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शनिवार, 17 नवंबर 2012

नायपॉल : विकृत प्रतिभा

मुंबई में द टाईम्स ऑफ इंडिया समाचारपत्र समूह द्वारा आयोजित साहित्योत्सव में जानेमाने नाट्य कलाकार व धर्मनिरपेक्ष कार्यकर्ता गिरीश कर्नाड ने अपने भाषण़ में उस जूरी की कड़े शब्दों में निंदा की, जिसने साहित्यकार व्ही़ एस़ नायपॉल को पुरस्कार देने का निर्णय लिया था। कर्नाड का कहना था कि नायपॉल फिरकापरस्त हैं और इस पुरस्कार के लायक नहीं हैं। कुछ लोगों ने ऐसे मौके पर नायपॉल पर हमला बोलने के लिए कर्नाड की निंदा भी की। यह कहा गया कि कर्नाड को कम से कम उस समय नायपॉल के बारे में कटु शब्द नहीं बोलने थे।
गिरीश कर्नाड ने अपना बचाव करते हुए कहा कि उनकी अन्तार्त्मा यह स्वीकार नहीं कर पा रही थी कि नायपॉल को इस तरह का सम्मान मिले और उनके लिए अपना विरोध व्यक्त करने का सबसे बेहतर मौका वह समारोह ही था। नायपॉल नोबेल पुरस्कार विजेता हैं और उन्हें अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि साहित्यिक या अन्य मुद्दों को लेकर उनकी निंदा नहीं की जा सकती। एक धर्मनिरपेक्ष कार्यकर्ता के बतौर मैं भी इस बात से सहमत हूँ कि चोट तभी की जानी चाहिए जब लोहा गर्म हो। कर्नाड ने नायपॉल के विचारों पर हमला करने के लिए बिलकुल सही वक्त चुना।
यद्यपि नायपॉल का बचपन त्रिनिनाद में मुसलमानों के बीच गुजरा और अपने जीवन की शुरूआत में वे तार्किकता के हामी थे परन्तु शनै:शनै: इस्लाम और मध्यकालीन भारतीय इतिहास के संबंध में उनके विचारों में गहरा परिवर्तन आ गया। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने बिना सोचेविचारे इस्लाम और भारतीय इतिहास के बारे में आऱएस़एस़ की सोच को अपना लिया। उनके जीवन की शुरूआत तार्किकता से हुई परन्तु अपने जीवन के अंत में वे हिन्दुत्ववाद के झंडाबरदार बन गये। सन 1970 की शुरूआत में उन्होंने भारत पर अंग्रेजी में एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक था ‘एन एरिया ऑफ डार्कनेस’। इस पुस्तक में उन्होंने भारत में व्याप्त अंधविश्वासों और इनसे उपजी कुप्रथाओं की कड़ी निंदा की। इस पुस्तक की प्रतियों को जनसंघ (अब भाजपा) ने मुंबई के फ्लोरा फाउंटेन पर जलाया था। इस पुस्तक की प्रतियाँ देश के अन्य स्थानों में भी जलाई गयी होंगी। परन्तु चूंकि मैं मुंबई में रहता था इसलिए मैंने इस घटना का विवरण मुंबई के सामाचारपत्रों में प़ा।
परन्तु मैं द टाईम्स ऑफ इंडिया में छपे नायपॉल के पूरे पेज के साक्षात्कार को प़कर अचंभित रह गया। इस साक्षात्कार में उन्होंने रामजन्मभूमि आंदोलन को इस आधार पर सही ठहराया था कि वह राष्ट्रीय गौरव का प्रश्न है। उनका कहना था कि मुसलमान शासकों ने देशभर में कई मंदिरों को जमींदोज किया था और
रामजन्मभूमि आंदोलन, एक तरह से, देश के मुसलमानों के प्रति हिन्दुओं के मन में भरे गुस्से का प्रतीक था। अगर मेरी स्मॢति मुझे धोखा नहीं दे रही है तो यह साक्षात्कार हिन्दुत्व के
जानेमाने पैरोकार अरूण शौरी ने लिया था।
युवा साहित्यकार के रूप में नायपॉल तार्किकतावादी और भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वासों के कटु निंदक थे। परन्तु जैसेजैसे लेखक के रूप में उनका दर्जा ॐचा होता गया और उन्हें विभिन्न पुरस्कारों से नवाजा जाने लगा, वे उन लोगों की स्वीकार्यता हासिल करने के लिए बेचैन होने लगे जो स्वयं को हिन्दू धर्म का रक्षक बताते हैं। उनकी भाषा वही हो गयी जो हिन्दुत्ववादियों की है। वे हिन्दू धर्म और दर्शन की उच्च पंरपराओं, जो वेदान्त और उपनिषदों में निहित हैं, व विकृत हिन्दुत्व के बीच भेद नहीं कर सके। वे यह नहीं समझ पाये कि कुछ निहित स्वार्थी तत्व, अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए, हिन्दू धर्म की शिक्षाओं को गलत रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। और नायपॉल, गिरीश कर्नाड के शब्दों में, ‘भारतीय इस्लाम के कट्टर विरोधी बन गए।’
प्रश्न यह है कि क्या नायपॉल, जो भारतीय इस्लाम और मुसलमानों को खलनायक के रूप में देखते हैं, को महान चिंतक और लेखक कहा जा सकता है। इस प्रश्न का कोई सीधा उत्तर नहीं हो सकता। मुझे लगता है कि नायपॉल जैसे लेखक के मामले में यह एक ऐसा मुद्दा है जो बहस का विषय हो सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि नायपॉल में साहित्यिक प्रतिभा है। इस तथ्य को कर्नाड ने भी यह कहते हुए स्वीकार किया कि ‘‘वे नि:संदेह हमारी पी़ी के महान अंग्रेजी लेखकों में से एक हैं‘‘। परंतु इस तरह के प्रतिभाशाली व अपने फन में माहिर लेखक भी सही रास्ते से भटक सकते हैं, विशेषकर जब वे दूसरे धमोरं, नस्लों आदि से संबंधित विषयों पर लिखते या चिंतन करते हैं। ऐसा होने की संभावना तब और ब़ जाती है जब संबंधित धमोर्ं या नस्लों के बीच किसी तरह का प्रतिस्पर्धा का भाव हो।
नायपॉल इस तरह के पूर्वाग्रहों से ऊपर नहीं हैं। अतः यह महत्वपूर्ण है कि हम एक अच्छे व प्रतिभाशाली लेखक और एक महान लेखक के बीच अंतर करें। केवल एक महान लेखक ही अपने पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर, अपने विरोधियों की क्षमता व प्रतिभा का भी उचित मूल्यांकन कर सकता है और वह केवल अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए नहीं लिखता। नायपॉल इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते। उनकी महत्वाकांक्षाएँ, उनकी महानता पर अगर वे महान हैं तो हावी हो गयीं हैं। वे मिट्टी के माधो साबित हुए हैं।
भारतीय इतिहास की उनकी समझविशेषकर उस दौर की जब देश में मुस्लिम राजवंशों का शासन थाअधूरी और एकतरफा है। वे इतिहासविद नहीं हैं परंतु किसी भी व्यक्तिविशेषकर नायपॉल जैसे प्रतिभाशाली लेखक के लिएइतिहास को समझना बहुत मुश्किल नहीं होना चाहिए बशर्ते उसका दिमाग खुला हुआ हो और वह पूर्वाग्रहों से मुक्त हो। एक महान लेखक को अपने वैचारिक पूर्वाग्रहों से ऊपर उठना होता है और अपनी व्यक्तिगत पसंदनापसंद को अपने लेखन में उतारने से बचना होता है। नायपॉल ऐसा करने में असफल रहे हैं। उर्दू साहित्य में गालिब, इकबाल और मंटो जैसे लेखक और कवि इसलिए महानता हासिल कर सके क्योंकि उन्होंने अपनी धार्मिक, सामाजिक और ऐतिहासिक परंपराओं की निंदा करने में कभी संकोच नहीं किया और न ही वे पूर्वाग्रहों से पीड़ित रहे। ठीक इसी कारण से राजा राममोहन राय, टैगोर और महात्मा गांधी को बिना किसी हिचक के महान चिंतक और लेखक माना जा सकता है। उन्होंने कभी अपने पूर्वाग्रहों को अपने विचारों और लेखनी पर हावी नहीं होने दिया।
कबजब कोई व्यक्ति अपने जीवन के उत्तरार्ध में अपनी शुरूआती गलतियों को स्वीकार करता है और उन्हें सुधारता है। परंतु नायपॉल, जैसा कि पहले कहा जा चुका है, प्रगतिशील से प्रतिगामी बने। उनकी लेखन यात्रा तार्किकता से पूर्वाग्रह की ओर ब़ी। शुरूआत में वे राजा राममोहन राय और टैगोर की तरह
तार्किकतावादी थे और हमें विरासत में प्राप्त परंपराओं के कटु आलोचक थे। परंतु ज्योंही वे साहित्य के क्षेत्र में एक स्थापित हस्ताक्षर बने, वे अपनी छवि एक पुरातनपंथी हिन्दू बतौर स्थापित करने की कोशिश करने लगे। उनके पूर्वाग्रह, उनकी किताबों से झांकने लगे। उनकी पुस्तक ‘द वुंडिड सिविलाईजेशन‘ (घायल सभ्यता) उनकी दकियानूसी और प्रतिगामी सोच का उदाहरण है। किताब के शीर्षक से ही उनके पूर्वाग्रह झलकते हैं। वे यह मानते हैं कि हिन्दू सभ्यता को मुसलमानों द्वारा अपमानित और नष्ट किया गया।
जैसा कि गिरीश कर्नाड ने बताया, नायपॉल विजयनगर साम्राज्य को हिन्दू संस्कृति का गौरवशाली अध्याय बताते हैं। परंतु विजयनगर के बारे में उनके विचार सीधे सन 1900 में प्रकाशित राबर्ट सीवेल की पुस्तक ‘ए फॉरगाटन एम्पयार‘ से लिए गए हैं। गिरीश कहते हैं ‘‘नायपॉल हमेशा से औपनिवेशिक स्त्रोतों को अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखते रहे हैं। वे इन स्त्रोतों को पूर्णतः सत्य मानते हैं और इन्हें अपने विचार बताकर प्रचारित करते हैं।‘‘
मैं जब विजयनगर के अवशेषों को देखने गया था तब मेरे साथ मेरे एक ब्राहम्ण मित्र भी थे, जो कि धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्ध हैं। वहां एक गाईड कुछ पर्यटकों को घुमाया रहा था। कुछ टूटी हुई मूर्तियों को दिखाकर उसने पर्यटकों को बताया कि ये मूर्तियां हिन्दू देवीदेवताओं की हैं, जिन्हें मुस्लिम आक्रांताओं ने तोड़ा था और यह भी कि मुसलमानों ने विजयनगर साम्राज्य को नष्ट किया था। मेरे मित्र ने जैसे ही यह सुना उन्होंने पर्यटकों को गुमराह करने के लिए गाईड को जमकर लताड़ा और उन मूर्तियों के टूटने के असली कारण के बारे में पर्यटकों को बताया।
हमारे ब्रिटिश शासकों ने हमें बांटने के लिए हमारे इतिहास के साथ जमकर छेड़छाड़ की थी और अगर नायपॉल इतिहास के ब्रिटिश संस्करण को पत्थर की लकीर मानते हैं तो यह उनकी विचारशून्यता का ही उदाहरण है। किसी भी साम्प्रदायिक विचारधारा में गहराई तो होती ही नहीं है, उसमें सत्य भी नहीं होता। वह झूठ का पुलिंदा और तथ्यों को तोडे़मरोड़े जाने का परिणाम होती है। और किसी भी रचनात्मक और विशेषकर महान लेखक का लक्ष्य ही सत्यान्वेषण होता है। ऐसा लगता है कि नॉयपाल की सत्यान्वेषण में तनिक भी रूचि नहीं है। उल्टे, हिन्दू साम्प्रदायिक विचारधारा के उनके प्रेम के चलते वे झूठ को भी सहर्ष स्वीकार कर रहे हैं। ऐसे में उन्हें एक महान लेखक कैसे कहा जा सकता है?
यह आश्चर्यजनक है कि कुछ लोग यह तर्क दे रहे हैं कि चूंकि नायपॉल ने एक पाकिस्तानी मुस्लिम महिला से विवाह किया है इसलिए वे हिन्दू साम्प्रदायिक नहीं हो सकते। यह तर्क सचमुच अजीब है। हमारे जैसे पितृसत्तात्मक समाज में एक साधारण आदमी, जिसकी कोई उपलब्धियां नहीं हैं और जिसमें तनिक भी प्रतिभा नहीं है, वह भी अपनी पत्नी पर हावी रहता है। ऐसे में क्या हम यह अपेक्षा कर सकते हैं कि ‘सर‘ की उपाधि और नोबेल पुरस्कार से सम्मानित नायपॉल अपनी पत्नी के प्रभाव में होंगे? उल्टे, उनकी पत्नी उनके आभामंडल से इतनी अभिभूत होंगी कि वे जो कहते होंगे, उसे वे सच मानती होंगी।
पाकिस्तान में भी ऐसी मुस्लिम महिलाएं हैंऔर उनमें से कुछ को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूंजो मुस्लिम समुदाय द्वारा उनके दमन से इतनी दुःखी हैं कि वे इस्लाम और इस्लाम से जुड़ी हर चीज को घोर नापसंद करती हैं। अतः नायपॉल की पत्नी के पाकिस्तानी मुसलमान होने से कुछ साबित नहीं होता। यह अत्यंत सतही तर्क है। हमें सर विद्या के तर्कों और उनके लेखन को सच्चाई की कसौटी पर कसना होगा। उनकी पत्नी के धर्म का इससे कोई लेनादेना नहीं है।
एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि हर महान लेखक भविष्यदृष्टा होता है। वह न केवल यह लिखता है कि तत्कालीन समाज कैसा है वरन वह इस पर भी विचार करता है कि समाज कैसा होना चाहिए। वह एक ऐसे समाज की कल्पना करता है जो अधिक मानवतावादी होगा और जो मानवता को उसके कष्टों और दुःखों से मुक्ति दिलाएगा। इसके विपरीत, साम्प्रदायिक विचारधारा विकृत मूल्यों और दूसरों के प्रति घृणा पर आधारित होती है। किसी भी रचनात्मक लेखक का मुख्य आत्मिक गुण होता है प्रेम। जबकि साम्प्रदायिक सोच वाले व्यक्ति केवल घृणा बांटते हैं। सर विद्या व्यक्तिगत महानता की तलाश में दौड़ रहे हैं जबकि महान चिंतक, चाहे स्वयं की कीमत पर ही सही, समाज को महान बनाना चाहते हैं। सभी महान लेखक और चिंतक अपने समय से आगे सोचते हैं। उनके लिए भविष्य, भूतकाल से अधिक महत्वपूर्ण होता है यद्यपि वे गुजरे हुए वक्त में जो कुछ अच्छा था, उसे स्वीकारने में सकुचाते भी नहीं हैं। इतिहास के झूठे संस्करण के आधार पर महानता हासिल नहीं की जाती बल्कि इतिहास, सच्चे चिंतक और लेखक पर महानता अपिर्त करता है।
यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है कि नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद सर विद्या ने भाजपा कार्यालय जाकर श्री एल़ के़ आडवाणी से आशीर्वाद लिया। नायपॉल नोबेल के लायक थे या नहीं यह तो नोबेल पुरस्कार समिति ही जाने परंतु केवल नोबेल विजेता होने से कोई व्यक्ति महान नहीं बन जाता। ज्यादा से ज्यादा उससे यह पता चलता है कि उस व्यक्ति में साहित्यिक प्रतिभा है। वैसे भी, नोबेल पुरस्कार राजनैतिक सहित कई इतर कारणों से भी दिया जाता है। टैगोर को नोबेल पुरस्कार दिया गया परंतु महात्मा गांधी को नहीं। क्या इससे महात्मा, टैगोर से कम महान व्यक्ति साबित होते हैं? महात्मा गांधी नि:संदेह टैगोर से कहीं अधिक महान व्यक्ति थे। उपनिवेशवाद के खिलाफ उनके शानदार संघर्ष ने उन्हें दुनिया के महानतम व्यक्तियों की श्रेणी में स्थान दिया है और इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन्हें नोबेल पुरस्कार के लायक नहीं समझा गया।
-डॉ़ असगर अली इंजीनियर

