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सोमवार, 21 जनवरी 2013

माजरा क्या है ?

नकद सब्सिडी योजना की असलियत


 इस योजना के लागू किये जाने के साथ सब्सिडी को घटाए जाने का काम पूरे देश पैमाने पर किया जाना है | यह जन - साधारण को प्रत्यक्ष रूप में सब्सिडी देना नही है , बल्कि उसके सब्सिडी में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में कटौती करना है |
आर्थिक सुधारों के नए चरण के साथ आते रहे योजनाओं में इस समय नकद सब्सिडी योजना की खूब चर्चा है | हुकुमती व प्रचार माध्यमी क्षेत्र में योजना का आम तौर पर स्वागत समर्थन किया जा रहा है | विपक्षी पार्टियों द्वारा इसका कोई विरोध नही सुनाई पड़ रहा है | प्रचार माध्यमी हिस्सों द्वारा कुछ किन्तु -- परन्तु के साथ इस योजना को जनसाधारण के हित की योजना के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है |
अभी तक चलती रही सब्सिडी योजना में खाद्यान्न , उर्वरक , तथा मिटटी के तेल , रसोई गैस , डीजल आदि के बाजार मूल्य का एक हिस्सा सरकार द्वारा सब्सिडी के रूप में दिया जाता रहा है | इसलिए उपभोक्ताओं को ये माल सामान खुले बाजार से कम मूल्य पर मिलते रहे है | अब इस योजना के जरिये सरकार ने यह निर्णय लिया है कि सबसे पहले ( किरोसिन व रसोई गैस ) उर्वरक और खाद्यान्न पर दी जाती रही सब्सिडी को अब उसके आपूर्तिकर्ता संस्थानों को देने की जगह सीधे -- सीधे उपभोक्ताओं को दिया जाएगा | साफ़ बात है कि बाजार में उपभोक्ता को अब इन मालो का बाजार दाम चुकाना पडेगा | पर उसे अब तक मिलती रही सब्सिडी की रकम नई योजना के तहत सरकारी खजाने से उसके खाते में पहुंच जायेगी | उदाहरण , अभी तक 49.10 रूपये प्रति लीटर दाम वाला मिटटी का तेल उसे कंट्रोल रेट पर 15.25  रूपये प्रति लीटर में मिल जाता था | अब उसे कंट्रोल की दूकान पर भी मिटटी का तेल 49.10 रूपये प्रति लीटर खरीदना पडेगा | सब्सिडी की रकम उसको नकद रूप में अपने बैंक एकाउन्ट के जरिये मिल जायेगी | इस नई और नकद सब्सिडी योजना के समर्थन में चलाए जा रहे प्रचारों में यह कहा जा रहा है कि इससे सब्सिडी की रकम को बिचौलिया द्वारा खा जाने का भ्रष्टाचार रुकेगा | इस नई और नकद सब्सिडी योजना को उपभोक्ताओ तक पहुँचने के लिए दो नए चीजो की जरूरत है | एक तो सब्सिडी पाने योग्य होने के प्रमाण -- पत्र '' की जिसे '' आधार पत्र '' का नाम दिया गया है | दूसरी जरूरत है आधार पत्र धारको द्वारा निकटवर्ती बैंक में खाता खुलवाने की | कयोकी सरकारी खजाने से उसके इसी खाते में सब्सिडी की रकम पहुंचनी है | यह भी कहा जा रहा है कि देर सवेर अन्य योजनाओ  ''उदाहरण ''-- छात्रवृति जैसी योजनाओं को भी नकद सब्सिडी योजना के तहत ला दिया जाएगा | अभी इस योजना को प्रयोगिक तौर पर राजस्थान के अलवर जिले में मिटटी के तेल पर नकद सब्सिडी योजना के रूप में तथा मैसूर में कुकिंग गैस पर नकद सब्सिडी योजना के रूप में आरम्भ किया गया है | सूचना यह है कि 1 जनवरी 2013 से देश के 51 जिलो में नकद सब्सिडी योजना लागू कर दी जायेगी और अप्रैल 2014 तक इसे पूरे देश में लागू कर दिया जाएगा | जनवरी 2013 में सार्वजनिक सेवा के 29 कार्यक्रमों को नकद सब्सिडी योजना में शामिल किया जाएगा और बाद में सार्वजनिक सेवा के लिए चलाई जा रही 42 योजनाओं को इसके अंतर्गत लाया जाएगा |
सूचना यह भी दी गयी है कि इस योजना के चलते सरकारी खजाने पर अब तक पड़ रहा एक लाख नब्बे हजार करोड़ रूपये की सब्सिडी बढ़कर कुल चार लाख करोड़ रूपये प्रति वर्ष हो जाएगी | आगे बढने से पहले एक दिलचस्प मामला सुन ले | अभी तक खासकर पिछले 15 सालो से आती रही सरकारे , उनके वित्त मंत्रीगण जाने -- माने अर्थशास्त्री व आर्थिक सलाहकार सरकारी खजाने पर बढती सब्सिडी का रोना रोते रहे है उसे घटाने  की सलाह देने के साथ इसके उपाय भी बताते रहे है | इन्ही सुझावों और उपायों के तहत जनसाधारण को खाद , बीज , सिंचाई , बिजली , पेट्रोल , डीजल , गैस  तथा शिक्षा , चिकित्सा आदि क्षेत्रो में मिलती रही सब्सिडी को विभिन्न रूपों में काटा --  घटाया भी जाता रहा है | खासकर पिछले 15 सालो से |
