मंगलवार, 9 सितंबर 2014

हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों का 'विदेशियों' से घृणा करो जिहाद

हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों का उन समुदायों.जिन्हें वे 'विदेशी' बताते हैं.को कलंकित करने का तरीका बहुत दिलचस्प है। व्ही.डी. सावरकर ने अपनी पुस्तक 'हिन्दुत्व' में लिखा है 'लोगों को एक राष्ट्र के रूप में एकजुट करने और राष्ट्रों को राज्य का स्वरूप देने में कोई भी चीज इतनी कारगर नहीं है जितनी कि सबका शत्रु एक ही होना। घृणा बांटती भी है और एक भी करती है।' सावरकर ने मुसलमानों और ईसाईयों के रूप में उस शत्रु को ढूंढ निकाला। ये वे समुदाय थे, जिनके पवित्रतम तीर्थस्थल सिंधुस्तान अर्थात सिंधु नदी से अरब सागर तक में फैले भूभाग,से बाहर थे। हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों ने इस शत्रु का निर्माण करने में बहुत मेहनत की है। यह अलग बात है कि यह शत्रु काल्पनिक अधिक है वास्तविक कम, पौराणिक अधिक है ऐतिहासिक कम। पहले उनके निशाने पर केवल मुसलमान थे परंतु सन् 1998 में एनडीए के सत्ता में आने के बाद से, उन्होंने ईसाईयों को भी हिन्दुओं का धर्मपरिवर्तन करवाने के नाम पर कटघरे में खड़ा करना शुरू कर दिया।
हिन्दू संगठन बड़े सुनियोजित ढंग से उन मुद्दों को चुनते और प्रचारित करते हैं,जिनका इस्तेमाल 'विदेशी समुदायों' पर कीचड़ उछालने के लिए किया जा सकता है। पहले उनके शीर्ष स्तर के नेता, चुनिंदा लोगों को प्रशिक्षित करते हैं। फिर ये प्रशिक्षित प्रचारक, उन मुद्दों को स्थानीय स्तर पर ले जाते हैं। वे मुद्दों को बढ़ाचढ़ा कर प्रस्तुत करते हैं और कभी.कभी नये मुद्दों का आविष्कार भी कर लेते हैं। इन मुद्दों पर वे तब तक लगातार बोलते रहते हैं जब तक कि कम से कम कुछ लोगए खतरे को वास्तविक और गंभीर न मानने लगें और संबंधित समुदाय के प्रति नकारात्मक रवैया न अपना लें। जब ऐसे लोगों की संख्या पर्याप्त हो जाती है तब उन्हें काल्पनिक'शत्रु' पर हमला करने के लिए उकसाया जाता है।
सबसे पहले कुछ'कट्टरपंथी तत्व'किसी ऐसे मुद्दे को उठाते हैंए जिसके जरिये'शत्रु' समुदाय को बदनाम किया जा सके। अगर उस मुद्दे पर विपरीत प्रतिक्रिया होती है और मीडिया में उसकी निंदा की जाती है तो उसे वहीं छोड़ दिया जाता है। इसका उदाहरण है पब जाने वाली महिलाओं पर हमले या वैलेन्टाइन डे मनाने का विरोध। परंतु यदि किसी मुद्दे या हिंसक हमले पर जनविरोध नहीं होता, उसकी निंदा नहीं की जाती, तब कोई स्थापित हिन्दू राष्ट्रवादी संगठन उस मुद्दे को उठाना शुरू कर देता है। उससे संबंधित नया साहित्य तैयार किया जाता है और काल्पनिक तथ्यों के सहारे उसे अधिक मसालेदार बनाया जाता है। फिर उस मुद्दे पर व्यापक अभियान छेड़ दिया जाता है ताकि'शत्रु समुदाय' के प्रति अविश्वासए घृणा और गुस्से का वातावरण निर्मित किया जा सके। अंत में, उस मुद्दे को भाजपा, राज्य व शासन के स्तर पर उठाती है। हिंदू राष्ट्रवादी संगठन, दरअसल,किसी बास्केटबाल या फुटबाल टीम की तरह काम करते हैं। खिलाड़ी ;संगठनद्ध, बॉल ;मुद्दे को ड्रिबिल करते हुए फारवर्ड खिलाड़ी तक ले जाते हैं ताकि वह गोल कर सके। बाबरी मस्जिद का मुद्दा भी इन विभिन्न चरणों से गुजरा। सन् 1949 में वहां राम की मूर्तियां स्थापित की गईं और मस्जिद के दरवाजे, मुसलमानों के लिए बंद कर दिए गए। केवल एक पुजारी को अंदर जाकर स्थापित की गई मूर्तियों की पूजा करने की इजाजत दी गई। फिर,  विहिप ने'रामजन्मभूमि मंदिर' को आम लोगों के लिए खोले जाने की मांग को लेकर सन् 1986 में अभियान शुरू किया। यह अभियान इतना सफल हुआ कि आज बड़ी संख्या में लोग यह जानते हैं कि भगवान राम का जन्म ठीक.