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बुधवार, 2 दिसंबर 2015

दिल्ली में प्रदूषित गंगा बहाने चले

वर्तमान सत्तारूढ़ दल चुनाव से पहले और चुनाव के बाद जिस तरह से रंग बदल रहा है. उससे यह साबित होता है कि नैतिकता आदर्श नाम की चीज उनके पास सार्वजानिक जीवन में नहीं है. एक तरफ तो कश्मीर के सवाल पर सीमा पर रोज गोला बारी हो रही है हिंदुवत्व वादी कवियों की सारी कविता और नेताओ का भाषण कश्मीर, पाकिस्तान और मुस्लिम तुष्टिकरण पर होती है. विशेषकर उत्तर भारत में इन्ही सवालों को लेकर नागपुर के लोग मतदाताओं को गोलबंद करते हैं. अभी बरखा दत्त की प्रकाशित पुस्तक ' दिस अनक्विट लैंड-स्टोरीज फ्रॉम इंडियाज फाल्ट लाइन्स ' में खुलासा किया गया है कि नेपाल में सार्क देशों की बैठक से अलग भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर मोदी व पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की एक घंटे की गुप्त बैठक हुई थी और सीमा पर बराबर गोलियां भी चलती रही हैं. दोनों नेताओं की पिछली मुलाक़ात रूस के उफ़ा में हुई थी, जिसके बाद एक साझा घोषणापत्र भी जारी किया गया था  और अब फ्रांस में हो रहे जलवायु सम्मलेन में भी नरेन्द्र मोदी व नवाज शरीफ की बातचीत होती है और हमारे प्रधानमंत्री मुंह पर हाथ लगा कर बात करते हैं. जिससे लोग ओठ देखकर अंदाजा न लगा ले की वह क्या कह रहे हैं. 
लोकतंत्र में जनता से छिपाकर कोई बात नहीं होती है. सारी बातें गोपनीय हो रही हैं. हमारे देश का पैसा अनावश्यक रूप से सीमा पर खर्च हो रहा है, जवान मर रहे हैं और नेतागण हाथ मिलाकर फोटो खिंचवा रहे हैं. हम पाकिस्तानी जनता के विरोधी नहीं हैं. भारत-पाक एकता होनी चाहिए. वोटों के लिए देशभक्ति और राष्ट्रभक्ति का फर्जी नाटक बंद होना चाहिए. भारत और पाकिस्तान का और अच्छा विकास तभी हो सकता है जब दोनों देशों के सम्बन्ध अच्छे हों लेकिन जमीनी स्तर पर नेतागण जनता की भावनाओं को भड़काकर एक छद्म युद्ध का वातावरण तैयार करते हैं. एक देशभक्ति, राष्ट्रभक्ति का नाटक शुरू होता है और फिर मारपीट, वार्ताओं का दौर शुरू होता है जिसकी कोई आवश्यकता नहीं होती है. वर्तमान सत्तारूढ़ दल के चुनावी भाषणों का विश्लेषण अगर किया जाए तो देशभक्त, राष्ट्रभक्त, पाकिस्तान विरोध व मुस्लिम तुष्टिकरण उनके केंद्रबिंदु थे. गाय को चुनाव का मुद्दा बनाकर एक धार्मिक उन्माद पैदा किया गया लेकिन सरकार में आने के बाद इस वर्ष अप्रैल से अगस्त के बीच 10 करोड़ 95 लाख रुपए की बीफ की चर्बी का निर्यात हुआ, जो पहले से 36 गुना अधिक है। इस तरह से यह लोग जो भी कहते हैं आचरण उसके विपरीत है. आप और हम मिलकर इस देश की एकता और अखंडता के लिए इन सांप्रदायिक उन्मादियों से दूर रहे और मिलजुलकर देश को आगे बढ़ने के लिए कार्य करें. इनकी हालत यह है कि 'अपना दिल दामन धो न सके, दिल्ली में गंगा बहाने चले'.
जिस तरह से देश के अन्दर गंगा प्रदूषित है उसी तरह इनके दिल और दिमाग प्रदूषित हैं. राष्ट्रपति प्रणव कुमार मुखर्जी ने सही कहा है कि विभाजनकारी विचारों को असल गंदगी है जो गलियों में नहीं, बल्कि हमारे दिमाग में और समाज को विभाजित करने वाले विचारों को दूर करने की अनिच्छा में है।
सुमन 

