बुधवार, 15 अक्तूबर 2014

किसका विकास ?



प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अक्सर अपनी आमसभाओं आदि में कहते हैं कि वे सभी 125 करोड़ भारतीयों के विकास के प्रति प्रतिबद्ध हैं। उनके कहने का अर्थ शायद यह होता है कि वे सभी भारतीयों के विकास के लिए काम करेंगे,चाहे वे किसी भी धर्म, जाति या नस्ल के हों, चाहे उनकी संस्कृति कोई भी हो व वे देश के किसी भी इलाके में रहते हों। यह सोच सराहनीय है और इस दिशा में प्रयास करने वाले नेता को हम सभी का पूरा समर्थन मिलना चाहिए।
परंतु यदि हम थोड़ी गहराई से सोचें तो दो प्रश्न हमारे मन में उभरेंगे। पहला यह कि क्या हमारे देश के पास इतने संसाधन हैं कि हम सभी 125 करोड़ भारतीयों का विकास सुनिश्चित कर सकें?तथ्य यह है कि हमारे संसाधन अत्यंत सीमित हैं और चाहे हम कितने ही आकर्षक नारे क्यों न लगायें, ऐसा विकास असंभव है जिसका लाभ सभी भारतीयों तक पहुंचे। विकास पर परस्पर विरोधाभासी दावे होना अवश्यंभावी है। जो लोग संगठित हैं और जिनके पास सरकारी तंत्र को प्रभावित करने की ताकत और नौकरशाही तक पहुंच है, वे विकास के फल उन लोगों तक नहीं पहुंचने देंगे जो अपनी आवाज उठाने में सक्षम नहीं हैं। इसलिये सभी का विकास या तो केवल एक पवित्र इरादे की घोषणा है या सहज विश्वासियों को बेवकूफ बनाने का हथियार।
दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हमारे देश में व्याप्त असमानताओं के परिप्रेक्ष्य में, यदि हम सभी 125 करोड़ भारतीयों के विकास की बात करते हैं तो क्या यह न्यायपूर्ण है?दुनिया के 100, बल्कि 50,सबसे रईस व्यक्तियों में भारतीयों की संख्या बढ़ती जा रही है परंतु यह भी सच है कि 20 रूपये प्रति व्यक्ति प्रति दिन से कम की आमदनी पर जीवनयापन करने वाले भारतीयों की संख्या 83.6 करोड़ है। लगभग 20 करोड़ भारतीय,हर रात भूखे सोते हैंए लगभग 21.2 करोड़ कुपोषित हैं और हर वर्ष लगभग 7,000 भारतीय भूख से मर जाते हैं। अगर हम इनमें उन लोगों को जोड़ लें जो कुपोषण.जनित बीमारियों से मरते हैं तो यह संख्या करीब 1 करोड़ हो जायेगी।
सबसे रईस 50 या 100 लोगों के क्लब में भारतीयों की संख्या के बढ़ने से कुछ भारतीय, विशेषकर शहरी मध्यम वर्गए स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं। वे भारत में बढ़ती असमानता की ओर देखना ही नहीं चाहते। वे इस तथ्य की ओर शुतुरमुर्गी रवैया अपनाये रहते हैं कि भारतए मानव विकास सूचकांकों की दृष्टि से, दुनिया के अन्य देशों की तुलना में काफी पीछे है। शिक्षाए स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंचए शिशु व बाल मृत्यु दर आदि की दृष्टि से हम बहुत पिछड़े हुये हैं। शुतुरमुर्गी मुद्रा में रेत में सिर गड़ाये हुये शहरी मध्यमवर्ग के भारतीय, ऐसा कुछ भी देखना.समझना नहीं चाहते जो गौरव के उनके भाव को चोट पहुंचाए। जब प्रधानमंत्री मोदी सभी 125 करोड़ भारतीयों के विकास की बात करते हैं तब तकनीकी रूप से वे गरीबों के विकास की बात भी करते हैं। परंतु चूंकि संसाधन सीमित हैं इसलिये प्रश्न यह उठता है कि सभी भारतीयों का विकास करने की उनकी रणनीति क्या है ?सरकार की प्राथमिकताएं क्या हैं? करदाताओं के पैसे का सरकार किस तरह इस्तेमाल करना चाहती है ?
