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मंगलवार, 21 मई 2013

डा. असगर अली इंजीनियर की विरासत



मेरे जीवन में मानो एक तूफान आया और सब कुछ खत्म हो गया। मुझे जो क्षति हुई हैए उससे मैं अब तक समझौता नहीं कर सका हूँ। तूफान की तरह, मौत भी ईश्वर के हाथों में होती है और तूफान की तरह, आप मौत के सामने भी असहाय होते हैं। मुझे जरा भी इल्म ना था कि मेरे अजीज पिता डाक्टर असगर अली इंजीनियर को मौत हमसे इतनी जल्दी छीन लेगी। मैं इतने बड़े धक्के के लिए कतई तैयार नहीं था। परंतु अब मुझे यह सोचना है कि मेरे पिता ने मुझे विरासत में क्या दिया। मेरी बहन सीमा ने एक संवाददाता से बिलकुल ठीक कहा कि मेरे पिता चाहते थे कि उनकी विरासत हम दोनों में बराबर.बराबर बांट दी जाये . उनकी शिक्षाओं की विरासत। मन कुछ शांत होने के बाद मैं यह सोचने की कोशिश कर रहा हूँ कि मेरे पिता ने मुझे विरासत में क्या दिया है।
मेरे पिता से मुझे विरासत में क्या मिला है?
 उनका अनुशासन और कठिन दिनचर्या।
वे अपनी निर्धारित दिनचर्या से कभी भी डिगते नहीं थे। इस दिनचर्या में शामिल थी सुबह की सैर, जिससे उनकी सेहत ठीक रह सके। वे सुबह आठ बजे से लेकर रात दस बजे तक काम करते थे। दोपहर में एक छोटी सी झपकी उनकी दिनचर्या का हिस्सा थी। गत 13 फरवरी को अस्पताल में दाखिल होने तक वे अपने दिनभर के काम को चार हिस्सों में बांटते थे.प्रशासनिक काम, पत्रों और ई.मेलों का उत्तर देनाए पढ़ना और लिखना। इस मामले में वे काफी सख्त थे और कार्यालय के कर्मचारियों को उनके इस कार्यक्रम में फेरबदल करने की इजाजत नहीं थी। शहर के बाहर के आगन्तुकों से वे इस निर्धारित दिनचर्या को तोड़कर भी मिल लेते थे परन्तु उनसे मिलने के इच्छुक मुंबईवासियों से यह अनुरोध किया जाता था कि वे समय लेकर आयें। फिर भी, अगर कोई दूर से आता था तो उसके मामले में वे कब.जब अपने कार्य विभाजन से समझौता भी कर लेते थे। रविवार और छुट्टी के दिनों में भी वे इस दिनचर्या का पालन करते थे, चाहे फिर उन्हें कार्यालय में अकेले ही क्यों ना बैठना पड़े। रविवार की शाम को कभी.कभी वे टहलने या कार से कुछ दूर घूमने चले जाया करते थे। वे अक्सर प्रवास पर रहते थे और इस कारण हम लोग . यानी उनके परिवारजन . उनके साथ से वंचित रहते थे। जो संगठनए समूह या व्यक्ति उन्हें विभिन्न कार्यक्रमों के लिए आमंत्रित करते थे, उनके बीच वे कोई भेदभाव नहीं करते थे। एक बार वे किसी कार्यक्रम में पहुंचने की सहमति दे देते थे, उसके बाद वे अपने वायदे को निभाते थे, चाहे उसी तारीख में उन्हें कितनी ही महत्वपूर्ण संस्था से दूसरा निमंत्रण क्यों न प्राप्त हो जाये।  तबियत खराब होने पर भी वे अपनी यात्राएं स्थगित नहीं करते थे। उन्होंने शांति और विवादों के निपटारे पर कई कार्यशालाओं का संचालन उस स्थिति में भी किया जब वे बीमार थे। इस अनुशासन और कड़ी मेहनत के कारण ही वे दुनिया को इतना कुछ दे सके। परन्तु इस कारण ही उनका जीवन छोटा हो गया। हम अपने जीवन में कितना अनुशासन रख सकते हैं और कितने सुनियोजित ढंग से काम कर सकते हैं?
;2द्ध उनके लिए न्यायए समानताए प्रेमए गरिमा और विविधता के मूल्यों के अतिरिक्त और कुछ भी पवित्र नहीं था . कोई कर्मकाण्ड नहींए कोई परंपरा नहीं और कोई संस्कृति नहीं। उनके लिए संस्कृति केवल वह माध्यम थी जिसके जरिये मनुष्य अपने आसपास की दुनिया को समझता है। और इसलिए उनका मत था कि सभी संस्कृतियां और सभी धर्म सम्मान के पात्र हैं। इन मूल्यों के अतिरिक्त, बाकी हर चीज में सुधार हो सकता था, उनकी पुनर्व्याख्या की जा सकती थी, उन्हें एक नये दृष्टिकोण से समझा जा सकता था, तार्किकता की कसौटी पर कसा जा सकता था और उनमें ऐसे बदलाव लाये जा सकते थेए जिससे वे इन पवित्र मूल्यों को बढ़ावा देने में मदद कर सके। सत्य की उनकी जीवनपर्यन्त खोज में कोई सीमायें नहीं थीं और वे किसी भी पवित्र प्रतीक, कर्मकाण्ड, परंपरा, भाषा या संस्कृति से बंधे हुये नहीं थे। सत्य को तभी हासिल किया जा सकता है जब कोई व्यक्ति इस दिशा में अनवरत और निर्भीक प्रयास करे। उनके लिए सत्य तक पहुंचने के लिए कोई भी कीमत अधिक नहीं थी। इसके लिए जरूरी था अपने अन्तःकरण को ईमानदारी से खंगालना और अपनी अंतरात्मा की आवाज के अनुरूप काम करना। सत्य की अपनी इस खोज की उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी। जब वे बंबई महानगर पालिका में सिविल इंजीनियर बतौर काम कर रहे थे तब उनकी ईमानदारी और इंजीनियरों के संघ का नेतृत्व करने के कारण उन्हें बार.बार यहां से वहां और वहां से यहां स्थानांतरित किया जाता रहा। उन्हें पदोन्नतियां भी नहीं मिलीं। अन्ततः उन्होंने यह तय किया कि वे अपना पूरा समय अपने सिद्धांतों और मूल्यों को बढ़ावा देने के काम में लगायेंगे।  आमदनी में भारी कमी होने के बावजूद उन्होंने महानगर पालिका से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। सैयदाना और उनके तंत्र ने डाक्टर इंजीनियर को बोहरा समाज से बहिष्कृत कर दिया। नतीजे में उनके अपनी मांए भाईए बहन और अन्य नातेदारों से रिश्ते खत्म हो गये। सन् 2000 के फरवरी माह में सैयदाना के जुनूनी अनुयायियों ने उनके कार्यालय और घर पर हमला किया और जमकर तोड़.फोड़ मचाई। उन पर सैयदाना के इशारे पर छः बार कातिलाना हमले हुये। उन्हें अक्सर धमकियों और बदसलूकी का शिकार बनना पड़ता था। परन्तु उन्होंने सत्य की खोज का अपना अभियान जारी रखा। कोई भी बलिदान इतना बड़ा नहीं था जो कि वे अपने सिद्धांतों के खातिर नहीं दे सकते थे। हम सत्य की खोज कितनी ईमानदारी से कर सकते हैं और क्या हम इस काम में अनवरत जुटे रह सकते हैं?
 अगर कोई व्यक्ति सत्य के किसी आयाम तक पहुँचता है तो उसे अपनी इस खोज को सभी के साथ बांटना चाहिएए बिना इस बात की परवाह किये कि उसके क्या नतीजे होंगे। और इसके लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जाना चाहिए जिसे सभी लोग आसानी से समझ सकें। वे अक्सर मुझसे कहा करते थे कि एक पैगम्बर और दार्शनिक के बीच यही अंतर होता है कि पैगम्बर अपनी बात ऐसी भाषा में कहता है जिसे लोग आसानी से समझ सकते हैं जबकि दार्शनिक की भाषा ऐसी होती है जिसे समझना केवल चन्द लोगों के बूते की बात होती है। दार्शनिक प्रसिद्धी हासिल करते हैंए पैगम्बर समाज को बदलते हैं और अपनी विरासत की गहरी छाप छोड़ जाते हैं। एक सामाजिक कार्यकर्ता व बुद्धिजीवी के तौर पर डाक्टर इंजीनियर लिखने और बोलने . दोनों में आसानी से समझ आने वाली भाषा का इस्तेमाल करते थे। शुरू में उनकी भाषा बहुत अकादमिक हुआ करती थी परन्तु शनैः शनैः उन्हें यह अहसास हुआ कि अगर सामाजिक परिवर्तन के अपने लक्ष्य को हासिल करना है तो उन्हें साधारण शब्दों और भाषा का इस्तेमाल करना होगा। क्या हम निष्ठापूर्वक सामाजिक परिवर्तन लाने के अपने लक्ष्य के लिए काम करने को तैयार हैं?
 डाक्टर इंजीनियर अक्सर कहा करते थे कि सच्ची स्वतंत्रता के लिए उपयुक्त वातावरण आवश्यक है। इसके लिए जरूरी है प्रजातंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी। वे प्रजातंत्र, संवाद और विविधता पर बहुत जोर देते थे। उनका कहना था कि इन तीनों के बगैर हम न तो एक दूसरे को समझ सकेंगे और ना ही उसकी सारी जटिलताओं के साथए सत्य के विभिन्न पहलुओं को। अगर हम सत्य को पाना चाहते हैं तो यह जरूरी है कि हम अपना दिमाग खुला रखें और दूसरों की बातों को धैर्यपूर्वक सुनें। दो व्यक्तियों या समूहों के बीच मतविभिन्नता को आपसी संवाद के जरिएए एक ऐसे सेतु में बदला जा सकता है जिस पर चलकर दोनों के ज्ञान में वृद्धि होगी और दोनों एक दूसरे को समझ सकेंगे। वे इस बात पर बहुत जोर देते थे कि जिनसे हमारी मतभिन्नता है, उनसे संवाद करने में हमें कभी संकोच नहीं करना चाहिए।
विविधता भी उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण थी क्योंकि विभिन्न संस्कृतियां, जीवन के बारे में अलग.अलग सोच को प्रतिबिम्बित करती हैं। चूंकि हर संस्कृति मानवीय क्षमताओं और भावनाओं के केवल एक हिस्से को उद्घाटित कर पाती है इसलिये मानव को पूरी तरह से समझने के लिए हर संस्कृति को दूसरी संस्कृतियों की मदद की आवष्यकता होती है। दूसरी संस्कृतियों को समझने से हमारे बौद्धिक और नैतिक क्षितिज का विस्तार होता है और हम आत्ममुग्ध होने से बचे रहते हैं। हम इस मिथ्या अभिमान से ग्रस्त नहीं हो पाते कि हमारी संस्कृति सर्वश्रेष्ठ है। इसका यह अर्थ नहीं है कि हम हमारी संस्कृति के अंदर एक अच्छा जीवन नहीं बिता सकते। परन्तु इसका अर्थ केवल यह है कि अन्य चीजों के समान रहने परए जीवन जीने का हमारा तरीका अधिक समृद्ध होगा यदि हमें जीवन जीने के दूसरे तरीकों की भी समझ और जानकारी होगी। वैसे भी, आज की आधुनिक और आपसी निर्भरता वाली दुनिया में किसी भी व्यक्ति के लिए शायद ही यह संभव हो कि वह केवल अपनी संस्कृति की चहारदीवारी में बंद रह सके। कोई भी संस्कृति बिल्कुल बेकार नहीं होती। हर संस्कृति हमारे सम्मान की हकदार सिर्फ इसलिये बन जाती है क्योंकि वह उसके मानने वालों के लिए महत्वपूर्ण है और उसमें रचनात्मक ऊर्जा है। वे यह भी मानते थे कि कोई संस्कृति अपने आप में सम्पूर्ण नहीं होती और ना ही किसी एक संस्कृति को दूसरी संस्कृतियों पर लादा जाना चाहिये। संस्कृतियों में परिवर्तन उनके अंदर से आना चाहिये।
