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बुधवार, 10 दिसंबर 2014

दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के अधिकार



सेंटर फॉर सोसायटी एण्ड सेक्युलरिज्म ;सीएसएसएसद्धए मुंबई ने काठमाण्डू में आयोजित पीपुल्स सार्क रीजनल कन्वर्जेन्स मीट में 24 नवंबर 2014 को 'दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के अधिकार' विषय पर सत्र का आयोजन किया।  इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य, दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के उल्लंघन की प्रकृति को समझना और जनसंगठनों का ऐसा मजबूत गठजोड़ खड़ा करना था, जिससे इन उल्लंघनों से मुकाबला करने के लिए पहले से विद्यमान व्यवस्था को और शक्तिशाली बनाया जा सके और इसके लिए नए तंत्र विकसित किए जा सकें। दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के घोषणापत्र का मसविदा तैयार करने की प्रक्रिया का शुभारंभ भी इस सत्र के एजेण्डे में शामिल था।
भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका व बांग्लादेश से आए लगभग 40 प्रतिनिधियों ने इस सत्र में भागीदारी की। सत्र की शुरूआत सभी उपस्थित प्रतिभागियों के परिचय से हुई। तत्पश्चात, सीएसएसएस के निदेशक इरफान इंजीनियर ने सत्र के आयोजन के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर विमर्श की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यक वर्गों में चेतना का उदय साम्राज्यवादी दौर में हुआ जब हमारे विदेशी शासकों ने बड़ी संख्या में लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान जाने पर मजबूर किया ताकि उन्हें सस्ता श्रम उपलब्ध हो सके। आबादी के इस स्थानांतरण से देशों की सीमाएं बदलीं और नई राजनीतिक व्यवस्थाओं ने जन्म लिया। विभिन्न क्षेत्रों में नए लोगों के बसने का एक प्रभाव यह हुआ कि दक्षिण एशिया के एक देश में जो समुदाय बहुसंख्यक था वह दूसरे देश में अल्पसंख्यक बन गया। इससे परिस्थितियां जटिल होती गईं।
अल्पसंख्यकों द्वारा उनके अधिकारों की मांग को राज्य अपनी सत्ता के लिए चुनौती मानता आया है। यद्यपि अल्पसंख्यकों की स्थिति में सुधार के लिए नेहरू.लियाकत सहित कई समझौते हुए परंतु शीतयुद्ध के काल मेंए दक्षिण एशिया, साम्राज्यवादी हितों के टकराव और हिंसा व षडयंत्रों का केंद्र बनकर उभरा। इससे विभिन्न समुदायों के बीच आपसी बैरभाव तो बढ़ा हीए धार्मिक कट्टरता में भी तेजी से वृद्धि हुई और क्षेत्र की सुरक्षा और शांति को खतरा पैदा हो गया। इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए अल्पसंख्यक, जो दक्षिण एशिया में पहले से ही हाशिए पर थे।
सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज के हर्षमंदर ने अपने मुख्य वक्तव्य में कहा कि अल्पसंख्यक समुदायों और सरकारों के आपसी रिश्ते सहज और सामान्य नहीं हैं। अल्पसंख्यकों को यह लगता है कि वे वंचना के शिकार हैं। धार्मिक पहचान, समाज को विभाजित कर रही है। उन्होंने कहा कि प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता का मूल तत्व यह है कि हम विविधता का सम्मान करें और समानताएं ढूंढना बंद करें। यही दक्षिण एशिया और यूरोप में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा का फर्क है। यूरोप में धर्मनिरपेक्षता, वहां के समाज में घुलमिल जाने के रूप में परिभाषित की जा रही है। इसका एक उदाहरण है फ्रांस में पगड़ी व हिजाब पहनने पर प्रतिबंध। उन्होंने कहा कि राज्य के दमन और विविधता की उपेक्षा के कारण, लोग उस देश में स्वयं को सुरक्षित समझते हैं जहां उनके समुदाय का बहुमत हो। दक्षिण एशिया की विविधता ने उसकी संस्कृति को समृद्ध किया है। परंतु समृद्ध संस्कृति के साथ.साथ यह भी जरूरी है कि किसी भी देश में अल्पसंख्यक स्वयं को सुरक्षित समझें और बिना आतंक या डर के अपना जीवनयापन कर सकें। हर एक को यह स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वह किसी भी धर्म का पालन करे या कोई भी धर्म न माने या नास्तिकता में विश्वास रखे। यही सच्चा प्रजातंत्र है। दुर्भाग्यवश,दक्षिण एशिया में प्रजातंत्र की इस मूल आत्मा का हनन हो रहा है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचला जा रहा है। बर्मा जैसे कई देशों में तो मानवाधिकारों के उल्लंघन पर चर्चा करना तक प्रतिबंधित है। ऐसे मुद्दों पर चर्चा के लिए गुप्त बैठकें आयोजित करनी पड़ती हैं क्योंकि सरकार किसी भी प्रकार की मतविभिन्नता को क्रूरता से कुचल देती है।
इसके बाद,विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने अपने.अपने देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति का विवरण दिया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि श्री मंदर द्वारा व्यक्त की गई चिंताएं एकदम सही थीं। अल्पसंख्यकों की समस्या का चरित्र मूलतः राजनैतिक है और प्रजातांत्रिक अधिकारों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को उपयुक्त व पर्याप्त महत्व मिलना चाहिए। अल्पसंख्यकों की समस्याओं के बढ़ने का एक कारण है आक्रामक बाजार.आधारित अर्थव्यवस्था,जो कि मध्यम वर्ग की मानसिकता पर गहरा प्रभाव डाल रही है। श्रेष्ठी वर्ग यह चाहता है कि हाशिए पर पटक दिए गए लोगों और अल्पसंख्यकों की कीमत पर समाज में उसका वर्चस्व बना रहे। इसलिए यह आवश्यक है कि पूंजीवाद जैसी विचारधाराओं पर हल्ला बोला जाए जो कि अमीरों और गरीबों के बीच की खाई को औरचौड़ा कर रही हैं। बाजार.आधारित अर्थव्यवस्था से असंतुलित विकास हो रहा हैए जो समावेशी नहीं है। बांग्लादेश से आए मोइनुद्दीन ने कहा कि बांग्लादेश में कई धार्मिक,नस्लीय व सैक्स.आधारित अल्पसंख्यक समूह हैं। देश में हिजड़ा समुदाय एक महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक समुदाय है। अल्पसंख्यकों को ढेर सारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बांग्लादेश में हिंदू आबादीए जो कि सन् 1947 में 27 प्रतिशत थीए घटकर 10 प्रतिशत रह गई है। देश में अल्पसंख्यकों को अपने रहवास के इलाकों से पलायन करने पर मजबूर किया जा रहा है।
श्रीलंका के के.के. बालकृष्णन ने कहा कि वहां की आबादी में 72 प्रतिशत हिस्सा सिंहलियों का है जबकि 12.13 प्रतिशत तमिल, 8 प्रतिशत मुसलमान और लगभग 7 प्रतिशत भारतीय तमिल हैं,जो कि मुख्यतः वहां के बागानों में काम करते हैं। श्रीलंका में अल्पसंख्यकों के साथ नस्ल व वर्ग के आधार पर भेदभाव किया जाता है। भारतीय तमिलों के भी हाल बेहाल हैं।
