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गुरुवार, 27 सितंबर 2012

समस्या देश में सूखे की ----- चर्चा उद्योग , व्यापार , बैंक , और विकास की ?

 वाह रे देश के नेता और हमारे प्रधानमन्त्री

  • कृषि 
सुखे की समस्या और उसके राहत व समाधान से ज्यादा चर्चा सूखे के पड़ने वालेदूसरे प्रभावों की हो रही है | कृषि पर सूखे के पड़ने वाले प्रभावों से कुछज्यादा ही हो रही है | इनमे एक चर्चा तो सूखे के बढने के साथ ही खाद्यान्नव्यापारियों द्वारा खाद्यान्न का मूल्य अभी से तेज किए जाने के रूप में होरही है | दूसरे इसकी चर्चा किसानो द्वारा कृषि ऋण की अदायगी के संकट तथाबैंको के पैसे के वापस न मिल पाने के के संकट के रूप में हो रही है | इसीके साथ किसान व किसान परिवारों को कर्जा दी हुई माइक्रो फाइनेंस कम्पनियोंके पैसे समय से न वसूल हो पाने के संकटों की भी चर्चा हो रही है | तीसरीचर्चा उद्योगों के उपर सूखे से पड़ रहे और पड़ने वाले प्रभावों की हो रही है | 
बैंको के संकटों का ( न की किसानो के संकटों का ) आकलन करते हुए रिजर्व बैंक नेकिसान क्रेडिट कार्ड ( के . सी. सी . ) पर उठाये गये कर्ज को 12 महीन  में लौटाने की बाध्यता खत्म कर दी है | उसने यह निर्देश दिया है की बैंककिसानो की स्थितियों का आकलन करके अल्पावधि के इस कृषि ऋण की अवधि को बढासकते है | ताकि किसानो को कर्ज चुकाने का पर्याप्त समय मिल जाए | इसी केसाथ रिजर्व बैंक ने यह भी निर्देश भी दिया है की ( के. सी . सी . ) धारककिसानो को फसल बीमा उपलब्ध कराने में भी बैंको को मदद करनी चाहिए |अगर किसान इस के लिए तैयार हो तो बीमे की किस्त का भुगतान भी किसान क्रेडिट कार्ड के खाते से किया जा सकता है |
  • उद्योगों  पर पड़ने वाले प्रभावों में बताया जा रहा है की  औद्योगिक  सुस्ती और ऊँचीव्याज दर से परेशान उद्योग जगत पर अब सूखे के संकट से भी मार पड़ने वाली है |सूखे के प्रभावों का आकलन करके टूथपेस्ट , तेल , साबुन व अन्य प्रसाधन केसामान बनाने वाली कम्पनिया ( फास्ट मूविंग कन्जूमर गुड्स की कम्पनिया ) तथाऑटो मोबाइल व इलेक्ट्रानिक उपकरण बनाने वाली कम्पनिया ख़ास तौर से परेशानहै | क्योंकि तेल साबुन आदि तथा प्रसाधन के सामानों के कुल बिक्री मेंग्रामीण क्षेत्र का हिस्सा लगभग 40% है | कृषि सूखे से उनके इस बिक्रीबाजारका भी सुखना निश्चित है | इसी तरह से ग्रामीण इलाको में फ्रीज, टीवी . वअन्य इलेक्ट्रानिक सामानों के ग्रामीण बिक्री बाजार को भी सूखे के चलतेप्रभावित होना पड रहा है | साथ ही साथ दुपहिये वाहन कम्पनियों पर भी इससूखे का गम्भीर प्रभाव जरुर पढ़ना है क्योंकि इन दुपहिया वाहनों की बिक्रीका 35% हिस्सा ग्रामीण क्षेत्र से आता है |योजना आयोग भी सूखे को लेकरचिन्तित है | उसकी चिन्ता भी बैंको व औद्योगिक   कम्पनियों की तरह खेती --किसानी के सूखने की नही है , बल्कि सूखे के बढ़ते प्रभाव के कारण मालो वसामानों की बिक्री के घटने से विकास दर में कमी आने से है | इसके फलस्वरूपदेश में विदेशी निवेश के माहौल और निवेश में कमी आने की आशंका भी योजनाआयोग की चिन्ता का विषय है | इसे सुधारने के लिए योजना आयोग की सलाहकारसमिति ने आर्थिक सुधारों को आगे