 जिस व्यक्ति ने सत्य को पा लिया है उसके लिये अतिआवश्यक है कि वह विनम्र हो। डाक्टर इंजीनियर अत्यंत विनम्र व्यक्ति थे। जिन दिनों वे कार्यालय से घर तक पैदल आया करते थेए अक्सर उन्हें सड़क पर कोई भी अजनबी रोक लेता था। वह कोई साधारण व्यक्ति ही होता था। वह डाक्टर इंजीनियर से किसी भी विषय पर चर्चा शुरू कर देता या अपने संदेहों का निवारण करता या कभी कभी उनसे बहस भी करता। वे उस अजनबी से घंटों तर्क.वितर्क करते रहते थे। मेरे पैर दुखने लगते थे परन्तु डाक्टर इंजीनियर तब तक चर्चा जारी रखते थे जब तक या तो वह व्यक्ति पूरी तरह संतुष्ट ना हो जाये या मैदान छोड़ने का निर्णय ना कर ले। जब मैं बाद में उनसे पूछता था कि उन्होंने अपना समय एक अजनबी पर क्यों बर्बाद किया तब उनका उत्तर रहता था कि दुनिया में हर व्यक्ति महत्वपूर्ण होता है। डाक्टर इंजीनियर अत्यंत सुलभ थे और कोई भी व्यक्तिए दिन हो या रातए अपने प्रश्नों या संदेहों के निवारण के लिए उनसे संपर्क कर सकता था। वे ऐसे ई.मेल संदेशों का भी जवाब देते थे जिनमें उन्हें गालियां दी जाती थीं। वे अपने हर विरोधी से अत्यंत धैर्यपूर्वक तर्क करने में सक्षम थे। उनकी विनम्रता के कारण कई कट्टर व्यक्ति भी उनसे बहुत प्रभावित थे। कट्टर विचारों वाले व्यक्तियों से तर्क करने और उन्हें समझाने की उनमें अद्भुत क्षमता और असीम धैर्य था। उनकी दृष्टि में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं था जिसके विचारों में परिवर्तन नहीं किया जा सकता हो। वे यह मानते थे कि हर व्यक्ति को सत्य से परिचित करवाकर उसे न्याय और शांति के लिए काम करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। विनम्रता उनका नैसर्गिक गुण था और वह सत्य के सिक्के का दूसरा पहलू भी था। परन्तु इसके साथ साथए वह उनके कट्टर विरोधियों का दिल जीतने का हथियार भी थी। उन्होंने कई मौकों पर अत्यंत चुनौतिपूर्ण परिस्थितियों में अपनी शांति कार्यशालाओं का संचालन किया था। कब.जब तो हालात इतने खराब होते थे और सुविधाएं इतनी कम कि कोई सभ्य व्यक्ति शायद ही वहां ठहरता। परन्तु वे ना केवल वहां रहते थे वरन् उत्साहपूर्वक काम भी करते थे। उनके लिए व्यक्ति महत्वपूर्ण थे ना कि सुख.सुविधाएं और आराम। वे आसानी से लोगों पर विश्वास कर लेते थेए विशेषकर जरूरतमंदों पर। उनके मन में जरूरतमंदों, अन्याय के शिकार व्यक्तियों और कष्ट भोग रहे लोगों के प्रति सहानुभूति और करूणा का गहरा भाव रहता था।
;6द्ध न्याय के साथ शांतिए एक अन्य मूल्य थाए जिसके प्रति डाक्टर इंजीनियर की पूर्ण प्रतिबद्धता थी। उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि न्याय के बिना शांति की स्थापना नहीं हो सकती। और न्याय से उनका अर्थ मात्र यह नहीं था कि किसी व्यक्ति के अधिकारों का अतिक्रमण करने वाले को सजा मिले और पीड़ित व्यक्ति को हुए नुकसान की प्रतिपूर्ति की जाये। उनके लिए न्याय का अर्थ यह भी था कि समाज में उपलब्ध संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण हो और वर्गीय असमानतायें ना रहें। शांति स्थापना के लिए अपने काम के दौरान उन्होंने साम्प्रदायिक विवादों और हिंसा का गहराई से अध्ययन किया और वे इस नतीजे पर पहुंचे कि साम्प्रदायिक हिंसा की जड़ में सामाजिकए आर्थिक व राजनैतिक असमानताएं हैं। उन्होंने साम्प्रदायिक हिंसा और विवादों पर बहुत कुछ लिखा। उनका हमेशा यह कहना रहता था कि यद्यपि साम्प्रदायिक हिंसा को भड़काने के लिए धर्म का इस्तेमाल एक हथियार बतौर किया जाता है परन्तु धर्मए साम्प्रदायिक हिंसा का मूल कारण नहीं है। साम्प्रदायिक संघर्ष का असली कारण है दोनों समुदायों के श्रेष्ठी वर्ग का राज्य सहित,  सामाजिक.आर्थिक संस्थाओं पर अपना वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास। धर्म का इस्तेमाल तो केवल भोलेभाले लोगों को भड़काने के लिए किया जाता है। उनकी यह मान्यता थी कि अल्पसंख्यकों के विरूद्ध फैलाये गये पूर्वाग्रहों के बगैर साम्प्रदायिक हिंसा नहीं हो सकती। अल्पसंख्यकों के खिलाफ पूर्वाग्रह वह नींव है जिस पर साम्प्रदायिक दंगों की इमारत खड़ी की जाती है। डाक्टर इंजीनियर ने अत्यंत परिश्रम से ऐसी तथ्य व आंकड़े इकट्ठे किये जिनकी सहायता से अल्पसंख्यकों के संबंध में फैले या फैलाये गये पूर्वाग्रहों को दूर किया जा सके। कई लोगों ने मुझसे मिलकर या पत्राचार के जरिये मुझे यह बताया है कि किस तरह डाक्टर इंजीनियर की कार्यशालाओं में भाग लेने के बादए अल्पसंख्यकों के प्रति उनका रवैया बदल गया। हरियाणा के एक पुलिस अधिकारी मुझसे तब मिले जब डाक्टर इंजीनियर आई.सी.यू। में थे और उन्होंने मुझे बताया कि डाक्टर इंजीनियर की कार्यशाला में भाग लेने के बाद मुसलमानों के बारे में उनकी सोच पूरी तरह बदल गयी। उस दिन के बाद से उन्होंने मुसलमानों से घृणा करना छोड़ दिया। और इससे भी महत्वपूर्ण यह कि उन्होंने इस तरह के मूखर्तापूर्ण दुष्प्रचार पर विश्वास करना बंद कर दिया कि औरंगजेब तभी खाना खाता था जब उसके सामने जनेऊ पहने हुये बीस ब्राह्मणों की लाशें रख दी जाती थीं।
 अपने अनुसंधान और अध्ययन के आधार पर डाक्टर इंजीनियर इस निष्कर्ष पर भी पहुंचे कि धर्म को मुल्ला.पंडितों के पंजों से मुक्त कर आम लोगों के हाथों में सौंपने से धर्म को नया जीवन मिलेगा। इससे आम लोग अपने.अपने धर्म के उन पक्षों के बारे में भी जान सकेंगे जिन्हें मौलवियों और पंडितों ने उनसे अब तक छुपा रखा था। तब धर्म एक ऐसी सच्ची नैतिक शक्ति बन सकेगा जिसका इस्तेमाल दमित वर्ग अन्याय से लड़ने और दमन के यथास्थितिवादी तंत्र को बदलने के लिये कर सकेंगे। उनके लिए ऐसा धर्म अर्थहीन था जो अपने अनुयायियों को यथास्थिति को चुनौती देने की प्रेरणा नहीं देता, जो उन्हें धार्मिक शिक्षाओं की पुनर्व्याख्या करने की इजाजत नहीं देता, जो उन्हें विद्रोह करने से रोकता है। उन्होंने वामपंथी विचारकों की इस मान्यता को भी चुनौती दी कि धर्म आम लोगों की अफीम है। उन्होंने मार्क्स को उद्वत करते हुये लिखा कि मार्क्स के लिये भी धर्म केवल अफीम नहीं थी। उनके लिए वह दमितों की आह भी थी।
डाक्टर इंजीनियर लैंगिक न्याय और समानता . विशेषकर मुस्लिम महिलाओं के मामले में . के जबरदस्त पैरोकार थे। उन्होंने इस्लामए कुरान, इस्लाम के इतिहास और इस्लामिक विधिशास्त्र के अपने गहन अध्ययन का इस्तेमाल, मुस्लिम महिलाओं की भलाई करने के लिए किया। उनके अनुसार कुरान की सूराइननिस्सा में केवल महिलाओं के अधिकारों की बात की गयी है, पुरूषों के अधिकारों की नहीं। जहां भी पुरूषों की बात की गयी है वह उनके कर्तव्यों के संदर्भ में है। कुरान की यह व्याख्या करने के पीछे उनका उद्देश्य उस सामाजिक असंतुलन को ठीक करना था जिसमें महिलाओं के हिस्से केवल कर्तव्य आये हैं, अधिकार नहीं। उनका तर्क यह था कि मध्यकाल में जब मुस्लिम शासक नये.नये इलाकों पर कब्जा कर अपना साम्राज्य फैला रहे थे, उस दौर में पितृसत्तामक संस्कृति ने महिलाओं से वे अधिकार छीन लिए जो कुरान ने उन्हें दिये थे। कुरान का उनका अध्ययन इतना गहन था कि मुस्लिम उलेमा शायद ही कभी तर्क में उन पर भारी पड़ पाते थे और इसलिए वे पितृसत्तामक सांस्कृतिक मूल्यों को नैतिक आधार पर उचित बताते थे। उन्होंने मुझे यह सख्त निर्देश दिया था कि उनकी मृत्यु के बाद मेरी बहन और उनकी पुत्री को उनकी सम्पत्ति में से बराबर हिस्सा दिया जाये। समानता का उनका संघर्ष केवल महिलाओं तक सीमित नहीं था। वे सभी वर्गों की समानता के हामी थे। उन्होंने मण्डल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का संघर्ष तब शुरू किया था जब हम सब मण्डल आयोग के बारे में कुछ जानते तक नहीं थे।
असगर अली इंजीनियर का मिषन था धर्म को धार्मिक संस्थागत ढांचे से मुक्ति दिलाकर उसे धार्मिक ग्रंथों की वर्तमान व्याख्या पर प्रश्नचिन्ह लगाने के लिए इस्तेमाल करना। वे चाहते थे कि धर्म, सत्य तक पहुंचने की राह प्रशस्त करे, दमन पर आधारित सामाजिक व्यवस्था को बदले, विविधता को स्वीकार करे और संवाद व लैंगिक समानता के जरिए एक ऐसे समाज का निर्माण करे, जिसमें विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों वाले लोग प्रेमपूर्वक मिलजुल कर रह सकें। उन्होंने हमारे ज्ञान के कैनवास को बड़ा किया और समानताए न्याय, शांति और गरिमा के मूल्यों को प्रोत्साहित करने का रास्ता दिखाया। असगर अली इंजीनियर व्यक्ति नहीं संस्था थे। क्या हम उनके मिषन को उसी अनुशासन व समर्पण के भाव से आगे ले जाना चाहते हैं, जिस अनुशासन व समर्पण से उन्होंने अपना काम किया? हम ऐसा करने का पूरा प्रयास करेंगे।

