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बुधवार, 10 सितंबर 2014

आईसिस,तेल की राजनीति और इस्लाम के प्रति घृणा का चरम

 लगभग एक माह पहले ;अगस्त 2014, मुस्लिम कार्यकर्ताओं.अध्येताओं के एक समूह ने विभिन्न शहरों में प्रेस वार्ताएं आयोजित कीं। उन्होंने आईसिस द्वारा की जा रही क्रूर हिंसा की भर्त्सना करते हुए वक्तव्य जारी किये। इन वक्तव्यों पर सबसे ऊपरए बड़े.बड़े अक्षरों में लिखा गया था, 'इस्लाम मीन्स पीस' ;,का अर्थ है शांति। बयान में कहा गया था कि'भारतीय मुसलमान, ईराक और सीरिया में आईसिस द्वारा अल्पसंख्यकों पर किए जा रहे भीषण अत्याचारों की कड़ी निंदा करते हैं। हम धार्मिक असहिष्णुता और इस्लाम के नाम पर हिंसा और उत्पीड़न की भी निंदा करते हैं।' मैंने इस वक्तव्य को कई जगह भेजा। एक व्यक्ति का जवाब आया, ''इस्लाम का अर्थ है शांति' यहए इस सदी का सबसे बड़ा चुटकुला है'।
भारत में इन दिनों लवजिहाद के बारे में प्रचार, जंगल में आग की तरह फैल रहा है। जाहिर है कि इस मुद्दे को सांप्रदायिक तत्वों द्वारा हवा दी जा रही है। शादी के साथ.साथ धर्मपरिवर्तन करने और लड़कियों द्वारा पीछे हट जाने की चन्द घटनाओं का इस्तेमालए यह बताने के लिए किया जा रहा है कि मुस्लिम पुरूष, हिंदू लड़कियों से धोखा देकर विवाह कर रहे हैं और इसका उद्देश्य उन्हें मुसलमान बनाना है। एक मित्र ने मुझसे जानना चाहा कि क्या मैं ऐसे 100 मामले भी बता सकता हूं, जब मुस्लिम लड़कियों ने हिंदू पुरूषों से शादी की हो। मेरी किस्मत अच्छी थी कि और मैं 100 से भी अधिक ऐसे दंपत्तियों की सूची बनाने में सफल रहा। हिंदू पुरूष,मुस्लिम पत्नि के नाम से गूगल सर्च करने पर कई मर्मस्पर्शी प्रेमकथाएं सामने आईं। यह शायद उल्टा लवजिहाद हैhttps://www.facebook.com/R3alityofPorkistan/posts/613266692020533। पहले से ही जहरीले हो चुके वातावरण में अल कायदा के अल जवाहिरी ने एक वीडियो जारी कियाए जिसमें कहा गया है कि अल कायदा अपनी गतिविधियों का भारत में विस्तार करेगा।
 इस्लाम और मुसलमानों के बारे में इतनी सारी भ्रांतियां फैला दी गई हैं और जनसाधारण के मन में इतनी गलतफहमियां बैठा दी गईं हैं कि किसी से यह कहना ही मुहाल हो गया है कि वे धर्म, और राजनीतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए धर्म के दुरूपयोग,के बीच अंतर करें। देश और दुनिया में दिल को हिला देने वाली जो घटनाएं हो रही हैं उनके लिए इस्लाम और मुस्लिम समुदाय को दोषी बताया जा रहा है। आमजन अन्य धर्मों को तो 'नैतिकता और शांति' के साथ जोड़ने को तैयार हैं परंतु इस्लाम को नहीं। कई समूहों और संगठनों द्वारा 'सहमति के उत्पादन' के चलते, मुसलमानों का एक ऐसा चित्र बनाया जा रहा है जो न तो सही है और ना ही विश्व में शांति की स्थापना में मददगार साबित होगा। सभी मुसलमानों को एकसा बताया जा रहा है। चंद अपराधी मुसलमानों और इस्लाम के कट्टरवादी संस्करण को असली इस्लाम बताया जा रहा है, जिससे दशकों से चले आ रहे पूर्वाग्रह और मजबूत हो रहे हैं।
आईसिस का जन्म अलकायदा की कोख से हुआ है। अलकायदा के लड़ाकों को अमरीका और आईएसआई द्वारा स्थापित किये गये मदरसों में प्रशिक्षित किया गया था। इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि अमरीका,पश्चिम एशिया के तेल संसाधनों पर कब्जा करना चाहता है। इस क्षेत्र के बारे में अमरीका की नीति को इन शब्दों में बयान किया जा सकता है,'तेल इतना कीमती है कि उसे वहां के निवासियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।' अमरीका की पश्चिम एशिया नीति को समझने के लिए आपको बड़े.बड़े विद्वानों की मोटी.मोटी किताबें पढ़ने की जरूरत नहीं है। आपको केवल हिलेरी क्लिंटन की एक छोटी सी वीडियो क्लिप भर देखनी होगी। वीडियो क्लिप में वे बड़ी शान से और बिना किसी लागलपेट के कहती हैं कि अमरीका ने मुस्लिम युवकों को प्रशिक्षित कर अल कायदा का निर्माण किया था। http://www.youtube.com/watch?v=nLhRKj6633w। इस क्षेत्र के इतिहास पर एक नजर डालने से ही हमें समझ में आ जायेगा कि मुस्लिम युवकों को प्रशिक्षित करने के लिए इस्लाम के तोड़ेमरोड़े गये वहाबी संस्करण का इस्तेमाल किया गया था।
 अल कायदा का अमरीका ने केवल निर्माण ही नहीं किया वरन उसने उसे धन और हथियार भी उपलब्ध करवाये ताकि अल कायदा, अफगानिस्तान पर काबिज रूसी सेनाओं से मोर्चा ले सके। धीरे.धीरे, जब अलकायदा के भयावह अत्याचारों की खबरें छन.छन कर बाहर आनी शुरू हुईं तब अमरीकी मीडिया ने इस्लाम को ही दानवी प्रवृत्तियों का स्त्रोत बताने के लिए 9-11-2001 के बाद से 'इस्लामिक आतंकवाद' शब्द का इस्तेमाल शुरू कर दिया। 9-11 के पहले तकए आतंकी हमलों को किसी धर्म से नहीं जोड़ा जाता था। वैसे भी, सभी धर्मों के मानने वाले आतंकी हमलों में शामिल रहे हैं। महात्मा गांधी और राजीव गांधी के हत्यारे हिंदू थे तो इंदिरा गांधी को सिक्खों ने मारा था। थायलैण्ड, म्यानमार और श्रीलंका में बौद्ध भिक्षुक आतंकी हमलों में शामिल हैं। नार्वे के एंडर्सबर्लिंग ब्रेविक भी आतंकी थे परंतु मुसलमान नहीं। सच यह है कि लगभग सभी धर्मों के लोगों ने कभी न कभी राजनैतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए आतंकी हमलों में भाग लिया है। परंतु 9-11 के बाद से, आतंकी हमलों को इस्लाम और केवल इस्लाम से जोड़ दिया गया।
