बुधवार, 26 अक्तूबर 2011

जनसाधारण के लिए अक्तूबर - क्रान्ति को न जानना या उपेक्षित करना आत्मघाती है


अक्तूबर क्रान्ति को महज कम्यूनिस्टो की क्रांति मानकर राष्ट्र व समाज के मेहनत कशो की अनन्य नियत्रण की सत्ता व्यवस्था की स्थापना वाली क्रांति के रूप में न देखना , जनसाधारण के लिए , मेहनत कश समुदाय के लिए आत्मघाती हो रहा है और आगे भी होगा

1917 में रूस में हुई अक्तूबर क्रांति को याद करने व मनाने की जगह उसे भुलाए जाने का सुनियोजित प्रयास किया जाता रहा है | खासकर पिछले 20 - 22 सालो से | 1989-90 के बाद बची खुची समाजवादी व जनवादी सत्ता व व्यवस्था को उखाड़े जाने के बाद से इसे इन देशो की कम्यूनिस्टो की सत्ता व्यवस्था के अपने आप उखड़ जाने या ढह जाने के रूप में प्रचारित किया गया था | वह प्रचार आज भी जारी है | यह प्रचार रूस और पूर्वी यूरोप की उन सत्ताओ व्यवस्थाओं के असली चरित्र को छिपाने के लिए भी किया जाता रहा है | इसी के अंतर्गत उसे मजदूरों किसानो की या कहिये समाज के मेहनत कशो की सत्ता व्यवस्था के रूप में बताने का काम पिछले 20 - 25 सालो से लगभग बन्द कर दिया गया है | प्रचार इस तरह से चलाया जाता रहा मानो वहा की कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं ने अपने सत्ता - स्वार्थ की पूर्ति के लिए ही उन सत्ताओ व्यवस्थाओं को स्थापित किया था |ऐसा इसलिए किया गया ताकि कम्यूनिस्टो के बारे में ' धर्म - विरोधी ' राष्ट्र - विरोधी ' परिवार -विरोधी ' जैसे प्रचारों के चलते गैर कम्युनिस्ट जनसाधारण इन सत्ताओ - व्यवस्थाओं की विरोधी बने रहे |उसे जनसाधारण की मजदूरों - किसानो की सत्ता व्यवस्था न समझ पाए | आम तौर पर यही होता भी रहा है |
जबकि सच्चाई यह है कि मजदूरों , मेहनतकशो के आम हितो से इतर कम्यूनिस्टो का कोई अपना अलग हित या स्वार्थ नही होता और न ही हो सकता है | ' कम्युनिस्ट घोषणा - पत्र ' में इसे स्पष्ट रूप से घोषित भी किया गया हैं | इसका व्यवहारिक सबूत यह भी है कि अक्तूबर क्रान्ति के उपरान्त कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्त्व में सोवियतो के रूप में संगठित मजदूरों , किसानो व अन्य मेहनतकश हिस्सों के अनन्य नियत्रण की सत्ता स्थापित हुई थी | वह सत्ता मजदूरों , किसानो के दशको तक चले संघर्ष के जरिये वहा की जारशाही सत्ता को और फिर धनाढ्य पूंजीपतियों एवं उच्च वर्गो के हितो - अधिकारों की सत्ता को बलपूर्वक तोडकर और हटाकर स्थापित हुयी थी | फिर यह निजी लाभ - मुनाफ़ा कमाने और निजी धन सम्पति खड़ी करने की सामाजिक व्यवस्था को तोड़ते और हटाते हुए आगे बढ़ी थी | साथ ही वह सामन्तो एवं देशी व विदेशी पूंजीवाद वर्गो की निजी सम्पत्तियों को छीनकर उसे मेहनतकश समाज की सामूहिक सम्पति बनाते हुए तथा उसके जरिये समाज की मानवीय आवश्यकताओ की अधिकाधिक पूर्ति करते हुए आगे बढ़ी थी | खासकर 1917 से लेकर 1956 तक के सुधारों , संशोधनों से पहले के पूरे दौर में | इस उद्देश्य से अक्तूबर -क्रांति द्वारा स्थापित सत्ता - व्यवस्था ने पूंजी वादी धनाढ्य वर्गो द्वारा दूसरो को मजदूर ( तथा दास या अर्द्ध दास ) बनाकर काम करवाने , और धन सम्पत्ति बढाने की सदियों से चली आ रही प्रणाली का अन्त कर दिया था | मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का अंत कर दिया था |दुसरो को मजदूर रखने और स्वंय श्रम न