गुरुवार, 11 सितंबर 2014

नशेमन से धुआँ उठता है तुम कहते हो बादल है

 हालिया पार्लियामानी इन्तखाबात से पहले मुस्लिम तंजीमों और इदारों के सरबराहान में बड़ी इजतराबी कैफियत देखने को मिली थी। हर जानिब से ये आवाज बुलन्द की गई कि किसी सूरत बी0जे0पी0 और मोदी को बरसरे एक्तदार आने से रोका जाए। इस अन्दाज से मोदी के खिलाफ नारे बुलन्द किए गए कि हिन्दू वोटरों का एक बड़ा तबका खामोशी के साथ मुत्तहिद हो गया और मुस्लिम वोटर मुन्तसिर होकर कई खानों में बँट गए। नतीजा यह हुआ कि बी0जे0पी0 अक्सरीयत से जीत गई और मोदी सिर्फ हिन्दुस्तान को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को हैरत में डालकर बाआसानी वजीर आजम बन गए। ऐसे लोग जो हर हाल में किसी भी हुकूमत से करीब तर हो जाना चाहते हैं वह अपनी सियासी मन्तिक को फेल होता देख कर परेशान व बेचैन हो गए, अब खौफ व डर की वजह से उजलत में वजीर आजम मोदी को अपनी हिमायत की खबर पहुँचाना चाहते हैं। चूँकि इन लोगों ने यह अन्दाजा अपने तौर पर कर लिया है कि आइन्दा दस साल तक मोदी एक्तदार उज़मा पर काबिज रहेंगे। गालिबन यही सोच मुस्लिम इदारों के सरबराहान को भी खुद सुपुर्दगी पर मजबूर कर रही है। ताज्जुब की बात यह है कि न किसी ने इनकी हिमायत तलब की है न अब किसी को हुकूमत साजी के लिए मुसलमानों की हिमायत की जरूरत है। रजाकाराना तौर पर अपनी जानिब से हिमायत का एलान किस बात का पैगाम देता है? बेमहल बे मौका और बेजरूरत बातों से सिर्फ कीमत ही नहीं घटती बल्कि बचा बचाया वकार भी बाकी नहीं रहता और इसको हलकापन भी कहा जाता है।
      वजीर आजम मोदी ने अपने इलेक्शन के तकरीरों में और टी0वी0 चैनलों को इंटरव्यू देते हुए बहुत सारे नेकात की तरफ इशारा किया है और कुछ बातें मुस्लिम अवाम के तईं खुल कर की हैं। अभी तो मोदी की ताजपोशी को एक माह भी नहीं गुजरा हम अभी से उतावले होकर खुद को इनके हवाले कर दें, ये कहाँ की अकलमंदी है। इसे खौफ या लालच ही तसव्वुर किया जाएगा। गलती दर गलती यह सियासी सूझ बूझ हरगिज नहीं है। हम हिन्दुस्तानी शहरी हैं। हमारे हुकूक बराबर के हैं। हम किसी के मरहूनेमिन्नत नहीं हैं। हमारे हुकूक की अदायगी में अगर जानिबदारी बरती गई तो हम खामोश नहीं रहेंगे। दस्तूर हिन्द ने हमें जो मुराआत दी हैं इन में अगर किसी तरह की नाइंसाफी की गई तो हमें अपने हुकूक को वागुजार कराने के जायज तरीकों से कोई ताकत रोक नहीं सकती और खुद मोदी ने कहा है कि मैं किसी मखसूस कौम या फिरका का नहीं बल्कि एक सौ पच्चीस करोड़ हिन्दुस्तानियों का चैकीदार और सेवक हूँ। मुझसे किसी को डरने की जरूरत नहीं है। मोदी से कौन डरता है। मुसलमानों में गुजरात के फसाद का गुस्सा जरूर बाकी है। अगर उन्हें इस गुस्से को खत्म करना है तो अपनी गैर जानिबदारी का सबूत पेश करने के लिए ही मसायल हल करें।
