अभी हाल तक कुछ लोग यह विचार व्यक्त कर रहे थे कि हमारे देश में साम्प्रदायिकता के प्रभाव में काफी कमी आयी है। कुछ का तो यहां तक कहना था कि बदले हुए वातावरण के प्रकाश में, संसद द्वारा साम्प्रदायिक हिंसा निरोंधक विधेयक पारित करने की आवश्यकता ही नहीं रह गई है। शायद इन लोगों की मान्यता थी कि गुजरात के भयावह दंगों ने देश को इतना गहरा सदमा पहुंचाया है कि अब हमारे देश में बड़े साम्प्रदायिक दंगे होने की संभावना न के बराबर है। परंतु अभी हाल में उत्तरप्रदेश के कई शहरों में साम्प्रदायिक दंगे हुए और कुछ दिनों पूर्व, असम में, गुजरात की तर्ज पर दिल को हिला देने वाली हिंसा हुई। इसके बाद, भारत के दक्षिणी राज्यों में रहने वाले उत्तरपूर्व के नागरिकों को निशाना बनाया जा रहा है।
राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक पर बहस के दौरान जनता दल यूनाइटेड के नेता और एनडीए की संयोजक श्री शरद यादव ने प्रस्तावित बिल को अप्रासंगिक बताते हुए कहा था कि चूंकि देश में अब साम्प्रदायिक हिंसा नहीं हो रही है इसलिए इस बिल की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि यह बिल, मुगल शासनकाल की तरह, देश में हिन्दुओं और मुसलमानों के लिए अलगअलग कानूनों का सॢजन करेगा। स्पतष्टतः वे इस मुद्दे पर भाजपा की सोच को अभिव्यक्त कर रहे थे। कहने की आवश्यकता नहीं कि मुगल शासनकाल की बात करना पूरी तरह अर्थहीन था और इससे हमें यह भी समझ में आता है कि कथित रूप से राममनोहर लोहिया के विचारों का प्रतिनिधित्व करने वाली धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के धर्मनिरपेक्ष नेताओं का असली चरित्र क्या है। श्री यादव ने जोर देकर यह भी कहा कि देश में अब साम्प्रदायिक दंगे होने बंद हो गये हैं। इस दावे में सच्चाई का एक अंश भी नहीं था। जिस समय श्री यादव राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में यह दावा कर रहे थे, लगभग उसी समय राजस्थान के शारदा, मंगलथाना व गोपालग़ में साम्प्रदायिक दंगे हो रहे थे। गोपालग़ में राजस्थान पुलिस द्वारा एक मस्जिद में दस मेव मुसलमानों को गोलियों से भून दिया गया।
श्री यादव के दावे का खंडन करते हुए मैंने अपने भाषण में कहा कि या तो श्री यादव समाचारपत्र प़ते नहीं हैं और या फिर वे जानबूझ कर पिछले कुछ महीनों के दौरान हुए दंगों को
नजरअंदाज कर रहे हैं। और अब, जबकि असम में हिंसा का विस्फोट हो गया है और वहां के बंगाली मुसलमान और पूरे देश में रह रहे उत्तरपूर्व के निवासी स्वयं को घोर असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, तब श्री यादव का क्या कहना हैं? दुर्भाग्यवश, भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए द्वारा साम्प्रदायिक हिंसा विेधेयक पर किये गये तीखे हमले के चलते, यूपीए2 सरकार ने साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक को संसद में प्रस्तुत करने का इरादा त्याग दिया है।
कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन ने सन 2004 के लोकसभा चुनाव के अपने चुनावी घोषणापत्र में यह वायदा किया था कि गुजरात के 2002 के भयावह साम्प्रदायिक दंगों के परिपे्रक्ष्य में, वह सरकार में आने पर, साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक पारित करेगी। इस वायदे को आज 8 वर्ष बीत चुके हैं परंतु यह विधेयक, कानून बनना तो दूर, संसद में प्रस्तुत तक नहीं हो सका है। कोई नहीं जानता कि यह कब प्रस्तुत होगा या कभी होगा भी या नहीं। मुझे ऐसा लगता है कि अगर यह बिल पारित हो गया होता तो असम के दंगे नहीं होते।