पाकिस्तान में स्थिति और भी खराब है। वहां अल्पसंख्यकों की अर्थव्यवस्था और विकास में तनिक भी हिस्सेदारी नहीं है। नौकरशाही में अल्पसंख्यकों की भागीदारी न के बराबर है। यद्यपि पाकिस्तान में सरकारी नौकरियों में अल्पसंख्यकों के लिए 5 प्रतिशत पद आरक्षित हैं तथापि उन्हें कभी जिम्मेदार व ऊँचे पदों पर नियुक्त नहीं किया जाता। उन्हें अक्सर महत्वहीन पद दिए जाते हैं। विभाजन के दौरान, जिस समय दोनो देशों से हिंदुओं और मुसलमानों का बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा था, उस समय अल्पसंख्यकों ने पाकिस्तान में रहने का निर्णय इसलिए किया क्योंकि उन्हें उस धरती से प्यार था, जिसमें वे पले.बढ़े थे। केवल वे ही हिंदू पाकिस्तान छोड़कर जा सके जो धनी थे और जिनके पास एक नए स्थान पर जिंदगी शुरू करने के लिए आवश्यक संसाधन और योग्यता थी। दमनकारी जाति व्यवस्था और अमानवीय अछूत प्रथा के कारण भील और कोली समुदायों की बड़ी आबादी ने पाकिस्तान छोड़कर भारत न जाने का निर्णय किया। आज भी 80 लाख भील और कोली पाकिस्तान में रह रहे हैं। परंतु भारतीय उपमहाद्वीप के अन्य देशों की तरह, पाकिस्तान में भी उनके साथ जाति के आधार पर भेदभाव होता रहा और उन्हें शिक्षा व अन्य क्षेत्रों में समान अवसर नहीं मिले। इस भेदभाव का एक सुबूत यह है कि जहां हिंदू आबादी का 80 प्रतिशत अनुसूचित जातियां हैं,वहीं अर्थव्यवस्था, प्रशासन, संसद आदि में उनका प्रतिनिधित्व मात्र 20 प्रतिशत है। स्पष्टतः, अल्पसंख्यकों की राजनीति में भागीदारी को रोकने की कोशिश की जा रही है। अगर सत्ता और राजनैतिक प्रक्रिया में उन्हें आनुपातिक प्रतिनिधित्व दिया जाना है तो अल्पसंख्यक समुदायों को संसद में अधिक सीटें दी जानी चाहिए।
परंतु जब हम अल्पसंख्यकों और उनके अधिकारों की चर्चा करते हैं तब यह जरूरी है कि हम अल्पसंख्यक समुदायों को एकाश्म न मानें और ना ही हम उन्हें ऐसा समूह समझें, जिसकी आवश्यकताएं, महत्वाकाक्षाएं और अनुभव एक ही हैं। जाति की तरहए लिंग भी भेदभाव का आधार है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं को विवाह करते समय इस्लाम अपनाने पर मजबूर किया जाता है। वहां बलात्कार आम है और ये महिलाओं के लिए मानसिक और शारीरिक यंत्रणा का सबब बनते हैं। अतः अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर कोई भी चर्चा तब तक पूरी नहीं होगी जब तक कि उसमें लैंगिक न्याय की बात शामिल न हो। अल्पसंख्यकों के अधिकारों के किसी भी घोषणापत्र को लागू करते समय यह ध्यान में रखा जाना होगा कि उसमें महिलाओं के अधिकारों के लिए उचित स्थान हो।
पाकिस्तान की तरह,भारत में भी अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं को हजार दुःख हैं। उनके साथ भी बलात्कार और शारीरिक शोषण की घटनाएं बहुत आम हैं। मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान यह प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से सामने आयी। जब मुसलमानों के खिलाफ हिंसा हो रही थी तब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने उसे रोकने के लिए पर्याप्त और उचित कदम नहीं उठाए। यहां तक कि मुस्लिम समुदाय के विधायक भी मूकदर्शक बने रहे।
टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल सांइसेज,मुंबई के प्रोफेसर रानू जैन ने कहा कि भारत में अल्पसंख्यकों के प्रति नीतियों पर बहस होनी चाहिए क्योंकि वे काफी हद तक अस्पष्ट हैं। उदाहरणार्थ, अल्पसंख्यक समुदाय को ही परिभाषित नहीं किया गया है। नतीजे मेंए उच्चतम न्यायालय यह तय कर रहा है कि कौन.सा समुदाय अल्पसंख्यक है और उस समुदाय को अल्पसंख्यकों के लिए नियत सुविधाएं दी जा रही हैं। इससे शक्तिशाली समुदायों को जोड़तोड़ करने का मौका मिल रहा है। भारत में इसी अस्पष्टता का लाभ उठाकर जैनियों और पारसियों ने भी अपने.अपने समुदायों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिलवा दिया है और उन्हें राज्य द्वारा हर किस्म का प्रोत्साहन दिया जा रहा है। यद्यपि यह सही है कि जैनियों और पारसियों की आबादी कम है परंतु यह भी सच है कि दोनों समुदाय विकसित,शिक्षित और समृद्ध हैं और उन्हें उन अल्पसंख्यक समुदायों की कीमत पर सुविधाएं उपलब्ध करवाई जा रही हैं, जो पिछड़े, गरीब और अशिक्षित हैं। भारत में अमीरों और गरीबों के बीच भारी अंतर है। मुट्ठीभर रईस यह जानते भी नहीं कि गरीबों को किस तरह की हिंसा, भेदभाव और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। संपन्न वर्ग तो बस अपनी ताकत में बढ़ोत्तरी करना चाहता है। मीडिया और शिक्षा व्यवस्था का इस हद तक सांप्रदायिकीकरण हो चुका है कि ये दोनों संस्थाएं अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों के प्रति संवेदनशील नहीं हैं। निराशा के इस घनघोर अंधेरे में सच्चर समिति की रपट, आशा की किरण बनकर उभरी थी परंतु उसकी अधिकांश सिफारिशों को आज तक लागू नहीं किया गया है। ऐसे में जरूरी है कि अल्पसंख्यकों की चिंताओं पर खुलकर चर्चा की जाए और ऐसे नियम.कानून बनाए जाएं जिनसे सांप्रदायिक आधार पर भेदभाव रूक सके। साथ हीए सांप्रदायिक हिंसा पर नजर रखे जाने की भी जरूरत है। भारत के अल्पसंख्यकों की समस्याओं के बारे में कश्मीर से आए बशीर अहमद ने एक महत्वपूर्ण बात कही। कश्मीर में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वे जिस इलाके में रहते हैंए वहां पर हिंदू पंडित अल्पसंख्यक हैं।  उन्होंने कहा कि घाटी से पंडितों का पलायन दुर्भाग्यपूर्ण है। वे वहां से इसलिए चले गए क्योंकि उनके मन में असुरक्षा का भाव घर कर गया था। उन्होंने कहा कि जब हम अल्पसंख्यकों के संबंध में नीतियों के निर्माण पर चर्चा करें तब हमें अल्पसंख्यकों के अंदर के अल्पसंख्यकों का भी ध्यान रखना होगा।
सत्र के अंत में पाकिस्तान से आए करामत अली और इरफान इंजीनियर ने पूरी चर्चा का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया और भविष्य की कार्यवाही की रूपरेखा बताई। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों को विधानमंडलों और निर्णय लेने वाली संस्थाओं में तो पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना ही चाहिएए आर्थिक नीतियों और विकास की प्रक्रिया के निर्धारण में भी उनकी भूमिका होनी चाहिए। अल्पसंख्यकों को यह हक मिलना चाहिए कि वे अपनी संस्कृति की रक्षा कर सकें और अपनी पहचान को सुरक्षित रख सकें। सांप्रदायिक हिंसा और कत्लेआम को रोकने के लिए कानून बनाए जाने चाहिए और उन्हें कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए। अकेले भारत में स्वतंत्रता से लेकर अब तक सांप्रदायिक दंगों में लगभग 40,000 लोग मारे जा चुके हैं। परंतु बहुत कम दोषियों को सजा मिल सकी है। अतः यह आवश्यक है कि पूरे दक्षिण एशिया में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं की निष्पक्ष जांच करने के लिए एक आयोग का गठन किया जाए। जो लोग हिंसा के कारण अपने गांवए घर छोड़ने पर मजबूर कर दिए जाते हैं वे शिक्षा और रोजगार से तो मेहरूम होते ही हैंए उनमें मजहबी कट्टरता भी बढ़ती है। अगर अल्पसंख्यकों को सुरक्षा दी जाए और सत्ता में उनकी हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए तो कट्टरपंथी तत्व कमजोर पड़ेंगे और धार्मिक पहचान के आधार पर ध्रुवीकरण कम होगा।
इस सत्र में हुई चर्चा के आधार पर अल्पसंख्यक अधिकारों के घोषणापत्र की अवधारणा पर विचार करने हेतु एक मसविदा समिति का गठन किया गया जिसमें इरफान इंजीनियर,रानू जैन, हर्षमंदर, करामत अली व बशीर अहमद शामिल हैं। सम्मेलन में यह मांग की गई कि सार्क देशों को दक्षिण एशिया आयोग की नियुक्ति करना चाहिए जिसमें हर सार्क देश से एक.एक पुरूष और महिला प्रतिनिधि शामिल हो और जो क्षेत्र में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर नजर रखे।
-नेहा दभाड़े

