बुधवार, 26 सितंबर 2012

युद्ध और मन्दी के बीच तेल

राजेश मल्ल


जब नाम तेरा लीजिए तब चश्म भर आवे।
इस जिंदगी करने को कहाँ से जिगर आवे।

    बीती सदियों में अमरीका ने दसियों लाख मूल निवासियों (रेड इण्डियन्स) का संहार किया है, आधे मैक्सिको पर अपना कब्जा जमाया है (जो दरअसल मूल निवासियों के क्षेत्र हैं) पूरे इलाके में हिंसक हस्तक्षेप किया है और हवाई और फिलीपीन्स को फतह किया है (हजारो-हजार फिलीपीन्स वासियों की हत्या करके) और खास तौर पर पिछली आधी सदी में अपने ऐसे ही कारनामों को ताकत के बल पर पूरी दुनिया में अंजाम देता रहा है। इन करतूतों के शिकार बेशुमार हैं।
-नोम चोम्स्की

    अरब। तेल। बाजार। ठेका। अरबों डालर। बहुराष्ट्रीय निगम। कारपोरेट। सिनेटर। ड्रोन, मिशाइलें, सेना, फौज। मानवाधिकार-लोकतंत्र। आदिम बर्बरता। कहीं आग लग गई, कहीं गोली चल गई।
    अफगानिस्तान, इराक, लीबिया, सूडान, जार्डन, सीरिया। मरते लोग, लड़ते लोग, कटते लोग, विस्थापित होते लोग। सद्दाम, गद्दाफी, यासिर, अपराधियों की लम्बी सूची।
तेल देखिए और तेल की धार देखिए।
युद्ध आदिम बर्वर युद्ध..........................
लाखों करोड़ों लोग.............................
लाखों करोड़ों डालर............................
लाखों बैरेल तेल..........पेट्रोल............।        विगत दो दशकों में पूरी दुनिया के पैमाने पर और खासकर अरब में एक भयानक युद्ध अमरीका तथा उसके सहयोगियों ने छेड़ रखा है। अब तक मरने और विस्थापित होने वालों की संख्या करोड़ांे में पहुँच गई है। मात्र लीबिया में मरने वालों और विस्थापित होने वालो की संख्या साढ़े छः लाख से ऊपर है। यह हमारे समय का सबसे खौफनाक-खूँरेज मंजर है जिसे दुनिया के लाखों अमन पसंद लोग ‘चश्म तर से देख रहे हैं और मीर की तरह कहाँ से मानवता के इस संहार को देखने का ‘जिगर लावें’ सोच रहे हैं। दुःखद और तकलीफ देह बात यह है कि ढेर सारे लोग  तो इसे शुतुरमुर्ग की तरह आँखों के सामने से ओझल किये हैं या संचार माध्यमों के शोर को अपनी रगों मंे उतार कर उस धोखे के शिकार हैं जो युद्ध के दिनों में सामान्यतः होता ही है। कुछ लोग इसे भारतीय अर्थ व्यवस्था से सम्बद्ध कर पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ती कीमतों तक सीमित कर देते हैं। इस दृष्टि-बोध ने हमें उस भयावह युद्ध से बिलग कर दिया है और भ्रामक सोच के कारण अनवरत चलते इस हत्याकाण्ड के चमश्दीद होने से मुक्त कर दिया है।
    मेरी समझ है और विनम्र अवधारणा कि तेल और उसकी कीमतों पर कोई भी चर्चा ‘अरब युद्ध’ जो प्रथम और द्वितीय महायुद्ध की तरह की भयावह घटना है और और आज जारी है तथा तेल पर कब्जे और उपनिवेश बनाने के लिए लड़ा जा रहा है। इस महत्वपूर्ण सन्दर्भ के बिना सम्भव नहीं है। ‘तेल’ की कीमतों में लगी आग ‘युद्ध और मन्दी की आग’ है ये दोनों एक दूसरे के जनक अन्योन्याश्रित और पूँजीवाद की अन्धी गली का अन्तिम छोर हैं। हो सकता है कि आप को यह बात अतिरंजित लगे और आप मेरे सूत्रीकरण से असहमत हों। लेकिन आप यदि गौर फरमाएँ तथा घटनाक्रमों को एक तरतीब दें तथा अपने ज्ञान और विश्लेषण की परिधि को पूँजीवादी सूचना तंत्र से बाहर जाकर देखने की कोशिश करें तो हकीकत अपने आप सामने आ जाएगी। मैं क्रमशः अपने निष्कर्षों के लिए तथ्य नहीं जुटाऊँगा बल्कि तथ्यों की ऐसी