हम तब तक कोई कानून बनाने पर विचार नहीं करते जब तक कोई बड़ा हादसा न हो जाये और जब कोई हादसा हो जाता है, तब भी हम उस तरह के हादसे की पुनार्वृत्ति रोकने के उपाय करने में इतनी देरी कर देते हैं कि उसकी उपयोगिता ही समाप्त हो जाती है। कई बार संबंधित कानून को इतना कमजोर बना दिया जाता है कि वह निष्प्रभावी हो जाता है। जहां तक धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न है, कांग्रेस उसके पक्ष में बहुत मजबूती से खड़ी नहीं दिखती और भाजपा के लिए तो साम्प्रदायिकता ही जीवनीशक्ति है। ऐसे में हम कैसे यह कह सकते हैं कि हमारा देश कभी भी एक सच्चा प्रजातांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होगा।
हमारे देशवासियों में कितनी आपसी एकता और भाईचारा है, यह गुजरात व असम के दंगों और उसके बाद दक्षिण भारत के राज्यों में उत्तरपूर्वी इलाकों के निवासियों पर हुए हमलों से जाहिर है। घृणा फैलाने वाले एस़एम़एस़ किसने भेजे, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि यह कि केवल कुछ हजार एस़एम़एस़ संदेशों ने उत्तरपूर्व के नागरिकों को इस हद तक आतंकित कर दिया कि वे अपने कामधंधे छोड़कर, ताबड़तोड़ अपने अपने गृह राज्यों के लिए रवाना हो गये। इस घटनाक्रम के लिए पाकिस्तान को दोषी बताया जा रहा है पंरतु क्या यह कटु सत्य नहीं है कि उत्तरपूर्वी राज्यों के निवासियों को इतनी आसानी से आतंकित करना इसलिए संभव हो सका क्योंकि उन पर देश के विभिन्न इलाकों में पहले से ही या तो हिंसक हमले हो रहे थे और या फिर उनके प्रति भेदभाव किया जाता रहा था। यही कारण था कि एक एस़एम़एस़ से वे इतने घबड़ा गये कि बैंगलोर से तीन दिन की लम्बी यात्रा कर गुवहाटी पहुॅच गये। उत्तरपूर्वी राज्यों के निवासियों का पलायन पुणे, मुंबई, बैंगलोर, चैन्नई, हैदराबाद व लखनऊ से भी हुआ।
क्या कारण हैं कि उत्तरपूर्व के निवासियों को अपने ही देशवासियों पर भरोसा नहीं है? क्या कारण कि वे इतनी जल्दी घबड़ा जाते हैं? इसका कारण यह है कि हमने उन्हें कभी अपना माना ही नहीं। उनकी नस्लीय विभिन्नता के कारण उनके चेहरेमोहरे में जो अंतर हैं उनके कारण हम उन्हें बाहरी समझते रहे। दिल्ली में उत्तरपूर्व की महिलाओं के साथ अश्लील व्यवहार की घटनाएं होती रहती हैं। हमारे देश में राष्ट्रीय एकीकरण की भावना की कमी के पीछे हमारी शिक्षा व्यवस्था भी है। पाकिस्तान के सिर पर दोष म़ देने से काम नहीं चलने वाला है। हमे यह भी सोचना होगा कि हमने स्वयं अपने देशवासियों में एकता कायम करने के लिए क्या किया।
जाति, धर्म, भाषा, नस्ल और लिंग यह सब लोगों को आपस में बांटते हैं। हमारी विभिन्नता हमारी ताकत बनने की बजाय हमारी कमजोरी बन गई है। हमारे राजनेता हमारे बीच अलगाव के बीज बोने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। भाजपा, कांग्रेस को दोषी बताती है और कांग्रेस, भाजपा को। परंतु दोनों का उद्देश्य एक ही है और वह है अपना अपना वोट बैंक बनाना।