एक रणनीति तो यह हो सकती है कि देश के पिछड़े इलाकों में आधारभूत संरचना का निर्माण किया जाये। इसके लिये संबंधित क्षेत्र के सभी जातियों व समुदायों के लोगों के श्रम का इस्तेमाल हो। ऐसा करने से वहां के निवासियों को विकास का लाभ तो मिलेगा हीए उन्हें रोजगार भी उपलब्ध हो सकेगा। इससे उन लोगों को नये अवसर मिलेंगेए जिन्हें उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है। इससे भूखों और कुपोषितों के हाथों में कुछ पैसा आयेगा। इस आमदनी से वे जो सामान खरीदेंगे उससे उद्योगों को अपरोक्ष रूप से लाभ होगा। परंतु जब प्रधानमंत्री सब के विकास की बात करते हैं तब उनके दिमाग में स्पष्टतः यह रणनीति नहीं होती।
दूसरी रणनीति यह हो सकती है कि करदाताओं के पैसे और देश के संसाधनों ;जमीनए पानीए जंगल, खनिज व अन्य प्राकृतिक संसाधनद्ध का इस्तेमाल कर भारी.भरकम उद्योग खड़े किए जाएं, जिनसे केवल कुछ लोगों को लाभ हो। इस रणनीति के पैरोकार हमें बताते हैं कि गरीब.मजदूर, किसान,छोटे व्यवसायी व कारीगर . उन्हें उपलब्ध करा,गए अवसरों का उचित इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे और वे उतनी तेजी से विकास की राह पर देश को आगे नहीं ले जा पाएंगे जितनी तेजी से वे लोग ऐसा कर सकेंगे जिनके पास ढ़ेर सारी पूंजी है। जब विकास तेजी से होगा तब रोजगार के अवसर बढेंगे और इससे अपरोक्ष रूप से गरीबों को फायदा होगा। विदेशी निवेशक,भारत को भारी मुनाफा कमाने वाली जगह के तौर पर देख रहे हैं। परंतु वे श्रमिकों पर कम से कम पैसा खर्च करना चाहते हैं और देश के प्राकृतिक संसाधनों,जिनमें जमीन से लेकर स्पेक्ट्रम तक शामिल हैं, का भरपूर दोहन करना चाहते हैं। मुनाफा बढ़ाने के लिए यह जरूरी है कि श्रम पर कम से कम खर्च किया जाए। इसका एक तरीका तो यह है कि इस तरह की आधुनिक, मंहगी तकनीक का इस्तेमाल किया जाए जिससे उद्योगों में कम से कम श्रमिकों की जरूरत पड़े। इस तरह का विकास, रोजगार नहीं लाता। दूसरा तरीका है कि मजदूरी की दर कम से कम रखी जाए।'विकास' की इस दूसरी रणनीति के तहत, राज्य,पूंजीपतियों को मिट्टी के मोल जमीन व अन्य प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध करवाता है और करदाताओं के पैसे से 'विश्वस्तरीय'आधारभूत संरचना वाले कुछ द्वीप तैयार करता है, जिससे पूंजीपतियों को अच्छी सड़कें,फ्लाईओवर,बंदरगाहए बिजली आदि उपलब्ध कराई जा सके। राज्य, गरीबों से उनकी जमीनें जबरदस्ती छीनता है। किसानों को संगठित होकर अपनी जमीन की उचित कीमत पाने के लिए मोलभाव करने का मौका ही नहीं दिया जाता। गरीबों से कहा जाता है कि वे अपनी जरूरत की चीजें जैसे अनाज, खाद,कीटनाशक इत्यादि खुले बाजार से खरीदें क्योंकि अनुदान, अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। परंतु निवेशकर्ताओं से यह नहीं कहा जाता कि वे अपने उद्योग लगाने के लिए बाजार मूल्य पर जमीन आदि खरीदें। इस तरह,इस दूसरी रणनीति से केवल और केवल उन लोगों को लाभ होता है जिनके पास अरबों रूपये हैं। राज्य उनका ताबेदार बन जाता है और उन्हें जमीन व देश के अन्य प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर दोहन करने की खुली छूट देता है। इसके साथ ही, श्रम कानूनों में इस तरह के 'सुधार' किए जाते हैं जिससे ट्रेड यूनियनों के लिए श्रमिकों को संगठित करना मुश्किल हो जाता है। गरीबों को उनकी संपत्ति का उचित मूल्य नहीं मिलता और उन्हें कम से कम वेतन पर काम करना होता है। इससे देश में असमानताएं बढ़ती हैं। अपने विदेशी दौरों में प्रधानमंत्री मोदी अपने 'मेक इन इंडिया' नारे से विदेशी कुबेरपतियों को यही लालच दे रहे हैं और मजे की बात यह है कि वे इसे सभी 125 करोड़ भारतीयों का विकास कहते हैं।