बढाने की चेतावनी भी दी है |इनसूचनाओं , चर्चाओं निवेशो से कोई भी आदमी दो बाते बखूबी समझ सकता है | पहलातो यह की उद्योगों , बैंको समेत योजना आयोग की तथा प्रचार माध्यमी जगत कीमुख्य चिन्ता सूखे को लेके कत्तई नही है | दुसरा की इनकी सारी या प्रमुखचिन्ता अपने बैंक उद्योग व्यापार की कमाई धमाई  में बढ़ोत्तरी की तथाआर्थिक वृद्धि दर को बढाने की ही है | बैंको एवं उद्योगों की बैंको एवउद्योगों की बात को दरकिनार कर देखे तो यह अजीब बात है की राष्ट्र का योजनाआयोग कृषि के सूखे पर चिन्तित नही है | उसके लिए किसी तात्कालिक सुधार काया दूरगामी योजना का निर्देश की सलाह भी नही दे रहा है | बल्कि उसकीसलाहकार समिति आर्थिक वृद्धिदर में गिरावट का आकलन करके उसके लिए आर्थिक सुधारों की गति बढाने की चेतावनी पूर्ण सलाह दे रहा है | जबकि आर्थिकसुधारों के अंतर्गत कृषि सुधार या सूखे से निपटने का कोई मामला ही नही है |यह तो वर्तमान समय में खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश की पूरी छूट के साथबीमा बैंक आदि में पूरी छूट के सुधार एजेन्डा है |  कृषि भूमि के तीव्रएवं आसान अधिग्रहण आदि का एजेन्डा है | आर्थिक सुधार के यही एजेन्डे  बने हुएहै | इसके पास सूखे की स्थितियों में तात्कालिक एवं दूरगामी सुधार का कहीकोई एजेन्डा नही है |देश का प्रचार माध्यमी तंत्र बैंको की समस्या को गम्भीरता से उठा रहा है | माइक्रोफाइनेंस कम्पनियों तक की वसूली की समस्या को उठा रहा है | उसे प्रचारित भी कर रहा है |  साथ ही सूखे के फलस्वरूप उद्योगों के संकटों को पूरे विस्तार से उठा बता रहा है | पर किसानोकी खेती के सूखे के संकट को गम्भीरता से उठाने की जगह सूखे की सूचनाये दे रहा है | किसानो की खेती के सूखने का असर किसानो ग्रामीणों पर क्या पडेगा , इस पर कही कोई गम्भीर चर्चा नही हो रही है की सूखे से प्रभावित किसानो व ग्रामीणों पर औद्योगिक कम्पनियों , व्यापारियों , बैंको व फाइनेंस कम्पनियों द्वारा की जाती रही लूट का क्या प्रभाव पडेगा ? सूखे से प्रभावित किसान किस तरह से अपनी खेतियो का और अपना बचाव कर पायेंगे  ? ये और ऐसे ही अन्य सवाल इनकी चर्चाओं से बाहर है |यह है की सूखे के प्रभावों पर प्रचार माध्यमी चर्चाये | इन चर्चाओं में किसानो व अन्य ग्रामीण हिस्सों पर इसके पड़ने वाले प्रभावों को ही उपेक्षित नही किया जा रहा है बल्कि सूखे से निपटने के लिए आवश्यक तात्कालिक राहत कार्यो तक की उपेक्षा की जा रही है | जबकि 2009 में पड़े सूखे के दौरान विभिन्न प्रान्तों की सरकारों और प्रचारों के माध्यमो से पुराने सरकारी नलकूपों को ठीक करने , नहरों में भरपूर पानी सप्लाई का प्रबंध करने तथा स्थानीय स्तर पर सिंचाई व्यवस्था के इंतजाम करने आदि की घोषणाये व प्रचार चर्चा में आते रहे थे | इस बार के सूखे में ऐसे राहत कार्यक्रमों की घोषनाये व चर्चाये बहुत कम हो रही है अगर कहे तो एक दम नही हो रही है प्रदेश व केंद्र सरकारे कुम्भकर्णी नीद सो रही है |
ऐसे में मुझे धूमिल की कविता याद आरही है 
अकाल-दर्शन
-धूमिल



भूख कौन उपजाता है :
वह इरादा जो तरह देता है
या वह घृणा जो आँखों पर पट्टी बाँधकर
हमें घास की सट्टी मे छोड़ आती है?