आज देश में ऐसा कौन सा राजनैतिक दल है, जिसका अपना वोट बैंक न हो? छोटे और क्षेत्रीय राजनैतिक दल भी इस मामले में किसी से पीछे नहीं हैं। सभी दल अपनेअपने वोट बैंकों को प्रसन्न करने में लगे रहते हैं। कोई दलितों को अपना वोट बैंक मानता है, कोई मुसलमानों को, कोई ब्राम्हणों का,े कोई राजपूतों को तो कोई यादवों को। इस तरह, चुनाव हमारे देश में लोगों को एक करने की बजाय उन्हें बांटने का साधन बन गये हैं। इसका एक कारण यह भी है कि हमने आँखें बंद कर ब्रिटिश चुनाव व्यवस्था को अपना लिया है, जिसमें सबसे ज्यादा वोट पाने वाला विजेता होता है।
यह व्यवस्था ब्रिटेन के लिए ठीक थी क्योंकि वहां का समाज एकसार है। उनकी एक ही भाषा और संस्कृति है। हमारे नेताओं को यह समझना था कि भारत जैसी ओँखें चौंधिया देने वाली विविधताओं से भरे देश के लिए, """"जिसेसबसे–अधिक–वोट–मिले–वही– विजेता वाली व्यवस्था उपयुक्त नहीं है। हर चुनाव में हम देखते हैं कि 18 से 25 प्रतिशत मत प्राप्त करने वाले विजेता बन जाते हैं और यह दावा करते हैं कि उन्हें बहुमत का समर्थन हासिल है। यह तो एक तरह का मखौल है।
हमें अपनी चुनाव प्रणाली में आमूलचूल बदलाव लाने होंगे। विजेता के लिए कम से कम 51 प्रतिशत मत पाना अनिवार्य करना होगा। अगर ऐसा हो जाता है तो राजनेताओं को सभी मतदाताओं का समर्थन हासिल करना होगा न कि एक छोटे से वोट बैंक का। अभी तो चुनाव नजदीक आते ही वोट बैंक की राजनीति शुरू हो जाती है।
असम दंगों के पीछे भी भाजपा की वोट बैंक की राजनीति है। भाजपा, आगामी चुनाव में बोडो मत पाने के लिए जमकर उनका समर्थन कर रही है। वह बांग्लादेशी घुसपैठियों का मिथक फैला रही है, जिसे बोडो नेता दोहरा रहे हैं। इस मिथक का इस्तेमाल बंगाली मुसलमानों को बोडो क्षेत्रीय स्वायत्तशासी परिषद क्षेत्र से बाहर खदेड़ने के लिए किया जा रहा है। इस परिषद का गठन भी एऩडी़ए़ सरकार ने सन 2003 में किया था।
अब भाजपा, कांग्रेस पर यह आरोप लगा रही है कि वह अपना वोट बैंक बनाने के लिए बांग्लादेशी घुसपैठियों को असम में बसने दे रही है। इस आरोपप्रत्यारोप में सच कहीं गुमसा गया है। सच यह है कि अगर बांग्लादेशी घुसपैठियों की जो संख्या बताई जा रही है, उसे गंभीरता से लिया जावे तो उसका अर्थ यह होगा कि बांग्लादेश की कुल आबादी का छठवां हिस्सा भारत में बस चुका है। त्रिपुरा की बांग्लादेश से सटी हुई सीमा की लंबाई लगभग 900 किलोमीटर है परंतु त्रिपुरा से हमें शायद ही कभी बांग्लादेशी घुसपैठ का शोर सुनाई देता है। असम व बांग्लादेश की सीमा मात्र 250 किलोमीटर है परंतु बताया जा रहा है कि हर रोज सैकड़ों बांग्लादेशी, असम में आ रहे हैं।
जिन्हे आज बांग्लादेशी बताया जा रहा है उनमें से अधिकांश बंगाली मुसलमान हैं जो कि विभाजन के पहले असम में बसे थे। उस समय पूरा देश एक था और कोई भी नागरिक कहीं भी बसने के लिए स्वतंत्र था। इस मुद्दे को सबसे पहले ऑल असम स्टॅूडेंट्स यूनियन के आंदोलन के दौरान उठाया गया। इस आंदोलन का नतीजा था नेल्ली और अब बोडोमुस्लिम हिंसा। इस हिंसक संघर्ष ने असम के लगभग चार लाख निवासियों को अपने ही प्रदेश में शरणार्थी बना दिया है। यह एक बहुत बड़ी संख्या है।