रविवार, 12 अक्टूबर 2014

नेहरू युग के सभी इतिहासविदों द्वारा लिखी किताबों में आग लगा दो


सुब्रमण्यम स्वामी एक ऐसे व्यक्ति हैं जो जब भी बोलते हैं जहर उगलते हैं। दिल्ली में एक कार्यक्रम में बोलते हुये उनने कहा कि नेहरू युग के सभी इतिहासविदों द्वारा लिखी किताबों में आग लगा देना चाहिए।
इस संदर्भ में स्वामी ने विशेष रूप से विपिन चंद्र और रोमिला थापर का नाम लिया। उनका आरोप है कि इस तरह के लेखकों ने अनेक हिंदू राजा.महाराजाओं की उपेक्षा की है। स्वामी दिल्ली में अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना द्वारा आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे। यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा समर्थित एक संस्था है। कार्यक्रम में बोलते हुये अनेक वक्ताओं ने कहा कि मार्क्सवादी,मुसलमान और पश्चिमी इतिहासकारों ने भारत के प्राचीन इतिहास की बहुत उपेक्षा की है।
स्वामी और अन्य वक्ताओं ने इस तरह के अनेक हिंदू राजाओं का नाम लिया जिनका उल्लेख इन इतिहासज्ञों ने नहीं किया है। वक्ताओं ने विशेष रूप से हेमचंद्र विक्रमादित्य का नाम लिया है, जिन्होंने उत्तर भारत में 1556 के द्वितीय पानीपत युद्ध के बाद हिंदू राज्य की स्थापना की थी।
तथाकथित इन इतिहासज्ञों की इस घनघोर हिंसक प्रवृत्ति की सारे देश में आलोचना की गई। प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक हिंदुस्तान टाईम्स ने 9 अक्टूबर को लिखे एक संपादकीय में इस बात पर घोर चिंता प्रगट की है कि हमारे देश में किताबों को सिर्फ इस कारण जलाने की बात की जाए क्योंकि उनमें कुछ ऐसे विचार हैं जो कुछ लोगों को पसंद नहीं हैं। संपादकीय में कहा गया है कि सुब्रमण्यम स्वामी समाचारपत्रों में सुर्खियां जीतने के लिए इस तरह की गैर.जिम्मेदार बात करते हैं। वे आये दिन बुद्धिजीवियों और मुसलमानों पर हमला करते रहते हैं। हिंदुस्तान टाईम्स ने यह मांग की है कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व को चाहिए कि वह स्वामी पर लगाम लगायें। स्वामी बहुत ही भद्दी और भडकाऊ भाषा में, मुसलमानों,पाकिस्तान, सोनिया गांधी, राहुल गांधी आदि के बारे में निंदापूर्ण बातें कहते रहते हैं। इसी क्रम में उनने नेहरूवियन और वामपंथी इतिहासज्ञों पर हमला किया है। उनका कहना है कि विपिन चंद्र और रोमिला थापर के समान इतिहासज्ञों की किताबों को जला देना चाहिए।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि संघ और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े अनेक संगठनों को स्वामी की बात न सिर्फ अच्छी लगती है वरन् वे उनसे सहमत भी होते हैं। इसी सिलसिले में यहां उल्लेख करना होगा कि दीनानाथ बत्रा द्वारा लिखित कुछ किताबों को गुजरात के पाठ्यक्रमों में शामिल किया गया है। दीनानाथ बत्रा भी एक अत्यधिक घनघोर प्रतिक्रियावादी लेखक हैं। वे अखंड भारत की वकालत करते हैं और कहते हैं कि पश्चिमी ढंग से लोगों को अपने जन्मदिन नहीं मनाने चाहिए। चूंकि गुजरात में इनकी पुस्तकें पाठ्यक्रम में शामिल कर ली गई हैं इसलिये यह कहना उचित होगा कि इस तरह के विचारों को स्वीकार करने वालो की संख्या काफी ज्यादा है।
स्वामी ने जिन इतिहासज्ञों पर हमला किया है वे दुनिया के महान इतिहासज्ञों में से हैं। इतिहास की दुनिया में उनकी अद्भुत स्वीकार्यता है। इस तथ्य के बावजूद यह दुःख की बात है कि स्वामी उनकी किताबों को जलाने की बात करते हैं। आखिर ये लोग कितनी किताबों को प्रतिबंधित करेंगे। दिल्ली की सरकार और भाजपा के नेताओं को स्पष्ट करना चाहिए कि उनका इस तरह के विचारों से कोई लेना.देना नहीं हैं। न सिर्फ उनको असहमति दिखाना चाहिए बल्कि इस तरह की बेबुनियाद, भड़काऊ बातें कहने के लिए उनके विरूद्ध कार्यवाही भी होना चाहिए।
आज के आधुनिक समाज में विभिन्न नजरियों से इतिहास का विवेचन व मूल्यांकन स्वाभाविक है। यह पाठक पर छोड़ देना चाहिए कि वह किस विवेचन व मीमांसा को स्वीकार करता है। इस तरह की स्वीकार्यता पर किसी प्रकार का बंधन न तो संभव है और ना ही लगाना चाहिए। हमारे जैसे बहुआयामी देश में इस तरह का बंधन संभव नहीं है।
आखिर परस्पर विरोधी विचारों को सहना ही तो हमारे देश की सबसे बड़ी ताकत है। स्वामी के समान लोग जो भारत को एक ही दिशा में ले जाना चाहते हैं और जो किसी भी प्रकार के विरोधी विचार को सहने के लिए तैयार नहीं हैं उनके इस दकियानूसी रवैये से हमारे देश का भारी नुकसान होता है। प्रधानमंत्री को स्पष्ट करना चाहिए कि हम इस तरह के एकतरफा संकुचित विचारों के विरूद्ध हैं। प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को स्वामी जैसे संकुचित विचार वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों पर लगाम कसना चाहिए और उन्हें स्पष्ट रूप से बता देना चाहिए कि भारतीय जनता पार्टी की चिंता क्या है। उसका इस तरह के मुद्दों पर रवैया क्या है? हिंदुस्तान टाईम्स ने अंत में अपने संपादकीय में चेतावनी देते हुये कहा है कि यदि सत्ताधारी पार्टी ऐसा नहीं करती है तो वह वास्तव में हमारे देश का भारी नुकसान करेगी।
संघ और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हुये लोगों के रवैये की अमरीका के सर्वाधिक लोकप्रिय समाचारपत्र न्यूयार्क टाईम्स ने भी निंदा की है। अपने 8 अक्टूबर के संस्करण के संपादकीय में न्यूयार्क टाईम्स लिखता है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत के युवकों को एक सुनहरे भविष्य का आश्वासन दिया है। शायद वे जानते होंगे कि इस आश्वासन को पूरा करने के लिए उच्च कोटि की शिक्षा और उच्च कोटि के अवसर प्रदान करना आवश्यक है। तभी 25 वर्ष से कम आयु वाले 60 करोड़ भारतीय युवकों को सही दिशा मिलेगी। आज इन युवकों में बुनियादी योग्यताओं की कमी है।
अपने 2014 के घोषणापत्र में भारतीय जनता पार्टी ने कहा था कि राष्ट्र के विकास के लिये और गरीबी के उन्मूलन के लिये शिक्षा ही सबसे बड़ा प्रभावी हथियार है। अब सवाल यह है कि क्या शिक्षा में सुधारों का उपयोग एक प्रबुद्ध शिक्षित नागरिकों की जमात बनाने के लिये ही किया जायेगाघ् क्या इस तरह की जमात को आवश्यक प्रशिक्षण दिया जायेगा या एक विशेष प्रकार की विचारधारा को आगे बढ़ाया जायेगा?
पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी ने राष्ट्र का प्रशासन चलाने के लिए गुजरात मॉडल की सिफारिश की थी। अनेक मतदाताओं ने इसे एक लचीली अर्थव्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता माना था। परंतु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि गुजरात मॉडल में वे पाठ्यपुस्तकें भी शामिल हैं जिन्हें दीनानाथ बत्रा ने लिखी हैं। बत्रा एक ऐसे विद्वान हैं जो भारत को दक्षिणपंथी रास्ते पर ले जाना चाहते हैं।
पिछले फरवरी माह में उनने पेंग्विन पर यह दबाव बनाया कि वह वेंडी डोनीगर जो शिकागो यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं उनकी किताबों का प्रकाशन रद्द किया जाये। क्योंकि बत्रा की राय में उस प्रकाशन ने हिंदू धर्म का अपमान किया है। उसके बाद जून के महीने में गुजरात सरकार ने यह आदेश जारी किया कि गुजरात के पाठ्यक्रम में बत्रा की किताबें शामिल की जायें। बत्रा की किताबों में अनेक ऐसी बातें शामिल हैं जिन्हें गंभीरता से नहीं लिया जा सकता। उनकी किताबों में विद्यार्थियों को सलाह दी गई है कि वे केक और मोमबत्ती के साथ अपना जन्मदिन न मनायें क्योंकि यह गैर भारतीय रीति रिवाज है।
बत्रा विद्यार्थियों से कहते हैं कि वे अखण्ड भारत का नक्शा बनायें। जिस अखण्ड भारत में बांग्लादेश,श्रीलंका,तिब्बत,पाकिस्तान और अफगानिस्तान शामिल हैं। बत्रा की यह भी मान्यता है कि प्राचीन भारत में कारें थीं, हवाईजहाज भी थे और अणु अस्त्र भी थे। वे कहते हैं कि विद्यार्थियों को इसका ज्ञान होना चाहिए।
यहां स्मरण दिलाना उचित होगा कि 1999 में जब केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली मिलीजुली सरकार थी उस समय बत्रा को इतिहास की पाठ्यपुस्तकें तैयार करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया था। उस समय यह काम अधूरा रह गया था, चूंकि 2004 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार चुनाव में अपदस्थ हो गई थी और वह काम अधूरा रह गया था। इसलिए अब बत्रा दावा करते हैं कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री स्मृति जूबिन ईरानी ने उन्हें आश्वस्त किया है कि उनकी किताबें शीघ्र ही राष्ट्रीय पाठ्यक्रम का हिस्सा बन जायेंगी।
शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण विद्या है यदि इस पर ऐसे लोगों का नियंत्रण हो जाता है जो ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़मरोड़कर पेश करते हैंए जो लगभग तानाशाही के ढंग से यह तय करते हैं कि कौन से सांस्कृतिक रीतिरिवाज भारतीय हैं, जो एक योजना के अनुसार की जाने वाली गतिविधि के द्वारा पड़ोसियों के मन में खतरनाक भावनाओं को जन्म देते हैं। इस तरह की प्रवृत्तियों से देश का भला नहीं होगा न्यूयार्क टाईम्स अंत में लिखता है।
 -एल.एस. हरदेनिया

