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मंगलवार, 17 नवंबर 2015

आधुनिक कसाई कौन ? चेहरा पहचानने की ज़रुरत है

अपने बच्चों को IS की जद में जाने से बचाएं मुस्लिम: ओबामा , यह बयान अमेरिकी राष्ट्रपति का नितांत गलत है और यूज एंड थ्रो की नीति का परिचायक है और जब अमेरिका या साम्राज्यवादी मुल्क इस्तेमाल करने के बाद फेंकते हैं तो फेंकने के बाद वह चीज जब ज़ख्म देती है और फिर सेप्टिक बनकर उनके जिस्म निर्जीव बनाने लगती है तो वह तरह-तरह के सिद्धांत गढ़ने लगते हैं. कौन नहीं जनता है कि पश्चिमी देशों के दलाल बगदादी से पेट्रोलियम पदार्थ फ़ोकट दामों में खरीदते थे और फिर इन्ही देशों को बेच देते थे हथियारों की सप्लाई पेट्रोलियम पदार्थों के बदले में अमेरिकी व उसके मित्र देश कर रहे थे यही हालत अफगानिस्तान के सम्बन्ध में लादेन के साथ थे. अब वह चिल्ला रहे हैं कि मुस्लिम अपने बच्चों को आईएस की ज़द में जाने से बचाएँ. बगदादी को किसने पैदा किया था, लादेन को किसने पैदा किया था. इसका जवाब न ओबामा के पास है और न ही फ्रांस के राष्ट्रपति ओलंदे के पास है. यही लोग बगदादी के मेली-मददगार हैं और जब रूस ने बगदादी के ऊपर  बम्बार्ड करना शुरू किया तो यह लोग बगदादी का साथ छोड़ कर भाग खड़े हुए जिसकी प्रतिक्रिया स्वरूप बेरोजगार आतंकी पूरी दुनिया में मानवता के खिलाफ हमले करना शुरू कर दिया लेकिन अगर देखा जाए तो असली मानवता के दुश्मन कौन हैं तो मालूम चलेगा कि ओबामा और ओलंदे ही हैं. इस्लाम का चेहरा अगर शैतान के रूप में तब्दील किया है तो इन्ही साम्राज्यवादी देशों ने अपने नौकरों के माध्यम से किया है. इस्लाम तो शांति, करुणा और दया का दर्शन है. उसके पैगम्बर मोहम्मद साहब के ऊपर एक बुढ़िया रोज कूड़ा फेंकती थी और जब एक दिन उसने कूड़ा नहीं फेंका उनके ऊपर तो वह उसके घर जाकर मालूम करने गए थे. उस दर्शन का खौफनाक चेहरा मुनाफाखोर साम्राज्यवादी मुल्कों ने बदल दिया. इन साम्राज्यवादी देशों  की नकाब उतारते हुए रूस के राष्ट्रपति पुतिन का दावा महत्वपूर्ण है. उसने इनका मुखौटा उतार कर फेंक दिया है.
                               जिसका सबूत यह है कि आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट के पेरिस पर हुए हमले को लेकर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि आतंकी संगठन आईएस को कुछ देशों से पैसा पहुंच रहा है, जिसमें जी-20 से जुड़े देश भी शामिल हैं। उन्होंने दावा किया कि आईएस को फंडिंग करने की इस लिस्ट में कुल 40 देशों का नाम है। जिन देशों से पैसा पहुंच रहा है, उसे लेकर पुतिन ने खुफिया जानकारियां भी साझा कीं। पुतिन ने साथ ही कहा कि आईएस तेल का गैरकानूनी कारोबार करता है। इसे भी खत्म करने की जरूरत है।
 पेरिस हमले के बाद सीरिया के ऊपर आतंकवाद समाप्त करने के नाम पर जो साम्राज्यवादी मुल्क बम्बार्ड कर रहे हैं. क्या उनसे फूल झर रहे हैं. इन लोगों के हथियारों की प्रयोगशाला अफगानिस्तान, सीरिया, लीबिया है और यहाँ ये हथियारों का प्रयोग कर दुनिया के अन्दर अपने हथियार बेचने का सौदा करते हैं. युद्ध इनका जीवन है. शांति इनकी मौत है अगर यह जरा सा भी मानवतावादी हैं तो इनको चाहिए की अविलम्ब अपनी हथियार इंडस्ट्री को बंद करें. पूरी दुनिया में आतंकवादियों को हथियार सप्लाई करने का काम कौन कर रहा है यही सब अपने मुनाफे के लिए विभिन्न देशों को गुलाम बनाने का काम कौन कर रहा है, यही मुल्क. अमेरिका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक वहां के मूल निवासियों को समाप्त करने का काम इन्ही साम्राज्यवादी ताकतों ने किया है. यह चाहते हैं कि दुनिया के अन्दर विभिन्न नस्लों के लोग, विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं इनको समाप्त किया जाए इसलिए समय समय पर विभिन्न सिद्धांत गढ़ते रहते हैं. कभी सभ्यताओं का युद्ध, कभी भाषा का युद्ध, कभी धर्म का युद्ध. युद्ध में मरता कौन है, इंसान और मुनाफा, लूट और खसोट कौन करता है यह सब.
