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गुरुवार, 7 जुलाई 2016

मानव जाति का हत्यारा टोनी ब्लेयर

भारत की जनता पर ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर इंग्लैंड सरकार ने जो अत्याचार किये थे. वह मानवजाति के लिए कलंक है और उसमें नर पिशाचों की आश्चर्यजनक भूमिका दिखाई देती है. दुनिया में अपने को उच्च समझने वाले यूरोपीय लोगों ने मानव जाति के ऊपर कैसे-कैसे अत्याचार किये. 
                ईराक में सद्दाम हुसैन को फांसी व जनता का नरसंहार इंग्लैंड, अमेरिका और उसकें दोस्त देशों ने किया और 6 लाख से अधिक लोगों को मार डाला था लेकिन जब चिलकॉट जांच समिति की रिपोर्ट आई है तो जिन आधारों के ऊपर ईराक में नरसंहार किया था. वह सब गलत पाए गए. आज भी लाखों विधवाएं बेसहारा हैं.
 इराक़ युद्ध में शामिल होने के फ़ैसले की जांच के लिए गठित चिलकॉट जांच समिति अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सरकार ने सद्दाम हुसैन की तरफ से दिख रहे ख़तरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया और अप्रशिक्षित सैनिकों को युद्ध में भेजा दिया गया.
रिपोर्ट में कहा गया है कि युद्ध में शामिल होने के फ़ैसले का एक कारण यह बताया गया कि इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के पास सामूहिक विनाश के अस्त्र है, जिनके चलते वह बड़ा खतरा पैदा कर सकते है लेकिन यह अनुमान पूरी तरह अतिरंजित था।
समिति की रिपोर्ट आने के बाद टोनी ब्लेयर के खिलाफ इंग्लैंड में जगह-जगह प्रदर्शन शुरू हो गए हैं तो वहीँ ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने 2003 के इराक़ युद्ध में मारे गए लोगों के परिवार से माफी मांगी है हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि वो परिवार उन्हें न कभी भूलेंगे और न माफ़ करेंगे. उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि खुफिया सूचनाएं ग़लत थीं और युद्ध के बाद की योजना खराब थी. इसी के बाद से दुनिया के अन्दर आतंकवाद की एक लहर आई जिसने भी इंसानी खून को बहा रहे हैं  लेकिन इसकी शुरुवात अमेरिकी साम्राज्यवाद ने शुरू की थी और पूरी दुनिया में आतंकवादी और नर पिशाच की भूमिका में पहले इंग्लैंड और अब अमेरिका और इंग्लैंड दोनों के चेहरे दिखाई देते हैं.इन देशों की खुशहाली का राज  मानव रक्त की नदियाँ बहा देने में छिपा हुआ है. साम्राज्यवाद का असली चेहरा एक खूनो दैत्य का चेहरा होता है जो पूरी दुनिया के अन्दर मानव जाति का रक्त पीने के लिए हमेशा लालायित रहता है और आज भी साम्राज्यवाद मानव रक्त को बहाकर मुनाफे को बढ़ा रहा है. दुनिया में आतंकवाद समाप्त करने के लिए ईराक युद्ध व सद्दाम हुसैन की फांसी के जिम्मेदार राष्ट्राध्यक्षों को  पकड़ कर युद्ध अपराधी की तरह मुकदमा चला कर सजा-ए-मौत देनी चाहिए जिससे दुनिया के अन्दर शांति कायम हो सके नहीं तो विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्ष जो हथियार सौदागरों के एजेंट की भूमिका में हैं वह अपने हतियारों का प्रदर्शन करने के लिए इसी तरह नरसंहार करते रहेंगे और उसके प्रतिशोध में आतंकवाद जारी रहेगा. 

सुमन
लो क सं घ र्ष !