मंगलवार, 24 जून 2014

अपने पड़ोसी से प्यार करो: नवाज़ शरीफ की भारत यात्रा

जब से भारत का बंटवारा हुआ है, तब से शायद ही कभी भारत और पाकिस्तान के आपसी रिश्ते मधुर रहे हों। किसी न किसी मुद्दे को लेकर, हमारे पड़ोसी से हमारे रिश्तों में कड़वाहट घुली ही रहती है। यहां तक कि आमजन, पाकिस्तान को हमारे ‘शत्रु’ के रूप में देखते हैं। यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शपथग्रहण समारोह में यद्यपि सभी सार्क देशों  के प्रतिनिधि पहुंचे थे तथापि मीडिया और जनता का सबसे अधिक ध्यान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ पर केन्द्रित था।  मोदी ने सभी सार्क देशों  के प्रमुखों को अपने षपथग्रहण समारोह (16 मई 2014) में आमंत्रित किया था। यह समारोह बहुत शान-ओ-शोकत के साथ सम्पन्न हुआ।
नवाज़  शरीफ को भारत का निमंत्रण स्वीकार करने में काफी परेशानियां आईं। उनके परिवार, जिसमें उनकी पुत्री शामिल हैं, ने ट्वीट कर कहा कि उन्हें यह निमंत्रण स्वीकार करना चाहिए। उनकी पुत्री का कहना था कि कोई कारण नहीं कि भारत और पाकिस्तान, उत्तरी और दक्षिणी कोरिया की तरह हमेशा एक-दूसरे के प्रति बैरभाव पाले रहें। क्या कारण है कि इन दोनों देशों के बीच उस तरह के मधुर संबंध नहीं रह सकते जैसे कि यूरोपियन यूनियन के देशों के हंै।शरीफ की पुत्री, दरअसल, पाकिस्तान के बहुसंख्यक लोगों की भावनाओं को स्वर दे रहीं थीं, जो कि चाहते हैं कि पाकिस्तान में प्रजातंत्र मजबूत हो और उसके भारत से अच्छे रिश्ते रहें। पाकिस्तान की आम जनता का यह मानना है कि भारत के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, पाकिस्तान में प्रजातंत्र की सफलता और देश   के विकास की आवष्यक शर्त हैं। कुछ सालों पहले मैं पाकिस्तान गया था और मुझे यह देखकर आष्चर्य हुआ कि वहां के लोगों में भारत के साथ दोस्ताना संबंध बनाने की कितनी उत्कट इच्छा है। जब भी कोई गैर-राजनीतिज्ञ भारतीय, पाकिस्तान जाता है, वहां के लोग जिस गर्मजोशी  से उसका स्वागत करते हैं, उसमें भी यही भावना प्रतिबिम्बित होती है। पाकिस्तान और भारत के बीच यदि शांति व मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित नहीं हो पा रहे हैं तो उसका कारण वहां का शक्तिशाली सेना-मुल्ला गठजोड़ है। इस बार भी जिस समय मोदी के निमंत्रण को स्वीकार करने या न करने पर पाकिस्तान सरकार विचार कर रही थी उसी समय अफ़गानिस्तान के हैरात में भारत के वाणिज्य दूतावास पर आतंकी हमला हुआ। पाकिस्तान के हाफिज सईदों की भृकटियां तन गईं और उन्होंने अपनी पुरानी धमकियां एक बार फिर दोहराईं। हम सबको याद है कि किस तरह, जब भारत और पाकिस्तान के बीच शांति प्रक्रिया जोर पकड़ रही थी, उसी समय मुंबई पर 26/11 का आतंकवादी हमला हुआ था। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत-पाक शांति प्रक्रिया और आतंकी हमलों में सीधा संबंध है। ये हमले उन आतंकी समूहों द्वारा किए जाते हैं जिन्हें पाकिस्तान की सेना के एक हिस्से का समर्थन प्राप्त है।
इसी तरह, जब पिछली एनडीए सरकार के मुखिया अटलबिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ शांति वार्ताएं शु रू कीं और बस से लाहौर पहुंचे, तब पाकिस्तान की सेना ने इस पहल का विरोध किया और कारगिल पर चढ़ाई कर दी। उस समय परवेज़ मुशर्रफ सेना प्रमुख थे। कारगिल पर पाकिस्तानी सेना के कब्जे के बाद भारतीय सैन्यबलों ने उसके खिलाफ कार्यवाही की। अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भी कड़े शब्दों में पाकिस्तान से कारगिल पर कब्जा छोड़ने के लिए कहा। अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान मैं ऐसे कुछ नागरिक कार्यकर्ताओं से भी मिला जो भारत के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों के प्रति प्रतिबद्ध हैं। ये लोग भारत में अपने साथियों के साथ मिलकर, पाक-भारत पीपुल्स फोरम जैसी संस्थाएं चला रहे हैं। वे शांति के अलावा अन्य मुद्दों पर भी जोर देते आए हैं, जिनमें उन निर्दोष मछुआरों को छोड़े जाने की मांगशामिल है जो गलती से दोनों देशों  की सीमाओं का अतिक्रमण करने के कारण पकड़कर जेलों में ठूंस दिए जाते हैं। इस बार नवाज़ शरीफ ने अपनी भारत यात्रा के पूर्व, पाकिस्तान की जेलों में बंद भारतीय मछुआरों को छोड़ने का आदेश जारी कर एक सकारात्मक कदम उठाया। कहने की आवष्यकता नहीं कि यदि दक्षिण एशिया मेंशांति स्थापित की जानी है तो वह भारत और पाकिस्तान के बीच अच्छे रिश्तों के बगैर संभव नहीं है। वहां मेरी मुलाकात उन लोगों से भी हुई जो ‘‘अमन की आषा’’ नामक संस्था के लिए काम कर रहे हैं। इस संस्था की स्थापना, भारत के एक प्रमुख दैनिक और पाकिस्तान से प्रकाशित एक अखबार ने मिलकर की है।