बुधवार, 5 सितंबर 2012

भारत एवं धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र

अभी हाल तक कुछ लोग यह विचार व्यक्त कर रहे थे कि हमारे देश में साम्प्रदायिकता के प्रभाव में काफी कमी आयी है। कुछ का तो यहां तक कहना था कि बदले हुए वातावरण के प्रकाश में, संसद द्वारा साम्प्रदायिक हिंसा निरोंधक विधेयक पारित करने की आवश्यकता ही नहीं रह गई है। शायद इन लोगों की मान्यता थी कि गुजरात के भयावह दंगों ने देश को इतना गहरा सदमा पहुंचाया है कि अब हमारे देश में बड़े साम्प्रदायिक दंगे होने की संभावना न के बराबर है। परंतु अभी हाल में उत्तरप्रदेश के कई शहरों में साम्प्रदायिक दंगे हुए और कुछ दिनों पूर्व, असम में, गुजरात की तर्ज पर दिल को हिला देने वाली हिंसा हुई। इसके बाद, भारत के दक्षिणी राज्यों में रहने वाले उत्तरपूर्व के नागरिकों को निशाना बनाया जा रहा है।
राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक पर बहस के दौरान जनता दल यूनाइटेड के नेता और एनडीए की संयोजक श्री शरद यादव ने प्रस्तावित बिल को अप्रासंगिक बताते हुए कहा था कि चूंकि देश में अब साम्प्रदायिक हिंसा नहीं हो रही है इसलिए इस बिल की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि यह बिल, मुगल शासनकाल की तरह, देश में हिन्दुओं और मुसलमानों के लिए अलगअलग कानूनों का सॢजन करेगा। स्पतष्टतः वे इस मुद्दे पर भाजपा की सोच को अभिव्यक्त कर रहे थे। कहने की आवश्यकता नहीं कि मुगल शासनकाल की बात करना पूरी तरह अर्थहीन था और इससे हमें यह भी समझ में आता है कि कथित रूप से राममनोहर लोहिया के विचारों का प्रतिनिधित्व करने वाली धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के धर्मनिरपेक्ष नेताओं का असली चरित्र क्या है। श्री यादव ने जोर देकर यह भी कहा कि देश में अब साम्प्रदायिक दंगे होने बंद हो गये हैं। इस दावे में सच्चाई का एक अंश भी नहीं था। जिस समय श्री यादव राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में यह दावा कर रहे थे, लगभग उसी समय राजस्थान के शारदा, मंगलथाना व गोपालग़ में साम्प्रदायिक दंगे हो रहे थे। गोपालग़ में राजस्थान पुलिस द्वारा एक मस्जिद में दस मेव मुसलमानों को गोलियों से भून दिया गया।
श्री यादव के दावे का खंडन करते हुए मैंने अपने भाषण में कहा कि या तो श्री यादव समाचारपत्र प़ते नहीं हैं और या फिर वे जानबूझ कर पिछले कुछ महीनों के दौरान हुए दंगों को
नजरअंदाज कर रहे हैं। और अब, जबकि असम में हिंसा का विस्फोट हो गया है और वहां के बंगाली मुसलमान और पूरे देश में रह रहे उत्तरपूर्व के निवासी स्वयं को घोर असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, तब श्री यादव का क्या कहना हैं? दुर्भाग्यवश, भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए द्वारा साम्प्रदायिक हिंसा विेधेयक पर किये गये तीखे हमले के चलते, यूपीए2 सरकार ने साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक को संसद में प्रस्तुत करने का इरादा त्याग दिया है।
कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन ने सन 2004 के लोकसभा चुनाव के अपने चुनावी घोषणापत्र में यह वायदा किया था कि गुजरात के 2002 के भयावह साम्प्रदायिक दंगों के परिपे्रक्ष्य में, वह सरकार में आने पर, साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक पारित करेगी। इस वायदे को आज 8 वर्ष बीत चुके हैं परंतु यह विधेयक, कानून बनना तो दूर, संसद में प्रस्तुत तक नहीं हो सका है। कोई नहीं जानता कि यह कब प्रस्तुत होगा या कभी होगा भी या नहीं। मुझे ऐसा लगता है कि अगर यह बिल पारित हो गया होता तो असम के दंगे नहीं होते।
हम तब तक कोई कानून बनाने पर विचार नहीं करते जब तक कोई बड़ा हादसा न हो जाये और जब कोई हादसा हो जाता है, तब भी हम उस तरह के हादसे की पुनार्वृत्ति रोकने के उपाय करने में इतनी देरी कर देते हैं कि उसकी उपयोगिता ही समाप्त हो जाती है। कई बार संबंधित कानून को इतना कमजोर बना दिया जाता है कि वह निष्प्रभावी हो जाता है। जहां तक धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न है, कांग्रेस उसके पक्ष में बहुत मजबूती से खड़ी नहीं दिखती और भाजपा के लिए तो साम्प्रदायिकता ही जीवनीशक्ति है। ऐसे में हम कैसे यह कह सकते हैं कि हमारा देश कभी भी एक सच्चा प्रजातांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होगा।
हमारे देशवासियों में कितनी आपसी एकता और भाईचारा है, यह गुजरात व असम के दंगों और उसके बाद दक्षिण भारत के राज्यों में उत्तरपूर्वी इलाकों के निवासियों पर हुए हमलों से जाहिर है। घृणा फैलाने वाले एस़एम़एस़ किसने भेजे, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि यह कि केवल कुछ हजार एस़एम़एस़ संदेशों ने उत्तरपूर्व के नागरिकों को इस हद तक आतंकित कर दिया कि वे अपने कामधंधे छोड़कर, ताबड़तोड़ अपने अपने गृह राज्यों के लिए रवाना हो गये। इस घटनाक्रम के लिए पाकिस्तान को दोषी बताया जा रहा है पंरतु क्या यह कटु सत्य नहीं है कि उत्तरपूर्वी राज्यों के निवासियों को इतनी आसानी से आतंकित करना इसलिए संभव हो सका क्योंकि उन पर देश के विभिन्न इलाकों में पहले से ही या तो हिंसक हमले हो रहे थे और या फिर उनके प्रति भेदभाव किया जाता रहा था। यही कारण था कि एक एस़एम़एस़ से वे इतने घबड़ा गये कि बैंगलोर से तीन दिन की लम्बी यात्रा कर गुवहाटी पहुॅच गये। उत्तरपूर्वी राज्यों के निवासियों का पलायन पुणे, मुंबई, बैंगलोर, चैन्नई, हैदराबाद व लखनऊ से भी हुआ।
क्या कारण हैं कि उत्तरपूर्व के निवासियों को अपने ही देशवासियों पर भरोसा नहीं है? क्या कारण कि वे इतनी जल्दी घबड़ा जाते हैं? इसका कारण यह है कि हमने उन्हें कभी अपना माना ही नहीं। उनकी नस्लीय विभिन्नता के कारण उनके चेहरेमोहरे में जो अंतर हैं उनके कारण हम उन्हें बाहरी समझते रहे। दिल्ली में उत्तरपूर्व की महिलाओं के साथ अश्लील व्यवहार की घटनाएं होती रहती हैं। हमारे देश में राष्ट्रीय एकीकरण की भावना की कमी के पीछे हमारी शिक्षा व्यवस्था भी है। पाकिस्तान के सिर पर दोष म़ देने से काम नहीं चलने वाला है। हमे यह भी सोचना होगा कि हमने स्वयं अपने देशवासियों में एकता कायम करने के लिए क्या किया।
जाति, धर्म, भाषा, नस्ल और लिंग यह सब लोगों को आपस में बांटते हैं। हमारी विभिन्नता हमारी ताकत बनने की बजाय हमारी कमजोरी बन गई है। हमारे राजनेता हमारे बीच अलगाव के बीज बोने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। भाजपा, कांग्रेस को दोषी बताती है और कांग्रेस, भाजपा को। परंतु दोनों का उद्देश्य एक ही है और वह है अपना अपना वोट बैंक बनाना।
आज देश में ऐसा कौन सा राजनैतिक दल है, जिसका अपना वोट बैंक न हो? छोटे और क्षेत्रीय राजनैतिक दल भी इस मामले में किसी से पीछे नहीं हैं। सभी दल अपनेअपने वोट बैंकों को प्रसन्न करने में लगे रहते हैं। कोई दलितों को अपना वोट बैंक मानता है, कोई मुसलमानों को, कोई ब्राम्हणों का,े कोई राजपूतों को तो कोई यादवों को। इस तरह, चुनाव हमारे देश में लोगों को एक करने की बजाय उन्हें बांटने का साधन बन गये हैं। इसका एक कारण यह भी है कि हमने आँखें बंद कर ब्रिटिश चुनाव व्यवस्था को अपना लिया है, जिसमें सबसे ज्यादा वोट पाने वाला विजेता होता है।
यह व्यवस्था ब्रिटेन के लिए ठीक थी क्योंकि वहां का समाज एकसार है। उनकी एक ही भाषा और संस्कृति है। हमारे नेताओं को यह समझना था कि भारत जैसी ओँखें चौंधिया देने वाली विविधताओं से भरे देश के लिए, """"जिसेसबसे–अधिक–वोट–मिले–वही– विजेता वाली व्यवस्था उपयुक्त नहीं है। हर चुनाव में हम देखते हैं कि 18 से 25 प्रतिशत मत प्राप्त करने वाले विजेता बन जाते हैं और यह दावा करते हैं कि उन्हें बहुमत का समर्थन हासिल है। यह तो एक तरह का मखौल है।
हमें अपनी चुनाव प्रणाली में आमूलचूल बदलाव लाने होंगे। विजेता के लिए कम से कम 51 प्रतिशत मत पाना अनिवार्य करना होगा। अगर ऐसा हो जाता है तो राजनेताओं को सभी मतदाताओं का समर्थन हासिल करना होगा न कि एक छोटे से वोट बैंक का। अभी तो चुनाव नजदीक आते ही वोट बैंक की राजनीति शुरू हो जाती है।
असम दंगों के पीछे भी भाजपा की वोट बैंक की राजनीति है। भाजपा, आगामी चुनाव में बोडो मत पाने के लिए जमकर उनका समर्थन कर रही है। वह बांग्लादेशी घुसपैठियों का मिथक फैला रही है, जिसे बोडो नेता दोहरा रहे हैं। इस मिथक का इस्तेमाल बंगाली मुसलमानों को बोडो क्षेत्रीय स्वायत्तशासी परिषद क्षेत्र से बाहर खदेड़ने के लिए किया जा रहा है। इस परिषद का गठन भी एऩडी़ए़ सरकार ने सन 2003 में किया था।
अब भाजपा, कांग्रेस पर यह आरोप लगा रही है कि वह अपना वोट बैंक बनाने के लिए बांग्लादेशी घुसपैठियों को असम में बसने दे रही है। इस आरोपप्रत्यारोप में सच कहीं गुमसा गया है। सच यह है कि अगर बांग्लादेशी घुसपैठियों की जो संख्या बताई जा रही है, उसे गंभीरता से लिया जावे तो उसका अर्थ यह होगा कि बांग्लादेश की कुल आबादी का छठवां हिस्सा भारत में बस चुका है। त्रिपुरा की बांग्लादेश से सटी हुई सीमा की लंबाई लगभग 900 किलोमीटर है परंतु त्रिपुरा से हमें शायद ही कभी बांग्लादेशी घुसपैठ का शोर सुनाई देता है। असम व बांग्लादेश की सीमा मात्र 250 किलोमीटर है परंतु बताया जा रहा है कि हर रोज सैकड़ों बांग्लादेशी, असम में आ रहे हैं।
जिन्हे आज बांग्लादेशी बताया जा रहा है उनमें से अधिकांश बंगाली मुसलमान हैं जो कि विभाजन के पहले असम में बसे थे। उस समय पूरा देश एक था और कोई भी नागरिक कहीं भी बसने के लिए स्वतंत्र था। इस मुद्दे को सबसे पहले ऑल असम स्टॅूडेंट्स यूनियन के आंदोलन के दौरान उठाया गया। इस आंदोलन का नतीजा था नेल्ली और अब बोडोमुस्लिम हिंसा। इस हिंसक संघर्ष ने असम के लगभग चार लाख निवासियों को अपने ही प्रदेश में शरणार्थी बना दिया है। यह एक बहुत बड़ी संख्या है।
हमें यह समझना होगा कि ये सारे अलगाव राजनैतिक हैं और इनके पीछे है राजनैतिक प्रतिद्वंदिता। यद्यपि हमारे राजनेताओं ने हमें हमारी पहचान के प्रति अत्यन्त संवेदनशील बना दिया है तथापि आम व्यक्ति आज भी एक है। अभी हाल में एक ख़बर आई कि उत्तरांचल के एक गांव में, जहां मस्जिद नही है, 800 से अधिक मुसलमानों ने एक गुरूद्वारे के अंदर नमाज प़ी क्योंकि बाहर तेज बारिश हो रही थी। द टाईम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक चित्र अत्यंत प्रेरणास्पद है। इस चित्र में एक साधू (इमाम की तरह) सबसे आगे बैठा हुआ है और उसके पीछे लाईन से बैठकर मुसलमान नमाज़ प़ रहे हैं।
अगर हमारे नेता अलगाव की राजनीति न खेलें और हमारी शिक्षा व्यवस्था, देश के एकीकरण में मदद करे तो भारत के लोग एक साथ मिलकर आगे बें़गे और हमारे कीमती संसाधन उन क्षुद्र विवादों से निपटने में खर्च नही होंगे, जिनमें एक नागरिक दूसरे के खून का प्यासा बन जाता है। कुछ संगठन दिन और रात लोगों के बीच शत्रुता ब़ाने मे लगे हैं और यही कारण है कि कई बार छोटेमोटे विवाद भी हिंसक स्वरूप धारण कर लेते हैं। राजनेता सड़कों पर हथियारबंद और घृणा से लबरेज भीड़ इकट्ठा कर लेते हैं और सांप्रदायिक दंगे शुरू हो जाते हैं।
अगर हमारी शिक्षा व्यवस्था लोगों की एकता और हमारी सांझा विरासत पर जोर दे तो चमत्कारिक नतीजे सामने आयेंगे। मेरी पी़ी तक हम लोग हमारी सांझा विरासत को एक कीमती सौगात मानते थे और उसे किसी कीमत पर खोने के लिए तैयार नही थे परन्तु बाद की पीयिों ने केवल विवाद और हिंसा देखी है और यही कारण है कि सांप्रदायिक दंगे लगातार होते ही जा रहे हैं। अंगे्रजो ने फूट डालो और राज करो की नीति को अपनाया था परन्तु हमारे राजनेता देश को बांटने में अंग्रेजों से भी आगे निकल गये हैं। इसमें दोष हमारे राजनेताओं का हैं, राजनीति का नही।
गांधीजी की राजनीति बदलाव की राजनीति थी। वे नागरिकों के अंतर्मन को बदलना चाहते थे। परन्तु सत्ता के भूखे हमारे राजनेता केवल सत्ता की राजनीति में रूची रखते हैं। वे यथास्थितिवाद के समर्थक हैं और हर परिवर्तन का विरोध करते है। गाहे बगाहे कोई परिवर्तन होता भी है तो वह हालात को और बिगाड़ने वाला होता है। यह राजनीति हमें बदल नही रही है बल्कि हमें एक निश्चित दायरे, एक संकीर्ण पहचान में कैद कर रही है।