लेकिन अब नकद सब्सिडी योजना के अंतर्गत सब्सिडी की कुल रकम घटने की जगह बढाने के समाचार आने के वावजूद इस पर कही कोई चिंता चर्चा सुनाई नही पड़ी | न ही इस योजना की कोई आलचना ही हुई | उल्टे इसका स्वागत समर्थन किया जा रहा है | लेकिन क्यों ? माजरा क्या है ? क्या सत्ता सरकारों उनके वित्त मंत्रियों सलाहकार बने उच्च स्तरीय अर्थशास्त्रियो का मन बदल गया है ? नही ! ऐसा कुछ नही हुआ है | उनका मन सब्सिडी घटाने का ही बना हुआ है | उसी के प्रयास स्वरूप ही यह नकद सब्सिडी योजना लागू भी की जा रही है | लेकिन एक लाख चौरासी हजार करोड़ की सब्सिडी  के चार लाख करोड़ तक पहुंचने से यह संभव कैसे होगा ?
पहली बात तो 2012 -- 13 में 1 लाख 84 की दी गयी सब्सिडी मुख्यत: खाद्यान्न , उर्वरक , और तेल पेट्रोल व गैस पर दी जाने वाली सब्सिडी की रकम है | यह सब्सिडी लगातार घटाई गयी है | खासकर डाई जैसे उर्वरको पर और पेट्रोल पर तो उसे 2010 -- 11 से ही घटाया जा रहा है | जहा तक सब्सिडी की संभावित रकम 4 लाख करोड़ पहुंचने का मामला है तो अब उसमे केन्द्रीय बजट के जरिये सामाजिक सेवाओं के विभिन्न क्षेत्रो में ( उदाहरण छात्रवृति व आम बीमा योजना आदि रूपों में ) खर्च किये जाते रहे रकम को भी प्रत्यक्ष सब्सिडी योजना के नाम पर जोड़ दिया गया है | हालाकि स्पष्ट तौर पर इसकी सूचना नही दी गयी है लेकिन यह सूचना तो दी ही गयी है कि अब नकद सब्सिडी योजना के तहत सरकार द्वारा चलाई जा रही 42 योजनाओं के लिए दिए जाने वाला सरकारी धन शामिल कर लिया गया है | साफ़ बात है कि यह सब्सिडी की रकम को बढाना नही है , अपितु उसे बढा दिखा कर सब्सिडी के हकदार जनसाधारण को धोखा देना है | जबकि वास्तविक स्थिति प्रचारों के एकदम विपरीत  है | इसे आप बतौर सबूत देखे --
अलवर जिले के जिलाधिकारी का ब्यान 8 दिसम्बर के हिन्दी दैनिक बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित हुआ है | उनका कहना है कि एक साल पहले इस क्षेत्र में मिटटी के तेल की बिक्री 84000 लीटर प्रति माह थी | लेकिन अब उसमे 70% की गिरावट आई है | वे खुश होकर गिरावट का कारण बताते है कि प्रत्यक्ष सब्सिडी योजना के चलते मिटटी के तेल की कालाबाजारी बंद हो गयी है |
इसके विपरीत अलवर के मिटटी के तेल के विक्रेताओ और खरीदारों का कहना है कि बड़ी संख्या में अब गरीब मिटटी का तेल नही खरीद पा रहे है | कयोकी अब उन्हें तुरंत खरीद के लिए कंट्रोल रेट 15.25 रूपये देने की जगह 49.10 रूपये  देना पड़ रहा है | बहुतेरे लोगो के खाते में सब्सिडी का पैसा अभी आया ही नही है | जबकि सब्सिडी की रकम उनके खातो में पहले ही पहुंचाया जाना तय  किया गया था | इसके अलावा बहुत से लोगो के खाते में 3 माह पहले सब्सिडी की रकम एक बार के लिए तो आई पर दुबारा नही आई , कब आएगी इसका कोई पता नही | फिर जिले के कई गाँवों के आस -- पास कोई बैंक नही है | उदाहरण -- कोट -- कासिम गाँव के कई पूर्वे नजदीकी बैंक से 17 किलोमीटर दूर है | वह के निवासियों के लिए और आम तौर पर दिहाड़ी मजदूरों के लिए बैंक में सब्सिडी के रूप में आये धन का पता लगाना और पाना कत्तई आसान नही है | उसके लिए उन्हें एक दिन या कई दिन का काम या दिहाड़ी छोड़ना पडेगा | अलवर जिले का कोटेदार भी 49.10 रु के रेट से मिटटी के तेल की उठान करने में अपने को असमर्थ बता रहे है | तमाम प्रशासनिक दबावों के वावजूद निर्धारित कोटे से कही कम उठान हो रहे है | कयोकी अब उन्हें भी मिटटी के तेल का मूल्य बगैर सब्सिडी के ही चुकाना पड़ रहा है | वह पहले के मूल्य से तीन गुना से भी ज्यादा है |
दरअसल अलवर जिले में मिटटी के तेल में गिरावट के ये उपरोक्त कारण ही असली व प्रमुख कारण है |
निश्चित रूप से बढे मूल्य के साथ काला बाजारी में भी कमी जरुर आई होगी , लेकिन मुख्य गिरावट उसकी खरीद बिक्री में भारी गिरावट आने के चलते हुई है | कयोंकि  यह स्वाभाविक बात है कि जब उसकी खरीद बिक्री में कमी और वह भी भारी कमी आ जायेगी तो उस पर दी जाने वाली सब्सिडी की मात्रा भी घट जायेगी या घटा दी जायेगी | अलवर में मिटटी के तेल की बिक्री पर दी जाने वाली सब्सिडी में भारी कमी जरुर आई होगी |
स्वाभाविक बात है कि जो स्थिति राजस्थान के अलवर की है उसी का परिलक्षण नकद सब्सिडी योजना के तहत देश के पैमाने पर दिखाई पड़ना है | इस योजना के लागू किये जाने के साथ सब्सिडी को घटाए जाने का काम पूरे देश के पैमाने पर किया जाना है | यह जनसाधारण को प्रत्यक्ष रूप से सब्सिडी देना नही है बल्कि उसके सब्सिडी में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में कटौती करना है |
यह सरकार और देश के धनाढ्य वर्ग की सोची समझी एक चाल है |



