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सोमवार, 5 अगस्त 2013

साम्प्रदायिक हिंसा: कौन है दोषी?

मेरे एक मित्र, आसानी से हार मानना जिनके स्वभाव का हिस्सा नहीं है, अपनी वक्तृव्य कला का उपयोग कर मुझे यह समझाने की कोशिश कर रहे थे कि साम्प्रदायिक हिंसा के लिए भाजपा से कहीं ज्यादा कांग्रेस जिम्मेदार है। उन्होंने देश में हुए प्रमुख साम्प्रदायिक दंगों को गिनाया और यह बताया कि जब ये भीषण घटनाक्रम हुए तब कांग्रेस, संबंधित क्षेत्र में सत्ता में थी। वे पूछते हैं कि हम गुजरात हिंसा की एक घटना को इतना अधिक महत्व क्यों दे रहे हैं और उसे नरेन्द्र मोदी व भाजपा के खिलाफ एक बड़ा मुद्दा क्यों बना रहे हैं? कुछ अन्य लोग भी अक्सर कहते हैं कि मोदी की सरकार की सन् 2002 के कत्लेआम में जो भूमिका थी, लगभग वही भूमिका कांग्रेस की सन् 1984 के सिक्ख-विरोधी दंगों में थी। अगर मोदी ने यह कहकर गुजरात को सही ठहराया था कि ‘‘हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है‘‘ तो राजीव गांधी ने भी सिक्खांें की मारकाट को औचित्यपूर्ण बताते हुए कहा था कि ‘‘जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती कांपती है‘‘- तो फिर मोदी और भाजपा को हम किस तरह साम्प्रदायिक दंगों के लिए अधिक जिम्मेदार ठहरा सकते हैं?
भारत में साम्प्रदायिक हिंसा की शुरूआत हुई अंगेेजों द्वारा ‘फूट डालो और राज करो‘ की नीति लागू किए जाने के साथ। इस नीति के अन्तर्गत ही उन्होंने इतिहास का साम्प्रदायिकीकरण किया और शासकों को धर्म के चश्मे से देखना शुरू किया। इसी सोच को जमींदारों और राजाओं-नवाबों के अस्त होते वर्ग ने अपना लिया। इन्हीं अस्त होते वर्गों ने मुस्लिम और हिन्दू-दोनों ब्रांडों की साम्प्रदायिकता की नींव रखी। हिन्दू साम्प्रदायिक तत्व मुस्लिम राजाओं पर मंदिर ढहाने और जबरन धर्मांतरण करवाने का आरोप लगाते थे जबकि मुस्लिम साम्प्रदायिक तत्व यह दावा करते थे कि वे देश के शासक हैं। इतिहास के इस तोड़े-मरोड़े गए संस्करण के कारण, हिन्दुओं और मुसलमानों में आपसी घृणा बढ़ती गई। शनैः-शनैः साम्प्रदायिक पार्टियां उभर आईं जिनमें मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा शामिल हैं। विभिन्न साम्प्रदायिक दलों ने समाज में नफरत फैलाने में तो कामयाबी हासिल कर ली परंतु चुनाव के मैदान में उन्हें कभी सफलता न मिल सकी। ब्रिटिश दौर में एक समुदाय को दूसरे समुदाय का शत्रु बनाने में अंग्र्रेजों द्वारा तैयार किए गए इतिहास के साम्प्रदायिक संस्करण की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। अंगे्रजों ने एक समुदाय को दूसरे समुदाय के खिलाफ भड़काने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी परंतु उस वक्त भी सड़कों और चैराहों पर हिंसा करने वाले लोग तो साम्प्रदायिक संगठनों के सदस्य ही हुआ करते थे। उस समय पुलिस और प्रशासन तटस्थ प्रेक्षक की भूमिका निभाता था। यहां यह महत्वपूर्ण है कि हिन्दू-मुस्लिम हिंसा के लंबी त्रासद सिलसिले के पीछे कई कारक थे, जिन्होंने अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं। अंग्रेजों के दौर में साम्प्रदायिक दंगों के लिए ब्रिटिश सरकार की नीतियां (इतिहास का साम्प्रदायिकीकरण और फूट डालो और राज करो की नीति) व साम्प्रदायिक तत्व जिम्मेदार थे। तत्कालीन पुलिस और प्रशासन को इस सिलसिले में कतई दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
धीरे-धीरे समय बदलने लगा। स्वाधीनता के बाद प्रशासन और पुलिस तटस्थ नहीं रह गए। वे पक्षपात करने लगे। एक जानेमाने पुलिस अधिकार डाॅ व्ही. एन. राय द्वारा किए गए अनुसंधान से यह सामने आया है कि कोई भी साम्प्रदायिक हिंसा तब तक जारी नहीं रह सकती जब तक कि प्रशासन और राजनैतिक नेतृत्व ऐसा न चाहे। इसके लिए मुख्यतः दोषी हैं साम्प्रदायिक ताकतें, जो न केवल अल्पसंख्यक समुदाय के बारे में दुष्प्रचार करती रहीं बल्कि उनके कुछ साथियों ने, साम्प्रदायिक हिंसा का इस्तेमाल, समाज को धार्मिक आधार पर धु्रवीकृत करने के लिए किया। धार्मिक आधार पर धु्रवीकरण से साम्प्रदायिक ताकतों को सामाजिक, राजनैतिक और चुनावीे क्षेत्र में लाभ हुआ। अन्य पार्टियों के राजनेेताओं ने भी कबजब हिंसा का इस्तेमाल सत्ता में आने या उसमें बने रहने के लिए किया। उस समय हुए दंगों की जांच करने वाले विभिन्न आयोगों ने साम्प्रदायिक ताकतों की भूमिका को रेखांकित किया है। अहमदाबाद के 1969 के दंगों की जगमोहन रेड्डी न्यायिक आयोग द्वारा की गई जांच की रपट स्पष्ट कहती है कि दंगों के पीछे आरएसएस और जनसंघ के नेताओं की भूमिका थी। इस तरह, स्वतंत्रता के तुरंत बाद के वर्षों में, साम्प्रदायिक ताकतों ने सत्ता में न रहते हुए भी, दंगे भड़काने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