करने को दंडनीय अपराध घोषित कर दिया था | इसीलिए मेहनतकशो के सामूहिक हितो की पूर्ति के लिए बनी इस क्रांतिकारी समाजवादी सत्ता व्यवस्था में शासक पार्टी के रूप में विद्यमान कम्युनिस्ट पार्टी के नेता न तो स्वंय निजी तौर पर धन - पैसा - पूंजी कमा सकते थे और न ही उसके लिए किसी भी तरह के भ्रष्टाचार को करवाने की छूट दे सकते थे | इसीलिए कोई कम्युनिस्ट नेता निजी तौर पर न तो जमीन , जायदाद तथा कल - कारखाने आदि का मालिक बना औरं न ही बन सकता था |जबकि हम यह बात स्पष्ट तौर पर देख रहे है कि जनतांत्रिक सत्ता - व्यवस्था के संचालन नियंत्रण में लगी पार्टियों के लोग निजी हितो को हर तरह से बढाने में , उसके लिए हर तरह के भ्रष्टाचार करने में कही से पीछे नही रहते | कयोंकि वे जन्त्रंत्र के नाम से देश व समाज के धनाढ्य वर्गो के निजी लाभ व निजी मालिकाने को बढाने में लगे रहते है और उसका फल अपने निजी चढत -बढत के रूप में हासिल कर लेते है | इसीलिए और इसी के साथ धनाढ्य वर्गो के हितो कि पूर्ति के लिए मजदूरों , किसानो एवं अन्य साधारण मध्यम वर्गियो के नाम मात्र के अधिकारों व सम्पत्तियों को भी काटने घटाने का काम निरंतर करते रहते है |
इसका सबूत आप सभी जनतांत्रिक या गैर- जनतांत्रिक शेख शाही व सैन्य शाही शासन व्यवस्थाओं में देख सकते हैं | मध्य युगीन और आधुनिक काल के भारत में इसका सबूत हर जगह मौजूद है |देश की वर्तमान व्यवस्था में जनतंत्र का यही दोहरा और परस्पर विरोधी चेहरा एकदम प्रत्यक्ष रूप में हमारे सामने मौजूद है | अल्पसख्यक धनाढ्यो के खुशहाल भारत और बहुसख्यक मेहनतकशो की बदहाल भारत के रूप में |अक्तूबर क्रांति से पहले जारशाही रूस भी ऐसा ही था और अब 1989 -90 के बाद समाजवादी सत्ता व्यवस्था के उखाड़े जाने के बाद जनतांत्रिक कहा जाने वाला रूस भी अमीरों को रूस व गरीबो के रूस में , अमीरों को बढाने और गरीबो को दबाने वाले रूस में तथा राज व समाज में हर तरह के भ्रष्टाचार को बढावा देने वाले रूस में बदलता जा रहा है या कहिये की बदल गया है |
यह काम इस देश या वर्तमान रूस व अन्य देशो की कुनीतियो , कुशासनो , के चलते नही हो रहा है | बल्कि इस देशो के समाज में बहुसख्यक गरीब एवं मेहनतकश हिस्से के साथ अल्पसख्या में धनाढ्य एवं उच्च वर्गो की मौजूदगी के फलस्वरूप हो रहा है | देश दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च वर्गो द्वारा अपने आधुनिक साधनों , पूंजियो तकनीको और उसे बढाने के छुट , अधिकारों के जरिये आम किसानो , मजदूरों व अन्य जनसाधारण की सम्पत्तियों को छीनते जाने तथा उन्हें मजदूर व मजबूर बनाये जाने के फलस्वरूप हो रहा है | देशो की जनतांत्रिक या किसी नाम की सत्ता सरकार की ताकत से देश दुनिया के धनाढ्य वर्गो के शोषण , लूट व प्रभुत्व को संचालित करने के चलते हो रहा है | मालिको एवं मेहनतकशो में बटे समाज में यही होना भी हैं | यही होता आया है | क्योंकि साधन सम्पन्न मालिको और साधनहीन बनते जनसाधारण के हितो में , न हल किया जा सकने विरोध मौजूद हैं | इस विरोध का समाधान इतिहास में गुलाम मालिको , फिर राजाओं बादशाहों , जमीदारो को और उनके मालिकाने व प्रभुत्व की व्यवस्था को हटाकर किया गया था | वही समाधान वर्तमान दौर के पूंजिवान वर्गो और उनकी बाजारवादी सत्ता व्यवस्था के प्रति भी किया जाना अनिवार्य एवं अपरिहार्य हैं | अत:इतिहास से