हम ! कुछ नहीं कहते













सुमन 

शनिवार, 14 नवंबर 2015

आतंक :अमेरिका की दोहरी नीतियों का परिणाम

सोवियत यूनियन के खिलाफ अमेरिका ने पाकिस्तान के उन क्षेत्रों को जो अफगानिस्तान से मिले हुए थे वहां पर मदरसों के माध्यम से तालिबान को पूरी तरीके से पोषित कर सोवियत संघ को अफगानिस्तान में नीचा दिखाया था. अमेरिकी मदद के बाद तालिबान का वृक्ष वटवृक्ष का रूप धारण कर लिया और जब अमेरिका के खिलाफ कुछ क्षेत्रों में उसने लड़ाईयां लड़ी तो अमेरिका ने आतंकवाद समाप्त करने का नारा दिया. ईराक में अमेरिका ने सद्दाम हुसैन की सरकार को नष्ट कर दिया और वहां की जनता को कोई व्यवस्था नहीं दी. इसी तरह इराक के अगल-बगल के देशों में अमेरिका ने उन सरकारों को नष्ट करने के लिए तमाम सारे आतंकी संगठनो को मदद करके एक शैतान का साम्राज्य स्थापित कर दिया.  
ईराक की अव्यवस्था के बाद आई एस आई एस का उभार सामने आता है और सीरिया में असद की सरकार को नष्ट करने के लिए उसकी मदद पश्चिमी देशों ने की थी . आई एस आई एस का नेता अबु बक्र अल-बगदादी 2003 में इराक में अमेरिकी घुसपैठ के बाद बागी गुटों के साथ अमेरिकी फौज से लड़ा था। वह पकड़ा भी गया और 2005-09 के दौरान उसे दक्षिणी इराक में अमेरिका के बनाए जेल कैंप बुका में रखा गया था। और 2010 में इराक के अलकायदा का नेता बन गया। कहा यह जाता है कि बगदादी को अमेरिकी जेलों में ट्रेनिंग देकर छोड़ा गया था कि सीरिया जैसे मुल्कों को वह अपने कब्जे में ले लेगा. जो भी ताकत बगदादी के पास है वह ताकत अमेरिकी साम्राज्यवादी नीतियों के समर्थक देशों के बदौलत है. अब सवाल यह उठता है कि बगदादी के पास जो अत्याधुनिक हथियार हैं उनकी सप्लाई कौन से मुल्क कर रहे हैं और उसके बदले में सस्ता पेट्रोलियम पदार्थ कौन से मुल्क खरीद रहे हैं इन सवालों का पश्चिमी देश चुप्पी साध लेते हैं. 