सन् 1970 के भिवंडी-जलगांव दंगों की जांच करने वाले न्यायमूर्ति डी. पी. मादौन आयोग की रपट कहती है कि ‘‘हिन्दू समुदाय के कुछ सदस्य, विशेषकर आरएसएस व पीएसपी के कार्यकर्ता, गड़बड़ी फैलाने के लिए आतुर थे और उन्हें इसमें सफलता इसलिए मिली क्योंकि पुलिस तटस्थ बनी रही।“ सन् 1971 के तेल्लीचेरी दंगों की न्यायमूर्ति जोसफ विथ्याथिल ने जांच की थी। इस रपट में यह कहा गया है कि मुस्लिम-विरोधी प्रचार की शुरूआत आरएसएस व जनसंघ ने की थी। इस सबसे सामाजिक वातावरण बिगड़ गया और समाज धार्मिक आधार पर धु्रवीकृत हो गया। सन् 1979 के जमशेदपुर दंगों की जांच करने वाले न्यायिक आयोग ने कहा कि ‘‘हिंसा की शुरूआत संयुक्त बजरंगबली अखाड़ा समिति-जो कि आरएसएस से जुड़ा संगठन था-ने की। इस संगठन ने जानबूझकर जुलूस के रास्ते को लेकर विवाद खड़ा किया और इसके सदस्यों ने मुस्लिम विरोधी नारे लगाए।‘‘ कन्याकुमारी के 1982 केे दंगों की जस्टिस वेणु गोपाल आयोग की जांच रपट उन अफवाहों को फैलाने में आरएसएस की भूमिका की चर्चा करती है, जिनके चलते हिंसा भड़की। जस्टिस श्रीकृष्ण जांच आयोग ने यह साफ कर दिया है कि मुंबई के दंगांे में भाजपा के साथी दल शिवसेना की अत्यंत कुत्सित भूमिका थी।
प्रश्न यह है कि क्या दंगों के लिए केवल शासक दल को दोषी ठहराया जाना उचित है? साम्प्रदायिक हिंसा, समाज को बांटने वाले साम्प्रदायिक  प्रचार, पुलिस की भूमिका और शासक दल के दृष्टिकोण का मिलाजुला नतीजा होती है। अतः इन सभी को इस हिंसा के लिए दोषी ठहराया जा सकता है और ठहराया जाना चाहिए। शासक दल, जो कि अधिकांश दंगों के समय कांग्रेस रही है, को हिंसा से अपेक्षित कड़ाई से न निपटने, कई मौकों पर हिंसा को नजरअंदाज करने और कभी-कभी हिंसा को भड़काने-उदाहरणार्थ दिल्ली में-का दोषी ठहराया जा सकता है। इस सिलसिले में पुलिस की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। ब्रिटिश राज में साम्प्रदायिक दंगों में पुलिस पूरी तरह तटस्थ रहती थी। परंतु आज वह दंगों में भाग लेती है। जैसा कि महाराष्ट्र के धुले में सन् 2012 में हुए दंगों से जाहिर है। यहां हिन्दू दंगाईयों की जरूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि पुलिस ने खुद ही मुुसलमानों पर गोली चालन कर कई निर्दोष व्यक्तियों की जान ले ली।
तो साम्प्रदायिक हिंसा के मसले पर हम भाजपा और कांगे्रस की तुलना किस रूप में कर सकते हैं? भाजपा, दरअसल, आरएसएस की राजनैतिक शाखा है। साम्प्रदायिक दुष्प्रचार, अफवाहें फैलाने, साम्प्रदायिक धु्रवीकरण करने, भड़काऊ भाषणबाजी और हिंसा करने का आरएसएस का कई दशकों का अनुभव है। उसने इस कौशल से अपने अनुषांगिक संगठनों और अपनी विभिन्न शाखाओं को भी लैस कर दिया है। गुजरात के कत्लेआम में संघ ने ये सभी भूमिकाएं निभाईं। परंतु बाकी दंगों में भी उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सत्ता में न रहने का अर्थ यह नहीं है कि आरएसएस ने दंगे भड़काने में प्रमुख भूमिका अदा नहीं की। यह तर्क कि चूंकि अधिकांश दंगे कांग्रेस के राज में हुए इसलिए दंगों के लिए कांग्रेस ही दोषी है, दरअसल, साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा कुटिलतापूर्वक गढ़े गए कई मिथकों में से एक है। यद्यपि साम्प्रदायिक हिंसा के संदर्भ में कांग्रेस का दामन पूरी तरह पाकसाफ नहीं है परंतु उसकी भूमिका की तुलना भाजपा की भूमिका से करना घोर अनुचित होगा। सिक्ख-विरोधी दंगों को छोड़कर कांग्रेस ने कभी दंगे करवाने में केन्द्रीय भूमिका नहीं निभाई। हां, उसने अपने कर्तव्य पालन में कोताही अवश्य बरती। परंतु भाजपा की तो अधिकांश दंगे भड़काने में केन्द्रीय भूमिका रही है।