हमें यह समझना होगा कि ये सारे अलगाव राजनैतिक हैं और इनके पीछे है राजनैतिक प्रतिद्वंदिता। यद्यपि हमारे राजनेताओं ने हमें हमारी पहचान के प्रति अत्यन्त संवेदनशील बना दिया है तथापि आम व्यक्ति आज भी एक है। अभी हाल में एक ख़बर आई कि उत्तरांचल के एक गांव में, जहां मस्जिद नही है, 800 से अधिक मुसलमानों ने एक गुरूद्वारे के अंदर नमाज प़ी क्योंकि बाहर तेज बारिश हो रही थी। द टाईम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक चित्र अत्यंत प्रेरणास्पद है। इस चित्र में एक साधू (इमाम की तरह) सबसे आगे बैठा हुआ है और उसके पीछे लाईन से बैठकर मुसलमान नमाज़ प़ रहे हैं।
अगर हमारे नेता अलगाव की राजनीति न खेलें और हमारी शिक्षा व्यवस्था, देश के एकीकरण में मदद करे तो भारत के लोग एक साथ मिलकर आगे बें़गे और हमारे कीमती संसाधन उन क्षुद्र विवादों से निपटने में खर्च नही होंगे, जिनमें एक नागरिक दूसरे के खून का प्यासा बन जाता है। कुछ संगठन दिन और रात लोगों के बीच शत्रुता ब़ाने मे लगे हैं और यही कारण है कि कई बार छोटेमोटे विवाद भी हिंसक स्वरूप धारण कर लेते हैं। राजनेता सड़कों पर हथियारबंद और घृणा से लबरेज भीड़ इकट्ठा कर लेते हैं और सांप्रदायिक दंगे शुरू हो जाते हैं।
अगर हमारी शिक्षा व्यवस्था लोगों की एकता और हमारी सांझा विरासत पर जोर दे तो चमत्कारिक नतीजे सामने आयेंगे। मेरी पी़ी तक हम लोग हमारी सांझा विरासत को एक कीमती सौगात मानते थे और उसे किसी कीमत पर खोने के लिए तैयार नही थे परन्तु बाद की पीयिों ने केवल विवाद और हिंसा देखी है और यही कारण है कि सांप्रदायिक दंगे लगातार होते ही जा रहे हैं। अंगे्रजो ने फूट डालो और राज करो की नीति को अपनाया था परन्तु हमारे राजनेता देश को बांटने में अंग्रेजों से भी आगे निकल गये हैं। इसमें दोष हमारे राजनेताओं का हैं, राजनीति का नही।
गांधीजी की राजनीति बदलाव की राजनीति थी। वे नागरिकों के अंतर्मन को बदलना चाहते थे। परन्तु सत्ता के भूखे हमारे राजनेता केवल सत्ता की राजनीति में रूची रखते हैं। वे यथास्थितिवाद के समर्थक हैं और हर परिवर्तन का विरोध करते है। गाहे बगाहे कोई परिवर्तन होता भी है तो वह हालात को और बिगाड़ने वाला होता है। यह राजनीति हमें बदल नही रही है बल्कि हमें एक निश्चित दायरे, एक संकीर्ण पहचान में कैद कर रही है।
राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक पर बहस के दौरान जनता दल यूनाइटेड के नेता और एनडीए की संयोजक श्री शरद यादव ने प्रस्तावित बिल को अप्रासंगिक बताते हुए कहा था कि चूंकि देश में अब साम्प्रदायिक हिंसा नहीं हो रही है इसलिए इस बिल की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि यह बिल, मुगल शासनकाल की तरह, देश में हिन्दुओं और मुसलमानों के लिए अलगअलग कानूनों का सॢजन करेगा। स्पतष्टतः वे इस मुद्दे पर भाजपा की सोच को अभिव्यक्त कर रहे थे। कहने की आवश्यकता नहीं कि मुगल शासनकाल की बात करना पूरी तरह अर्थहीन था और इससे हमें यह भी समझ में आता है कि कथित रूप से राममनोहर लोहिया के विचारों का प्रतिनिधित्व करने वाली धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के धर्मनिरपेक्ष नेताओं का असली चरित्र क्या है। श्री यादव ने जोर देकर यह भी कहा कि देश में अब साम्प्रदायिक दंगे होने बंद हो गये हैं। इस दावे में सच्चाई का एक अंश भी नहीं था। जिस समय श्री यादव राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में यह दावा कर रहे थे, लगभग उसी समय राजस्थान के शारदा, मंगलथाना व गोपालग़ में साम्प्रदायिक दंगे हो रहे थे। गोपालग़ में राजस्थान पुलिस द्वारा एक मस्जिद में दस मेव मुसलमानों को गोलियों से भून दिया गया।