डॉ़ असगर अली इंजीनियर

शनिवार, 18 अगस्त 2012

असम हिंसा : क्या हो स्थायी हल



असम हिंसा : क्या हो स्थायी हल ?मुंबई हिंसा क्या इससे मूर्खतापूर्ण कुछ हो सकता था

पिछले कुछ हफ्तों के घटनाक्रम को देखते हुए यह आश्चर्यजनक नहीं कि इसकी परिणति मुंबई में हालिया (12 अगस्त 2012) हिंसा में हुई। ऐसा लगता है कि यह घटना, घटने का इंतजार कर रही थी। पिछले कुछ हफ्तों से बड़े पैमाने पर यह प्रचार किया जा रहा था कि पूरी दुनिया में मुसलमानों को मारा जा रहा है। बोडोमुस्लिम हिंसा और बर्मा में मारे जा रहे रोंहिग्या मुसलमानों के लिए लगभग हर मस्जिद में विशेष नमाज अदा की जा रही थीं और लाखों की संख्या में एसएमएस भेजे जा रहे थे। उर्दू अखबार ऐसे लेख प्रकाशित कर रहे थे जिनमें यह कहा गया था कि मुसलमानों को खत्म करने की विश्वव्यापी साजिश पर अमल हो रहा है। इनमें से अधिकांश लेख केवल भावनाओं को भड़काने वाले थे। उनमें घटनाओं के वस्तुपरक विश्लेषण के लिए कोई स्थान नहीं था।
मैंने मुंबई की उर्दू प्रेस में इस विेषय पर कोई गंभीर और विश्लेषणात्मक लेख नहीं देखा। मुस्लिम नेतृत्व, मुसलमानों के मन में यह धारणा उत्पन्न कर रहा था कि पूरी दुनिया मुसलमानों के पीछे पड़ी है। इससे उत्पन्न गुस्से को फूट पड़ने के लिए कोई बहाना भर चाहिए था। बर्मा में मुसलमानों के मारे जाने की तस्वीरों ने मुस्लिम युवकों को बहुत आहत किया। यहां यह कहना होगा कि इनमें से बहुत सी तस्वीरें नकली थीं परंतु उन्हें बड़े पैमाने पर इंटरनेट और सेलफोनों द्वारा पूरे देश में भेजा गया और इससे भावनाएं भड़कीं।
मुस्लिम नेतृत्व समुदाय की असली भलाई के लिए कभी कुछ नहीं करता। उसे केवल इस तरह के संवेदनशील मुद्दों की तलाश रहती है ताकि वह उनका इस्तेमाल अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए कर सके। इस मामले में भी यही हुआ। आज़ाद मैदान में रैली के आयोजन की घोषणा मस्जिदों में की गई जिससे पूरे मसले पर धार्मिक रंग च़ गया। जो लोग मस्जिदों में नमाज प़ने जाते हैं, उनमें से बहुत से सहज विश्वासी होते हैं और ज्योंही किसी मुद्दे को धार्मिक कलेवर दिया जाता है, वे उस संबंध में अति संवेदनशील हो जाते हैं। रमजान के पवित्र महीने में मस्जिदों में नमाज प़ने वालों की संख्या में भारी वॢद्धि होती है।
मुसलमानों के धार्मिक नेता और कई सामाजिकराजनैतिक नेता भी, असम और बर्मा में क्या हो रहा है, उसके बारे में कुछ खास जानतेसमझते नहीं हैं। वे इन दोनों घटनाक्रमों को मुसलमानों के खिलाफ षड़यंत्र बताते हैं। उन्हें इससे ज्यादा न कुछ मालूम है और न वे जानना चाहते हैं। आजाद मैदान में वक्ताओं ने अत्यंत भावनात्मक और भड़काऊ भाषण दिए। विशेषकर मीडिया पर यह आरोप लगाया गया कि उसने बर्मा में मुसलमानों की हत्याओं को पर्याप्त तरजीह नहीं दी। वक्ताओं ने अत्यंत उत्तेजनापूर्ण शब्दों का उपयोग, यह जानते हुए किया कि वहां मौजूद भारी भीड़ में हर तरह के लोग शामिल थे और उसमें असामाजिक तत्वों की भी कोई कमी नहीं थी। हिंसा भड़काने के लिए इतना काफी था।
यह सिर्फ भीड़ पर नियंत्रण बनाए रखने का प्रश्न नहीं है। रैली के नेतृत्व का व्यवहार घोर गैरजिम्मेदारीपूर्ण था। उनका कहना था कि वे केवल 1500 के लगभग लोगों के इकट्ठा होने की उम्मीद कर रहे थे परंतु वहां 50,000 से ज्यादा लोग पहुंच गए। क्या केवल इसी तथ्य से उन्हें यह समझ में नहीं आना था कि इस मामले ने भावनात्मक स्वरूप अख्तियार कर लिया है और भीड़ को अत्यंत समझदारी व परिपक्वता से संभाला जाना जरूरी है। कोई भी समझदार नेतृत्व इस तरह की बड़ी भीड़ के सामने भड़काऊ भाषण देने की इजाजत कभी नहीं देगा क्योंकि इससे भावनाओं के और अधिक भड़कने का खतरा रहता है।
आयोजकों के इस दावे में दम नहीं है कि उन्हें केवल 1500 लोगों के आने की उम्मीद थी। पिछले दोतीन शुक्रवारों से शहरभर की मस्जिदों में रैली के आयोजन की घोषणाएं की जा रहीं थीं और शहर के कई भागों में पोस्टर भी लगाए गए थे। साफ है कि आयोजक बड़ी संख्या में लोगों को इकट्ठा करना चाहते थे और इसमें वे सफल भी रहे। बेहतर तो यह होता कि 1000,1500 ऐसे व्यक्ति, जो मुद्दे की गंभीरता और उसके सभी पहलुओ से वाकिफ हैं, आजाद मैदान पर दिन भर का धरना करते और शाम को मुख्यमंत्री या गृहमंत्री को अपनी मांगों के संबंध में ज्ञापन सौंपते। रैली आयोजित करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी।
और अगर इतनी बड़ी रैली आयोजित की भी गई थी तो उसमें भावनात्मक भाषण क्यों दिए गए? क्या आयोजकों को मामले की संवेदनशीलता का अंदाजा नहीं था? परंतु वह मुस्लिम नेतृत्व ही क्या जो लोगों की धिर्मक भावनाएं न भड़काए? जहां तक रैली के आयोजकों का संबंध है, उनमें से शायद मुट्ठीभर भी असम में हो रही हिंसा के पीछे के कारणों को समझते होंगे। वे केवल एक चीज जानते हैं और वह यह कि वहां मुसलमान मारे गए हैं और इस बात को वे तोते की तरह दुहराते रहते हैं।?
असम में बोडोमुस्लिम विवाद का इतिहास हमें समझना होगा। बोडो, मुसलमानों को इसलिए नहीं मार रहे हैं क्योंकि वे मुसलमान हैं। वहां मूल विवाद जमीन का है। बोडो, आदिभाषियों, संथालों और अन्य समुदायों से भी संघर्षरत हैं। हालांकि यह सही नहीं है कि बड़ी संख्या में बांग्लादेशी असम में घुस रहे हैं (यह केवल संघ परिवार का प्रचार है) परंतु दुर्भाग्यवश अपना बोडो राज्य कायम करने के लिए बोडो, इस दुष्प्रचार का इस्तेमाल, बोडो क्षेत्रीय परिषद के अन्तर्गत चार जिलों से बंगाली मुसलमानों व अन्य गैरबोडो जातीय समूहों को खदेड़ने के लिए कर रहे हैं। इस पूरे विवाद की जड़ में कांग्रेस सरकार की नीति है जिसने इस इलाके में शांति कायम करने की कीमत, बोडो क्षेत्रीय परिषद का गठन कर अदा की। बोडो अतिवादी समूहों से यह समझौता करने से पहले सरकार को अन्य जातीय समुदायों को विश्वास में लेना था और बोडो क्षेत्रीय परिषद में उन्हें पर्याप्त
प्रतिनिधित्व दिया जाना सुनिश्चित करना था। कोकराझार व अन्य जिलों में बोडोमुस्लिम दंगो के संबंध में पिछले लेख में हमनें प्रकाश डाला था।
जहां तक रोंहिग्या मुसलमानों का प्रश्न है, उन पर हो रही ज्यादतियों के लिए केवल और केवल बर्मा की सैनिक तानाशाह सरकार जिम्मेदार है। दंगों के बाद मैं रंगून गया था और वहां मेरी कई रोंहिंग्या मुसलमानों से लंबी चर्चा हुई थी। मुझे बताया गया था कि सन 1981 तक वहां कोई समस्या नहीं थी। रोहिंग्या मुसलमानों को मताधिकार प्राप्त था और उन्हें पूर्ण नागरिक माना जाता था। म्यंनमार की सैनिक तानाशाह सरकार ने अचानक और बिना कोई कारण बताए रोहिंग्या मुसलमानों से उनके नागरिकता संबंधी दस्तावेज छीन लिए और अब उन्हें पिश्चमी म्यंनमार के राखीने जिले से निकाल बाहर करने की कोशिश हो रही है।