उस चालाक आदमी ने मेरी बात का उत्तर
नहीं दिया।
उसने गलियों और सड़कों और घरों में
बाढ़ की तरह फैले हुए बच्चों की ओर इशारा किया
और हँसने लगा।

मैंने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा –
'बच्चे तो बेकारी के दिनों की बरकत हैं'
इससे वे भी सहमत हैं
जो हमारी हालत पर तरस खाकर, खाने के लिए
रसद देते हैं।
उनका कहना है कि बच्चे
हमें बसन्त बुनने में मदद देते हैं।

लेकिन यही वे भूलते हैं
दरअस्ल, पेड़ों पर बच्चे नहीं
हमारे अपराध फूलते हैं
मगर उस चालाक आदमी ने मेरी किसी बात का उत्तर
नहीं दिया और हँसता रहा – हँसता रहा – हँसता रहा
फिर जल्दी से हाथ छुड़ाकर
'जनता के हित में' स्थानांतरित
हो गया।

मैंने खुद को समझाया – यार!
उस जगह खाली हाथ जाने से इस तरह
क्यों झिझकते हो?
क्या तुम्हें किसी का सामना करना है?
तुम वहाँ कुआँ झाँकते आदमी की
सिर्फ़ पीठ देख सकते हो।

और सहसा मैंने पाया कि मैं खुद अपने सवालों के
सामने खड़ा हूँ और
उस मुहावरे को समझ गया हूँ
जो आज़ादी और गांधी के नाम पर चल रहा है
जिससे न भूख मिट रही है, न मौसम
बदल रहा है।
लोग बिलबिला रहे हैं (पेड़ों को नंगा करते हुए)
पत्ते और छाल
खा रहे हैं
मर रहे हैं, दान
कर रहे हैं।
जलसों-जुलूसों में भीड़ की पूरी ईमानदारी से
हिस्सा ले रहे हैं और
अकाल को सोहर की तरह गा रहे हैं।
झुलसे हुए चेहरों पर कोई चेतावनी नहीं है।

मैंने जब उनसे कहा कि देश शासन और राशन...
उन्होंने मुझे टोक दिया है।
अक्सर ये मुझे अपराध के असली मुकाम पर
अँगुली रखने से मना करते हैं।
जिनका आधे से ज़्यादा शरीर
भेड़ियों ने खा लिया है
वे इस जंगल की सराहना करते हैं –
'भारतवर्ष नदियों का देश है।'

बेशक यह ख्याल ही उनका हत्यारा है।
यह दूसरी बात है कि इस बार
उन्हें पानी ने मारा है।

मगर वे हैं कि असलियत नहीं समझते।
अनाज में छिपे उस आदमी की नीयत
नहीं समझते
जो पूरे समुदाय से
अपनी गिज़ा वसूल करता है –
कभी 'गाय' से
कभी 'हाथ' से

'यह सब कैसे होता है' मैं उसे समझाता हूँ
मैं उन्हें समझाता हूँ –
यह कौनसा प्रजातान्त्रिक नुस्खा है
कि जिस उम्र में
मेरी माँ का चेहरा
झुर्रियों की झोली बन गया है
उसी उम्र की मेरी पड़ौस की महिला
के चेहरे पर
मेरी प्रेमिका के चेहरे-सा
लोच है।

ले चुपचाप सुनते हैं।
उनकी आँखों में विरक्ति है :
पछतावा है;
संकोच है
या क्या है कुछ पता नहीं चलता।
वे इस कदर पस्त हैं :

कि तटस्थ हैं।
और मैं सोचने लगता हूँ कि इस देश में
एकता युद्ध की और दया
अकाल की पूंजी है।
क्रान्ति –
यहाँ के असंग लोगों के लिए
किसी अबोध बच्चे के –
हाथों की जूजी है।
-सुनील दत्ता  
09415370672