भारत में पाकिस्तान के खिलाफ सबसे तीखे स्वर में जो पार्टी बात करती है वह है भाजपा। परंतु भाजपा, पाकिस्तान पर शाब्दिक हमले तभी करती है जब वह सत्ता में नहीं होती। पाकिस्तान के प्रति भाजपा के रवैए में स्पष्ट विरोधाभास हैं। जब वह सत्ता में नहीं होती तब वह पाकिस्तान पर कटु हमले कर भारत की जनता को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने की कोशिश करती है। इसके विपरीत, सत्ता में आने पर वह पाकिस्तान की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाती है और शांति के कबूतर छोड़ती है। हम यह कैसे भूल सकते हैं कि हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री ने गोधरा कांड और उसके पश्चात हुए दंगों के बाद, पाकिस्तान और उसके राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ पर तीखे हमले कर, गुजरात की जनता को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत किया था। सन् 2002 के विधानसभा चुनाव में गुजरात में सैंकड़ों ऐसे होर्डिंग लगे थे जिनमें एक ओर मोदी की तस्वीर थी और दूसरी और मुशर्रफ की।  हालिया चुनाव अभियान के दौरान भी मोदी, पाकिस्तान को आंखे दिखाते रहते थे। उनकी पार्टी के एक अन्य सदस्य गिरीराज सिंह ने तो पाकिस्तान के बारे में लगभग गालीगलौच की भाषा मंे बात की थी। इस सबका उद्देश्य एक ऐसी मानसिकता विकसित करना है जिसमें यह माना जाता है कि भारतीय मुसलमान, पाकिस्तान के प्रति वफादार हैं और दोनों देशों  की क्रिकेट टीमों के बीच मैच, दरअसल एक युद्ध है। इस तरह, क्रिकेट, जो कि दोनों देशों के बीच दोस्ती का सेतु बना सकता है, का इस्तेमाल कटुता उत्पन्न करने के लिए किया जाता है। यह तथ्य भुला दिया जाता है कि पाकिस्तान की ओर से भारत में जासूसी करने के आरोप में मधु गुप्ता सहित जितने भी लोग पकड़े गए हैं, उनमें से अधिकांश हिन्दू हैं। इसके बाद भी, हर मुसलमान को पाकिस्तान के जासूस की तरह देखने की हमारी आदत गई नहीं है। पेशावर में जन्में हमारे देश के महान फिल्म कलाकार दिलीप कुमार को पाकिस्तान के उच्चतम नागरिक सम्मान निशान-ए-पाकिस्तान को स्वीकार करने के लिए कई बार अपमानित किया गया। यहां तक कि दिलीप कुमार की भारत के प्रति वफादारी पर भी प्रश्न चिन्ह लगाए जाते रहे हैं। सीमा पर होने वाली मामूली से मामूली मुठभेड़ का इस्तेमाल, पाकिस्तान के बारे में उल्टी-सीधी बातें कहने के लिए किया जाता है। भाजपा, हमेशा से कांग्रेस पर पाकिस्तान के प्रति ‘नर्म रवैया’ अपनाने का आरोप लगाती रही है। कुल मिलाकर, जब भाजपा सत्ता में नहीं होती तब पाकिस्तान-विरोधी दुष्प्रचार उसकी राजनैतिक रणनीति का प्रमुख हिस्सा रहता है।
भाजपा की गठबंधन साथी शिवसेना, एक और कदम आगे बढ़कर, पाकिस्तान व भारत के बीच रिश्ते बेहतर करने के  हर प्रयास में रोड़े खड़े करती आ रही है। शिवसेना कार्यकर्ताओं ने मुंबई में होने वाले भारत-पाकिस्तान किक्रेट मैच को रोकने के लिए वानखेड़े स्टेडियम की पिच खोद डाली थी। पाकिस्तान के कलाकारों के कार्यक्रमों में हंगामा और तोड़फोड़ करना भी शिवसेना का षगल रहा है। अभी भी, जब मोदी ने नवाज़ शरीफ को आमंत्रण भेजा तब शिवसेना ने यह धमकी दी कि वह शपथग्रहण समारोह का बहिष्कार करेगी। सौभाग्यवश, बाद में शिवसेना को अकल आ गई और उसके मुखिया ने शपथग्रहण समारोह में हिस्सा लिया।
यह दुर्भाग्य की बात है कि लगभग संपूर्ण दक्षिण एशिया में धार्मिक अल्पसंख्यक, तरह-तरह के कष्ट भोग रहे हैं। पाकिस्तान में ईसाई और हिन्दू, भारत में ईसाई और मुसलमान, बांग्लादेश में हिन्दू और बौद्ध, हिंसा का शिकार बनते आ रहे हैं और उन्हें डराया-धमकाया जाना आम है। सभी देशो  को आपसी बातचीत और सहयोग से यह सुनिष्चित करना चाहिए कि अपने-अपने देशों  में वे अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करें। हर व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है। अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, सार्क देशों  का मुख्य एजेंडा होना चाहिए। जिस देश में भी दो या दो से अधिक समुदाय एक दूसरे से घृणा करते रहेंगे या एक दूसरे के खिलाफ हिंसा करेंगे, वह देश कभी प्रगति नहीं कर सकता।
जहां तक पाकिस्तान का सवाल है, वहां प्रजातंत्र जितना मजबूत होगा, सेना की पकड़ उतनी ही कमजोर होगी और शांति प्रक्रिया जोर पकड़ेगी। दूसरी ओर, सेना जितनी मजबूत होगी, प्रजातंत्र उतना ही कमजोर होगा और भारत से रिश्ते उतने ही खराब होंगे। भारत में पाकिस्तान की तुलना में प्रजातंत्र की जड़ें काफी मजबूत हैं परंतु पाकिस्तान की प्रजातांत्रिक सरकार के प्रति सकारात्मक रूख रखना हमारे लिए आवश्यक है ताकि सेना, सामंतवादियों और कट्टरपंथी मुल्लाओं का गठजोड़ कमजोर पड़े और वहां प्रजातंत्र मजबूत हो। भारत और पाकिस्तान दोनों तरह-तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं। दोनों ही देशों  के लोगों को स्वास्थ, पोषण, शिक्षा व रोजगार संबंधी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में सेनाओं पर बढ़ता खर्च, दोनों ही देशों  की प्रगति को अवरूद्ध करेगा। जरूरी यह है कि दोनों देश रोटी, कपड़ा और मकान पर धन खर्च करें न कि टैंकों और बंदूकों पर।
-राम पुनियानी

