शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

उम्मीदवार दे रहे हैं मज़हबी ज्ञान की परीक्षा

पाकिस्तान में चुनाव
 कड़ुवाहट पैदा करने वाले बहुत सारे समाचारों के बीच एक अच्छी ख़बर आई है। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ख़लिदा जि़या ने देश में ईश निंन्दा क़ानून बनाने की दक्षिण पंथी मज़हबी संगठनांे की मांग को अस्वीकार करते हुए उनके उग्र आन्दोलन के आगे झुकने से इंकार कर दिया है। पाकिस्तान में इस तरह के क़ानून के दुरुपयोग से विश्व अच्छी तरह परिचित है। इसका अवसाद वहां के सामाजिक माहौल में अब भी महसूस किया जा सकता है। पाकिस्तान के उसी पंजाब में जहां आधुनिकता व पारम्परिकता के बीच, देश के दूसरे हिस्सांे के समान तीखा संघर्ष चलता रहा है, वहां की प्रान्तीय हुकूमत ने स्कूली पाठयक्रम में बड़ी तब्दीली करते हुए पाठय सामग्री में धार्मिक पाठों की संख्या सीमित कर दी है। विशेष रूप से दसवीं कक्षा की उर्दू पाठय पुस्तक में। हलांकि वहां इस तब्दीली का तीखा विरोध हुआ और तत्कालीन मुख्यमंत्री शहबाज़ शरीफ की लानत-मलामत भी हुई। जाते-जाते शहबाज ने तबदीली रद्द करने की हामी भी भर दी। परन्तु उनकी जगह आये कार गुजार मुख्यमंत्री नज्मसेठी ने, धार्मिक पाठों को फिर से शामिल करने से इन्कार कर दिया। इस पृष्ठ भूमि में देखिए तो वहां के युवाओं के बड़े प्रतिशत द्वारा देश के लिये इस्लामी शरीअत का समर्थन चांैकाता भी है, चिन्ता भी पैदा करता है। ये स्थिति अपने देश के युवाओं में नरेन्द्र मोदी की बढ़ती लोकप्रियता से बहुत अलग नहीं है। भारत हो या पाकिस्तान दोनों जगह आगामी चुनाव में धर्म निरपेक्ष आधुनिकता वदियों तथा साम्प्रदायिक रूढि़वादियों के बीच बड़ी टक्कर होने जा रही है। इतना अन्तर अवश्य है कि पाकिस्तान में ये टक्कर अधिक उग्र और हिंसक हो सकती है। क्योंकि वहां का चुनाव आयोग स्वयं इस विवाद की एक पार्टी बना हुआ है। उसकी निगरानी लोकतंत्र और जनवाद के मसीहा की हैसियत प्राप्त कर चुके जस्टिस इफि़्तखा़र चैधरी कर रहे है। चुनाव आयोग नामांकन करने वाले सम्भावित उम्मीदवारों से उनकी इस्लामी ज्ञान की परीक्षा ले रहा है। यह परीक्षा गुपचुप तरीकें से नहीं बल्कि सार्वजनिक रूप से हो रही है। यानि की इसमें टी.वी. के क्विज़ प्रोग्राम का भी सहारा लिया गया है। निश्चय ही यह परीक्षा हमारे समय की गहरे तक चिन्तित करने वाली बड़ी त्रासदी है। यद्यपि इस आधार पर अभी तक कोई नामांकन रद्द नही हुआ है, फिर भी ख़तरे बने हुये है। वो क्षण यकीनन इतिहास के रोचक प्रसंग की तरह याद कियें जायेगें, जिनमें शरीअत कानून की प्रबल प़क्ष धर जामाअते इस्लामी के एक उम्मीदवार उस्मान शरीफ इस परीक्षा में उत्तीर्ण नही हो पाये। एक रिपोर्ट के अनुसार उनसे इस्लाम का ‘‘तीसरा कलमा’’ सुनाने को कहा गया लेकिन वो पहला कलमा ही सुना पाये। कुछ पाकिस्तान का क़ौमी तराना नही सुना सके तो कुछ मज़हब के बुनियादी उसूल नही बता पायें। ऐसे में हालात की बिडम्बना उबारने वाली सआदत हसन मंन्टो की ‘‘स्याह हाशिए’’ मे संकलित एक छोटी कहानी याद आती है।
        बम्बई में विभाजन के दंगो के दौरान एक मुसलमान एक हिन्दू रिक्शे वाले को मारने के लिये खुला चाकू लेकर उसके पीछे दौड़ता है। एक मक़ाम पर वो उसे जा दबोचता है। और नीचे गिराकर उसकी छाती पर चढ़ बैठता है। उसकी ओर चाकू तान कर कहता है, ‘‘पढ़ कलमा नहीं तो मारा’’ कलमा पढ़ने का मतलब उसके निकट मुसलमान हो जाना था। हिन्दू रिक्शे वाला बहुत छटपटाया ,बड़ी मिन्नत समाजत की, हाथ पैर जोड़े लेकिन इस्लामी जोश ठंडा नही पड़ा। रिक्शे वाले ने बचने का कोई उपाय न देख, अंन्ततः छाती पर चढे़ नंगा चाकू ताने हुए आदमी से कहा ‘‘अच्छा बताओ कैसे पढं़े कलमा’’? चाकू वाला हाथ सहसा ढीला हुआ, वो अपलक अवाक सा उसे देखता रह गया। उसका गरीबां छोड़ते हुए और छाती से उठते हुए उस आदमी ने कहा ‘‘यह तो मुझे भी नही मालूम कि कलमा कैसे पढ़ा जाता है’’