यह दिलचस्प है कि अल कायदा को खड़ा करने और मुजाहिदीनों के दिमाग में घोर कट्टरता भरने के लिए अमरीका ने इस्लाम के जिस संस्करण का इस्तेमाल किया, उसे सूत्रबद्ध करने वाले थे अब्द अब्द अल वहाब, जिन्होंने इस्लाम को कट्टर बनाने की प्रक्रिया शुरू की थी और धर्म की केवल अपनी व्याख्या को सही बताया था। वे लिखते हैं 'यदि कोई धर्मावलंबी, इस्लाम की इस ;वहाबी व्याख्या पर अपने विश्वास को स्वीकार करने में जरा सा भी संकोच या संदेह दर्शाता है तो वह अपना संपत्ति और जीवन का अधिकार खो बैठेगा।' इस्लाम के इसके अलावा कई अन्य संस्करण भी हैं। परंतु क्या कारण है कि यह संस्करण सबसे प्रभुत्वशाली बनकर उभरा है। इसका कारण यह है कि इस संस्करण को सऊदी अरब के शासकों का संरक्षण प्राप्त है। अब्द अल वहाब के सिद्धांत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है तकफीर। इस सिद्धांत के अनुसारए 'वे मुस्लिम काफिर हैं जो ऐसी किसी भी गतिविधि में हिस्सा लेते हैं जिससे शासक ;अर्थात राजा की प्रभुसत्ता और उसके अधिकारों का अतिक्रमण होता हो। जो लोग इस सिद्धांत को स्वीकार नहीं करेंगे उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा,उनकी पत्नियों और लड़कियों के साथ जबरदस्ती की जायेगी और उनकी संपत्ति जब्त कर ली जायेगी।'http://www.huffingtonpost.com/alastair-crooke/isis-wahhabism-saudi-arabia_b_5717157.html
  यह संस्करण सऊदी शासकों को भाता था क्योंकि इससे वे तेल के संसाधनों पर अपना कब्जा बरकरार रख सकते थे। यह अमरीका के लिए भी बहुत काम का था क्योंकि इसमें काफिर ;जो सत्य को छुपाता है का अर्थ गैर.मुस्लिम या 'दूसरा' कर दिया गया था। इस संस्करण में जिहाद का अर्थ है गैर.मुस्लिम की जान लेना। इस्लाम के जानेमाने विद्वानों का कहना है कि जिहाद का अर्थ है अच्छे काम करने की हर संभव कोशिश करना। इस्लाम, जो यह कहता है कि'मेरे लिये मेरा दीनए तुम्हारे लिये तुम्हारा' और जो यह कहता है कि 'इसी कारण इजरायल की संतान के लिए हमने यह आदेश लिख दिया था कि जिसने किसी इंसान को कत्ल के बदले या जमीन में बिगाड़ फैलाने के सिवाए किसी और वजह से कत्ल कर डाला उसने मानो सारे ही इंसानों को कत्ल कर दिया और जिसने किसी की जान बचाई उसने मानो सारे इंसानों को जीवनदान दिया ;कुरान,अध्याय 5, आयत 32। शांति के पैरोकार इस धर्म के नाम पर मासूमों को मारा गया। इस्लाम का यह संस्करण उन लोगों के लिए बहुत उपयोगी था जो दूसरों के कंधों पर बंदूक रखकर रूसी सेना से लड़ना चाहते थे। परंतु समस्या यह है कि ब्रेनवाश करके जिन लड़ाकों को तैयार किया गया था वे सोवियत संघ की अफगानिस्तान से वापसी के बाद भी उतने ही कट्टर बने रहे। रूसी सेना को हराने के बाद अल कायदा इस्लाम के तोड़ेमरोड़े गये संस्करण में विश्वास करता रहा और उसके पास अमरीका द्वारा उसे उपलब्ध कराये गये खतरनाक हथियार बने रहे। उनके दिमाग में वहाबी इस्लाम भरा हुआ था और हाथों में अमरीकी बंदूकें थीं। इसी का नतीजा है कि आईसिस का अस्तित्व में आना, उनका यह भ्रम कि वे अब दुनिया पर शासन कर सकते हैंए उनके द्वारा खलीफा को गद्दी पर बैठाया जाना और उसके बाद पागलपन के कामों की लंबी श्रृंखला।
जाहिर है कि अमरीका बांटो और राज करो की नीति का इस्तेमाल ठीक उसी तरह कर रहा है जैसे कि पहले साम्राज्यवादी ताकतें किया करती थीं। भारत में साम्राज्यवादियों ने सांप्रदायिक राजनीति के बीच बोये। पश्चिम एशिया में पिछले कुछ दशकों के दौरान, अमरीकी साम्राज्यवादियों का लक्ष्य रहा है नस्लीय और सांप्रदायिक विभाजनों को और गहरा करना, और उनके आधार पर छोटे.छोटे देशों का गठन करवाना। यही कारण है कि शियाओं, सुन्नियों और कुर्दों आदि के बीच हिंसा को अमरीका प्रोत्साहन दे रहा है। एक ओर अमरीका बांटो और राज करो की अपनी नीति लागू कर रहा है और दूसरी ओर वह पूरी दुनिया में इस्लाम का दानवीकरण भी कर रहा है और इसका आधार बनाया जा रहा है अल कायदा और आईसिस जैसे संगठनों के कुकर्मों को।
शक्तिशाली निहित स्वार्थी तत्व,अपने राजनैतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए धर्म का दुरूपयोग करने पर आमादा हैं। वे एक धर्म विशेष के मुंह पर कालिख पोत रहे हैं। ऐसे दौर में आमजनों को तार्किक ढंग से सोचने के लिए राजी करना दुष्कर कार्य है। जो धारणायें लोगों के दिमागों में बैठ गयी हैं उन्हें निकालना आसान नहीं है। परंतु यदि हमें अपने समाज में शांति और प्रगति लानी है तो हमें यह करना ही होगा। 
 -  राम पुनियानी