सन् 1984 के सिक्ख कत्लेआम में कांग्रेस की भूमिका उसकी बहुवादी व धर्मनिरपेक्ष विरासत पर एक बदनुमा दाग है। उसने इस दाग को मिटाने की काफी कोशिशें की हैं। कांग्रेस ने दंगों के लिए माफी मांगी है और उसकी सरकार का प्रधानमंत्री एक सिक्ख है, जो पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद सबसे लंबे समय तक लगातार इस पद पर आसीन रहने वाले व्यक्ति हैं। भाजपा की किसी और पार्टी से इसलिए भी तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि भाजपा, आरएसएस की राजनैतिक संतान है और आरएसएस का लक्ष्य हिन्दू राष्ट्र का निर्माण है। समाजविज्ञानियों ने कांग्रेस और भाजपा की राजनीति के बीच के विरोधाभास को स्पष्ट किया है। एजाज अहमद कहते हैं कि जहां भाजपा का कार्यक्रम ही साम्प्रदायिक है वहीं कांग्रेस की साम्प्रदायिकता, अवसरवादी है। मुकुल केसवन ने अपने एक हालिया लेख में कहा कि कांग्रेस मूलतः बहुवादी और मौका पड़ने पर साम्प्रदायिक है जबकि भाजपा विचारधारा के स्तर पर साम्प्रदायिक और मौका पड़ने पर धर्मनिरपेक्ष है।
इस तथ्य के बावजूद कि साम्प्रदायिक हिंसा के पीछे कई कारक होते हैं, दो गलत चीजें मिलकर एक सही नहीं बन सकतीं। कांगे्रस को ऊपर से नीचे तक व्यापक सुधार लाने होंगे ताकि साम्प्रदायिक हिंसा पर नियंत्रण पाया जा सके। साम्प्रदायिक दुष्प्रचार का प्रभावी खण्डन होना चाहिए और कानूनों में इस तरह के परिवर्तन होने चाहिए की न केवल दंगाई बल्कि दंगों को रोकने के अपने कर्तव्य का पालन न करने वाले अधिकारियों को भी सजा मिल सके। जहां तक आरएसएस और उसके साथियों का सवाल है, उनसे यह उम्मीद करना बेकार है कि वे साम्प्रदायिक हिंसा पर नियंत्रण पाने में देश की कोई मदद करेंगे।     

-राम पुनियानी

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

पुलिस और सांप्रदायिक दंगे





प्रथम दृष्टया, यह अत्यंत घिसापिटा विषय लगता है। सांप्रदायिक फसादों के दौरान और उनके बाद व पहले, पुलिस की भूमिका के बारे में पूर्व से ही हम सब बहुत-कुछ जानते हैं। हाल में, राज्यों के पुलिस महानिदेशकों और महानिरीक्षकों के दिल्ली में आयोजित सम्मेलन में अपने उद्घाटन भाषण में, प्रधानमंत्री ने देश में सांप्रदायिक हिंसा की बढ़ती घटनाओं पर गहरी चिंता जाहिर की थी। इस सम्मेलन में गुप्तचर सेवाओं के अधिकारियों ने भी भाग लिया था। स्पष्टतः, जब देश के प्रधानमंत्री किसी समस्या पर चिंता व्यक्त करते हैं तब उसे हम सभी को गंभीरता से लेना चाहिए।
इस वर्ष के पहले चार महीनों के दौरान देश में साम्प्रदायिक हिंसा की कोई वारदात नहीं हुई और मुझे लगने लगा कि दंगा-मुक्त वर्ष का मेरा सपना पूरा होने जा रहा है। परंतु मेरा यह स्वप्न जल्दी ही टूट गया। उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों में दंगे भड़क उठे। देश के अन्य हिस्सों में भी सांप्रदायिक हिंसा हुई। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी के सत्ता में आने के बाद से वहाँ सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में वृद्धि हुई है। इससे एक बार फिर यह जाहिर हुआ है कि दंगों के पीछे राजनैतिक मंतव्य होते हैं और धर्म का इनसे कोई लेनादेना नहीं होता। राजनैतिक उद्देश्यों से धार्मिक पूर्वाग्रह फैलाए जाते हैं।
दंगो के मामलों में पुलिस की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पुलिस को गुप्तचर सूचनाएं इकट्ठा करनी होती हैं, शरारती तत्वों की पहचान कर उन्हें पहले से गिरफ्तार करना होता है, हिंसा शुरू हो जाने की स्थिति में उसे रोकना होता है और दंगे समाप्त हो जाने के बाद, दंगाईयांे को कानूनी तंत्र के जरिए ऐसी सजा दिलवानी होती है ताकि वे आगे से हिंसा करने की हिम्मत न कर सकें। पुलिस की दंगो के दौरान भूमिका के मेरे कई दशकों के अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि इस वर्ष हुए दंगों में भी पुलिस के व्यवहार में तनिक भी परिवर्तन परिलक्षित नहीं हुआ।
यह आश्चर्यजनक है कि उत्तरप्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बावजूद, उत्तरप्रदेश पुलिस के व्यवहार में जरा-सा भी बदलाव नहीं आया है। हम सबको अपेक्षा थी कि मुलायम सिंह, जो कि मुख्यतः मुसलमानो के समर्थन से सत्ता में आए हैं, पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार लावेंगे। परंतु हम सबको निराशा ही हाथ लगी। अगर मुलायम सिंह ने पुलिस की कार्यप्रणाली में कोई बदलाव लाने की कोशिश की भी है तो पुलिस पर उसका कोई असर नहीं दिखलाई पड़ रहा है। पुलिस ने खुलकर दंगाईयों का साथ दिया। ऐसा लग रहा था मानों सत्ता में आने के तुरंत बाद, मुलायम सिंह सरकार को बदनाम करने का षडयंत्र अंजाम दिया जा रहा हो।