आतंकियों को बेरोजगार नौजवानों  को  जिनके कोई रोजगार  नही है तो वह पैसो  के लिए   उनके हितसाधक  बन जाते है और धर्म  की गलत बयानी का नशा  पीकर  जन्नत   जाने की लालसा  में  वह सब कुछ करने को तैयार  हो जाते है तब वह धर्म की करुणा-दया -प्यार   को भूल जाते है अमरीकियों  ने तो धर्म  के शब्दों  के अर्थ  ही बदल डाले है
वही दिल्ली यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर  डॉक्टर सुधीर सिंह कहते हैं,कि “अफगानिस्तान की सेना बहुत हद तक तालिबान से या इस्लामिक स्टेट के आतंकियों से लड़ने में सक्षम है। ऐसे में जरूरत इस बात की भी है कि अफगानिस्तान की सेना को और मजबूत किया जाए। रूस-भारत और मध्य एशिया के देशों ने अच्छी पहल की है। भारत ने भी चार लड़ाकू हेलीकॉप्टर्स दिए हैं अफगानिस्तान की सेना को। अफगानिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी भारत आने वाले हैं। भारत-रूस ने बहुत सारे हथियार अफगानिस्तान की सेना को देने का फैसला किया है। ईरान भी इसमें सहयोग कर रहा है। अब अमेरिका वस्तुस्थिति को समझते हुए इसे मुद्दा न बनाए। सीरिया में भी असद के विरोध या समर्थन को भी अमेरिका को मुद्दा नहीं बनाते हुए सारा ध्यान इस्लामिक स्टेट के सफाई पर केंद्रित किया जाना चाहिए। इस लड़ाई का विस्तार इराक में भी होना चाहिए क्योंकि यहां भी इस्लामिक स्टेट का गढ़ है और इन आतंकियों के लिए देश की सीमाओं का कोई मतलब नहीं है। अभी तक लड़ाई सीरिया की सीमा के अंदर चल रही हैं। यही नहीं अमेरिका को यहां भी यह तय करना होगा कि वो इस्लामिक स्टेट के आतंकियों का सफाया करे ना की असद की सेना को नुकसान पहुंचाया जाए“। फ्रांस की राजधानी पेरिस में जो घटनाएं घटी हैं वह निंदनीय हैं, दुखद हैं लेकिन यह तय करना पड़ेगा कि दोहरी नीतियों के कारण बगदादी जैसे लोग विश्व समुदाय के लिए खतरा बन गए हैं लेकिन जब तक अमेरिका की दोहरी नीतियां बंद नहीं होती हैं और उसकी मुनाफाखोर नीतियां हमेशा आतंक और आतंकवादियों को जन्म देती रहेंगी. बगदादी का विनाश अगर पश्चिमी मुल्क चाहे तो उसके सस्ते पेट्रोल खरीद को बंद करके तथा इमानदारी से हथियार सप्लाई करने वाली चैन को ध्वस्त कर दे तो निश्चित रूप से इन आधुनिक शैतानो का विनाश हो सकता है. रूस ने लगातार हमले कर बगदादी की ताकत को लगभग समाप्त सा कर दिया है लेकिन पश्चिमी देशों की दोमुही नीतियों के कारण वह आज भी जिंदा है. आतंकवाद हमेशा निरीह जनता को मार डालने का ही काम करता है उसका कोई धर्म नहीं होता है. इंसान का लहू पीना उसकी फितरत है लेकिन राजनीति की जरूरतों के कारण आतंकवादी पैदा किये जाते हैं और जब वह पलट कर पैदा करने वालों को पीटने लगते हैं तब असली कष्ट का एहसास होता है वही हालत पेरिस घटना के बाद तमाम सारे साम्राज्यवादी लोगों को महसूस हो रहा है. हम सब मानवता पसंद लोग फ्रांस की जनता के साथ हैं. जनता को चाहिए कि अपने-अपने मुल्कों की सरकारों को बाध्य करे की वह आतंकवादियों की मदद अपनी राजनितिक आवश्यकताओं के लिए न करे.
 सुमन
लो क सं घ र्ष !