सोमवार, 21 जनवरी 2013

माजरा क्या है ?

नकद सब्सिडी योजना की असलियत


 इस योजना के लागू किये जाने के साथ सब्सिडी को घटाए जाने का काम पूरे देश पैमाने पर किया जाना है | यह जन - साधारण को प्रत्यक्ष रूप में सब्सिडी देना नही है , बल्कि उसके सब्सिडी में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में कटौती करना है |
आर्थिक सुधारों के नए चरण के साथ आते रहे योजनाओं में इस समय नकद सब्सिडी योजना की खूब चर्चा है | हुकुमती व प्रचार माध्यमी क्षेत्र में योजना का आम तौर पर स्वागत समर्थन किया जा रहा है | विपक्षी पार्टियों द्वारा इसका कोई विरोध नही सुनाई पड़ रहा है | प्रचार माध्यमी हिस्सों द्वारा कुछ किन्तु -- परन्तु के साथ इस योजना को जनसाधारण के हित की योजना के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है |
अभी तक चलती रही सब्सिडी योजना में खाद्यान्न , उर्वरक , तथा मिटटी के तेल , रसोई गैस , डीजल आदि के बाजार मूल्य का एक हिस्सा सरकार द्वारा सब्सिडी के रूप में दिया जाता रहा है | इसलिए उपभोक्ताओं को ये माल सामान खुले बाजार से कम मूल्य पर मिलते रहे है | अब इस योजना के जरिये सरकार ने यह निर्णय लिया है कि सबसे पहले ( किरोसिन व रसोई गैस ) उर्वरक और खाद्यान्न पर दी जाती रही सब्सिडी को अब उसके आपूर्तिकर्ता संस्थानों को देने की जगह सीधे -- सीधे उपभोक्ताओं को दिया जाएगा | साफ़ बात है कि बाजार में उपभोक्ता को अब इन मालो का बाजार दाम चुकाना पडेगा | पर उसे अब तक मिलती रही सब्सिडी की रकम नई योजना के तहत सरकारी खजाने से उसके खाते में पहुंच जायेगी | उदाहरण , अभी तक 49.10 रूपये प्रति लीटर दाम वाला मिटटी का तेल उसे कंट्रोल रेट पर 15.25  रूपये प्रति लीटर में मिल जाता था | अब उसे कंट्रोल की दूकान पर भी मिटटी का तेल 49.10 रूपये प्रति लीटर खरीदना पडेगा | सब्सिडी की रकम उसको नकद रूप में अपने बैंक एकाउन्ट के जरिये मिल जायेगी | इस नई और नकद सब्सिडी योजना के समर्थन में चलाए जा रहे प्रचारों में यह कहा जा रहा है कि इससे सब्सिडी की रकम को बिचौलिया द्वारा खा जाने का भ्रष्टाचार रुकेगा | इस नई और नकद सब्सिडी योजना को उपभोक्ताओ तक पहुँचने के लिए दो नए चीजो की जरूरत है | एक तो सब्सिडी पाने योग्य होने के प्रमाण -- पत्र '' की जिसे '' आधार पत्र '' का नाम दिया गया है | दूसरी जरूरत है आधार पत्र धारको द्वारा निकटवर्ती बैंक में खाता खुलवाने की | कयोकी सरकारी खजाने से उसके इसी खाते में सब्सिडी की रकम पहुंचनी है | यह भी कहा जा रहा है कि देर सवेर अन्य योजनाओ  ''उदाहरण ''-- छात्रवृति जैसी योजनाओं को भी नकद सब्सिडी योजना के तहत ला दिया जाएगा | अभी इस योजना को प्रयोगिक तौर पर राजस्थान के अलवर जिले में मिटटी के तेल पर नकद सब्सिडी योजना के रूप में तथा मैसूर में कुकिंग गैस पर नकद सब्सिडी योजना के रूप में आरम्भ किया गया है | सूचना यह है कि 1 जनवरी 2013 से देश के 51 जिलो में नकद सब्सिडी योजना लागू कर दी जायेगी और अप्रैल 2014 तक इसे पूरे देश में लागू कर दिया जाएगा | जनवरी 2013 में सार्वजनिक सेवा के 29 कार्यक्रमों को नकद सब्सिडी योजना में शामिल किया जाएगा और बाद में सार्वजनिक सेवा के लिए चलाई जा रही 42 योजनाओं को इसके अंतर्गत लाया जाएगा |
सूचना यह भी दी गयी है कि इस योजना के चलते सरकारी खजाने पर अब तक पड़ रहा एक लाख नब्बे हजार करोड़ रूपये की सब्सिडी बढ़कर कुल चार लाख करोड़ रूपये प्रति वर्ष हो जाएगी | आगे बढने से पहले एक दिलचस्प मामला सुन ले | अभी तक खासकर पिछले 15 सालो से आती रही सरकारे , उनके वित्त मंत्रीगण जाने -- माने अर्थशास्त्री व आर्थिक सलाहकार सरकारी खजाने पर बढती सब्सिडी का रोना रोते रहे है उसे घटाने  की सलाह देने के साथ इसके उपाय भी बताते रहे है | इन्ही सुझावों और उपायों के तहत जनसाधारण को खाद , बीज , सिंचाई , बिजली , पेट्रोल , डीजल , गैस  तथा शिक्षा , चिकित्सा आदि क्षेत्रो में मिलती रही सब्सिडी को विभिन्न रूपों में काटा --  घटाया भी जाता रहा है | खासकर पिछले 15 सालो से |
लेकिन अब नकद सब्सिडी योजना के अंतर्गत सब्सिडी की कुल रकम घटने की जगह बढाने के समाचार आने के वावजूद इस पर कही कोई चिंता चर्चा सुनाई नही पड़ी | न ही इस योजना की कोई आलचना ही हुई | उल्टे इसका स्वागत समर्थन किया जा रहा है | लेकिन क्यों ? माजरा क्या है ? क्या सत्ता सरकारों उनके वित्त मंत्रियों सलाहकार बने उच्च स्तरीय अर्थशास्त्रियो का मन बदल गया है ? नही ! ऐसा कुछ नही हुआ है | उनका मन सब्सिडी घटाने का ही बना हुआ है | उसी के प्रयास स्वरूप ही यह नकद सब्सिडी योजना लागू भी की जा रही है | लेकिन एक लाख चौरासी हजार करोड़ की सब्सिडी  के चार लाख करोड़ तक पहुंचने से यह संभव कैसे होगा ?
पहली बात तो 2012 -- 13 में 1 लाख 84 की दी गयी सब्सिडी मुख्यत: खाद्यान्न , उर्वरक , और तेल पेट्रोल व गैस पर दी जाने वाली सब्सिडी की रकम है | यह सब्सिडी लगातार घटाई गयी है | खासकर डाई जैसे उर्वरको पर और पेट्रोल पर तो उसे 2010 -- 11 से ही घटाया जा रहा है | जहा तक सब्सिडी की संभावित रकम 4 लाख करोड़ पहुंचने का मामला है तो अब उसमे केन्द्रीय बजट के जरिये सामाजिक सेवाओं के विभिन्न क्षेत्रो में ( उदाहरण छात्रवृति व आम बीमा योजना आदि रूपों में ) खर्च किये जाते रहे रकम को भी प्रत्यक्ष सब्सिडी योजना के नाम पर जोड़ दिया गया है | हालाकि स्पष्ट तौर पर इसकी सूचना नही दी गयी है लेकिन यह सूचना तो दी ही गयी है कि अब नकद सब्सिडी योजना के तहत सरकार द्वारा चलाई जा रही 42 योजनाओं के लिए दिए जाने वाला सरकारी धन शामिल कर लिया गया है | साफ़ बात है कि यह सब्सिडी की रकम को बढाना नही है , अपितु उसे बढा दिखा कर सब्सिडी के हकदार जनसाधारण को धोखा देना है | जबकि वास्तविक स्थिति प्रचारों के एकदम विपरीत  है | इसे आप बतौर सबूत देखे --
अलवर जिले के जिलाधिकारी का ब्यान 8 दिसम्बर के हिन्दी दैनिक बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित हुआ है | उनका कहना है कि एक साल पहले इस क्षेत्र में मिटटी के तेल की बिक्री 84000 लीटर प्रति माह थी | लेकिन अब उसमे 70% की गिरावट आई है | वे खुश होकर गिरावट का कारण बताते है कि प्रत्यक्ष सब्सिडी योजना के चलते मिटटी के तेल की कालाबाजारी बंद हो गयी है |
इसके विपरीत अलवर के मिटटी के तेल के विक्रेताओ और खरीदारों का कहना है कि बड़ी संख्या में अब गरीब मिटटी का तेल नही खरीद पा रहे है | कयोकी अब उन्हें तुरंत खरीद के लिए कंट्रोल रेट 15.25 रूपये देने की जगह 49.10 रूपये  देना पड़ रहा है | बहुतेरे लोगो के खाते में सब्सिडी का पैसा अभी आया ही नही है | जबकि सब्सिडी की रकम उनके खातो में पहले ही पहुंचाया जाना तय  किया गया था | इसके अलावा बहुत से लोगो के खाते में 3 माह पहले सब्सिडी की रकम एक बार के लिए तो आई पर दुबारा नही आई , कब आएगी इसका कोई पता नही | फिर जिले के कई गाँवों के आस -- पास कोई बैंक नही है | उदाहरण -- कोट -- कासिम गाँव के कई पूर्वे नजदीकी बैंक से 17 किलोमीटर दूर है | वह के निवासियों के लिए और आम तौर पर दिहाड़ी मजदूरों के लिए बैंक में सब्सिडी के रूप में आये धन का पता लगाना और पाना कत्तई आसान नही है | उसके लिए उन्हें एक दिन या कई दिन का काम या दिहाड़ी छोड़ना पडेगा | अलवर जिले का कोटेदार भी 49.10 रु के रेट से मिटटी के तेल की उठान करने में अपने को असमर्थ बता रहे है | तमाम प्रशासनिक दबावों के वावजूद निर्धारित कोटे से कही कम उठान हो रहे है | कयोकी अब उन्हें भी मिटटी के तेल का मूल्य बगैर सब्सिडी के ही चुकाना पड़ रहा है | वह पहले के मूल्य से तीन गुना से भी ज्यादा है |
दरअसल अलवर जिले में मिटटी के तेल में गिरावट के ये उपरोक्त कारण ही असली व प्रमुख कारण है |
निश्चित रूप से बढे मूल्य के साथ काला बाजारी में भी कमी जरुर आई होगी , लेकिन मुख्य गिरावट उसकी खरीद बिक्री में भारी गिरावट आने के चलते हुई है | कयोंकि  यह स्वाभाविक बात है कि जब उसकी खरीद बिक्री में कमी और वह भी भारी कमी आ जायेगी तो उस पर दी जाने वाली सब्सिडी की मात्रा भी घट जायेगी या घटा दी जायेगी | अलवर में मिटटी के तेल की बिक्री पर दी जाने वाली सब्सिडी में भारी कमी जरुर आई होगी |
स्वाभाविक बात है कि जो स्थिति राजस्थान के अलवर की है उसी का परिलक्षण नकद सब्सिडी योजना के तहत देश के पैमाने पर दिखाई पड़ना है | इस योजना के लागू किये जाने के साथ सब्सिडी को घटाए जाने का काम पूरे देश के पैमाने पर किया जाना है | यह जनसाधारण को प्रत्यक्ष रूप से सब्सिडी देना नही है बल्कि उसके सब्सिडी में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में कटौती करना है |
यह सरकार और देश के धनाढ्य वर्ग की सोची समझी एक चाल है |