मैं इस निष्कर्ष पर भी पहुँचा कि शासन चाहे किसी भी पार्टी का क्यों न हो, पुलिस का व्यवहार एक सा ही बना रहता है। पुलिसकर्मियों के दिमागों मंे इतना जहर भर दिया गया है कि तुलनात्मक रूप से अधिक धर्मनिरपेक्ष सरकार के अधीन भी वे वैसा ही व्यवहार करते रहते हैं। परन्तु फिर, हमारे सामने बिहार और पश्चिम बंगाल के उदाहरण भी हैं, जहां लालू प्रसाद यादव और ज्योति बसु व बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली सरकारों के कार्यकाल में, क्रमशः 15 और 30 वर्षों तक कोई बड़ा साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ। बिहार और पश्चिम बंगाल में क्रमशः नितिश कुमार और ममता बेनर्जी के नेतृत्व मंे भी साम्प्रदायिक अमन कायम है।
शायद मुलायम सिंह यादव का व्यक्तित्व उतना मजबूत और चमत्कारिक नही है जितना कि बिहार और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्रियों का। यह साफ है कि किसी भी निश्चित नतीजे पर पहुंचने के लिए अत्यन्त गहराई से अध्ययन किये जाने की जरूरत है। प्राथमिक तौर पर हम केवल यही कह सकते हैं कि पुलिस उन मुख्यमंत्रियों की सुनती हैं जो शक्तिशाली होते है और पुलिस का इस्तेमाल अपने राजनैतिक हितों की पूर्ति के लिए नही करते। इन मुख्यमंत्रियों के कम से कम कुछ सिद्धांत होते हैं और वे पुलिस तक सही संदेश पहुंचाने में सफल होते हंै।
यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि क्या संपूर्ण पुलिस तंत्र का सांप्रदायिकीकरण हो गया है  या केवल निचले और मध्यम श्रेणी के पुलिस अधिकारी इस रोग से ग्रस्त हैं। एक बार, हैदराबाद की राष्ट्रीय पुलिस अकादमी में एक संगोष्ठी के दौरान, मैने यह मत व्यक्त किया कि पुलिस के उच्च अधिकारी, निचले और मध्यम स्तर के अधिकारियों की तुलना में कम साम्प्रदायिक और जातिवादी हैं। एक वरिष्ठ आई.पी.एस अधिकारी, जो कि मेरी ही तरह अकादमी में व्याख्यान देने आये थे, ने मुझसे असहमती जताते हुए कहा कि वरिष्ठ अधिकारी तो अपने मातहतों से कहीं ज्यादा फिरकापरस्त और जातिवादी हैं। मैने इस पर सिर्फ यही कहा कि आई.पी.एस. अधिकारी होने के नाते वे शायद मुझसे बेहतर जानते हैं।
मेरा स्वयं का अनुभव यह है कि पुलिस के उच्च अधिकारी वर्ग में दोनो तरह के लोग होते हैं- कुछ घोर साम्प्रदायिक तो कुछ पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष। गुजरात इन दोनो तरह के अधिकारियों का अच्छा उदाहरण है। वहां ऐसे आईपीएस अधिकारी थे जिन्होंने मुख्यमंत्री के आगे घुटने टेक दिये और उनके सभी जायज-नाजायज आदेशों को शिरोधार्य किया। कुछ अधिकारी ऐसे भी थे जो नहीं झुके, जिन्होंने अवैधानिक आदेश मानने से इंकार कर दिया और जबरदस्त दबाव के बाद भी जो अपने मत पर दृढ़ रहे। मैने इनमें से दूसरी श्रेणी के अधिकारियों के साथ कई बार कार्यक्रमों में शिरकत की है।
ऐसा भी नही हैं कि वे सब अधिकारी दलित थे। उनमें से कुछ ब्राम्हण सहित अन्य उच्च जातियों के भी थे और कुछ निचली जातियांे के। मंै ऐसे दो आईपीएस अधिकारियों को जानता हूँ जो भाई-भाई हैं, एक ऊँची जाति से आते हैं, पुलिस महानिदेशक के दर्जे के हैं और  जिनकी धर्मनिरपेक्षता किसी भी संदेह के परे हैं। वे अपने पूरे कार्यकाल के दौरान अपने सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध बने रहे और उन्होंने बड़े साहस से साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं का मुकाबला किया।
यह कहा जा सकता है कि इस प्रकार के अधिकारी एक अपवाद हंै और मेरे पास इस तर्क का कोई जवाब भी नही है। परन्तु मैंने ऐसे कई अन्य अधिकारी भी देखे हैं। हैदराबाद की राष्ट्रीय पुलिस अकादमी में आयोजित एक कार्यशाला में पूरे देश से आये प्रोबेशनर आईपीएस अधिकारियों को साम्प्रदायिक दंगो और उन्हें रोकने में पुलिस की भूमिका पर केस स्टडी प्रस्तुत करनी थी। इस कार्यशाला में प्रोफेसर राम पुनियानी और मैं निर्णायक मंडल में थे। कई आईपीएस अधिकारियों का प्रस्तुतिकरण इतना अच्छा था कि मैंने प्रोफेसर पुनियानी से मजाक में कहा कि अब हम लोगों को इस क्षेत्र से सन्यास ले लेना चाहिए क्योंकि युवा पुलिस अधिकारी पहले से ही धर्मनिरपेक्षता के प्रति इतने प्रतिबद्ध है कि उन्हें किसी प्रकार के प्रशिक्षण की आवश्यकता नही है।
