करने और उनका गुणगान करने में जुट जाते हैं। बोहरा समुदाय के पुरोहित वर्ग को भी अपने साम्राज्य को बचाने के लिए राजनैतिक संरक्षण की जरूरत थी। उसने अपने अनुयायियों से कहा कि वे अपनी पारंपरिक टोपियां लगाकर मोदी की हर रैली व सभा में जाएं। मोदी की जय.जयकार कर रहा मुसलमानों का श्रेष्ठी वर्ग एक अलग प्रकार का जरूरिया है, जिसे राजनैतिक संरक्षण की जरूरत इसलिए है क्योंकि गुजरात में सामान्य प्रक्रिया से कुछ होता ही नहीं है। व्यवसायी वर्ग हमेशा शासक दल का साथ देता है और इसलिए आश्चर्य नहीं कि गुजरात के बोहरा व खोजा मुसलमान, भाजपा के जुलूस में शामिल हो गए हैं। भाजपा के लगातार चार बार सत्ता में आने के बाद उनके सामने कोई रास्ता भी नहीं बचा था।
भाजपा ने मोदी की छवि को बदलने के लिए जरूरिया मुसलमानों से हाथ मिला लिया और फरवरी २०१३ में सलाया ;जिला जामनगरद्ध के नगरपालिका चुनाव में २७ वार्डों में से २४ में मुस्लिम उम्मीदवार खड़े कर सुर्खियां बटोरीं। भाजपा के सभी २४ मुसलमान उम्मीदवार चुनाव जीत गए। तथ्य यह है कि कस्बे की ३३,००० आबादी में से ९० प्रतिशत मुसलमान हैं और मुसलमानों के कारण भाजपा पहली बार वहां चुनाव जीत सकी। अर्थात् मुसलमानों ने भाजपा को जिताया ना कि भाजपा ने मुसलमानों को।
हमारी मुलाकात भुज ;कच्छ जिला के भाजपाई मुस्लिम पार्षद से हुई। वे काफी समृद्ध हैं और एक बंगले में रहते हैं। वे कुछ शैक्षणिक संस्थाएं चलाते हैं और जमीन.मकान आदि बेचने.खरीदने के धंधे में भी हैं। राज्य सरकार के संरक्षण के बिना उनका व्यवसाय चल ही नहीं सकता था। उनकी मजबूरी थी कि वे मोदी की जय.जयकार करें। हम इसी जिले के अंजर के तीन मुस्लिम पार्षदों में से एक से भी मिले। उन्होंने कहा कि वे मुसलमानों के शुभचिन्तक हैं। उनका दावा था कि वे भाजपा में इसलिए शामिल हुए हैं ताकि अपने समुदाय का भला कर सकें। अंजर की लगभग २० प्रतिशत आबादी मुस्लिम है और वहां के तीनों मुसलमान पार्षद भाजपा के हैं। बाकी दोनों, इन पार्षद महोदय के चेले थे। ये पार्षद स्थानीय बाहुबली थे और शासक दल को नाराज नहीं कर सकते थे। परंतु उनका दावा यह था कि उन्हें अपने समुदाय की खातिर गुंडागर्दी करनी पड़ती है। अंजर के नागरिकों ने मुझे बताया कि वहां के शेख टिम्बा, देवादिया नाका और एकता नगर जैसे मुस्लिम इलाकों में पानी, बिजलीए सड़क व सीवेज जैसी सुविधाओं की भारी कमी है। पार्षद ने मुझे बताया कि उन्होंने नगरपालिका के मुस्लिम इलाकों में बिजली के खम्बे लगवाने और सीवेज की व्यवस्था को सुधारने के लिए ३ करोड़ रूपए की राशि मंजूर करवाई है। परंतु इसके बदले उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि मुसलमान,केवल और केवल भाजपा को मत दें। ३ करोड़ रूपए के बदले १२ए००० वोट! सौदा बुरा नहीं था।