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

गुजरात कत्लेआम और नरेन्द्र मोदी

हाल (जनवरी 2014) में एक टेलीविजन चैनल पर प्रसारित अपने साक्षात्कार में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने यह कहकर हंगामा खड़ा कर दिया कि संभव है कि कुछ कांग्रेसजन, सन् 1984 के सिक्ख-विरोधी दंगों में शामिल रहे हांे। उन्होंने यह भी कहा कि सन् 2002 के गुजरात कत्लेआम के लिए मोदी भी दोषी हैं।
इस साक्षात्कार पर कई विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आईं। अरविन्द केजरीवाल ने सन् 1984 के दंगों की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) के गठन का वायदा दिल्ली विधानसभा चुनाव के पहले ही कर दिया था। उनकी सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है और संभवतः जल्दी ही 1984 के त्रासद खूनखराबे की जांच के लिए विशेष जांच दल नियुक्त कर दिया जाएगा। यहां यह कहना समीचीन होगा कि इतना समय गुजर जाने के बाद, जांच का कोई विशेष अर्थ नहीं रह जाता क्योंकि अब तक अधिकांश सुबूत नष्ट या गुम हो चुके होंगे। परंतु फिर भी, न्यायिक प्रक्रिया मशीनरी को सक्रिय कर जो कुछ भी किया जा सकता है, किया जाना चाहिए। दंगों के पीडि़तों के साथ न्याय होना चाहिए। कहने की आवष्यकता नहीं कि सभी दंगा पीडि़तों को, चाहे वे किसी भी धर्म के क्यों न हों, न्याय मिलना चाहिए। कश्मीरी पंडितों के साथ भी न्याय होना चाहिए और उनके पुनर्वास की व्यवस्था की जानी चाहिए। जब भी गुजरात की भयावह हिंसा के पीडि़तों को न्याय दिलवाने की बात होती है तब कश्मीरी पंडितों और सिक्ख दंगों के मुद्दे उछाल दिए जाते हंै। यह मूल मुद्दे से लोगों का ध्यान हटाने के प्रयास के अतिरिक्त कुछ नहीं है।
दो गलत चीजें मिलकर सही नहीं हो जातीं। - ग - = $ केवल गणित में होता है। किसी धार्मिक समुदाय के खिलाफ ंिहंसा से, उस समुदाय को न्याय नहीं मिल जाता जिसके साथ अन्याय हुआ हो। इसी तरह, भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय को इस आधार पर उचित ठहराना कि पाकिस्तान या बांग्लादेश  में हिन्दुओं के साथ अन्याय हो रहा है, पूरी तरह अमानवीय है। सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों, को सभी देशों  में, हमेशा  न्याय मिलना चाहिए। किसी एक स्थान या देश  में अन्याय को सहना, हर जगह अन्याय को सहने के समकक्ष है।
राहुल गांधी की गुजरात के बारे में टिप्पणी के जवाब में भाजपा प्रवक्ताओं ने जोर देकर कहा कि मोदी को एसआईटी और अदालत से क्लीन चिट मिल चुकी है। यह दुष्प्रचार है। गुजरात की हिंसा के शुरूआती दौर से ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग गुजरात मंे हिंसा प्रायोजित करने के लिए मोदी को दोषी ठहराता रहा है। यद्यपि एसआईटी ने यह दावा किया है कि मोदी पर मुकदमा चलाने का कोई आधार नहीं है परन्तु एसआईटी की रपट में ही ऐसी कई बातें हैं जिनसे यह जाहिर होता है कि मोदी ने दंगों के दौरान और उनके बाद, वह नहीं किया जो उन्हें करना चाहिए था और वह किया जो उन्हें नहीं करना था। मोदी के समर्थक कहते हैं कि दिल्ली में तीन दिन तक सेना नहीं बुलाई गई थी परंतु वे यह भूल जाते हैं कि दिल्ली की हिंसा पर तीन दिनों में नियंत्रण स्थापित कर लिया गया था। इसके विपरीत, गुजरात में 27 फरवरी 2002 से लेकर मई तक हिंसा जारी रही। हिंसा तभी रूकी जब तत्कालीन प्रधामनंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने केपीएस गिल को हिंसा पर नियंत्रण करने के लिए विशेष रूप से गुजरात भेजा। इस मसले पर मोदी की लगातार निंदा की जाती रही और यह निंदा आधारहीन या बकवास नहीं है।
उच्चतम न्यायालय ने गुजरात सरकार को लताड़ लगाते हुए कहा था ‘‘जब गुजरात जल रहा था तब वहां के नीरो बांसुरी बजा रहे थे।‘‘ अटलबिहारी वाजपेयी तक ने मोदी से राजधर्म का पालन करने के लिए कहा था। गुजरात में जिस तरह का वातावरण बन गया था, उसी के चलते उच्चतम न्यायालय ने  दंगों से संबंधित दो बड़े मामलों को राज्य से बाहर स्थानांतरित किया था। गुजरात में आतंक के इस वातावरण का सृजन अगर मोदी ने नहीं किया था तो फिर किसने किया था? न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत के ताजा निर्णय के बाद, मल्लिका साराभाई ने कहा, ‘‘गुजरात की किसी अदालत से यह अपेक्षा करना बेकार है कि वह मोदी को क्लीन चिट के अलावा कुछ और देगी‘‘। एसआईटी की रपट की व्याख्या भी गलत ढंग से की गई है। एसआईटी और न्यायमित्र राजू रामचन्द्रन - दोनों की नियुक्ति उच्चतम न्यायालय ने की थी। यह कहना कि एसआईटी ने मोदी को क्लीन चिट दे ही है, पूरी तरह सच नहीं है। तथ्य यह है कि एसआईटी ने 2010 की अपनी रपट में कहा था कि गुलबर्ग सोसायटी और अन्य स्थानों पर मुसलमानांें पर भयावह हिंसक हमलों पर सरकार की प्रतिक्रिया वैसी नहीं थी जैसी कि अपेक्षा की जाती है। मुख्यमंत्री ने गुलबर्ग सोसायटी व नरोदा पाटिया की दिल दहलाने वाली घटनाओं को यह कहकर खारिज कर दिया था कि प्रत्येक क्रिया की विपरीत एवं समान प्रतिक्रिया होती है। राजू रामचन्द्रन का यह स्पष्ट मत है कि एसआईटी की रपट के आधार पर मोदी को अभियोजित किया जा सकता है।
याद रहे कि राष्ट्रीय मानाविधकार आयोग ने 31 मई 2002 को जारी अपनी रपट में निष्कर्ष स्वरूप कहा था कि ‘गुजरात में राज्य, लोगों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने में पूर्णतः विफल रहा‘‘। न्यायमित्र ने अपनी अंतिम रपट में मोदी पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 166, 153-अ व 153-ब के तहत मुकदमा चलाए जाने की अनुषंसा की है। तो फिर कहां है क्लीन चिट? राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मोदी को दोषी बताया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त न्यायमित्र का मत है कि मोदी के विरूद्ध मुकदमा चलाया जा सकता है। तीसर,े जकिया जाफरी मामले में न्याय प्रक्रिया की शुरूआत ही हुई है। अदालत के निर्णय के बाद जकिया जाफरी ने कहा कि वे ऊँची अदालत में अपील करंेगीं। हमारे देश  में न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत से न्यायिक प्रक्रिया शुरू होती है, खत्म नहीं। यह कहना कि मोदी को गुजरात दंगांे के मामले में क्लीन चिट मिल गई है, तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करना है। यह झूठा प्रचार एक विशिष्ट उद्देष्य से किया जा रहा है।
हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि मोदी के नजदीकी साथी बाबू बजरंगी और माया कोडनानी, गुजरात दंगों में हिंसा भड़काने और उसमें भाग लेने के दोषी पाए गए हैं और उन्हें कड़ी सजाएं सुनाई गई हैं। तहलका के स्टिंग आपरेषन से यह स्पष्ट है कि बाबू बजरंगी व उनके साथियों की मोदी की सरकार से मिलीभगत थी। ‘‘सिटीजन्स फाॅर जस्टिस एण्ड पीस‘‘ के तत्वाधान में गठित जन न्यायाधिकरण ने भी दंगों मंे मोदी की भूमिका को रेखांकित किया है। इस जन न्यायाधिकरण में पी बी सावंत जैसे जानेमाने न्यायविद् शामिल थे। गुजरात दंगों से संबंधित केवल चन्द मामलों में न्याय हुआ है और वह भी इसलिए संभव हो पाया क्योंकि पीडि़तों और मानवाधिकारों के रक्षकों ने इसके लिए एक लंबी और कठिन लड़ाई लड़ी। न्याय की इस प्रक्रिया को आगे बढाए जाने की जरूरत है। गुजरात सरकार ने पीडि़तों के न्याय पाने की राह में हर संभव बाधा खडी़ की है। क्लीन चिट के दावों में कोई दम नहीं है। दुष्प्रचार की गहरी धुंध के बावजूद  ध्यान से देखने पर मोदी के खून से रंगे हाथ स्पष्ट दिखलाई दे रहे हैं।
 -राम पुनियानी