-सुनील  दत्ता  
पत्रकार

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

समस्या देश में सूखे की ----- चर्चा उद्योग , व्यापार , बैंक , और विकास की ?

 वाह रे देश के नेता और हमारे प्रधानमन्त्री

  • कृषि 
सुखे की समस्या और उसके राहत व समाधान से ज्यादा चर्चा सूखे के पड़ने वालेदूसरे प्रभावों की हो रही है | कृषि पर सूखे के पड़ने वाले प्रभावों से कुछज्यादा ही हो रही है | इनमे एक चर्चा तो सूखे के बढने के साथ ही खाद्यान्नव्यापारियों द्वारा खाद्यान्न का मूल्य अभी से तेज किए जाने के रूप में होरही है | दूसरे इसकी चर्चा किसानो द्वारा कृषि ऋण की अदायगी के संकट तथाबैंको के पैसे के वापस न मिल पाने के के संकट के रूप में हो रही है | इसीके साथ किसान व किसान परिवारों को कर्जा दी हुई माइक्रो फाइनेंस कम्पनियोंके पैसे समय से न वसूल हो पाने के संकटों की भी चर्चा हो रही है | तीसरीचर्चा उद्योगों के उपर सूखे से पड़ रहे और पड़ने वाले प्रभावों की हो रही है | 
बैंको के संकटों का ( न की किसानो के संकटों का ) आकलन करते हुए रिजर्व बैंक नेकिसान क्रेडिट कार्ड ( के . सी. सी . ) पर उठाये गये कर्ज को 12 महीन  में लौटाने की बाध्यता खत्म कर दी है | उसने यह निर्देश दिया है की बैंककिसानो की स्थितियों का आकलन करके अल्पावधि के इस कृषि ऋण की अवधि को बढासकते है | ताकि किसानो को कर्ज चुकाने का पर्याप्त समय मिल जाए | इसी केसाथ रिजर्व बैंक ने यह भी निर्देश भी दिया है की ( के. सी . सी . ) धारककिसानो को फसल बीमा उपलब्ध कराने में भी बैंको को मदद करनी चाहिए |अगर किसान इस के लिए तैयार हो तो बीमे की किस्त का भुगतान भी किसान क्रेडिट कार्ड के खाते से किया जा सकता है |
  • उद्योगों  पर पड़ने वाले प्रभावों में बताया जा रहा है की  औद्योगिक  सुस्ती और ऊँचीव्याज दर से परेशान उद्योग जगत पर अब सूखे के संकट से भी मार पड़ने वाली है |सूखे के प्रभावों का आकलन करके टूथपेस्ट , तेल , साबुन व अन्य प्रसाधन केसामान बनाने वाली कम्पनिया ( फास्ट मूविंग कन्जूमर गुड्स की कम्पनिया ) तथाऑटो मोबाइल व इलेक्ट्रानिक उपकरण बनाने वाली कम्पनिया ख़ास तौर से परेशानहै | क्योंकि तेल साबुन आदि तथा प्रसाधन के सामानों के कुल बिक्री मेंग्रामीण क्षेत्र का हिस्सा लगभग 40% है | कृषि सूखे से उनके इस बिक्रीबाजारका भी सुखना निश्चित है | इसी तरह से ग्रामीण इलाको में फ्रीज, टीवी . वअन्य इलेक्ट्रानिक सामानों के ग्रामीण बिक्री बाजार को भी सूखे के चलतेप्रभावित होना पड रहा है | साथ ही साथ दुपहिये वाहन कम्पनियों पर भी इससूखे का गम्भीर प्रभाव जरुर पढ़ना है क्योंकि इन दुपहिया वाहनों की बिक्रीका 35% हिस्सा ग्रामीण क्षेत्र से आता है |योजना आयोग भी सूखे को लेकरचिन्तित है | उसकी चिन्ता भी बैंको व औद्योगिक   कम्पनियों की तरह खेती --किसानी के सूखने की नही है , बल्कि सूखे के बढ़ते प्रभाव के कारण मालो वसामानों की बिक्री के घटने से विकास दर में कमी आने से है | इसके फलस्वरूपदेश में विदेशी निवेश के माहौल और निवेश में कमी आने की आशंका भी योजनाआयोग की चिन्ता का विषय है | इसे सुधारने के लिए योजना आयोग की सलाहकारसमिति ने आर्थिक सुधारों को आगे बढाने की चेतावनी भी दी है |इनसूचनाओं , चर्चाओं निवेशो से कोई भी आदमी दो बाते बखूबी समझ सकता है | पहलातो यह की उद्योगों , बैंको समेत योजना आयोग की तथा प्रचार माध्यमी जगत कीमुख्य चिन्ता सूखे को लेके कत्तई नही है | दुसरा की इनकी सारी या प्रमुखचिन्ता अपने बैंक उद्योग व्यापार की कमाई धमाई  में बढ़ोत्तरी की तथाआर्थिक वृद्धि दर को बढाने की ही है | बैंको एवं उद्योगों की बैंको एवउद्योगों की बात को दरकिनार कर देखे तो यह अजीब बात है की राष्ट्र का योजनाआयोग कृषि के सूखे पर चिन्तित नही है | उसके लिए किसी तात्कालिक सुधार काया दूरगामी योजना का निर्देश की सलाह भी नही दे रहा है | बल्कि उसकीसलाहकार समिति आर्थिक वृद्धिदर में गिरावट का आकलन करके उसके लिए आर्थिक सुधारों की गति बढाने की चेतावनी पूर्ण सलाह दे रहा है | जबकि आर्थिकसुधारों के अंतर्गत कृषि सुधार या सूखे से निपटने का कोई मामला ही नही है |यह तो वर्तमान समय में खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश की पूरी छूट के साथबीमा बैंक आदि में पूरी छूट के सुधार एजेन्डा है |  कृषि भूमि के तीव्रएवं आसान अधिग्रहण आदि का एजेन्डा है | आर्थिक सुधार के यही एजेन्डे  बने हुएहै | इसके पास सूखे की स्थितियों में तात्कालिक एवं दूरगामी सुधार का कहीकोई एजेन्डा नही है |देश का प्रचार माध्यमी तंत्र बैंको की समस्या को गम्भीरता से उठा रहा है | माइक्रोफाइनेंस कम्पनियों तक की वसूली की समस्या को उठा रहा है | उसे प्रचारित भी कर रहा है |  साथ ही सूखे के फलस्वरूप उद्योगों के संकटों को पूरे विस्तार से उठा बता रहा है | पर किसानोकी खेती के सूखे के संकट को गम्भीरता से उठाने की जगह सूखे की सूचनाये दे रहा है | किसानो की खेती के सूखने का असर किसानो ग्रामीणों पर क्या पडेगा , इस पर कही कोई गम्भीर चर्चा नही हो रही है की सूखे से प्रभावित किसानो व ग्रामीणों पर औद्योगिक कम्पनियों , व्यापारियों , बैंको व फाइनेंस कम्पनियों द्वारा की जाती रही लूट का क्या प्रभाव पडेगा ? सूखे से प्रभावित किसान किस तरह से अपनी खेतियो का और अपना बचाव कर पायेंगे  ? ये और ऐसे ही अन्य सवाल इनकी चर्चाओं से बाहर है |यह है की सूखे के प्रभावों पर प्रचार माध्यमी चर्चाये | इन चर्चाओं में किसानो व अन्य ग्रामीण हिस्सों पर इसके पड़ने वाले प्रभावों को ही उपेक्षित नही किया जा रहा है बल्कि सूखे से निपटने के लिए आवश्यक तात्कालिक राहत कार्यो तक की उपेक्षा की जा रही है | जबकि 2009 में पड़े सूखे के दौरान विभिन्न प्रान्तों की सरकारों और प्रचारों के माध्यमो से पुराने सरकारी नलकूपों को ठीक करने , नहरों में भरपूर पानी सप्लाई का प्रबंध करने तथा स्थानीय स्तर पर सिंचाई व्यवस्था के इंतजाम करने आदि की घोषणाये व प्रचार चर्चा में आते रहे थे | इस बार के सूखे में ऐसे राहत कार्यक्रमों की घोषनाये व चर्चाये बहुत कम हो रही है अगर कहे तो एक दम नही हो रही है प्रदेश व केंद्र सरकारे कुम्भकर्णी नीद सो रही है |
ऐसे में मुझे धूमिल की कविता याद आरही है 
अकाल-दर्शन
-धूमिल



भूख कौन उपजाता है :
वह इरादा जो तरह देता है
या वह घृणा जो आँखों पर पट्टी बाँधकर
हमें घास की सट्टी मे छोड़ आती है?

उस चालाक आदमी ने मेरी बात का उत्तर
नहीं दिया।
उसने गलियों और सड़कों और घरों में
बाढ़ की तरह फैले हुए बच्चों की ओर इशारा किया
और हँसने लगा।

मैंने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा –
'बच्चे तो बेकारी के दिनों की बरकत हैं'
इससे वे भी सहमत हैं
जो हमारी हालत पर तरस खाकर, खाने के लिए
रसद देते हैं।
उनका कहना है कि बच्चे
हमें बसन्त बुनने में मदद देते हैं।

लेकिन यही वे भूलते हैं
दरअस्ल, पेड़ों पर बच्चे नहीं
हमारे अपराध फूलते हैं
मगर उस चालाक आदमी ने मेरी किसी बात का उत्तर
नहीं दिया और हँसता रहा – हँसता रहा – हँसता रहा
फिर जल्दी से हाथ छुड़ाकर
'जनता के हित में' स्थानांतरित
हो गया।