-इरफान इंजीनियर

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

पुलिस और सांप्रदायिक दंगे





प्रथम दृष्टया, यह अत्यंत घिसापिटा विषय लगता है। सांप्रदायिक फसादों के दौरान और उनके बाद व पहले, पुलिस की भूमिका के बारे में पूर्व से ही हम सब बहुत-कुछ जानते हैं। हाल में, राज्यों के पुलिस महानिदेशकों और महानिरीक्षकों के दिल्ली में आयोजित सम्मेलन में अपने उद्घाटन भाषण में, प्रधानमंत्री ने देश में सांप्रदायिक हिंसा की बढ़ती घटनाओं पर गहरी चिंता जाहिर की थी। इस सम्मेलन में गुप्तचर सेवाओं के अधिकारियों ने भी भाग लिया था। स्पष्टतः, जब देश के प्रधानमंत्री किसी समस्या पर चिंता व्यक्त करते हैं तब उसे हम सभी को गंभीरता से लेना चाहिए।
इस वर्ष के पहले चार महीनों के दौरान देश में साम्प्रदायिक हिंसा की कोई वारदात नहीं हुई और मुझे लगने लगा कि दंगा-मुक्त वर्ष का मेरा सपना पूरा होने जा रहा है। परंतु मेरा यह स्वप्न जल्दी ही टूट गया। उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों में दंगे भड़क उठे। देश के अन्य हिस्सों में भी सांप्रदायिक हिंसा हुई। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी के सत्ता में आने के बाद से वहाँ सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में वृद्धि हुई है। इससे एक बार फिर यह जाहिर हुआ है कि दंगों के पीछे राजनैतिक मंतव्य होते हैं और धर्म का इनसे कोई लेनादेना नहीं होता। राजनैतिक उद्देश्यों से धार्मिक पूर्वाग्रह फैलाए जाते हैं।
दंगो के मामलों में पुलिस की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पुलिस को गुप्तचर सूचनाएं इकट्ठा करनी होती हैं, शरारती तत्वों की पहचान कर उन्हें पहले से गिरफ्तार करना होता है, हिंसा शुरू हो जाने की स्थिति में उसे रोकना होता है और दंगे समाप्त हो जाने के बाद, दंगाईयांे को कानूनी तंत्र के जरिए ऐसी सजा दिलवानी होती है ताकि वे आगे से हिंसा करने की हिम्मत न कर सकें। पुलिस की दंगो के दौरान भूमिका के मेरे कई दशकों के अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि इस वर्ष हुए दंगों में भी पुलिस के व्यवहार में तनिक भी परिवर्तन परिलक्षित नहीं हुआ।
यह आश्चर्यजनक है कि उत्तरप्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बावजूद, उत्तरप्रदेश पुलिस के व्यवहार में जरा-सा भी बदलाव नहीं आया है। हम सबको अपेक्षा थी कि मुलायम सिंह, जो कि मुख्यतः मुसलमानो के समर्थन से सत्ता में आए हैं, पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार लावेंगे। परंतु हम सबको निराशा ही हाथ लगी। अगर मुलायम सिंह ने पुलिस की कार्यप्रणाली में कोई बदलाव लाने की कोशिश की भी है तो पुलिस पर उसका कोई असर नहीं दिखलाई पड़ रहा है। पुलिस ने खुलकर दंगाईयों का साथ दिया। ऐसा लग रहा था मानों सत्ता में आने के तुरंत बाद, मुलायम सिंह सरकार को बदनाम करने का षडयंत्र अंजाम दिया जा रहा हो।
मैं इस निष्कर्ष पर भी पहुँचा कि शासन चाहे किसी भी पार्टी का क्यों न हो, पुलिस का व्यवहार एक सा ही बना रहता है। पुलिसकर्मियों के दिमागों मंे इतना जहर भर दिया गया है कि तुलनात्मक रूप से अधिक धर्मनिरपेक्ष सरकार के अधीन भी वे वैसा ही व्यवहार करते रहते हैं। परन्तु फिर, हमारे सामने बिहार और पश्चिम बंगाल के उदाहरण भी हैं, जहां लालू प्रसाद यादव और ज्योति बसु व बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली सरकारों के कार्यकाल में, क्रमशः 15 और 30 वर्षों तक कोई बड़ा साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ। बिहार और पश्चिम बंगाल में क्रमशः नितिश कुमार और ममता बेनर्जी के नेतृत्व मंे भी साम्प्रदायिक अमन कायम है।
शायद मुलायम सिंह यादव का व्यक्तित्व उतना मजबूत और चमत्कारिक नही है जितना कि बिहार और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्रियों का। यह साफ है कि किसी भी निश्चित नतीजे पर पहुंचने के लिए अत्यन्त गहराई से अध्ययन किये जाने की जरूरत है। प्राथमिक तौर पर हम केवल यही कह सकते हैं कि पुलिस उन मुख्यमंत्रियों की सुनती हैं जो शक्तिशाली होते है और पुलिस का इस्तेमाल अपने राजनैतिक हितों की पूर्ति के लिए नही करते। इन मुख्यमंत्रियों के कम से कम कुछ सिद्धांत होते हैं और वे पुलिस तक सही संदेश पहुंचाने में सफल होते हंै।
यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि क्या संपूर्ण पुलिस तंत्र का सांप्रदायिकीकरण हो गया है  या केवल निचले और मध्यम श्रेणी के पुलिस अधिकारी इस रोग से ग्रस्त हैं। एक बार, हैदराबाद की राष्ट्रीय पुलिस अकादमी में एक संगोष्ठी के दौरान, मैने यह मत व्यक्त किया कि पुलिस के उच्च अधिकारी, निचले और मध्यम स्तर के अधिकारियों की तुलना में कम साम्प्रदायिक और जातिवादी हैं। एक वरिष्ठ आई.पी.एस अधिकारी, जो कि मेरी ही तरह अकादमी में व्याख्यान देने आये थे, ने मुझसे असहमती जताते हुए कहा कि वरिष्ठ अधिकारी तो अपने मातहतों से कहीं ज्यादा फिरकापरस्त और जातिवादी हैं। मैने इस पर सिर्फ यही कहा कि आई.पी.एस. अधिकारी होने के नाते वे शायद मुझसे बेहतर जानते हैं।
मेरा स्वयं का अनुभव यह है कि पुलिस के उच्च अधिकारी वर्ग में दोनो तरह के लोग होते हैं- कुछ घोर साम्प्रदायिक तो कुछ पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष। गुजरात इन दोनो तरह के अधिकारियों का अच्छा उदाहरण है। वहां ऐसे आईपीएस अधिकारी थे जिन्होंने मुख्यमंत्री के आगे घुटने टेक दिये और उनके सभी जायज-नाजायज आदेशों को शिरोधार्य किया। कुछ अधिकारी ऐसे भी थे जो नहीं झुके, जिन्होंने अवैधानिक आदेश मानने से इंकार कर दिया और जबरदस्त दबाव के बाद भी जो अपने मत पर दृढ़ रहे। मैने इनमें से दूसरी श्रेणी के अधिकारियों के साथ कई बार कार्यक्रमों में शिरकत की है।
ऐसा भी नही हैं कि वे सब अधिकारी दलित थे। उनमें से कुछ ब्राम्हण सहित अन्य उच्च जातियों के भी थे और कुछ निचली जातियांे के। मंै ऐसे दो आईपीएस अधिकारियों को जानता हूँ जो भाई-भाई हैं, एक ऊँची जाति से आते हैं, पुलिस महानिदेशक के दर्जे के हैं और  जिनकी धर्मनिरपेक्षता किसी भी संदेह के परे हैं। वे अपने पूरे कार्यकाल के दौरान अपने सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध बने रहे और उन्होंने बड़े साहस से साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं का मुकाबला किया।
यह कहा जा सकता है कि इस प्रकार के अधिकारी एक अपवाद हंै और मेरे पास इस तर्क का कोई जवाब भी नही है। परन्तु मैंने ऐसे कई अन्य अधिकारी भी देखे हैं। हैदराबाद की राष्ट्रीय पुलिस अकादमी में आयोजित एक कार्यशाला में पूरे देश से आये प्रोबेशनर आईपीएस अधिकारियों को साम्प्रदायिक दंगो और उन्हें रोकने में पुलिस की भूमिका पर केस स्टडी प्रस्तुत करनी थी। इस कार्यशाला में प्रोफेसर राम पुनियानी और मैं निर्णायक मंडल में थे। कई आईपीएस अधिकारियों का प्रस्तुतिकरण इतना अच्छा था कि मैंने प्रोफेसर पुनियानी से मजाक में कहा कि अब हम लोगों को इस क्षेत्र से सन्यास ले लेना चाहिए क्योंकि युवा पुलिस अधिकारी पहले से ही धर्मनिरपेक्षता के प्रति इतने प्रतिबद्ध है कि उन्हें किसी प्रकार के प्रशिक्षण की आवश्यकता नही है।
यद्यपि यह सच है परन्तु पूरा सच नही। और शायद आने वाले लम्बे समय तक यह पूरा सच नही बन सकेगा। हर धर्मनिरपेक्ष अधिकारी के पीछे विभिन्न स्तरों के अनेक साम्प्रदायिक अधिकारी होते हैं। उनकी जातिवादी और साम्प्रदायिक सोच साफ झलकती है। मैंने बम्बई (1992-93), मेरठ (1987), गुजरात (1985, 2002) व भिवन्डी (1984) दंगो में पुलिस की इस पुर्वाग्रहपूर्ण सोच का अनुभव किया है।
मैं यह स्वीकार करता हूँ कि पूर्वाग्रहग्रस्त अधिकांश अधिकारी निचले दर्जे के थे परन्तु शीर्ष स्तर पर भी, कुछ अपवादों को छोड़ कर, हालात बहुत भिन्न नही थे। मुम्बई में निचले स्तर के अधिकांश पुलिसकर्मी मराठी सामना पढ़ते हैं और मुसलमानों के बारे में सामना की ही भाषा में बात करते हैं। फिर भला हम उनसे कैसे यह उम्मीद करें कि वे उत्तेजना फैलाने वाले लेखन के लिए सामना के विरूद्ध कार्यवाही करेंगे। मुम्बई दंगो के समय के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नायक का रवैया देखिए। जब मुम्बई के गणमान्य नागरिकों का एक
प्रतिनिधिमंडल उनसे मिला और दंगों को रोकने का आग्रह किया तो उनका जवाब था कि “आप लोग बाल ठाकरे से मिल लंे क्यों कि वे ही दंगा भड़का रहे हैं”। साफ तौर पर श्री नायक ने अपने अधिकार, ठाकरे के पास गिरवी रख दिये थे। इतने कमजोर मुख्यमंत्री से हम कैसे यह अपेक्षा कर सकते हैं कि वह दंगों को रोकेगा। यह शर्मनाक है कि महाराष्ट्र सहित कई अन्य स्थानों पर जो पुलिस अधिकारी दंगों पर नियंत्रण पाने में असफल रहे और जिनकी दंगा जांच आयोगो ने कड़ी निंदा की, उन्हें सजा मिलना तो दूर, उनकी पदोन्नति कर दी गई।
उदाहरणार्थ, सन् 1970 के भिवन्डी-जलगाँव दंगों की जांच के लिए नियुक्त मादोन आयोग ने अपनी रपट में तत्कालीन पुलिस अधीक्षक की जमकर खिंचाई करते हुए कहा था कि उन्होंने निर्दाेषांे को गिरफ्तार किया और दोषियों को बख्शा। परन्तु इसके बाद भी उन्हें एक के बाद एक पदोन्नतियां मिलती गईं और अंततः वे महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुये। एक अन्य उदाहरण मुम्बई पुलिस के एक संयुक्त आयुक्त का है जिन्होेंने आठ मदरसा छात्रों को दंगाई बताकर गोली मार दी थी। श्रीकृष्ण आयोग ने अपनी जांच रपट में इस अधिकारी की इस भूल की कड़े शब्दों में निंदा की थी परन्तु उन्हें शिवसेना सरकार के कार्यकाल मंे मुम्बई का पुलिस आयुक्त बना दिया गया। उनकी सेवानिवृति के बाद, एक अदालत ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया परन्तु वे दिल का दौरा पड़ने का बहाना लेकर एक अस्पताल में भर्ती हो गए और वहीं रहते हुए उन्होंने एक अदालत से जमानत ले ली। इस प्रकार वे एक दिन के लिए भी जेल नहीं गए।
इस तरह के तो कई उदाहरण हैं। परन्तु हाल में मुम्बई में ही इसका ठीक विपरीत उदाहरण सामने आया। मुम्बई के पुलिस आयुक्त अरूप पटनायक ने हिंसा पर उतारू भीड़ को नियंत्रित करने में अनुकरणीय साहस और योग्यता दिखाई। वे पचास हजार लोगो की उत्तेजित भीड़ को चुपचाप अपने घर जाने के लिए प्रेरित कर सके। इसके लिए वे ईनाम के हकदार थे परन्तु इसके उलट राज ठाकरे के दबाव में महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर.आर. पाटील ने उनका तबादला सड़क परिवहन के महानिदेशक के पद पर कर दिया। राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने पटनायक के खिलाफ कार्यवाही की मांग करते हुए लगभग 45 हजार लोगों का जुलूस निकाला था।
राज ठाकरे अब तक मुसलमानों के खिलाफ चुप्पी बनाए हुए थे और यहां तक कि कुछ मामलों में वे मुसलमानों का समर्थन भी कर रहे थे। परन्तु अब शायद सन् 2014 के चुनाव के परिपेक्ष्य में उनका दृष्टिकोण बदल गया है और वे हिन्दुत्व कार्ड खेलने पर आमादा हैं। पटनायक को हटाने की मांग को लेकर विशाल रैली निकालने के पीछे उनका उद्देश्य एक पत्थर से दो पक्षियों का शिकार करना था। पहला यह कि इससे वे शिवसेना के नजदीक आ गये और शिवसेना के साथ सन् 2014 के चुनाव में उनकी पार्टी के गठबंधन की संभावना बढ़ गई। दूसरे, उन्होेंने महाराष्ट्र की राजनीति में अपना दबदबा कायम किया। परन्तु इस राजनैतिक खेल में एक अत्यन्त कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी की बली चढ़ गई, जिन्होंने एक गम्भीर स्थिति से सफलतापूर्वक मुकाबला किया था।
शायद यही कारण है कि कार्यशालाओं के दौरान कई पुलिस अधिकारी मुझसे कहते हैं कि वे इस मामले मंे कुछ खास नहीं कर सकते क्योंकि वे तो राजनीतिज्ञों के मोहरे भर है। इस बात में दम है। गुजरात मंे कई पुलिस अधिकारियों ने राजनैतिक दबाव का मुकाबला करने की कोशिश की परन्तु असफल रहे। अलबत्ता, हमेशा ऐसा नहीं होता। पुलिस अधिकारियों की सोच में पूर्वाग्रह बिल्कुल साफ नजर आते हैं। इस सोच को खत्म करने के लिए स्कूली पाठ्यक्रमों से लेकर पुलिस प्रशिक्षण संस्थानों तक के पाठ्यक्रमों में आमूलचूल परिवर्तन लाने होगें। हमे हमारे पुलिसकर्मियों को धर्मनिरपेक्ष बनाना होगा।
यह भी जरूरी है कि अहमदाबाद के नरोदा पाटिया मामले में जिस तरह का निर्णय आया है वैसे ही निर्णय आगे भी सुनाए जाते रहंे। एक पूर्व मंत्री को दंगे भड़काने के आरोप में 28 साल के कारावास की सजा से वे राजनेता हतोत्साहित होंगे जो अपने मतदाताओं के साम्प्रदायिक तबके का इस्तेमाल अपने हितों के लिए करते हैं। इस मामले मंे न्यायाधीश ज्योत्सना याज्ञनिक बधाई की पात्र हैं।
-डा. असगर अली इंजीनियर