ठीक किस स्थान पर हुआ था भले ही उन्हें यह नहीं मालूम कि राम कब.यहां तक कि किस सदी में.जन्मे थे। मंदिर मुद्दे के आंदोलन ने इस 'तथ्य' को स्थापित किया कि मुसलमान बादशाहों ने मस्जिदों का निर्माण करने के लिए मंदिरों को ढहाया। ऐसा दावा किया गया कि देश में कम से कम ऐसी 3000 मस्जिदें हैं जिन्हें मंदिरों के मलबे पर खड़ा किया गया है। इन मस्जिदों की सूची कभी सामने नहीं आई। इसका कारण स्पष्ट था। सूची न होने के कारण कभी भी किसी भी मस्जिद को मंदिर की जगह बनाया गया होना बताना आसान था।
उसी तरह, गुजरात के सन् 2002 के मुस्लिम.विरोधी दंगे भी अचानक नहीं हुए थे। यह कहना कि ये दंगे ट्रेन आगजनी की क्रिया की प्रतिक्रिया थे,असलियत पर पर्दा डालना है। दरअसल, मुसलमानों और ईसाईयों को अलग.अलग बहानों से,हिन्दुओं का शत्रु बताने का क्रम तब से जारी था जब से भाजपा वहां पहले चिमनभाई पटेल के गुजरात जनता दल के साथ मिलकर और बाद में अपने बलबूते पर सरकार चला रही थी।
हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों का 'गौहत्या विरोधी अभियान' भी इसी तर्ज पर चलता है। किसी भी ऐसे वाहन को जिसमें मवेशी ले जाए जा रहे हों और जिसका मालिक या ड्रायवर मुसलमान हो, को रोक लिया जाता है। वाहन के मुसलमान ड्रायवर या मालिक की पिटाई की जाती है और मीडिया में यह प्रचार किया जाता है कि मुसलमान, गैरकानूनी ढंग सेए गायों को काटने के लिए ले जा रहे थे। यह तब भी होता है जब मवेशी गायें हों ही ना या जब गायों को किसी ऐसे व्यक्ति के पास ले जाया जा रहा होए जिसने उन्हें वैध तरीके से पालने के लिए खरीदा हो। यह सब ऐसे स्थानों पर किया जाता है जहां हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों को राजनैतिक संरक्षण उपलब्ध हो या कम से कम जहां के पुलिस अधिकारी और मीडिया उनके साथ सहानुभूति रखते हों। इस कड़े परिश्रम के बदले, हिंदू राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं को 'जब्त' किए गए मवेशी इनाम के रूप में मिल जाते हैं।
इसी तरह के अभियानों के जरिये यह धारणा लोगों के मन में बैठा दी गई है कि मुसलमानों की कई बीवियां होती हैं, वे ढेर सारे बच्चे पैदा करते हैं और जल्दी ही उनकी आबादी,हिन्दुओं से ज्यादा हो जायेगी। यह भी कहा जाता है कि वे देश के प्रति वफादार नहीं हैं और उनकी वफादारी केवल उनके धार्मिक नेताओं और पाकिस्तान के प्रति है। यह भी आरोप लगाया जाता है कि वे आक्रामक और हिंसक समाजविरोधी तत्व हैं जो अपनी ही महिलाओं का शोषण करते हैं और जिनके नैतिक और सामाजिक मानदंड एकदम अलग हैं।
ईसाईयों को इस आधार पर बदनाम किया जाता है कि उनका पवित्रतम तीर्थस्थल भारत के बाहर, जेरूसलेम में है और वे हिंदुओं को तेजी से ईसाई बना रहे हैं। किसी व्यक्ति के अपनी इच्छा से ईसाई बनने को भी मुद्दा बना लिया जाता है। इस मसले को लेकर हिंसा और अतिश्योक्तिपूर्ण दावों के आधार पर कई जिलों में अभियान चलाए गए। जब भाजपा ने राज्यों में और एनडीए ने केन्द्र में सत्ता संभाली, तब ईसाईयों के खिलाफ हिंसा और तेज कर दी गई। गुजरात के डांग और मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले में ईसाईयों पर हमले की घटनाओं में नाटकीय वृद्धि हुई। और फिर,प्रधानमंत्री ने धर्मपरिवर्तन पर राष्ट्रीय बहस का आव्हान किया।
हिंदुत्व को प्यार से क्यों नफरत है?