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

विदेशी शक्तियों का षड़यंत्र

कुछ विदेशी शक्तियों की कोशिश है कि भारत, चीन या पाकिस्तान से युद्ध करे और उसकी स्तिथि पाकिस्तान जैसी हो जाए। पाकिस्तान द्वारा उकसावे की कार्यवाहियां अक्सर की जाती है। देश के अन्दर बैठे हुए कथित राष्ट्रवादी तत्व युद्ध की ओर देश को अग्रसर करने की दिशा में ले जाने का प्रयास करते हैं। पाकिस्तान की सेना द्वारा दो भारतीय सैनिको के मारे जाने को लेकर युद्धौन्माद पैदा करने की कोशिश हुई। संसद में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने आह्वाहन किया कि पाकिस्तानी सैनिको के दस सर लाओ जैसे बाजार से भिन्डी और गोभी खरीद कर लाना हो। वहीँ शिवसेना ने परमाणु बम पर धूल जमी होने की बात कही और उसका इस्तेमाल कब होगा और फिर देश में जगह-जगह धरना अनशन प्रदर्शन शुरू हो गए। पाकिस्तान की यह स्तिथि है कि लगभग प्रतिदिन विस्फोट होते हैं। निर्दोष नागरिक मारे जाते हैं। न्यायपालिका ने कार्यपालिका के प्रमुख का वारंट जारी कर रखा है। कनाडा निवासी पाकिस्तानी मूल का कादरी पाकिस्तानी संसद को घेरे बैठा है। सेना भी अपने दांव में है ऐसी स्तिथियाँ इस देश में विदेशी शक्तियां पैदा करना चाहती हैं जिससे देश आर्थिक रूप से कमजोर हो और प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से शासन सत्ता संभाली जा सके। बांग्लादेश युद्ध के समय बाजार से नमक से लेकर सभी आवश्यक सामग्रियों का अभाव हो गया था। देश के अन्दर बैठे हुए जमाखोर, मुनाफाखोरों ने खूब जमकर मुनाफा कमाया। जनता का गरीब तबका युद्ध की मार झेल नहीं पाया था। जो लोग राष्ट्रवाद का सबसे ज्यादा दम भरते हैं वही लोग देश में युद्ध के समय जमाखोरी, मुनाफाखोरी में लग जाते हैं। पूंजीवादी, साम्राज्यवादी शक्तियों का जीवन युद्ध में ही है। शांति उनको कब्रिस्तान की तरफ ले जाती है। पाकिस्तान को इन हरकतों को बंद करने के लिए कुटनीतिक राजनितिक प्रयास किये जाने चाहिए। युद्ध कोई विकल्प ही नहीं है। कारगिल के समय युद्ध हुआ था या घुसपैठियों को मार भगाया गया था।  इस बात का  स्पष्टीकरण उस समय तथाकथित राष्ट्रवादी ताकतों ने नहीं दिया था जबकि वही लोग सत्तारूढ़ थे और ताबूत घोटाला भी उसी समय में हुआ था।
                 देश के अन्दर भ्रष्टाचार, धन सम्पदा की लूट करने वाले लोग अपने ही लोग हैं। गरीबों के हिस्से का बहुसंख्यक आबादी का शोषण वही लोग करते हैं। जनता अगर धन-धान्य से भरपूर होगी और विदेशी शक्तियों के हाथ की कठपुतली हमारे लोग नहीं होंगे तो युद्ध करने की आवश्यकता नहीं होगी।

सुमन 

बुधवार, 26 सितंबर 2012

युद्ध और मन्दी के बीच तेल

राजेश मल्ल


जब नाम तेरा लीजिए तब चश्म भर आवे।
इस जिंदगी करने को कहाँ से जिगर आवे।

    बीती सदियों में अमरीका ने दसियों लाख मूल निवासियों (रेड इण्डियन्स) का संहार किया है, आधे मैक्सिको पर अपना कब्जा जमाया है (जो दरअसल मूल निवासियों के क्षेत्र हैं) पूरे इलाके में हिंसक हस्तक्षेप किया है और हवाई और फिलीपीन्स को फतह किया है (हजारो-हजार फिलीपीन्स वासियों की हत्या करके) और खास तौर पर पिछली आधी सदी में अपने ऐसे ही कारनामों को ताकत के बल पर पूरी दुनिया में अंजाम देता रहा है। इन करतूतों के शिकार बेशुमार हैं।
-नोम चोम्स्की