मंगलवार, 17 जुलाई 2012

रूमी की बांसुरी

हर साल गर्मियों में, फ्रांस और अन्य (अधिकांशतः फ्रेंच भाषाभाषी) देशों के लेखकों, कवियों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक अनौपचारिक सम्मेलन, फ्रांस के लियोन शहर में होता है। इस बैठक में मानवता के समक्ष उपस्थित विभिन्न मुद्दों पर शुक्रवार से रविवार तक तीन दिन का गहन संवाद होता है। इस संवाद का आयोजन जुलाई के पहले सप्ताह में किया जाता है। मुझे पिछले दो वर्षों से लगातार इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाता रहा परन्तु अपनी अन्य व्यस्तताओं के चलते मैं वहां नहीं जा सका। इस साल मुझे लियोन आने का निमंत्रण काफी पहले से दे दिया गया था और मैंने यह तय किया कि इस बार मैं वहां जरूर जाऊंगा।
फ्रांस और दुनिया के फ्रेंचभाषी हिस्सों के प्रमुख बुद्धिजीवियों, लेखकों और कवियों से मिलना और बातचीत करना सचमुच एक शानदार बौद्धिक अनुभव था। वहां उत्तरी अफ्रीका अर्थात अल्जीरिया, ट्यूनीशिया, मोरक्को, माली, मिस्त्र कई अन्य देशों के प्रतिनिधि मौजूद थे। इन देशों के जो नागरिक फ्रांस में रह रहे हैं, वे भी वहां थे। अधिकांश प्रतिभागी फ्रांस और फ्रेंचभाषी विश्व के जानेमाने व्यक्तित्व थे। कुछ प्रतिभागी ब्राजील से भी आए थे। मानवता के भविष्य के प्रति पूरी गंभीरता से चिंतित इन लोगों से विचारविनिमय सचमुच एक बहुत अच्छा अनुभव था।
लियोन एक मझौले आकार का शहर है। शहर के बीच से दो नदियां बहती हैं और इस कारण यह शहर लगभग एक टापू है। लियोन का इतिहास रोमन काल तक जाता है और आज भी वहां रोमन युग के अवशेष मौजूद हैं। शहर के ठीक बीच, 700 एकड़ में फैला एक बहुत बड़ा पार्क है। जिस होटल में मैं और कुछ अन्य प्रतिभागी ठहरे थे, उससे यह पार्क कुछ ही मिनटों के फासले पर था। लियोन की सुंदरता देखने लायक थी। सम्मेलन पूरी तरह अनौपचारिक था और इसका आयोजन इस पार्क में ही, विशालकाय पुराने पेड़ों की छाया तले किया गया था। इसे देखकर मुझे टैगोर के शांतिनिकेतन की याद गई। दिलचस्प बात यह है कि वहां टैगोर, पाब्लो नेरूदा उनके यूनिवर्सलिज्म भी चर्चा का विषय थे। एक सत्र में टैगोर और नेरूदा दोनों पर एक साथ चर्चा हुई।
प्रतिभागियों में से केवल मैं फ्रेंच नही जानता था। अन्य सभी धाराप्रवाह फ्रेंच बोल रहे थे परन्तु इससे कोई समस्या नहीं हुई। मेरी बातों का अनुवाद करने के लिए कई लोग तैयार थे। मैं 5 जुलाई की सुबह जब लियोन पहुँचा तो हवाई अड्डे पर मुझे लेने के लिए सिमोन कुनेगेल नामक महिला आईं हुईं थीं। मुझे लगा कि वे मात्र स्वयंसेवक हैं और मुझे होटल तक छोड़कर चली जावेंगीं।
परन्तु मैं गलत था और मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि सुश्री सिमोन के बारे में मेरा अंदाजा गलत निकला। वे धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलती थीं और मुंबई स्थित फ्रेंच राजनयिक मिशन में कई वर्षों तक पदस्थ रही थीं। वे कोलाबा में रहती थीं। भारत में अपनी पदस्थापना के दौरान उन्होंने कई भारतीय व्यंजन बनाना सीख लिया था। उन्होंने जोर देकर कहा कि मैं उनके घर आऊं ताकि वे मुझे भारतीय व्यंजन बनाकर खिला सकें। उनका कहना था कि इससे मुझे ऐसा लगेगा मानो मैं अपने घर पर ही हूं। मेरी यात्रा के पहले ही दिन उन्होंने मुझे पूरे लियोन शहर में घुमाया। शहर के पुराने हिस्से को देखकर मैं चकित रह गया। उसमें रोमन काल की खुशबू अब भी बाकी थी।
