सोमवार, 21 जनवरी 2013

पत्ता तक नहीं खड़केगा

अब फिर वीआरएस ! कर्मचारियों की व्यापक छंटनी का मौसम!राहुल गांधी की ताजपोशी होते न होते बीएसएनएल के एक लाख कर्मचारियों की नौकरी जाना तय! 

आगे आगे देखियेए क्या क्या होने जा रहा है सरकारी कर्मचारियों को खुश रखकर देश की बाकी जनता को नरसंहार संसकृति के तहत खुले बाजार के आखेट क्षेत्र में साफ करके विकासगाथा और शेयर बाजार के मार्पत सुपरपावर इंडिया बनाने वाले अब अपनी गोद में खेलते ​​खाते राजदुलारों की बलि चढ़ाने की तैयारी में है।बेरहम विनिवेश मुहिम तेज है ही। स्थाई नियुक्तियों का रिवाज खत्म है।अब फिर वीआरएस!तमाम जरुरी सेवाओं शिक्षाएचिकित्साए परिवहन, संचार, बिजली, खाद्य एवं आपूर्ति, आधारभूत संरचना, आदि को बाजार और क्रयशक्ति से जोड़ दिया जाता रहा है।  इस बुनियादी बदलाव को सरकारी कर्मचारियों और सार्वजनिक उपक्रमों के मोटे वेतन और भारी सुविधाओं वाले वर्ग ने लगातार समर्थन दिया है। कर्मचारी संगठन और ट्रड यूनियनें लगातार वेतन और सुविधाओं के अर्थवादी मांगों के दायरे में भटकती रहीं। उनके नेता एक के बाद एक समझौते करते रहे। विदेश यात्राओं में मौज मस्ती करते रहे। वातानुकूलित कांच के दड़बों में आम जनता की दर्दभरी चीखे सुनायीं नहीं पड़ी। अब एअरइंडिया के पायलटों की हालत देखकर कर्मचारियों की आंखें नहीं खुली  तो बीएसएनएल क्या, सभी सरकारी कर्मचारियों की नियति एक सी है।राजकोष में सबसे ज्यादा व्यय इन्हीं कर्मचारियों को पटाये रखने में होता है। हर सरकारी दफ्तर की लालफीताशाही में आम आदमी का दम घुटता है। इन कर्मचारियों का न जनता, न समाज और न देश से कोई सरोकार है। सरकारी कारपोरेट नीतियों को बेरहमी से लागू करने वाले आत्मघाती इस वर्ग के लिए आम आदमी के मन में तनिक सहानुभूति ​​नहीं है।वेतनए भत्तों, पेंशन और भविष्यनिधि के सहारे इसी वर्ग का बाजार पर कब्जा है। इन्हीं की वजह से बाजार भाव आसमान छू रहे हैं। इसलिए सरकारी नीति निरधारण की तलवार से जब यह वर्ग लहूलुहान हो रहा है, तो मारे जा रहेए जख्मी , लहूलुहान लोगों की क्या प्रतिक्रिया होगी?
सार्वजनिक क्षेत्र की टेलीकॉम कंपनी बीएसएनएल के एक लाख कर्मचारियों की नौकरी खतरे में है। दरअसल, यह जानी.मानी कंपनी अपने एक लाख कर्मचारियों को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति स्कीम ;वीआरएस की पेशकश करना चाहती है ताकि उसका वेतन बोझ कम हो सके। इससे कंपनी को अपना घाटा कम करने में भी मदद मिलेगी।बीएसएनएल के एक शीर्ष अधिकारी ने बताया, कंपनी में तकरीबन एक लाख कर्मचारी जरूरत से ज्यादा हैं।यही कारण है कि कंपनी इन्हें वीआरएस की पेशकश किए जाने के पक्ष में है। उन्होंने कहा कि वीआरएस संबंधी प्रस्ताव सरकार को पेश किया जा चुका है। गौरतलब है कि बीएसएनएल के कुल राजस्व का तकरीबन 48 फीसदी उसके कर्मचारियों को तनख्वाह देने में ही चला जाता है।सरकारी पक्ष यह है कि इसके अतिरिक्त कर्मचारियों का बोझ ही इसके लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन चुका है क्योंकि एक समय में जब लैंडलाइन की बहुत आवश्यकता होती थी तो इसमें बड़े पैमाने पर भर्ती की गयी थी। पर अब मोबाइल युग के तेज़ी से आने के बाद इसकी लैंडलाइन सेवा पर सबसे बुरा असर पड़ा है। पर आज भी पूरे देश के महानगरों को छोड़कर किसी भी जिला मुख्यालय की बात की जाये तो आज भी आधुनिक सेवाओं के लिए संचार निगम के अलावा लोगों के पास कोई विकल्प नहीं है। फिर भी इस लाभ की स्थिति से निगम कुछ नहीं कर पा रहा है। इसमें आज की तकनीक के अनुसार दक्ष कर्मचारियों की भर्ती करने को प्राथमिकता देनी चाहिए और पुराने कर्मचारियों के सामने वीआरएस का विकल्प रखा जाना चाहिए।
सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी भारत संचार निगम लिमिटेड ;बीएसएनएल का घाटा 2010.11 में तीन गुना बढ़कर 6,000 करोड़ रुपये पर पहुंच गया।कंपनी ने कहा है कि 3जी और ब्रॉडबैंड वायरलेस एक्सेस ;बीडब्ल्यूए स्पेक्ट्रम के भुगतान तथा कर्मचारियों को वेतन मद में भारी राशि की अदायगी से उसका घाटा बढ़ गया।कंपनी को 2009.10 में 1,823 करोड रुपये का शुद्ध घाटा हुआ था। कंपनी के अनांकेक्षित नतीजों के अनुसार 2010.11 में उसका घाटा 5,997 करोड रुपये रहा है।बीते वित्त वर्ष में कंपनी की कुल आमदनी भी करीब 10 प्रतिशत घटकर 28,876 करोड रुपये रह गई, जो इससे पिछले वित्त वर्ष में 32,072 करोड रुपये थी। बीएसएनएल सूत्रो के अनुसार घाटा बढने की मुख्य वजह सरकार को 3जी और बीडब्ल्यूए लाइसेंस के लिए किया गया भुगतान है।कंपनी ने इन दोनों के लिए 18,500 करोड रूपये चुकाए हैं। इससे बीते साल में कंपनी को 4,000 करोड रूपये की अन्य आमदनी का नुकसान हुआ।
कंपनी की 47 प्रतिशत से अधिक आमदनी कर्मचारियों को किए गए भुगतान में चली गई। घाटे से उबरने के लिए विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के अनुरूप अपने श्रमबल को घटाने के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना ;वीआरएस ला सकती है। कंपनी ने 99,700 कर्मचारियों का आंतरिक लक्ष्य बनाया है। प्रस्तावित वीआरएस से बीएसएनएल पर 2,700 करोड रूपये का बोझ पड सकता है। सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम पुनर्गठन बोर्ड ने दूरसंचार कंपनियों, आईटीआई और एमटीएनएल के बीएसएनएल में विलय की भी सिफारिश की है.केंद्र सरकार इस कंपनी को दी जाने वाली 2,000 करोड रूपए की सालाना सब्सिडी रोकने की भी बात कही है। दिल्ली और मुंबई को छोड़कर बीएसएनएल समूचे देश में सेवाएं देती है। 31 जुलाई तक इसके मोबाइल ग्राहकों की संख्या 9.51 करोड़ थी।कुछ समय पहले सुना था कि सार्वजनिक क्षेत्र की दूरसंचार कंपनी बीएसएनएल को घाटे से उबारने के लिए दूरसंचार विभाग खास रणनीति तैयार कर रहा है। इसके तहत दूरसंचार क्षेत्र से जुड़े अन्य सार्वजनिक उद्यमों, मसलन. आईटीआई लिमिटेड और सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ टेलीमेट्रिक्स ;सीडॉट के साथ बेहतर तालमेल के साथ संसाधनों के अधिकतम इस्तेमाल की संभावना तलाशी जा रही है।विभाग ऐसी योजना बना रहा हैए जिससे इन कंपनियों के संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो सके और यह निजी क्षेत्र से मुकाबला करने में भी सक्षम हो।
बाकायदा बाजार केंद्रित कारपोरेट नीति निर्धारण का फोकस यह है कि नुकसान में चलने वाली सार्वजनिक क्षेत्र  इकाइयों को या तो बंद कर देना चाहिए या फिर फ़ौरन विनिवेश की दिशा में बढ़ते हुए सरकार को अपना हिस्सा इकदम कम कर देना चाहिए। जो इकाइयाँ लाभ अर्जित करने की स्थिति में लग ही नहीं रही हैं उन का पूर्णतया निजीकरण कर देना चाहिए। विलयनए पुनर्गठन, आकार घटाना और विभिन्न सरकारी कामकाज की आउटसोर्सिंग कुछ अन्य उपाय हैं जिनसे सार्वजनिक उद्यमों में सुधार आ सकता है।
राजग शासनकाल में विनिवेश के लिए गठित निजी कंपनियों के मालिकों की ममिति ने ऐसी ही शिपारिश की थीए जिसपर तुरंत अ्मल शुरु हो​​ गया। तत्कालीन राजग सरकार ने तो बाकायदा विनिवेश मंत्रालय में अरुण शौरी को मंत्री बनाकर विनवेश और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति स्कीम ;वीआरएसद्ध की मुहिम चलायी थी। सरकर बदलने के बावजूद वही पुरानी सूची और पुराने कार्यक्रम पर अमल हो रहा है। सिर्फ विनिवेश मंत्रालय नहीं रहा।​​
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​नीति निर्धारकों का स्पस्ट मत है कि आज के समय में सरकार की वो भूमिका नहीं रह गयी है जिसकी आज़ादी के समय परिकल्पना की गयी थी।​​ आज जिस तरह निजी सेक्टर और दूसरे नागरिक संगठन समाज की ज़रूरतों को पूरा करने में लगे हुए हैंए उसे देखते हुए सरकार को अपनी भूमिका सिर्फ आवश्यक जिम्मेदारियों के निर्वहन तक ही सीमित कर देनी चाहिए।​​
बड़ी सरकारी मशीनरी और हानि में चलने वाली सार्वजनिक इकाइयों से राष्ट्रीय कोष को लगातार नुकसान होता है।​​ ऋण में रहना तो किसी भी तरह से हमारी सरकार के लिए हितकारी नहीं है।​​ इसीलिए आवश्यक है की हम राज्य सरकारों और उनके द्वारा चालित इकाइयों को छोटा करें और उनका प्रदर्शन सुधारे।​​कार्यसंस्कृति में सुधार के तहत राज्य सरकारें भी इसी नीति पर अमल कर रही हैं।