हिंदुत्ववादियों को यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगता कि दो समुदायों के सदस्यों के बीच सद्भाव या प्रेम के रिश्ते बनें। उन्हें यह बिल्कुल नहीं भाता कि हिंदुओं और 'शत्रु समुदायों'के आराधना के तरीकोंए संस्कृति या सभ्यता में कुछ भी समान हो। वे बिल्कुल नहीं चाहते कि दोनों समुदायों के सदस्य एक ही मोहल्ले में रहें या उनमें आपसी वैवाहिक रिश्ते बने। हिंदुत्व पर अपनी पुस्तक में सावरकर लिखते हैं,'हमारे और हमारे शत्रु के बीच जितनी समानतायें होंगीए, हमारे लिए शत्रु का विरोध करना उतना ही मुश्किल होता जायेगा। जिस शत्रु से हमारी कुछ भी समानता न होए उसका हम सबसे मजबूती से विरोध कर सकते हैं।' किसी भी प्रकार की समानता न बन सके और यदि होए तो उसे समाप्त कर दिया जाये, इसके लिए दूसरे समुदायों को बदनाम करने के अभियान चलाये जाते हैं, जिनमें हिंसा का भी इस्तेमाल होता है। छोटे.मोटे अंतरों जैसे खानपान की आदतों, को बढ़ाचढ़ा कर प्रस्तुत किया जाता है। यह धारणा कि मुसलमान व ईसाई 'हम' से एकदम अलग हैं उन इलाकों में अधिक मजबूत है जहां सांप्रदायिक हिंसा का इतिहास है। इसका सबसे ताजा उदाहरण मुजफ्फरनगर है। सितंबर 2013 में वहां भड़की हिंसा के पहले तकए इलाके के जाटों और मुसलमानों की एक जैसी परंपराएं और सामाजिक रीतिरिवाज थे। वे एक ही बोली बोलते थे और यहां तक कि दोनों में ही सगोत्र विवाह पर प्रतिबंध था। अंतर केवल एक था.और वह यह कि वे अलग.अलग जगहों पर अपने खुदा की इबादत करते थे। दंगों के बाद जब हम मुजफ्फरनगर गए तो हमने पाया कि वहां के हालात एकदम बदल चुके हैं। गांवों के लोग अब 'वे' और 'हम' की भाषा में बात करने लगे थे। सांप्रदायिक हिंसा की हर घटना के बाद,संबंधित शहर में मिलीजुली आबादी वाले मोहल्ले कम हो जाते हैं और लोग ऐसे इलाकों में रहना पसंद करने लगते हैं जहां उनके समुदाय के लोग अधिक संख्या में हों। सन् 1993 के दंगों के बाद मुंबई में भी यही हुआ। मीरा रोड और मुंबरा में मुसलमानों की बड़ी.बड़ी बस्तियां बन गईं। इन बस्तियों में आपको ढूंढने पर भी कोई हिंदू घर नहीं मिलेगा। हाल में प्रवीण तोगडि़या ने एक ऐसे मुसलमान के विरूद्ध हिंसा करने के लिए भीड़ को उकसाया जिसने एक हिंदू इलाके में फ्लैट खरीदा था। यहां तक कि यह धमकी भी दी गई कि अगर उसने यह फ्लैट नहीं छोड़ा तो फ्लैट पर जबरन कब्जा कर लिया जायेगा।
हम जिस समुदाय को हिन्दू कहते हैं, वह, दरअसल एक विविधवर्णी समाज है,जिसके सदस्य कई भाषाएं बोलते हैं, 33 करोड़ अलग.अलग देवी.देवताओं की आराधना करते हैं व जिसमें नास्तिक भी शामिल हैं। उनके विभिन्न समूहों के अलग.अलग दर्शन हैं, जिनमें मूलभूत अंतर हैं। उनके कई धार्मिक ग्रंथ हैं और वे असंख्य जातियों में विभाजित हैं। यही कारण है कि हिंदू धर्म की कोई सर्वमान्य परिभाषा देना बहुत कठिन है। हिंदुत्व का लक्ष्य यह था कि जहां एक ओर इस विविधता के महत्व को कम किया जाएए वहीं दूसरी ओर, जातिगत ऊँचनीच को मजबूती दी जाए। सावरकर के शब्दों में,'अगर भारत को अपनी आत्मा के अनुसार अस्तित्व में बने रहना है,चाहे आध्यात्मिक तौर पर या राजनैतिक दृष्टि सेए तो उसे वह ताकत नहीं खोनी चाहिए जो राष्ट्रीय और नस्लीय एकता से मिलती है।' जातिगत ऊँचनीच को बनाए रखते हुएए राष्ट्रीय और नस्लीय एकता स्थापित करने के लक्ष्य को पूरा करने का तरीका सावरकर ने 1923 में हिंदुत्व पर लिखी अपनी पुस्तक में बताया है। उनका कहना है कि देश में उन लोगों की रगों में एक खून बह रहा है जिनकी पुण्यभूमि सिंधुस्तान में है। हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों ने एक खून और नस्लीय शुद्धता पर आधारित राष्ट्रवाद की इस अवधारणा को हिटलर से लिया है।
