बुधवार, 10 सितंबर 2014

आईसिस,तेल की राजनीति और इस्लाम के प्रति घृणा का चरम

 लगभग एक माह पहले ;अगस्त 2014, मुस्लिम कार्यकर्ताओं.अध्येताओं के एक समूह ने विभिन्न शहरों में प्रेस वार्ताएं आयोजित कीं। उन्होंने आईसिस द्वारा की जा रही क्रूर हिंसा की भर्त्सना करते हुए वक्तव्य जारी किये। इन वक्तव्यों पर सबसे ऊपरए बड़े.बड़े अक्षरों में लिखा गया था, 'इस्लाम मीन्स पीस' ;,का अर्थ है शांति। बयान में कहा गया था कि'भारतीय मुसलमान, ईराक और सीरिया में आईसिस द्वारा अल्पसंख्यकों पर किए जा रहे भीषण अत्याचारों की कड़ी निंदा करते हैं। हम धार्मिक असहिष्णुता और इस्लाम के नाम पर हिंसा और उत्पीड़न की भी निंदा करते हैं।' मैंने इस वक्तव्य को कई जगह भेजा। एक व्यक्ति का जवाब आया, ''इस्लाम का अर्थ है शांति' यहए इस सदी का सबसे बड़ा चुटकुला है'।
भारत में इन दिनों लवजिहाद के बारे में प्रचार, जंगल में आग की तरह फैल रहा है। जाहिर है कि इस मुद्दे को सांप्रदायिक तत्वों द्वारा हवा दी जा रही है। शादी के साथ.साथ धर्मपरिवर्तन करने और लड़कियों द्वारा पीछे हट जाने की चन्द घटनाओं का इस्तेमालए यह बताने के लिए किया जा रहा है कि मुस्लिम पुरूष, हिंदू लड़कियों से धोखा देकर विवाह कर रहे हैं और इसका उद्देश्य उन्हें मुसलमान बनाना है। एक मित्र ने मुझसे जानना चाहा कि क्या मैं ऐसे 100 मामले भी बता सकता हूं, जब मुस्लिम लड़कियों ने हिंदू पुरूषों से शादी की हो। मेरी किस्मत अच्छी थी कि और मैं 100 से भी अधिक ऐसे दंपत्तियों की सूची बनाने में सफल रहा। हिंदू पुरूष,मुस्लिम पत्नि के नाम से गूगल सर्च करने पर कई मर्मस्पर्शी प्रेमकथाएं सामने आईं। यह शायद उल्टा लवजिहाद हैhttps://www.facebook.com/R3alityofPorkistan/posts/613266692020533। पहले से ही जहरीले हो चुके वातावरण में अल कायदा के अल जवाहिरी ने एक वीडियो जारी कियाए जिसमें कहा गया है कि अल कायदा अपनी गतिविधियों का भारत में विस्तार करेगा।
 इस्लाम और मुसलमानों के बारे में इतनी सारी भ्रांतियां फैला दी गई हैं और जनसाधारण के मन में इतनी गलतफहमियां बैठा दी गईं हैं कि किसी से यह कहना ही मुहाल हो गया है कि वे धर्म, और राजनीतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए धर्म के दुरूपयोग,के बीच अंतर करें। देश और दुनिया में दिल को हिला देने वाली जो घटनाएं हो रही हैं उनके लिए इस्लाम और मुस्लिम समुदाय को दोषी बताया जा रहा है। आमजन अन्य धर्मों को तो 'नैतिकता और शांति' के साथ जोड़ने को तैयार हैं परंतु इस्लाम को नहीं। कई समूहों और संगठनों द्वारा 'सहमति के उत्पादन' के चलते, मुसलमानों का एक ऐसा चित्र बनाया जा रहा है जो न तो सही है और ना ही विश्व में शांति की स्थापना में मददगार साबित होगा। सभी मुसलमानों को एकसा बताया जा रहा है। चंद अपराधी मुसलमानों और इस्लाम के कट्टरवादी संस्करण को असली इस्लाम बताया जा रहा है, जिससे दशकों से चले आ रहे पूर्वाग्रह और मजबूत हो रहे हैं।