यह सबसे कठिन हालत है कि सरकार बखूब जानती है कि सरकारी कर्मचारियों के साथ चाहे जो सलूक किया जाये, उनकी करनी ऐसी है कि उनके समर्थन में कहीं एक पत्ता तक नहीं खड़केगा। यही वजह है कि पिछले बीस सालों के दरम्यान निजीकरण और विनिवेश के अभियान के खिलाफ कोई जनांदोलन राज्यों में वामपंथी सरकारों के मजबूत जनाधार होने और नीतिगत तौर पर उनके उदारीकरण के खिलाफ होने के बावजूद संबव ही नहीं हुा। अलग थलग पद और वेतनमान, सत्ता और क्षमता , काला धन और दो नंबर के रोजगार में निष्मात इस वर्ग का अवसान अब होने ही वाला है और विडंबना है कि उनके लिए कोई रोने वाला नहीं है। नौकरी बचाने की फिक्र में पद और सुविदाएं जारी रखने के फिराक में उनके अपने साथी तक उनके साथ नहीं खड़े है, तो आम आदमी उनके लिए आंसू क्यों बहायेगा?
नीति निर्धारकों का स्पस्ट मत है कि  सरकार पर आने वाले वित्तीय भार का प्रमुख हिस्सा होता है वेतन बिल, पेंशन और ब्याज भुगतान। पिछले कुछ वर्षों से राज्यों का वेतन बिल उनके संपूर्ण राजस्व व्यय का करीब 35 प्रतिशत हिस्सा बना हुआ है और ब्याज भुगतान संपूर्ण राजस्व प्राप्ति का 25 प्रतिशत हिस्सा खाता आ रहा है वित्त आयोग के अनुसार राज्यों को अपनी भर्ती और वेतन पॉलिसी ऐसी बनानी चाहिए कि वो सरकार के राजस्व खाते पर सेंध ना लगाए। इस दिशा में सरकारी मशीनरी का आकार बहुत महत्वूर्ण होता है।जवाहरलाल नेहरु नैशनल अरबन रुरल मिशन के अंतर्गत राज्यों में प्रशासनिक सुधार आने चाहिए। इन सुधारों के अंतर्गत स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति स्कीम, सेवानिवृत्ति से होने वाली रिक्तियों को ना भरा जाना,  सेवानिवृत्ति की उम्र घटाना, सर्विंग अधिकारियों को ही विभिन्न पोस्ट पर तैनात करना ना कि रिटायर्ड लोगों कोए कठोर वर्क कांट्रेक्ट का सर्जन, अतिरिक्तध्भार रुपी स्टाफ की छंटनी और अन्य उपायों से सरकारी संस्थापनाओं को छोटा और कुशल बनाना है। नीति निर्धारकों का आकलन है कि दुर्भाग्यवश वेतन आयोग के प्रशासनिक सुधार सम्बंधित सुझावों की तो अनदेखी कर दी गयी पर वेतनों को और बढ़ा दिया गया जिस से राज्यों पर अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ा।  आयोग ने कहा था कि सिविल सर्विस को 30 प्रतिशत तक कट किया जाए पर उस पर अधिक अमल नहीं किया गया।  बाज़ार की सच्चाइयों को मद्देनज़र रखते हुए वेतन बढ़ाना ज़रूरी है पर अगर साथ ही साथ दूसरे सुधारों से भी सरकार का प्रदर्शन ठीक किया जाएए तो ये पूरे देश के विकास के लिए अच्छा होगा।