गुजरात का विकास
आईए,हम एक नजर डालें नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल में गुजरात के कच्छ जिले के कुछ गांवों में हुए विकास पर। वहां के लोगों से मिलने और वहां के हालात देखने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ग्रामीण क्षेत्रों में जो भी थोड़ा.बहुत विकास हुआ है उससे दलित और मुसलमान अछूते हैं। भाजपा और संघ परिवार से जुड़ा हुआ स्थानीय श्रेष्ठि वर्ग, विकास के अभाव से लोगों का ध्यान हटाने के लिए समय.समय पर साम्प्रदायिक नारे उछालकर एक वंचित समूह को दूसरे वंचित समूह से लड़ाता आ रहा है।
जिले के बानी.पच्छम इलाके के लोग इसे तालुका का दर्जा दिए जाने की मांग लंबे समय से करते आ रहे हैं। 60 हजार की आबादी और 85 गांवों वाला यह इलाका, वर्तमान में भुज तालुका का भाग है। खाबड़ा इस इलाके का सबसे बड़ा गांव है और भारत.पाक सीमा पर स्थित है। खाबड़ा में रॉ, बीएसएफ आदि सहित लगभग सभी सुरक्षा एजेन्सियों के कार्यालय हैं। भुज, इस गांव से लगभग 54 किलोमीटर दूर है और अपने हर काम के लिए गांव वालों को 100 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है। हाल तक, 12वीं कक्षा के विद्यार्थियों को बोर्ड परीक्षा देने के लिए भी भुज जाना पड़ता था जिसके कारण कई विद्यार्थी यह परीक्षा नहीं दे पाते थे। इस साल खाबड़ा में 12वीं की बोर्ड परीक्षा का केन्द्र स्थापित किया गया और यहां से 164 विद्यार्थियों ने परीक्षा दी। गांव के लोगों को लगता है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है क्योंकि जहां 10 गांव वाले गांधीधाम को तालुका का दर्जा दे दिया गया है वहीं 85 गांव वाले बानी.पच्छम इलाके को यह दर्जा नहीं दिया जा रहा है। इस इलाके में मुसलमान बहुसंख्यक हैं। वे आबादी का लगभग 85 प्रतिशत हैं। गांववासियों का कहना है कि उनके इलाके को तालुका का दर्जा सिर्फ इसलिए नहीं दिया जा रहा है क्योंकि वहां मुसलमानों की बहुसंख्या है और सरकार, मुसलमानों पर संदेह करती है। यह इस तथ्य के बावजूद कि 1965 और 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों में स्थानीय मुस्लिम रहवासियों ने भारतीय सेना की हर तरह से मदद की थी। यहां तक कि वे सैनिकों के साथ पाकिस्तानी बंकरों तक गए थे।
पूरे इलाके में मात्र 72 स्कूल हैं। शिक्षकों के 350 पद खाली पड़े हैं। अधिकतर स्कूलों में मात्र एक शिक्षक है जो पहली से आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों को पढ़ाता है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अनुसार, हर स्कूल में कम से कम पांच शिक्षक होने चाहिए। तीन गांव.उदयी, झामरीवाट और लखाबो.ऐसे हैं जिनमें एक भी स्कूल नहीं है। और यह शायद संयोग मात्र नहीं कि इन तीनों गांवों की पूरी आबादी मुसलमानों की है। इन गांवों में स्कूल खोलने के लिए कई बार मांग उठाई गई परंतु सरकार ने उस पर ध्यान नहीं दिया। इसके विपरीत,लुहाना में मांग करते ही स्कूल खोल दिया गया। मुस्लिम.बहुल इलाकों के स्कूलों के परीक्षा परिणाम बहुत खराब आते हैं।