-सुनील  दत्ता  
पत्रकार

गुरुवार, 24 मई 2012

पाकिस्तान में पेट्रोल के दाम घटाने की बात है।




संप्रग सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल की तीसरी वर्षगांठ पूरे होते ही मंहगाई की मार झेल रही जनता को जोरदार झटका देते हुए पेट्रोल के भाव 7.50 पैसे प्रति लीटर बढ़ा दिए। लेकिन अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या सरकार तेल कंपनियों को फायदा पहुंचाने के नाम पर जनता को लूट रही है या तेल कंपनियों ने अपने फायदे के लिए सरकार को गुमराह किया है...

गौरतलब है कि एक ही झटके में की जाने वाली यह अब तक की सबसे बड़ी वृद्धि है। सरकार का कहना है कि डॉलर के मुकाबले रुपए की विनिमय दर में भारी गिरावट और तेल कंपनियों को हो रहे भारी नुकसान को देखते हुए यह वृद्धि जरूरी हो गई थी। जहां प्रणब मुखर्जी ने इस मामले से पल्ला झाड़ते हुए इसका ठीकरा तेल कंपनियों के सिर मढ़ा है वहीं संप्रग सरकार के सहयोगी दलों ने इस वृद्धि पर नाराजगी जताते हुए इसे वापस लेने की मांग की है।