शनिवार, 14 नवंबर 2015

आतंक :अमेरिका की दोहरी नीतियों का परिणाम

सोवियत यूनियन के खिलाफ अमेरिका ने पाकिस्तान के उन क्षेत्रों को जो अफगानिस्तान से मिले हुए थे वहां पर मदरसों के माध्यम से तालिबान को पूरी तरीके से पोषित कर सोवियत संघ को अफगानिस्तान में नीचा दिखाया था. अमेरिकी मदद के बाद तालिबान का वृक्ष वटवृक्ष का रूप धारण कर लिया और जब अमेरिका के खिलाफ कुछ क्षेत्रों में उसने लड़ाईयां लड़ी तो अमेरिका ने आतंकवाद समाप्त करने का नारा दिया. ईराक में अमेरिका ने सद्दाम हुसैन की सरकार को नष्ट कर दिया और वहां की जनता को कोई व्यवस्था नहीं दी. इसी तरह इराक के अगल-बगल के देशों में अमेरिका ने उन सरकारों को नष्ट करने के लिए तमाम सारे आतंकी संगठनो को मदद करके एक शैतान का साम्राज्य स्थापित कर दिया.  
ईराक की अव्यवस्था के बाद आई एस आई एस का उभार सामने आता है और सीरिया में असद की सरकार को नष्ट करने के लिए उसकी मदद पश्चिमी देशों ने की थी . आई एस आई एस का नेता अबु बक्र अल-बगदादी 2003 में इराक में अमेरिकी घुसपैठ के बाद बागी गुटों के साथ अमेरिकी फौज से लड़ा था। वह पकड़ा भी गया और 2005-09 के दौरान उसे दक्षिणी इराक में अमेरिका के बनाए जेल कैंप बुका में रखा गया था। और 2010 में इराक के अलकायदा का नेता बन गया। कहा यह जाता है कि बगदादी को अमेरिकी जेलों में ट्रेनिंग देकर छोड़ा गया था कि सीरिया जैसे मुल्कों को वह अपने कब्जे में ले लेगा. जो भी ताकत बगदादी के पास है वह ताकत अमेरिकी साम्राज्यवादी नीतियों के समर्थक देशों के बदौलत है. अब सवाल यह उठता है कि बगदादी के पास जो अत्याधुनिक हथियार हैं उनकी सप्लाई कौन से मुल्क कर रहे हैं और उसके बदले में सस्ता पेट्रोलियम पदार्थ कौन से मुल्क खरीद रहे हैं इन सवालों का पश्चिमी देश चुप्पी साध लेते हैं. 
आतंकियों को बेरोजगार नौजवानों  को  जिनके कोई रोजगार  नही है तो वह पैसो  के लिए   उनके हितसाधक  बन जाते है और धर्म  की गलत बयानी का नशा  पीकर  जन्नत   जाने की लालसा  में  वह सब कुछ करने को तैयार  हो जाते है तब वह धर्म की करुणा-दया -प्यार   को भूल जाते है अमरीकियों  ने तो धर्म  के शब्दों  के अर्थ  ही बदल डाले है
वही दिल्ली यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर  डॉक्टर सुधीर सिंह कहते हैं,कि “अफगानिस्तान की सेना बहुत हद तक तालिबान से या इस्लामिक स्टेट के आतंकियों से लड़ने में सक्षम है। ऐसे में जरूरत इस बात की भी है कि अफगानिस्तान की सेना को और मजबूत किया जाए। रूस-भारत और मध्य एशिया के देशों ने अच्छी पहल की है। भारत ने भी चार लड़ाकू हेलीकॉप्टर्स दिए हैं अफगानिस्तान की सेना को। अफगानिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी भारत आने वाले हैं। भारत-रूस ने बहुत सारे हथियार अफगानिस्तान की सेना को देने का फैसला किया है। ईरान भी इसमें सहयोग कर रहा है। अब अमेरिका वस्तुस्थिति को समझते हुए इसे मुद्दा न बनाए। सीरिया में भी असद के विरोध या समर्थन को भी अमेरिका को मुद्दा नहीं बनाते हुए सारा ध्यान इस्लामिक स्टेट के सफाई पर केंद्रित किया जाना चाहिए। इस लड़ाई का विस्तार इराक में भी होना चाहिए क्योंकि यहां भी इस्लामिक स्टेट का गढ़ है और इन आतंकियों के लिए देश की सीमाओं का कोई मतलब नहीं है। अभी तक लड़ाई सीरिया की सीमा के अंदर चल रही हैं। यही नहीं अमेरिका को यहां भी यह तय करना होगा कि वो इस्लामिक स्टेट के आतंकियों का सफाया करे ना की असद की सेना को नुकसान पहुंचाया जाए“। फ्रांस की राजधानी पेरिस में जो घटनाएं घटी हैं वह निंदनीय हैं, दुखद हैं लेकिन यह तय करना पड़ेगा कि दोहरी नीतियों के कारण बगदादी जैसे लोग विश्व समुदाय के लिए खतरा बन गए हैं लेकिन जब तक अमेरिका की दोहरी नीतियां बंद नहीं होती हैं और उसकी मुनाफाखोर नीतियां हमेशा आतंक और आतंकवादियों को जन्म देती रहेंगी. बगदादी का विनाश अगर पश्चिमी मुल्क चाहे तो उसके सस्ते पेट्रोल खरीद को बंद करके तथा इमानदारी से हथियार सप्लाई करने वाली चैन को ध्वस्त कर दे तो निश्चित रूप से इन आधुनिक शैतानो का विनाश हो सकता है. रूस ने लगातार हमले कर बगदादी की ताकत को लगभग समाप्त सा कर दिया है लेकिन पश्चिमी देशों की दोमुही नीतियों के कारण वह आज भी जिंदा है. आतंकवाद हमेशा निरीह जनता को मार डालने का ही काम करता है उसका कोई धर्म नहीं होता है. इंसान का लहू पीना उसकी फितरत है लेकिन राजनीति की जरूरतों के कारण आतंकवादी पैदा किये जाते हैं और जब वह पलट कर पैदा करने वालों को पीटने लगते हैं तब असली कष्ट का एहसास होता है वही हालत पेरिस घटना के बाद तमाम सारे साम्राज्यवादी लोगों को महसूस हो रहा है. हम सब मानवता पसंद लोग फ्रांस की जनता के साथ हैं. जनता को चाहिए कि अपने-अपने मुल्कों की सरकारों को बाध्य करे की वह आतंकवादियों की मदद अपनी राजनितिक आवश्यकताओं के लिए न करे.
 सुमन
लो क सं घ र्ष !
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