    अरब। तेल। बाजार। ठेका। अरबों डालर। बहुराष्ट्रीय निगम। कारपोरेट। सिनेटर। ड्रोन, मिशाइलें, सेना, फौज। मानवाधिकार-लोकतंत्र। आदिम बर्बरता। कहीं आग लग गई, कहीं गोली चल गई।
    अफगानिस्तान, इराक, लीबिया, सूडान, जार्डन, सीरिया। मरते लोग, लड़ते लोग, कटते लोग, विस्थापित होते लोग। सद्दाम, गद्दाफी, यासिर, अपराधियों की लम्बी सूची।
तेल देखिए और तेल की धार देखिए।
युद्ध आदिम बर्वर युद्ध..........................
लाखों करोड़ों लोग.............................
लाखों करोड़ों डालर............................
लाखों बैरेल तेल..........पेट्रोल............।        विगत दो दशकों में पूरी दुनिया के पैमाने पर और खासकर अरब में एक भयानक युद्ध अमरीका तथा उसके सहयोगियों ने छेड़ रखा है। अब तक मरने और विस्थापित होने वालों की संख्या करोड़ांे में पहुँच गई है। मात्र लीबिया में मरने वालों और विस्थापित होने वालो की संख्या साढ़े छः लाख से ऊपर है। यह हमारे समय का सबसे खौफनाक-खूँरेज मंजर है जिसे दुनिया के लाखों अमन पसंद लोग ‘चश्म तर से देख रहे हैं और मीर की तरह कहाँ से मानवता के इस संहार को देखने का ‘जिगर लावें’ सोच रहे हैं। दुःखद और तकलीफ देह बात यह है कि ढेर सारे लोग  तो इसे शुतुरमुर्ग की तरह आँखों के सामने से ओझल किये हैं या संचार माध्यमों के शोर को अपनी रगों मंे उतार कर उस धोखे के शिकार हैं जो युद्ध के दिनों में सामान्यतः होता ही है। कुछ लोग इसे भारतीय अर्थ व्यवस्था से सम्बद्ध कर पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ती कीमतों तक सीमित कर देते हैं। इस दृष्टि-बोध ने हमें उस भयावह युद्ध से बिलग कर दिया है और भ्रामक सोच के कारण अनवरत चलते इस हत्याकाण्ड के चमश्दीद होने से मुक्त कर दिया है।
    मेरी समझ है और विनम्र अवधारणा कि तेल और उसकी कीमतों पर कोई भी चर्चा ‘अरब युद्ध’ जो प्रथम और द्वितीय महायुद्ध की तरह की भयावह घटना है और और आज जारी है तथा तेल पर कब्जे और उपनिवेश बनाने के लिए लड़ा जा रहा है। इस महत्वपूर्ण सन्दर्भ के बिना सम्भव नहीं है। ‘तेल’ की कीमतों में लगी आग ‘युद्ध और मन्दी की आग’ है ये दोनों एक दूसरे के जनक अन्योन्याश्रित और पूँजीवाद की अन्धी गली का अन्तिम छोर हैं। हो सकता है कि आप को यह बात अतिरंजित लगे और आप मेरे सूत्रीकरण से असहमत हों। लेकिन आप यदि गौर फरमाएँ तथा घटनाक्रमों को एक तरतीब दें तथा अपने ज्ञान और विश्लेषण की परिधि को पूँजीवादी सूचना तंत्र से बाहर जाकर देखने की कोशिश करें तो हकीकत अपने आप सामने आ जाएगी। मैं क्रमशः अपने निष्कर्षों के लिए तथ्य नहीं जुटाऊँगा बल्कि तथ्यों की ऐसी प्रत्यक्ष कड़ी है, श्रंृखला है और बहुत हद तक चीजें हस्तामलक हैं कि आपकी असहमति की कोई गुंजाइश ही नहीं है फिर भी मैं उस भयावह सच से परदा उठाना चाहता हूँ जो आपकी जेहन का हिस्सा नहीं है या नहीं बन पाया है। हालाँकि इसे साम्राज्यवादी ठीक-ठाक कह रहे हैं और उसे आप मात्र ‘शब्द’ मानकर उस ओर गौर नहीं कर रहे हैं जैसे मैं इसे ‘युद्ध और मन्दी’ का परिणाम मान