मुसीबत यहीं खत्म नहीं होती है, पेट्रोल के साथ ही सरकार ने एलपीजी, केरोसिन और डीजल के दाम में भी इजाफे की तैयारी ली है। सरकारी सूत्रों के अनुसार एलपीजी के दाम में लगभग 100 रुपए (प्रति सिलेंडर), केरोसिन व डीजल के दाम में 5-7 रुपए प्रति लीटर की बढोत्तरी करने का प्रस्ताव है।

इस समय एलपीजी पर सरकार को प्रति घरेलू सिलेंडर पर लगभग 479 रुपए का घाटा होता है। वहीं, केरोसिन की बिक्री पर सरकार को प्रति लीटर 31.41 रुपए और डीजल की बिक्री पर 13.64 रुपए प्रति लीटर का घाटा हो रहा है।

लेकिन हैरानी की बात यह है कि 2011 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक प्रमुख तेल उत्पादन कंपनियों जैसे आईओसी को टैक्स भरने के बाद भी 7445 करोड़, एचपीसीएल को 1539 करोड़ और बीपीसीएल को 1547 करोड़ रु. मुनाफा हुआ। इस तरह से देखा जाए तो तेल कंपनियों का घाटा होने का दावा झूठा सिद्ध होता है; साथ ही सरकार डीजल, गैस और केरोसीन पर सब्सिडी देती है तो इन पर घाटे की बात में भी दम नहीं लगता।

पिछले 2 सालों में सरकार और कंपनियों ने मिलकर महंगे क्रूड ऑयल की दुहाई देते हुए पेट्रोल के दाम 14 बार बढ़ाए हैं। सरकार द्वारा 26 जून 2010 को पेट्रोल नियंत्रण मुक्त किया था। तब तेल कंपनियों ने कहा था कि कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों को ध्यान में रखकर देश में पेट्रोल के दाम तय होंगे।

लेकिन सच यह है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड का दाम 124 डॉलर प्रति बैरल था, तब भी तेल कंपनियां घाटा बता रही थीं, आज क्रूड का भाव 91.47 तब भी घाटा हो रहा है।

सबसे हैरानी की बात है कि पड़ोसी देश जैसे पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन में मुद्रा के डॉलर के मुकाबले टूटने पर भी सिर्फ एक या दो बार ही पेट्रोल के दाम बढ़े। आर्थिक रूप से जर्जर हो चुके पाकिस्तान में तो अभी पेट्रोल के दाम घटाने की बात हो रही है।
एजेंसी/वेबदुनिया न्यूज