रविवार, 10 मार्च 2013

जमायते इस्लामी द्वारा हिंसा


बांग्लादेश साम्प्रदायिकता का पुनरूत्थान

हमारा पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश, इस्लामवादी जमायते इस्लामी द्वारा की जा रही हिंसा से हलकान है। इस हिंसा में अब तक 50 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। कई घायल हुए हैं और हिन्दू पूजास्थलों को नुकसान पहुंचाया गया है। हिंसा बांग्लादेश की सीमा को पार कर कोलकाता तक आ पहुंची है। पिछले और इस माह, मुस्लिम साम्प्रदायिक तत्वों और मायनारिटी यूथ आर्गनाईजेशन जैसे कई संगठनों के सदस्यों की भीड़ ने कोलकाता में जम कर उत्पात मचाया। यह हिंसा जमायते इस्लामी के उपाध्यक्ष दिलावर हुसैन सैय्यदी को मौत की सजा सुनाए जाने के विरोध स्वरूप हो रही है। उन्हें तत्कालीन पूर्वी व पश्चिमी पाकिस्तान के बीचए 9 माह तक चले युद्ध में सामूहिक हत्याओं, बलात्कारों व अन्य अत्याचारों के लिए दोषी ठहराया गया है।
वे जमायते इस्लामी के तीसरे ऐसे पदाधिकारी हैं जिन्हें तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तान की सेना के जुल्मों के खिलाफ सन् 1971 में लड़े गए 'मुक्ति युद्ध' के दौरान अपराध करने का दोषी पाया गया है। शेख हसीना सरकार ने सन् 1971 के युद्ध अपराधों के दोषियों को सजा देने के लिए लगभग तीन वर्ष पहले 'युद्ध अपराध अधिकरण' का गठन किया था और इस अधिकरण ने अब अपने निर्णय सुनाने शुरू किए हैं। बांग्लादेश में इन दिनों प्रजातंत्र में विश्वास करने वाले युवा बड़ी संख्या में, उन लोगों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की मांग कर रहे हैं जिनकी पाकिस्तान की सेना के साथ मिलीभगत थी। दूसरी ओर, जमात के कार्यकर्ता भी सड़कों पर उतर आए हैं और सन् 1971 के युद्ध अपराधियों को सजा दिए जाने का विरोध कर रहे हैं। भारत में भी जमायते इस्लामी ने शाहबाग आंदोलन का विरोध किया था और वह भी सन् 1971 के युद्ध अपराधियों को सजा दिए जाने के खिलाफ है। जमायते इस्लामी ने सन् 1971 में बांग्लादेश की मुक्ति वाहिनी, जिसका नेतृत्व शेख मुजीब.उर.रहमान कर रहे थे, का विरोध किया था। मुक्ति वाहिनी द्वारा शुरू किए गए स्वाधीनता संघर्ष को बांग्लादेश के अधिकांश निवासियों का समर्थन प्राप्त था। उस समय पाकिस्तानी सेना द्वारा किए गए हमलों में लगभग 30 लाख लोग मारे गए थे और बांग्लादेश की 2 लाख से अधिक महिलाओं के साथ बलात्कार हुए थे। बड़ी संख्या में पूर्वी पाकिस्तान के बुद्धिजीवियों और राजनैतिक कार्यकर्ताओं को मौत के घाट उतार दिया गया था।
भारत के विभाजन की कथा बहुत त्रासद है और आज 66 साल बाद भीए इसके घाव भरे नहीं हैं। भारत का विभाजन एक अजीब से तर्क के आधार पर किया गया था। इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान बना दिया गया जबकि भारत को धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र घोषित किया गया। इस विभाजन का घोषित उद्धेश्य था साम्प्रदायिकता की समस्या को सुलझाना। अंग्रेजों ने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में धर्म की राजनीति और धर्म के नाम पर हिंसा की जो विरासत छोड़ी है, वह अब भी उपमहाद्वीप के तीनों राष्ट्रों के लिए सिरदर्द बनी हुई है। फूट डालो और राज करो की ब्रिटिश नीति के दो प्रमुख हिस्से थे। पहलाए बढ़ते औद्योगिकरण के बाद भी सामंती तत्वों का दबदबा बरकरार रखना और दूसरा, 1906 में मुस्लिम लीग के गठन के बाद से ही लीग को भारतीय मुसलमानों के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में मान्यता देना। मुस्लिम लीग का गठन मुसलमानों के तत्समय अस्त हो रहे वर्ग ने किया था। इनमें शामिल थे नवाब और जमींदार। बाद में मुस्लिम शिक्षित वर्ग और श्रेष्ठि वर्ग ने भी इसकी सदस्यता ग्रहण करनी शुरू कर दी। मुस्लिम लीग किसी भी तरह से भारतीय मुसलमानों की प्रतिनिधि नहीं थी। उसी तरह, मुस्लिम लीग के समानांतर गठित हिन्दू महासभा भी हिन्दू राजाओं और जमींदारों का संगठन थी जिसमें बाद में शिक्षित वर्ग का एक हिस्सा और उच्च जातियों के कुछ लोग शामिल हो गए। इन दोनो ही संगठनों ने एजेन्डे में स्वतंत्रताए समानता और बंधुत्व के मूल्यों के लिए कोई स्थान नहीं था। ये मूल्य भारत के स्वाधीनता संग्राम के आधार थे।
इन दोनों ;हिन्दू व मुस्लिम साम्प्रदायिक धाराओं के बीच गहरे आपसी संबंध थे। विभाजन के ठीक पहले तक, सिंध और बंगाल में हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग की गठबंधन सरकारें थीं। ये दोनों ही संगठन आजादी के आंदोलन से दूर रहे और दोनों ही सामाजिक एवं लैंगिक ऊँचनीच के हामी थे। यद्यपि ये दोनों संगठन समाजसुधार को औपचरिक समर्थन देते थे तथापि असल में उनकी इच्छा यही थी कि सामाजिक रिश्तों में यथास्थिति बनी रहे।
विभाजन के बादए पूरे पाकिस्तान पर पश्चिमी पाकिस्तान का वर्चस्व स्थापित हो गया। सेना, नौकरशाही, अर्थजगत और राजनीति में सभी महत्वपूर्ण पदों पर पश्चिमी पाकिस्तान के लोग काबिज हो गए। सन् 1970 में शेख मुजीब.उर.रहमान की अध्यक्षता वाली अवामी लीग ने चुनाव में शानदार सफलता हासिल की परंतु जुल्फिकार अली भुट्टो, जिन्हें सेना का समर्थन प्राप्त था, ने अवामी लीग की सरकार नहीं बनने दी। यहां हम राजनीति और धर्म के बीच का टकराव स्पष्ट देख सकते हैं। जहां इस्लाम यह कहता है कि सभी मनुष्य भाई.भाई हैं वहीं इस्लाम के नाम पर की जा रही राजनीति, अन्य धर्मावलम्बियों के साथ तो भेदभाव करती ही है, वह मुसलमानों में भी भेदभाव करती है। पूर्वी पाकिस्तान के मुसलमानों पर पश्चिमी पाकिस्तान के मुसलमान हावी थे और उनका क्रूर दमन कर रहे थे।