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

साम्प्रदायिक दंगे 2011 -4

राजस्थान के भरतपुर जिले के गोपालग में 14 सितम्बर को सन 2011 का सबसे बड़ा साम्प्रदायिक दंगा हुआ। हिंसा में 11 लोग मारे गए जिनमें से 9 की मौत मस्जिद के अंदर पुलिस द्वारा गोली चलाने से हुई। भरतपुर में मुख्यतः मेव मुसलमान बसते हैं। विवाद एक कब्रिस्तान को लेकर था। हिन्दुओं का कहना था कि उनके जानवरों को पानी पिलाने के लिए गाँव में स्थित तालाब की भूमि को पंचायत ने गलत तरीके से मुसलमानों के कब्रिस्तान के लिए आवंटित कर दिया था।
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत राज्य में साम्प्रदायिक हिंसा को नियंत्रित करने में पूरी तरह असफल रहे हैं। हलोत से व्यक्तिगत रूप से अनुरोध किया कि इन दोनों अधिकारियों को निलंबित किया जाना चाहिए। पिछले साल राजस्थान में सरोदा और मंगल थाना में दो बड़े दंगे हुए थे और दोनों ही जगह पुलिस की भूमिका घोर पक्षपातपूर्ण थी। उदयपुर जिले के सरोदा में जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक की उपस्थिति में मुसलमानों के 30 घर जलाए गए। मैंने श्री गबड़ी संख्या में मुसलमानों ने उनके कार्यालय के बाहर धरना भी दिया। परंतु उन्होंने कोई कार्यवाही नहीं की। इससे साम्प्रदायिक सोच वाले पुलिस अधिकारियों का मनोबल ब़ा और अन्य स्थानों पर भी पुलिस अधिकारियों ने खुलओम साम्प्रदायिक तत्वों का साथ देना शुरू कर दिया।
गोपालग के दंगे को गहलोत ने शुरू में केवल जमीन का विवाद बताया। परंतु बाद में श्रीमती सोनिया गांधी द्वारा उनसे जवाब तलब किए जाने के बाद उन्होंने कलेक्टर और एसपी को निलंबित किया। राजस्थान में साम्प्रदायिक स्थिति बहुत खराब है और गहलोत हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। भाजपा, सत्ता में वापसी के लिए खुलओम साम्प्रदायिक कार्ड खेल रही है। श्रीमती सोनिया गांधी से मिले राजस्थान के कांग्रेसी नेताओं और सांसदों के एक
प्रतिनिधिमंडल ने भी उनसे शिकायत की कि मस्जिद के भीतर पुलिस का गोली चलाना अनुचित और अकारण था। राजस्थान के मुसलमान श्री गहलोत से बहुत नाराज हैं और बड़ी संख्या में मुसलमान उनके कार्यक्रमों का बहिष्कार कर रहे हैं।
यद्यपि भरतपुर साम्प्रदायिक दृष्टि से संवेदनशील है परंतु गोपालग का साम्प्रदियक हिंसा का कोई इतिहास नहीं था। वहाँ हिन्दू और मुसलमान शांतिपूर्वक एक साथ रह रहे थे। वैसे भी, मेव मुसलमान, सांस्कृतिक दृष्टि से
आधे हिन्दू हैं। उनमें से कई के हिन्दू नाम हैं और वे हिन्दू त्यौहार भी मनाते हैं। भाजपा हमेशा से यह कहती आई है कि मुसलमान, देश की सामाजिक मुख्यधारा में शामिल होने के लिए तैयार नहीं हैं और इसलिए बहुसंख्यक सम्प्रदाय उनके प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त रहता है। यद्यपि प्रजातंत्र में जीने का अधिकार पाने के लिए शर्तें नहीं लगाई जा सकतीं तथापि भरतपुर के मुसलमानों के हिन्दूकरण के बाद भी उनके विरुद्ध क्रुर साम्प्रदायिक हिंसा की गई। इससे भाजपा के दावे का खोखलापन उजागर हो जाता है।
भाजपा शासित उत्तराखण्ड के रुद्रपुर में भी साम्प्रदायिक दंगा हुआ। रुद्रपुर का भी साम्प्रदायिक हिंसा का कोई इतिहस नहीं है। ऐसा लगता है कि वहाँ जानबूझकर दंगा भड़काया गया। दो प्रयास हुए जिनमें से एक सफल हो गया।
पहली घटना में 28 सितम्बर की रात को कुछ लोगों ने कुरान के पन्ने एक कपड़े में बाँधे। उस कपड़े को लाल पेंट में इस तरह डुबाकर मानो वह खून से रंगा हो, सती मंदिर में रख दिया। 29 सितम्बर की सुबह जब श्रद्घालु मंदिर पहुँचे तब खून से रंगी हुई कुरान के पन्ने मंदिर में रखे देखकर उनमें तनाव फैल गया। पुलिस ने स्थिति को सँभाला। हिन्दुओं को यह समझाया गया कि इस घटना से मुसलमान भी उतने ही नाराज हैं जितने कि वे।
दूसरा प्रयास सफल हो गया। गांधी जयंती के दिन कुछ कागजों को, जिनपर अरबी में कुछ लिखा हुआ था, मांस के टुकड़ों के साथ बाँधकर उसी मंदिर में फेंक दिया गया। जैसे ही खबर फैली करीब 150 मुसलमान मंदिर के पास इकट्ठा हो गए। धीरेधीरे यह संख्या लगभग 800 हो गई। भीड़ जल्दी ही हिंसक हो गई और हिंसा में 38 पुलिसकर्मी और अन्य अधिकारी जख्मी हो गए। इसके बाद हिन्दुओं की जवाबी कार्यवाही शुरू हुई जिससे स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई।
पुलिस के अनुसार 30 से अधिक नागरिक घायल हुए और कम से कम 100 वाहनों में आग लगा दी गई। दिल्ली, नैनीताल राष्ट्रीय राजमार्ग पर रुद्रपुर के आसपास सड़क के दोनों ओर जले हुए वाहनों के स्टील के कंकाल बिखरे पड़े थे। लगभग एक सौ दुकानों को लूटकर उनमें आग लगा दी गई। पुलिस ने 37 लोगों के खिलाफ एफ0आई0आर0 दर्ज की जिनमें से 24 को गिरफ्तार कर लिया गया। स्थिति को इस हद तक बिगड़ने से रोका जा सकता था यदि प्रशासन 29 सितम्बर को ही कड़ी कार्यवाही करता और दोषियों को सींखचों के पीछे डाल देता। बाद में राज्य सरकार ने रुद्रपुर के जिला मजिस्ट्रेट और क्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक का तबादला कर दिया।
यह था सन 2011 में हुए साम्प्रदायिक दंगों का लेखाजोखा। कहने की आवश्यकता नहीं कि इनमें से अधिकांश दंगे बहुत मामूली विवादों से शुरू हुए। यह साफ है कि छोटेमोटे मुद्दे भी बड़ी हिंसा का रूप इसलिए ग्रहण कर लेते हैं क्योंकि अनवरत चलने वाले साम्प्रदायिक प्रचार ने हम सबके मन में ज़हर भर दिया है। दोनों समुदायों के सदस्य एक दूसरे के प्रति पूर्वाग्रह पाले हुए हैं और उनमें आपसी विश्वास न के बराबर है। इसके अतिरिक्त, पुलिसकर्मी मुसलमानों के विरुद्ध रहते हैं और अक्सर हिंसा भड़काने वालों का साथ देते हैं। साम्प्रदायिक हिंसा भड़कने का एक कारण गरीबी और बेरोजगारी भी है। जब तक इन मुद्दों पर समुचित ध्यान नहीं दिया जाता तब तक देश को साम्प्रदायिक हिंसा से मुक्त करना संभव नहीं होगा।

-डा. असगर अली इंजीनियर



मो0 : 09869446999

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

साम्प्रदायिक दंगे 2011 -3


अगस्त महीने की 8 तारीख को मुरादाबाद शहर एक बार फिर साम्प्रदायिक हिंसा की चपेट में आ गया। काँवड़ियों (गंगाजल ले जा रहे शिवभक्त) के एक जुलूस को एक मुस्लिम मोहल्ले से होकर निकलने की इजाजत नहीं दी गई। काँवड़िये एक मस्जिद के सामने से अपना जुलूस ले जाना चाहते थे। काँवड़ियों ने पहले पुलिस से हुज्जत की और उसके बाद उनमें से कुछ ने मस्जिद पर गोलियाँ दागीं। चूँकि रोज़ा अफ्तार का समय नजदीक आ रहा था इसलिए पुलिस कोई जोखिम उठाना नहीं चाहती थी।
जब मुस्लिम तराबी के लिए अपने घरों से निकले तब काँवड़ियों ने उन्हें मस्जिद जाने से रोका। इसके बाद हिंसा भड़क उठी। काँवड़ियों ने कई मोटर साइकिलों और अन्य वाहनों में आग लगा दीं और पुलिस की गाड़ियों पर भी गोलियाँ दागीं। उन्होंने एक मस्जिद पर भी पत्थरबाजी की। आसपास खड़े कुछ ट्रकों को भी आग के हवाले कर दिया गया। एक पुल पर से गुजर रहे लोगों पर पुल के नीचे से गोलियाँ चलाई गईं। ऐसा लगता है कि यह हिंसा पूर्व नियोजित थी।
अगस्त महीने की 22 तारीख को मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर में एक धार्मिक जुलूस को लेकर शुरू हुए विवाद ने दो समुदायों के बीच हिंसक संघर्ष का रूप ले लिया। जमकर पत्थरबाजी हुई जिसके बाद पुलिस ने 6 थाना क्षेत्रों में कफ्र्यू लगाकर स्थिति को नियंत्रित किया। जबलपुर शहर का साम्प्रदायिक हिंसा का लंबा इतिहास है। यही वह शहर था जहाँ सन 1961 में स्वतंत्र भारत का पहला साम्प्रदायिक दंगा हुआ था।
इसके तीन दिन बाद, उत्तर प्रदेश के बहराइच शहर में साम्प्रदायिक हिंसा हुई। बहराइच भी साम्प्रदायिक दृष्टि से संवेदनशील शहर है। एक मस्जिद के सामने दो समुदायों के सदस्यों के बीच किसी मुद्दे पर बहसबाजी हुई। उसके बाद दोनों गुटों ने एकदूसरे पर पत्थर फेंकने शुरू कर दिए। बीच में किसी ने गोलियाँ भी चलाईं जिससे एक व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गया। इलाज के लिए लखनऊ ले जाते वक्त रास्ते में उसकी मृत्यु हो गई। हिंसा में कई लोग घायल भी हुए।
इसी दिन महाराष्ट्र के ठाणे जिले के टिटवाला में हिंसा भड़क उठी। उस दिन जन्माष्टमी थी। कुछ हिन्दू असामाजिक तत्वों ने मुस्लिम युवकों की पिटाई कर दी और मुसलमानों की गाड़ियों और सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाया। वहाँ हुई हिंसा के फोटो सहित मुसलमानों का एक प्रतिनिधि मंडल महाराष्ट्र के गृहमंत्री श्री आर0 आर0 पाटिल से मिला। गृहमंत्री को बताया गया कि हमलावर अब भी खुलओम मुस्लिम बस्तियों में घूम रहे हैं और मुसलमान डर के साए में जीने को मजबूर हैं। प्रतिनिधिमंडल ने पुलिस कार्यवाही पर भी प्रश्न चिन्ह लगाए।
2 सितम्बर को ईद थी। इस दिन महाराष्ट्र के अहमद नगर जिले के नेवासा में साम्प्रदायिक दंगा हुआ। ऐसा आरोप है कि पुलिस का व्यवहार अत्यंत पक्षपातपूर्ण रहा। जो मुसलमान थाने में एफ0आई0आर0 लिखवाने गए उन्हें ही आई0पी0सी0 की धारा 307 का आरोपी बनाकर गिरफ्तार कर लिया गया। मुसलमानों के साथ ऐसा अक्सर होता है और इसलिए वे एफ0आई0आर0 दर्ज कराने से भी घबराते हैं। कई मुसलमानों ने नेवासा से भागकर अहमद नगर में शरण ली। इस दंगे में मुसलमानों पर चाकुओं और तलवारों से हमला किया गया और ज़की नामक एक व्यक्ति का कार्यालय पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया। इसके बाद भी पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की और उल्टै मुसलमानों को हत्या के प्रयास का आरोपी बना दिया। इसके अगले दिन 3 सितम्बर को मध्यप्रदेश के उज्जैन में साम्प्रदायिक दंगा हुआ। उज्जैन में खासी मुस्लिम आबादी है। इस हिंसा में दो लोग मारे गए और 16 घायल हुए। ऐसा कहा जा रहा है कि विवाद की शुरुआत शहर के पुराने इलाके दौलतगंज में स्थित एक दुकान में गणेश की मूर्ति की स्थापना को लेकर हुई। यह दुकान एक मस्जिद के बगल में है। यह स्पष्ट नहीं है कि दंगे का कारण केवल वह मूर्ति थी या कुछ और। वैसे गणेश की मूर्ति की स्थापना को लेकर ही मस्जिद के बगल में विवाद का कारण नहीं बननी चाहिए। सितम्बर माह की 7 तारीख को आंध्रप्रदेश के कुरनूल जिले की अधूनी तहसील में हुई हिंसा में सैकड़ों लोग घायल हुए। इनमें से तीन को गंभीर चोटें आईं। कारण वही पुराना था मस्जिद के सामने संगीत बजाया जाना। पुलिस को भीड़ को तितरबितर करने के लिए कई बार लाठी चार्ज करना पड़ा। दोनों ओर से पत्थरबाजी हुई और यह सिलसिला चार घंटे तक चलता रहा। इसके बाद पुलिस ने हवा में गोलियाँ भी चलाईं। गणेश की प्रतिमाओं को विसर्जन के लिए ले जाया जा रहा था। यह जुलूस एक मस्जिद के सामने रुक गया और वहाँ काफी समय तक बाजे बजाए गए। इसके बाद हिंसा शुरू हुई। दोनों पक्ष ट्रकों और आटो रिक्शों में पत्थर भरकर लाए थे।
महाराष्ट्र के आदिवासी इलाके नंदूरबार में 8 सितम्बर को गणेश विसर्जन के दौरान हिंसा हुई जिसमें दो लोगों ने अपनी जानें गवाईं और कई घायल हो गए। बताया जाता है कि विवाद एक गैरकानूनी गणेश मंडप को लेकर शुरू हुआ। मुसलमानों का आरोप है कि स्थानीय थाने के इंस्पेक्टर रमेश पाटिल का रवैया अत्यंत पक्षपातपूर्ण था और उन्होंने मुसलमानों को डराया धमकाया। यहाँ भी अपनी सम्पित्त को नुकसान पहुँचाए जाने की एफ0आई0आर0 लिखवाने थाने पहुँचे मुसलमानों को धारा 353 में गिरफ्तार कर लिया गया। इस धारा में 326 मुसलमानों को और केवल 12 गैर मुसलमानों को गिरफ्तार किया गया। इसी तरह, 6 मुसलमानों को धारा 302 और 12 को धारा 307 में गिरफ्तार किया गया। इन धाराओं में एक भी गैरमुस्लिम की गिरफ्तारी नहीं हुई। नंदूरबार के मुसलमान इतने आतंकित हैं कि उनमें से जो वहाँ बरसों से रह रहे थे वे भी अपने घर वापस जाने के लिए तैयार नहीं हैं।