मैंने खुद को समझाया – यार!
उस जगह खाली हाथ जाने से इस तरह
क्यों झिझकते हो?
क्या तुम्हें किसी का सामना करना है?
तुम वहाँ कुआँ झाँकते आदमी की
सिर्फ़ पीठ देख सकते हो।

और सहसा मैंने पाया कि मैं खुद अपने सवालों के
सामने खड़ा हूँ और
उस मुहावरे को समझ गया हूँ
जो आज़ादी और गांधी के नाम पर चल रहा है
जिससे न भूख मिट रही है, न मौसम
बदल रहा है।
लोग बिलबिला रहे हैं (पेड़ों को नंगा करते हुए)
पत्ते और छाल
खा रहे हैं
मर रहे हैं, दान
कर रहे हैं।
जलसों-जुलूसों में भीड़ की पूरी ईमानदारी से
हिस्सा ले रहे हैं और
अकाल को सोहर की तरह गा रहे हैं।
झुलसे हुए चेहरों पर कोई चेतावनी नहीं है।

मैंने जब उनसे कहा कि देश शासन और राशन...
उन्होंने मुझे टोक दिया है।
अक्सर ये मुझे अपराध के असली मुकाम पर
अँगुली रखने से मना करते हैं।
जिनका आधे से ज़्यादा शरीर
भेड़ियों ने खा लिया है
वे इस जंगल की सराहना करते हैं –
'भारतवर्ष नदियों का देश है।'

बेशक यह ख्याल ही उनका हत्यारा है।
यह दूसरी बात है कि इस बार
उन्हें पानी ने मारा है।

मगर वे हैं कि असलियत नहीं समझते।
अनाज में छिपे उस आदमी की नीयत
नहीं समझते
जो पूरे समुदाय से
अपनी गिज़ा वसूल करता है –
कभी 'गाय' से
कभी 'हाथ' से

'यह सब कैसे होता है' मैं उसे समझाता हूँ
मैं उन्हें समझाता हूँ –
यह कौनसा प्रजातान्त्रिक नुस्खा है
कि जिस उम्र में
मेरी माँ का चेहरा
झुर्रियों की झोली बन गया है
उसी उम्र की मेरी पड़ौस की महिला
के चेहरे पर
मेरी प्रेमिका के चेहरे-सा
लोच है।

ले चुपचाप सुनते हैं।
उनकी आँखों में विरक्ति है :
पछतावा है;
संकोच है
या क्या है कुछ पता नहीं चलता।
वे इस कदर पस्त हैं :

कि तटस्थ हैं।
और मैं सोचने लगता हूँ कि इस देश में
एकता युद्ध की और दया
अकाल की पूंजी है।
क्रान्ति –
यहाँ के असंग लोगों के लिए
किसी अबोध बच्चे के –
हाथों की जूजी है।
-सुनील दत्ता  
09415370672

बुधवार, 26 सितंबर 2012

युद्ध और मन्दी के बीच तेल

राजेश मल्ल


जब नाम तेरा लीजिए तब चश्म भर आवे।
इस जिंदगी करने को कहाँ से जिगर आवे।

    बीती सदियों में अमरीका ने दसियों लाख मूल निवासियों (रेड इण्डियन्स) का संहार किया है, आधे मैक्सिको पर अपना कब्जा जमाया है (जो दरअसल मूल निवासियों के क्षेत्र हैं) पूरे इलाके में हिंसक हस्तक्षेप किया है और हवाई और फिलीपीन्स को फतह किया है (हजारो-हजार फिलीपीन्स वासियों की हत्या करके) और खास तौर पर पिछली आधी सदी में अपने ऐसे ही कारनामों को ताकत के बल पर पूरी दुनिया में अंजाम देता रहा है। इन करतूतों के शिकार बेशुमार हैं।
-नोम चोम्स्की