मयंनमार की सरकार का यह कहना है कि ये मुसलमान विदेशी हैं और वह चाहती है कि बांग्लादेश उन्हें अपनी जमीन पर बसाए। यह पूरी तरह से अन्यायपूर्ण मांग है। रोंहिग्या मुसलमान उस इलाके में सदियों से रहे रहे हैं और उन्हें बाहरी बताए जाने का कोई आधार नहीं है। जहां तक मयंनमार की सैनिक सरकार का सवाल है, वह अन्य प्रान्तो में बर्मी मूल के लोगों पर भी अत्याचार कर रही है और प्रजातंत्रसमर्थक आंदोलनों के बाद कई बौद्ध धर्मगुरूओं को भी मौत के घाट उतारा गया है। यह सही है कि कुछ बौद्ध धर्मगुरूओं ने अपने धर्मांवलम्बियों के प्रति एकता प्रदशिर्त करने के लिए राखीने जिले के मुसलमानों के खिलाफ पर्चे जारी किए हैं। उन्हें ऐसा कतई नहीं करना था। परंतु वे भी क्या करें। जैसा कि प्रजातंत्रसमर्थक आंदोलनों से सिद्ध होता है, बौद्ध धर्मगुरूओं का भी राजनीतिकरण हो गया है। परंतु एक बात बिल्कुल साफ है। न तो असम और न ही रोहिंग्या मुसलमानों के मामले, मुसलमानों के खिलाफ किसी विश्वव्यापी षड़यंत्र का हिस्सा हैं, जैसा कि प्रचारित किया जा रहा है।
मुंबई में मीडिया पर हमला किया गया और इसका एकमात्र कारण था भड़काऊ भाषण। यह अत्यंत मूर्खतापूर्ण काम था। कोई भी समझदार नेतृत्व मीडिया को खुश रखने की कोशिश करता है न कि उसे नाराज करने की। दूसरे, मीडिया को इस तरह की हिंसा से दबाना असंभव है। इसके अलावा, पूरे मीडिया को एक रंग में रंगना भी गलत है। पिं्रट और इलेक्ट्रानिकदोनों मीडिया के विभिन्न संस्थानों की अलगअलग वैचारिक प्रतिबद्धताएं और व्यवसायिक मजबूरियां हैं। अगर मीडिया का एक हिस्सा मुसलमानों की समस्याओं को तरजीह नहीं देता या उनके प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त है तो भी इस समस्या का इलाज पत्रकारों पर हमले कर और ओबी वैनों में आग लगाकर नहीं हो सकता। यह शुद्ध मूर्खता है।
उर्दू अखबार अक्सर लिखते हैं कि उलेमाकिराम (सम्मानीय उलेमा) को मुस्लिम उम्मा का पथप्रदशर्न और नेतृत्व करना चाहिए। उलेमा से यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है जबकि उनमें से अधिकांश
आधुनिक दुनिया के बार में न के बराबर जानते हैं और धार्मिक भावनाएं भड़काना जिनकी मानसिकता का अंग होता है। कहने की जरूरत नहीं कि सभी उलेमा ऐसे नहीं हैं परंतु राजनैतिक मसलों में अधिकांश उलेमा या तो घोर अवसरवादी नीतियां अपनाते रहे हैं या आम मुसलमानों की भावनाओं से खिलवाड़ करते रहे हैं।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मुंबई की हिंसा रमजान के पवित्र महीने में हुई। उलेमा हमें यह बताते नहीं थकते कि रमजान के महीने में रोजे रखने का उद्धेश्य यह है कि हम अधिक धैर्यवान बनें और अपने गुस्से पर नियंत्रण पाना सीखें। ऐसा कहा जाता है कि इस पूरे माह को केवल इबादत करते हुए बिताना चाहिए अर्थात अल्लाह को याद करते हुए व गरीबों और कमजोरों के प्रति करूणाभाव रखकर उनकी मदद करते हुए। जब असम और बर्मा में कोई ताजी हिंसक घटनाएं नहीं हो रहीं थीं तब रमजान के पवित्र महीने में यह रैली आयोजित करने की जल्दी क्या थी। असम में हिंसा पर नियंत्रण स्थापित कर लिया गया था और अब वहां चार हिंसा पीड़ित जिलों में शरणार्थी शिविरों में रह रहे लोगों के लिए पैसे, वस्त्र, जूते व दवाईयां आदि इकट्ठा करने की जरूरत थी।
परोपकार के इस पवित्र महीने में ये नेता उन चार लाख लोगों के लिए मदद इकट्ठा कर सकते थे जो अत्यंत अमानवीय परिस्थितियों में शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं। मुसलमानों द्वारा की गई बदले की कार्यवाही में कई बोडो भी मारे गए हैं और कुछ शरणार्थी शिविरों में बोडो भी रह रहे हैं और उनकी हालत भी उतनी ही दयनीय है जितनी कि बांग्लाभाषी मुसलमानों की। एक सच्चे और दयावान मुसलमान की तरह इन नेताओं को बोडो शरणार्थियों के लिए भी मदद इकट्ठी करनी चाहिए थी। पवित्र कुरान हमसे यही अपेक्षा करती है। परंतु इसकी जगह उन्होंने मुसलमानों के खिलाफ काल्पनिक विश्वव्यापी षड़यंत्र का प्रचार किया और बेजा हिंसा भड़काई।
अगर असम के घटनाक्रम को केवल मुसलमानों के खिलाफ षड़यंत्र बताए जाने के स्थान पर बोडो की हत्या की भी निदां की जाती और उनकी भलाई के लिए भी प्रार्थना की जाती तो इस मुद्दे को भड़काऊ बनने से रोका जा सकता था। दूसरे, जो रैली आयोजित की गई थी, उसमें केवल मुसलमानों को बुलाया जाना गलत था। उसमें हिन्दुओं, ईसाईयों, बौद्घों और अन्य धमोर्ं के नेताओं को भी बुलाया जाना था जिससे रैली का चरित्र धर्मनिरपेक्ष बनता। यहां तो संकीर्णता की यह हद थी कि रैली का आयोजन रजा अकादमी द्वारा किया गया था जो कि बरेलवी मुसलमानों की प्रतिनिधि है। क्या इससे अधिक संकीर्णता कुछ हो सकती है? अगले दिन, उसी स्थान पर, देवबंदी मुसलमानों की विरोध रैली आयोजित थी, जो कि हिंसा के बाद रद्द कर दी गई।
अगर हम हिंसा के खिलाफ हैं तो इस मुद्दे पर हमें पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध होना चाहिए और हमें प्रत्येक समुदाय या वर्ग के खिलाफ हिंसा का विरोध करना चाहिए। इस मामले में संकीर्ण रूख अपनाने से काम नहीं चलेगा। अगर हम केवल किसी एक वर्ग के विरूद्ध हिंसा का विरोध करेंगे तो इससे जवाबी हिंसा भड़कने की आशंका बनी रहेगी। दूसरी ओर, यदि हम सभी वर्गों के साथ मिलकर, हर प्रकार की हिंसा का विरोध करेंगे तो इस विरोध का चरित्र न केवल प्रजातांत्रिक वरन अहिंसक बना रहेगा। एक वर्ग की संकीर्णता, दूसरे वर्ग की संकीर्णता को ब़ावा देती है। दूसरी ओर, उदार नजरिया अपनाने से हमें सभी का समर्थन और सहयोग प्राप्त होता है।
पुलिस का कहना है कि यह हिंसा सुनियोजित थी। इसका अर्थ यह है कि कई मुस्लिम युवक अब पुलिस की प्रताड़ना का शिकार बनेंगे। यह शर्मनाक है कि रैली में शामिल कई लोगों ने महिला पुलिसकर्मियों के साथ अश्लील व्यवहार किया और उनके रिवाल्वर छीन लिए। इससे पुलिसकर्मियों के मन में प्रतिशोध का भाव जाग सकता है। हम केवल आशा कर सकते हैं कि ऐसा न हो। यहां हमें पुलिस की इस बात के लिए प्रशंसा करनी होगी कि उसने धैर्य का परिचय दिया और पुलिस कमिश्नर अरूप पटनायक ने स्वयं रैली स्थल पर आकर मंच से रमजान के पवित्र महीने में धैर्य और शांति बनाए रखने की अपील की।
आईए, हम सब यह आशा करें कि सभी संबंधित पक्ष समझदारी और परिपक्वता से व्यवहार करेंगे और शांति भंग नहीं होने देंगे।
-डॉ़ असगर अली इंजीनियर


