सोमवार, 21 जनवरी 2013

माजरा क्या है ?

नकद सब्सिडी योजना की असलियत


 इस योजना के लागू किये जाने के साथ सब्सिडी को घटाए जाने का काम पूरे देश पैमाने पर किया जाना है | यह जन - साधारण को प्रत्यक्ष रूप में सब्सिडी देना नही है , बल्कि उसके सब्सिडी में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में कटौती करना है |
आर्थिक सुधारों के नए चरण के साथ आते रहे योजनाओं में इस समय नकद सब्सिडी योजना की खूब चर्चा है | हुकुमती व प्रचार माध्यमी क्षेत्र में योजना का आम तौर पर स्वागत समर्थन किया जा रहा है | विपक्षी पार्टियों द्वारा इसका कोई विरोध नही सुनाई पड़ रहा है | प्रचार माध्यमी हिस्सों द्वारा कुछ किन्तु -- परन्तु के साथ इस योजना को जनसाधारण के हित की योजना के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है |
अभी तक चलती रही सब्सिडी योजना में खाद्यान्न , उर्वरक , तथा मिटटी के तेल , रसोई गैस , डीजल आदि के बाजार मूल्य का एक हिस्सा सरकार द्वारा सब्सिडी के रूप में दिया जाता रहा है | इसलिए उपभोक्ताओं को ये माल सामान खुले बाजार से कम मूल्य पर मिलते रहे है | अब इस योजना के जरिये सरकार ने यह निर्णय लिया है कि सबसे पहले ( किरोसिन व रसोई गैस ) उर्वरक और खाद्यान्न पर दी जाती रही सब्सिडी को अब उसके आपूर्तिकर्ता संस्थानों को देने की जगह सीधे -- सीधे उपभोक्ताओं को दिया जाएगा | साफ़ बात है कि बाजार में उपभोक्ता को अब इन मालो का बाजार दाम चुकाना पडेगा | पर उसे अब तक मिलती रही सब्सिडी की रकम नई योजना के तहत सरकारी खजाने से उसके खाते में पहुंच जायेगी | उदाहरण , अभी तक 49.10 रूपये प्रति लीटर दाम वाला मिटटी का तेल उसे कंट्रोल रेट पर 15.25  रूपये प्रति लीटर में मिल जाता था | अब उसे कंट्रोल की दूकान पर भी मिटटी का तेल 49.10 रूपये प्रति लीटर खरीदना पडेगा | सब्सिडी की रकम उसको नकद रूप में अपने बैंक एकाउन्ट के जरिये मिल जायेगी | इस नई और नकद सब्सिडी योजना के समर्थन में चलाए जा रहे प्रचारों में यह कहा जा रहा है कि इससे सब्सिडी की रकम को बिचौलिया द्वारा खा जाने का भ्रष्टाचार रुकेगा | इस नई और नकद सब्सिडी योजना को उपभोक्ताओ तक पहुँचने के लिए दो नए चीजो की जरूरत है | एक तो सब्सिडी पाने योग्य होने के प्रमाण -- पत्र '' की जिसे '' आधार पत्र '' का नाम दिया गया है | दूसरी जरूरत है आधार पत्र धारको द्वारा निकटवर्ती बैंक में खाता खुलवाने की | कयोकी सरकारी खजाने से उसके इसी खाते में सब्सिडी की रकम पहुंचनी है | यह भी कहा जा रहा है कि देर सवेर अन्य योजनाओ  ''उदाहरण ''-- छात्रवृति जैसी योजनाओं को भी नकद सब्सिडी योजना के तहत ला दिया जाएगा | अभी इस योजना को प्रयोगिक तौर पर राजस्थान के अलवर जिले में मिटटी के तेल पर नकद सब्सिडी योजना के रूप में तथा मैसूर में कुकिंग गैस पर नकद सब्सिडी योजना के रूप में आरम्भ किया गया है | सूचना यह है कि 1 जनवरी 2013 से देश के 51 जिलो में नकद सब्सिडी योजना लागू कर दी जायेगी और अप्रैल 2014 तक इसे पूरे देश में लागू कर दिया जाएगा | जनवरी 2013 में सार्वजनिक सेवा के 29 कार्यक्रमों को नकद सब्सिडी योजना में शामिल किया जाएगा और बाद में सार्वजनिक सेवा के लिए चलाई जा रही 42 योजनाओं को इसके अंतर्गत लाया जाएगा |