कर्मचारियों का बोझ
बीएसएनएल के खर्च का करीब 50 फीसदी कर्मचारियों के वेतन में जाता है
वित्तीय सेहत सुधारने के लिए कर्मचारियों की संख्या घटाना बेहद जरूरी है


योजना . दोनों सार्वजनिक क्षेत्र की टेलीकॉम कंपनियां वित्तीय सेहत सुधारने के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को जरूरी मानती हैं। कंपनियों ने इसके लिए प्रस्ताव डॉट को दे रखा हैए लेकिन नवंबर में होने वाली 2जी बोली के मद्देनजर ये प्रस्ताव अटके हैं। बीएसएनएल अपने 1,00,000 कर्मचारियों को स्वैच्छिक सेवानिवृति ;वीआरएस देना चाहती है तो एमटीएनएल 15,000 कर्मचारियों को। दोनों कंपनियों को इसके लिए तकरीबन 15,000 करोड़ रुपये की जरूरत है।
देश की दोनों सार्वजनिक टेलीकॉम कंपनियों की वीआरएस योजनाओं पर डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकॉम ;डॉटद्ध नवंबर 2012 के बाद फैसला कर सकता है। डॉट के सूत्रों का कहना है कि नवंबर में बोली प्रक्रिया के समाप्त होने के बाद मंत्रालय भारत संचार निगम लिमिटेड ;बीएसएनएलद्ध और महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड ;एमटीएनएलद्ध की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ;वीआरएसद्ध की योजनाओं पर फैसला ले सकता है।

सूत्रों का कहना है कि दोनों कंपनियों ने जो प्रस्ताव डॉट को दिया है उसके मुताबिक तकरीबन 15ए000 करोड़ रुपये की जरूरत होगी। लेकिनए फिलहाल इस संबंध में वित्त मंत्रालय से कोई संवाद नहीं हो रहा है। सूत्रों ने कहा कि दोनों सार्वजनिक टेलीकॉम कंपनियों की वित्तीय सेहत सुधारने के लिए वीआरएस बेहद जरूरी है। लिहाजाए इस पर नवंबर में होने वाली बोली प्रक्रिया के समाप्त होने के बाद कार्यवाही शुरू हो सकती है।

इस बारे में पूछे जाने पर एमटीएनएल के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर एण् केण् गर्ग ने कहा कि कंपनी ने प्रस्ताव डॉट को दे दिया है। लेकिनए अभी इस बारे में डॉट से किसी भी प्रकार का संवाद नहीं हुआ है। वहींए बीएसएनएल के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर आरण् केण् उपाध्याय ने कहा कि कंपनी का 49 फीसदी खर्च कर्मचारियों की तनख्वाह में जाता है।

ऐसे में कंपनी को दोबारा पटरी पर लाने के लिए वीआरएस स्कीम को अमली.जामा पहनाना बेहद जरूरी है। उन्होंने बताया कि वीआरएस का प्रस्ताव अभी तक पेंडिंग है। वहींए सूत्रों का कहना है कि दोनों कंपनियों को घाटे से उबारने के लिए वीआरएस योजना लागू करना बेहद जरूरी है। लेकिनए इस पर फैसला बोली प्रक्रिया के पूरा होने के बाद ही संभव हो पाएगा।

गौरतलब हैए बीएसएनएल अपने 1ए00ए000 कर्मचारियों को स्वैच्छिक सेवानिवृति ;वीआरएसद्ध देना चाहती है तो एमटीएनएल 15ए000 कर्मचारियों को। लेकिनए दोनों ही कंपनियों को इसके लिए कुल मिलाकर तकरीबन 15ए000 करोड़ रुपये की जरूरत है। दोनों ही कंपनियां इस संबंध में डॉट को प्रस्ताव दे चुकी हैं लेकिन अभी तक इस मसले पर कुछ नहीं हुआ है।

