मंगलवार, 14 अक्तूबर 2014

गोरिल्ला लड़ाई की तरह है कहानी - रमाकान्त श्रीवास्तव


दमोह। कहानीकारों ने अपना कार्य ईमानदारी से करते हुए अपने समय को कहानियों में जिन्दा रखा है। आज जब सामाजिक मूल्य नष्ट होने की कगार पर हैं तब कहानी का दायित्व और कहानी की आवश्यकता समाज में अधिक है। सामाजिक यथार्थ और सत्यान्वेषण कहानी की जरूरत है। आज की कहानी गोरिल्ला लड़ाई की तरह है जो अपने साथ विपक्ष को शामिल करती हुई उस पर प्रहार करती है उक्त उदगार ख्यात कथा लेखक रमाकान्त श्रीवास्तव ने प्रगतिशील लेखक संघ इकाई दमोह द्वारा आयोजित दो दिवसीय प्रदेश स्तरीय कहानी कार्यशाला में कहानी और समाज पर केन्द्रित विचार - विमर्श के तहत प्रदेश के नवरचनाकारों को सम्बोधित करते हुये अभिव्यक्त किए ।

                इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुये कहानीकार सुबोध श्रीवास्तव ने स्पष्ट किया कि दमोह में उनके कथा लेखन की जड़ है ।यहाँ कथा का अपना इतिहास है ।आज समाज हाशिये पर पहुँचने की स्थिति में है ऐसे हालात में कहानी कार का दायित्व बनता है कि वे अपनी कहानियों के जरिए विसंगतियों के साथ निराकरण को भी सामने लायें क्योंकि कहानी अपने समय का ऐतिहासिक दस्तावेज़ होती है ।
         इस विमर्श में कहानीकार दिनेश भट्ट (छिंदवाड़ा), अनिल अयान (सतना), संजीव माथुर (ग़ाज़ियाबाद) ,दीपा भट्ट (सागर),अनुपम दाहिया (सतना), अक्षय जैन, एवं अमर सिंह ने हस्तक्षेप करते हुए कई अहम् सवाल उठाकर अपनी व् शिविरार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया ।
                इस विमर्श से पूर्व स्वागत भाषण में अध्यक्ष सुसंस्कृति परिहार ने यथार्थवादी प्रथम कहानी "टोकरी भर मिट्टी" के लिये जाने वाले लेखक श्री माधव प्रसाद सप्रे की इस माटी में रचनाकारों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि पहले की कहानियाँ निद्रा में ले जातीं थीं आज वे जगाने का काम करती हैं। उद्घाटन भाषण देते हुए प्रलेसं दमोह संस्थापक अध्यक्ष सत्मोहन वर्मा ने कथा परम्परा पर अपने विचार रखते हुये कार्यशाला को जरूरी बताया ।
               दूसरे चरण में कहानी की विषय वस्तु और शिल्प पर व्याख्यान युवा कथाकार दिनेश भट्ट ने दिया । श्री भट्ट का मानना था कि कहानी की विषयवस्तु यदि आप जरा से भी संवेदनशील हैं तो वह कहीँ भी मिल सकती है। मूल बात उसके शिल्प की है। जिसका तानाबाना बुनने में आपका अध्ययन, और सूक्ष्म अन्वेषण महत्वपूर्ण होता  है। नन्द लाल सिंह ने परसाई की कहानी "चूहा और मैं" के माध्यम से शिल्प की ओर इशारा करते हुए कहा कि चूहे को आगे क्यों रखा गया, ये समझना कहानी लेखक के मंतव्य  समझने में मदद करता है।  अनिल अयान ने लघु कथा और कहानी के शिल्प पर, संजीव माथुर ने व्यक्तिगत अनुभव की कहानियों और सामाजिक सरोकार की कहानियों के फासले पर और महत्व पर विविध सवाल किये जिस पर रमाकांत जी ने टिप्पणियाँ कीं तथा स्पष्ट तौर पर कहा कि लघु कथाओं में कथ्य महत्वपूर्ण है जबकि कहानी में शिल्प और परिवेश की कसावट भी अत्यंत आवश्यक है। सामाजिक सरोकारों की कहानियाँ यकीनन दीर्घजीवी होती हैं ।