बुधवार, 26 अक्टूबर 2011

जनसाधारण के लिए अक्तूबर - क्रान्ति को न जानना या उपेक्षित करना आत्मघाती है


अक्तूबर क्रान्ति को महज कम्यूनिस्टो की क्रांति मानकर राष्ट्र व समाज के मेहनत कशो की अनन्य नियत्रण की सत्ता व्यवस्था की स्थापना वाली क्रांति के रूप में न देखना , जनसाधारण के लिए , मेहनत कश समुदाय के लिए आत्मघाती हो रहा है और आगे भी होगा

1917 में रूस में हुई अक्तूबर क्रांति को याद करने व मनाने की जगह उसे भुलाए जाने का सुनियोजित प्रयास किया जाता रहा है | खासकर पिछले 20 - 22 सालो से | 1989-90 के बाद बची खुची समाजवादी व जनवादी सत्ता व व्यवस्था को उखाड़े जाने के बाद से इसे इन देशो की कम्यूनिस्टो की सत्ता व्यवस्था के अपने आप उखड़ जाने या ढह जाने के रूप में प्रचारित किया गया था | वह प्रचार आज भी जारी है | यह प्रचार रूस और पूर्वी यूरोप की उन सत्ताओ व्यवस्थाओं के असली चरित्र को छिपाने के लिए भी किया जाता रहा है | इसी के अंतर्गत उसे मजदूरों किसानो की या कहिये समाज के मेहनत कशो की सत्ता व्यवस्था के रूप में बताने का काम पिछले 20 - 25 सालो से लगभग बन्द कर दिया गया है | प्रचार इस तरह से चलाया जाता रहा मानो वहा की कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं ने अपने सत्ता - स्वार्थ की पूर्ति के लिए ही उन सत्ताओ व्यवस्थाओं को स्थापित किया था |ऐसा इसलिए किया गया ताकि कम्यूनिस्टो के बारे में ' धर्म - विरोधी ' राष्ट्र - विरोधी ' परिवार -विरोधी ' जैसे प्रचारों के चलते गैर कम्युनिस्ट जनसाधारण इन सत्ताओ - व्यवस्थाओं की विरोधी बने रहे |उसे जनसाधारण की मजदूरों - किसानो की सत्ता व्यवस्था न समझ पाए | आम तौर पर यही होता भी रहा है |
जबकि सच्चाई यह है कि मजदूरों , मेहनतकशो के आम हितो से इतर कम्यूनिस्टो का कोई अपना अलग हित या स्वार्थ नही होता और न ही हो सकता है | ' कम्युनिस्ट घोषणा - पत्र ' में इसे स्पष्ट रूप से घोषित भी किया गया हैं | इसका व्यवहारिक सबूत यह भी है कि अक्तूबर क्रान्ति के उपरान्त कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्त्व में सोवियतो के रूप में संगठित मजदूरों , किसानो व अन्य मेहनतकश हिस्सों के अनन्य नियत्रण की सत्ता स्थापित हुई थी | वह सत्ता मजदूरों , किसानो के दशको तक चले संघर्ष के जरिये वहा की जारशाही सत्ता को और फिर धनाढ्य पूंजीपतियों एवं उच्च वर्गो के हितो - अधिकारों की सत्ता को बलपूर्वक तोडकर और हटाकर स्थापित हुयी थी | फिर यह निजी लाभ - मुनाफ़ा कमाने और निजी धन सम्पति खड़ी करने की सामाजिक व्यवस्था को तोड़ते और हटाते हुए आगे बढ़ी थी | साथ ही वह सामन्तो एवं देशी व विदेशी पूंजीवाद वर्गो की निजी सम्पत्तियों को छीनकर उसे मेहनतकश समाज की सामूहिक सम्पति बनाते हुए तथा उसके जरिये समाज की मानवीय आवश्यकताओ की अधिकाधिक पूर्ति करते हुए आगे बढ़ी थी | खासकर 1917 से लेकर 1956 तक के सुधारों , संशोधनों से पहले के पूरे दौर में | इस उद्देश्य से अक्तूबर -क्रांति द्वारा स्थापित सत्ता - व्यवस्था ने पूंजी वादी धनाढ्य वर्गो द्वारा दूसरो को मजदूर ( तथा दास या अर्द्ध दास ) बनाकर काम करवाने , और धन सम्पत्ति बढाने की सदियों से चली आ रही प्रणाली का अन्त कर दिया था | मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का