नीति निर्धारकों का स्पस्ट मत है कि  एयर इंडिया के बाद बीएसएनएल का भी हाल देख कर भारत के सार्वजनिक उपक्रम क्षेत्र की खस्ता हालत का खुलासा हो जाता है। आर्थिक सुधारों के बीस साल बाद और निजीकरण के स्वाभाविक सुपरिणामों को देख कर भी संप्रग सरकार अगले फेज़ के सुधारों को लेकर निष्क्रिय देखी पड़ती है। बीएसएनएल और एमटीएनएल के विलय से अगर एयर इंडिया जैसी हालत हो गई तो फिर दो कंपनियों के कर्मचारी वेतन भत्ते और वरिष्ठता आदि मुद्दों को लेकर जंग छिड़ी रहेगी। वर्षों से घाटे में चल रही कई अन्य सार्वजनिक इकाईयों को बोझ की तरह ढोने के बजाय उनके विनिवेश और निजीकरण से यदि हम उत्पादकता और रोज़गार सृजन कर सकते हैं तो यह सभी के लिए अच्छा सौदा साबित होगा।

भारत संचार निगम लिमिटेड ;बीएसएनएलद्ध के कर्मचारियों को अगले छह महीने के दौरान स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति स्कीम ;वीआरएसद्ध का विकल्प मिलने की उम्मीद है। डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकॉम ;डॉटद्ध के सूत्रों का कहना है कि बीएसएनएल के प्रस्ताव को जल्द ही वित्त मंत्रालय को भेजे जाने की उम्मीद है। सूत्रों ने बताया कि इस योजना के तहत बीएसएनएल के तकरीबन 1,00,000 कर्मचारियों को वीआरएस देने का प्रस्ताव है। यह पूरी योजना तकरीबन 19,000 करोड़ रुपए की है जिसमें से डॉट की तरफ से 16,000 करोड़ रुपए देने का प्रस्ताव है। सूत्रों का कहना है कि डॉट द्वारा बीएसएनएल की वीआरएस पर अंतिम फैसला लेने के बाद इसे वित्त मंत्रालय के पास भेजा जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में तकरीबन छह महीने का समय लग सकता है। बीएसएनएल ने डॉट को जो प्रस्ताव दिया हैए उसके मुताबिक कंपनी में तकरीबन 2.80 लाख कर्मचारी हैं जिनकी औसत उम्र 49 वर्ष है। वहींए कंपनी की कुल आमदनी में तनख्वाह का खर्च 45 फीसदी से ज्यादा है। ऐसे में कंपनी की तकरीबन आधी कमाई सिर्फ तनख्वाह में चली जाती है। इस कारण कंपनी भारी घाटे में जा रही है। वहींए निजी टेलीकॉम कंपनियों की कुल आमदनी का महज 4.5 फीसदी ही तनख्वाह के रूप में खर्च होता है। इस कारण से बीएसएनएल लगातार बाजार में पिछड़ती जा रही है। सूत्रों ने बताया कि बीएसएनएल को घाटे से उबारने के लिए वीआरएस बेहद जरूरी है। बीएसएनएल की वीआरएस को 45 वर्ष से ज्यादा उम्र वाले सभी कर्मचारियों के लिए खोला जाएगा। एक अनुमान के मुताबिक नॉन.एक्जीक्यूटिव.1 श्रेणी वाले कर्मचारियों को वीआरएस से तकरीबन 11 लाख रुपए मिलेंगे।

अधिकारी ने कहाए अगर ये सभी एक लाख कर्मचारी वीआरएस की पेशकश पर अपनी हामी भर दें तो कंपनी का वेतन बोझ घटकर महज 10 से 15 फीसदी रह जाएगा। मालूम हो कि 31 मार्चए 2011 को बीएसएनएल में कुल मिलाकर 2.81 लाख कर्मचारी थे। जहां तक बीएसएनएल के मुनाफे का सवाल है, इसमें लगातार गिरावट देखने को मिल रही है।