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

रुकिए जरा सोचिए


इंसान को व देश को पंगु, बीमार और कंगाल बनाती मोटरवाहन क्रांति:
साईकिल ही इक्कीसवीं सदी का आदर्श वाहन हो सकती है।
दोस्तों,
पिछले दिनों पेट्रोल की कीमत में 3 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोत्तरी हो गई। डीजल की कीमत भी बढ़ने वाली है। कुछ महीने पहले जब से सरकार ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों को नियंत्रण-मुक्त करने का फैसला किया, तब से छः बार उनके दाम बढ़ गए हैं। पहले से महंगाई की मार से जूझती जनता पर यह बड़ा अत्याचार है। सरकारों ने पेट्रोल-डीजल पर भारी टैक्स लगा रख है। यदि उसे कम कर दिया जाए तो राहत मिल सकती है।
लेकिन इस संकट से राहत पाने के लिए हम भी कुछ कर सकते हैं, यदि कुछ नए और रचनात्मक तरीके से हम सोचना शुरु करें। यदि थोड़ा विचार करेंगें तो हम पाएंगे कि कई काम पहले हम पैदल या साईकिल से जाकर कर लेते थे, अब
मोटरसाईकिल या कार से करते हैं। क्या यह गैर-जरुरी नहीं है ? जरुरी लग सकता हैं क्योंकि उनकी आदत पड़ गई है। क्या यह आदत हमारे लिए, हमारे नगर के लिए, समाज के लिए और देश के लिए अच्छी है ? पिछले दिनों देश में मोटर-वाहनों की जो बाढ़ आई है, एक तरह की मोटरवाहन क्रांति आई है, जिसमें हम भी बिना सोचे-विचारे बह गए हैं, क्या वह स्वागत-योग्य है ? इसके कारण जो संकट पैदा हो रहे हैं, क्या हमने उन पर सोचा है ?
आइए, विचार करें -
आइए, हम कुछ बातों पर विचार करते हैं:-
1. मोटरवाहनों में प्रयोग होने वाला पेट्रोल/डीजल देश के बाहर से आयात करना पड़ता है, जिससे देश का धन बाहर जाता है। यदि हम पैदल या साईकिल से चलते हैं, तो कोई ईंधन खर्च नहीं होता।
2. मोटरवाहनों को बनाने वाली ज्यादातर कंपनियां विदेशी है या फिर विदेशी कंपनियों की भागीदारी है। तकनालाॅजी व पुर्जों का भी आयात होता है। विदेशी कंपनियों के मुनाफे व रायल्टी के रुप में भी देश का काफी पैसा बाहर जाता है। दूसरी तरफ, साईकिलें बनाने वाली करीब सारी कंपनियां भारतीय है।
3. मोटरवाहन गाड़ियां बड़े-बड़े कारखानों में बनती है, जो पूरे मशीनीकृत और स्वचालित होते हैं। इनमें बहुत कम रोजगार मिलता है। जबकि साईकिलें व उनके पुर्जें ज्यादातर लघु उद्योगों में बनते हैं, जिनसे ज्यादा रोजगार पैदा होता है।
4. औद्योगीकरण के नाम पर मोटरवाहन कंपनियों को सरकार कई कर-रियायतें, अनुदान, सस्ती जमीन दे रही है। सिंगूर जैसे संघर्ष भी इसके कारण पैदा हो रहे हैं।
5. मोटरवाहनों से हमारी सड़को पर भीड़ बढ़ती जा रही है और पैदल चलने की जगह भी नहीं बची है। टेªफिक जाम होने लगे हैं। बड़े शहरों में पार्किंग की समस्या भी भयानक हो गई है।
6. इन मोटरगाड़ियों के लिए शहरों में सड़कों को चैड़ा किया जा रहा है। उसके लिए अतिक्रमण हटाने के नाम पर गरीब हाथठेले वालों, गुमठी वालों, छोटे दुकानदारों को हटाया जा रहा है और उनकी रोजी-रोटी छीनी जा रही है। कई जगह घरों को भी तोड़ा जा रहा है। इसी तरह राजमार्गों को चार लेन-छः लेन बनाने, बायपास और एक्सप्रेस मार्ग बनाने में भारी मात्रा में किसानों को उजाड़ा जा रहा है तथा खेती की जमीन छीनी जा रही है। यदि इसी तरह बड़े पैमाने पर खेतों को खतम किया जाता रहा तो, देश में अन्न संकट पैदा हो सकता है।
7. इन्हीं मोटरगाड़ियों के लिए एक्सप्रेसवे, हाईवे, बायपास, फ्लाईओवर, नए पुल, पार्किंग स्थल आदि बनाने में इस गरीब देश का अरबों-खरबों रुपया बरबाद हो रहा है। यदि इतनी गाड़ियां नहीं होती, तो पुरानी सड़कों और पुराने पुलों से भी काम चल सकता था। इनके कारण सड़कों की मरम्मत पर भी ज्यादा खर्च करना पड़ता है।
8. यह मत सोचिए कि मोटरगाड़ियों की संख्या में यह विस्फोट आबादी में वृद्धि के कारण हो रहा है। भारत की आबादी तो केवल दो-ढाई फीसदी की दर से बढ़ रही है, किन्तु गाड़ियों (खास तौर पर कारों व मोटरसाईकिलों) की तादाद हर साल 20-25 प्रतिशत बढ़ रही है। बसों और ट्रकों की संख्या तो ठीक है (उसमें भी कुछ गैर जरुरी परिवहन हो सकता है) किन्तु एक कार सिर्फ एक या दो आदमी को ले जाती है और जगह काफी घेरती है। यह आबादी विस्फोट नहीं, ‘कार विस्फोट’ है, जो मुसीबत पैदा कर रहा है।