मंगलवार, 7 अगस्त 2012

असम हिंसा : क्या हो स्थायी हल


पिछले दिनों निचले असम के कोकराझार और तीन अन्य जिलों में हुई व्यापक हिंसा के बारे में समाचारपत्रों में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। जुलाई के पहले सप्ताह में शुरू हुई हिंसा, जिसने 19 जुलाई के बाद जोर पकड़ लिया, में 58 व्यक्ति मारे गए। वर्तमान में इस इलाके में एक असहज शांति व्याप्त है। इस हिंसा ने चार लाख से अधिक लोगों को शरणार्थी बना दिया है। इनमें से तीन लाख मुसलमान हैं। शरणार्थी 27 अलगअलग राहत शिविरों में रह रहे हैं। समाचारपत्र, सामान्यतः, केवल घटनाओं का विवरण देते हैं, उनके पीछे के कारणों का विश्लेषण नहीं करते और न ही समाचारपत्रों में किसी मसले के गहन अध्ययन पर आधारित सामग्री प्रकाशित होती है।
जब मुख्यमंत्री तरूण गोगोई से किसी ने कहा कि असम जल रहा है तो वे आगबबूला हो गए। श्री गोगोई, सच यह है कि असम वास्तव में धूधूकर जल रहा है। असम समस्या की जड़ें कोकराझार में बोडो व मुसलमानों के बीच हिंसा और बोडो क्षेत्रीय परिषद में आए दिन होने वाले विवादों से कहीं गहरी हैं। ये दोनों तो असम के आंतरिक सामाजिक संघर्ष के बाहरी लक्षण मात्र हैं। असम में तब तक शांति स्थापित नहीं हो सकती जब तक कि बांग्लादेशी मुसलमानों के राज्य में घुसपैठ करने संबंधी झूठे प्रचार पर रोक नहीं लगती।
सन 1980 के दशक में चला एएएसयू आंदोलन और उसके बाद हुआ नेल्ली नरसंहार, इस आंतरिक टकराव का पहला प्रकटीकरण थे। नेल्ली में बांग्लाभाषी मुसलमानों (तथाकथित बांग्लादेशियों) और ललुंग कबीलाईयों के बीच हिंसा हुई थी जिसमें 3000 से अधिक मुसलमान मारे गए थे। बांग्लादेशी होने का आरोप लगाकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। इस जनसंहार से पूरे असम के मुसलमानों में इतना आतंक व्याप्त हो गया था कि जब मैं इस घटना की जांच के लिए असम पहुंचा तब एक भी असमिया मुसलमान कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं था।
सन 2008 में मुसलमानों और बोडो के बीच हिंसा का एक और दौर हुआ जिसमें 55 लोग मारे गए। जिन मुसलमानों को बांग्लादेशी बताया जा रहा है उनमें से अधिकांश ब्रिटिश शासनकाल में असम में बसे थे। नेल्ली में बंगाली मुसलमानों ने मुझे बताया कि उनके पुरखे सन 1930 या उसके भी पहले वहां आकर बसे थे और उन्हें खाली पड़ी जमीनों पर खेती करने के लिए लाया गया था। ये लोग बहुत मेहनती हैं जबकि असमिया अहोम और पहाड़ी कबीलाई ललूंग आरामतलब हैं और खेती में ज्यादा मेहनत करना नहीं चाहते। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नेल्ली में 3000 से अधिक मौतों के बावजूद घटना की कोई आधिकारिक जांच नहीं हुई। यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि 3000 मासूमों को क्रुरतापूर्वक मौत के घाट उतार दिए जाने के घटनाक्रम की जांच करवाने तक की जरूरत महसूस नहीं की गई।
दक्षिणपंथी भाजपा इस मामले में आग में घी डालने का काम करती रही है। वह बिना किसी आधार के अत्यंत अतिश्योक्तिपूर्ण आंकड़े प्रस्तुत कर यह आरोप लगाती रही है कि बड़ी संख्या में बांग्लादेशी मुसलमान असम में बस रहे हैं। सन 1980 तक असम में आरएसएस की कोई खास पकड़ नहीं थी परंतु अब गांवगांव तक उसका फैलाव हो गया है और उसके कार्यकर्ता रातदिन मुसलमानों और हिन्दुओं के बीच खाई खोदने के काम में जुटे हुए हैं। वैसे असम में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच साम्प्रदायिक सौहार्द का लंबा इतिहास रहा है। इन सौहार्दपूर्ण रिश्तों के निर्माण में एक ओर शक्रदेव तो दूसरी ओर आजम फकीर ने महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं थीं।
असम ही नहीं, भाजपा को पूरे देश में कहीं भी हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सौहार्दपूर्ण रिश्ते नहीं भाते। अपनी हिन्दुत्ववादी राजनीति को आगे ब़ाने के लिए भाजपा हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच नफरत की दीवार खड़ी करने के लिए बांग्लादेशियों के मसले का इस्तेमाल करती रही है। असम में साम्प्रदायिक सौहार्द के लम्बे इतिहास के चलते भाजपा के लिए असमिया मुसलमानों पर निशान साधना लगभग असंभव था। इसलिए उसने बांग्लादेशी मुसलमानों का मिथक ईजाद किया। इसका अर्थ यह नहीं है कि असम में बांग्लाभाषी मुसलमान नहीं हैं और यह भी सही है कि हाल के वषोर्ं में कुछ बांग्लाभाषी मुसलमान असम में आकर बसे हैं । इनमें से कुछ बांग्लादेश से आए हैं और कुछ पिश्चम बंगाल से।
परंतु अधिकांश बांग्लाभाषी मुसलमान ब्रिटिश काल से असम में बसे हुए हैं और वैज्ञानिक तरीके से एकित्रत किए गए ऐसे कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं जिनसे यह पता चल सके कि वास्तव में कितने बांग्लादेशी प्रवासी पिछले कुछ दशकों में असम में आए हैं। वहां कोई नेशनल पापुलेशन रजिस्टर भी नहीं है। पूरा मसला प्रचार और केवल प्रचार पर आधारित है और इसके जरिए आमजनों को विभाजित करने और उनके मन में तरहतरह की भ्रांतियां फैलाने में साम्प्रदायिक तत्वों को सफलता मिली है। इस आरोप, कि कांग्रेस सरकार बांग्लादेशी मुसलमानों को असम में बसने की इजाजत इसलिए दे रही है ताकि उसका वोट बैंक ब़ सके, ने गैरकांग्रेसी राजनैतिक दलों को प्रभावित किया है।
असम तब तक हिंसा और तनाव के झंझावातों में फंसा रहेगा जब तक कि बांग्लाभाषी मुसलमानों के असम में बसने संबंधी आरोपों का पुरजोर व प्रभावी ंग से खण्डन नहीं होता। ऐसा भी नहीं है कि केवल बांग्लादेशी या बांग्लाभाषी मुसलमान असम में आ रहे हैं। हिन्दीभाषी बिहारी भी बड़ी संख्या में असम में बस गए हैं। राजस्थान के मारवाड़ी भी वहां हैं और उनका उत्तरपूर्वी राज्यों के व्यापारव्यवसाय पर लगभग पूण्र नियंत्रण है। परंतु कतिपय राजनैतिक कारणों से फोकस केवल बांग्लादेशी मुस्लिम प्रवासियों पर ही किया जा रहा है।
इस समस्या का एक अन्य कारण है बोडो क्षेत्रीय परिषद की स्थापना। यह परिषद ऐसे इलाके में शासन कर रही है जहां बोडो आबादी केवल 29 प्रतिशत है और अन्य लोगों में वे बांग्लाभाषी मुसलमान शामिल हैं जिन्हें ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेजों द्वारा जूट की खेती करने के लिए वहां बसाया गया था। वे सौ से अधिक वषोर्ं से वहां रह रहे हैं। केन्द्र सरकार ने अतिवादी बोडो आंदोलनकारियों से, जो कि एक स्वतंत्र बोडो राज्य की मांग कर रहे थे, समझौता करने की खातिर बोडो क्षेत्रीय स्वायत्त परिषद की स्थापना को मंजूरी दी थी।
प्रश्न यह है कि बोडो परिषद बनाकर उसे संबंधित इलाके के विकास संबंधी और अन्य निर्णय लेने का पूर्ण अधिकार कैसे दिया जा सकता है जबकि क्षेत्र में बोडो, कुल आबादी का केवल 29 प्रतिशत हैं। परिषद की स्थापना से सभी गैरबोडो नाराज हैं और वे चाहते हैं कि इस परिषद को भंग कर दिया जाए। उनकी शिकायत है कि उन्हें विकास में उनका उचित हिस्सा नहीं मिल रहा है। दूसरी ओर, बोडो अपनी आबादी इतनी ब़ाना चाहते हैं कि वे उस इलाके में बहुसंख्यक हो जाएं और इस आधार पर बोडो परिषद के गठन को औचित्यपूर्ण ठहराया जा सके।
हिंसा के पीछे एक अन्य कारण यह है कि समझौते के अनुसार, बोडो अतिवादियों को अपने हथियार समपिर्त करने थे परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया और आज भी ये अतिवादी अपनी बंदूकें लिए क्षेत्र में घूमते रहते हैं और गैरबोडो रहवासियों को आतंकित करते हैं। बोडो अतिवादियों को आज भी आग्नेय अस्त्र आसानी से उपलब्ध हो रहे हैं और सरकार ने मुख्यतः राजनैतिक कारणों से उनसे ये अवैध हथियार जब्त करने की कोई कोशिश नहीं की है। असम की सरकार एक गठबंधन सरकार है, जिसका एक हिस्सा बोडो नेशनल फ्रंट भी है और इस कारण मुख्यमंत्री, बोडो को नाराज नहीं करना चाहते।
कोकराझार में हिंसा 6 जुलाई को तब शुरू हुई जब मोटरसाईकिलों पर सवार और बंदूकों से लैस चार बोडो युवक एक गांव में पहुंचे और दो मुसलमानों की हत्या कर भाग गए। जिला प्रशासन ने उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की क्योंकि जिले के डिप्टी कमिश्नर और कलेक्टर, दोनों ही बोडो हैं। इसके बाद अज्ञात लोगों (जिन्हें बंगाली मुसलमान माना जा रहा है) ने चार पूर्व अतिवादी बोडो को मार डाला और फिर बड़े पैमाने पर हिंसा शुरू हो गई। अब जाकर जिले के डिप्टी कमिश्नर और कलेक्टर को हटाया गया है और कलेक्टर का निलंबन भी कर दिया गया है।
अगर यही कार्यवाही पहले कर दी जाती तो बड़े पैमाने पर हुआ खूनखराबा और तबाही रोकी जा सकती थी। परंतु मुख्यमंत्री, जिला प्रशासन की अकर्मणयता के मूक दशर्क बने रहे और उन्होंने अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की। जब हिंसा फैलने लगी तब मुख्यमंत्री ने केन्द्र सरकार से सहायता मांगी और सेना की तैनाती किए जाने का अनुरोध किया। परंतु सेना के इलाके में पहुंचने तक बहुत देर हो चुकी थी और हिंसा नियंत्रण के बाहर हो गई थी। इस सिलसिले में प्रधानमंत्री डॉ़ मनमोहन सिंह की इस बात के लिए प्रशंसा की जानी चाहिए कि उन्होंने न केवल मुख्यमंत्री को हिंसा रोकने के लिए कड़ी कार्यवाही करने के निर्देश दिए वरन वे स्वयं भी प्रभावित इलाके में पहुंचे। प्रधानमंत्री की यात्रा के पहले तक मुख्यमंत्री ने हिंसाग्रस्त क्षेत्र में जाने की जहमत नहीं उठाई थी।
यह महत्वपूर्ण है कि असम में दंगे भड़कने की यह पहली और आखिरी घटना नहीं है। अगर त्वरित और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आगे भी खूनखराबे, आगजनी और दंगों का दौर चलता रहेगा। सबसे पहला कदम, जो कि तुरंत उठाया जाना चाहिए, वह है बोडो अतिवादी युवकों का नि:शस्त्रीकरण। इन युवकों तक आग्नेय अस्त्र किस रास्ते से पहुंच रहे हैं इसका पता लगाकर उस पर रोक लगाई जानी चाहिए। बोडो युवकों को खुलओम हथियार लेकर घूमने और गैरबोडो रहवासियों को आतंकित करने की इजाजत कोई सरकार नहीं दे सकती।
बोडो अतिवादी, गैरबोडो निवासियों से जबरिया पैसे की वसूली भी करते हैं और जो लोग पैसे देने से इंकार करते हैं उनके पशु और अन्य घरेलू सामान लूट लिया जाता है। इस तरह की घटनाओं के कारण जनता में भारी आक्रोश है। यह कहना मुश्किल है कि सरकार बोडो अतिवादियों से हथियार छीनने के लिए प्रभावी कदम उठा सकेगी या नहीं क्योंकि बोडो, सत्ताधारी राजनैतिक गठबंधन के हिस्से हैं।
दूसरे, बोडो क्षेत्रीय परिषद की स्थापना से उत्पन्न समस्याओं से निपटने की भी जरूरत है। बोडो कुल आबादी के एकतिहाई से भी कम हैं परंतु क्षेत्र का शासन उनके हाथ में है। एक तरीका तो यह हो सकता है कि बोडो क्षेत्रीय परिषद में गैरबोडो सदस्यों को पर्याप्त संख्या में शामिल किया जाए। क्षेत्र के अल्पसंख्यक समुदाय को शासन के पूरे अधिकार सौंपना, केन्द्र सरकार का एक अन्यायपूर्ण कदम था। मुसलमानों के अतिरिक्त वहां कोच्ची, राजभोंगशी, संथाल और आदिभाषी भी हैं हालांकि गैरबोडो में मुसलमानों की संख्या सबसे अधिक है। अतः या तो बोडो क्षेत्रीय परिषद की स्थापना के लिए फरवरी 2003 में किए गए समझौते को रद्द किया जाना चाहिए या परिषद में गैरबोडो प्रतिनिधियों को उनकी आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए।
तीसरे, बांग्लादेशी मुसलमानों की घुसपैठ के बारे में अतिश्योक्तिपूर्ण प्रचार का प्रभावी खण्डन किया जाना चाहिए और वैज्ञानिक आंकड़े देश के सम्मुख प्रस्तुत किए जाने चाहिए। बांग्लादेशी मुसलमानों की घुसपैठ के बारे में दुष्प्रचार से न केवल असम बल्कि पूरे देश में अकारण तनाव फैल रहा है।
ये कुछ कदम हैं जो हालात को बेहतर बनाने के लिए तुरंत उठाए जा सकते हैं। इस समस्या को केवल कानून और व्यवस्था की समस्या मानना भूल होगी। यह एक राजनैतिक समस्या है जिसका राजनैतिक हल निकाला जाना चाहिए। कुछ बोडो नेता अत्यंत गैर जिम्मेदाराना बयान जारी कर रहे हैं और यह दुर्भाग्यपूण्र है कि नेशनल काऊंसिल आफ चर्चिस ऑफ इंडिया के महासचिव श्री रोजर गायकवाड़ ने यह बेसिरपैर का वक्तव्य जारी किया है कि बांग्लादेशी मुसलमानों ने असम में दस हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है। यह गैरजिम्मेदारी की हद है।
यह सचमुच दुःखद है कि असम के पड़ोस में स्थित म्यानामांर में वहां के सैनिक शासकों द्वारा रोहिंग्या मुसलमानों का बड़े पैमाने पर कत्ल किया जा रहा है और इसके लिए भी उसी बहाने का उपयोग किया जा रहा है जिस बहाने से भारत में बंगाली मुसलमानों को मारा जा रहा है। यह स्थिति इसलिए भी और दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि हमारा देश एक प्रजातंत्र है। हां, एक महत्वपूर्ण फर्क यह है कि भारत में केन्द्र सरकार और विशेषकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने असम में भड़की हिंसा की आग को बुझाने के लिए प्रभावी कदम उठाए हैं जिनमें तीन सौ करोड़ रूपये के राहत पैकेज की घोषणा शामिल है। म्यानांमार में तो वहां की सैनिक तानाशाह सरकार क्रुरतापूर्वक रोहिंग्या मुसलमानों को मौत के घाट उतार रही है और अपनी इस कार्यवाही को औचित्यपूर्ण भी ठहरा रही है।
किसी भी क्षेत्र में बाहर से आकर लोगों के बसने को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है परंतु इस अप्रवासन का राजनैतिक हित साधन के लिए दुरूपयोग नहीं होना चाहिए और न ही आंकड़ों की बाजीगरी की जानी चाहिए। शांति स्थापना के लिए राजनैतिक परिपक्वता तो आवश्यक है ही यह सुनिश्चित किया जाना भी जरूरी है कि असम में एक शताब्दी से भी अधिक समय से रह रहे जातीय व भाषायी समूहों को सुरक्षा मिले और प्रगति व समॢद्धि में हिस्सेदारी भी।