देश की सार्वजनिक क्षेत्र और लैंडलाइन सेवा देने वाली देश व्यापी दूरसंचार कम्पनी भारत संचार निगम लिमिटेड ;बीएसएनएल में जिस तरह से प्रबंधन से जुड़ी ख़ामियों के कारण घाटा बढ़ता ही जा रहा है वहीं उसमें आज भी शीर्ष पर फ़ैसले लेने के लिए बैठे हुए लोगों पर इसका कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा है। एक समय में हज़ारों करोड़ का लाभ अर्जित करने वाली कम्पनी में लगातार ग़लत फ़ैसलों के कारण आज यह स्थिति बन चुकी है कि वह सेवाओं में फिसड्डी साबित हो रही है और उसके कर्मचारियों में एक निगम के स्थान पर सरकारी विभाग के रूप में काम करने की मंशा आज भी पली हुई है। यह सही है कि कई सामजिक दबावों के चलते आज भी निगम को देश के उन दूर दराज़ के क्षेत्रों में सेवाएं देनी पड़ती हैं जहाँ पर उनसे कोई आर्थिक लाभ नहीं मिलता है। फिर भी देश के सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी होने के कारण वह अपना दायित्व निभाती रहती है। आख़िर ऐसा क्या रहा कि एक समय अपनी सेवाओं के लिए तत्पर रहने वाले इस निगम में सब कुछ इतना बिगड़ गया कि अब उसके सामने परिचालन को बनाये रखने तक की चुनौती भी आने लगी है? २ जी घोटाले की सबसे बड़ी मार निगम पर ही पड़ी है। क्योंकि उसके बाद फिर से भ्रष्टाचार होने के डर से सभी तरह की खरीद प्रक्रिया में ही रोक लग गयी, जिसका असर नगम के नेटवर्क को विस्तृत करने और आज के अनुरूप सेवा देने पर पड़ गया। आज भी निगम के पास पूरे देश में ३ जी सेवा देने का अधिकार तो है पर उसके नेटवर्क में ३ जी लायक उपकरण ही नहीं हैं, जो उपभोक्ताओं को यह सेवा दे सकें। केवल राजमार्गों और बड़े शहरों तक ही इसकी यह सेवा ठिठक कर रह गयी है। जबकि उपभोक्ताओं को यह काफी पहले मिल जानी चाहिए थी। निगम में जब तक कर्मचारियों और अधिकारियों की संख्या का अनुपात ठीक नहीं किया जायेगा, तब तक कुछ भी नहीं सुधर सकता है। क्योंकि आज के समय में जब केवल बेतार संचार को ही प्राथमिकता दी जा रही है तो लैंडलाइन सेवाओं के लिए तैनात कर्मचारियों के बड़े बोझ को ढोने की क्या आवश्यकता है ?
सुप्रीम कोर्ट ने डीएमके लीडर दयानिधि मारन के खिलाफ दायर एक याचिका की सुनवाई करते हुए शुक्रवार को बीएसएनएल और सीबीआई को नोटिस जारी किया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मारन के चेन्नै स्थित घर में गलत तरीके से एक्सचेंज स्थापित कर 323 लाइंस की सुविधा उनकी पारिवारिक कंपनी सन टीवी नेटवर्क को दी गई।

एक पत्रकार द्वारा मारन के खिलाफ दायर इस याचिका पर जस्टिस आफताब आलम की अगुआई वाली बेंच ने सीबीआई और बीएसएनएल से जवाब मांगा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि जांच एजेंसी ने पॉलिटिकल प्रेशर के कारण इस मामले को दफन कर दियाए जबकि जांच में इस बात का खुलासा हुआ था कि मामले में 440 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ है। याचिकाकर्ता स्वामीनाथन गुरुमूर्ति का कहना हैए श्इस तरह की गलत व्यवस्था सन टीवी नेटवर्क को समुचित रूप से डाटा ट्रांसफर करने के लिए की गई थी। सीबीआई ने अपनी शुरुआती जांच में पता लगाया था कि इसकी वजह से बीएसएनएल को 440 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।

बहरहाल दूरसंचार आयोग ने सरकारी दूरसंचार कंपनी भारत संचार निगम लिमिटेड ;बीएसएनएल को ग्रामीण क्षेत्रों में लैंडलाइन परिचालन को बढ़ावा देने के लिए 1,500 करोड़ रुपये की सब्सिडी को मंजूरी दे दी।

दूरसंचार आयोग के चेयरमैन और दूरसंचार विभाग ;डॉट के सचिव आर चंद्रशेखरन ने कहा, बीएसएनएल को पहले साल में सहयोग दिए जाने के लिए हरी झंडी दे दी गई है और उनसे अन्य जानकारियां मांगी गई हैं।
दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण ;ट्राई ने दो साल के लिए 2,750 करोड़ रुपये की सब्सिडी की सिफारिश की थी। इसमें से 1,500 करोड़ रुपये पहले साल के लिए और बाकी 1,250 करोड़ रुपये दूसरे साल के लिए प्रस्तावित थे।