श्री यादव के दावे का खंडन करते हुए मैंने अपने भाषण में कहा कि या तो श्री यादव समाचारपत्र प़ते नहीं हैं और या फिर वे जानबूझ कर पिछले कुछ महीनों के दौरान हुए दंगों को
नजरअंदाज कर रहे हैं। और अब, जबकि असम में हिंसा का विस्फोट हो गया है और वहां के बंगाली मुसलमान और पूरे देश में रह रहे उत्तरपूर्व के निवासी स्वयं को घोर असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, तब श्री यादव का क्या कहना हैं? दुर्भाग्यवश, भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए द्वारा साम्प्रदायिक हिंसा विेधेयक पर किये गये तीखे हमले के चलते, यूपीए2 सरकार ने साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक को संसद में प्रस्तुत करने का इरादा त्याग दिया है।
कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन ने सन 2004 के लोकसभा चुनाव के अपने चुनावी घोषणापत्र में यह वायदा किया था कि गुजरात के 2002 के भयावह साम्प्रदायिक दंगों के परिपे्रक्ष्य में, वह सरकार में आने पर, साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक पारित करेगी। इस वायदे को आज 8 वर्ष बीत चुके हैं परंतु यह विधेयक, कानून बनना तो दूर, संसद में प्रस्तुत तक नहीं हो सका है। कोई नहीं जानता कि यह कब प्रस्तुत होगा या कभी होगा भी या नहीं। मुझे ऐसा लगता है कि अगर यह बिल पारित हो गया होता तो असम के दंगे नहीं होते।
हम तब तक कोई कानून बनाने पर विचार नहीं करते जब तक कोई बड़ा हादसा न हो जाये और जब कोई हादसा हो जाता है, तब भी हम उस तरह के हादसे की पुनार्वृत्ति रोकने के उपाय करने में इतनी देरी कर देते हैं कि उसकी उपयोगिता ही समाप्त हो जाती है। कई बार संबंधित कानून को इतना कमजोर बना दिया जाता है कि वह निष्प्रभावी हो जाता है। जहां तक धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न है, कांग्रेस उसके पक्ष में बहुत मजबूती से खड़ी नहीं दिखती और भाजपा के लिए तो साम्प्रदायिकता ही जीवनीशक्ति है। ऐसे में हम कैसे यह कह सकते हैं कि हमारा देश कभी भी एक सच्चा प्रजातांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होगा।
हमारे देशवासियों में कितनी आपसी एकता और भाईचारा है, यह गुजरात व असम के दंगों और उसके बाद दक्षिण भारत के राज्यों में उत्तरपूर्वी इलाकों के निवासियों पर हुए हमलों से जाहिर है। घृणा फैलाने वाले एस़एम़एस़ किसने भेजे, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि यह कि केवल कुछ हजार एस़एम़एस़ संदेशों ने उत्तरपूर्व के नागरिकों को इस हद तक आतंकित कर दिया कि वे अपने कामधंधे छोड़कर, ताबड़तोड़ अपने अपने गृह राज्यों के लिए रवाना हो गये। इस घटनाक्रम के लिए पाकिस्तान को दोषी बताया जा रहा है पंरतु क्या यह कटु सत्य नहीं है कि उत्तरपूर्वी राज्यों के निवासियों को इतनी आसानी से आतंकित करना इसलिए संभव हो सका क्योंकि उन पर देश के विभिन्न इलाकों में पहले से ही या तो हिंसक हमले हो रहे थे और या फिर उनके प्रति भेदभाव किया जाता रहा था। यही कारण था कि एक एस़एम़एस़ से वे इतने घबड़ा गये कि बैंगलोर से तीन दिन की लम्बी यात्रा कर गुवहाटी पहुॅच गये। उत्तरपूर्वी राज्यों के निवासियों का पलायन पुणे, मुंबई, बैंगलोर, चैन्नई, हैदराबाद व लखनऊ से भी हुआ।