टूगा गांव के एक शिक्षक मोहम्मद खालिद से हमारी मुलाकात हुई। इस गांव में एक प्राथमिक व एक हाईस्कूल है। यह इलाके के बेहतर स्कूलों में से एक है। जिस प्राथमिक शाला में खालिद पढ़ाते हैं वहां 225 विद्यार्थी और छःह शिक्षक हैं। इन्हें कक्षा एक से लेकर आठ तक के विद्यार्थियों को पढ़ाना होता है। इसके लिए पहली और दूसरी व तीसरी और चौथी  कक्षाओं के विद्यार्थियों को एकसाथ बिठाया जाता है ताकि एक ही शिक्षक उन्हें पढ़ा सके। खालिद यह स्वीकार करते हैं कि स्कूल में पढ़ाई का स्तर बहुत निम्न है और सुविधाओं की बहुत कमी है। परंतु इसके लिए वे मुस्लिम समुदाय में जागरूकता की कमी को दोषी ठहराते हैं। वे कहते हैं कि अगर समुदाय में जागरूकता होती तो लोग स्कूल पर ध्यान देते और कोशिश करते कि वह अच्छी तरह चले। वे इसके लिए मुसलमानों के प्रति भेदभाव को दोषी नहीं ठहराते।
जान कुनरिया गांव में बिजाल डुंगलिया ने भी बताया कि स्कूल ठीक से नहीं चल रहे हैं। उनमें शौचालय तो दूरए पीने के पानी की व्यवस्था तक नहीं है।
अंजर ब्लाक के सिनोगरा गांव में दो स्कूल हैं। इनमें से एक का भवन सन् 2001 के भूकंप में ढह गया था और इसका पुनर्निर्माण कृष्ण पारिणम मंदिर द्वारा करवाया गया है। दूसरी कन्या शाला है। मुसलमान, गांव की आबादी का लगभग 20 प्रतिशत हैं। स्कूल, हिन्दुओं के रहवासी इलाके में हैं यद्यपि मुसलमानों की बस्ती वहां से बहुत दूर नहीं है। उच्च जातियों के बच्चे लगभग सात किलोमीटर दूर स्थित अंजर में स्थित निजी स्कूलों में पढ़ते हैं और गांव के स्कूल में केवल मुसलमानों और दलितों के बच्चे ही हैं। 220 विद्यार्थियों में से केवल 83 मुसलमान हैं। मुसलमान बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर बहुत ज्यादा है। जो बच्चे दाखिला ले लेते हैं उनमें से ज्यादातर या तो स्कूल आते ही नहीं हैं या बहुत कम आते हैं। शिक्षकों की राय थी कि मुस्लिम अभिभावकों में जागरूकता का अभाव है। लड़कियां'बंधानी' का काम करती हैं और लड़के दुकानों आदि में। वे पढ़ना ही नहीं चाहते। मुसलमानों के केवल कुछ घर पक्के हैं और समय के साथ उनके मालिकाना हक की जमीनें कम होती जा रही हैं। दलित अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक हैं और इसलिए दलित विद्यार्थियों की स्कूलों में उपस्थिति बेहतर है। लड़कों की तुलना में लड़कियों की उपस्थिति ज्यादा रहती है। स्कूलों में शिक्षकों की कमी है और कई पद खाली पड़े हैं। लड़कों के स्कूल में सात और लड़कियों के स्कूल में छःह शिक्षक हैं। दोनों स्कूलों में शिक्षकों की कमी के चलते दो या दो से अधिक कक्षाओं के विद्यार्थियों को एकसाथ बैठाकर पढ़ाया जाता है।
स्वास्थ्य सेवाओं की हालत भी खराब है। मुस्लिम ग्रामीणों का मानना है कि उनके गांव की उपेक्षा इसलिए की जा रही है क्योंकि वहां मुसलमानों का बहुमत है।
-इरफान इंजीनियर

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