सूचना यह भी दी गयी है कि इस योजना के चलते सरकारी खजाने पर अब तक पड़ रहा एक लाख नब्बे हजार करोड़ रूपये की सब्सिडी बढ़कर कुल चार लाख करोड़ रूपये प्रति वर्ष हो जाएगी | आगे बढने से पहले एक दिलचस्प मामला सुन ले | अभी तक खासकर पिछले 15 सालो से आती रही सरकारे , उनके वित्त मंत्रीगण जाने -- माने अर्थशास्त्री व आर्थिक सलाहकार सरकारी खजाने पर बढती सब्सिडी का रोना रोते रहे है उसे घटाने  की सलाह देने के साथ इसके उपाय भी बताते रहे है | इन्ही सुझावों और उपायों के तहत जनसाधारण को खाद , बीज , सिंचाई , बिजली , पेट्रोल , डीजल , गैस  तथा शिक्षा , चिकित्सा आदि क्षेत्रो में मिलती रही सब्सिडी को विभिन्न रूपों में काटा --  घटाया भी जाता रहा है | खासकर पिछले 15 सालो से |
लेकिन अब नकद सब्सिडी योजना के अंतर्गत सब्सिडी की कुल रकम घटने की जगह बढाने के समाचार आने के वावजूद इस पर कही कोई चिंता चर्चा सुनाई नही पड़ी | न ही इस योजना की कोई आलचना ही हुई | उल्टे इसका स्वागत समर्थन किया जा रहा है | लेकिन क्यों ? माजरा क्या है ? क्या सत्ता सरकारों उनके वित्त मंत्रियों सलाहकार बने उच्च स्तरीय अर्थशास्त्रियो का मन बदल गया है ? नही ! ऐसा कुछ नही हुआ है | उनका मन सब्सिडी घटाने का ही बना हुआ है | उसी के प्रयास स्वरूप ही यह नकद सब्सिडी योजना लागू भी की जा रही है | लेकिन एक लाख चौरासी हजार करोड़ की सब्सिडी  के चार लाख करोड़ तक पहुंचने से यह संभव कैसे होगा ?
पहली बात तो 2012 -- 13 में 1 लाख 84 की दी गयी सब्सिडी मुख्यत: खाद्यान्न , उर्वरक , और तेल पेट्रोल व गैस पर दी जाने वाली सब्सिडी की रकम है | यह सब्सिडी लगातार घटाई गयी है | खासकर डाई जैसे उर्वरको पर और पेट्रोल पर तो उसे 2010 -- 11 से ही घटाया जा रहा है | जहा तक सब्सिडी की संभावित रकम 4 लाख करोड़ पहुंचने का मामला है तो अब उसमे केन्द्रीय बजट के जरिये सामाजिक सेवाओं के विभिन्न क्षेत्रो में ( उदाहरण छात्रवृति व आम बीमा योजना आदि रूपों में ) खर्च किये जाते रहे रकम को भी प्रत्यक्ष सब्सिडी योजना के नाम पर जोड़ दिया गया है | हालाकि स्पष्ट तौर पर इसकी सूचना नही दी गयी है लेकिन यह सूचना तो दी ही गयी है कि अब नकद सब्सिडी योजना के तहत सरकार द्वारा चलाई जा रही 42 योजनाओं के लिए दिए जाने वाला सरकारी धन शामिल कर लिया गया है | साफ़ बात है कि यह सब्सिडी की रकम को बढाना नही है , अपितु उसे बढा दिखा कर सब्सिडी के हकदार जनसाधारण को धोखा देना है | जबकि वास्तविक स्थिति प्रचारों के एकदम विपरीत  है | इसे आप बतौर सबूत देखे --