-डा. असगर अली इंजीनियर
क्रमश:

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

साम्प्रदायिक दंगे 2011 -2


मेरठ में 25 अप्रैल को एक गिलास ठंडा पानी सांप्रदायिक हिंसा का सबब बन गया। मेरठ के नजदीक काज़ीपुर गाँव के दो रहवासी गाँव की छोटी मस्जिद में पहुँचे और पीने के लिए पानी माँगा। उनसे कहा गया कि वे मस्जिद प्रांगण में लगे नल से पानी पी सकते हैं। परंतु उन्होंने ठंडे पानी की माँग की। जब उनसे यह कहा गया कि ठंडा पानी मस्जिद में उपलब्ध नहीं है तो वे मस्जिद के इमाम और वहाँ मौजूद अन्य लोगों पर टूट पड़े। उन्होंने मस्जिद में पढ़ रहे कुछ बच्चों की भी पिटाई कर दी। इमाम और उनके साथियों की रपट लिखने से पुलिस ने साफ इंकार कर दिया। इसके बाद मुसलमानों की एक भीड़ ने थाने को घेर लिया। पथराव हुआ जिसमें सिटी मजिस्ट्रेट और कुछ पुलिस अधिकारी घायल हुए।
इसके बाद भीड़ ने दुकानों और मकानों को निशाना बनाना शुरू किया। कई पुलिस चौकियों को आग के हवाले कर दिया गया। पुलिस ने बतौर सावधानी शहर के सभी सरकारी और निजी स्कूलों को बंद करवा दिया। यह सब हुआ केवल एक गिलास ठंडे पानी की खातिर।
मेरठ का सांप्रदायिक हिंसा का लंबा इतिहास है। सन 1987 में वहाँ हुई जबरदस्त हिंसा के बाद पी0ए0सी0 जवानों ने 54 मुस्लिम युवकों को उनके घरों से निकाल कर गोली मार दी थी। उनके शवों को हिण्डन नहर में फेंक दिया गया था।
अगली घटना भी उत्तरप्रदेश के ही मुरादाबाद में हुई। कुछ पुलिसवाले मुल्ज़िम की तलाश में एक मुस्लिम घर में घुसे। मुल्ज़िम को वहाँ न पाकर वे घरवालों से दुव्र्यवहार करने लगे। उन्होंने नूरजहाँ नामक 10 साल की बच्ची के हाथ से कुरान छीनकर उसके बिस्तर पर पटक दिया। जब उन्होंने बिस्तर पलटा तब कुरान नीचे गिर गई। इससे मुसलमान नाराज हो गए। इसे कुरान का अपमान बताते हुए मुसलमानों की भारी भीड़ इकट्ठा हो गई और पुलिसवालों के विरुद्ध कार्यवाही की माँग करने लगी। पुलिस बारबार भीड़ को तितरबितर होने के लिए कहती रही और भीड़, पुलिसवालों के खिलाफ कार्यवाही की माँग दोहराती रही। भीड़ ने पुलिस थाने पर भी हमला किया और पुलिसवालों की गाड़ियों को आग लगा दी। पुलिसकर्मियों पर पत्थर भी फेंके गए। जवाब में गुस्साए पुलिसकर्मियों ने भीड़ की जम कर पिटाई की। पुलिस ने गोलियाँ भी चलाईं जिसमें दो मुसलमान और पेट्रोल पंप पर काम करने वाला एक हिन्दू गंभीर रूप से घायल हो गए। शहर में कफ्र्यू लगाया गया। निकटवर्ती गाँवों के रहवासियों ने पुलिस की बर्बर कार्यवाही और गिरफ्तारी के डर से आसपास के जंगलों में शरण ली।
उस्मानिया विश्वविद्यालय की ए0बी0व्ही0पी0 शाखा की बदौलत तेलंगाना जैसे क्षेत्रीय आंदोलन का भी साम्प्रदायिकीकरण हो गया है। इसी सांप्रदायिकीकरण का नतीजा था कि आंध्र प्रदेश के आदिलाबाद जिले में 8 जुलाई को छः मुसलमानों को जिंदा जला दिया गया। यह लोमहर्षक घटना आंध्रप्रदेश व महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित एक गाँव में हुई। शरारती तत्वों ने जिले के वाटोली गाँव में अल्पसंख्यकों के एक घर में आग लगा दी। निकटवर्ती भैनसा नगर का साप्रंदायिक हिंसा का लंबा इतिहास है इसलिए सरकार काफी सावधान थी। वाटोली गाँव में मारे गए लोगों में महबूब खान, नोमान, अरसालन, रिजवान व साफिया बेगम के अलावा दो वर्षीय टूबा महोश भी शामिल थे।
दिनांक 12 जुलाई को आगरा के मनटोला इलाके में साम्प्रदायिक हिंसा भड़क उठी। एक बीमार बकरी को अस्पताल ले जा रहे ट्रक से दूसरे समुदाय के कुछ लोगों को मामूली चोटें आईं। इसके बाद शुरू हुए विवाद ने जल्द ही दोनों समुदायों के सदस्यों के बीच हिंसक झड़पों का रूप ले लिया। पत्थरबाजी शुरू हो गई। दुकानों, मकानों और गाड़ियों में आग लगा दी गई। कुछ लोगों ने गोलियाँ भी चलाईं। जवाब में पुलिस ने भी गोलीबारी की। ड्यूटी पर तैनात डी0आई0जी0 को गोली लगतेलगते बची। लोग अपने घरों की छतों से गोलियाँ चला रहे थे। भारी संख्या में हथियारबंद पुलिस व पी0ए0सी0 के जवानों की तैनाती के बाद बड़ी मुश्किल से दंगे पर नियंत्रण पाया जा सका।
-डा. असगर अली इंजीनियर
क्रमश:

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

साम्प्रदायिक दंगे 2011 -1



दंगामुक्त भारत अब भी एक ऐसा स्वप्न बना हुआ है जिसका निकट शिष्या में पूरा ह®ना असंभव जान पड़ता है। हर वर्ष की तरह, वर्ष 2011 में भी देश के विभिन्न हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा हुई। बीते वर्ष के शुरुआती महीनों में देश के किसी हिस्से से बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा की खबर नहीं आई या ऐसा लगा कि शायद यह वर्ष तुलनात्मक दृष्टि से शांत रहेगा। परंतु साल के मध्य अ©र अंत में अनेक सांप्रदायिक फसाद हुए जिन्होंने हमारे देश क® शर्मसार किया। इस संदर्भ में एक सकारात्मक पहलू यह है कि सन् 2011 में, मुंबई (1992-93) व गुजरात (2002) जैसी भयावह हिंसा नहीं हुई। परंतु इसके पीछे एक कारण है। शिवसेना, भाजपा अ©र उसके जैसे अन्य संगठन या पार्टियाँ चाह कर भी बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा नहीं फैला सकतीं क्योंकि उसके लिए जिस भावनात्मक ज्वार की जरूरत ह®ती है, उसे पैदा करना बहुत आसान नहीं है। यह तभी ह® सकता है जब बाबरी मस्जिद क® ढहाए जाने जैसी क®ई बड़ी घटना ह®।
सन् 2011 में सांप्रदायिक दंगों का खाता खुला महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के उमरखेडी में, जहाँ 13 जनवरी क® कुछ हिन्दू लड़क®ं द्वारा एक मुसलमान लड़की क® छेड़े जाने के बाद द® गुटों के बीच पथराव शुरू ह® गया। बड़े पैमाने पर हिंसा भड़कने की आशंका के चलते दुकानें बंद ह® गईं या ल®ग अपने जूते चप्पल तक छ®ड़ कर बाजार से भागने लगे। परंतु स्थानीय पुलिस अधिकारी श्री देवकाटे ने जल्दी ही स्थिति पर नियंत्रण कर लिया। जिला मुख्यालय से पुलिस बल बुलवाकर उन्होंने हालात क® बिगड़ने नहीं दिया।
इससे साफ है कि यदि पुलिस निष्पक्षता से काम करे त® हिंसा र®की जा सकती है। यह भी साफ है कि छेड़छाड़ जैसी मामूली घटनाएँ, जब केवल कानून अ©र व्यवस्था की समस्या न रहकर सांप्रदायिक स्वरूप अख्तियार कर लेती हंै, जनता, हिन्दू अ©र मुसलमानों में विभाजित ह® जाती है। किसी क® क्रिकेट बाल लगने या क®ई छ®टी-म®टी सड़क दुर्घटना जैसी साधारण घटनाएँ तक समाज क® सांप्रदायिक आधार पर विभाजित करने के लिए पर्याप्त ह®ती हंै। यह सब नतीजा है निरंतर चलने वाले सांप्रदायिक दुष्प्रचार का अ©र हमारी शिक्षा व्यवस्था का ज® विद्यार्थियों के दिल® दिमाग में फिरका-परस्ती का जहर श्र देती है।
इसी तरह की एक अन्या घटना में, एक ईसाई पादरी व मुसलमान रिक्षा चालक के बीच हुए झगड़े ने हिन्दू-मुस्लिम विवाद का रूप ले लिया। कुछ सांप्रदायिक तत्व एक मुस्लिम म®हल्ले में घुस गए और वहाँ जम कर पत्थरबाजी की। कई मकानों व दुकानों क® आग के हवाले कर दिया गया। अनेक वाहन भी क्षतिग्रस्त हुए। हमलावरों ने क्षेत्र में रह रहे आदिवासियों क® भी नहीं बख्शा। दुर्भाग्य्ावष, पुलिस ने अत्यंत पक्षपातपूर्ण व्यवहार किया अ©र केवल मुसलमानों व आदिवासियों पर लाठी चार्ज किया। संपत्ति का नुकसान भी मुसलमानों का ही ज्यादा हुआ।
गुजरात का बड़©दा, सांप्रदायिक दृष्टि से संवेदनशील शहर है। वहाँ 16 फरवरी क® कुछ शरारती तत्वों ने ईद के उपलक्ष्य्ा में सड़क पर लगाए गए स्वागत द्वार क® गिराकर उसमें आग लगा दी। मछुआरा समुदाय के चमीस कहार नामक व्यक्ति क® गिरफ्तार किया गया। कहारों अ©र मुसलमानों के बीच बड़©दा में अक्सर झड़पें ह®ती रहतीं हैं क्योंकि द®नों समुदायों के कुछ सदस्य अवैध शराब के धंधे में संलग्न हंै। शिव कहार के नेतृत्व में कहारों व मुसलमानों के बीच बड़©दा में 1982 में भयावह हिंसा हुई थी।
इस साल मार्च के महीने की द® तारीख क® मुंबई के सेवरी में पैगंबर साहब के जन्मदिन के सिलसिले में लगाए गए झंडे अ©र प®स्टर कुछ सांप्रदायिक तत्वों ने फाड़ दिए। द® दिन बाद, 5 मार्च क® कुछ ल®गों ने एक बच्चे क® धक्का देकर गिरा दिया। इससे हिंसा भड़क उठी। द®नों अ®र से पथराव ह®ने लगा। कुछ ल®गों ने मुस्लिम महिलाअ®ं के साथ छेड़छाड़ भी की। पुलिस का व्यवहार एक बार फिर पक्षपातपूर्ण रहा। शरारती तत्वों के विरुद्ध कुछ नहीं किया गया। उल्टे मुसलमानों पर लाठीचार्ज हुआ अ©र कई मुस्लिम लड़कों क® हिरासत में ले लिया गया। पुलिस कमिष्नर ने भी यह स्वीकार किया कि एक सामान्य झगड़े क® सांप्रदायिक रंग दे दिया गया था अ©र उनके प्रयासों से द®नों पक्षों में समझ©ता हुआ।
अगली घटना महाराष्ट्र के एक अन्य संवेदनशील शहर अ©रंगाबाद में हुई। 20 मार्च क® कुछ मुसलमान लड़के अ©र लड़कियाँ एस0बी0 कालेज से एक परीक्षा देकर ल©ट रहे थे। मुस्लिम लड़कियाँ बुर्क़ा पहने हुए थीं परंतु इसके बावजूद उन पर कुछ सांप्रदायिक तत्वों ने रंग डालना शुरू कर दिया। जब उन्होंने इसका विर®ध किया त® उन पर चाकुअ®ं अ©र गुप्ती से हमला कर दिया गया। चार विद्यार्थी गंभीर रूप से घायल हुए।
पुलिस ने हमलावरों क® गिरफ्तार कर लिया। इनमें वे लड़के भी शामिल थे ज® घटनास्थल से भाग गए थे। डाँ अंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय के कुल पति प्र®0 पांडे ने एस0बी0 काॅलेज के प्रशासन के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही की क्योंकि काॅलेज ने सांप्रदायिक हमलावरों क® क®ई सजा नहीं दी थी।
मुंबई की धारावी एशिया की सबसे बड़ी मलिन बस्ती है। सांप्रदायिक दृष्टि से अत्य्ान्त संवेदनशील इस इलाके में सन् 1992-93 के दंगों के द©रान भारी हिंसा हुई थी। इसके बाद वहाँ म®हल्ला शंाति समितियाँ बनाई गईं जिनका अच्छा असर हुआ। सन् 1992-93 के बाद पहली बार इस वर्ष यहाँ सांप्रदायिक हिंसा हुई जिसमें चार ल®ग घायल हुए। ऐसा लगता है कि शंाति समितियों की सक्रियता क® बढ़ाए जाने की जरूरत है।
दुर्भाग्य्ावष, पिछले कुछ सालों में पूरा महाराष्ट्र राज्य ही सांप्रदायिक दृष्टि से अत्यन्त संवेदषील बन गया है अ©र हर वर्ष इस राज्या में बड़ी सन्ख्या में सांप्रदायिक दंगे ह®ते हंै। सन् 2001 से 2011 के दषक में महाराष्ट्र में देष के अन्य्ा सभी राज्याओं से ज्यादा, 1192 सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएँ हुईं जिनमें 172 ल®ग मारे गए। उŸार प्रदेश में इसी अवधि में 1112 दंगे हुए जिनमें 384 मासूमों ने अपनी जान गवाईं।

-डा. असगर अली इंजीनियर