डॉ़ असगर अली इंजीनियर

मंगलवार, 17 जुलाई 2012

रूमी की बांसुरी

हर साल गर्मियों में, फ्रांस और अन्य (अधिकांशतः फ्रेंच भाषाभाषी) देशों के लेखकों, कवियों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक अनौपचारिक सम्मेलन, फ्रांस के लियोन शहर में होता है। इस बैठक में मानवता के समक्ष उपस्थित विभिन्न मुद्दों पर शुक्रवार से रविवार तक तीन दिन का गहन संवाद होता है। इस संवाद का आयोजन जुलाई के पहले सप्ताह में किया जाता है। मुझे पिछले दो वर्षों से लगातार इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाता रहा परन्तु अपनी अन्य व्यस्तताओं के चलते मैं वहां नहीं जा सका। इस साल मुझे लियोन आने का निमंत्रण काफी पहले से दे दिया गया था और मैंने यह तय किया कि इस बार मैं वहां जरूर जाऊंगा।
फ्रांस और दुनिया के फ्रेंचभाषी हिस्सों के प्रमुख बुद्धिजीवियों, लेखकों और कवियों से मिलना और बातचीत करना सचमुच एक शानदार बौद्धिक अनुभव था। वहां उत्तरी अफ्रीका अर्थात अल्जीरिया, ट्यूनीशिया, मोरक्को, माली, मिस्त्र कई अन्य देशों के प्रतिनिधि मौजूद थे। इन देशों के जो नागरिक फ्रांस में रह रहे हैं, वे भी वहां थे। अधिकांश प्रतिभागी फ्रांस और फ्रेंचभाषी विश्व के जानेमाने व्यक्तित्व थे। कुछ प्रतिभागी ब्राजील से भी आए थे। मानवता के भविष्य के प्रति पूरी गंभीरता से चिंतित इन लोगों से विचारविनिमय सचमुच एक बहुत अच्छा अनुभव था।
लियोन एक मझौले आकार का शहर है। शहर के बीच से दो नदियां बहती हैं और इस कारण यह शहर लगभग एक टापू है। लियोन का इतिहास रोमन काल तक जाता है और आज भी वहां रोमन युग के अवशेष मौजूद हैं। शहर के ठीक बीच, 700 एकड़ में फैला एक बहुत बड़ा पार्क है। जिस होटल में मैं और कुछ अन्य प्रतिभागी ठहरे थे, उससे यह पार्क कुछ ही मिनटों के फासले पर था। लियोन की सुंदरता देखने लायक थी। सम्मेलन पूरी तरह अनौपचारिक था और इसका आयोजन इस पार्क में ही, विशालकाय पुराने पेड़ों की छाया तले किया गया था। इसे देखकर मुझे टैगोर के शांतिनिकेतन की याद गई। दिलचस्प बात यह है कि वहां टैगोर, पाब्लो नेरूदा उनके यूनिवर्सलिज्म भी चर्चा का विषय थे। एक सत्र में टैगोर और नेरूदा दोनों पर एक साथ चर्चा हुई।
प्रतिभागियों में से केवल मैं फ्रेंच नही जानता था। अन्य सभी धाराप्रवाह फ्रेंच बोल रहे थे परन्तु इससे कोई समस्या नहीं हुई। मेरी बातों का अनुवाद करने के लिए कई लोग तैयार थे। मैं 5 जुलाई की सुबह जब लियोन पहुँचा तो हवाई अड्डे पर मुझे लेने के लिए सिमोन कुनेगेल नामक महिला आईं हुईं थीं। मुझे लगा कि वे मात्र स्वयंसेवक हैं और मुझे होटल तक छोड़कर चली जावेंगीं।
परन्तु मैं गलत था और मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि सुश्री सिमोन के बारे में मेरा अंदाजा गलत निकला। वे धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलती थीं और मुंबई स्थित फ्रेंच राजनयिक मिशन में कई वर्षों तक पदस्थ रही थीं। वे कोलाबा में रहती थीं। भारत में अपनी पदस्थापना के दौरान उन्होंने कई भारतीय व्यंजन बनाना सीख लिया था। उन्होंने जोर देकर कहा कि मैं उनके घर आऊं ताकि वे मुझे भारतीय व्यंजन बनाकर खिला सकें। उनका कहना था कि इससे मुझे ऐसा लगेगा मानो मैं अपने घर पर ही हूं। मेरी यात्रा के पहले ही दिन उन्होंने मुझे पूरे लियोन शहर में घुमाया। शहर के पुराने हिस्से को देखकर मैं चकित रह गया। उसमें रोमन काल की खुशबू अब भी बाकी थी।
जब मैं सुश्री सिमोन के घर पहुँचा तब मेरे आश्चर्य का ठिकाना रहा। वहां दो अन्य मेहमान भी थे। एक थे मिस्त्र मूल के मोहम्मद, जो संगीतविज्ञानी हैं और अपने साथ ढेर सारी बांसुरियाँ लाये थे। उन्होंने बांसुरी बजाई भी और इससे मुझे केवल अपने देश भारत वरन मौलाना रूमी की "मथनवी रूमी" की भी याद आई। मथनवी का अर्थ होता है महाकाव्य। मौलाना रूमी की मथनवी, जो कि फारसी की कुरान कही जाती है, की शुरूआत में ही बांसुरी का जिक्र है। मौलाना रूमी कहते हैं कि बांसुरी के दिल में घाव (छेद) हैं और इनसे अपने ईश्वर से जुदा होने का उसका करूण क्रंदन निकलता है। मैने मोहम्मद को भगवान कृष्ण और उनकी बांसुरी के बारे में बताया और यह भी कि भगवान कृष्ण हमारे सूफी संतों के अत्यंत प्रिय थे। मोहम्मद की पत्नी जे़नब, जो कि जर्मन हैं, भी वहां थीं। वे भी अपने पति की तरह संगीतविज्ञानी हैं। मोहम्मद का बांसुरी वादन सचमुच मन को प्रसन्नता से भर देने वाला था। हमने उस दिन सुबह और शाम का खाना साथ ही खाया क्योंकि सिमोन का आग्रह था कि हम रात का भोजन भी उनके साथ लें। उन्होंने खाने में दाल पकाई थी जिसका स्वाद लगभग वैसा ही था जैसा हमारे देश में होता है। यद्यपि मैं सिमोन और उनके पति से पहली बार मिला था परन्तु जब मैंने उनसे विदा ली तो मुझे लगा कि मैं अपने बरसों पुराने दोस्तों से बिछुड़ रहा हूँ। यह मेरे लिये सम्मेलन की बहुत सुंदर शुरूआत थी।
दोपहर के भोजन के बाद वे मुझे फिर शहर में घुमाने ले गईं और मैने लियोन के कुछ अन्य हिस्से देखे। मेरे पास शहर देखने के लिए सिर्फ वही एक दिन था क्योंकि अगले तीन दिनों तक तो मैं संवाद में व्यस्त रहने वाला था। स्पष्टतः, एक दिन में हम लोगों के लिए सब कुछ देखना संभव नहीं था। हम लोग उस पहाड़ को भी नहीं देख पाये, जिसपर एक जमाने में लियोन के मजदूर रहते थे और वहीं से उन्होंने अन्याय के विरूद्ध अपना संघर्ष किया था। ऐसा कहा जाता है कि कार्ल मार्क्स ने भी उनसे प्रेरणा ली थी। मैं केवल उतना ही देख सका जितना कि एक दिन में संभव था। मैंने लियोन का सिनेमा पर केन्द्रित संग्रहालय भी देखा, किन्तु केवल बाहर से। ल्यूमियर ब्रदर्स लियोन के हैं और उनके घर को संग्रहालय बना दिया गया है।
संवाद के सत्र 6 जुलाई की सुबह से शुरू हुए। ये संवाद काफी अनौपचारिक थे। किसी विषय विशेष में रूचि रखने वाले लोग पेड़ों की शाखाओं या जमीन पर समूह बनाकर बैठ जाते और चर्चा शुरू कर देते। सभी संवाद केन्द्रित थे मानवता और आधुनिक दुनिया में उसे पेश रही समस्याओं पर। मैं जिस समूह के साथ बैठा, उसमें हालिया रिओ सम्मेलन, अन्यायपूर्ण वैश्विक आर्थिक व्यवस्था और अरब देशों में हुई क्रांति पर चर्चा हो रही थी।
मुझसे अरब क्रांति पर अपने विचार रखने के लिए कहा गया। मैंने बैंगलोर के फायर लाईज आश्रम के सिद्घार्थ की ओर नजर घुमाई। वे पेरिस में हैं और फ्रेंच भाषा का अच्छा ज्ञान रखते हैं। उन्होंने अपने आश्रम में भी इस तरह के संवादों का आयोजन किया था। मुझे सिद्घार्थ की मदद की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि मैं वहां चर्चा शुरू होने के कुछ समय बाद पहुँचा था और मुझे यह मालूम नही था कि बातचीत किस विषय पर हो रही है। सिद्घार्थ ने मुझे संक्षेप में पहले हुई चर्चा के बारे में बताया और यह कहा कि मैं अरब देशों में हुई प्रजातांत्रिक क्रांति के बारे में अपने विचार सामने रखूं।