यद्यपि यह सच है परन्तु पूरा सच नही। और शायद आने वाले लम्बे समय तक यह पूरा सच नही बन सकेगा। हर धर्मनिरपेक्ष अधिकारी के पीछे विभिन्न स्तरों के अनेक साम्प्रदायिक अधिकारी होते हैं। उनकी जातिवादी और साम्प्रदायिक सोच साफ झलकती है। मैंने बम्बई (1992-93), मेरठ (1987), गुजरात (1985, 2002) व भिवन्डी (1984) दंगो में पुलिस की इस पुर्वाग्रहपूर्ण सोच का अनुभव किया है।
मैं यह स्वीकार करता हूँ कि पूर्वाग्रहग्रस्त अधिकांश अधिकारी निचले दर्जे के थे परन्तु शीर्ष स्तर पर भी, कुछ अपवादों को छोड़ कर, हालात बहुत भिन्न नही थे। मुम्बई में निचले स्तर के अधिकांश पुलिसकर्मी मराठी सामना पढ़ते हैं और मुसलमानों के बारे में सामना की ही भाषा में बात करते हैं। फिर भला हम उनसे कैसे यह उम्मीद करें कि वे उत्तेजना फैलाने वाले लेखन के लिए सामना के विरूद्ध कार्यवाही करेंगे। मुम्बई दंगो के समय के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नायक का रवैया देखिए। जब मुम्बई के गणमान्य नागरिकों का एक
प्रतिनिधिमंडल उनसे मिला और दंगों को रोकने का आग्रह किया तो उनका जवाब था कि “आप लोग बाल ठाकरे से मिल लंे क्यों कि वे ही दंगा भड़का रहे हैं”। साफ तौर पर श्री नायक ने अपने अधिकार, ठाकरे के पास गिरवी रख दिये थे। इतने कमजोर मुख्यमंत्री से हम कैसे यह अपेक्षा कर सकते हैं कि वह दंगों को रोकेगा। यह शर्मनाक है कि महाराष्ट्र सहित कई अन्य स्थानों पर जो पुलिस अधिकारी दंगों पर नियंत्रण पाने में असफल रहे और जिनकी दंगा जांच आयोगो ने कड़ी निंदा की, उन्हें सजा मिलना तो दूर, उनकी पदोन्नति कर दी गई।
उदाहरणार्थ, सन् 1970 के भिवन्डी-जलगाँव दंगों की जांच के लिए नियुक्त मादोन आयोग ने अपनी रपट में तत्कालीन पुलिस अधीक्षक की जमकर खिंचाई करते हुए कहा था कि उन्होंने निर्दाेषांे को गिरफ्तार किया और दोषियों को बख्शा। परन्तु इसके बाद भी उन्हें एक के बाद एक पदोन्नतियां मिलती गईं और अंततः वे महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुये। एक अन्य उदाहरण मुम्बई पुलिस के एक संयुक्त आयुक्त का है जिन्होेंने आठ मदरसा छात्रों को दंगाई बताकर गोली मार दी थी। श्रीकृष्ण आयोग ने अपनी जांच रपट में इस अधिकारी की इस भूल की कड़े शब्दों में निंदा की थी परन्तु उन्हें शिवसेना सरकार के कार्यकाल मंे मुम्बई का पुलिस आयुक्त बना दिया गया। उनकी सेवानिवृति के बाद, एक अदालत ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया परन्तु वे दिल का दौरा पड़ने का बहाना लेकर एक अस्पताल में भर्ती हो गए और वहीं रहते हुए उन्होंने एक अदालत से जमानत ले ली। इस प्रकार वे एक दिन के लिए भी जेल नहीं गए।
इस तरह के तो कई उदाहरण हैं। परन्तु हाल में मुम्बई में ही इसका ठीक विपरीत उदाहरण सामने आया। मुम्बई के पुलिस आयुक्त अरूप पटनायक ने हिंसा पर उतारू भीड़ को नियंत्रित करने में अनुकरणीय साहस और योग्यता दिखाई। वे पचास हजार लोगो की उत्तेजित भीड़ को चुपचाप अपने घर जाने के लिए प्रेरित कर सके। इसके लिए वे ईनाम के हकदार थे परन्तु इसके उलट राज ठाकरे के दबाव में महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर.आर. पाटील ने उनका तबादला सड़क परिवहन के महानिदेशक के पद पर कर दिया। राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने पटनायक के खिलाफ कार्यवाही की मांग करते हुए लगभग 45 हजार लोगों का जुलूस निकाला था।
राज ठाकरे अब तक मुसलमानों के खिलाफ चुप्पी बनाए हुए थे और यहां तक कि कुछ मामलों में वे मुसलमानों का समर्थन भी कर रहे थे। परन्तु अब शायद सन् 2014 के चुनाव के परिपेक्ष्य में उनका दृष्टिकोण बदल गया है और वे हिन्दुत्व कार्ड खेलने पर आमादा हैं। पटनायक को हटाने की मांग को लेकर विशाल रैली निकालने के पीछे उनका उद्देश्य एक पत्थर से दो पक्षियों का शिकार करना था। पहला यह कि इससे वे शिवसेना के नजदीक आ गये और शिवसेना के साथ सन् 2014 के चुनाव में उनकी पार्टी के गठबंधन की संभावना बढ़ गई। दूसरे, उन्होेंने महाराष्ट्र की राजनीति में अपना दबदबा कायम किया। परन्तु इस राजनैतिक खेल में एक अत्यन्त कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी की बली चढ़ गई, जिन्होंने एक गम्भीर स्थिति से सफलतापूर्वक मुकाबला किया था।