क्या कारण हैं कि उत्तरपूर्व के निवासियों को अपने ही देशवासियों पर भरोसा नहीं है? क्या कारण कि वे इतनी जल्दी घबड़ा जाते हैं? इसका कारण यह है कि हमने उन्हें कभी अपना माना ही नहीं। उनकी नस्लीय विभिन्नता के कारण उनके चेहरेमोहरे में जो अंतर हैं उनके कारण हम उन्हें बाहरी समझते रहे। दिल्ली में उत्तरपूर्व की महिलाओं के साथ अश्लील व्यवहार की घटनाएं होती रहती हैं। हमारे देश में राष्ट्रीय एकीकरण की भावना की कमी के पीछे हमारी शिक्षा व्यवस्था भी है। पाकिस्तान के सिर पर दोष म़ देने से काम नहीं चलने वाला है। हमे यह भी सोचना होगा कि हमने स्वयं अपने देशवासियों में एकता कायम करने के लिए क्या किया।
जाति, धर्म, भाषा, नस्ल और लिंग यह सब लोगों को आपस में बांटते हैं। हमारी विभिन्नता हमारी ताकत बनने की बजाय हमारी कमजोरी बन गई है। हमारे राजनेता हमारे बीच अलगाव के बीज बोने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। भाजपा, कांग्रेस को दोषी बताती है और कांग्रेस, भाजपा को। परंतु दोनों का उद्देश्य एक ही है और वह है अपना अपना वोट बैंक बनाना।
आज देश में ऐसा कौन सा राजनैतिक दल है, जिसका अपना वोट बैंक न हो? छोटे और क्षेत्रीय राजनैतिक दल भी इस मामले में किसी से पीछे नहीं हैं। सभी दल अपनेअपने वोट बैंकों को प्रसन्न करने में लगे रहते हैं। कोई दलितों को अपना वोट बैंक मानता है, कोई मुसलमानों को, कोई ब्राम्हणों का,े कोई राजपूतों को तो कोई यादवों को। इस तरह, चुनाव हमारे देश में लोगों को एक करने की बजाय उन्हें बांटने का साधन बन गये हैं। इसका एक कारण यह भी है कि हमने आँखें बंद कर ब्रिटिश चुनाव व्यवस्था को अपना लिया है, जिसमें सबसे ज्यादा वोट पाने वाला विजेता होता है।
यह व्यवस्था ब्रिटेन के लिए ठीक थी क्योंकि वहां का समाज एकसार है। उनकी एक ही भाषा और संस्कृति है। हमारे नेताओं को यह समझना था कि भारत जैसी ओँखें चौंधिया देने वाली विविधताओं से भरे देश के लिए, """"जिसेसबसे–अधिक–वोट–मिले–वही– विजेता वाली व्यवस्था उपयुक्त नहीं है। हर चुनाव में हम देखते हैं कि 18 से 25 प्रतिशत मत प्राप्त करने वाले विजेता बन जाते हैं और यह दावा करते हैं कि उन्हें बहुमत का समर्थन हासिल है। यह तो एक तरह का मखौल है।
हमें अपनी चुनाव प्रणाली में आमूलचूल बदलाव लाने होंगे। विजेता के लिए कम से कम 51 प्रतिशत मत पाना अनिवार्य करना होगा। अगर ऐसा हो जाता है तो राजनेताओं को सभी मतदाताओं का समर्थन हासिल करना होगा न कि एक छोटे से वोट बैंक का। अभी तो चुनाव नजदीक आते ही वोट बैंक की राजनीति शुरू हो जाती है।
असम दंगों के पीछे भी भाजपा की वोट बैंक की राजनीति है। भाजपा, आगामी चुनाव में बोडो मत पाने के लिए जमकर उनका समर्थन कर रही है। वह बांग्लादेशी घुसपैठियों का मिथक फैला रही है, जिसे बोडो नेता दोहरा रहे हैं। इस मिथक का इस्तेमाल बंगाली मुसलमानों को बोडो क्षेत्रीय स्वायत्तशासी परिषद क्षेत्र से बाहर खदेड़ने के लिए किया जा रहा है। इस परिषद का गठन भी एऩडी़ए़ सरकार ने सन 2003 में किया था।