क्रमश:

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

इस्लाम, मुसलमान और मीडिया




मुसलमानों की यह पुरानी शिकायत है कि मीडिया का इस्लाम व मुसलमानों के प्रति
शत्रुतापूर्ण रूख है। विशेषकर, पश्चिमी मीडिया तो मुसलमानों के प्रति घोर पूर्वाग्रहपूर्ण रवैया रखता
है और 9/11 के बाद से, मीडिया का रूख और पक्षपात पूर्ण हो गया है। ऐसा नहीं है कि 9/11
के पहले, मीडिया का मुसलमानों के प्रति दोस्ताना रवैया था। मीडिया के इस रवैये के पीछे जटिल
कारण हैं, जिन्हें समझने की कोशिश मुसलमानों को करनी चाहिए। मीडिया को लगातार कटघरे में
खड़ा करने, उसकी निंदा करने से कुछ हासिल नहीं होगा। निंदा करना आसान है, उसके कारणों
को समझना मुष्किल।
इस लेख में मैं मीडिया के इस रूख के कारणों की विवेचना करना चाहूंगा। किसी भी
समस्या का निदान तभी हो सकता है जब हम उसके कारण को समझें। सबसे पहले तो हमें यह
समझ लेना चाहिए कि मीडिया का बैर भाव राजनैतिक है न कि धार्मिक, यद्यपि सरसरी निगाह से
देखने पर ऐसा लग सकता है कि इसके मूल में धार्मिक कारक हैं। इस्लाम व इसाईयत दोनों
विश्वव्यापी धर्म हैं। इन दोनों धर्मों के राजा-बादशाह एक दूसरे के प्रतिद्वन्दी थे व एक-दूसरे की
कीमत पर अपना-अपना साम्राज्य कायम करने की कोशिश में लगे रहे।
इस्लाम और इसाईयत में कोई प्रतिद्वंदिता नहीं थी परंतु इन धर्मों के शासकों में अवश्य
थी। इससे दोनों धर्मों के अनुयायियों के मन में पूर्वाग्रहों ने अपनी जड़ें जमा लीं। क्रूसेड्स पूरी
ताकत से लड़े गए और इसका भी आमजनों के मनोमस्तिष्क पर प्रभाव पड़ा। तुर्की, दुनिया के
सबसे बड़े साम्राज्यों में से एक बनकर उभरा और उसका विस्तार मध्य यूरोप तक हो गया।
इससे यूरोप वासियों को लगे घाव के निशान अब भी बाकी हैं।
मध्य युग में मुस्लिम साम्राज्यों का बोलबाला रहा। पुनर्जागरण (रेनेसां) के बाद से दुनिया में
यूरोप का दबदबा बढ़ा। यूरोपीय देशों ने विज्ञान व तक्नालाॅजी के क्षेत्रों में आशातीत प्रगति की व वे
एशियाई व अफ्रीकी देशों में अपने उपनिवेश स्थापित करने लगे। इन देशों में उनका मुकाबला
मुसलमानों से हुआ। भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने के लिए, अंग्रेजों को मुगल बादशाह को
पराजित करना पड़ा।
कहने की आवश्यकता नहीं कि इस सत्ता संघर्ष ने यूरोप वासियों के मन में इस्लाम व
मुसलमानों के प्रति गहरे पूर्वाग्रह उत्पन्न किए। कई ईसाई शासको ने मिशनरियों के जरिए अपने
धर्म का प्रचार करवाया। जवाबी कार्यवाही में मुसलमान, षासकों ने अपने धर्मावलम्बियों के ईसाई
बनने पर कडाई से रोक लगाई और अपने धर्मप्रचारकों के जरिए, आदि वासियों को इस्लाम का
अनुयायी बनाने के लिए अभियान चलाए। इस सबसे ऐसा लगने लगा मानों बादशाहों के बीच
का यह संघर्ष राजनैतिक न होकर धार्मिक हो।
ये पूर्वाग्रह बने रहे और आज भी मीडिया के शत्रुतापूर्ण रवैये के रूप में प्रतिबिंबित हो रहे
हैं। प्रो. हटिंगटन की पुस्तक “क्लैष आॅफ सिविलाईजेषंस“, जिसकी पश्चिमी मीडिया ने जमकर
तारीफ की, भी इसी पूर्वाग्रह का नतीजा है। सोवियत संघ के पतन के बाद यह पुस्तक और
महत्वपूर्ण बन गई। अमरीका एक “बाहरी षत्रु“ की तलाश में था और पश्चिमी देशों का पुराना
प्रतिद्वंदी इस्लाम इसके लिए एकदम उपयुक्त साबित हुआ।
दोनों विश्वयुद्धों में हुई भीषण बर्बादी के बाद दुनिया में कुछ समय तक शान्ति बनी रही।
इन युद्धों में मुख्यतः ईसाई शक्तियां ही शामिल थीं और ये युद्ध धार्मिक प्रभुता नहीं बल्कि
राजनैतिक प्रभुता स्थापित करने के लिए लड़े गए। युद्धों के बाद नष्ट हो चुके देशों का पुनर्निर्माण
शुरू हुआ, संयुक्त राष्ट्र संघ अस्तित्व में आया और धर्म व धार्मिक प्रतिद्वंदिता का स्थान
मानवाधिकारों व मानवीय गरिमा की अवधारणाओं ने ले लिया।
द्वितीय विश्व युद्ध से एक नई समस्या उभरी और वह थी इजराईल की। इजराईल का
निर्माण फिलिस्तीन की धरती पर हुआ। जो क्रूसेड्स से हासिल नहीं किया जा सका उसे इजराईल
के जरिए पाने की कोशिश हुई। इजराईल का निर्माण उन करोड़ों यहूदियों की जानों के मुआवज़े
बतौर नहीं हुआ, जिन्हें नाजियों ने मौत के घाट उतार दिया था। इसका असली उद्देश्य था
इस्लामिक दुनिया पर प्रभुत्व जमाना। निर्दोष यहूदियों की क्रूर हत्या के लिए अरब देश कतई
जिम्मेदार नहीं थे। फिर भी, इसकी कीमत अरब देशों व विशेषकर फिलिस्तीन को चुकानी पड़ी।
यहूदीवाद दुनिया की सबसे आक्रामक दक्षिणपंथी राजनैतिक विचारधारा के रूप में उभरा।
उसे पश्चिमी राष्ट्रों, विशेषकर अमरीका का भरपूर सहयोग व समर्थन मिला। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद
इंग्लैंड की जगह अमरीका दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में सामने आया। अमरीका ने
इजराईल को पूरा समर्थन दिया और आज तक देता आ रहा है। इजराईल ने अमरीकी नीतियों को
अपने दक्षिणपंथी राजनैतिक चरित्र के अनुरूप पाया और दोनों देशों की घनिष्ठता बढ़ती गई।
यही वे तत्व हैं जो अमरीका के प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया के नियंता हैं और इस्लाम व
मुसलमानों को बदनाम करने में उन्हें अपना हित नज़र आता है। उनकी एकता, ईसाईयों व
यहूदियों की एकता नहीं बल्कि दक्षिणपंथी राजनैतिक ताक़तों की एकता है। इसी तरह, फिलिस्तीन
में ईसाई अरब व मुसलमान अरब एक हैं क्योंकि दोनों ही यहूदीवादी आक्रामकता के शिकार हैं।
इस तरह, यह स्पष्ट है कि मुसलमानों व इस्लाम पर हमला, यहूदियों या ईसाईयों ने नहीं बल्कि
दक्षिणपंथी राजनैतिक ताकतों ने बोला है।
यह दिलचस्प है कि अधिकांश पश्चिमी देश धर्मनिरपेक्ष हैं व धर्मनिरपेक्ष-राष्ट्रवाद में आस्था
रखते हैं। इसके बावजूद वे इजराईल जैसे धर्म-आधारित देष के अंधसमर्थक हैं- एक ऐसे देष के
जहाँ सभी गैर-यहूदी, चाहे वे ईसाई हों या मुसलमान, दूसरे दर्जे के नागरिक हैं। इजराईल में
मुसलमान व ईसाई अरबों को वे नागरिक अधिकार प्राप्त नहीं हैं जो कि यहूदियों को हैं। परंतु चूंकि
वह उनका हित-साधन करता है इसलिए पश्चिमी देशों को धार्मिक राष्ट्रवाद के सिद्धांत पर गठित
इज़राईल से संयुक्त गठबंधन बनाने में कोई गुरेज नहीं है। धर्म-आधारित किसी भी अन्य राष्ट्र को
पश्चिमी देश तुरंत प्रतिक्रियावादीबर्बर करार देते हैं।