शायद यही कारण है कि कार्यशालाओं के दौरान कई पुलिस अधिकारी मुझसे कहते हैं कि वे इस मामले मंे कुछ खास नहीं कर सकते क्योंकि वे तो राजनीतिज्ञों के मोहरे भर है। इस बात में दम है। गुजरात मंे कई पुलिस अधिकारियों ने राजनैतिक दबाव का मुकाबला करने की कोशिश की परन्तु असफल रहे। अलबत्ता, हमेशा ऐसा नहीं होता। पुलिस अधिकारियों की सोच में पूर्वाग्रह बिल्कुल साफ नजर आते हैं। इस सोच को खत्म करने के लिए स्कूली पाठ्यक्रमों से लेकर पुलिस प्रशिक्षण संस्थानों तक के पाठ्यक्रमों में आमूलचूल परिवर्तन लाने होगें। हमे हमारे पुलिसकर्मियों को धर्मनिरपेक्ष बनाना होगा।
यह भी जरूरी है कि अहमदाबाद के नरोदा पाटिया मामले में जिस तरह का निर्णय आया है वैसे ही निर्णय आगे भी सुनाए जाते रहंे। एक पूर्व मंत्री को दंगे भड़काने के आरोप में 28 साल के कारावास की सजा से वे राजनेता हतोत्साहित होंगे जो अपने मतदाताओं के साम्प्रदायिक तबके का इस्तेमाल अपने हितों के लिए करते हैं। इस मामले मंे न्यायाधीश ज्योत्सना याज्ञनिक बधाई की पात्र हैं।
-डा. असगर अली इंजीनियर

बुधवार, 5 सितंबर 2012

भारत एवं धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र

अभी हाल तक कुछ लोग यह विचार व्यक्त कर रहे थे कि हमारे देश में साम्प्रदायिकता के प्रभाव में काफी कमी आयी है। कुछ का तो यहां तक कहना था कि बदले हुए वातावरण के प्रकाश में, संसद द्वारा साम्प्रदायिक हिंसा निरोंधक विधेयक पारित करने की आवश्यकता ही नहीं रह गई है। शायद इन लोगों की मान्यता थी कि गुजरात के भयावह दंगों ने देश को इतना गहरा सदमा पहुंचाया है कि अब हमारे देश में बड़े साम्प्रदायिक दंगे होने की संभावना न के बराबर है। परंतु अभी हाल में उत्तरप्रदेश के कई शहरों में साम्प्रदायिक दंगे हुए और कुछ दिनों पूर्व, असम में, गुजरात की तर्ज पर दिल को हिला देने वाली हिंसा हुई। इसके बाद, भारत के दक्षिणी राज्यों में रहने वाले उत्तरपूर्व के नागरिकों को निशाना बनाया जा रहा है।
राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक पर बहस के दौरान जनता दल यूनाइटेड के नेता और एनडीए की संयोजक श्री शरद यादव ने प्रस्तावित बिल को अप्रासंगिक बताते हुए कहा था कि चूंकि देश में अब साम्प्रदायिक हिंसा नहीं हो रही है इसलिए इस बिल की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि यह बिल, मुगल शासनकाल की तरह, देश में हिन्दुओं और मुसलमानों के लिए अलगअलग कानूनों का सॢजन करेगा। स्पतष्टतः वे इस मुद्दे पर भाजपा की सोच को अभिव्यक्त कर रहे थे। कहने की आवश्यकता नहीं कि मुगल शासनकाल की बात करना पूरी तरह अर्थहीन था और इससे हमें यह भी समझ में आता है कि कथित रूप से राममनोहर लोहिया के विचारों का प्रतिनिधित्व करने वाली धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के धर्मनिरपेक्ष नेताओं का असली चरित्र क्या है। श्री यादव ने जोर देकर यह भी कहा कि देश में अब साम्प्रदायिक दंगे होने बंद हो गये हैं। इस दावे में सच्चाई का एक अंश भी नहीं था। जिस समय श्री यादव राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में यह दावा कर रहे थे, लगभग उसी समय राजस्थान के शारदा, मंगलथाना व गोपालग़ में साम्प्रदायिक दंगे हो रहे थे। गोपालग़ में राजस्थान पुलिस द्वारा एक मस्जिद में दस मेव मुसलमानों को गोलियों से भून दिया गया।
श्री यादव के दावे का खंडन करते हुए मैंने अपने भाषण में कहा कि या तो श्री यादव समाचारपत्र प़ते नहीं हैं और या फिर वे जानबूझ कर पिछले कुछ महीनों के दौरान हुए दंगों को
नजरअंदाज कर रहे हैं। और अब, जबकि असम में हिंसा का विस्फोट हो गया है और वहां के बंगाली मुसलमान और पूरे देश में रह रहे उत्तरपूर्व के निवासी स्वयं को घोर असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, तब श्री यादव का क्या कहना हैं? दुर्भाग्यवश, भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए द्वारा साम्प्रदायिक हिंसा विेधेयक पर किये गये तीखे हमले के चलते, यूपीए2 सरकार ने साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक को संसद में प्रस्तुत करने का इरादा त्याग दिया है।
कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन ने सन 2004 के लोकसभा चुनाव के अपने चुनावी घोषणापत्र में यह वायदा किया था कि गुजरात के 2002 के भयावह साम्प्रदायिक दंगों के परिपे्रक्ष्य में, वह सरकार में आने पर, साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक पारित करेगी। इस वायदे को आज 8 वर्ष बीत चुके हैं परंतु यह विधेयक, कानून बनना तो दूर, संसद में प्रस्तुत तक नहीं हो सका है। कोई नहीं जानता कि यह कब प्रस्तुत होगा या कभी होगा भी या नहीं। मुझे ऐसा लगता है कि अगर यह बिल पारित हो गया होता तो असम के दंगे नहीं होते।