    अरब। तेल। बाजार। ठेका। अरबों डालर। बहुराष्ट्रीय निगम। कारपोरेट। सिनेटर। ड्रोन, मिशाइलें, सेना, फौज। मानवाधिकार-लोकतंत्र। आदिम बर्बरता। कहीं आग लग गई, कहीं गोली चल गई।
    अफगानिस्तान, इराक, लीबिया, सूडान, जार्डन, सीरिया। मरते लोग, लड़ते लोग, कटते लोग, विस्थापित होते लोग। सद्दाम, गद्दाफी, यासिर, अपराधियों की लम्बी सूची।
तेल देखिए और तेल की धार देखिए।
युद्ध आदिम बर्वर युद्ध..........................
लाखों करोड़ों लोग.............................
लाखों करोड़ों डालर............................
लाखों बैरेल तेल..........पेट्रोल............।        विगत दो दशकों में पूरी दुनिया के पैमाने पर और खासकर अरब में एक भयानक युद्ध अमरीका तथा उसके सहयोगियों ने छेड़ रखा है। अब तक मरने और विस्थापित होने वालों की संख्या करोड़ांे में पहुँच गई है। मात्र लीबिया में मरने वालों और विस्थापित होने वालो की संख्या साढ़े छः लाख से ऊपर है। यह हमारे समय का सबसे खौफनाक-खूँरेज मंजर है जिसे दुनिया के लाखों अमन पसंद लोग ‘चश्म तर से देख रहे हैं और मीर की तरह कहाँ से मानवता के इस संहार को देखने का ‘जिगर लावें’ सोच रहे हैं। दुःखद और तकलीफ देह बात यह है कि ढेर सारे लोग  तो इसे शुतुरमुर्ग की तरह आँखों के सामने से ओझल किये हैं या संचार माध्यमों के शोर को अपनी रगों मंे उतार कर उस धोखे के शिकार हैं जो युद्ध के दिनों में सामान्यतः होता ही है। कुछ लोग इसे भारतीय अर्थ व्यवस्था से सम्बद्ध कर पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ती कीमतों तक सीमित कर देते हैं। इस दृष्टि-बोध ने हमें उस भयावह युद्ध से बिलग कर दिया है और भ्रामक सोच के कारण अनवरत चलते इस हत्याकाण्ड के चमश्दीद होने से मुक्त कर दिया है।
    मेरी समझ है और विनम्र अवधारणा कि तेल और उसकी कीमतों पर कोई भी चर्चा ‘अरब युद्ध’ जो प्रथम और द्वितीय महायुद्ध की तरह की भयावह घटना है और और आज जारी है तथा तेल पर कब्जे और उपनिवेश बनाने के लिए लड़ा जा रहा है। इस महत्वपूर्ण सन्दर्भ के बिना सम्भव नहीं है। ‘तेल’ की कीमतों में लगी आग ‘युद्ध और मन्दी की आग’ है ये दोनों एक दूसरे के जनक अन्योन्याश्रित और पूँजीवाद की अन्धी गली का अन्तिम छोर हैं। हो सकता है कि आप को यह बात अतिरंजित लगे और आप मेरे सूत्रीकरण से असहमत हों। लेकिन आप यदि गौर फरमाएँ तथा घटनाक्रमों को एक तरतीब दें तथा अपने ज्ञान और विश्लेषण की परिधि को पूँजीवादी सूचना तंत्र से बाहर जाकर देखने की कोशिश करें तो हकीकत अपने आप सामने आ जाएगी। मैं क्रमशः अपने निष्कर्षों के लिए तथ्य नहीं जुटाऊँगा बल्कि तथ्यों की ऐसी प्रत्यक्ष कड़ी है, श्रंृखला है और बहुत हद तक चीजें हस्तामलक हैं कि आपकी असहमति की कोई गुंजाइश ही नहीं है फिर भी मैं उस भयावह सच से परदा उठाना चाहता हूँ जो आपकी जेहन का हिस्सा नहीं है या नहीं बन पाया है। हालाँकि इसे साम्राज्यवादी ठीक-ठाक कह रहे हैं और उसे आप मात्र ‘शब्द’ मानकर उस ओर गौर नहीं कर रहे हैं जैसे मैं इसे ‘युद्ध और मन्दी’ का परिणाम मान रहा हूँ तो पूरा पूँजीवादी तंत्र बिना किसी हिचक के साफ शब्दों में इसे इसी रूप में कह भी रहा है। अमरीका पूरे नियोजित तरीके से विगत दो दशकों से इसे ‘आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध’ कह भी रहा है और इसे नाटो के साथ मिलकर लड़ भी रहा है। मेरा संशोधन मात्र इसमें यह है कि यह ‘आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध’ नहीं बल्कि ‘तेल के लिए युद्ध’ है। हाँ यदि आप किसी युद्ध से ही इन्कार करते हंै तो फिर आप से मुखातिब होना मेरे लिए संभव नहीं है।
           तो ‘तेल के सन्दर्भ में पहली बात आपको माननी होगी कि एक पीड़ादायी-विनाशक और इन्सानियत के विरुद्ध एक युद्ध लड़ा जा रहा है जिसके एक पक्ष अमरीका और उसके सहयोगी हैं और दूसरी तरफ सम्पूर्ण अरब जनता है। उसकी स्वतंत्रता है, उसकी सम्प्रभुता है। उसके अपने खनिज पदार्थों पर उसका अपना हक है। यह युद्ध अफगानिस्तान, इराक, लीबिया में प्रत्यक्ष रूप से लड़ा गया है और कमोवेश भयावह तबाही के साथ जीता जा चुका है। वहाँ के राष्ट्रध्यक्षों की हत्या की जा चुकी है। अब आगे निशाने पर सीरिया से लेकर ईरान तक वे सारे अरब देश हैं जो अभी गुलाम नहीं बने हैं या उनकी खनिज सम्पदा जो ‘तेल ही है पर साम्राज्यवाद का कब्जा नहीं हो गया है। इस युद्ध के आँकड़े समयावधि, धनराशि, शामिल सैनिको कीं संख्या, प्रभावित जन समुदाय, क्षेत्रफल, मारे और विस्थापित लोगों