जब मैं सुश्री सिमोन के घर पहुँचा तब मेरे आश्चर्य का ठिकाना रहा। वहां दो अन्य मेहमान भी थे। एक थे मिस्त्र मूल के मोहम्मद, जो संगीतविज्ञानी हैं और अपने साथ ढेर सारी बांसुरियाँ लाये थे। उन्होंने बांसुरी बजाई भी और इससे मुझे केवल अपने देश भारत वरन मौलाना रूमी की "मथनवी रूमी" की भी याद आई। मथनवी का अर्थ होता है महाकाव्य। मौलाना रूमी की मथनवी, जो कि फारसी की कुरान कही जाती है, की शुरूआत में ही बांसुरी का जिक्र है। मौलाना रूमी कहते हैं कि बांसुरी के दिल में घाव (छेद) हैं और इनसे अपने ईश्वर से जुदा होने का उसका करूण क्रंदन निकलता है। मैने मोहम्मद को भगवान कृष्ण और उनकी बांसुरी के बारे में बताया और यह भी कि भगवान कृष्ण हमारे सूफी संतों के अत्यंत प्रिय थे। मोहम्मद की पत्नी जे़नब, जो कि जर्मन हैं, भी वहां थीं। वे भी अपने पति की तरह संगीतविज्ञानी हैं। मोहम्मद का बांसुरी वादन सचमुच मन को प्रसन्नता से भर देने वाला था। हमने उस दिन सुबह और शाम का खाना साथ ही खाया क्योंकि सिमोन का आग्रह था कि हम रात का भोजन भी उनके साथ लें। उन्होंने खाने में दाल पकाई थी जिसका स्वाद लगभग वैसा ही था जैसा हमारे देश में होता है। यद्यपि मैं सिमोन और उनके पति से पहली बार मिला था परन्तु जब मैंने उनसे विदा ली तो मुझे लगा कि मैं अपने बरसों पुराने दोस्तों से बिछुड़ रहा हूँ। यह मेरे लिये सम्मेलन की बहुत सुंदर शुरूआत थी।
दोपहर के भोजन के बाद वे मुझे फिर शहर में घुमाने ले गईं और मैने लियोन के कुछ अन्य हिस्से देखे। मेरे पास शहर देखने के लिए सिर्फ वही एक दिन था क्योंकि अगले तीन दिनों तक तो मैं संवाद में व्यस्त रहने वाला था। स्पष्टतः, एक दिन में हम लोगों के लिए सब कुछ देखना संभव नहीं था। हम लोग उस पहाड़ को भी नहीं देख पाये, जिसपर एक जमाने में लियोन के मजदूर रहते थे और वहीं से उन्होंने अन्याय के विरूद्ध अपना संघर्ष किया था। ऐसा कहा जाता है कि कार्ल मार्क्स ने भी उनसे प्रेरणा ली थी। मैं केवल उतना ही देख सका जितना कि एक दिन में संभव था। मैंने लियोन का सिनेमा पर केन्द्रित संग्रहालय भी देखा, किन्तु केवल बाहर से। ल्यूमियर ब्रदर्स लियोन के हैं और उनके घर को संग्रहालय बना दिया गया है।
संवाद के सत्र 6 जुलाई की सुबह से शुरू हुए। ये संवाद काफी अनौपचारिक थे। किसी विषय विशेष में रूचि रखने वाले लोग पेड़ों की शाखाओं या जमीन पर समूह बनाकर बैठ जाते और चर्चा शुरू कर देते। सभी संवाद केन्द्रित थे मानवता और आधुनिक दुनिया में उसे पेश रही समस्याओं पर। मैं जिस समूह के साथ बैठा, उसमें हालिया रिओ सम्मेलन, अन्यायपूर्ण वैश्विक आर्थिक व्यवस्था और अरब देशों में हुई क्रांति पर चर्चा हो रही थी।