एक समस्या यह थी कि इस एक खून वाले सिद्धांत से वह वर्ग प्रभावित नहीं होता जो जाति के पिरामिड के सबसे निचले पायदान पर था और जिसका दर्जा जानवरों से भी नीचा था और जिसे रोजाना अपमान झेलने पड़ते थे। इसलिए इस विविधतापूर्ण समाज को हिन्दू राष्ट्र के सांचे में ढालने के लिए यह जरूरी था कि एक समान शत्रु का निर्माण किया जाए। इस लक्ष्य की प्राप्ति में हिंसा के इस्तेमाल से हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों को कोई परहेज नहीं था।
यही कारण है कि इन संगठनों के लिए अंतर्धार्मिक विवाह एक बड़ा मुद्दा हैं। अगर अंतर्धार्मिक विवाह होंगे तो वे हिंदुओं जैसे विविधवर्णी समुदाय को एक राष्ट्र व एक नस्ल का स्वरूप नहीं दे सकेंगे। सावरकर ने बहुत पहले कहा था कि अपने शत्रु और स्वयं में किसी भी प्रकार की समानता को ढूंढने से राष्ट्र कमजोर होता है। उनकी पुस्तक में म्लेच्छों द्वारा साधुओं की लड़कियों का अपहरण करने की चर्चा है। विभाजन के बाद हुए खूनी दंगों के पश्चात, भारत में पहला बड़ा सांप्रदायिक दंगा, जबलपुर में सन् 1961 में हुआ था जब ऊषा भार्गव नाम की एक लड़की, एक बड़े मुस्लिम बीड़ी व्यापारी के लड़के के साथ भाग गई थी। मीडिया में इस घटना का बहुत आक्रामक ढंग से प्रस्तुतिकरण हुआ और यह आरोप लगाया गया कि मुस्लिम युवक ने ऊषा भार्गव के साथ बलात्कार किया है। इस दुष्प्रचार से तंग आकर ऊषा भार्गव ने आत्महत्या कर ली। सन् 1998 में गुजरात के पंचमहल जिले के रणधीकपुर और बारडोली में अंतर्धार्मिक विवाहों के बहाने दंगे भड़काये गये। विहिप ने बिना किसी सुबूत के यह आरोप लगाया कि रणधीकपुर में मुस्लिम युवक, हिन्दू लड़कियों को अगवा कर उनके साथ बलात्कार कर रहे हैं। उस छोटे से गांव में रहने वाले 60.70 मुस्लिम परिवारों को अपनी जान बचाने के लिए गांव से भागना पड़ा। वे तीन महीनों तक अपने गांव नहीं लौट सके। बारडोली में जून 1998 में वर्षा शाह और हनीफ मेमन ने शादी कर ली। इसके बाद इस भाजपा शासित प्रदेश में हिंदुत्व की विचारधारा के अनुरूप, यह कानून बना दिया गया कि अंतर्धार्मिक विवाह के पंजीकरण के पूर्व,  प्रशासन से अनुमति लेना आवश्यक होगा। अगर किसी हिंदू राष्ट्रवादी संगठन को ऐसा विवाह होने की सूचना मिलती है तो वे इतना हंगामा खड़ा कर देते हैं कि अगर लड़का.लड़की और उनके माता.पिता विवाह के लिए राजी हों तब भी विवाह नहीं हो पाता। हाल में अहमदाबाद में मुस्लिम महिलाओं के लिए आयोजित एक कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों ने बताया कि गुजरात में अंतर्धार्मिक विवाह करना असंभव है। हमें बताया गया कि ऐसे युगलों के लिए एकमात्र रास्ता यह है कि वे किसी दूसरे राज्य में भाग जायें और वहां शादी कर लें। परंतु इससे उनके परिवार और विशेषकर 'शत्रु समुदाय' के परिवार की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। उन्हें अपना कामकाज भी छोड़ना पड़ता है। किसी दूसरे राज्य में जाकर रोजगार पाना आसान नहीं होता और ना ही अपने परिवार से नाता तोड़ लेना और मुसीबत के समय अपने समुदाय से सहायता मिलने की उम्मीद समाप्त कर लेना सब के लिए संभव होता है।
बाबू बजरंगी को ऐसे प्रेमी युगलों को अलग करने में विशेषज्ञता हासिल थी। तरीका बहुत आसान था। लड़के के विरूद्ध अपहरण और बलात्कार का मामला दर्ज करो और गुजरात पुलिस को उसके पीछे लगा दो। उसे पकड़ने के बाद उसका इस ढंग से 'इलाज' करो कि प्रेमी युगल के सामने अलग होने के सिवाए कोई रास्ता न बचे।
-इरफान इंजीनियर

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