अलवर जिले के जिलाधिकारी का ब्यान 8 दिसम्बर के हिन्दी दैनिक बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित हुआ है | उनका कहना है कि एक साल पहले इस क्षेत्र में मिटटी के तेल की बिक्री 84000 लीटर प्रति माह थी | लेकिन अब उसमे 70% की गिरावट आई है | वे खुश होकर गिरावट का कारण बताते है कि प्रत्यक्ष सब्सिडी योजना के चलते मिटटी के तेल की कालाबाजारी बंद हो गयी है |
इसके विपरीत अलवर के मिटटी के तेल के विक्रेताओ और खरीदारों का कहना है कि बड़ी संख्या में अब गरीब मिटटी का तेल नही खरीद पा रहे है | कयोकी अब उन्हें तुरंत खरीद के लिए कंट्रोल रेट 15.25 रूपये देने की जगह 49.10 रूपये  देना पड़ रहा है | बहुतेरे लोगो के खाते में सब्सिडी का पैसा अभी आया ही नही है | जबकि सब्सिडी की रकम उनके खातो में पहले ही पहुंचाया जाना तय  किया गया था | इसके अलावा बहुत से लोगो के खाते में 3 माह पहले सब्सिडी की रकम एक बार के लिए तो आई पर दुबारा नही आई , कब आएगी इसका कोई पता नही | फिर जिले के कई गाँवों के आस -- पास कोई बैंक नही है | उदाहरण -- कोट -- कासिम गाँव के कई पूर्वे नजदीकी बैंक से 17 किलोमीटर दूर है | वह के निवासियों के लिए और आम तौर पर दिहाड़ी मजदूरों के लिए बैंक में सब्सिडी के रूप में आये धन का पता लगाना और पाना कत्तई आसान नही है | उसके लिए उन्हें एक दिन या कई दिन का काम या दिहाड़ी छोड़ना पडेगा | अलवर जिले का कोटेदार भी 49.10 रु के रेट से मिटटी के तेल की उठान करने में अपने को असमर्थ बता रहे है | तमाम प्रशासनिक दबावों के वावजूद निर्धारित कोटे से कही कम उठान हो रहे है | कयोकी अब उन्हें भी मिटटी के तेल का मूल्य बगैर सब्सिडी के ही चुकाना पड़ रहा है | वह पहले के मूल्य से तीन गुना से भी ज्यादा है |
दरअसल अलवर जिले में मिटटी के तेल में गिरावट के ये उपरोक्त कारण ही असली व प्रमुख कारण है |
निश्चित रूप से बढे मूल्य के साथ काला बाजारी में भी कमी जरुर आई होगी , लेकिन मुख्य गिरावट उसकी खरीद बिक्री में भारी गिरावट आने के चलते हुई है | कयोंकि  यह स्वाभाविक बात है कि जब उसकी खरीद बिक्री में कमी और वह भी भारी कमी आ जायेगी तो उस पर दी जाने वाली सब्सिडी की मात्रा भी घट जायेगी या घटा दी जायेगी | अलवर में मिटटी के तेल की बिक्री पर दी जाने वाली सब्सिडी में भारी कमी जरुर आई होगी |
स्वाभाविक बात है कि जो स्थिति राजस्थान के अलवर की है उसी का परिलक्षण नकद सब्सिडी योजना के तहत देश के पैमाने पर दिखाई पड़ना है | इस योजना के लागू किये जाने के साथ सब्सिडी को घटाए जाने का काम पूरे देश के पैमाने पर किया जाना है | यह जनसाधारण को प्रत्यक्ष रूप से सब्सिडी देना नही है बल्कि उसके सब्सिडी में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में कटौती करना है |
यह सरकार और देश के धनाढ्य वर्ग की सोची समझी एक चाल है |



-सुनील  दत्ता  
पत्रकार

1 टिप्पणी:

प्रवाह ने कहा…

सब्सिडी की कटौती का तथ्यात्मक एवं खोजपरक विवरण प्रस्तुत करने के लिए साधुवाद ,सारी सरकारे जनतंत्र का सोची समझी चाल के तहत माखौला बना रही है लोकहित का कोई काम करने से रही ,आपसे पुर्णतः सहमत