मुझसे अरब क्रांति पर अपने विचार रखने के लिए कहा गया। मैंने बैंगलोर के फायर लाईज आश्रम के सिद्घार्थ की ओर नजर घुमाई। वे पेरिस में हैं और फ्रेंच भाषा का अच्छा ज्ञान रखते हैं। उन्होंने अपने आश्रम में भी इस तरह के संवादों का आयोजन किया था। मुझे सिद्घार्थ की मदद की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि मैं वहां चर्चा शुरू होने के कुछ समय बाद पहुँचा था और मुझे यह मालूम नही था कि बातचीत किस विषय पर हो रही है। सिद्घार्थ ने मुझे संक्षेप में पहले हुई चर्चा के बारे में बताया और यह कहा कि मैं अरब देशों में हुई प्रजातांत्रिक क्रांति के बारे में अपने विचार सामने रखूं।
मैने कहा कि अरब क्रांति मूलतः राजनैतिक थी कि सामाजिक और सांस्कृतिक। इस क्रांति का क्या भविष्य होगा, इसका अंदाजा लगा पाना मुश्किल है क्योंकि राजनीति केवल विचारधारा पर आधारित नहीं होती बल्कि कई अन्य कारक भी उसे प्रभावित करते हैं। यह क्रांति विशुद्ध रूप से राजनैतिक थी और उसमे कोई सामाजिक सांस्कृतिकधार्मिक मुद्दा शामिल नही था। अभी तो मिस्त्र और ट्यूनीशिया में धार्मिक पार्टियों ने जीत हासिल कर ली है और धर्मनिरपेक्ष दलों को केवल कुछ सीटों पर संतोष करना पड़ा है। परन्तु इससे निराश होने की जरूरत नही है क्योंकि जै़मूल अबिदिन और हुस्नी मुबारक दोनों ने धार्मिक ताकतों का दमन किया था। ये दोनों शासक अमेरिका के पिट्ठू माने जाते थे।
आशा की एक किरण यह है कि इखवानूल मुसलमीन और अनेहदादोनों ने लोगों से यह वायदा किया है कि धार्मिक मामलों में उनकी नीतियां मध्यमार्गी होंगी और वे देश को धार्मिक कट्टरता की ओर नहीं ले जायेंगे। आश्चर्यजनक रूप से, लीबिया में भी धार्मिक अतिवाद पर कबीलाई और पारिवारिक वफादारियां भारी पड़ीं। अरब देशों में धर्मनिरपेक्षता और आधुनिकता की जड़ें बहुत गहरी नही हैं और इनको वहां जमने में कुछ वक्त लगेगा। इन परिस्थितियों में मध्यमार्गी इस्लाम ही सबसे अच्छा विकल्प मालूम होता है। शहर के एक टीवी चैनल ने भी इसी मुद्दे पर मुझसे बातचीत की और मैंने वहां भी यही बातें कहीं।
दोपहर के सत्र में मुझसे "मानवता और सार्वभौमिक मूल्य" विषय पर बोलने के लिए कहा गया। जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूं इस सम्मेलन में औपचारिक भाषण नहीं हुए वरन यह एक तरह का गोलमेज विमर्श था जिसमें गोलमेज नहीं थी! इस सत्र का फोकस टैगोर पर था और मुझसे अपेक्षा थी कि मैं टैगोर पर कुछ बोलूं। यद्यपि मुझे केवल उन तक सीमित रहने की जरूरत नहीं थी। नि:संदेह, टैगोर एक महान कवि, लघुकथा लेखक, चित्रकार, संगीतकार और प्रतिभाशाली बुद्धिजीवी थे। उनकी संगीत रचनाओं को रबीन्द्र संगीत कहा जाता है और बांग्लादेश रेडियो से तक रोज इस संगीत का प्रसारण होता है।
टैगोर सार्वभौमिक मूल्यों में विश्वास रखते थे और अपनी रचनाओं के जरिए उन्होंने इन मूल्यों को बढ़ावा दिया। वे धार्मिक संकीर्णता से कोसों दूर थे। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक "गीतांजलि" जिस पर उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला, में वे पूछते हैं, "तुम भगवान को मंदिरों में क्यों ढूंढते हो। मुझे तो मई की तपती दुपहरी में सड़क किनारे पत्थर तोड़ते मजदूरों में भगवान दिखते हैं। उनमें समाए ईश्वर को तुम आसानी से देख सकते हो" यह थी उनकी गरीबों और वंचितों के प्रति सहानुभूति की भावना। यह था उनका मानव श्रम की गरिमा पर विश्वास।