अवामी लीग को सरकार नहीं बनाने दी गई। पाकिस्तान में विरोध व्यक्त करने के प्रजातांत्रिक चैनलों का अभाव था। नतीजतन, पूर्वी पाकिस्तान में अलगाव का भाव पनपने लगा और मुजीब.उर. रहमान ने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने की घोषणा की। पूर्वी पाकिस्तान की जनता उठ खड़ी हुई और चारों ओर से विद्रोह के स्वर सुनाई देने लगे। इसके बाद पाकिस्तान की सेना अपने ही नागरिकों पर टूट पड़ी। पूर्वी पाकिस्तान में सेना ने कहर बरपाना शुरू कर दिया। बड़ी संख्या में हत्याएं और बलात्कार हुए। हिन्दू इस अत्याचार के मुख्य शिकार थे परंतु मुसलमानों को भी बख्शा नहीं गया। पूर्वी पाकिस्तान के नागरिकों के साथ शत्रुओं से भी बदतर व्यवहार किया गया। सामूहिक बलात्कारों और हत्याओं का सिलसिला तब तक जारी रहा जब तक कि मुक्तिवाहिनी ने भारतीय सेना की मदद से पूर्वी पाकिस्तान को स्वतंत्र देश घोषित नहीं कर दिया। इस प्रकार बांग्लादेश गणराज्य अस्तित्व में आया।
बांग्लादेश के गठन से इस सिद्धांत के परखच्चे उड़ गए कि राष्ट्र, धर्म पर आधारित होते हैं और हर धर्म एक अलग राष्ट्र होता है। बांग्लादेश के निर्माण ने द्विराष्ट्र सिद्धांत को हमेशा.हमेशा के लिए दफन कर दिया। परंतु हिन्दू और मुसलमान अलग.अलग राष्ट्र हैं, इस सिद्धांत के निर्णायक खंडन ने भी भारतीय उपमहाद्वीप से साम्प्रदायिक तत्वों का सफाया नहीं किया। वे समय.समय पर अपना सिर उठाते रहे। बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के बाद बांग्लादेश के मुस्लिम साम्प्रदायिक तत्वों ने भारत पर चढ़ाई करने की घोषणा की थी।
बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की हालत अत्यंत दयनीय है। कई मुस्लिम और हिन्दू शरणार्थी बांग्लादेश छोड़कर भारत आ गए हैं। इनके कारण हिन्दू साम्प्रदायिक तत्वों को बांग्लादेशी घुसपैठिए का हौव्वा खड़ा करने का मौका मिल गया है। भारतीय उपमहाद्वीप के तीनों देशों की राजनीति का काफी हद तक साम्प्रदायिकीकरण हो चुका है।
भारत में साम्प्रदायिक राजनीति के बीज जमींदारों के अस्त होते हुए वर्ग ने बोए थे और उन्हें संरक्षण दिया था अंग्र्रेज साम्राज्यवादियों ने। दरअसल, यही साम्प्रदायिक तत्व अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति की सफलता और भारत के विभाजन के लिए जिम्मेदार थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारतीय उपमहाद्वीप के तीनों देशों में साम्प्रदायिकता के जहर की तीव्रता अलग.अलग है। पाकिस्तान को औपनिवेशिक.साम्राज्यवादी ताकतों के हाथों सबसे ज्यादा नुकसान भुगतना पड़ा और वहां हिन्दुओं और ईसाईयों की हालत सबसे खराब है। पाकिस्तान में सेना, साम्प्रदायिक ताकतों की साथी है और वह आमजनों की प्रजातांत्रिक महत्वाकांक्षाओं को कुचलने में सबसे आगे है। बांग्लादेश में प्रजातांत्रिक प्रक्रिया से निर्वाचित सरकारों को साम्प्रदायिक तत्वों का जबरदस्त दबाव झेलना पड़ रहा है। भारत में हिन्दू साम्प्रदायिक तत्वों ने राम मंदिर जैसे पहचान से जुड़े मुद्दों को केन्द्र में लाकर देश को कमजोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। हमारे औपनिवेशिक शासकों की नीतियों के कारण जिन समस्याओं का सामना हमें करना पड़ रहा है उन्हें ये ताकतें साम्प्रदायिक रंग दे रही हैं। बांग्लादेश को घुसपैठियों का स्त्रोत बताया जा रहा है जबकि सच यह है कि सन् 1971 में जो गरीब हिन्दू और मुसलमान वहां से भागे थे, वे पाकिस्तान की सेना के क्रूर अत्याचारों से बचने के लिए अपना घर.बार छोड़ने पर मजबूर हुए थे। कश्मीर की समस्या भी अंग्रेज शासकों की भारतीय उपमहाद्वीप को भेंट है। इस समस्या को भी दोनों देशों के साम्प्रदायिक तत्व, हिन्दू और मुस्लिम चश्मे से देख रहे हैं।
इस तरह, भारतीय उपमहाद्वीप के तीनों देश साम्प्रदायिकता के दैत्य का मुकाबला कर रहे हैं। दोनों धर्मों के साम्प्रदायिक तत्वों की एक बड़ी सफलता यह है कि उन्होंने धर्म और राजनीति के बीच की विभाजक रेखा को मिटा दिया है। इन साम्प्रदायिक ताकतों की आलोचना को संबंधित धर्म की आलोचना का पर्यायवाची मान लिया गया है। तीनों देशों के प्रजातंत्र में विश्वास रखने वाले वर्ग को एक.दूसरे से हाथ मिलाकर साम्प्रदायिकता के दैत्य और धर्म की राजनीति का खात्मा करना चाहिए। परंतु क्या साम्प्रदायिक ताकतें, जो भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश तीनों में ही काफी शक्तिशाली हैं, ऐसा होने देंगी साम्प्रदायिक ताकतें जुनून का ज्वार पैदा करने की कला में सिद्धहस्त होती हैं। वे धर्मनिरपेक्ष, प्रजातांत्रिक शक्तियों को अपने.अपने धर्म के लिए खतरा बताकर जोर.जोर से छातियां पीटना जानती हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में प्रजातंत्र को बचाना और उसे मजबूती देना एक अत्यंत दुष्कर कार्य है। क्या भारतीय उपमहाद्वीप के वे निवासी जो प्रजातंत्र में विश्वास रखते ..
-राम पुनियानी

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