अंत कर दिया था |दुसरो को मजदूर रखने और स्वंय श्रम न करने को दंडनीय अपराध घोषित कर दिया था | इसीलिए मेहनतकशो के सामूहिक हितो की पूर्ति के लिए बनी इस क्रांतिकारी समाजवादी सत्ता व्यवस्था में शासक पार्टी के रूप में विद्यमान कम्युनिस्ट पार्टी के नेता न तो स्वंय निजी तौर पर धन - पैसा - पूंजी कमा सकते थे और न ही उसके लिए किसी भी तरह के भ्रष्टाचार को करवाने की छूट दे सकते थे | इसीलिए कोई कम्युनिस्ट नेता निजी तौर पर न तो जमीन , जायदाद तथा कल - कारखाने आदि का मालिक बना औरं न ही बन सकता था |जबकि हम यह बात स्पष्ट तौर पर देख रहे है कि जनतांत्रिक सत्ता - व्यवस्था के संचालन नियंत्रण में लगी पार्टियों के लोग निजी हितो को हर तरह से बढाने में , उसके लिए हर तरह के भ्रष्टाचार करने में कही से पीछे नही रहते | कयोंकि वे जन्त्रंत्र के नाम से देश व समाज के धनाढ्य वर्गो के निजी लाभ व निजी मालिकाने को बढाने में लगे रहते है और उसका फल अपने निजी चढत -बढत के रूप में हासिल कर लेते है | इसीलिए और इसी के साथ धनाढ्य वर्गो के हितो कि पूर्ति के लिए मजदूरों , किसानो एवं अन्य साधारण मध्यम वर्गियो के नाम मात्र के अधिकारों व सम्पत्तियों को भी काटने घटाने का काम निरंतर करते रहते है |
इसका सबूत आप सभी जनतांत्रिक या गैर- जनतांत्रिक शेख शाही व सैन्य शाही शासन व्यवस्थाओं में देख सकते हैं | मध्य युगीन और आधुनिक काल के भारत में इसका सबूत हर जगह मौजूद है |देश की वर्तमान व्यवस्था में जनतंत्र का यही दोहरा और परस्पर विरोधी चेहरा एकदम प्रत्यक्ष रूप में हमारे सामने मौजूद है | अल्पसख्यक धनाढ्यो के खुशहाल भारत और बहुसख्यक मेहनतकशो की बदहाल भारत के रूप में |अक्तूबर क्रांति से पहले जारशाही रूस भी ऐसा ही था और अब 1989 -90 के बाद समाजवादी सत्ता व्यवस्था के उखाड़े जाने के बाद जनतांत्रिक कहा जाने वाला रूस भी अमीरों को रूस व गरीबो के रूस में , अमीरों को बढाने और गरीबो को दबाने वाले रूस में तथा राज व समाज में हर तरह के भ्रष्टाचार को बढावा देने वाले रूस में बदलता जा रहा है या कहिये की बदल गया है |
यह काम इस देश या वर्तमान रूस व अन्य देशो की कुनीतियो , कुशासनो , के चलते नही हो रहा है | बल्कि इस देशो के समाज में बहुसख्यक गरीब एवं मेहनतकश हिस्से के साथ अल्पसख्या में धनाढ्य एवं उच्च वर्गो की मौजूदगी के फलस्वरूप हो रहा है | देश दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च वर्गो द्वारा अपने आधुनिक साधनों , पूंजियो तकनीको और उसे बढाने के छुट , अधिकारों के जरिये आम किसानो , मजदूरों व अन्य जनसाधारण की सम्पत्तियों को छीनते जाने तथा उन्हें मजदूर व मजबूर बनाये जाने के फलस्वरूप हो रहा है | देशो की जनतांत्रिक या किसी नाम की सत्ता सरकार की ताकत से देश दुनिया के धनाढ्य वर्गो के शोषण , लूट व प्रभुत्व को संचालित करने के चलते हो रहा है | मालिको एवं मेहनतकशो में बटे समाज में यही होना भी हैं | यही होता आया है | क्योंकि साधन सम्पन्न मालिको और साधनहीन बनते जनसाधारण के हितो में , न हल किया जा सकने विरोध मौजूद हैं | इस विरोध का समाधान इतिहास में गुलाम मालिको , फिर राजाओं बादशाहों , जमीदारो को और उनके मालिकाने व प्रभुत्व की व्यवस्था को हटाकर