शनिवार, 17 नवंबर 2012

नायपॉल : विकृत प्रतिभा

मुंबई में द टाईम्स ऑफ इंडिया समाचारपत्र समूह द्वारा आयोजित साहित्योत्सव में जानेमाने नाट्य कलाकार व धर्मनिरपेक्ष कार्यकर्ता गिरीश कर्नाड ने अपने भाषण़ में उस जूरी की कड़े शब्दों में निंदा की, जिसने साहित्यकार व्ही़ एस़ नायपॉल को पुरस्कार देने का निर्णय लिया था। कर्नाड का कहना था कि नायपॉल फिरकापरस्त हैं और इस पुरस्कार के लायक नहीं हैं। कुछ लोगों ने ऐसे मौके पर नायपॉल पर हमला बोलने के लिए कर्नाड की निंदा भी की। यह कहा गया कि कर्नाड को कम से कम उस समय नायपॉल के बारे में कटु शब्द नहीं बोलने थे।
गिरीश कर्नाड ने अपना बचाव करते हुए कहा कि उनकी अन्तार्त्मा यह स्वीकार नहीं कर पा रही थी कि नायपॉल को इस तरह का सम्मान मिले और उनके लिए अपना विरोध व्यक्त करने का सबसे बेहतर मौका वह समारोह ही था। नायपॉल नोबेल पुरस्कार विजेता हैं और उन्हें अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि साहित्यिक या अन्य मुद्दों को लेकर उनकी निंदा नहीं की जा सकती। एक धर्मनिरपेक्ष कार्यकर्ता के बतौर मैं भी इस बात से सहमत हूँ कि चोट तभी की जानी चाहिए जब लोहा गर्म हो। कर्नाड ने नायपॉल के विचारों पर हमला करने के लिए बिलकुल सही वक्त चुना।
यद्यपि नायपॉल का बचपन त्रिनिनाद में मुसलमानों के बीच गुजरा और अपने जीवन की शुरूआत में वे तार्किकता के हामी थे परन्तु शनै:शनै: इस्लाम और मध्यकालीन भारतीय इतिहास के संबंध में उनके विचारों में गहरा परिवर्तन आ गया। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने बिना सोचेविचारे इस्लाम और भारतीय इतिहास के बारे में आऱएस़एस़ की सोच को अपना लिया। उनके जीवन की शुरूआत तार्किकता से हुई परन्तु अपने जीवन के अंत में वे हिन्दुत्ववाद के झंडाबरदार बन गये। सन 1970 की शुरूआत में उन्होंने भारत पर अंग्रेजी में एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक था ‘एन एरिया ऑफ डार्कनेस’। इस पुस्तक में उन्होंने भारत में व्याप्त अंधविश्वासों और इनसे उपजी कुप्रथाओं की कड़ी निंदा की। इस पुस्तक की प्रतियों को जनसंघ (अब भाजपा) ने मुंबई के फ्लोरा फाउंटेन पर जलाया था। इस पुस्तक की प्रतियाँ देश के अन्य स्थानों में भी जलाई गयी होंगी। परन्तु चूंकि मैं मुंबई में रहता था इसलिए मैंने इस घटना का विवरण मुंबई के सामाचारपत्रों में प़ा।
परन्तु मैं द टाईम्स ऑफ इंडिया में छपे नायपॉल के पूरे पेज के साक्षात्कार को प़कर अचंभित रह गया। इस साक्षात्कार में उन्होंने रामजन्मभूमि आंदोलन को इस आधार पर सही ठहराया था कि वह राष्ट्रीय गौरव का प्रश्न है। उनका कहना था कि मुसलमान शासकों ने देशभर में कई मंदिरों को जमींदोज किया था और
रामजन्मभूमि आंदोलन, एक तरह से, देश के मुसलमानों के प्रति हिन्दुओं के मन में भरे गुस्से का प्रतीक था। अगर मेरी स्मॢति मुझे धोखा नहीं दे रही है तो यह साक्षात्कार हिन्दुत्व के
जानेमाने पैरोकार अरूण शौरी ने लिया था।