रहा हूँ तो पूरा पूँजीवादी तंत्र बिना किसी हिचक के साफ शब्दों में इसे इसी रूप में कह भी रहा है। अमरीका पूरे नियोजित तरीके से विगत दो दशकों से इसे ‘आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध’ कह भी रहा है और इसे नाटो के साथ मिलकर लड़ भी रहा है। मेरा संशोधन मात्र इसमें यह है कि यह ‘आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध’ नहीं बल्कि ‘तेल के लिए युद्ध’ है। हाँ यदि आप किसी युद्ध से ही इन्कार करते हंै तो फिर आप से मुखातिब होना मेरे लिए संभव नहीं है।
           तो ‘तेल के सन्दर्भ में पहली बात आपको माननी होगी कि एक पीड़ादायी-विनाशक और इन्सानियत के विरुद्ध एक युद्ध लड़ा जा रहा है जिसके एक पक्ष अमरीका और उसके सहयोगी हैं और दूसरी तरफ सम्पूर्ण अरब जनता है। उसकी स्वतंत्रता है, उसकी सम्प्रभुता है। उसके अपने खनिज पदार्थों पर उसका अपना हक है। यह युद्ध अफगानिस्तान, इराक, लीबिया में प्रत्यक्ष रूप से लड़ा गया है और कमोवेश भयावह तबाही के साथ जीता जा चुका है। वहाँ के राष्ट्रध्यक्षों की हत्या की जा चुकी है। अब आगे निशाने पर सीरिया से लेकर ईरान तक वे सारे अरब देश हैं जो अभी गुलाम नहीं बने हैं या उनकी खनिज सम्पदा जो ‘तेल ही है पर साम्राज्यवाद का कब्जा नहीं हो गया है। इस युद्ध के आँकड़े समयावधि, धनराशि, शामिल सैनिको कीं संख्या, प्रभावित जन समुदाय, क्षेत्रफल, मारे और विस्थापित लोगों
की संख्या सभी द्वितीय महायुद्ध से ज्यादा है। मात्र इराक या लीबिया के युद्ध का आकार फैलाव और जन हानि तथा बबर्रता हिटलर द्वारा रचाए गए यहूदी हत्याकाण्ड से बड़ा है। युद्ध का तर्क, अरब देशों पर हमले का कारण और वहाँ के राष्ट्रध्यक्षों के प्रति साम्राज्यवादी व्यवहार ‘सब कुछ घृणित, आपराधिक और मानवता को शर्मशार करने वाला है। उदाहरण के लिए अभी लीबिया और कर्नल गद्दाफी की घटना को देखा जा सकता है। ‘चूँकि लीबिया में संभावित गृहयुद्ध की स्थितियाँ हैं और ऐसे में लाखों लोग मारे जा सकते हैं इसलिए वहाँ के लोगों में शान्ति बहाल करने के लिए अमरीका तथा नाटो ने लाखों लोगों को मार डाला। गद्दाफी पर तो सद्दाम हुसैन की तरह मुकदमे की बेशर्मी भी नहीं की गई बल्कि पहले ही करोड़ों डालर का इनाम-इकराम घोषित कर दिया गया कि सेना की जद में आने के बाद कर्नल गद्दाफी को मारने की होड़ मच गई। यह बेशर्मी और अमरीकी बर्बता का ताजातरीन उदाहरण है। खैर ‘युद्ध’ के साथ-साथ जब-जब मन्दी खासकर विŸाीय पूँजी के संकट के बादल घिरते हैं। शेयर मार्केट, बैकिंग तथा अन्य विŸाीय संस्थाएँ डूबने लगती हैं, तेल कम्पनियों और उनके मालिकों का दबाव बढ़ता जाता है और तभी अरब का कोई न कोई हिस्सा फिर से युद्ध की लपटों में समाने लगता है।
    यह किस्सा अब नानी के भूत की कहानी नहीं बल्कि एक संवेदनशील तार्किक निगाह की तलबगार है जिसे पूरी दुनिया ठीक से समझ रही है। तेल कम्पनियों पर पड़ने वाला मन्दी का प्रभाव और उसी के गर्भ से पैदा होने वाले युद्ध की विभीषिका आज हमारे समय की सबसे बड़ी सच्चाई है। मैं इस छोटे से आलेख में आँकड़े और उसके परिणामी निष्कर्षों को न रखकर मात्र उन सच्चाइयों की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ जिससे हम तथाकथित तेल संकट को समझ सकें।