सबक लेकर देश दुनिया की जनसाधारण के लिए , मेहनतकशो के लिए , धनाढ्य वर्गो के विरुद्ध तथा उनके मालिकाने व अधिकार के विरुद्ध निर्मम संघर्ष चलाने के अलावा कोई अन्य रास्ता नही बचता है |धनाढ्य वर्गो के लिए जनतांत्रिक पर मेहनतकशो के लिए आमतौर पर तानाशाही सत्ता व्यवस्था को हटाना अनिवार्य एवं अपरिहार्य है | मेहनतकशो के लिए जनतांत्रिक पर धनाढ्य एवं उच्च वर्गो पर तानाशाही लगाने वाली सत्ता व्यवस्था की स्थापना भी अनिवार्य एवं अपरिहार्य है | अक्टूबर क्रांति ने यही किया था | इसीलिए दुनिया के धनाढ्य वर्गो द्वारा खासकर अमेरिकी इंग्लैण्ड जैसे देशो के साम्राज्यी ताकतों द्वारा रूस और पूर्वी यूरोप के देशो में स्थापित मेहनतकशो के समाजवादी एवं जनवादी सत्ता व्यवस्था के बारे में हर तरह के कुप्रचार करते रहे हैं | उसे उखाड़ फेकने के हर हरबे - हथकंडे अपनाते रहे है | इसी के फलस्वरूप साम्राज्यी ताकतों द्वारा इन समाजवादी सत्ताओ व्यवस्थाओं को उखाड़ा भी गया है | लेकिन यह काम खुद इन देशो में शिक्षा - ज्ञान , शासन - प्रशासन में दक्ष और 1989 - 90 के दौर में मौजूद उच्चता प्राप्त तबको के साथ सहयोग से किया गया | ठीक ऐसे ही बौद्धिक शासकीय हिस्सों द्वारा लूटेरी साम्राज्यी कम्पनियों को उनकी पूंजी व तकनीक को छूट देते हुए देश के आम जनता के हितो को 1991 से खुलेआम काटा जाता रहा है | देश की स्वतंत्रता एवं आत्म निर्भरता का प्रचार भी चलता रहा और उसे विदेशी संबन्धो पे खुलेआम परनिर्भर व परतंत्र बनाने का काम भी होता रहा | समाजवादी एवं जनवादी सत्ताओ , व्यवस्थाओं को हटाने के बाद अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसी ताकते पिछड़े देशो पर , , इन देशो के जनसाधारण लोगो के हिस्सों पर खुलेआम हमला कर रही है | इसलिए इस देश के जनसाधारण के लिए भी अपने वर्गीय हितो को जानना , समझना व उसे हासिल करने के लिए अक्तूबर - क्रांति के रास्ते पर चलना अनिवार्य एवं अपरिहार्य हो चुका है | अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसी साम्राज्यी ताकतों के शोषणकारी प्रभुत्वकारी संबंधो , नीतियों , प्रस्तावों आदि से राष्ट्र को पूरी तरह मुक्त कराए जाने का काम अब अनिवार्य हो चुका है |
इसी के साथ साम्राज्यी ताकतों के सहयोगी व हिमायती बने इस देश के धनाढ्य एवं उच्च वर्गो पर भी कठोरतम नियंत्रण लगाना भी अनिवार्य हो चुका है |
इसीलिए अक्तूबर क्रांति को महज कम्यूनिस्टो की क्रांति मानकर राष्ट्र व समाज के मेहनतकशो द्वारा मेहनतकशो के हित और मेहनतकशो की अनन्य नियंत्रण की सत्ता व्यवस्था की स्थापना वाली क्रांति के रूप में न देखना , जनसाधारण के लिए मेहनतकश समुदाय के लिए आत्मघाती साबित हो रहा है और आगे भी होगा | इसी के साथ धूमिल की कुछ पक्तिया याद आ रही है |
यह तीसरा आदमी कौन है?

एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूं--
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है।
- धूमिल

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

2 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

दीपावली की आपको और आपके पूरे परिवार को बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

सुनील भाई , बहुत ही सार्थक लेख .. हमेशा की तरह . लेकिन सवाल ये है कि इस तरह के जनांदोलनो से देश की सरकार क्या चेत पाएंगी ..

विजय