    चाहिए तो ये था कि हम अभी खामोश रहकर हुकूमत के रवैये का जायजा लेते क्योंकि पूरा हिन्दुस्तान गुजरात नहीं है। हिन्दुस्तानी मुसलमानों को और इनके मफादात को नजरअंदाज करना या इन पर जबर जुल्म करना कोई आसान बात नहीं है। अगर ऐसा हुआ तो इसके बड़े भयानक नतीजे  बरामद होंगे, हमें मोदी से कोई ज़ाती दुश्मनी नहीं थी न है। बात सिर्फ यह है कि गुजरात में मुसलमानों का जो कत्लेआम हुआ उस वक्त वह खुद वजीर आला थे। इनकी मौजूदगी में जो हुआ इसको रोकना इनका फर्ज मनसवी था जिसे इन्होंने नहीं निभाया। न मुजरिमों को इन्होंने कैफरे किरदार तक पहुँचाया। यही शिकायत और इसी कारकिर्दगी का जख्म आज भी हरा है। इसके बावजूद हमारी बेहिसी और चापलूसी की इन्तिहा देखिए कि मोदी साहब को और इनके करीबी लोगों को जामिया मिलिया और एक दीगर मुस्लिम इदारे में दावत दी जा चुकी है। यह इदारा एक कल्चरल सेन्टर है जिसका सियासत से कोई लेना देना नहीं है वहाँ के जिम्मेदारों में एक होड़ लग गई है कि कैसे मोदी तक पहुँचा जाए। इनके करीबी मुअतमिद हैं जो गुजरात से आकर आजकल दिल्ली में कयाम पजीर हंै। जामिया मिलिया में इनको दावत दी जा चुकी है जबकि इसके बरअक्स मुजफ्फरनगर फसाद के हीरो को वजीर बना दिया गया है। पुणे में एक मुसलमान इंजीनियर को टोपी और दाढ़ी के जुर्म में कत्ल किया गया, अभी तक इस पर खामोशी है कि हिन्दू राष्ट्र सेना पर कब पाबन्दी आयद होगी और कब तक इसको बेलगाम छोड़ा जाएगा। एक तरफ यह एलान है कि हम एक सौ पच्चीस करोड़ अवाम के सेवक हैं दूसरी तरफ अमल यह है कि बेगुनाह मुसलमानों को दसियों साल तक जेल में बन्द करके स्कीम बनाने वाला आई0बी0 अफसर अजीत देवल को एन0एस0ए0 बनाया जाता है। दूसरी तरफ बाबरी मस्जिद शहादत के वक्त कल्याण सिंह का होम सेक्रेटरी जो बाद में टी0आई0आई0 का चेयरमैन बना, गैर कानूनी तरीके से कैबिनेट सेक्रेटरी आर्डिनेन्स के जरिये बनाया जाता है। इससे हुकूमत की करनी का तजाद और जहनियत का पता चलता है।
    हमारी जिन्दगी और मौत का मालिक रज्जाक सिर्फ अल्लाह है, यही हमारा ईमान है। ईमान व यकीन को मजबूत करके अपने मौक्किफ पर इस्तकलाल के साथ कायम रहना एक मोमिन की शान है। अगर हमारे साथ अच्छा रवैया रहा और हमारे मजहबी उमूर में बेजा मदाखिलत नहीं की गयी। हमारे चैन सुकून की जिन्दगी में रखनान्दाजी नहीं की गई तो खामख्वाह मुखालिफत का हमें शौक नहीं। नरेन्द्र मोदी के खिलाफ 60 फीसदी हिन्दू आज भी ऐसे हैं जो खुद को सेक्यूलर कहते हैं। इन्हें ये बताना चाहिए कि 1947 में हमने हिन्दुस्तान के इक्तिदार को यह कहकर इनके हवाले कर दिया था कि अब हम हिन्दुस्तान की हुकूमत आपके जिम्मे करते हैं आप हुकूमत कीजिए हम आपके पीछे हैं। जो हालत उस वक्त हमारी थी वही हालत आज 