    ‘युद्ध और मन्दी’ या ‘मन्दी और युद्ध’ के बीच तेल कीमतों की बढ़ोत्तरी और भारतीय मध्य वर्ग की चिल्ल-पों के बीच यह भी गौर करने का विषय है कि भारतीय तेल कम्पनियों और भारत सरकार के रिश्ते और मन्दी की मार से उबरने में तेल की कीमतों में वृद्धि की विवशता और तानाशाहीपूर्ण सोच ने हमें भी अरब जनता की तरह विवश कर रखा है।
    मेरा अनुरोध है कि मन्दी-युद्ध तथा तेल कीमतों में वृद्धि को एक साथ रखकर देखें तो साम्राज्यवाद-पूँजीवाद का क्रूर चेहरा बेनकाब हो जाएगा। इसलिए जरूरी है कि पहले, मन्दी और युद्ध को समझा जाए फिर उसकी परिणति तेल कम्पनियों के लाभांश के लिए जनता को और-और दुहने में लगे पूँजीवादी साम्राज्यवादी खेल को समझा जाए और अब यह सारा कुछ साफ है, स्पष्ट है।
    तेल कीमतों की वृद्धि, भयावह नरसंहार और मन्दी की बार-बार आती बाढ़ उसी पूँजीवादी-साम्राज्यवादी क्रिया कलापों की परिणाति है जिसके खिलाफ निर्णायक युद्ध के बिना न देश की जनता का कल्याण है और न ही विश्व मानवता का। हर बार डूबती अर्थ व्यवस्थाओं को बचाने के नाम पर अरबों डालर मदद तथा तेल कम्पनियों के ‘तथाकथित घाटे’ जो कि अधिक मुनाफे की हवस ही है, को पूरा करने के लिए साम्राज्यवादी और उनकी पिट्ठू सरकारें तेल कम्पनियों के सामने नतमस्तक हैं। ब्रिटेन की छः डाईन कम्पनियाँ हों या भारत की तेल कम्पनियाँ इनकी शक्ति इतनी है कि ये सरकारों को अपनी मर्जी अर्थात अधिक से अधिक मुनाफे के लिए विवश कर सकती हैं। ‘युद्ध और मंदी’ के इस खेल को अंजाम देने का कार्य यदि ब्रिटेन, जर्मनी तथा अमरीकी कम्पनियों ने किया है तो भारत के संदर्भ में यहाँ की तेल कम्पनियाँ जो अब पूरी तरह से भारत सरकार के नियंत्रण से मुक्त हैं, उनका दबाव है। युद्ध और ईरान पर प्रतिबंध के बीच अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर जारी सट्टेबाजी तथा तेल कम्पनियों के मुनाफे की हवस ने मिलकर एक सर्वग्रासी तंत्र का निर्माण किया है। मजेदार बात यह है कि तेल का अन्तर्राष्ट्रीय बाजार भाव सन् 2008 के बराबर है लेकिन 2012 तक कीमतों की वृद्धि लगभग दोगुने के आसपास पहुँच चुकी है। तब यह सवाल गंभीर है कि आखिर मुनाफे की भारी मात्रा किसकी जेब में जा रही है।
    सही बात यह है कि नव उदारवादी तंत्र कारपोरेट और मुनाफा खोर कम्पनियों को लाभ पहुँचाने के लिए ही बन गया है जिससे बार-बार विश्व मानवता को खौफनाक दौरों से गुजरना पड़ रहा है। दुनिया के तथा देश के समस्त प्राकृतिक संसाधनों को इन कम्पनियों के हवाले कर सरकारें नए-नए हत्याकाण्ड रचाने में शामिल हैं।
    इस स्तर में ‘तेल’ की कीमतों के सवाल के पीछे पूँजीवादी साम्राज्यवादी अर्थतंत्र है जो पिछली सदी के मुकाबले ज्यादा घृणित और आक्रामक हैं। जन विरोधी हैं। मुनाफे की अंधी हवस ने विश्व मानवता को संकट के दहाने पर खड़ा कर दिया है।
   -राजेश मल्ल