बीएसएनएल ने इसके लिए प्रति वर्ष 2ए580 करोड़ रुपये के सहयोग की मांग की थी। यह सब्सिडी 1 अप्रैल, 2002 से पहले सरकारी दूरसंचार कंपनी द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में जारी किए गए लैंडलाइन कनेक्शनों को सहयोग देने के लिए मांगी गई थी। दूरसंचार आयोग की सिफारिशों के आधार पर डॉट इस संबंध में अंतिम फैसला करेगा।

बैठक में दूरसंचार आयोग ने टेलीकम्युनिकेशंस कंसल्टैंट इंडिया ;टीसीआईएल और भारती एयरटेल के संयुक्त उपक्रम भारती हेक्साकॉम में टीसीआईएल की 30 फीसदी हिस्सेदारी बेचने पर भी विचार.विमर्श किया। यह राजस्थान सर्किल में मोबाइल सेवाएं देती है।

चंद्रशेखर ने कहा,आज भारती हेक्साकॉम के मामले में फैसले पर कोई बात नहीं हुई। बैठक में सिर्फ इससे संबंधित जानकारियों पर बात हुई। कुछ अन्य जानकारियां मांगी गई हैं और उचित मूल्यांकन के लिए कुछ और काम किया जाना है।
सार्वजनिक क्षेत्र की दूरसंचार सेवा देने वाली कंपनी भारत संचार निगम लिमिटेड ;बीएसएनएल अपने सीडीएम, नेटवर्क को लीज पर देने की तैयारी कर रही है। कंपनी लगातार बढ़ रहे घाटे को कम करने के मकसद से यह कदम उठाने की तैयारी कर रही है। बीएसएनएल के सूत्रों का कहना है कि कंपनी अपने सीडीएम नेटवर्क को लीज पर देने की तैयारी कर रही है। कंपनी जल्द ही इस संबंध में कंसल्टेंट नियुक्त करने जा रही है। सूत्रों ने बताया कि कंसल्टेंट नियुक्त करने की प्रक्रिया जल्द ही शुरू हो जाएगी। कंसल्टेंट बाजार की स्थिति के मुताबिक आकलन करेगा कि किस तरह कंपनी को अपना सीडीएम, नेटवर्क लीज पर देना चाहिए जिससे कि कंपनी को ज्यादा से ज्यादा राजस्व हासिल हो सके। सूत्रों का कहना है कि कंपनी के सामने कुछ नियामक अड़चनें भी सामने आ सकती हैं। लिहाजा, बीएसएनएल इस संबंध में डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकॉम ;डॉट से यह राय.मशविरा लेगी कि किस प्रकार सीडीएम, नेटवर्क को लीज पर दिया जा सके। सूत्रों का कहना है कि नई टेलीकॉम नीति आने के बाद बीएसएनएल के लिए सीडीएम, नेटवर्क को लीज पर देना ज्यादा आसान हो जाएगा जिसमें स्पेक्ट्रम शेयरिंग की इजाजत मिल जाएगी। सूत्रों का कहना है कि कंसल्टेंट से कंपनी यह जानना चाहेगी कि सीडीएम, नेटवर्क को लीज पर देने से ज्यादा राजस्व कैसे हासिल होगा। कंपनी के सामने दो विकल्प हैं। पहला तो यह कि कंपनी सीडीएम, नेटवर्क पर वायरलेस डाटा सर्विसेज की इजाजत दे। दूसरा यह कि किसी कंपनी को स्पेक्ट्रम शेयरिंग पर दिया जाए और वह कंपनी वॉयस एवं डाटा सेवाएं मुहैया कराए। गौरतलब है, बीएसएनएल के पास 800 मेगाहट्र्ज बैंड में सीडीएम, स्पेक्ट्रम मौजूद है। कंपनी के पास देश भर के सभी सर्किलों ;दिल्ली और मुंबई को छोड़ में सीडीएम, स्पेक्ट्रम मौजूद है। लेकिन, कंपनी के पास इस नेटवर्क पर ज्यादा ग्राहक नहीं हैं।