टैगोर ने ही गांधीजी को "महात्मा" का दर्जा दिया था। महात्मा एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है महान आत्मा। टैगोर ने गांधी को महान आत्मा क्यों कहा? उन्होंने पाया कि गांधी उनके आदर्शों को उनसे भी कहीं अधिक प्रतिबिंबित करते हैं। गांधी के अहिंसा और मानव प्रेम के दर्शन ने हमारी दुनिया की कई विभूतियों को प्रेरणा दी। इनमें शामिल हैं मार्टिन लूथर किंग जूनियर जिन्होंने गांधी की राह पर चलकर अफ्रीकीअमेरिकियों के अधिकारों की लंबी लड़ाई लड़ी।
गांधीजी ने अपनी पुस्तक "हिन्द स्वराज" में लिखा है, "मैं ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ता हूं पर मैं अंग्रेजों से घृणा नहीं करता। अपने दुश्मन से बेशक लड़ो परंतु एक मानव के रूप में उससे घृणा मत करो। तुम जब किसी व्यक्ति से लड़ते हो, तब, दरअसल, तुम जो बुराईयां उसमें हैं, उनसे लड़ते हो कि उसकी मानवता से" गांधीजी ब्रिटिश श्रमिक वर्ग के परम हितैषी थे। गांधी का दर्शन गहरी आंतरिक आस्था पर आधारित था। ऐसी आस्था के बगैर आपके मुंह से ऐसे शब्द निकल ही नहीं सकते।
आज हममें से शायद ही किसी में अपने विचारों के प्रति इतनी आस्था और द्रढता हो। इसके बिना हम दुनिया को नहीं बदल सकते। गांधीजी ने संकुचित धार्मिक सोच और साम्प्रदायिकता के खिलाफ जीवन भर संघर्ष किया और अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों, को अपना मानने के कारण ही उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ी। मुसलमानों के प्रति उनके दृष्टिकोण से नाराज एक हिन्दू कट्टरवादी ने उन्हें गोली मार दी। जिस समय पूरे देश में मुसलमानों के प्रति गहरी घृणा का वातावरण हो, उनके गले काटने की प्रतिस्पर्धा चल रही हो, ऐसे समय उनके अधिकारों के लिए लड़ने का काम गांधी जैसे असाधारण रूप से साहसी और द्रण विचार वाले मनुष्य ही कर सकते थे। वे नि:संदेह महान थे।
मैंने नरेन्द्र मोदी के गुजरात की बात भी की जहां गांधी की धरती पर 2000 निर्दोष मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया गया। किसी से घृणा करना, उसे नुकसान पहुंचाना, उसे मार डालना बहुत आसान है। कठिन है किसी से प्रेम करना और मानवता की रक्षा के लिए दृ़ता से खड़े रहना। वहां मौजूद सभी लोगों को मेरी बातें बहुत मर्मस्पर्शी लगीं। दक्षिण अफ्रीका से आई एक महिला ने कहा कि गांधी नि:संदेह महान थे और उन्हें महात्मा कहने वाले टैगोर भी उतने ही महान थे।
आधुनिक दुनिया में हमें जरूरत है ऐसे लोगों की जो सभी को और विशेषकर अल्पसंख्यकों को खुले दिल से गले लगाएं। आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था हर देश में प्रवासियों की संख्या बढ़ रही है और राजनैतिक दमन भी बढ़ रहा है। इस कारण कई अलग-अलग तरह के अल्पसंख्यक समूह बन गए हैं। हमारी दुनिया को कई गांधी चाहिए।
दूसरे समूहों में अन्य विषयों पर चर्चा हुई जिनमें मुख्यतः समाज के हाशिए पर रहने वाले तबकों से जुड़े मुद्दे शामिल थे जैसे, शिक्षा व्यवस्था, सड़क पर रहने वाले बच्चों की समस्या, मीडिया और आर्थिक असमानताएं।
