रविवार, 12 अक्तूबर 2014

नेहरू युग के सभी इतिहासविदों द्वारा लिखी किताबों में आग लगा दो


सुब्रमण्यम स्वामी एक ऐसे व्यक्ति हैं जो जब भी बोलते हैं जहर उगलते हैं। दिल्ली में एक कार्यक्रम में बोलते हुये उनने कहा कि नेहरू युग के सभी इतिहासविदों द्वारा लिखी किताबों में आग लगा देना चाहिए।
इस संदर्भ में स्वामी ने विशेष रूप से विपिन चंद्र और रोमिला थापर का नाम लिया। उनका आरोप है कि इस तरह के लेखकों ने अनेक हिंदू राजा.महाराजाओं की उपेक्षा की है। स्वामी दिल्ली में अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना द्वारा आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे। यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा समर्थित एक संस्था है। कार्यक्रम में बोलते हुये अनेक वक्ताओं ने कहा कि मार्क्सवादी,मुसलमान और पश्चिमी इतिहासकारों ने भारत के प्राचीन इतिहास की बहुत उपेक्षा की है।
स्वामी और अन्य वक्ताओं ने इस तरह के अनेक हिंदू राजाओं का नाम लिया जिनका उल्लेख इन इतिहासज्ञों ने नहीं किया है। वक्ताओं ने विशेष रूप से हेमचंद्र विक्रमादित्य का नाम लिया है, जिन्होंने उत्तर भारत में 1556 के द्वितीय पानीपत युद्ध के बाद हिंदू राज्य की स्थापना की थी।
तथाकथित इन इतिहासज्ञों की इस घनघोर हिंसक प्रवृत्ति की सारे देश में आलोचना की गई। प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक हिंदुस्तान टाईम्स ने 9 अक्टूबर को लिखे एक संपादकीय में इस बात पर घोर चिंता प्रगट की है कि हमारे देश में किताबों को सिर्फ इस कारण जलाने की बात की जाए क्योंकि उनमें कुछ ऐसे विचार हैं जो कुछ लोगों को पसंद नहीं हैं। संपादकीय में कहा गया है कि सुब्रमण्यम स्वामी समाचारपत्रों में सुर्खियां जीतने के लिए इस तरह की गैर.जिम्मेदार बात करते हैं। वे आये दिन बुद्धिजीवियों और मुसलमानों पर हमला करते रहते हैं। हिंदुस्तान टाईम्स ने यह मांग की है कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व को चाहिए कि वह स्वामी पर लगाम लगायें। स्वामी बहुत ही भद्दी और भडकाऊ भाषा में, मुसलमानों,पाकिस्तान, सोनिया गांधी, राहुल गांधी आदि के बारे में निंदापूर्ण बातें कहते रहते हैं। इसी क्रम में उनने नेहरूवियन और वामपंथी इतिहासज्ञों पर हमला किया है। उनका कहना है कि विपिन चंद्र और रोमिला थापर के समान इतिहासज्ञों की किताबों को जला देना चाहिए।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि संघ और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े अनेक संगठनों को स्वामी की बात न सिर्फ अच्छी लगती है वरन् वे उनसे सहमत भी होते हैं। इसी सिलसिले में यहां उल्लेख करना होगा कि दीनानाथ बत्रा द्वारा लिखित कुछ किताबों को गुजरात के पाठ्यक्रमों में शामिल किया गया है। दीनानाथ बत्रा भी एक अत्यधिक घनघोर प्रतिक्रियावादी लेखक हैं। वे अखंड भारत की वकालत करते हैं और कहते हैं कि पश्चिमी ढंग से लोगों को अपने जन्मदिन नहीं मनाने चाहिए। चूंकि गुजरात में इनकी पुस्तकें पाठ्यक्रम में शामिल कर ली गई हैं इसलिये यह कहना उचित होगा कि इस तरह के विचारों को स्वीकार करने वालो की संख्या काफी ज्यादा है।
स्वामी ने जिन इतिहासज्ञों पर हमला किया है वे दुनिया के महान इतिहासज्ञों में से हैं। इतिहास की दुनिया में उनकी अद्भुत स्वीकार्यता है। इस तथ्य के बावजूद यह दुःख की बात है कि स्वामी उनकी किताबों को जलाने की बात करते हैं। आखिर ये लोग कितनी किताबों को प्रतिबंधित करेंगे। दिल्ली की सरकार और भाजपा के नेताओं को स्पष्ट करना चाहिए कि उनका इस तरह के विचारों से कोई लेना.देना नहीं हैं। न सिर्फ उनको असहमति दिखाना चाहिए बल्कि इस तरह की बेबुनियाद, भड़काऊ बातें कहने के लिए उनके विरूद्ध कार्यवाही भी होना चाहिए।
आज के आधुनिक समाज में विभिन्न नजरियों से इतिहास का विवेचन व मूल्यांकन स्वाभाविक है। यह पाठक पर छोड़ देना चाहिए कि वह किस विवेचन व मीमांसा को स्वीकार करता है। इस तरह की स्वीकार्यता पर किसी प्रकार का बंधन न तो संभव है और ना ही लगाना चाहिए। हमारे जैसे बहुआयामी देश में इस तरह का बंधन संभव नहीं है।