किया गया था | वही समाधान वर्तमान दौर के पूंजिवान वर्गो और उनकी बाजारवादी सत्ता व्यवस्था के प्रति भी किया जाना अनिवार्य एवं अपरिहार्य हैं | अत:इतिहास से सबक लेकर देश दुनिया की जनसाधारण के लिए , मेहनतकशो के लिए , धनाढ्य वर्गो के विरुद्ध तथा उनके मालिकाने व अधिकार के विरुद्ध निर्मम संघर्ष चलाने के अलावा कोई अन्य रास्ता नही बचता है |धनाढ्य वर्गो के लिए जनतांत्रिक पर मेहनतकशो के लिए आमतौर पर तानाशाही सत्ता व्यवस्था को हटाना अनिवार्य एवं अपरिहार्य है | मेहनतकशो के लिए जनतांत्रिक पर धनाढ्य एवं उच्च वर्गो पर तानाशाही लगाने वाली सत्ता व्यवस्था की स्थापना भी अनिवार्य एवं अपरिहार्य है | अक्टूबर क्रांति ने यही किया था | इसीलिए दुनिया के धनाढ्य वर्गो द्वारा खासकर अमेरिकी इंग्लैण्ड जैसे देशो के साम्राज्यी ताकतों द्वारा रूस और पूर्वी यूरोप के देशो में स्थापित मेहनतकशो के समाजवादी एवं जनवादी सत्ता व्यवस्था के बारे में हर तरह के कुप्रचार करते रहे हैं | उसे उखाड़ फेकने के हर हरबे - हथकंडे अपनाते रहे है | इसी के फलस्वरूप साम्राज्यी ताकतों द्वारा इन समाजवादी सत्ताओ व्यवस्थाओं को उखाड़ा भी गया है | लेकिन यह काम खुद इन देशो में शिक्षा - ज्ञान , शासन - प्रशासन में दक्ष और 1989 - 90 के दौर में मौजूद उच्चता प्राप्त तबको के साथ सहयोग से किया गया | ठीक ऐसे ही बौद्धिक शासकीय हिस्सों द्वारा लूटेरी साम्राज्यी कम्पनियों को उनकी पूंजी व तकनीक को छूट देते हुए देश के आम जनता के हितो को 1991 से खुलेआम काटा जाता रहा है | देश की स्वतंत्रता एवं आत्म निर्भरता का प्रचार भी चलता रहा और उसे विदेशी संबन्धो पे खुलेआम परनिर्भर व परतंत्र बनाने का काम भी होता रहा | समाजवादी एवं जनवादी सत्ताओ , व्यवस्थाओं को हटाने के बाद अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसी ताकते पिछड़े देशो पर , , इन देशो के जनसाधारण लोगो के हिस्सों पर खुलेआम हमला कर रही है | इसलिए इस देश के जनसाधारण के लिए भी अपने वर्गीय हितो को जानना , समझना व उसे हासिल करने के लिए अक्तूबर - क्रांति के रास्ते पर चलना अनिवार्य एवं अपरिहार्य हो चुका है | अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसी साम्राज्यी ताकतों के शोषणकारी प्रभुत्वकारी संबंधो , नीतियों , प्रस्तावों आदि से राष्ट्र को पूरी तरह मुक्त कराए जाने का काम अब अनिवार्य हो चुका है |
इसी के साथ साम्राज्यी ताकतों के सहयोगी व हिमायती बने इस देश के धनाढ्य एवं उच्च वर्गो पर भी कठोरतम नियंत्रण लगाना भी अनिवार्य हो चुका है |
इसीलिए अक्तूबर क्रांति को महज कम्यूनिस्टो की क्रांति मानकर राष्ट्र व समाज के मेहनतकशो द्वारा मेहनतकशो के हित और मेहनतकशो की अनन्य नियंत्रण की सत्ता व्यवस्था की स्थापना वाली क्रांति के रूप में न देखना , जनसाधारण के लिए मेहनतकश समुदाय के लिए आत्मघाती साबित हो रहा है और आगे भी होगा | इसी के साथ धूमिल की कुछ पक्तिया याद आ रही है |
यह तीसरा आदमी कौन है?

एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूं--
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है।
- धूमिल

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672
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