एचसीएल इंफोसिस्टम्स लिमिटेड ने सोमवार को कहा कि उसे सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी भारत संचार निगम लिमिटेड ;बीएसएनएलद्ध से 250 करोड़ रुपये की परियोजना का ठेका मिला है।ठेके के तहत कम्पनी अगले सात सालों तक बीएसएनएल के उत्तरी और पश्चिमी क्षेत्र में बिल जारी करने की प्रक्रिया का प्रबंधन करेगी। इसके अलावा आधुनिकतम हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर का उपयोग कर बीएसएनएल के लिए अन्य सुविधाएं भी लगाएगी।एचसीएल इंफोसिस्टम्स के अध्यक्ष और मुख्य संचालन अधिकारी जे. वी. राममूर्ति ने एक बयान जारी कर कहा कि उनकी कम्पनी ने कई सिस्टम इंटिग्रेशन समाधान का विकास किया है। कम्पनी को मिले इस ठेके से इस क्षेत्र में उसकी विशेषज्ञता का पता चलता है।

भारत संचार निगम लिमिटेड;बी एस एन एल के नाम से जाने जाने वाला भारतीय संचार निगम लिमिटेड भारत का एक सार्वजनिक क्षेत्र की संचार कंपनी है।  ३१ मार्च २००८ को २४ः के बाजार पूँजी के साथ यह भारत की सबसे बड़ी, संचार कंपनी है। इसका मुख्यालय भारत संचार भवन,हरीश चन्द्र माथुर लेन , जनपथ , नई दिल्ली में है। इसके पास मिनी . रत्न का दर्जा है . भारत में सम्मानित सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को दिया गया एक दर्जा।

बीएसएनएल भारत का सबसे पुराने संचार सेवा प्रदाता ; ब्ैच्  है।  बीएसएनएल को वर्तमान में 72,34 लाख ; बेसिक तथा मोबाइल टेलीफोनी एक ग्राहक आधार है।   ३१ मार्च२००८ के अनुसार बी एस एन एल ३१.५५ मिलियन बेतारए ४.५८ मिलियन की दी एम् ऐ .डब्लू एल एल और ३६. २१ मिलियन जी एस एम् मोबाइल ग्राहकों का नियंत्रण था। ३१ मार्च  २००७ को समाप्त हुए वित्तीय साल में बी एस एन एल की कमाई ३९७.१५ बिलियन रुपये ;९.६७ बी  थी। आज बी एस एन एल भारत का सबसे बड़ा टेल्को और और १०० बिलियन अमेरिकी डालर के अनुमान के साथ सबसे बड़े सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों में से एक है। 

बीएसएनएल द्वारा प्रदान की जा रही मुख्य सेवाएँ

बीएसएनएल लगभग हर दूरसंचार सेवा प्रदान करता है लेकिन निम्नलिखित मुख्य दूरसंचार सेवाओं में भूमिका है

१. विश्व व्यापी दूरसंचार सेवा  रूनियत वायरलाइन और की दी एम् ऐ तकनीक कहे जाने वाले बी फ़ोन और तरंग क्रमशः बेतार सेवाओं में स्थानीय लूप ; डब्ल्यूएलएल  बीएसएनएल नियत लाइन में प्रमुख प्रचालक है३१ दिसम्बर २००७ के अनुसार एबी एस एन एल का नियत लाइन में ८१: की बाजार हिस्सेदारी है

२. सेलुलर मोबाइल टेलीफोन सेवा  बी एस एन एल सेलुलर मोबाइल टेलीफोन सेवा को सेल वन  ब्रांड नाम के तहत जी एस एम् प्लेट फॉर्म के उन्तार्घट प्रदाता है बीएसएनएल के एक्सेल ख्2, को पूर्व भुगतान किया सेल्यूलर सेवा के रूप में जानते हैं३१ मार्च2007 के अनुसार बी एस एन एल के पास देश में मोबाइल टेलीफोन में १७: हिस्सा है

3 . इंटरनेट रू बी एस एन एल इन्टरनेट को डायल उप कनेक्शन के रूप में संचार नेट ;ैंदबींतदमजद को , प्री पेड़ के रूप में नेट वन को पोस्ट पेड़ और ऐ दी एस एल . ब्रोड बंद को प्रदान कर रहा है बीएसएनएल के पास भारत में लगभग ५०: बाजार शेयर है बीएसएनएल ने मौजूदा वित्तीय वर्ष में आक्रामक रोल्लौत की योजना बनाये है

4 . इंटेलिजेंट नेटवर्क ; आई एन  बीएसएनएल टेली वोटिंग की , टोल फ्री फोन ए फोन आदि प्रीमियम जैसी आई एन सेवाए प्रदान कर रहा है
​-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

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