इस तरह के संवादों के आयोजन की जरूरत दुनिया के हर कोने में है। फ्रांस के एक एनजीओ ने इस सिलसिले में जो पहल की है वैसी ही पहल अन्य स्थानों पर भी की जानी चाहिए। इस एनजीओ के कार्यकर्ता अत्यंत उत्साही और मेहनती थे और उन्होंने बड़े अच्छे ढंग से सारी व्यवस्थाएं संभालीं। सबसे अच्छी बात यह थी कि पूरी चर्चा अनौपचारिक वातावरण में हुई। वहां किसी राजनेता या विशिष्ट व्यक्ति को आमंत्रित नहीं किया गया और ही कोई उद्घाटन या समापन सत्र हुआ। हर व्यक्ति अपनी बात रखने के लिए स्वतंत्र था। मैं सम्मेलन में महिलाओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति से भी बहुत प्रभावित हुआ। उन्होंने गंभीरता और बौद्धिकता से अपने विचार प्रतिभागियों के समक्ष रखे।

-डॉ. असगर अली इंजीनियर

रविवार, 20 मार्च 2011

रंगों की होली समाप्त-शांति के पुजारियों की खून की होली प्रारंभ

फ्रांस द्वारा लीबिया में खेली जा रही खून की होली का एक द्रश्य
भारत में बहुसंख्यक आबादी का रंगों का त्योहार होली। होली आपसी भाईचारे समाज में समृद्धि का प्रतीक है। भारतीय जनमानस एक दूसरे के ऊपर रंग गुलाल, अबीर लगा कर आपसी भाईचारे को मजबूत बनाता है। हमारे समाज में यह भी मान्यता है कि इस त्योहार में विरोधियों से भी बैर भाव समाप्त कर लेना चाहिए।
शांति के पुजारियों के महानायक अमेरिका और उसके पिछलग्गू फ्रांस इंग्लैंड ने शांति स्थापित करने के लिये लीबिया में टोमाहॉक मिसाइलें 112 रक्षा ठिकानो पर दागी हैं। वहीँ लीबिया ने फ्रांस के एक लड़ाकू विमान को मार गिराया है लेकिन फ्रांस ने उसका खंडन किया है। अमेरिकन साम्राज्यवादियों ने इसके पूर्व ईराक, अफगानिस्तान सहित पकिस्तान में भी शांति स्थापित कर रहे हैं। पाकिस्तान में ड्रोन हमलों में हजारो लोग मारे जा चुके हैं। शांति स्थापित नहीं हो पा रही है। मिस्र, ट्युनेसिया , बहरीन में अमेरिकन साम्राज्यवादी का पहले से कब्ज़ा है। उस परीक्षेत्र में लीबिया अमेरिकन साम्राज्यवाद का विरोध करता था। लीबिया को सबक सिखाने के लिये इन देशों ने पूर्व नियोजित कार्यक्रम के तहत पहले अलकायदा के माध्यम से अशांति फैलवायी। और जब पूर्वी लीबिया पर हथियारबंद विद्रोहियों का कब्ज़ा हो गया। लीबियाई सरकार ने विद्रोहियों से पुन: पूर्वी लीबिया को मुक्त करा लिया तो खिसियाये साम्राज्यवादी मुल्कों ने सैनिक कार्यवाई शुरू कर दी। साम्राज्यवादी हमलों में अब तक 50 लोग मारे जा चुके हैं व्यापक रूप से नुकसान हुआ है। इस युद्ध का मुख्य उद्देश्य लीबिया के तेल पर कब्ज़ा करना है। शांति लोकतंत्र न्याय विश्व बंधुत्व से इन शांति के पुजारियों का कोई लेना देना नहीं है। मानव रक्त से ही इनकी प्यास बुझती है। खून की होली खेलने का कार्य इन देशों का मुख्य शगल रहा है। हमारे देश को भी ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने जिस तरह से लूटा है उस इतिहास को पढ़ कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों ने भी हमारे देश के कुछ हिस्से को काफी अरसे तक गुलाम बनाये रखा था। शांति के नाम पर खून की होली जारी है। दुनिया का कोई भी मुल्क इस होली को रोकने में समर्थ नहीं है और ही किसी देश की संप्रभुता का कोई मतलब इन देशों की नजर में है। संयुक्त राष्ट्र संघ अपने निर्माण काल से ही इन देशो की कठपुतली रहा है और आज भी है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !
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