प्रत्यक्ष कड़ी है, श्रंृखला है और बहुत हद तक चीजें हस्तामलक हैं कि आपकी असहमति की कोई गुंजाइश ही नहीं है फिर भी मैं उस भयावह सच से परदा उठाना चाहता हूँ जो आपकी जेहन का हिस्सा नहीं है या नहीं बन पाया है। हालाँकि इसे साम्राज्यवादी ठीक-ठाक कह रहे हैं और उसे आप मात्र ‘शब्द’ मानकर उस ओर गौर नहीं कर रहे हैं जैसे मैं इसे ‘युद्ध और मन्दी’ का परिणाम मान रहा हूँ तो पूरा पूँजीवादी तंत्र बिना किसी हिचक के साफ शब्दों में इसे इसी रूप में कह भी रहा है। अमरीका पूरे नियोजित तरीके से विगत दो दशकों से इसे ‘आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध’ कह भी रहा है और इसे नाटो के साथ मिलकर लड़ भी रहा है। मेरा संशोधन मात्र इसमें यह है कि यह ‘आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध’ नहीं बल्कि ‘तेल के लिए युद्ध’ है। हाँ यदि आप किसी युद्ध से ही इन्कार करते हंै तो फिर आप से मुखातिब होना मेरे लिए संभव नहीं है।
           तो ‘तेल के सन्दर्भ में पहली बात आपको माननी होगी कि एक पीड़ादायी-विनाशक और इन्सानियत के विरुद्ध एक युद्ध लड़ा जा रहा है जिसके एक पक्ष अमरीका और उसके सहयोगी हैं और दूसरी तरफ सम्पूर्ण अरब जनता है। उसकी स्वतंत्रता है, उसकी सम्प्रभुता है। उसके अपने खनिज पदार्थों पर उसका अपना हक है। यह युद्ध अफगानिस्तान, इराक, लीबिया में प्रत्यक्ष रूप से लड़ा गया है और कमोवेश भयावह तबाही के साथ जीता जा चुका है। वहाँ के राष्ट्रध्यक्षों की हत्या की जा चुकी है। अब आगे निशाने पर सीरिया से लेकर ईरान तक वे सारे अरब देश हैं जो अभी गुलाम नहीं बने हैं या उनकी खनिज सम्पदा जो ‘तेल ही है पर साम्राज्यवाद का कब्जा नहीं हो गया है। इस युद्ध के आँकड़े समयावधि, धनराशि, शामिल सैनिको कीं संख्या, प्रभावित जन समुदाय, क्षेत्रफल, मारे और विस्थापित लोगों
की संख्या सभी द्वितीय महायुद्ध से ज्यादा है। मात्र इराक या लीबिया के युद्ध का आकार फैलाव और जन हानि तथा बबर्रता हिटलर द्वारा रचाए गए यहूदी हत्याकाण्ड से बड़ा है। युद्ध का तर्क, अरब देशों पर हमले का कारण और वहाँ के राष्ट्रध्यक्षों के प्रति साम्राज्यवादी व्यवहार ‘सब कुछ घृणित, आपराधिक और मानवता को शर्मशार करने वाला है। उदाहरण के लिए अभी लीबिया और कर्नल गद्दाफी की घटना को देखा जा सकता है। ‘चूँकि लीबिया में संभावित गृहयुद्ध की स्थितियाँ हैं और ऐसे में लाखों लोग मारे जा सकते हैं इसलिए वहाँ के लोगों में शान्ति बहाल करने के लिए अमरीका तथा नाटो ने लाखों लोगों को मार डाला। गद्दाफी पर तो सद्दाम हुसैन की तरह मुकदमे की बेशर्मी भी नहीं की गई बल्कि पहले ही करोड़ों डालर का इनाम-इकराम घोषित कर दिया गया कि सेना की जद में आने के बाद कर्नल गद्दाफी को मारने की होड़ मच गई। यह बेशर्मी और अमरीकी बर्बता का ताजातरीन उदाहरण है। खैर ‘युद्ध’ के साथ-साथ जब-जब मन्दी खासकर विŸाीय पूँजी के संकट के बादल घिरते हैं। शेयर मार्केट, बैकिंग तथा अन्य विŸाीय संस्थाएँ डूबने लगती हैं, तेल कम्पनियों और उनके मालिकों का दबाव बढ़ता जाता है और तभी अरब का कोई न कोई हिस्सा फिर से युद्ध की लपटों में समाने लगता है।