आखिर परस्पर विरोधी विचारों को सहना ही तो हमारे देश की सबसे बड़ी ताकत है। स्वामी के समान लोग जो भारत को एक ही दिशा में ले जाना चाहते हैं और जो किसी भी प्रकार के विरोधी विचार को सहने के लिए तैयार नहीं हैं उनके इस दकियानूसी रवैये से हमारे देश का भारी नुकसान होता है। प्रधानमंत्री को स्पष्ट करना चाहिए कि हम इस तरह के एकतरफा संकुचित विचारों के विरूद्ध हैं। प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को स्वामी जैसे संकुचित विचार वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों पर लगाम कसना चाहिए और उन्हें स्पष्ट रूप से बता देना चाहिए कि भारतीय जनता पार्टी की चिंता क्या है। उसका इस तरह के मुद्दों पर रवैया क्या है? हिंदुस्तान टाईम्स ने अंत में अपने संपादकीय में चेतावनी देते हुये कहा है कि यदि सत्ताधारी पार्टी ऐसा नहीं करती है तो वह वास्तव में हमारे देश का भारी नुकसान करेगी।
संघ और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हुये लोगों के रवैये की अमरीका के सर्वाधिक लोकप्रिय समाचारपत्र न्यूयार्क टाईम्स ने भी निंदा की है। अपने 8 अक्टूबर के संस्करण के संपादकीय में न्यूयार्क टाईम्स लिखता है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत के युवकों को एक सुनहरे भविष्य का आश्वासन दिया है। शायद वे जानते होंगे कि इस आश्वासन को पूरा करने के लिए उच्च कोटि की शिक्षा और उच्च कोटि के अवसर प्रदान करना आवश्यक है। तभी 25 वर्ष से कम आयु वाले 60 करोड़ भारतीय युवकों को सही दिशा मिलेगी। आज इन युवकों में बुनियादी योग्यताओं की कमी है।
अपने 2014 के घोषणापत्र में भारतीय जनता पार्टी ने कहा था कि राष्ट्र के विकास के लिये और गरीबी के उन्मूलन के लिये शिक्षा ही सबसे बड़ा प्रभावी हथियार है। अब सवाल यह है कि क्या शिक्षा में सुधारों का उपयोग एक प्रबुद्ध शिक्षित नागरिकों की जमात बनाने के लिये ही किया जायेगाघ् क्या इस तरह की जमात को आवश्यक प्रशिक्षण दिया जायेगा या एक विशेष प्रकार की विचारधारा को आगे बढ़ाया जायेगा?
पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी ने राष्ट्र का प्रशासन चलाने के लिए गुजरात मॉडल की सिफारिश की थी। अनेक मतदाताओं ने इसे एक लचीली अर्थव्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता माना था। परंतु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि गुजरात मॉडल में वे पाठ्यपुस्तकें भी शामिल हैं जिन्हें दीनानाथ बत्रा ने लिखी हैं। बत्रा एक ऐसे विद्वान हैं जो भारत को दक्षिणपंथी रास्ते पर ले जाना चाहते हैं।
पिछले फरवरी माह में उनने पेंग्विन पर यह दबाव बनाया कि वह वेंडी डोनीगर जो शिकागो यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं उनकी किताबों का प्रकाशन रद्द किया जाये। क्योंकि बत्रा की राय में उस प्रकाशन ने हिंदू धर्म का अपमान किया है। उसके बाद जून के महीने में गुजरात सरकार ने यह आदेश जारी किया कि गुजरात के पाठ्यक्रम में बत्रा की किताबें शामिल की जायें। बत्रा की किताबों में अनेक ऐसी बातें शामिल हैं जिन्हें गंभीरता से नहीं लिया जा सकता। उनकी किताबों में विद्यार्थियों को सलाह दी गई है कि वे केक और मोमबत्ती के साथ अपना जन्मदिन न मनायें क्योंकि यह गैर भारतीय रीति रिवाज है।
बत्रा विद्यार्थियों से कहते हैं कि वे अखण्ड भारत का नक्शा बनायें। जिस अखण्ड भारत में बांग्लादेश,श्रीलंका,तिब्बत,पाकिस्तान और अफगानिस्तान शामिल हैं। बत्रा की यह भी मान्यता है कि प्राचीन भारत में कारें थीं, हवाईजहाज भी थे और अणु अस्त्र भी थे। वे कहते हैं कि विद्यार्थियों को इसका ज्ञान होना चाहिए।
यहां स्मरण दिलाना उचित होगा कि 1999 में जब केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली मिलीजुली सरकार थी उस समय बत्रा को इतिहास की पाठ्यपुस्तकें तैयार करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया था। उस समय यह काम अधूरा रह गया था, चूंकि 2004 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार चुनाव में अपदस्थ हो गई थी और वह काम अधूरा रह गया था। इसलिए अब बत्रा दावा करते हैं कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री स्मृति जूबिन ईरानी ने उन्हें आश्वस्त किया है कि उनकी किताबें शीघ्र ही राष्ट्रीय पाठ्यक्रम का हिस्सा बन जायेंगी।
शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण विद्या है यदि इस पर ऐसे लोगों का नियंत्रण हो जाता है जो ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़मरोड़कर पेश करते हैंए जो लगभग तानाशाही के ढंग से यह तय करते हैं कि कौन से सांस्कृतिक रीतिरिवाज भारतीय हैं, जो एक योजना के अनुसार की जाने वाली गतिविधि के द्वारा पड़ोसियों के मन में खतरनाक भावनाओं को जन्म देते हैं। इस तरह की प्रवृत्तियों से देश का भला नहीं होगा न्यूयार्क टाईम्स अंत में लिखता है।
 -एल.एस. हरदेनिया

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