की संख्या सभी द्वितीय महायुद्ध से ज्यादा है। मात्र इराक या लीबिया के युद्ध का आकार फैलाव और जन हानि तथा बबर्रता हिटलर द्वारा रचाए गए यहूदी हत्याकाण्ड से बड़ा है। युद्ध का तर्क, अरब देशों पर हमले का कारण और वहाँ के राष्ट्रध्यक्षों के प्रति साम्राज्यवादी व्यवहार ‘सब कुछ घृणित, आपराधिक और मानवता को शर्मशार करने वाला है। उदाहरण के लिए अभी लीबिया और कर्नल गद्दाफी की घटना को देखा जा सकता है। ‘चूँकि लीबिया में संभावित गृहयुद्ध की स्थितियाँ हैं और ऐसे में लाखों लोग मारे जा सकते हैं इसलिए वहाँ के लोगों में शान्ति बहाल करने के लिए अमरीका तथा नाटो ने लाखों लोगों को मार डाला। गद्दाफी पर तो सद्दाम हुसैन की तरह मुकदमे की बेशर्मी भी नहीं की गई बल्कि पहले ही करोड़ों डालर का इनाम-इकराम घोषित कर दिया गया कि सेना की जद में आने के बाद कर्नल गद्दाफी को मारने की होड़ मच गई। यह बेशर्मी और अमरीकी बर्बता का ताजातरीन उदाहरण है। खैर ‘युद्ध’ के साथ-साथ जब-जब मन्दी खासकर विŸाीय पूँजी के संकट के बादल घिरते हैं। शेयर मार्केट, बैकिंग तथा अन्य विŸाीय संस्थाएँ डूबने लगती हैं, तेल कम्पनियों और उनके मालिकों का दबाव बढ़ता जाता है और तभी अरब का कोई न कोई हिस्सा फिर से युद्ध की लपटों में समाने लगता है।
    यह किस्सा अब नानी के भूत की कहानी नहीं बल्कि एक संवेदनशील तार्किक निगाह की तलबगार है जिसे पूरी दुनिया ठीक से समझ रही है। तेल कम्पनियों पर पड़ने वाला मन्दी का प्रभाव और उसी के गर्भ से पैदा होने वाले युद्ध की विभीषिका आज हमारे समय की सबसे बड़ी सच्चाई है। मैं इस छोटे से आलेख में आँकड़े और उसके परिणामी निष्कर्षों को न रखकर मात्र उन सच्चाइयों की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ जिससे हम तथाकथित तेल संकट को समझ सकें।
    ‘युद्ध और मन्दी’ या ‘मन्दी और युद्ध’ के बीच तेल कीमतों की बढ़ोत्तरी और भारतीय मध्य वर्ग की चिल्ल-पों के बीच यह भी गौर करने का विषय है कि भारतीय तेल कम्पनियों और भारत सरकार के रिश्ते और मन्दी की मार से उबरने में तेल की कीमतों में वृद्धि की विवशता और तानाशाहीपूर्ण सोच ने हमें भी अरब जनता की तरह विवश कर रखा है।
    मेरा अनुरोध है कि मन्दी-युद्ध तथा तेल कीमतों में वृद्धि को एक साथ रखकर देखें तो साम्राज्यवाद-पूँजीवाद का क्रूर चेहरा बेनकाब हो जाएगा। इसलिए जरूरी है कि पहले, मन्दी और युद्ध को समझा जाए फिर उसकी परिणति तेल कम्पनियों के लाभांश के लिए जनता को और-और दुहने में लगे पूँजीवादी साम्राज्यवादी खेल को समझा जाए और अब यह सारा कुछ साफ है, स्पष्ट है।
    तेल कीमतों की वृद्धि, भयावह नरसंहार और मन्दी की बार-बार आती बाढ़ उसी पूँजीवादी-साम्राज्यवादी क्रिया कलापों की परिणाति है जिसके खिलाफ निर्णायक युद्ध के बिना न देश की जनता का कल्याण है और न ही विश्व मानवता का। हर बार डूबती अर्थ व्यवस्थाओं को बचाने के नाम पर अरबों डालर मदद तथा तेल कम्पनियों के ‘तथाकथित घाटे’ जो कि अधिक मुनाफे की हवस ही है, को पूरा करने के लिए साम्राज्यवादी और उनकी पिट्ठू सरकारें तेल कम्पनियों के सामने नतमस्तक हैं। ब्रिटेन की छः डाईन कम्पनियाँ हों या भारत की तेल कम्पनियाँ इनकी शक्ति इतनी है कि ये सरकारों को अपनी मर्जी अर्थात अधिक से अधिक मुनाफे के लिए विवश कर सकती हैं। ‘युद्ध और मंदी’ के इस खेल को अंजाम देने का कार्य यदि ब्रिटेन, जर्मनी तथा अमरीकी कम्पनियों ने किया है तो भारत के संदर्भ में यहाँ की तेल कम्पनियाँ जो अब पूरी तरह से भारत सरकार के नियंत्रण से मुक्त हैं, उनका दबाव है। युद्ध और ईरान पर प्रतिबंध के बीच अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर जारी सट्टेबाजी तथा तेल कम्पनियों के मुनाफे की हवस ने मिलकर एक सर्वग्रासी तंत्र का निर्माण किया है। मजेदार बात यह है कि तेल का अन्तर्राष्ट्रीय बाजार भाव सन् 2008 के बराबर है लेकिन 2012 तक कीमतों की वृद्धि लगभग दोगुने के आसपास पहुँच चुकी है। तब यह सवाल गंभीर है कि आखिर मुनाफे की भारी मात्रा किसकी जेब में जा रही है।
    सही बात यह है कि नव उदारवादी तंत्र कारपोरेट और मुनाफा खोर कम्पनियों को लाभ पहुँचाने के लिए ही बन गया है जिससे बार-बार विश्व मानवता को खौफनाक दौरों से गुजरना पड़ रहा है। दुनिया के तथा देश के समस्त प्राकृतिक संसाधनों को इन कम्पनियों के हवाले कर सरकारें नए-नए हत्याकाण्ड रचाने में शामिल हैं।
    इस स्तर में ‘तेल’ की कीमतों के सवाल के पीछे पूँजीवादी साम्राज्यवादी अर्थतंत्र है जो पिछली सदी के मुकाबले ज्यादा घृणित और आक्रामक हैं। जन विरोधी हैं। मुनाफे की अंधी हवस ने विश्व मानवता को संकट के दहाने पर खड़ा कर दिया है।
   -राजेश मल्ल