आईसिस का जन्म अलकायदा की कोख से हुआ है। अलकायदा के लड़ाकों को अमरीका और आईएसआई द्वारा स्थापित किये गये मदरसों में प्रशिक्षित किया गया था। इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि अमरीका,पश्चिम एशिया के तेल संसाधनों पर कब्जा करना चाहता है। इस क्षेत्र के बारे में अमरीका की नीति को इन शब्दों में बयान किया जा सकता है,'तेल इतना कीमती है कि उसे वहां के निवासियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।' अमरीका की पश्चिम एशिया नीति को समझने के लिए आपको बड़े.बड़े विद्वानों की मोटी.मोटी किताबें पढ़ने की जरूरत नहीं है। आपको केवल हिलेरी क्लिंटन की एक छोटी सी वीडियो क्लिप भर देखनी होगी। वीडियो क्लिप में वे बड़ी शान से और बिना किसी लागलपेट के कहती हैं कि अमरीका ने मुस्लिम युवकों को प्रशिक्षित कर अल कायदा का निर्माण किया था। http://www.youtube.com/watch?v=nLhRKj6633w। इस क्षेत्र के इतिहास पर एक नजर डालने से ही हमें समझ में आ जायेगा कि मुस्लिम युवकों को प्रशिक्षित करने के लिए इस्लाम के तोड़ेमरोड़े गये वहाबी संस्करण का इस्तेमाल किया गया था।
 अल कायदा का अमरीका ने केवल निर्माण ही नहीं किया वरन उसने उसे धन और हथियार भी उपलब्ध करवाये ताकि अल कायदा, अफगानिस्तान पर काबिज रूसी सेनाओं से मोर्चा ले सके। धीरे.धीरे, जब अलकायदा के भयावह अत्याचारों की खबरें छन.छन कर बाहर आनी शुरू हुईं तब अमरीकी मीडिया ने इस्लाम को ही दानवी प्रवृत्तियों का स्त्रोत बताने के लिए 9-11-2001 के बाद से 'इस्लामिक आतंकवाद' शब्द का इस्तेमाल शुरू कर दिया। 9-11 के पहले तकए आतंकी हमलों को किसी धर्म से नहीं जोड़ा जाता था। वैसे भी, सभी धर्मों के मानने वाले आतंकी हमलों में शामिल रहे हैं। महात्मा गांधी और राजीव गांधी के हत्यारे हिंदू थे तो इंदिरा गांधी को सिक्खों ने मारा था। थायलैण्ड, म्यानमार और श्रीलंका में बौद्ध भिक्षुक आतंकी हमलों में शामिल हैं। नार्वे के एंडर्सबर्लिंग ब्रेविक भी आतंकी थे परंतु मुसलमान नहीं। सच यह है कि लगभग सभी धर्मों के लोगों ने कभी न कभी राजनैतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए आतंकी हमलों में भाग लिया है। परंतु 9-11 के बाद से, आतंकी हमलों को इस्लाम और केवल इस्लाम से जोड़ दिया गया।
यह दिलचस्प है कि अल कायदा को खड़ा करने और मुजाहिदीनों के दिमाग में घोर कट्टरता भरने के लिए अमरीका ने इस्लाम के जिस संस्करण का इस्तेमाल किया, उसे सूत्रबद्ध करने वाले थे अब्द अब्द अल वहाब, जिन्होंने इस्लाम को कट्टर बनाने की प्रक्रिया शुरू की थी और धर्म की केवल अपनी व्याख्या को सही बताया था। वे लिखते हैं 'यदि कोई धर्मावलंबी, इस्लाम की इस ;वहाबी व्याख्या पर अपने विश्वास को स्वीकार करने में जरा सा भी संकोच या संदेह दर्शाता है तो वह अपना संपत्ति और जीवन का अधिकार खो बैठेगा।' इस्लाम के इसके अलावा कई अन्य संस्करण भी हैं। परंतु क्या कारण है कि यह संस्करण सबसे प्रभुत्वशाली बनकर उभरा है। इसका कारण यह है कि इस संस्करण को सऊदी अरब के शासकों का संरक्षण प्राप्त है। अब्द अल वहाब के सिद्धांत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है तकफीर। इस सिद्धांत के अनुसारए 'वे मुस्लिम काफिर हैं जो ऐसी किसी भी गतिविधि में हिस्सा लेते हैं जिससे शासक ;अर्थात राजा की प्रभुसत्ता और उसके अधिकारों का अतिक्रमण होता हो। जो लोग इस सिद्धांत को स्वीकार नहीं करेंगे उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा,उनकी पत्नियों और लड़कियों के साथ जबरदस्ती की जायेगी और उनकी संपत्ति जब्त कर ली जायेगी।'http://www.huffingtonpost.com/alastair-crooke/isis-wahhabism-saudi-arabia_b_5717157.html