मैने कहा कि अरब क्रांति मूलतः राजनैतिक थी कि सामाजिक और सांस्कृतिक। इस क्रांति का क्या भविष्य होगा, इसका अंदाजा लगा पाना मुश्किल है क्योंकि राजनीति केवल विचारधारा पर आधारित नहीं होती बल्कि कई अन्य कारक भी उसे प्रभावित करते हैं। यह क्रांति विशुद्ध रूप से राजनैतिक थी और उसमे कोई सामाजिक सांस्कृतिकधार्मिक मुद्दा शामिल नही था। अभी तो मिस्त्र और ट्यूनीशिया में धार्मिक पार्टियों ने जीत हासिल कर ली है और धर्मनिरपेक्ष दलों को केवल कुछ सीटों पर संतोष करना पड़ा है। परन्तु इससे निराश होने की जरूरत नही है क्योंकि जै़मूल अबिदिन और हुस्नी मुबारक दोनों ने धार्मिक ताकतों का दमन किया था। ये दोनों शासक अमेरिका के पिट्ठू माने जाते थे।
आशा की एक किरण यह है कि इखवानूल मुसलमीन और अनेहदादोनों ने लोगों से यह वायदा किया है कि धार्मिक मामलों में उनकी नीतियां मध्यमार्गी होंगी और वे देश को धार्मिक कट्टरता की ओर नहीं ले जायेंगे। आश्चर्यजनक रूप से, लीबिया में भी धार्मिक अतिवाद पर कबीलाई और पारिवारिक वफादारियां भारी पड़ीं। अरब देशों में धर्मनिरपेक्षता और आधुनिकता की जड़ें बहुत गहरी नही हैं और इनको वहां जमने में कुछ वक्त लगेगा। इन परिस्थितियों में मध्यमार्गी इस्लाम ही सबसे अच्छा विकल्प मालूम होता है। शहर के एक टीवी चैनल ने भी इसी मुद्दे पर मुझसे बातचीत की और मैंने वहां भी यही बातें कहीं।
दोपहर के सत्र में मुझसे "मानवता और सार्वभौमिक मूल्य" विषय पर बोलने के लिए कहा गया। जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूं इस सम्मेलन में औपचारिक भाषण नहीं हुए वरन यह एक तरह का गोलमेज विमर्श था जिसमें गोलमेज नहीं थी! इस सत्र का फोकस टैगोर पर था और मुझसे अपेक्षा थी कि मैं टैगोर पर कुछ बोलूं। यद्यपि मुझे केवल उन तक सीमित रहने की जरूरत नहीं थी। नि:संदेह, टैगोर एक महान कवि, लघुकथा लेखक, चित्रकार, संगीतकार और प्रतिभाशाली बुद्धिजीवी थे। उनकी संगीत रचनाओं को रबीन्द्र संगीत कहा जाता है और बांग्लादेश रेडियो से तक रोज इस संगीत का प्रसारण होता है।
टैगोर सार्वभौमिक मूल्यों में विश्वास रखते थे और अपनी रचनाओं के जरिए उन्होंने इन मूल्यों को बढ़ावा दिया। वे धार्मिक संकीर्णता से कोसों दूर थे। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक "गीतांजलि" जिस पर उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला, में वे पूछते हैं, "तुम भगवान को मंदिरों में क्यों ढूंढते हो। मुझे तो मई की तपती दुपहरी में सड़क किनारे पत्थर तोड़ते मजदूरों में भगवान दिखते हैं। उनमें समाए ईश्वर को तुम आसानी से देख सकते हो" यह थी उनकी गरीबों और वंचितों के प्रति सहानुभूति की भावना। यह था उनका मानव श्रम की गरिमा पर विश्वास।
टैगोर ने ही गांधीजी को "महात्मा" का दर्जा दिया था। महात्मा एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है महान आत्मा। टैगोर ने गांधी को महान आत्मा क्यों कहा? उन्होंने पाया कि गांधी उनके आदर्शों को उनसे भी कहीं अधिक प्रतिबिंबित करते हैं। गांधी के अहिंसा और मानव प्रेम के दर्शन ने हमारी दुनिया की कई विभूतियों को प्रेरणा दी। इनमें शामिल हैं मार्टिन लूथर किंग जूनियर जिन्होंने गांधी की राह पर चलकर अफ्रीकीअमेरिकियों के अधिकारों की लंबी लड़ाई लड़ी।
गांधीजी ने अपनी पुस्तक "हिन्द स्वराज" में लिखा है, "मैं ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ता हूं पर मैं अंग्रेजों से घृणा नहीं करता। अपने दुश्मन से बेशक लड़ो परंतु एक मानव के रूप में उससे घृणा मत करो। तुम जब किसी व्यक्ति से लड़ते हो, तब, दरअसल, तुम जो बुराईयां उसमें हैं, उनसे लड़ते हो कि उसकी मानवता से" गांधीजी ब्रिटिश श्रमिक वर्ग के परम हितैषी थे। गांधी का दर्शन गहरी आंतरिक आस्था पर आधारित था। ऐसी आस्था के बगैर आपके मुंह से ऐसे शब्द निकल ही नहीं सकते।
आज हममें से शायद ही किसी में अपने विचारों के प्रति इतनी आस्था और द्रढता हो। इसके बिना हम दुनिया को नहीं बदल सकते। गांधीजी ने संकुचित धार्मिक सोच और साम्प्रदायिकता के खिलाफ जीवन भर संघर्ष किया और अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों, को अपना मानने के कारण ही उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ी। मुसलमानों के प्रति उनके दृष्टिकोण से नाराज एक हिन्दू कट्टरवादी ने उन्हें गोली मार दी। जिस समय पूरे देश में मुसलमानों के प्रति गहरी घृणा का वातावरण हो, उनके गले काटने की प्रतिस्पर्धा चल रही हो, ऐसे समय उनके अधिकारों के लिए लड़ने का काम गांधी जैसे असाधारण रूप से साहसी और द्रण विचार वाले मनुष्य ही कर सकते थे। वे नि:संदेह महान थे।
मैंने नरेन्द्र मोदी के गुजरात की बात भी की जहां गांधी की धरती पर 2000 निर्दोष मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया गया। किसी से घृणा करना, उसे नुकसान पहुंचाना, उसे मार डालना बहुत आसान है। कठिन है किसी से प्रेम करना और मानवता की रक्षा के लिए दृ़ता से खड़े रहना। वहां मौजूद सभी लोगों को मेरी बातें बहुत मर्मस्पर्शी लगीं। दक्षिण अफ्रीका से आई एक महिला ने कहा कि गांधी नि:संदेह महान थे और उन्हें महात्मा कहने वाले टैगोर भी उतने ही महान थे।
आधुनिक दुनिया में हमें जरूरत है ऐसे लोगों की जो सभी को और विशेषकर अल्पसंख्यकों को खुले दिल से गले लगाएं। आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था हर देश में प्रवासियों की संख्या बढ़ रही है और राजनैतिक दमन भी बढ़ रहा है। इस कारण कई अलग-अलग तरह के अल्पसंख्यक समूह बन गए हैं। हमारी दुनिया को कई गांधी चाहिए।
दूसरे समूहों में अन्य विषयों पर चर्चा हुई जिनमें मुख्यतः समाज के हाशिए पर रहने वाले तबकों से जुड़े मुद्दे शामिल थे जैसे, शिक्षा व्यवस्था, सड़क पर रहने वाले बच्चों की समस्या, मीडिया और आर्थिक असमानताएं।
इस तरह के संवादों के आयोजन की जरूरत दुनिया के हर कोने में है। फ्रांस के एक एनजीओ ने इस सिलसिले में जो पहल की है वैसी ही पहल अन्य स्थानों पर भी की जानी चाहिए। इस एनजीओ के कार्यकर्ता अत्यंत उत्साही और मेहनती थे और उन्होंने बड़े अच्छे ढंग से सारी व्यवस्थाएं संभालीं। सबसे अच्छी बात यह थी कि पूरी चर्चा अनौपचारिक वातावरण में हुई। वहां किसी राजनेता या विशिष्ट व्यक्ति को आमंत्रित नहीं किया गया और ही कोई उद्घाटन या समापन सत्र हुआ। हर व्यक्ति अपनी बात रखने के लिए स्वतंत्र था। मैं सम्मेलन में महिलाओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति से भी बहुत प्रभावित हुआ। उन्होंने गंभीरता और बौद्धिकता से अपने विचार प्रतिभागियों के समक्ष रखे।

-डॉ. असगर अली इंजीनियर

शुक्रवार, 4 मई 2012

बीती ताहिं बिसार दे?