          दूसरे दिन कहानी पाठ का सिलसिला प्रारंभ हुआ कार्यशाला में लिखी गई कहानी "सपनों की उड़ान" से, जिसे सतना से आये नवरचनाकार अंकुर चौरसिया ने प्रस्तुत किया । उपस्थितों ने कार्यशाला की कहानी कहकर इसका स्वागत किया। इसी क्रम में दीपा भट्ट ने "आर्डर", अक्षय जैन ने "टाईपिस्ट मेडम", उमेश दास साहनी ने "पद्मा", अनुपम दाहिया ने "अपने-अपने श्मशान", अनिल अयान ने "एक अनुबंध", अरबाज खान ने "दीवानी", पुरूषोत्तम रजक ने "दया",  आभा भारती ने "वसंत" और ओजेन्द्र तिवारी ने "शिक्षा" कहानी का पाठ किया ।
      रचनाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए वरिष्ठ कथाकार त्रयी ने इन लेखकों को संभावनाशील बताया। रमाकान्तजी ने सुझाव दिया कि विषयवस्तु के चयन में जल्दबाजी नहीं करना चाहिए जब तक कथ्य पक न जाये। कहानी लिखने के बाद कहानी कई बार पाठ होना चाहिए इससे उसकी खामियां सामने आती हैं। कहानी का टुकड़ों में अवलोकन भी गलत है। कहानीकार को अपनी भाषा, अपने मुहावरे, अपनी शैली और विषय वस्तु से जुड़ाव होना जरूरी है। चमकदार शिल्प और नकली आधुनिकता कहानी को अपंग बना देती है। सुबोध श्रीवास्तव ने कहा कि नवरचनाकार ध्यान रखें कि वे कहानी लिखकर सामाजिक कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हैं ।
    समापन सत्र में मिस्र के लेखक युसुफ अल फजई की राजेन्द्र शर्मा द्वारा अनुवादित कहानी "कठपुतली का नाच"  रंगकर्मी राजीव अयाची ने, एवं भीष्म साहनी की कहानी "चीफ की दावत" का पाठ सुसंस्कृति परिहार ने किया। इन मानक कहानियों के पाठोपरांत सुबोध श्रीवास्तव ने "भले लोग", दिनेश भट्ट ने "अंतिम बूढ़े का लाफ्टर डे" एवं रमाकांत श्रीवास्तव ने "साहब, बीबी और बाबाजी" कहानियों का पाठ कर तमाम रचनाधर्मियों को इन कथाओं की खूबियों से अवगत कराया। ये कहानियां सभी की  मार्गदर्शक बनेगी, इसी अपेक्षा के साथ दो दिवसीय कहानी कार्यशाला का समापन हुआ। इस कार्यशाला का सफल संचालन गफूर तायर ने किया। आभार व्यक्त करते हुये सुसंस्कृति परिहार ने इसे दमोह इकाई लिए ही नहीं, बल्कि प्रदेश के लिए भी महत्वपूर्ण आयोजन कहा और तमाम सहयोगियों को धन्यवाद दिया ।
ज्ञातव्य हो, कार्यशाला के मध्यांतर में दक्षेस सिँह व सुसम्मति परिहार ने हरिप्रसाद चौरसिया के निर्देशन में जनगीत गाये। रमेश तिवारी ने बुन्देली गीतों की छटा बिखेरी, वहीं केशू तिवारी ने गजलों से समां बांधा । इँदौर से आये रंगकर्मी लेखक शिवम् कुन्देर ने बांसुरी वादन कर सबका मन मोह लिया ।
                 कार्यक्रम में आनंद श्रीवास्तव ,नरेन्द्र दुबे,  ठा नारायण सिंह, श्रीकांत चौधरी, डा रघुनंदन चिले ,नितिन अग्रवाल ,पीएस परिहार, पुष्पा चिले, भारत चौबे, अभय नेमा, कॄष्णा विश्वकर्मा, वीरेन्द्र दबे, शिखा उमाहिया के साथ महाविद्यालीन छात्र छात्राएं  मौजूद रहे ।
- सुसंस्कृति परिहार

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बृहस्पतिवार (16-10-2014) को "जब दीप झिलमिलाते हैं" (चर्चा मंच 1768) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'