मो0 09919218089

 लोकसंघर्ष पत्रिका सितम्बर 2012 अंक में प्रकाशित

गुरुवार, 31 मई 2012

ईरान पर प्रतिबन्ध

अमेरिका लगातार भारत पर दबाव बना रहा है कि वह ईरान से तेल आयात कम करे जबकि भारत की उर्जा जरूरतों को पूरा करने में ईरान की विश्वसनीय भूमिका है जबकि अमेरिका कभी भी भारत का विश्वसनीय साथी नहीं रहा है। कई दशक पहले तारापुर परमाणु रिएक्टर की यूरानियम फर्जी बहानो के आधार पर पश्चिमी देश बंद कर चुके हैं। पूरी दुनिया में अमेरिका व पश्चिमी देश विकासशील व छोटे देशों के लिये ब्लैक मेलर साबित होते हैं और धीरे-धीरे उस देश की संप्रभुता का ही हरण कर लेते हैं।
भारत यात्रा पर आए ईरान के विदेश मंत्री अली अकबर सालेही से बातचीत के बाद विदेश मंत्री एस एम कृष्णा ने स्पष्ट किया कि भारत की बढ़ती घरेलू मांग को देखते हुए ईरान तेल का महत्वपूर्ण स्रोत बना हुआ है। सालेही ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद के विशेष दूत के तौर पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अगस्त में तेहरान में होने वाल गुट निरपेक्ष आंदोलन (नैम) की शिखर वार्ता का न्योता देने भारत आये हैं।
ईरान के साथ भारत के सदियों पुराने सम्बन्ध हैं और ईरान को भी जरूरत है भारत की वहीँ भारत को भी ईरान की जरूरत है । भारत को चाहिए की विकसित देश के रूप में अपना स्थान बनाने के लिये अमेरिकी साम्राज्यवादियों के किसी भी दबाव में न आयें। अपने देश के हितों के अनुरूप अपनी नीतियों को संचालित करें। पिछलग्गूपन से देश में ढेर सारी समस्याएं ही पैदा होंगी।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

अमेरिका का अंत निकट : अगर भारत चीन ने ईरान का साथ दिया

अमेरिकन साम्राज्यवाद की मौत नजदीक आ रही है। पूरी दुनिया को गुलाम बनाने का स्वप्न अधूरा रह जायेगा। ईरान ने आज अपने परमाणु कार्यक्रम को उसके लाख विरोध के बाद आगे बढ़ा दिया है। अमेरिकियों को दिखाने के लिये उसका टेलीकास्ट भी किया है। इसके साथ-साथ ईरान ने यूरोप के छह: देशों को तेल बेचने से भी मना कर दिया है। यह देश हैं इटली, फ्रांस, स्‍पेन, ग्रीस, नीदरलैंड, पुर्तगाल। इन देशों की पहले से अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं है। तेल न मिलने से और व्यवस्था ख़राब होगी। अमेरिका की आर्थिक व्यवस्था पहले से ख़राब है। अमेरिकी जनता महंगाई, बेरोजगारी के खिलाफ आन्दोलनरत है। इन परिस्तिथियों में अमेरिका और इजराइल व उसके पिट्ठू देशों ने जो युधोन्माद ईरान के खिलाफ पैदा किया था। अगर वास्तविक लड़ाई पर आये तो निश्चित रूप से अमेरिकन साम्राज्यवाद को जबरदस्त धक्का लगेगा। अमेरिका द्वारा अघोषित रूप से शासित ईराक व पाकिस्तान भी ईरान के साथ खड़े होंगे।
चीन ने खुले आम घोषणा कर रखी है कि वह ईरान की मदद करेगा वहीँ भारत भी ईरान को छोड़ना नहीं चाहता है। अमेरिकी प्रयासों के बाद भी भारत ने तेल लेना बंद नहीं किया है और भारत अपने संबंधों को ईरान से ख़त्म नहीं करना चाहता है। ऐसी स्तिथियों में अगर अमेरिकी साम्राज्यवादी व उसके पिट्ठू मुल्क ईरान की तरफ अगर आँखें भी तरेरते हैं तो एशिया की बहुसंख्यक जनता व सरकारें अमेरिका को मुंहतोड़ जवाब देंगी। जिस तरह से अमेरिकन्स आज भी वियतनाम की मार को भूल नहीं पाए हैं।

सुमन
लो क सं घ र्ष !
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