हम तब तक कोई कानून बनाने पर विचार नहीं करते जब तक कोई बड़ा हादसा न हो जाये और जब कोई हादसा हो जाता है, तब भी हम उस तरह के हादसे की पुनार्वृत्ति रोकने के उपाय करने में इतनी देरी कर देते हैं कि उसकी उपयोगिता ही समाप्त हो जाती है। कई बार संबंधित कानून को इतना कमजोर बना दिया जाता है कि वह निष्प्रभावी हो जाता है। जहां तक धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न है, कांग्रेस उसके पक्ष में बहुत मजबूती से खड़ी नहीं दिखती और भाजपा के लिए तो साम्प्रदायिकता ही जीवनीशक्ति है। ऐसे में हम कैसे यह कह सकते हैं कि हमारा देश कभी भी एक सच्चा प्रजातांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होगा।
हमारे देशवासियों में कितनी आपसी एकता और भाईचारा है, यह गुजरात व असम के दंगों और उसके बाद दक्षिण भारत के राज्यों में उत्तरपूर्वी इलाकों के निवासियों पर हुए हमलों से जाहिर है। घृणा फैलाने वाले एस़एम़एस़ किसने भेजे, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि यह कि केवल कुछ हजार एस़एम़एस़ संदेशों ने उत्तरपूर्व के नागरिकों को इस हद तक आतंकित कर दिया कि वे अपने कामधंधे छोड़कर, ताबड़तोड़ अपने अपने गृह राज्यों के लिए रवाना हो गये। इस घटनाक्रम के लिए पाकिस्तान को दोषी बताया जा रहा है पंरतु क्या यह कटु सत्य नहीं है कि उत्तरपूर्वी राज्यों के निवासियों को इतनी आसानी से आतंकित करना इसलिए संभव हो सका क्योंकि उन पर देश के विभिन्न इलाकों में पहले से ही या तो हिंसक हमले हो रहे थे और या फिर उनके प्रति भेदभाव किया जाता रहा था। यही कारण था कि एक एस़एम़एस़ से वे इतने घबड़ा गये कि बैंगलोर से तीन दिन की लम्बी यात्रा कर गुवहाटी पहुॅच गये। उत्तरपूर्वी राज्यों के निवासियों का पलायन पुणे, मुंबई, बैंगलोर, चैन्नई, हैदराबाद व लखनऊ से भी हुआ।
क्या कारण हैं कि उत्तरपूर्व के निवासियों को अपने ही देशवासियों पर भरोसा नहीं है? क्या कारण कि वे इतनी जल्दी घबड़ा जाते हैं? इसका कारण यह है कि हमने उन्हें कभी अपना माना ही नहीं। उनकी नस्लीय विभिन्नता के कारण उनके चेहरेमोहरे में जो अंतर हैं उनके कारण हम उन्हें बाहरी समझते रहे। दिल्ली में उत्तरपूर्व की महिलाओं के साथ अश्लील व्यवहार की घटनाएं होती रहती हैं। हमारे देश में राष्ट्रीय एकीकरण की भावना की कमी के पीछे हमारी शिक्षा व्यवस्था भी है। पाकिस्तान के सिर पर दोष म़ देने से काम नहीं चलने वाला है। हमे यह भी सोचना होगा कि हमने स्वयं अपने देशवासियों में एकता कायम करने के लिए क्या किया।
जाति, धर्म, भाषा, नस्ल और लिंग यह सब लोगों को आपस में बांटते हैं। हमारी विभिन्नता हमारी ताकत बनने की बजाय हमारी कमजोरी बन गई है। हमारे राजनेता हमारे बीच अलगाव के बीज बोने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। भाजपा, कांग्रेस को दोषी बताती है और कांग्रेस, भाजपा को। परंतु दोनों का उद्देश्य एक ही है और वह है अपना अपना वोट बैंक बनाना।
आज देश में ऐसा कौन सा राजनैतिक दल है, जिसका अपना वोट बैंक न हो? छोटे और क्षेत्रीय राजनैतिक दल भी इस मामले में किसी से पीछे नहीं हैं। सभी दल अपनेअपने वोट बैंकों को प्रसन्न करने में लगे रहते हैं। कोई दलितों को अपना वोट बैंक मानता है, कोई मुसलमानों को, कोई ब्राम्हणों का,े कोई राजपूतों को तो कोई यादवों को। इस तरह, चुनाव हमारे देश में लोगों को एक करने की बजाय उन्हें बांटने का साधन बन गये हैं। इसका एक कारण यह भी है कि हमने आँखें बंद कर ब्रिटिश चुनाव व्यवस्था को अपना लिया है, जिसमें सबसे ज्यादा वोट पाने वाला विजेता होता है।
यह व्यवस्था ब्रिटेन के लिए ठीक थी क्योंकि वहां का समाज एकसार है। उनकी एक ही भाषा और संस्कृति है। हमारे नेताओं को यह समझना था कि भारत जैसी ओँखें चौंधिया देने वाली विविधताओं से भरे देश के लिए, """"जिसेसबसे–अधिक–वोट–मिले–वही– विजेता वाली व्यवस्था उपयुक्त नहीं है। हर चुनाव में हम देखते हैं कि 18 से 25 प्रतिशत मत प्राप्त करने वाले विजेता बन जाते हैं और यह दावा करते हैं कि उन्हें बहुमत का समर्थन हासिल है। यह तो एक तरह का मखौल है।