गुजरात को दस वर्ष गुजर गए हैं परंतु वहां के दंगा पीड़ितों को आज तक न्याय नहीं मिल सका है। इस सिलसिले में पिछले कुछ समय से एक नई बहस प्रारंभ हुई है। कुछ लोगों का कहना है कि गुजरात के मुसलमानों को वह सब भूल जाना चाहिए जो उन पर गुजरा, दोषियों को माफ कर देना चाहिए और गुजरात में हो रहे विकास में हिस्सेदार बन आगे ब़ना चाहिए। आखिर कब तक मुसलमान 2002 के नाम पर रोतेझींकते रहेंगे? चाहे वह कितना ही भयावह अनुभव क्यों न रहा हो, वह अब गुजर चुका है और उसकी कटु स्मॢतियों को भुला देना ही श्रेयस्कर है। कुछ माह पहले, मौलाना वस्तानवी, जो कई मदरसे और धर्मनिरपेक्ष उच्च शिक्षण संस्थान चलाते हैं, ने भी इस आशय का सुझाव दिया था। उन्होंने कहा था कि मुसलमानों को गुजरात की विकास की मुख्यधारा में शामिल होना चाहिए और उससे पूरा लाभ उठाना चाहिए।
मेरा मानना है कि यह एक बहुत महत्वपूर्ण बहस है जिसके सभी निहितार्थों और पहलुओं पर गौर किया जाना जरूरी है। इस मुद्दे के गंभीर नैतिक और कानूनी पहलू हैं। यह विचार नैतिक दृष्टि से अत्यंत तार्किक, उचित और आकर्षक प्रतीत होता है कि गुजरात के मुसलमानों को अपने प्रियजनों के हत्यारों को माफ कर देना चाहिए और पूरे घटनाक्रम को एक दुःस्वप्न की भांति भूल जाना चाहिए। परंतु ऐसे किसी कदम के कानूनी और संवैधानिक पहलुओं पर विचार भी परम आवश्यक है।
सबसे पहले हमें """"भूल जाने"""" और """"माफ कर देने"""" के बीच के अंतर को समझना होगा। अक्सर ये दोनों शब्द (फारगेट एण्ड फारगिव) एक साथ इस्तेमाल किए जाते हैं परंतु ये समानार्थी नहीं हैं। इनमें महत्वपूर्ण अंतर हैं। क्षमा करना जहां नैतिक मूल्यों की श्रेणी में आता है वहीं भूल जाना एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। क्षमा करना (सिवाय उनके जो खून का बदला खून के सिद्घांत में आस्था रखते हैं) आसान है, भूल जाना कहीं मुश्किल।
गुजरात के कत्लओम जैसी लोमहर्षक घटनाओं को भूल जाना लगभग असंभव है। क्या गुलबर्ग सोसायटी, नरोदा पाटिया, अहमदाबाद के कुछ हिस्सों और उत्तर व केन्द्रीय गुजरात के मुस्लिम निवासी उन आतंक भरे दिनरातों को भूल सकते हैं? कई महिलाओं के साथ उनके परिजनों के सामने बलात्कार किए गए, बच्चों को उनके माता पिता की आंखों के सामने मौत के घाट उतार दिया गया। बिलकिस बानो अपने रिश्तेदारों की क्रुर मौत की चश्मदीद थीं। क्या इस तरह की आपबीती को कोई भूल सकता है?
किसी महिला के लिए एक साधारण बलात्कार को भी जीवन भर भुलाना मुश्किल होता है। फिर हम कैसे यह अपेक्षा कर सकते हैं कि कोई महिला उस बलात्कार और बर्बर व्यवहार को भुला सकेगी जो उसके परिवारजनों के सामने उसके साथ किया गया। हम क्या भूलते हैं और क्या याद रखते हैं यह कई मनोवैज्ञानिक अध्ययनों का विषय रहा है। कई बार किसी चीज को याद रखना मनोवैज्ञानिक दृष्टि से लाभप्रद होता है तो कभी भूल जाने से आदमी अपने मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रख पाता है। कुछ यादें ऐसी होती हैं कि अगर वे हमारा पीछा न छोड़ें तो हमारा पूरा जीवन नर्क हो जाए। इसके विपरीत, कई चीजें ऐसी होती हैं जिन्हें याद रखने से हमें प्रेरणा और संतोष प्राप्त होता है। अतः याद रखना और भूल जाना, एक अत्यंत जटिल परिघटना है।
दूसरी ओर, क्षमा करना एक जानतेबूझते लिया जाने वाला नैतिक निर्णय है। यह निर्णय लेने के पहले व्यक्ति को गहरे अतंद्वंद से गुजरना होता है। बदला लेने की इच्छा, मानव की मूल प्रकृति का हिस्सा है। हर व्यक्ति स्वयं को अपमानित करने या नुकसान पहुंचाने वाले व्यक्ति का अपमान करने या उसे नुकसान पहुंचाने की प्रबल इच्छा रखता है। जाहिर है कि यह प्रक्रिया हिंसा के एक अनवरत चक्र को जन्म देती है। इसी चक्र को तोड़ने के लिए सभी धमोर्ं के ग्रंथ हमें अपने शत्रुओं को क्षमा करने की शिक्षा देते हैं। बाईबल तो यहां तक कहती है कि अगर कोई तुम्हारे एक गाल पर चांटा मारे तो अपना दूसरा गाल उसके सामने कर दो। यह एक अत्यंत कठिन नैतिक निर्णय है जिसे लेने का साहस और धैर्य बहुत कम लोगों में होता है। दूसरा गाल सामने कर देने का उद्धेश्य है हमलावर को उसकी हरकतों के लिए शर्मसार करना।
क्षमा करने के साथ कई अन्य शर्तें जुड़ी हुई हैं। क्षमा करने के बाद दोनों पक्षों के बीच मेलमिलाप हो जाना चाहिए और उनके दिलों में एकदूसरे के प्रति तनिक सी भी कड़वाहट नहीं बचनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता तो ऐसी क्षमा का महत्व काफी कम हो जाता है यद्यपि उसकी कुछ उपयोगिता फिर भी बाकी रहती है। जहां तक गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का सवाल है, उन्होंने गुजरात दंगों की जिम्मेदारी आज तक नहीं ली है। कुछ लोगों का कहना है कि नरेन्द्र मोदी ने दंगों को रोकने में असफल रहकर स्वयं को मुख्यमंत्री के पद के लिए अयोग्य सिद्ध कर दिया है। कुछ लोग इससे भी आगे जाकर कहते हैं कि मोदी ने न सिर्फ दंगे नहीं रोके वरन दंगे कराने के पीछे भी वही थे।
कई क्षेत्रों से यह सुझाव भी आया था कि दक्षिण अफ्रीका की तरह गुजरात में भी ट्रुथ एण्ड रिकन्सियीलिएशन कमीशन (सत्य एवं मेलमिलाप आयोग) का गठन किया जाए। परंतु गुजरात सरकार ने इस सुझाव को एक सिरे से नकार दिया। इसका अर्थ यही है कि दंगा कराने वालों को अपने किए पर कोई पछतावा नहीं है। वे एक राजनैतिक विचारधारा विशेष से प्रभावित हैं और उन्होंने सन 2002 में गुजरात के मुसलमानों के साथ जो व्यवहार किया, वह उसे अपनी हिन्दुत्ववादी सोच के अनुरूप मानते हैं और वे यह भी मानते हैं कि उन्होंने जो कुछ किया वह पूरी तरह उचित था। अतः यह साफ है कि अगर उनकी क्रुरता के शिकार हुए लोग, गुजरात के दंगाईयों को क्षमा भी कर दें तो भी उससे उनके मन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और उनका ह्दय परिवर्तन होने की संभावना तो लगभग शून्य है।
इस तरह, गुजरात के दंगाईयों को क्षमा करने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। वे तो पहले से ही यह मानते हैं कि चूंकि उनकी पार्टी सत्ता में है इसलिए वैसे भी उन्हें कोई छू भी नहीं सकता। बेस्ट बेकरी और बिलकिस बानो मामले, उच्चतम न्यायालय की अनुमति से, गुजरात के बाहर के न्यायालयों में इसलिए चलाने पड़े क्योंकि गुजरात में पीड़ितों को न्याय मिलने की कोई संभावना नहीं थी। उल्टे, दंगाई, पीड़ितों को डरातेधमकाते रहे हैं। उन्हें उनके घरों में लौटने नहीं दिया जा रहा है और उनपर यह दबाव है कि वे पुलिस में की गई अपनी रिपोर्टों को वापिस ले लें और अगर मामला अदालत तक पहुंचे तो पक्षद्रोही साक्षी बन जावें।
अगर इन अपराधियों ने जरा सा भी पश्चाताप दिखाया होता तो उन्हें क्षमा करने और उनके साथ फिर से मेलमिलाप करने का कोई अर्थ होता। जब अपराधी के मन में पश्चाताप हो, वह शत्रुता खत्म करने के लिए इच्छुक दिखे तब उसे क्षमा कर देना, पीड़ित के मानसिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। इससे उसकी बदला लेने की इच्छा खत्म हो जाती है और चोट पहुंचाने वाले को पीड़ा न पहुंचा सकने की मजबूरी से उत्पन्न बैचेनी और अवसाद से वह मुक्त हो जाता है। एक तरह से क्षमा करने से व्यक्ति को उसके खिलाफ की गई हिंसा या उसके अपमान का आध्यात्मिक और नैतिक मुआवजा मिल जाता है।
आईए, अब हम न्याय के मुद्दे पर विचार करें। इस मुद्दे के महत्व को हम कम करके नहीं आंक सकते। शायद यह सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है। शक्तिशाली और प्रभुत्वशाली वर्ग को कमजोर वर्गों के खिलाफ हिंसा करके, उन पर अत्याचार करके, बच निकलने नहीं दिया जा सकता। प्रजातंत्र का आधार ही है कानून का राज। और जब किसी राज्य का प्रशासनिक मुखिया, जो कि संविधान के आधार पर शासन को चलाने के लिए जिम्मेदार है और कानूनव्यवस्था बनाए रखना जिसके कर्तव्यों में शामिल है, वही व्यक्ति जब अपने कर्तव्यों के पालन में असफल हो जाए और न्यूटन के गतिकी के तीसरे नियम को उद्धत कर हिंसा को औचित्यपूर्ण ठहराए, तब न्याय का मुद्दा और महत्वपूर्ण बन जाता है।
किसी भी संवैधानिक प्रजातंत्र में सबके साथ न्याय, प्रजातंत्र की सफलता की आवश्यक शर्त है। यद्यपि न्याय को सामन्यतः कानून से जोड़ा जाता है तथापि उसका एक नैतिक पक्ष भी हैविशेषकर पीड़ित की दृष्टि से। अगर मेरे साथ अन्याय करने वाले व्यक्ति को न्यायिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है तो इससे मुझे एक आतंरिक संतुष्टि प्राप्त होती है और व्यवस्था में मेरी आस्था मजबूत होती है।
साफ है कि यदि न्याय नहीं होता तो इससे संवैधानिक प्रजातंत्र के स्थायित्व पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। न्याय पाने के लिए अनिश्चित काल का इंतजार व्यवस्था में आस्था को कमजोर करता है और व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। पीड़ितों को ऐसा लगने लगता है कि इस व्यवस्था में केवल शक्तिशाली व्यक्तियों के साथ ही न्याय होता है। अगर उच्चतम न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करता तो गुजरात हिंसा के जिन चन्द मामलों में न्याय हुआ है, वह भी नहीं हो पाता।
गुलबर्ग सोसायटी का घटनाक्रम तो दिल को हिला देने वाला था। अहसान जाफरी और 61 अन्य लोगों को जिन्दा जला दिया गया। उनकी लाशों को भी अपमानित किया गया। हरचंद कोशिशों के बावजूद अहसान जाफरी की पत्नि को आज तक न्याय नहीं मिल सका है। उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित विशेष जांच दल ने भी मोदी को क्लीन चिट दे दी। यद्यपि एमीकस क्यूरे (न्यायालय के मित्र) राजू रामचन्द्रन ने कहा है कि एसआईटी ने मोदी को क्लीन चिट देकर गलती की है।
इस सबके बावजूद जाफरी की पत्नी ने हौसला नहीं खोया है। उनका लंबा और कठिन संघर्ष इस तथ्य को रेखांकित करता है कि किसी भी अपराध या अत्याचार के पीड़ित में न्याय पाने की जबरदस्त उत्कंठा होती है। इसे बदला लेने की इच्छा नहीं समझा जाना चाहिए क्योंकि बदला लेने के अन्य तरीके भी उपलब्ध हैं। यदि पीड़ितों को न्याय मिलता है और आक्रांताओं को सजा, तो इससे न केवल ऐसी घटनाओं की पुनरावॢत्ति पर रोक लगती है वरन पीड़ित भी इस अपराधबोध से मुक्त हो जाते हैं कि उन्होंने हिंसा के शिकार हुए अपने निर्दोष प्रियजनों के लिए कुछ नहीं किया।
इस संदर्भ में गुजरात एकमात्र उदाहरण नहीं है। सन 1984 में निरपराध सिक्खों पर जो बीती वह भी उतनी ही पीड़ादायक थी। सिक्खविरोधी दंगों के अपराधियों को भी आज तक सजा नहीं मिल सकी है। उनमें से अधिकांश शक्तिशाली राजनेता हैं। हाशिमपुरा में सन 1987 में जो कुछ हुआ था वह इससे भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण था। लगभग 40 युवा लड़कों को उनके घरों से खींचकर ट्रक में भर, मेरठ के बाहरी हिस्से में ले जाया गया। वहां उन सबको गोली मारकर उनके मॢत शरीर एक नहर में फेंक दिए गए। इस घटना को 25 साल गुजर चुके हैं परंतु एक भी अपराधी को सजा नहीं मिली है।
यह सब देखसुनकर कभीकभी ऐसा लगता है कि हमारे प्रजातंत्र में कानून का राज है भी है या नहीं। हमारी प्रशासनिक मशीनरी का पूर्वाग्रहपूर्ण रूख और न्यायपालिका की सुस्त चाल हमारी व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। हमारे देश का कानून और व्यवस्था लागू करने वाले तंत्र का पूरी तरह साम्प्रदायिकीकरण हो चुका है। इससे भी दुर्भाग्यजनक यह है कि हमारे सियासी आका इस तथ्य से वाकिफ होने के बावजूद, हालात को बेहतर बनाने के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं। कुछ राजनैतिक दल खुलओम जातिगत और साम्प्रदायिक हिंसा को प्रोत्साहन देते हैं और उनका कुछ नहीं बिगड़ता।
अगर ईमानदारी और तत्परता से न्याय हो तो राजनेता और पुलिसकर्मी मनमानी नहीं कर सकेंगे और कम से कम गुजरात जैसी व्यापक साम्प्रदायिक हिंसा भविष्य में नहीं होगी। यही कारण है कि साम्प्रदायिक हिंसा के पीड़ितों के साथ न्याय होना आवश्यक है। अगर ऐसा नहीं होता तो हमारे प्रजातंत्र को घुन लग जाएगा और कानून और व्यवस्था पूरी तरह ठप्प हो जाएगी।
जो लोग बीती ताहिं बिसार दे की बात कह रहे हैं उन्हें उसके दूरगामी परिणामों पर विचार करना चाहिए। हमें उनकी मंशा पर संदेह नहीं है। हो सकता है कि उनका लक्ष्य मात्र इतना हो कि मुस्लिम समुदाय पुराने घावों को भूलकर आधुनिक शिक्षा पाए और प्रगति करे। यद्यपि शिक्षा, प्रगति और समॢद्धि महत्वपूर्ण हैं तथापि न्याय की उपेक्षा घातक सिद्ध होगी। न्याय पाने की कोशिशों को हिकारत की दृष्टि से देखना खतरनाक होगा।
अगर पीड़ितों को न्याय मिल जाता है तो वे जिस मानसिक त्रास से रोज गुजर रहे हैं उससे उन्हें मुक्ति मिलेगी और उनकी खुशहाली की राह प्रशस्त होगी।
-डॉ़ असगर अली इंजीनियर
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