युवा साहित्यकार के रूप में नायपॉल तार्किकतावादी और भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वासों के कटु निंदक थे। परन्तु जैसेजैसे लेखक के रूप में उनका दर्जा ॐचा होता गया और उन्हें विभिन्न पुरस्कारों से नवाजा जाने लगा, वे उन लोगों की स्वीकार्यता हासिल करने के लिए बेचैन होने लगे जो स्वयं को हिन्दू धर्म का रक्षक बताते हैं। उनकी भाषा वही हो गयी जो हिन्दुत्ववादियों की है। वे हिन्दू धर्म और दर्शन की उच्च पंरपराओं, जो वेदान्त और उपनिषदों में निहित हैं, व विकृत हिन्दुत्व के बीच भेद नहीं कर सके। वे यह नहीं समझ पाये कि कुछ निहित स्वार्थी तत्व, अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए, हिन्दू धर्म की शिक्षाओं को गलत रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। और नायपॉल, गिरीश कर्नाड के शब्दों में, ‘भारतीय इस्लाम के कट्टर विरोधी बन गए।’
प्रश्न यह है कि क्या नायपॉल, जो भारतीय इस्लाम और मुसलमानों को खलनायक के रूप में देखते हैं, को महान चिंतक और लेखक कहा जा सकता है। इस प्रश्न का कोई सीधा उत्तर नहीं हो सकता। मुझे लगता है कि नायपॉल जैसे लेखक के मामले में यह एक ऐसा मुद्दा है जो बहस का विषय हो सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि नायपॉल में साहित्यिक प्रतिभा है। इस तथ्य को कर्नाड ने भी यह कहते हुए स्वीकार किया कि ‘‘वे नि:संदेह हमारी पी़ी के महान अंग्रेजी लेखकों में से एक हैं‘‘। परंतु इस तरह के प्रतिभाशाली व अपने फन में माहिर लेखक भी सही रास्ते से भटक सकते हैं, विशेषकर जब वे दूसरे धमोरं, नस्लों आदि से संबंधित विषयों पर लिखते या चिंतन करते हैं। ऐसा होने की संभावना तब और ब़ जाती है जब संबंधित धमोर्ं या नस्लों के बीच किसी तरह का प्रतिस्पर्धा का भाव हो।
नायपॉल इस तरह के पूर्वाग्रहों से ऊपर नहीं हैं। अतः यह महत्वपूर्ण है कि हम एक अच्छे व प्रतिभाशाली लेखक और एक महान लेखक के बीच अंतर करें। केवल एक महान लेखक ही अपने पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर, अपने विरोधियों की क्षमता व प्रतिभा का भी उचित मूल्यांकन कर सकता है और वह केवल अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए नहीं लिखता। नायपॉल इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते। उनकी महत्वाकांक्षाएँ, उनकी महानता पर अगर वे महान हैं तो हावी हो गयीं हैं। वे मिट्टी के माधो साबित हुए हैं।
भारतीय इतिहास की उनकी समझविशेषकर उस दौर की जब देश में मुस्लिम राजवंशों का शासन थाअधूरी और एकतरफा है। वे इतिहासविद नहीं हैं परंतु किसी भी व्यक्तिविशेषकर नायपॉल जैसे प्रतिभाशाली लेखक के लिएइतिहास को समझना बहुत मुश्किल नहीं होना चाहिए बशर्ते उसका दिमाग खुला हुआ हो और वह पूर्वाग्रहों से मुक्त हो। एक महान लेखक को अपने वैचारिक पूर्वाग्रहों से ऊपर उठना होता है और अपनी व्यक्तिगत पसंदनापसंद को अपने लेखन में उतारने से बचना होता है। नायपॉल ऐसा करने में असफल रहे हैं। उर्दू साहित्य में गालिब, इकबाल और मंटो जैसे लेखक और कवि इसलिए महानता हासिल कर सके क्योंकि उन्होंने अपनी धार्मिक, सामाजिक और ऐतिहासिक परंपराओं की निंदा करने में कभी संकोच नहीं किया और न ही वे पूर्वाग्रहों से पीड़ित रहे। ठीक इसी कारण से राजा राममोहन राय, टैगोर और महात्मा गांधी को बिना किसी हिचक के महान चिंतक और लेखक माना जा सकता है। उन्होंने कभी अपने पूर्वाग्रहों को अपने विचारों और लेखनी पर हावी नहीं होने दिया।