        पाकिस्तानी चुनाव आयोग के इस कृत्य से समूचे उप महाद्वीप के धर्म निरपेक्ष आधुनिकता वादियों का चिन्तित होना स्वाभाविक है। इस तरह की घटनाओं से दूसरे देशों के रूढि़वादी पोंगा पण्डितों तथा धार्मिक आस्था का राजनैतिक इस्तेमाल करने वालों को शक्ति प्राप्त होती है तथा समाज में उनका स्पेस विस्तार पाता है। इस्लामी या मुस्लिम एकता के परख़च्च्ेा उड़ाने वाले ऐतिहासिक संघर्ष से गुजर चुके बंग्लादेश में ईश निन्दा कानून के पक्ष में चला आन्दोलन जिसकी प्रकट मिसाल है। मुक्ति युद्ध से गद्दारी करने वालो को मृत्यु दण्ड दिये जाने के फैसले की मुखा़लिफ़त मे बड़ी संख्या में युवकों का सड़कों पर उतरना भी इसी सिलसिले की एक कड़ी मानी जा सकती है। याद किया जा सकता है कि वहां तस्लीमा नसरीन के खिलाफ़
विरोध व निन्दा का उग्र आन्दोलन जमाअते इस्लामी ने मुक्ति युद्ध के दौरान किये गये अपनेे अपराधों की ओर से ध्यान हटाने के लिये ही चलाया था।
        पाकिस्तान में उसके जन्म से ही सियासी नेताओं, पार्टियों तथा शासको द्वारा वहां के लुटे पिटे अवाम के प्रति किये गये लगातार विश्वास घात (जो संयोग से हमारे यहां भी होता रहा है।) के कारणों वहां के आवाम का सियासी नेताओं व पार्टियों पर सेे विश्वास बुरी तरह डगमगा गया है। राजनीति के प्रति विरक्ति का  भाव व्यापक होता गया। मोह भंग की तकलीफ़ उन्हे धर्म के करीब ले गयी यद्यपि धार्मिक गुरूओं-मौलानाओं तथा धर्म की राजनीति करने वालों ने भी उनके साथ  बड़ा विश्वासघात किया। लेकिन इसको क्या कीजिये कि पुर्नउत्थानवाद की मादकता हकीकतों को धुँधलाने में अधिक समर्थ साबित होती हेै। वहां चुनाव आयोग की इस सक्रियता को यदि एक ओर धर्म निरपेक्षता व उदारवाद की राजनीति करने वाली शक्तियों एवं सोच को कमजोर करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। तो दूसरी ओर समूची सियासी बिरादरी  को हास्यास्पद बनाने के प्रयास के रूप मे भी। ज़ाहिर सी बात है         ऐसे में विक्षोभ भरी आपत्तियां भी हो रही है और क़ानूनी कार्यवाही की धमकियां भी दी जा रही है। कुछ लोग तो वहां के संविधान में पाकिस्तान को इस्लामी राष्ट्र की हैसियत ही से असहमति प्रकट कर रहे है। ऐसे में इस समाचार पर सन्देह करने का कोई कारण नज़र नही आता है कि शराब पीने व बेचने पर लगी पाबन्दी को हटाने के अभियान से जुड़े एक उम्मीदवार को इसी कारण चुनाव लड़ने से प्रतिबन्धित कर दिया गया है।
        पाकिस्तान के अवाम को इस चुनाव से बड़ी आशाएँ है? निष्पक्षता के सिद्धांत को कड़ाई से लागू करते हुए टैक्स व बैंक क़जऱ्ों की अदायगी के साथ ही शैक्षिक प्रमाण-पत्रों व अपराधी पृष्ठिभूमि की बारीक जाँच ने लोगों में नई उम्मीद जगाई है। पख़्तून इलाक़े की दो क़बीलाई महिलाओं द्वारा पहली बार किए गये नामांकन तथा चुनाव प्रक्रिया में स्त्री सक्रियता ने गहमा गहमी को बढ़ाया है। पहली बार अपना कार्यकाल पूरा करने का श्रेय प्राप्त अतीत का हिस्सा बन चुकी पार्लयामेन्ट ने औरतों के पक्ष में कई क़ानून बनाए हंै।
        इस प्रकाश में देखें तो चुनाव आयोग द्वारा उम्मीदवारों के धार्मिक ज्ञान की परीक्षा लोकतांत्रिक मूल्यों तथा चुनाव की बुनियादी आचार संहिता का उपहास उड़ाने जैसा है। इसे तुरन्त रोकाजाना पकिस्तान सहित समूचे उपमहाद्वीप के हित में है।
   
   -शकील सिद्दीकी
  
    मो0. 09839123525


1 टिप्पणी:

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

धर्म के नाम पर वहाँ भी राजनीति होती है और यहाँ भी,,,,,,,
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