हमें अपनी चुनाव प्रणाली में आमूलचूल बदलाव लाने होंगे। विजेता के लिए कम से कम 51 प्रतिशत मत पाना अनिवार्य करना होगा। अगर ऐसा हो जाता है तो राजनेताओं को सभी मतदाताओं का समर्थन हासिल करना होगा न कि एक छोटे से वोट बैंक का। अभी तो चुनाव नजदीक आते ही वोट बैंक की राजनीति शुरू हो जाती है।
असम दंगों के पीछे भी भाजपा की वोट बैंक की राजनीति है। भाजपा, आगामी चुनाव में बोडो मत पाने के लिए जमकर उनका समर्थन कर रही है। वह बांग्लादेशी घुसपैठियों का मिथक फैला रही है, जिसे बोडो नेता दोहरा रहे हैं। इस मिथक का इस्तेमाल बंगाली मुसलमानों को बोडो क्षेत्रीय स्वायत्तशासी परिषद क्षेत्र से बाहर खदेड़ने के लिए किया जा रहा है। इस परिषद का गठन भी एऩडी़ए़ सरकार ने सन 2003 में किया था।
अब भाजपा, कांग्रेस पर यह आरोप लगा रही है कि वह अपना वोट बैंक बनाने के लिए बांग्लादेशी घुसपैठियों को असम में बसने दे रही है। इस आरोपप्रत्यारोप में सच कहीं गुमसा गया है। सच यह है कि अगर बांग्लादेशी घुसपैठियों की जो संख्या बताई जा रही है, उसे गंभीरता से लिया जावे तो उसका अर्थ यह होगा कि बांग्लादेश की कुल आबादी का छठवां हिस्सा भारत में बस चुका है। त्रिपुरा की बांग्लादेश से सटी हुई सीमा की लंबाई लगभग 900 किलोमीटर है परंतु त्रिपुरा से हमें शायद ही कभी बांग्लादेशी घुसपैठ का शोर सुनाई देता है। असम व बांग्लादेश की सीमा मात्र 250 किलोमीटर है परंतु बताया जा रहा है कि हर रोज सैकड़ों बांग्लादेशी, असम में आ रहे हैं।
जिन्हे आज बांग्लादेशी बताया जा रहा है उनमें से अधिकांश बंगाली मुसलमान हैं जो कि विभाजन के पहले असम में बसे थे। उस समय पूरा देश एक था और कोई भी नागरिक कहीं भी बसने के लिए स्वतंत्र था। इस मुद्दे को सबसे पहले ऑल असम स्टॅूडेंट्स यूनियन के आंदोलन के दौरान उठाया गया। इस आंदोलन का नतीजा था नेल्ली और अब बोडोमुस्लिम हिंसा। इस हिंसक संघर्ष ने असम के लगभग चार लाख निवासियों को अपने ही प्रदेश में शरणार्थी बना दिया है। यह एक बहुत बड़ी संख्या है।
हमें यह समझना होगा कि ये सारे अलगाव राजनैतिक हैं और इनके पीछे है राजनैतिक प्रतिद्वंदिता। यद्यपि हमारे राजनेताओं ने हमें हमारी पहचान के प्रति अत्यन्त संवेदनशील बना दिया है तथापि आम व्यक्ति आज भी एक है। अभी हाल में एक ख़बर आई कि उत्तरांचल के एक गांव में, जहां मस्जिद नही है, 800 से अधिक मुसलमानों ने एक गुरूद्वारे के अंदर नमाज प़ी क्योंकि बाहर तेज बारिश हो रही थी। द टाईम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक चित्र अत्यंत प्रेरणास्पद है। इस चित्र में एक साधू (इमाम की तरह) सबसे आगे बैठा हुआ है और उसके पीछे लाईन से बैठकर मुसलमान नमाज़ प़ रहे हैं।
अगर हमारे नेता अलगाव की राजनीति न खेलें और हमारी शिक्षा व्यवस्था, देश के एकीकरण में मदद करे तो भारत के लोग एक साथ मिलकर आगे बें़गे और हमारे कीमती संसाधन उन क्षुद्र विवादों से निपटने में खर्च नही होंगे, जिनमें एक नागरिक दूसरे के खून का प्यासा बन जाता है। कुछ संगठन दिन और रात लोगों के बीच शत्रुता ब़ाने मे लगे हैं और यही कारण है कि कई बार छोटेमोटे विवाद भी हिंसक स्वरूप धारण कर लेते हैं। राजनेता सड़कों पर हथियारबंद और घृणा से लबरेज भीड़ इकट्ठा कर लेते हैं और सांप्रदायिक दंगे शुरू हो जाते हैं।
अगर हमारी शिक्षा व्यवस्था लोगों की एकता और हमारी सांझा विरासत पर जोर दे तो चमत्कारिक नतीजे सामने आयेंगे। मेरी पी़ी तक हम लोग हमारी सांझा विरासत को एक कीमती सौगात मानते थे और उसे किसी कीमत पर खोने के लिए तैयार नही थे परन्तु बाद की पीयिों ने केवल विवाद और हिंसा देखी है और यही कारण है कि सांप्रदायिक दंगे लगातार होते ही जा रहे हैं। अंगे्रजो ने फूट डालो और राज करो की नीति को अपनाया था परन्तु हमारे राजनेता देश को बांटने में अंग्रेजों से भी आगे निकल गये हैं। इसमें दोष हमारे राजनेताओं का हैं, राजनीति का नही।
गांधीजी की राजनीति बदलाव की राजनीति थी। वे नागरिकों के अंतर्मन को बदलना चाहते थे। परन्तु सत्ता के भूखे हमारे राजनेता केवल सत्ता की राजनीति में रूची रखते हैं। वे यथास्थितिवाद के समर्थक हैं और हर परिवर्तन का विरोध करते है। गाहे बगाहे कोई परिवर्तन होता भी है तो वह हालात को और बिगाड़ने वाला होता है। यह राजनीति हमें बदल नही रही है बल्कि हमें एक निश्चित दायरे, एक संकीर्ण पहचान में कैद कर रही है।

डॉ़ असगर अली इंजीनियर
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