9. मोटरवाहनों के कारण सड़कों पर दुर्घटनाएं भी बढ़ती जा रही हैं। हमारे राजमार्ग मौत के राजमार्ग बनते जा रहे हैं।
10. मोटरगाड़ियों के धुएं से हवा जहरीली होती जा रही है। दुनिया के पर्यावरण को बिगाड़ने, जलवायु परिवर्तन और धरती के गरम होने में मोटरगाड़ियों का भी योगदान है। इसी तरह शोर भी बढ़ता जा रहा है। ऐसी ही हालत रही तो लोग जल्दी ऊंचा सुनने लगेंगें और बहरापन बढ़ेगा।
11. पैदल या साईकिल से चलने पर शरीर की कसरत होती है। गाड़ियों से चलने से मोटापा,हृदयरोग, रक्तचाप, मधुमेह, कब्ज, बवासीर जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं। अपना शरीर ठीक रखने के लिए हमंे अलग से जिम, योगासन, भ्रमण, दवाईयों का सहारा लेना पड़ रहा है। यदि पैदल या साईकिल से चलते तो शायद इनकी जरुरत ही नहीं पड़ती (या कम पड़ती)।
12. पृथ्वी पर जितने भी चैपाये हैं, उनमें सिर्फ इंसान ने ही पिछले पैरों पर खड़े होकर चलना सीखा है (चिम्पांजी और कंगारु जरुर दो अपवाद है)। इंसान ने लाखों सालों में यह महारत हासिल की है। यदि गाड़ियों का ऐसा प्रचलन बढ़ता गया, तो कहीं वह पैदल चलना भूल तो नहीं जाएगा ? इतिहास में बड़े-बड़े काम पैदल चलकर ही हुए है। गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, ईसामसीह, शंकराचार्य और गुरुनानक ने पैदल घूम-घूम कर ही अपना संदेश फैलाया है। व्हेनसांग, फाह्यान और मार्को पोलो ने पैदल ही दुनिया की दूरियां नापी थी।
13. महंगी कारों और मोटरसाईकिलों ने इस देश में विलासिता और शान-शौकत की भोगवादी संस्कृति को बढ़ावा दिया है तथा अमीर-गरीब की खाई को बढ़ाया है। दुनिया में कभी भी सबके पास कार नहीं हो सकती है, लेकिन साईकिल हो सकती है। इक्कीसवीं सदी का आदर्श वाहन साईकिल ही हो सकता है।
14. दुनिया के अमीर देशों में भी साईकिलों का प्रचलन और लोकप्रियता बढ़ रही है। वहां के रास्तों पर पैदल व साईकिलों के लिए अलग लेन बनाई जाती है। डेनमार्क की सड़कों पर अब मोटर गाड़ियों से ज्यादा साईकिलें दिखाई देती हैं। फ्रांस में प्रतिवर्ष पूरे देश का चक्कर लगाने वाली एक अंतरराष्ट्रीय साईकिल दौड़ आयोजित होती है, जिसे देखने के लिए लाखों लोग जुटते हंै। इस का नाम ‘टूर डी फ्रांस’ है। पेरिस मंे नगर निगम ने किराये पर देने के लिए 20 हजार साईकिलों की एक जोरदार व्यवस्था की है, जिन्हें 1639 केन्द्रों से कहीं से भी उठा सकते हैं और कहीं भी जमा कर सकते हैं। इसका नाम है ‘वेलिब’ यानी साईकिल की आजादी। यूरोप, अमरीका, कनाडा, आस्टेªलिया आदि में कई नगरों में ऐसी योजनाएं शुरु हुई हैं और ऐसी साईकिल दौड़ें भी लोकप्रिय हो रही है। क्या हम उनसे सीखेंगे ?
हम क्या कर सकते हैं ?
1. कार-मोटर साईकिल की जगह पैदल व साईकिल पर चलना शुरु करें। लंबी दूरी के लिए सार्वजनिक वाहनों (बस, रेलगाड़ी, रिक्शा, टैक्सी आदि) का इस्तेमाल करें।
2. अपने नगर व इलाके में साईकिल का प्रचार करें। साईकिल-दौड़ें व साईकिल-रैलियां आयोजित करें। ‘साईकिल क्लब’ का गठन करें। जीवन भर साईकिल चलाने वाले बुर्जुगों को सम्मानित करें।
3. मोटरवाहन उद्योग को सरकार द्वारा दिए जा रही रियायतों, अनुदान व प्रोत्साहन का विरोध करें। सरकार की परिवहन नीति बदलने के लिए जनमत बनाएं।
4. शहरों के व्यस्त बाजारों और भीड़ वाले इलाकों को ‘वाहन-मुक्त जोन’ बनाने के लिए अभियान चलाएं। सड़कों पर पैदल व साईकिलों के लिए अलग लेन बनाने की मांग करें।
5. बच्चों द्वारा वाहन चलाने पर पूरी तरह रोक लगे और सही प्रशिक्षण व जांच के बगैर किसी को ड्राइविंग लाईसेन्स न दिया जाए, इस दिशा में कोशिश करें।

सुनील
मोबाईल 09425040452
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