    यह किस्सा अब नानी के भूत की कहानी नहीं बल्कि एक संवेदनशील तार्किक निगाह की तलबगार है जिसे पूरी दुनिया ठीक से समझ रही है। तेल कम्पनियों पर पड़ने वाला मन्दी का प्रभाव और उसी के गर्भ से पैदा होने वाले युद्ध की विभीषिका आज हमारे समय की सबसे बड़ी सच्चाई है। मैं इस छोटे से आलेख में आँकड़े और उसके परिणामी निष्कर्षों को न रखकर मात्र उन सच्चाइयों की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ जिससे हम तथाकथित तेल संकट को समझ सकें।
    ‘युद्ध और मन्दी’ या ‘मन्दी और युद्ध’ के बीच तेल कीमतों की बढ़ोत्तरी और भारतीय मध्य वर्ग की चिल्ल-पों के बीच यह भी गौर करने का विषय है कि भारतीय तेल कम्पनियों और भारत सरकार के रिश्ते और मन्दी की मार से उबरने में तेल की कीमतों में वृद्धि की विवशता और तानाशाहीपूर्ण सोच ने हमें भी अरब जनता की तरह विवश कर रखा है।
    मेरा अनुरोध है कि मन्दी-युद्ध तथा तेल कीमतों में वृद्धि को एक साथ रखकर देखें तो साम्राज्यवाद-पूँजीवाद का क्रूर चेहरा बेनकाब हो जाएगा। इसलिए जरूरी है कि पहले, मन्दी और युद्ध को समझा जाए फिर उसकी परिणति तेल कम्पनियों के लाभांश के लिए जनता को और-और दुहने में लगे पूँजीवादी साम्राज्यवादी खेल को समझा जाए और अब यह सारा कुछ साफ है, स्पष्ट है।
    तेल कीमतों की वृद्धि, भयावह नरसंहार और मन्दी की बार-बार आती बाढ़ उसी पूँजीवादी-साम्राज्यवादी क्रिया कलापों की परिणाति है जिसके खिलाफ निर्णायक युद्ध के बिना न देश की जनता का कल्याण है और न ही विश्व मानवता का। हर बार डूबती अर्थ व्यवस्थाओं को बचाने के नाम पर अरबों डालर मदद तथा तेल कम्पनियों के ‘तथाकथित घाटे’ जो कि अधिक मुनाफे की हवस ही है, को पूरा करने के लिए साम्राज्यवादी और उनकी पिट्ठू सरकारें तेल कम्पनियों के सामने नतमस्तक हैं। ब्रिटेन की छः डाईन कम्पनियाँ हों या भारत की तेल कम्पनियाँ इनकी शक्ति इतनी है कि ये सरकारों को अपनी मर्जी अर्थात अधिक से अधिक मुनाफे के लिए विवश कर सकती हैं। ‘युद्ध और मंदी’ के इस खेल को अंजाम देने का कार्य यदि ब्रिटेन, जर्मनी तथा अमरीकी कम्पनियों ने किया है तो भारत के संदर्भ में यहाँ की तेल कम्पनियाँ जो अब पूरी तरह से भारत सरकार के नियंत्रण से मुक्त हैं, उनका दबाव है। युद्ध और ईरान पर प्रतिबंध के बीच अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर जारी सट्टेबाजी तथा तेल कम्पनियों के मुनाफे की हवस ने मिलकर एक सर्वग्रासी तंत्र का निर्माण किया है। मजेदार बात यह है कि तेल का अन्तर्राष्ट्रीय बाजार भाव सन् 2008 के बराबर है लेकिन 2012 तक कीमतों की वृद्धि लगभग दोगुने के आसपास पहुँच चुकी है। तब यह सवाल गंभीर है कि आखिर मुनाफे की भारी मात्रा किसकी जेब में जा रही है।
    सही बात यह है कि नव उदारवादी तंत्र कारपोरेट और मुनाफा खोर कम्पनियों को लाभ पहुँचाने के लिए ही बन गया है जिससे बार-बार विश्व मानवता को खौफनाक दौरों से गुजरना पड़ रहा है। दुनिया के तथा देश के समस्त प्राकृतिक संसाधनों को इन कम्पनियों के हवाले कर सरकारें नए-नए हत्याकाण्ड रचाने में शामिल हैं।
    इस स्तर में ‘तेल’ की कीमतों के सवाल के पीछे पूँजीवादी साम्राज्यवादी अर्थतंत्र है जो पिछली सदी के मुकाबले ज्यादा घृणित और आक्रामक हैं। जन विरोधी हैं। मुनाफे की अंधी हवस ने विश्व मानवता को संकट के दहाने पर खड़ा कर दिया है।
   -राजेश मल्ल

मो0 09919218089

 लोकसंघर्ष पत्रिका सितम्बर 2012 अंक में प्रकाशित

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