  यह संस्करण सऊदी शासकों को भाता था क्योंकि इससे वे तेल के संसाधनों पर अपना कब्जा बरकरार रख सकते थे। यह अमरीका के लिए भी बहुत काम का था क्योंकि इसमें काफिर ;जो सत्य को छुपाता है का अर्थ गैर.मुस्लिम या 'दूसरा' कर दिया गया था। इस संस्करण में जिहाद का अर्थ है गैर.मुस्लिम की जान लेना। इस्लाम के जानेमाने विद्वानों का कहना है कि जिहाद का अर्थ है अच्छे काम करने की हर संभव कोशिश करना। इस्लाम, जो यह कहता है कि'मेरे लिये मेरा दीनए तुम्हारे लिये तुम्हारा' और जो यह कहता है कि 'इसी कारण इजरायल की संतान के लिए हमने यह आदेश लिख दिया था कि जिसने किसी इंसान को कत्ल के बदले या जमीन में बिगाड़ फैलाने के सिवाए किसी और वजह से कत्ल कर डाला उसने मानो सारे ही इंसानों को कत्ल कर दिया और जिसने किसी की जान बचाई उसने मानो सारे इंसानों को जीवनदान दिया ;कुरान,अध्याय 5, आयत 32। शांति के पैरोकार इस धर्म के नाम पर मासूमों को मारा गया। इस्लाम का यह संस्करण उन लोगों के लिए बहुत उपयोगी था जो दूसरों के कंधों पर बंदूक रखकर रूसी सेना से लड़ना चाहते थे। परंतु समस्या यह है कि ब्रेनवाश करके जिन लड़ाकों को तैयार किया गया था वे सोवियत संघ की अफगानिस्तान से वापसी के बाद भी उतने ही कट्टर बने रहे। रूसी सेना को हराने के बाद अल कायदा इस्लाम के तोड़ेमरोड़े गये संस्करण में विश्वास करता रहा और उसके पास अमरीका द्वारा उसे उपलब्ध कराये गये खतरनाक हथियार बने रहे। उनके दिमाग में वहाबी इस्लाम भरा हुआ था और हाथों में अमरीकी बंदूकें थीं। इसी का नतीजा है कि आईसिस का अस्तित्व में आना, उनका यह भ्रम कि वे अब दुनिया पर शासन कर सकते हैंए उनके द्वारा खलीफा को गद्दी पर बैठाया जाना और उसके बाद पागलपन के कामों की लंबी श्रृंखला।
जाहिर है कि अमरीका बांटो और राज करो की नीति का इस्तेमाल ठीक उसी तरह कर रहा है जैसे कि पहले साम्राज्यवादी ताकतें किया करती थीं। भारत में साम्राज्यवादियों ने सांप्रदायिक राजनीति के बीच बोये। पश्चिम एशिया में पिछले कुछ दशकों के दौरान, अमरीकी साम्राज्यवादियों का लक्ष्य रहा है नस्लीय और सांप्रदायिक विभाजनों को और गहरा करना, और उनके आधार पर छोटे.छोटे देशों का गठन करवाना। यही कारण है कि शियाओं, सुन्नियों और कुर्दों आदि के बीच हिंसा को अमरीका प्रोत्साहन दे रहा है। एक ओर अमरीका बांटो और राज करो की अपनी नीति लागू कर रहा है और दूसरी ओर वह पूरी दुनिया में इस्लाम का दानवीकरण भी कर रहा है और इसका आधार बनाया जा रहा है अल कायदा और आईसिस जैसे संगठनों के कुकर्मों को।
शक्तिशाली निहित स्वार्थी तत्व,अपने राजनैतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए धर्म का दुरूपयोग करने पर आमादा हैं। वे एक धर्म विशेष के मुंह पर कालिख पोत रहे हैं। ऐसे दौर में आमजनों को तार्किक ढंग से सोचने के लिए राजी करना दुष्कर कार्य है। जो धारणायें लोगों के दिमागों में बैठ गयी हैं उन्हें निकालना आसान नहीं है। परंतु यदि हमें अपने समाज में शांति और प्रगति लानी है तो हमें यह करना ही होगा। 
 -  राम पुनियानी

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