मुस्लिम पार्षद परंतु मुस्लिम विधायक नहीं
भाजपा ने सन् २०१२ के विधानसभा चुनाव में एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया। मोदी की छवि बदलने की उसकी इच्छा और सद्भावना मिशन के बावजूद, भाजपा,मुसलमानों को पार्षदों की चंद सीटों से ज्यादा कुछ देने को तैयार नहीं थी। इस चुनाव में भाजपा की विजय हुई परंतु विधानसभा में मुसलमान विधायकों की संख्या ५ से घटकर २ रह गई। मुसलमान, गुजरात की आबादी का लगभग १० प्रतिशत हैं और इस हिसाब से १८२ सदस्यों वाली विधानसभा में कम से कम १८ मुसलमान विधायक होने चाहिए थे।
हाल में राजस्थान, मध्यप्रदेश और दिल्ली विधानसभाओं के चुनाव हुए। इनमें भाजपा ने कुल मिलाकर लगभग ५०० टिकट बांटे परंतु उसके मुसलमान उम्मीदवारों की संख्या केवल ६ थी। इन राज्यों में करीब ५० ऐसे निर्वाचन क्षेत्र हैं जिनमें मुसलमानों की खासी आबादी है। पिछली विधानसभाओं में १७ मुसलमान विधायक थे परंतु इस बार भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चे के शीर्ष पदाधिकारियों को भी भाजपा ने टिकट नहीं दिया। आरिफ अकील, मध्यप्रदेश की विधानसभा में एकमात्र मुस्लिम विधायक हैं और वे कांग्रेस के टिकट पर चुने गए हैं। राजस्थान में भाजपा ने ४ मुस्लिम उम्मीदवारों को खड़ा किया जिनमें से २ जीते। राजस्थान की आबादी में मुसलमानों का प्रतिशत ८.५ है और इस हिसाब से कम से कम १७ मुसलमानों को वहां की विधानसभा का सदस्य होना चाहिए था। दिल्ली में मुस्लिम आबादी लगभग १२ प्रतिशत है परंतु वहां की 70सदस्यीय विधानसभा के लिए हुए चुनाव में भाजपा ने केवल एक मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा किया। भाजपा केवल उन्हीं निर्वाचन क्षेत्रों में मुसलमान उम्मीदवार खड़ा करती है जिनमें मुसलमानों का पूर्ण बहुमत होता है और किसी गैर.मुसलमान को टिकट देकर चुनाव जीतना लगभग असंभव होता है।

मुसलमानों की नीति निर्धारण व कानून बनाने जैसे मसलों में कोई भागीदारी नहीं होती।

भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व में जो मुसलमान हैं वे केवल शोपीस हैं। उन्हें इसलिए रखा गया है ताकि कुछ मुसलमानों को भाजपा की ओर आकर्षित किया जा सके या कम से कम यह सुनिश्चित हो सके कि मुसलमान एकजुट होकर भाजपा के खिलाफ वोट न दें। भाजपा के मुस्लिम नेताओं में से कुछ वे हैं जो मुस्लिम कट्टरवाद की प्रतिक्रियास्वरूप इस पार्टी में आए हैं। इनमें सिकन्दर बख्त, मुख्तार अब्बास नकवी और आरिफ मोहम्मद खान जैसे कुछ नेता शामिल हैं। परंतु भाजपा के मजबूत होने से मुस्लिम कट्टरवाद कमजोर नहीं होता। उल्टे,वह और मजबूत होता है। आम मुसलमान कट्टरपंथी नेताओं की तरफ झुकने लगते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि कट्टरपंथी नेता ही समुदाय को एक कर उसकी रक्षा कर सकते हैं। उदाहरणार्थ, गुजरात में मुसलमानों में कट्टरवाद बढ़ा है। कुछ मुसलमानों ने भाजपा की सदस्यता अवश्य ले ली है परंतु वे मुख्यतः ऐसे नेता हैं जिन्हें कांग्रेस या किसी अन्य दल ने या तो टिकट नहीं दिया या वह पद नहीं दिया जिसकी उन्हें अपेक्षा थी। उदारणार्थ, नजमा हेपतुल्ला भारत की उपराष्ट्रपति बनना चाहती थीं। जब कांग्रेस ने उन्हें यह पद नहीं दिया तो वे भाजपा में शामिल हो गईं। शाहनवाज हुसैन भी भाजपा में बहुत तेजी से आगे बढ़े। वे सन् १९९९ में बनी भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के चंद मुस्लिम चेहरों में से एक थे। इन मुसलमान नेताओं को न तो मुसलमानों की सुरक्षा की फिक्र है और ना ही बाबरी ध्वंस जैसे मुद्दों पर वे कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। वे भाजपा को अधिक समावेशी दल बनने की ओर ले जाने में भी सफल नहीं रहे हैं। उनका काम सिर्फ यह है कि वे भाजपा की 'इंडिया फर्स्ट' जैसी नीतियों का ढोल बजाएं और यह कहते फिरें कि मुसलमान 'राष्ट्रवादी'बनें और उस दोयम दर्जे की नागरिकता से प्रसन्न रहें जो हिन्दुत्ववादी ताकतें उन्हें देना चाहती हैं।
    -इरफान इंजीनियर

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