इस्लाम व मुसलमानों के प्रति इस पुराने वैमनस्य को 9/11 की घटना ने जमकर हवा दी। अब इस्लाम व मुसलमानों के खिलाफ घोषित तौर पर युद्ध होने लगे। पश्चिमी मीडिया ने भी
मुसलमानों के मुँह पर कालिख पोत ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मुसलमानों को इस मामले में गहन
चिंतन करने की जरूरत है। उन्हें यह समझना चाहिए कि आतंकी हमले करने से कुछ हासिल नहीं
होता। उलटे, इससे इस्लाम बदनाम होता है। ओसामा बिन लादेन और उसके मुट्ठीभर अल्कायदा
अनुयायियों ने इस्लाम के नाम पर बट्टा लगा दिया है। पश्चिमी मीडिया के अनवरत दुष्प्रचार के
चलते आज सारी दुनिया यह मानने लगी है कि इस्लाम, हिंसा का धर्म है। अल्कायदा को कभी
आम मुसलमानों का समर्थन नहीं मिला। उसका साथ दिया मुसलमानों के एक आक्रामक तबके ने।
पी.ई.डब्ल्यू. सहित अनेक एजेंसियों द्वारा कराए गए सर्वेक्षणों से यह सामने आया है कि अल्जीरिया
से लेकर इंडोनेशिया तक-मुसलमानों का एक बहुत छोटा सा तबका 9/11 जैसे हमलों का
समर्थक है। परंतु पश्चिमी मीडिया ने कभी इस तरह की खबरों को महत्व नहीं दिया। हाँ, हर
आतंकी हमला, मुख पृष्ठ की सुर्खियों में स्थान पाता रहा।
मुसलमानों को न सिर्फ शान्ति में आस्था रखने वाला समुदाय बनना चाहिए वरन् उन्हें
शाँतिपूर्ण समुदाय दिखना और लगना भी चाहिए। तभी पश्चिमी मीडिया को मजबूर किया जा
सकेगा कि वह मुसलमानों के बारे में सकारात्मक खबरों को भी तवज्जो दे। अगर ऐसा नहीं किया
गया तो चंद मुसलमानों द्वारा की गई हिंसा को पूरे समुदाय की कारगुज़ारी बताने का सिलसिला
जारी रहेगा। इस्लाम और मुसलमानों की मीडिया में खराब छवि के पीछे अन्य कारण भी हैं। हम
मुसलमानों को इस विषय में गंभीर चिंतन करना होगा और हमारे समाज में परिवर्तन लाने होंगे।
पश्चिमी मीडिया यह देखता है कि अधिकांश इस्लामिक देशों में नागरिक स्वतंत्रताओं का
अभाव है व तानाशाही शासन है। गहराई में जाए बिना वे यह मान लेते हैं कि इस्लाम, प्रजातंत्र का
हामी नहीं है और कुलीन वर्गों के शासन को प्रोत्साहन देता है। कई दक्षिणपंथी मुस्लिम युवक,
तुर्की में खलीफा के राज्यारोहण को सभी समस्याओं का हल बताते हैं और मीडिया उनकी इस बात
का बतंगड़ बना देता है।
अगरचे कभी इस्लाम या पैगंबर के प्रति अपमानजनक कोई लेख, कार्टून या चित्र किसी
पश्चिमी अखबार या पत्रिका में प्रकाशित होता है तो तुरत हिंसक प्रदर्शन शुरू हो जाते हैं।
यहाँ तक कि संबंधित लेखक या कार्टूनिस्ट का सर कलम करने की बात उठने लगती है और
इससे पश्चिमी मीडिया इस निष्कर्ष पर पहॅुचता है कि इस्लामिक संस्कृति में सहिष्णुता व अभिव्यक्ति
की स्वतंत्रता के लिए कोई स्थान नहीं है और वह पश्चिमी संस्कृति से एकदम भिन्न है।
वे यह भूल जाते हैं कि कुछ दशकों पहले तक पश्चिमी समाज भी ऐसा ही था। मुस्लिम
समाज आज भी आधुनिक नहीं बन सका है और उसकी सोच सामंती है। पत्रकारों की नई
पीढ़ी एकदम अलग संस्कृति व वातावरण में पली बढ़ी है और उस पर दक्षिणपंथी प्रचार का असर
भी है। आश्चर्य नहीं की वह इस्लामिक देशों में हो रही घटनाओं को मानवाधिकारों के गंभीर हनन
के रूप में देखती है और उसके खिलाफ कड़े शब्दों में लिखती है। ये पत्रकार मानते हैं कि केवल
पश्चिमी संस्कृति ही स्वतंत्रता व प्रजातंत्र की गारंटी है और इस्लामिक समाज अत्यन्त असहिष्णु
तानाशाहीपूर्ण है।
पत्रकारों की वर्तमान पीढ़ी मीडिया के व्यवसायी करण के युग में जी रही है और वह पिछली
पीढ़ी के विपरीत मुद्दों की गहराई में जाने में विश्वास नहीं रखती। वह सतही प्रमाणों के आधार पर
तुरंत किसी निष्कर्ष पर पहुंच जाती है। आज के पत्रकारों को सच की परवाह नहीं है। उनकी रूचि

केवल मोटा वेतन पाने में है। जाहिर है कि सत्यान्वेषण की कमी से पत्रकार गलत निष्कर्ष पर
पहुँचता है।
इससे भी दुःखद यह है कि पश्चिमी अखबारों में जो कुछ लिखा जाता है उसे तीसरी
दुनिया के देशों का मीडिया धु्रवसत्य मानकर जैसा का तैसा छाप देता है। इससे पश्चिमी मीडिया
का मुसलमानों के प्रति पूर्वाग्रहपूर्ण रवैया एक विश्वव्यापी समस्या बन गया है। भारत इस मामले में
अपवाद नहीं है। यद्यपि भारतीय मीडिया स्वतंत्र व निष्पक्ष है तथापि वह भी पश्चिमी मीडिया के
निष्कर्षाें को बिना जाँच पड़ताल के निगल लेता है। इसके अतिरिक्त, भारत में अनेक दक्षिणपंथी
दल और विचारधाराएँ हैं जिनके प्रचार का असर भाषायी मीडिया और कुछ हद तक अंग्रेजी मीडिया
पर दिखलायी पड़ता है।
मीडिया प्रजातांत्रिक व्यवस्था का एक अभिन्न अंग है। मीडिया जनमत का निर्माता है
परंतु यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि किसी भी मुद्दे की समुचित विवेचना करने के स्थान पर वह पूर्वाग्रहों
को स्वीकार कर लेता है, यथास्थिति को बढ़ावा देता है और बहुसंख्यकवादी विचारों को प्रोत्साहन
देता है। इस्लामिक देशों के मीडिया का भी यही हाल है। वह भी बहुसंख्यकों के विचारों को
प्राथमिकता देता है, अल्पसंख्यक-विरोधी है और दक्षिणपंथी विचारधारा का पोशक है। चंद अपवादों
को छोड़कर मुस्लिम देशों का मीडिया स्वतंत्र नहीं है।
कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि पश्चिम, तीसरी दुनिया और इस्लामिक देश-तीनों
का ही मीडिया स्वतंत्र, निष्पक्ष व पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं है।
-डा. असगर अली इंजीनियर
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