अब भाजपा, कांग्रेस पर यह आरोप लगा रही है कि वह अपना वोट बैंक बनाने के लिए बांग्लादेशी घुसपैठियों को असम में बसने दे रही है। इस आरोपप्रत्यारोप में सच कहीं गुमसा गया है। सच यह है कि अगर बांग्लादेशी घुसपैठियों की जो संख्या बताई जा रही है, उसे गंभीरता से लिया जावे तो उसका अर्थ यह होगा कि बांग्लादेश की कुल आबादी का छठवां हिस्सा भारत में बस चुका है। त्रिपुरा की बांग्लादेश से सटी हुई सीमा की लंबाई लगभग 900 किलोमीटर है परंतु त्रिपुरा से हमें शायद ही कभी बांग्लादेशी घुसपैठ का शोर सुनाई देता है। असम व बांग्लादेश की सीमा मात्र 250 किलोमीटर है परंतु बताया जा रहा है कि हर रोज सैकड़ों बांग्लादेशी, असम में आ रहे हैं।
जिन्हे आज बांग्लादेशी बताया जा रहा है उनमें से अधिकांश बंगाली मुसलमान हैं जो कि विभाजन के पहले असम में बसे थे। उस समय पूरा देश एक था और कोई भी नागरिक कहीं भी बसने के लिए स्वतंत्र था। इस मुद्दे को सबसे पहले ऑल असम स्टॅूडेंट्स यूनियन के आंदोलन के दौरान उठाया गया। इस आंदोलन का नतीजा था नेल्ली और अब बोडोमुस्लिम हिंसा। इस हिंसक संघर्ष ने असम के लगभग चार लाख निवासियों को अपने ही प्रदेश में शरणार्थी बना दिया है। यह एक बहुत बड़ी संख्या है।
हमें यह समझना होगा कि ये सारे अलगाव राजनैतिक हैं और इनके पीछे है राजनैतिक प्रतिद्वंदिता। यद्यपि हमारे राजनेताओं ने हमें हमारी पहचान के प्रति अत्यन्त संवेदनशील बना दिया है तथापि आम व्यक्ति आज भी एक है। अभी हाल में एक ख़बर आई कि उत्तरांचल के एक गांव में, जहां मस्जिद नही है, 800 से अधिक मुसलमानों ने एक गुरूद्वारे के अंदर नमाज प़ी क्योंकि बाहर तेज बारिश हो रही थी। द टाईम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक चित्र अत्यंत प्रेरणास्पद है। इस चित्र में एक साधू (इमाम की तरह) सबसे आगे बैठा हुआ है और उसके पीछे लाईन से बैठकर मुसलमान नमाज़ प़ रहे हैं।
अगर हमारे नेता अलगाव की राजनीति न खेलें और हमारी शिक्षा व्यवस्था, देश के एकीकरण में मदद करे तो भारत के लोग एक साथ मिलकर आगे बें़गे और हमारे कीमती संसाधन उन क्षुद्र विवादों से निपटने में खर्च नही होंगे, जिनमें एक नागरिक दूसरे के खून का प्यासा बन जाता है। कुछ संगठन दिन और रात लोगों के बीच शत्रुता ब़ाने मे लगे हैं और यही कारण है कि कई बार छोटेमोटे विवाद भी हिंसक स्वरूप धारण कर लेते हैं। राजनेता सड़कों पर हथियारबंद और घृणा से लबरेज भीड़ इकट्ठा कर लेते हैं और सांप्रदायिक दंगे शुरू हो जाते हैं।
अगर हमारी शिक्षा व्यवस्था लोगों की एकता और हमारी सांझा विरासत पर जोर दे तो चमत्कारिक नतीजे सामने आयेंगे। मेरी पी़ी तक हम लोग हमारी सांझा विरासत को एक कीमती सौगात मानते थे और उसे किसी कीमत पर खोने के लिए तैयार नही थे परन्तु बाद की पीयिों ने केवल विवाद और हिंसा देखी है और यही कारण है कि सांप्रदायिक दंगे लगातार होते ही जा रहे हैं। अंगे्रजो ने फूट डालो और राज करो की नीति को अपनाया था परन्तु हमारे राजनेता देश को बांटने में अंग्रेजों से भी आगे निकल गये हैं। इसमें दोष हमारे राजनेताओं का हैं, राजनीति का नही।
गांधीजी की राजनीति बदलाव की राजनीति थी। वे नागरिकों के अंतर्मन को बदलना चाहते थे। परन्तु सत्ता के भूखे हमारे राजनेता केवल सत्ता की राजनीति में रूची रखते हैं। वे यथास्थितिवाद के समर्थक हैं और हर परिवर्तन का विरोध करते है। गाहे बगाहे कोई परिवर्तन होता भी है तो वह हालात को और बिगाड़ने वाला होता है। यह राजनीति हमें बदल नही रही है बल्कि हमें एक निश्चित दायरे, एक संकीर्ण पहचान में कैद कर रही है।
डॉ़ असगर अली इंजीनियर