2014 में हिन्दुस्तान के सेक्यूलर हिन्दुओं की है। अब ये मुल्क गांधी, लोहिया, या अम्बेडकर की सोच पर चलेगा या फिर गोलवलकर या सावरकर के ख्वाब की ताबीर पूरी करेगा। यह एक लमहा फिफ्र मुसलमानों के लिए ही नहीं बल्कि सेकुलर हिन्दुओं के लिए भी है। इन्हें चाहिए कि वे आपस में इत्तिहाद पैदा करें और सेकुलर पार्टियों के लीडरों को चाहिए गुजिश्ता सियासी रंजिशों को भूलकर करीब आएँ और मौजूदा सियासी तब्दीलियों का मुकाबला करने के लिए अवाम का एतमाद हासिल करें। तभी कोई बेहतर रास्ता निकल सकता है और हुकूमत को सीधे रास्ते पर चलाने के लिए एक दबाव कायम किया जा सकता है। वरना वही होगा जो आजादी के बाद से अब तक होता आ रहा है। वादा और मीठी बातों से खुश होकर और भरोसा करने की वजह से गुजिश्ता साठ वर्षों से हमारे जज्बात और एतमाद के साथ मुसलसल खेला जा रहा है। एक अरसा दराज तक रामविलास पासवान मुसलमानों की नजर में खुद को सेकुलर साबित करने के लिए बी0जे0पी0 से कसदन दूर रहे। आज अपने सियासी मफादात के हुसूल के लिए इन्होंने बी0जे0पी0 का दामन पकड़ा और मुसलमानों को पस्त हिम्मत करने के लिए इनके मुस्लिम नुमाइन्दे मुसलमानों की मजलिस में जाकर तकरीर करते हैं और अपने मतालबात से बाज रहने की तल्क़ीन करते हैं ऐसे बहुत सारे लोग मुस्लिम नुमाइन्दा बनकर खैरख्वाही की आड़ में हुकूमत के मन्जूरे नजर होने की गरज से मुसलमानों में दाखिल होकर दहशत पैदा करने की कोशिश में मुन्हमिक हंै। ऐसे लोग कौम व मिल्लत के भी खैरख्वाह नहीं हो सकते। इनसे होशियार रहने की अशद जरूरत है। आइन्दा पाँच बरसों में सियासत गिरगिट की तरह न जाने कितने रंग बदलेगी। अगर हमारे साथ बदसलूकी नहीं की गई तो हमसे ज्यादा वफादार दुनिया की कोई कौम नहीं है। पन्द्रह सौ साला तारीख इस सच्चाई की चश्मदीद गवाह है, इस पर किसी तरह के शक की गुंजाइश नहीं है। किसी को ज़ाती तौर पर हमारी हिमायत वफादारी का मुशाहिदा करना है तो हमारे जुमला मसायल को हल करे और फिर देखे कि हम किस कदर जां निशार हैं। अब सिर्फ वादों से काम नहीं चलेगा। अमली इकदामात ही जख्म पर मरहम का काम कर सकते हैं। इसलिए अभी वक्त हमारे सब्र व तहम्मुल का मोत्कादी है।
अभी इश्क के इम्तिहाँ और भी हैं।
आईना-जमीर हाशमी
लो उजागर हो गया पटना धमाकों का भी सच
कार्यवाही थी वहाँ भी सब उसूलांे के बगैर।
ला न पाए छः महीने में भी कोई फर्दे जुर्म
बेगुनाहों पर थी तोहमत फिर सबूतों के बगैर।।

 -मुहम्मद अदीब
मजमून निगार
(राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं। )
मोबाइल: 09868181945
साभार-इंकलाब
लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (13-09-2014) को "सपनों में जी कर क्या होगा " (चर्चा मंच 1735) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'