कबजब कोई व्यक्ति अपने जीवन के उत्तरार्ध में अपनी शुरूआती गलतियों को स्वीकार करता है और उन्हें सुधारता है। परंतु नायपॉल, जैसा कि पहले कहा जा चुका है, प्रगतिशील से प्रतिगामी बने। उनकी लेखन यात्रा तार्किकता से पूर्वाग्रह की ओर ब़ी। शुरूआत में वे राजा राममोहन राय और टैगोर की तरह
तार्किकतावादी थे और हमें विरासत में प्राप्त परंपराओं के कटु आलोचक थे। परंतु ज्योंही वे साहित्य के क्षेत्र में एक स्थापित हस्ताक्षर बने, वे अपनी छवि एक पुरातनपंथी हिन्दू बतौर स्थापित करने की कोशिश करने लगे। उनके पूर्वाग्रह, उनकी किताबों से झांकने लगे। उनकी पुस्तक ‘द वुंडिड सिविलाईजेशन‘ (घायल सभ्यता) उनकी दकियानूसी और प्रतिगामी सोच का उदाहरण है। किताब के शीर्षक से ही उनके पूर्वाग्रह झलकते हैं। वे यह मानते हैं कि हिन्दू सभ्यता को मुसलमानों द्वारा अपमानित और नष्ट किया गया।
जैसा कि गिरीश कर्नाड ने बताया, नायपॉल विजयनगर साम्राज्य को हिन्दू संस्कृति का गौरवशाली अध्याय बताते हैं। परंतु विजयनगर के बारे में उनके विचार सीधे सन 1900 में प्रकाशित राबर्ट सीवेल की पुस्तक ‘ए फॉरगाटन एम्पयार‘ से लिए गए हैं। गिरीश कहते हैं ‘‘नायपॉल हमेशा से औपनिवेशिक स्त्रोतों को अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखते रहे हैं। वे इन स्त्रोतों को पूर्णतः सत्य मानते हैं और इन्हें अपने विचार बताकर प्रचारित करते हैं।‘‘
मैं जब विजयनगर के अवशेषों को देखने गया था तब मेरे साथ मेरे एक ब्राहम्ण मित्र भी थे, जो कि धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्ध हैं। वहां एक गाईड कुछ पर्यटकों को घुमाया रहा था। कुछ टूटी हुई मूर्तियों को दिखाकर उसने पर्यटकों को बताया कि ये मूर्तियां हिन्दू देवीदेवताओं की हैं, जिन्हें मुस्लिम आक्रांताओं ने तोड़ा था और यह भी कि मुसलमानों ने विजयनगर साम्राज्य को नष्ट किया था। मेरे मित्र ने जैसे ही यह सुना उन्होंने पर्यटकों को गुमराह करने के लिए गाईड को जमकर लताड़ा और उन मूर्तियों के टूटने के असली कारण के बारे में पर्यटकों को बताया।
हमारे ब्रिटिश शासकों ने हमें बांटने के लिए हमारे इतिहास के साथ जमकर छेड़छाड़ की थी और अगर नायपॉल इतिहास के ब्रिटिश संस्करण को पत्थर की लकीर मानते हैं तो यह उनकी विचारशून्यता का ही उदाहरण है। किसी भी साम्प्रदायिक विचारधारा में गहराई तो होती ही नहीं है, उसमें सत्य भी नहीं होता। वह झूठ का पुलिंदा और तथ्यों को तोडे़मरोड़े जाने का परिणाम होती है। और किसी भी रचनात्मक और विशेषकर महान लेखक का लक्ष्य ही सत्यान्वेषण होता है। ऐसा लगता है कि नॉयपाल की सत्यान्वेषण में तनिक भी रूचि नहीं है। उल्टे, हिन्दू साम्प्रदायिक विचारधारा के उनके प्रेम के चलते वे झूठ को भी सहर्ष स्वीकार कर रहे हैं। ऐसे में उन्हें एक महान लेखक कैसे कहा जा सकता है?