मो0 09919218089

 लोकसंघर्ष पत्रिका सितम्बर 2012 अंक में प्रकाशित

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

चीन के बहाने अमेरिकी युद्धोन्माद


प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया में अक्सर चीन की सैन्य तैयारियों के सम्बन्ध में समाचार आते रहते हैं और युद्ध को लेकर तमाम तरह की अटकलबाजियां भी सुनाई देती हैं और हद तो तब हो गयी कि जब पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बुश ने कहा कि अमेरिका है चीन का पहला निशाना, इसके बाद भारत का नंबर। अमेरिकी साम्राज्यवादियों का हित इसीमें है कि भारत और चीन में अगर युद्ध हो जाए तो उसकी बिगड़ी हुई आर्थिक स्तिथि में सुधार आ सकता है और यह दोनों विकास शील देशों कि अर्थव्यवस्था लुंज-पुंज हो जाएगी। इसी उद्देश्य से अमेरिकी मीडिया और उसके समर्थक भारतीय मीडिया के लोग युद्ध उन्माद पैदा करने कि कोशिश में लगे रहते हैं।
1962 के चीन-भारत युद्ध के बाद हजारों किलोमीटर लम्बी सीमा पर भारतीय सैनिको व चीनी सैनिको कि झड़पें नहीं होती हैं और एक शांति का वातावरण बना रहता है भारत को अधिकार है कि अपनी सीमाओं कि सुरक्षा हेतु सभी तैयारियां रखनी चाहिए और हमारा देश इसको करता रहता भी है। चीन भी अपनी सीमाओं को सुरक्षित बनाने के लिये रोटीन वे में कार्य करता रहता है। पिछला युद्ध भी हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारों के समय हुआ था और उस युद्ध का मुख्य कारण सी.आइ.ए की तिब्बत में जारी गतिविधियाँ थी। जब अमेरिकी साम्राज्यवाद की मुख्य दुश्मन श्रीमती इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री थी तब भारत में अशांति फ़ैलाने के लिये सी.आइ.ए सिक्किम में षड्यंत्र कर रहा था और भारत सरकार ने समय रहते ही सैनिक कार्यवाई कर वहां के राजा चोग्याल को पद्युचुत कर दिया था। आज भी देश के अन्दर चल रही आतंकी घटनाओ के पीछे कहीं न कहीं प्रत्यक्ष-प्रत्यक्ष रूप से अमेरिकी साम्राज्यवादियों का ही हाथ है। चीन भारत का स्वाभाविक मित्र है, अमेरिका कभी भी हमारा मित्र नहीं रहा है न ही हो सकता है। हमने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़कर स्वतंत्रता प्राप्त की है और अब अमेरिकी साम्राज्यवाद से निपटना पड़ेगा अन्यथा हमारी आर्थिक ताकत को बर्बाद करने के लिये यह तरह-तरह के हथकंडे अपनाता रहेगा। इसलिए भारत और चीन दोनों के हित में यह है कि युद्ध किसी भी कीमत पर न हो और यह युद्ध नही होगा।

सुमन
लो क सं घ र्ष !
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