यह आश्चर्यजनक है कि कुछ लोग यह तर्क दे रहे हैं कि चूंकि नायपॉल ने एक पाकिस्तानी मुस्लिम महिला से विवाह किया है इसलिए वे हिन्दू साम्प्रदायिक नहीं हो सकते। यह तर्क सचमुच अजीब है। हमारे जैसे पितृसत्तात्मक समाज में एक साधारण आदमी, जिसकी कोई उपलब्धियां नहीं हैं और जिसमें तनिक भी प्रतिभा नहीं है, वह भी अपनी पत्नी पर हावी रहता है। ऐसे में क्या हम यह अपेक्षा कर सकते हैं कि ‘सर‘ की उपाधि और नोबेल पुरस्कार से सम्मानित नायपॉल अपनी पत्नी के प्रभाव में होंगे? उल्टे, उनकी पत्नी उनके आभामंडल से इतनी अभिभूत होंगी कि वे जो कहते होंगे, उसे वे सच मानती होंगी।
पाकिस्तान में भी ऐसी मुस्लिम महिलाएं हैंऔर उनमें से कुछ को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूंजो मुस्लिम समुदाय द्वारा उनके दमन से इतनी दुःखी हैं कि वे इस्लाम और इस्लाम से जुड़ी हर चीज को घोर नापसंद करती हैं। अतः नायपॉल की पत्नी के पाकिस्तानी मुसलमान होने से कुछ साबित नहीं होता। यह अत्यंत सतही तर्क है। हमें सर विद्या के तर्कों और उनके लेखन को सच्चाई की कसौटी पर कसना होगा। उनकी पत्नी के धर्म का इससे कोई लेनादेना नहीं है।
एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि हर महान लेखक भविष्यदृष्टा होता है। वह न केवल यह लिखता है कि तत्कालीन समाज कैसा है वरन वह इस पर भी विचार करता है कि समाज कैसा होना चाहिए। वह एक ऐसे समाज की कल्पना करता है जो अधिक मानवतावादी होगा और जो मानवता को उसके कष्टों और दुःखों से मुक्ति दिलाएगा। इसके विपरीत, साम्प्रदायिक विचारधारा विकृत मूल्यों और दूसरों के प्रति घृणा पर आधारित होती है। किसी भी रचनात्मक लेखक का मुख्य आत्मिक गुण होता है प्रेम। जबकि साम्प्रदायिक सोच वाले व्यक्ति केवल घृणा बांटते हैं। सर विद्या व्यक्तिगत महानता की तलाश में दौड़ रहे हैं जबकि महान चिंतक, चाहे स्वयं की कीमत पर ही सही, समाज को महान बनाना चाहते हैं। सभी महान लेखक और चिंतक अपने समय से आगे सोचते हैं। उनके लिए भविष्य, भूतकाल से अधिक महत्वपूर्ण होता है यद्यपि वे गुजरे हुए वक्त में जो कुछ अच्छा था, उसे स्वीकारने में सकुचाते भी नहीं हैं। इतिहास के झूठे संस्करण के आधार पर महानता हासिल नहीं की जाती बल्कि इतिहास, सच्चे चिंतक और लेखक पर महानता अपिर्त करता है।
यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है कि नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद सर विद्या ने भाजपा कार्यालय जाकर श्री एल़ के़ आडवाणी से आशीर्वाद लिया। नायपॉल नोबेल के लायक थे या नहीं यह तो नोबेल पुरस्कार समिति ही जाने परंतु केवल नोबेल विजेता होने से कोई व्यक्ति महान नहीं बन जाता। ज्यादा से ज्यादा उससे यह पता चलता है कि उस व्यक्ति में साहित्यिक प्रतिभा है। वैसे भी, नोबेल पुरस्कार राजनैतिक सहित कई इतर कारणों से भी दिया जाता है। टैगोर को नोबेल पुरस्कार दिया गया परंतु महात्मा गांधी को नहीं। क्या इससे महात्मा, टैगोर से कम महान व्यक्ति साबित होते हैं? महात्मा गांधी नि:संदेह टैगोर से कहीं अधिक महान व्यक्ति थे। उपनिवेशवाद के खिलाफ उनके शानदार संघर्ष ने उन्हें दुनिया के महानतम व्यक्तियों की श्रेणी में स्थान दिया है और इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन्हें नोबेल पुरस्कार के लायक नहीं समझा गया।
-डॉ़ असगर अली इंजीनियर

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